Kamal Somani Saab
Kamal Somani Saab Sep 1, 2017

*सुखी रहने का तरीका* ★★★★★★★★★★

*सुखी रहने का तरीका* ★★★★★★★★★★

*एक बार की बात है संत तुकाराम अपने आश्रम में बैठे हुए थे। तभी उनका एक शिष्य, जो स्वाभाव से थोड़ा क्रोधी था उनके समक्ष आया और बोला-*
*गुरूजी, आप कैसे अपना व्यवहार इतना मधुर बनाये रहते हैं, ना आप किसी पे क्रोध करते हैं और ना ही किसी को कुछ भला-बुरा कहते हैं? कृपया अपने इस अच्छे व्यवहार का रहस्य बताइए?*
*संत बोले- मुझे अपने रहस्य के बारे में तो नहीं पता, पर मैं तुम्हारा रहस्य जानता हूँ !*
*“मेरा रहस्य! वह क्या है गुरु जी?” शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।*
*”तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले हो!” संत तुकाराम दुखी होते हुए बोले।*
*कोई और कहता तो शिष्य ये बात मजाक में टाल सकता था, पर स्वयं संत तुकाराम के मुख से निकली बात को कोई कैसे काट सकता था?*
*शिष्य उदास हो गया और गुरु का आशीर्वाद ले वहां से चला गया।*
*उस समय से शिष्य का स्वभाव बिलकुल बदल सा गया। वह हर किसी से प्रेम से मिलता और कभी किसी पे क्रोध न करता, अपना ज्यादातर समय ध्यान और पूजा में लगाता। वह उनके पास भी जाता जिससे उसने कभी गलत व्यवहार किया था और उनसे माफ़ी मांगता। देखते-देखते संत की भविष्यवाणी को एक हफ्ते पूरे होने को आये।*
*शिष्य ने सोचा चलो एक आखिरी बार गुरु के दर्शन कर आशीर्वाद ले लेते हैं। वह उनके समक्ष पहुंचा और बोला-*
*गुरुजी, मेरा समय पूरा होने वाला है, कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिये!”*
*“मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है पुत्र। अच्छा, ये बताओ कि पिछले सात दिन कैसे बीते? क्या तुम पहले की तरह ही लोगों से नाराज हुए, उन्हें अपशब्द कहे?”*
*संत तुकाराम ने प्रश्न किया।*
*“नहीं-नहीं, बिलकुल नहीं। मेरे पास जीने के लिए सिर्फ सात दिन थे, मैं इसे बेकार की बातों में कैसे गँवा सकता था?*
*मैं तो सबसे प्रेम से मिला, और जिन लोगों का कभी दिल दुखाया था उनसे क्षमा भी मांगी” शिष्य तत्परता से बोला।*
*"संत तुकाराम मुस्कुराए और बोले, “बस यही तो मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।"*
*"मैं जानता हूँ कि मैं कभी भी मर सकता हूँ, इसलिए मैं हर किसी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूँ, और यही मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है।*
*शिष्य समझ गया कि संत तुकाराम ने उसे जीवन का यह पाठ पढ़ाने के लिए ही मृत्यु का भय दिखाया था ।*
*वास्तव में हमारे पास भी सात दिन ही बचें हैं :-*
*रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि, आठवां दिन तो बना ही नहीं है ।*
👏👏 *"आइये आज से परिवर्तन आरम्भ करें।"* 👏👏

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कामेंट्स

Rajendra Gulati Sep 2, 2017
janat hei manat nahi,lanat aesi jind. tulsi is sansar ko bhayo motiya bind.

kalpesh Sep 2, 2017
જય શ્રીકૃષ્ણ

Radhe Shyam Mamgain Sep 2, 2017
हरिऊँ नारायण हरी बहुत अच्छा है पर सब साधू भी नहीं बन सकते सेना साधू बन जाये तो सोचो क्या होगा पुलिस बहुत हैं लेकिन जो साधू बन गया उसे ऐसा ही होना चाहिए धन्यवाद जिसने लिखा है या संगत करता है उसको कुछ तो समझ गया होगा।।जै श्री हरि

abc Sep 3, 2017
really very nice... sachcha gyan to yahi h mrityu ko saath smjne se hi hm apne svbhaav ko smj skte hn

Swami Lokeshanand Apr 22, 2019

भरतजी अयोध्या पहुँचे, आज अयोध्या शमशान लग रही है। कोई नगरवासी भरत जी की ओर सीधे नहीं देखता। आज तो सब उन्हें संत मानते हैं, पर उस समय सब के मन में भरतजी को लेकर संशय था। यही संसार की रीत है, जीवित संत को पहचान लेना हर किसी के बस की बात नहीं, क्योंकि संत चमड़े की आँख से नहीं, हृदय की आँख से पहचाना जाता है। पर वह है कितनों के पास? हाँ! उनके जाने के बाद तो सब छाती पीटते हैं। भरतजी सीधे कैकेयी के महल में गए, क्योंकि रामजी वहीं मिलते थे। कैकेयीजी आरती का थाल लाई है, भरतजी पूछते हैं, भैया राम कहाँ हैं? पिताजी कहाँ हैं? काँपती वाणी से उत्तर मिला। वही हुआ जिसका कैकेयीजी को भय था। भरतजी की आँखों से दो वस्तु गिर गई, एक वो जो फिर गिरते ही रहे, आँसू। और दूसरी जो फिर नजरों में कभी उठ नहीं पाईं, कैकेयीजी। संत की नजरों से गिर जाना और जीवन नष्ट हो जाना, एक जैसी बात है। भगवान के राज्याभिषेक के बाद की घटना है, कैकेयीजी रामजी के पास आईं, बोलीं- राम! मैं कुछ माँगूगी तो मिलेगा? रामजी की आँखें भीग आईं, कहने लगे, माँ! मेरा सौभाग्य है, कि आपके काम आ सकूं, आदेश दें। कैकेयीजी ने कहा, हो सके तो एकबार भरत के मुंह से मुझे "माँ" कहलवा दो। रामजी ने तुरंत भरतजी को बुलवा भेजा। भरतजी दौड़े आए, दरबार में कदम धरते ही कनखियों से समझ लिया कि वहाँ और कौन बैठा है। तो कैकेयीजी को पीठ देकर खड़े हो गए। रामजी ने पूछा, भरत! मेरी एक बात मानोगे भाई? भरतजी के प्राण सूख गए, गला रुंध गया, परीक्षा की घड़ी आ गई। बोले, मानूँगा भगवान, जो आदेश देंगे मानूँगा, पर एक बात को छोड़ कर। रामजी ने पूछा, वह क्या भरत? भरतजी कहते हैं, इन्हें माँ नहीं कहूँगा॥ अब विडियो देखें- भरत जी अयोध्या आए- https://youtu.be/9TWpf3t8gIs

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विचार देते हैं हौसला, समझदारी और शक्ति दो तिनके एक नदी में गिर गए। दोनों एक ही हवा के झोंके से उड़कर एक ही साथ नदी तक आ पहुंचे थे। दोनों की परिस्थितियां समान थीं। परंतु दोनों की मानसिक स्थिति एक न थी। एक पानी में बह  रहा था सुख-पूर्वक। तैरने का आनंद लेते हुए, तो दूसरे को किनारे पर पहुंचने की जल्दी थी। वह बड़े प्रयास करता। पूरी ताकत लगाता, परंतु नदी के शक्तिशाली बहाव के आगे बेचारे तिनके की ताकत ही क्या थी। उसके सारे प्रयास व्यर्थ होते रहे। बहता तो वह उसी दिशा में रहा, जिस दिशा में  नदी बह रही थी, परंतु पहले तिनके की तरह सुखपूर्वक नहीं, बल्कि दुखी मन से। कुछ आगे जाने पर नदी की धारा धीमी हुई। पहला तिनका दूसरे से बोला- आओ मित्र, अब प्रयास करने के लिए समय अनुकूल है। चलो, मिलकर कोशिश करें। किनारे पर घास उगी है, जो नदी के बहाव को रोक भी रही है। थोड़ा प्रयास करने से  हम अपनी दुनिया में पहुंच जाएंगे। परंतु दूसरा तिनका इतनी मेहनत कर चुका था कि वह थक गया था। वह आगे प्रयास न कर सका। परंतु पहला तिनका अपने मित्र को मुसीबत में छोड़कर किनारे नहीं गया।  खुद को उससे उलझा दिया, जिससे तिनके की कुछ शक्ति बढ़ी। फिर जोर लगाया और एक लंबी घास को किसी तरह पकड़ लिया। कुछ देर सुस्ताने के बाद आखिरकार दोनों धीरे-धारे सूखे किनारे पर पहुंच ही गए।  पहला तिनका पुराने साथियों की मीठी यादों से खुश था। किनारे नए मित्रों के बीच प्रसन्न था। दूसरा तिनका अब भी अपने पुराने स्थान के साथी तिनकों से बिछड़ने के कारण उदास, डूबने की याद से परेशान और भीग जाने से दुखी था।  संक्षेप में  सकारात्मक विचारधारा हमें हौसला, समझदारी और शक्ति देती है, जिससे हम जीवन में किसी भी परिस्थिति का सामना कर लेते हैं। हर हर महादेव जय शिव शंकर

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Naval Sharma Apr 21, 2019

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anita sharma Apr 21, 2019

🌷आज का प्रेरक प्रसंग🌷 ---------------------------------------- आपकी चतुराई भी आपको मृत्यु से नही बचा सकती । ---------------------------------------- एक चतुर व्यक्ति को काल से बहुत डर लगता था । एक दिन उसे चतुराई सूझी और काल को अपना मित्र बना लिया । उसने अपने मित्र काल से कहा- मित्र, तुम किसी को भी नहीं छोड़ते हो, किसी दिन मुझे भी गाल में धर लोगो । काल ने कहा- ये मृत्यु लोक है । जो आया है उसे मरना ही है । सृष्टि का यह शाश्वत नियम है इस लिए मैं मजबूर हूं । पर तुम मित्र हो इसलिए मैं जितनी रियायत कर सकता हूं, करूंगा ही । मुझ से क्या आशा रखते हो साफ-साफ कहो । व्यक्ति ने कहा- मित्र मैं इतना ही चाहता हूं कि आप मुझे अपने लोक ले जाने के लिए आने से कुछ दिन पहले एक पत्र अवश्य लिख देना ताकि मैं अपने बाल- बच्चों को कारोबार की सभी बातें अच्छी तरह से समझा दूं और स्वयं भी भगवान भजन में लग जाऊं । काल ने प्रेम से कहा- यह कौन सी बड़ी बात है, मैं एक नहीं आपको चार पत्र भेज दूंगा । चिंता मत करो । चारों पत्रों के बीच समय भी अच्छा खासा दूंगा ताकि तुम सचेत होकर काम निपटा लो । मनुष्य बड़ा प्रसन्न हुआ सोचने लगा कि आज से मेरे मन से काल का भय भी निकल गया, मैं जाने से पूर्व अपने सभी कार्य पूर्ण करके जाऊंगा तो देवता भी मेरा स्वागत करेंगे । दिन बीतते गये आखिर मृत्यु की घड़ी आ पहुंची । काल अपने दूतों सहित उसके समीप आकर बोला- मित्र अब समय पूरा हुआ। मेरे साथ चलिए । मैं सत्यता और दृढ़तापूर्वक अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करते हुए एक क्षण भी तुम्हें और यहां नहीं छोड़ूंगा । मनुष्य के माथे पर बल पड़ गए, भृकुटी तन गयी और कहने लगा- धिक्कार है तुम्हारे जैसे मित्रों पर । मेरे साथ विश्वासघात करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती? तुमने मुझे वचन दिया था कि लेने आने से पहले पत्र लिखूंगा । मुझे बड़ा दुःख है कि तुम बिना किसी सूचना के अचानक दूतों सहित मेरे ऊपर चढ़ आए । मित्रता तो दूर रही तुमने अपने वचनों को भी नहीं निभाया । काल हंसा और बोला- मित्र इतना झूठ तो न बोलो । मेरे सामने ही मुझे झूठा सिद्ध कर रहे हो । मैंने आपको एक नहीं चार पत्र भेजे । आपने एक भी उत्तर नहीं दिया । मनुष्य ने चौंककर पूछा – कौन से पत्र? कोई प्रमाण है? मुझे पत्र प्राप्त होने की कोई डाक रसीद आपके पास है तो दिखाओ । काल ने कहा – मित्र, घबराओ नहीं, मेरे चारों पत्र इस समय आपके पास मौजूद हैं । मेरा पहला पत्र आपके सिर पर चढ़कर बोला, आपके काले सुन्दर बालों को पकड़ कर उन्हें सफ़ेद कर दिया और यह भी कहा कि सावधान हो जाओ, जो करना है कर डालो । नाम, बड़ाई और धन-संग्रह के झंझटो को छोड़कर भजन में लग जाओ पर मेरे पत्र का आपके ऊपर जरा भी असर नहीं हुआ । बनावटी रंग लगा कर आपने अपने बालों को फिर से काला कर लिया और पुनः जवान बनने के सपनों में खो गए । आज तक मेरे श्वेत अक्षर आपके सिर पर लिखे हुए हैं । कुछ दिन बाद मैंने दूसरा पत्र आपके नेत्रों के प्रति भेजा। नेत्रों की ज्योति मंद होने लगी । फिर भी आंखों पर मोटे शीशे चढ़ा कर आप जगत को देखने का प्रयत्न करने लगे। दो मिनिट भी संसार की ओर से आंखे बंद करके, ज्योतिस्वरूप प्रभु का ध्यान मन में नहीं किया । इतने पर भी सावधान नहीं हुए तो मुझे आपकी दीनदशा पर बहुत तरस आया और मित्रता के नाते मैंने तीसरा पत्र भी भेजा । इस पत्र ने आपके दांतो को छुआ, हिलाया और तोड़ दिया । आपने इस पत्र का भी जवाब न दिया बल्कि नकली दांत लगवाये और जबरदस्ती संसार के भौतिक पदार्थों का स्वाद लेने लगे । मुझे बहुत दुःख हुआ कि मैं सदा इसके भले की सोचता हूँ और यह हर बात एक नया, बनावटी रास्ता अपनाने को तैयार रहता है । अपने अन्तिम पत्र के रूप में मैंने रोग- क्लेश तथा पीड़ाओ को भेजा परन्तु आपने अहंकार वश सब अनसुना कर दिया । जब मनुष्य ने काल के भेजे हुए पत्रों को समझा तो फूट-फूट कर रोने लगा और अपने विपरीत कर्मो पर पश्चाताप करने लगा । उसने स्वीकार किया कि मैंने गफलत में शुभ चेतावनी भरे इन पत्रों को नहीं पढ़ा । मैं सदा यही सोचता रहा कि कल से भगवान का भजन करूंगा । अपनी कमाई अच्छे शुभ कार्यो में लगाऊंगा, पर वह कल नहीं आया । काल ने कहा – आज तक तुमने जो कुछ भी किया, राग-रंग, स्वार्थ और भोगों के लिए किया । जान-बूझकर ईश्वरीय नियमों को तोड़कर जो काम करता है, वह अक्षम्य है । मनुष्य को जब अपनी बातों से काम बनता नज़र नहीं आया तो उसने काल को करोड़ों की सम्पत्ति का लोभ दिखाया । काल ने हंसकर कहा- मित्र यह मेरे लिए धूल से अधिक कुछ भी नहीं है । धन-दौलत, शोहरत, सत्ता, ये सब लोभ संसारी लोगो को वश में कर सकता है, मुझे नहीं । मनुष्य ने पूछा- क्या कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तुम्हें भी प्रिय हो, जिससे तुम्हें लुभाया जा सके । ऐसा कैसे हो सकता है ? काल ने उत्तर दिया- यदि तुम मुझे लुभाना ही चाहते थे तो सच्चाई और शुभ कर्मो का धन संग्रह करते । यह ऐसा धन है जिसके आगे मैं विवश हो सकता था । अपने निर्णय पर पुनर्विचार को बाध्य हो सकता था । पर तुम्हारे पास तो यह धन ढेले भर का भी नहीं है । तुम्हारे ये सारे रूपए-पैसे, जमीन-जायदाद, तिजोरी में जमा धन-संपत्ति सब यहीं छूट जाएगा । मेरे साथ तुम भी उसी प्रकार निवस्त्र जाओगे जैसे कोई भिखारी की आत्मा जाती है । काल ने जब मनुष्य की एक भी बात नहीं सुनी तो वह हाय-हाय करके रोने लगा । सभी सम्बन्धियों को पुकारा परन्तु काल ने उसके प्राण पकड़ लिए और चल पड़ा अपने गन्तव्य की ओर । काल ने कितनी बड़ी बात कही, एक ही सत्य है जो अटल है वह है कि हम एक दिन मरेेंगे जरूर । हम जीवन में कितनी दौलत जमा करेंगे, कितनी शोहरत पाएंगे, कैसी संतान होगी यह सब अनिश्चित होता है, समय के गर्भ में छुपा होता है । परंतु हम मरेगे एक दिन बस यही एक ही बात जन्म के साथ ही तय हो जाती है । ध्रुव सत्य है मृ्त्यु । काल कभी भी दस्तक दे सकता है। प्रतिदिन उसकी तैयारी करनी होगी । समय के साथ उम्र की निशानियों को देख कर तो कम से कम हमें प्रभु की याद में रहने का अभ्यास करना चाहिए और अभी तो कलयुग का अन्तिम समय है इस में तो हर एक को चाहे छोटा हो या बड़ा सब को प्रभु की याद में रहकर ही कर्म करने हैं।

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