Girish Chowdhari
Girish Chowdhari Sep 10, 2017

कर्म का महत्व

*आज का चिंतन*
*यह हमेशा ध्यान रखे*
1) *निम्बू-मिर्च* खाने के लिये है.. कही *टाँगने* के लिए नहीं है।
2) *बिल्लियाँ* जंगली या पालतू जानवर है, बिल्ली के *रास्ता काटने* से कुछ गलत नहीं होता.. बल्कि चूहों से होनेवाले नुक्सान को बचाया जा सकता है।
3) *छींकना* एक नैसर्गिक क्रिया है, छींकने से कुछ *अनहोनी* नहीं होती ना हि किसी काम में बाधा आती है। छींकने से शरीर की *सोई हुई मांसपेशियां* सक्रिय हो जाती है।
4) *भूत* पेड़ों पर नहीं रहते, पेड़ों पर *पक्षी* रहते है।
5) *चमत्कार* जैसी कोई चीज नहीं होती। हर घटना के पीछे *वैज्ञानिक* कारण होता है।
6) *भोपा, तंत्रिक, बाबा* जैसे लोग *झुठे* होते है, जिन्हें *शारारिक मेहनत* नहीं करनी ये वही लोग है।
7) *जादू टोणा*, या *किसी ने कराया* ऐसा कुछ नहीं होता, ये दुर्बल लोगोंके *मानसिक विकार* है।
जादू-टोणा करके आपके ग्रहो की दिशा बदलने वाले बाबा, हवा और मेघों की दिशा बदलकर बारिश नहीं ला सकते क्या?
8 ) *वास्तुशास्त्र* भ्रामक है। सिर्फ दिशाओ का *डर* दिखाकर लूटने का तरीक़ा है।
वास्तविक तो पृथ्वी ही खुद हर क्षण *अपनी दिशा* बदलती है। अगर *कुबेर जी* उत्तर दिशा में है तो एक ही स्थान या दिशा में *अमीर* और *गरीब* दोनों क्यों पाये जाते है?
9) *मन्नत के लिये बलि, टिप* या *चढ़ावे* से भगवान प्रसन्न होकर *फल* देते है, तो क्या भगवान् *रिश्वतखोर* है?
आध्यात्म *मोक्ष* के लिए है, *धन* कमाने के लिए नहीं।
यह मेसैज 15 दूसरे ग्रूप्स में भेजने से कोई *खुशखबरी* नहीं मिलेगी और इसको डिलीट करने पर कोई अनहोनी भी नहीं होगी।
परंतु इसे Farword करने से आपके कई मित्र *मेहनत* और *कर्म* का महत्त्व जरूर जान सकेंगे।

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कामेंट्स

Shivam shaastri ji Sep 11, 2017
जब आप को कभी कोई दुख होगा तो किसको याद करोगे भगवान या खुद को इसलिए कुछ भी science नही सब गॉड मेड है तू भी समझे

Roshan Nawaval Suthar Sep 11, 2017
I'm not agree with you sir....#Asthaa hi hai koi galat nahi ,,,#Najria alag alag hota hai...

मृत्यु जितनी भयंकर नहीं उतना मृत्यु का भय भयंकर होता है ?💐 दो उल्लू एक वृक्ष पर आकर बैठे। एक ने सर्प अपने मुँह में पकड़ रखा था। भोजन था उनका, सुबह के नाश्ते की तैयारी थी। दूसरा एक चूहा पकड़ लाया था। दोनों जैसे ही वृक्ष पर बैठे और दोनों एक--दूसरे के निकट थे। एक के मुँह में साँप एक के मुँह में चूहा। साँप ने चूहे को देखा तो वह यह भूल ही गया कि वह उल्लू के मुँह में है और मृत्यु के करीब है। चूहे को देखकर उसके मुँह में रसधार बहने लगी। वह भूल ही गया कि मृत्यु के मुँह में है। उसको अपनी जीवेष्णा ने जकड़ लिया था। और सर्प के मन में उस चूहे को खाने की इच्छा होने लगी। कैसी बिडम्बना है भूख की। उस सर्प को ये पता नहीं कि मैं भी इस चूहे की भाँति किसी उल्लूरूपी काल के मुँह में पहले से बैठा हूँ। और यह काल मेरा थोड़ी ही देर में ग्रास बनाने वाला है। चूहे ने जैसे ही साँप को देखा वह भयभीत हो गया, बुरी तरह से वह काँपने लगा। उस चूहे ने ये भी नहीं देखा कि जो स्वयं काल का ग्रास बनने वाला है। वो भला मुझे क्या मारेगा। किन्तु मृत्यु का भय तो भयंकर होता ही है किन्तु उससे भी अधिक मृत्यु से होने वाला भय था। जो चूहे को कम्पित कर रहा था। वे दोनों उल्लू बड़े ही आश्चर्यचकित हो गए। एक उल्लू ने दूसरे उल्लू से पूछा---- भाई ! इसका कुछ आशय (राज) समझे या नहीं दूसरे ने कहा बिल्कुल समझ में आ गया। जीभ के स्वाद की इच्छा इतनी प्रबल है कि सामने मृत्यु खड़ी हो तब भी दिखाई नहीं पड़ती। और यह भी समझ में आया कि भय मृत्यु से भी बड़ा भय है। मृत्यु सामने खड़ी है, उससे यह भयभीत नहीं है चूहा; लेकिन भय से भयभीत है कि कहीं साँप हमला न कर दे।’ मृत्यु से हम भयभीत नहीं हैं, हम भय से अधिक भयभीत हैं। और लोभ स्वाद का, इन्द्रियों का, जीवेष्णा का इतना प्रगाढ़ है कि मृत्यु चौबीस घण्टे सामने खड़ी है, फिर भी हमें दिखाई नहीं पड़ती। हम अन्धे हो रहे हैं। इस कहानी से एक विचित्र अर्थ हमारे हृदय पटल के सामने आता है कि समूचे संसार के प्राणी मृत्यु से भयभीत हैं। जबकि यह विचार करने का विषय है कि मृत्यु और काल दोनों ईश्वरीय सृष्टि में आते हैं अर्थात् भगवान् ने इनकी रचना की है, और ये अटल सिद्धान्त है कि जिसका सर्जन (रचना) होता है उसका विसर्जन (विनाश) अवश्य होता है। इस ज्ञान के होते ही हमें पता चल जाता है कि मृत्यु और काल दोनों का विनाश करने के लिए भगवान् स्वयं महाकाल हैं। मृत्यु अथवा काल रूप को नष्ट करने वाले हैं। अजर--अमर आत्मा एवं नाम पर काल का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। क्योंकि आत्मा कालातीत है। जिस प्रकार मरते हुए साँप को देखकर भी चूहा डर रहा था। और सोच रहा था कि कहीं ये मुझे न मार दे। यही दशा संसार के सम्पूर्ण प्राणियों की है। क्योंकि जिनसे वह डरता है वो भले ही कोई विशेष पदार्थ और मृत्यु ही क्यों न हो स्वयं विनाश की ओर सभी उसी प्रकार बढ़ रहे हैं जैसे नदियाँ समुद्र की ओर बढ़ती हैं। उस साँप ने चूहे को उल्लू के मुख में देखकर स्वयं खाने की इच्छा प्रकट की। यही दशा समस्त जगत् के जीवों की है। जीवात्मा जिस दिन चौरासी लाख योनियों में जिस शरीर को धारण करता है अर्थात् जिस दिन उसका जन्म होता है, उसी दिन से उसका मरना भी आरम्भ हो जाता है। किन्तु कैसी विचित्र बिडम्बना है कि यह मरना किसी को दिखायी नहीं देता। क्योंकि काल भगवान् एक अजगर की भाँति प्रत्येक स्थान पर अपना मुँह फैलाये हुये विद्यमान हैं। हम जिसको शरीर का विकास कहते हैं, वही वेदान्त आदि ग्रन्थों की दृष्टि में सबसे बड़ा विनाश है। क्योंकि काल के पास असंख्य बाण हैं। जिनसे जीवात्मा क्षण--प्रतिक्षण मरता रहता है। इसलिए इस कहानी का यही वास्तविक अर्थ है कि चूहा और सर्प ही नहीं अपितु हमको भी अपनी मृत्यु दिखायी न देकर उसके भय से भयभीत रहते हैं। इसका यही तो तात्पर्य हुआ कि मृत्यु उतनी भयंकर नहीं जितना मृत्यु का भय भयंकर है। *जय राधेश्याम*🌹🙏🙏🙏

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*पैर में से काँटा निकल जाए तो*
*चलने में मज़ा आ जाता है,*
*और मन में से अहंकार निकल जाए तो..*
*जीवन जीने में मज़ा आ जाता है..*
*चलने वाले पैरों में कितना फर्क है ,*
*एक आगे है तो एक पीछे ।*
*पर न तो आगे वाले को अभिमान ...

(पूरा पढ़ें)
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Anju Mishra May 19, 2019

जय श्री राधे कृष्णा 🙏🌹 महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद द्रौपदी अपने कक्ष में उदास बैठी हुई थी. द्रौपदी उस घटना को सोच कर उदास थी जब भरी सभा में दुशहासन द्रौपदी का चीर हरण कर रहा था. तभी वहां भगवान् कृष्ण आते है और पूछते है “सखी द्रौपदी…तुम उदास क्यों बैठी हो.. तुम्हे तो बल्कि खुश होना चाहिए कि भरी सभा में तुम्हारी लाज बच गयी, तुम्हे तो खुश होने चाहिए क्यूंकि तुम्हारे प्रतिशोध की ज्वाला शांत हो गयी और दुशासन मारा गया. उस वक़्त द्रौपदी श्री कृष्ण से पूछती है “हे गोविन्द, आप तो अंतर्यामी है, सब जानते है. मैं ये सोच कर उदास हूँ कि जब दुशहासन मेरा चीर हरण करने के लिए मेरी और बढ़ रहा था उस वक़्त आपने आगे आ कर दुशहासन को रोका क्यों नहीं. अगर आप चाहते तो वो मुझे हाथ भी ना लगा सकता?? जब दुशहासन मेरे केस (बाल) पकड़ कर मुझे पूरी सभा में चीर हरण के लिए ले जा रहा था उस वक़्त आपने उसे क्यों नहीं रोका? अगर आप उसी वक़्त दुशहासन को रोक देते तो महाभारत जैसा इतना विनाशक युद्ध कभी होता ही नहीं. मुझे इसका उत्तर दीजिये भगवन। भगवान कृष्ण मुस्कुराये और द्रौपदी को उत्तर देते हुए कहा ” प्रिय सखी, इसमें मेरा कोई दोष नहीं. जब दुशहासन तुम्हारी तरफ बढ़ रहा था तो तुमने मुझे एक पल के लिए भी स्मरण नहीं किया. जब दुशहासन तुम्हारे केस पकड़ कर भरी सभा में ले जा रहा था तो तुमने सबसे मदद मांगी लेकिन मुझे भूल गयी. उस वक़्त तुम्हे अपनी शक्ति पर पूर्ण विश्वास था और तुम दुशहासन से लड़ी भी लेकिन जब जब सभा में बैठे किसी व्यक्ति ने तुम्हारी मदद नहीं की, केवल तब तुमने मुझे मदद के लिए पुकारा, क्यों? मैंने पहले तुम्हारी सहायता इसलिए नहीं की क्यूंकि मैं तुम्हारी शक्ति पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाना चाहता था. अक्सर मेरे भक्त समझते है कि मैं वैकुण्ठ या द्वारका में ही निवास करता हूँ, नहीं ऐसा बिलकुल नहीं. हे सखी, मैं तो हर उस भक्त के दिल में निवास करता हूँ जो सच्चे मन से मुझे याद करता है. जब दुशहासन तुम्हारा चीर हरण करने के लिए तुम्हारी और बढ़ रहा था, अगर तुम मुझे उस वक़्त केवल एक बार भी पुकारती तो मैं हस्तक्षेप ज़रूर करता और ये कतई ना होने देता. मेरे सच्चे भक्तो को मुझे हर समय स्मरण रखना चाहिए ना कि तब याद करना चाहिए जब वे किसी मुसीबत में हो. श्री कृष्ण का उत्तर सुन द्रौपदी ने हाथ जोड़ कर उन्हें नमन किया और कहा “भगवन आप धन्य है, एक बार फिर आपने मेरे दिल में उठे प्रश्नो के समंदर को शांत किया.

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" केदारनाथ को क्यों कहते हैं ‘जागृत महादेव’ ?, दो मिनट की ये कहानी रौंगटे खड़े कर देगी " एक बार एक शिव-भक्त अपने गांव से केदारनाथ धाम की यात्रा पर निकला। पहले यातायात की सुविधाएँ तो थी नहीं, वह पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में जो भी मिलता केदारनाथ का मार्ग पूछ लेता। मन में भगवान शिव का ध्यान करता रहता। चलते चलते उसको महीनो बीत गए। आखिरकार एक दिन वह केदार धाम पहुच ही गया। केदारनाथ में मंदिर के द्वार 6 महीने खुलते है और 6 महीने बंद रहते है। वह उस समय पर पहुचा जब मन्दिर के द्वार बंद हो रहे थे। पंडित जी को उसने बताया वह बहुत दूर से महीनो की यात्रा करके आया है। पंडित जी से प्रार्थना की - कृपा कर के दरवाजे खोलकर प्रभु के दर्शन करवा दीजिये । लेकिन वहां का तो नियम है एक बार बंद तो बंद। नियम तो नियम होता है। वह बहुत रोया। बार-बार भगवन शिव को याद किया कि प्रभु बस एक बार दर्शन करा दो। वह प्रार्थना कर रहा था सभी से, लेकिन किसी ने भी नही सुनी। पंडित जी बोले अब यहाँ 6 महीने बाद आना, 6 महीने बाद यहा के दरवाजे खुलेंगे। यहाँ 6 महीने बर्फ और ढंड पड़ती है। और सभी जन वहा से चले गये। वह वही पर रोता रहा। रोते-रोते रात होने लगी चारो तरफ अँधेरा हो गया। लेकिन उसे विस्वास था अपने शिव पर कि वो जरुर कृपा करेगे। उसे बहुत भुख और प्यास भी लग रही थी। उसने किसी की आने की आहट सुनी। देखा एक सन्यासी बाबा उसकी ओर आ रहा है। वह सन्यासी बाबा उस के पास आया और पास में बैठ गया। पूछा - बेटा कहाँ से आये हो ? उस ने सारा हाल सुना दिया और बोला मेरा आना यहाँ पर व्यर्थ हो गया बाबा जी। बाबा जी ने उसे समझाया और खाना भी दिया। और फिर बहुत देर तक बाबा उससे बाते करते रहे। बाबा जी को उस पर दया आ गयी। वह बोले, बेटा मुझे लगता है, सुबह मन्दिर जरुर खुलेगा। तुम दर्शन जरुर करोगे। बातों-बातों में इस भक्त को ना जाने कब नींद आ गयी। सूर्य के मद्धिम प्रकाश के साथ भक्त की आँख खुली। उसने इधर उधर बाबा को देखा, किन्तु वह कहीं नहीं थे । इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता उसने देखा पंडित जी आ रहे है अपनी पूरी मंडली के साथ। उस ने पंडित को प्रणाम किया और बोला - कल आप ने तो कहा था मन्दिर 6 महीने बाद खुलेगा ? और इस बीच कोई नहीं आएगा यहाँ, लेकिन आप तो सुबह ही आ गये। पंडित जी ने उसे गौर से देखा, पहचानने की कोशिश की और पुछा - तुम वही हो जो मंदिर का द्वार बंद होने पर आये थे ? जो मुझे मिले थे। 6 महीने होते ही वापस आ गए ! उस आदमी ने आश्चर्य से कहा - नही, मैं कहीं नहीं गया। कल ही तो आप मिले थे, रात में मैं यहीं सो गया था। मैं कहीं नहीं गया। पंडित जी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था। उन्होंने कहा - लेकिन मैं तो 6 महीने पहले मंदिर बन्द करके गया था और आज 6 महीने बाद आया हूँ। तुम छः महीने तक यहाँ पर जिन्दा कैसे रह सकते हो ? पंडित जी और सारी मंडली हैरान थी। इतनी सर्दी में एक अकेला व्यक्ति कैसे छः महीने तक जिन्दा रह सकता है। तब उस भक्त ने उनको सन्यासी बाबा के मिलने और उसके साथ की गयी सारी बाते बता दी। कि एक सन्यासी आया था - लम्बा था, बढ़ी-बढ़ी जटाये, एक हाथ में त्रिशुल और एक हाथ में डमरू लिए, मृग-शाला पहने हुआ था। पंडित जी और सब लोग उसके चरणों में गिर गये। बोले, हमने तो जिंदगी लगा दी किन्तु प्रभु के दर्शन ना पा सके, सच्चे भक्त तो तुम हो। तुमने तो साक्षात भगवान शिव के दर्शन किये है। उन्होंने ही अपनी योग-माया से तुम्हारे 6 महीने को एक रात में परिवर्तित कर दिया। काल-खंड को छोटा कर दिया। यह सब तुम्हारे पवित्र मन, तुम्हारी श्रद्वा और विश्वास के कारण ही हुआ है। आपकी भक्ति को प्रणाम। हर हर महादेव.....🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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Sunil upadhyaya May 20, 2019

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