santosh  chilhate
santosh chilhate Dec 7, 2017

payyr palo duniyame kahi man pya shya na rhe radhae radhe

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mamta kushwah May 15, 2021

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Ravi Kumar Taneja May 15, 2021

🌹🌹 *परिवार दिवस की शुभकामनाएं*🌹🌹 🌼 *एक अच्छी सुबह,* *एक अच्छी उम्मीद,* *सब अच्छा होगा*🌼 🌲 *जीवन में थोड़ा सा भय भी ज़रुरी है* *मौत का भय जीवन की रक्षा करता है*🌲 🌲 *बीमारी का भय स्वास्थ्य की रक्षा करता है*🌲 🌲 *गलती का भय सही राह दिखता है*🌲 🌲 *दुःख का भय नेकी के रास्ते बनाये रखता है*🌲 🌲 *पैसा सिर्फ लाइफस्टाइल बदल सकता है* *दिमाग,नियत और किस्मत नहीं*🌲 🌲 *जिस आदमी के पास एक चेहरा है,* *उस आदमी को तनाव नहीं होता है*🌲 *🌼तनाव चेहरों को बदलने से होता है* *इसलिए जो बदला जा सके उसे बदलो,*🌼 🏹 *जो बदला ना जा सके उसे स्वीकारों,* *और जो स्वीकारा ना जा सके* *उससे दूर हो जाओ* *लेकिन स्वयं को खुश रखो*🏹 🕉 *डर* से बड़ा कोई *वायरस* नहीं,, और *हिम्मत* से बड़ी कोई *वैक्सीन* नहीं...🕉 🌹 *स्वस्थ रहें,मस्त रहे, आनंदित रहे,खुश रहे,सुखी रहे, एवं मजे करें 🌹 *🕉 *सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया!*🤲 *सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग् भवेत्!!🤲*🕉 🕉सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।🕉 *जय बजरंग बली* आप सबकी हिफाजत करना,जान किसी की भी हो सबको सलामत रखना🕉🦚🦢🙏🌼🙏🦢🦚🕉

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Manoj manu May 15, 2021

🚩🔔🏵जय श्री राम जी राधे राधे जी 🌿🏵🙏 🌹🌹ईश्वर कहाँ मिलेंगे आईये जानते हैं श्री राम चरित। मानस ज्ञान से ,बाबा श्री तुलसी दास जी :- 🌹🌹जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती॥ 🌹🌹तेहिं समाज गिरिजा मैं रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक कहेउँ॥ भावार्थ:-जिसके हृदय में जैसी भक्ति और प्रीति होती है, प्रभु वहाँ (उसके लिए) सदा उसी रीति से प्रकट होते हैं। हे पार्वती! उस समाज में मैं भी था। अवसर पाकर मैंने एक बात कही-॥ 🌹🌹हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥ 🌹🌹देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥ भावार्थ:-मैं तो यह जानता हूँ कि भगवान सब जगह समान रूप से व्यापक हैं, प्रेम से वे प्रकट हो जाते हैं, देश, काल, दिशा, विदिशा में बताओ, ऐसी जगह कहाँ है, जहाँ प्रभु न हों॥ 🌹🌹अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी॥ 🌹🌹मोर बचन सब के मन माना। साधु-साधु करि ब्रह्म बखाना॥ भावार्थ:-वे चराचरमय (चराचर में व्याप्त) होते हुए ही सबसे रहित हैं और विरक्त हैं (उनकी कहीं आसक्ति नहीं है), वे प्रेम से प्रकट होते हैं, जैसे अग्नि। (अग्नि अव्यक्त रूप से सर्वत्र व्याप्त है, परन्तु जहाँ उसके लिए अरणिमन्थनादि साधन किए जाते हैं, वहाँ वह प्रकट होती है। इसी प्रकार सर्वत्र व्याप्त भगवान भी प्रेम से प्रकट होते हैं।) मेरी बात सबको प्रिय लगी। ब्रह्माजी ने 'साधु-साधु' कहकर बड़ाई की॥ 🌺🌿प्रभु श्री राम जी सभी का सदा कल्याण करें सदा मंगल प्रदान करें जय श्री राम जी 🌿🌹🌿🌹🌿🙏

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Girish Sareen May 15, 2021

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