कार्तिक माहात्म्य उन्नीसवां अध्याय

कार्तिक माहात्म्य उन्नीसवां अध्याय
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कार्तिक माहात्म्य उन्नीसवां अध्याय
कार्तिक माहात्म्य उन्नीसवां अध्याय

वृंदा ने श्रीहरि को दिया पत्नी विरह का शापः कार्तिक माहात्म्य, 19वां अध्याय

कार्तिक माहात्म्यः  उन्नीसवां अध्याय

राजा पृथु ने पूछा – हे नारद जी! अब आप यह कहिए कि भगवान विष्णु ने वहाँ जाकर क्या किया तथा जलन्धर की पत्नी का पतिव्रत किस प्रकार भ्रष्ट हुआ?

नारद जी बोले – जलन्धर के नगर में जाकर विष्णु जी ने उसकी पतिव्रता स्त्री वृन्दा का पतिव्रत भंग करने का विचार किया. वे उसके नगर के उद्यान में जाकर ठहर गये और रात में उसको स्वप्न दिया.

वह भगवान विष्णु की माया और विचित्र कार्यपद्धति थी. उसकी माया द्वारा जब वृन्दा ने रात में वह स्वप्न देखा कि उसका पति नग्न होकर सिर पर तेल लगाये महिष पर चढ़ा है. वह काले रंग के फूलों की माला पहने हुए है तथा उसके चारों हिंसक जीव हैं. वह सिर मुड़ाए हुए अन्धकार में दक्षिण दिशा की ओर जा रहा है.

उसने नगर को अपने साथ समुद्र में डूबा हुआ इत्यादि बहुत से स्वप्न देखे. तत्काल ही वह स्वप्न का विचार करने लगी. इतने में उसने सूर्यदेव को उदय होते हुए देखा तो सूर्य में उसे एक छिद्र दिखाई दिया तथा वह कान्तिहीन था.

इसे उसने अनिष्ट का सूचक जाना और वह भयभीत हो रोती हुई छज्जे, अटारी सब जगह व्यग्र होकर घूमने लगी. उसे कहीं भी शान्ति न मिलती थी. उसका हृदय अनिष्ट की आशंका से फटा जा रहा था. फिर अपनी दो सखियों के साथ उपवन में गई वहाँ भी उसे शान्ति नहीं मिली.

संभवतः वन में उसे शांति मिले इसी आशा में वह जंगल की ओर निकल गई. वहाँ उसने सिंह के समान दो भयंकर राक्षसों को देखा, जिससे वह भयभीत हो भागने लगी. उसी क्षण वृंदा के समक्ष अपने शिष्यों सहित शान्त मौनी तपस्वी वहाँ आ गया.

भयभीत वृन्दा उसके गले में अपना हाथ डाल उससे रक्षा की याचना करने लगी. मुनि ने अपनी एक ही हुंकार से उन राक्षसों को भगा दिया.

वृन्दा को आश्चर्य हुआ तथा वह भय से मुक्त हो मुनिनाथ को हाथ जोड़ प्रणाम करने लगी. फिर उसने मुनि से अपने पति के संबंध में उसकी कुशल क्षेम का प्रश्न किया.

उसी समय दो वानर मुनि के समक्ष आकर हाथ जोड़ खड़े हो गये और ज्योंही मुनि ने भृकुटि संकेत किया त्योंही वे उड़कर आकाश मार्ग से चले गये. फिर जलन्धर का सिर और धड़ लिए मुनि के आगे आ गये. अपने पति को मृत हुआ जान वृन्दा मूर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ी और अनेक प्रकार से दारुण विलाप करने लगी.

उसने मुनि से कहा – हे कृपानिधे! आप मेरे इस पति को जीवित कर दीजिए. पतिव्रता दैत्य पत्नी ऐसा कहकर दुखी श्वासों को छोड़कर मुनीश्वर के चरणों पर गिर पड़ी.

तब मुनीश्वर ने कहा – यह शिवजी द्वारा युद्ध में मारा गया है, जीवित नहीं हो सकता क्योंकि जिसे भगवान शिव मार देते हैं वह कभी जीवित नहीं हो सकता परन्तु शरणागत की रक्षा करना सनतन धर्म है, इसी कारण कृपाकर मैं इसे जिलाए देता हूँ.

नारद जी ने आगे कहा – वह मुनि साक्षात विष्णु ही थे जिन्होंने यह सब माया फैला रखी थी. वह वृन्दा के पति को जीवित करके अन्तर्ध्यान हो गये.

जलन्धर ने उठकर वृन्दा को आलिंगन किया और मुख चूमा. वृन्दा भी पति को जीवित हुआ देख अत्यन्त हर्षित हुई और अब तक हुई बातों को स्वप्न समझा. तत्पश्चात वृन्दा सकाम हो बहुत दिनों तक अपने पति के साथ रमण एवं यौन विहार करती रही.

एक बार सुरत एवं सम्भोग काल के अन्त में उसने देखा कि जिसके साथ उसने शैय्यागमन किया वह उसके पति जलंधर नहीं बल्कि वह तो श्रीविष्णु हैं. यह देखकर वह क्रोधित हो गई और श्रीविष्णु से आवेशित होकर बोली- हे पराई स्त्री के साथ गमन करने वाले विष्णु! तुम्हारे शील को धिक्कार है. मैंने जान लिया है कि मायावी तपस्वी तुम्हीं थे.

इस प्रकार कहकर कुपित पतिव्रता वृन्दा ने अपने तेज को प्रकट करते हुए भगवान विष्णु को शाप दिया- तुमने माया से दो राक्षस मुझे दिखाए थे. वही दोनों राक्षस किसी समय तुम्हारी स्त्री का हरण करेगें. सर्पेश्वर जो तुम्हारा शिष्य बना है, यह भी तुम्हारा साथी रहेगा और वनवास को भोगेगा. तुमने सेवकों को वानरों का रूप धराकर उनकी सहायता ली. तुम जब अपनी स्त्री के विरह में दुखी होकर विचरोगे उस समय तुम्हें वानरों से सहायता की याचना करनी होगी.

ऐसा कहती हुई पतिव्रता वृन्दा ने अपने तेज से अग्नि को प्रकट किया और उसमें प्रवेश कर गई. ब्रह्मा आदि देवता आकाश से उसका प्रवेश देखते रहे. वृन्दा के शरीर का तेज पार्वतीजी के शरीर में चला गया. पतिव्रत के प्रभाव से वृन्दा ने मुक्ति प्राप्त की.

कार्तिक माहात्म्य कथा जारी रहेगी.

।।कार्तिक माहात्म्य उन्नीसवां अध्याय समाप्त।।

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Kamlesh Jeswani Aug 10, 2020

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Swami Lokeshanand Aug 10, 2020

दुख मन की अवस्था विशेष का नाम है। देह का कष्ट दर्द नाम से जाना जाता है, मन का कष्ट दुख नाम से जाना जाता है। हो सकता है कि किसी को दर्द हो पर वह कोई दुख न मानता हो, और ऐसा भी हो सकता है कि किसी को कोई दर्द न हो पर वह दुखी हो। दुख का एकमात्र कारण है, अपना प्रेम संसार में लगा देना, और एकमात्र निवारण है वह प्रेम भगवान से लगा रखना। विभीषण दुखी है, कहता है- हनुमानजी! मैं इन राक्षसों के बीच ऐसे फंसा हूँ, जैसे दाँतों के बीच जीभ। जैसे दाँत जीभ को जब तब यहाँ वहाँ काटते रहते हैं, ये मुझे त्रस्त किए रहते हैं, मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता। अब हमारे भैया हनुमानजी तो हैं ही "नासै रोग मिटे सब पीरा" हनुमानजी कहते हैं चिंता मत करो, दो काम करो, एक तो वह स्थान दिखा दो जहाँ सीताजी बंदी हैं, माने यह बता दो कि तुम्हारा प्रेम संसार में कहाँ लगा है? दूसरे, तुम राम का नाम तो लेते ही हो, राम का काम भी करो। कौन सा काम? रावण आदि का विरोध करना, माने अपने अंत:करण के दोषों का शमन करना। तुम मूक दर्शक बने हो, अनाचार का विरोध नहीं करते। बस ये दो काम करो, दाँतों की चिंता मत करो। दाँत आते जीभ के बाद हैं, पर जाते पहले हैं। और जीभ बस जरा सा बोल जाए, दाँत टूटने में क्या देर लगती है? तुम बोलो तो! कुछ दिनों के बाद, सागर किनारे, इन दाँतों के विशेषज्ञ डा० रामचन्द्र का कैम्प लगेगा, बस तुम आ जाना। वे सारे दाँत निकाल देंगे, तब पूरे मुंह पर अकेली जीभ का ही राज होगा। माने लंका पर तुम्हारा राज होगा। लोकेशानन्द कहता है कि मोह की सत्ता को चुनौती देते हुए, अपना प्रेम संसार से निकाल कर, श्री राम के चरणों में लगा रखना ही राम काज है। आप भी हनुमानजी का यह मंत्र वैसे ही मान लो, जैसे विभीषण ने माना। विभीषण ने हनुमानजी को सीताजी का पता बता दिया और रावण का विरोध करने का संकल्प कर लिया। देखें विडियो- डा० रामचन्द्र https://youtu.be/rY3hhn10Ihk

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*A Useful Post for Human Being's Health.... *जय श्री राधेकृष्णा 🙏🌷 *शुभ प्रभात् नमन*🙏🏻🌷 *बाई करवट लेटने के लाभ* 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ *शरीर के लिए सोना बेहद जरूरी होता है। अच्छी सेहत के लिए शरीर को आराम देना कई तरह की बीमारियों से बचाता है। सोते समय हम कई बार करवट बदलकर सोते हैं जिसका हमारे शरीर पर गहरा प्रभाव पड़ता है। किसी भी इंसान के लिए एक तरफ करवट लेकर सोए रहना नामुमकिन है। लेकिन क्या आपको पता है बांए ओर करवट लेने से आपको कई तरह के फायदे मिल सकते हैं। *बांए ओर करवट लेकर सोने के फायदे..... *आयुर्वेद में शरीर को बीमारियों से बचाने के लिए बाएं ओर करवट लेकर सोने के बारे में बताया गया है। जिसे आज के वैज्ञानिकों ने शोध के आधार पर इसे माना है। शोध के अनुसार बाएं ओर करवट बदलकर सोने से पेट फूलने की समस्या, दिल के रोग, पेट की खराबी और थकान जैसी समस्याएं दूर होती हैं। यदि आप बाएं की जगह दाएं तरफ करवट लेकर सोते हैं तो इससे शरीर से टाक्सिन सही तरह से निकल नहीं पाते हैं और दिल पर जोर ज्यादा पड़ता है साथ ही पेट की बीमारी भी लगने लगती हैं। कई बार तो हार्ट रेट भी बढ़ सकता है। *सीधे लेटे रहने से भी इंसान को ठीक तरह से सांस लेने में परेशानी होती है। ज्यादातर वे लोग जिन्हें दमा या अस्थमा और स्लीप एपनिा की दिक्कत हो। उनको रात में सीधा नहीं लेटना चाहिए। इसलिए बांए ओर करवट लेकर सोने की आदत डालनी चाहिए। *किडनियां और लीवर के लिए..... *बाएं ओर करवट बदलकर सोने से लीवर और किडनियां ठीक तरह से काम करती हैं। शरीर से गंदगी को साफ करने में लीवर और किड़नी बेहद अहम भूमिका निभाती हैं इसलिए इन पर ज्यादा दबाव नहीं डालना चाहिए। *पाचन में सुधार...... *शरीर तभी ठीक रहता है जब आपका पाचन तंत्र ठीक हो। एैसे में बाएं तरफ करवट लेने से आपके पाचन तंत्र को फायदा मिलता है। और खाया हुआ खाना भी आसानी से पेट तक पहुंचता है जो ठीक से हजम भी हो जाता है। इसके अलावा एक ओर फायादा यह है कि बदहजमी की दिक्कत भी दूर हो जाती है। *खतरनाक बीमारियों से बचाव....... *बाएं ओर करवट लेने से शरीर पर जमा हुआ टाक्सिन धीरे-धीरे निकलने लगता है और इस वजह से शरीर को लगने वाली खतरनाक बीमारियां नहीं होती हैं। *एसिडिटी में फायदा...... *सीने में जलन और एसिडिटी की समस्या को दूर करता है बायीं ओर करवट लेकर सोना। क्योंकि इस तरीके से पेट में मौजूद एसिड उपर की जगह से नीचे आने लगता है जिस वजह से सीने की जलन और एसिडिटी की परेशानी में फायदा मिलता है। *पेट को आराम...... *बांए ओर सोने से पेट को आराम मिलता है। क्योंकि इस पोजिशन में सोने से भोजन छोटी आंत से बड़ी आंत तक आसानी से पहुंच जाता है जिस वजह से सुबह आपका पेट खुलकर साफ होता है। *दिल की परेशानी में..... *बाएं ओर करवट बदलकर सोने से दिल से संबंधित परेशानियां दूर होती हैं क्योंकि इस अवस्था में सोने से दिल तक खून की पूर्ती बेहद अच्छे तरह से होती है जिसकी वजह से आक्सीजन और खून की सप्लाई आराम से दिमाग और शरीर तक पहुंचती है जो इंसान को दिल की बीमारी यानि कि हार्ट अटैक जैसे गंभीर रोग से बचा सकती है। *गलत तरीकों से सोना कई बीमारियों जैसे सिर दर्द, पीठदर्द, माइग्रेन, थकान व दर्द को न्योता देता है । अच्छी स्लीपिंग पोजीशन इंसान को स्मार्ट और सेहतमन्द बनाती है इसलिए अपने सोने के तरीके को बदलें और हमेशा स्वस्थ रहें। [*वर्षा ऋतु के समय बच्चों को गले और पेट में होने वाली समस्या से बचाने के लिए स्वादिष्ट औषधि* 1-सोंठ 1/2चम्मच 2-अजवाइन पाउडर 1/3 3-काला नमक 2 चुटकी 4- 20ग्राम गुड़ लगभग *ये एक बार की मात्रा है* इसे गुड़ में मिलाकर छोटी छोटी गोलियां बना लें* दिन में 2 अथवा 3 गोली चूसने के लिए दें* *गले मे दर्द के लिये आसान उपाय* गले के दर्द में 2चम्मच प्याज रस गर्मजल से कभी भी ले *शरीर या हाथ पैरों में सूनापन* जिन लोगो को ये परेशानी है वो लोग पीपल के पत्ते को पानी मे उबालकर उस पानी से कुछ दिन स्नान करे तो ये समस्या बिल्कुल ठिक हो जाएगी। वंदेमातरम।।। पवन गौड़।। [: *आँखों पर गुहेरी हो जाना* *जिस साइड की आंख पर हो उसके विपरीत वाले पैर के अँगूठे के नाखून पर आक का दूध लगाए।* वन्देमातरम। राजीव दीक्षित जी अमर रहे।।। [ *रक्त प्रदर के लिए घरेलू उपचार* लौकी/दुधीके बीजों को छीलकर उनका हलवा बनाकर सुबह ख़ाली पेट खाने से रक्त प्रदर दूर होता है। वंदेमातरम।।। : *🌹वात्त्, पित्त, कफ...??🌹* *अर्ध रोग हरि निद्रा,पूर्ण रोग हरि क्षुधा* अच्छी नींद आये तो, आधे रोग हर लिए जाते है।। *पित्त संबंधी रोग* रात्रि जागरण से पित्त की तकलीफ होती है। पित्त ज्यादा होने से रात्रि 12 बजे निन्द खुल जाती है।। 🌷 *उपाय* 🌷 🍁पित्त के रोगी को दूध पर रहना चाहिए।। 🍁सेव फल का सेवन करना चाहिए। 🍁त्रिफला सेवन करना चाहिए। *कफ संबंधी रोग* रोगी को प्रभात में खांसी उठती है और नींद टूट जाती है।| 🌷 *उपाय* 🌷 🍁कफ नाशक चीज़ों का सेवन करे जैसे चने,ममरे आदि।। 🍁बेसन से बनी चीजों का सेवन करने से लाभ होता है।। 🍁1 लीटर गुनगुने पानी में 10 ग्राम नामक डालकर खारा पानी पीये और फिर वमन (उल्टी) करने से कफ संबंधी दमा ,कफ आदि कीटाणु का नाश होता है।। *वायु सम्बंधी रोग* 🌒रोगी की नींद रात्रि 2 से 2:30 के समय खुल जाती हैं।। *उपाय* 🍁गोझरण के सेवन से 50 प्रकार के वायु सम्बंधी रोग नष्ट होते है।। 🍁गोझरण ३०मीली,१कटोरी पानी, इससे वायू एवं कफ संबधी रोग ठीक होते हैं| 🍁42 वर्ष की आयु के बाद त्रिफला या रसायन चूर्ण का नियमित रूप से सेवन करना चाहिये जिससे किडनी,लिवर,पेशाब सम्बन्धी तकलीफे न हो।। सिर पर और 👣 पर गाय के घी से रात्रि को मालिश करे।। *प्रगाढ़ नींद से आधे रोग नही होते है और उपवास से पूर्ण रोग खीच कर जठरा में स्वाहा हो जाते है*।। *उपवास में कमजोरी महसूस होने पर शहद के पानी,अंगूर के रस या अंगूर का सेवन करना चाहिए*।। *तुलसी के पत्ते रविवार को छोड़कर रोज सेवन करना चाहिये*।। *दोपहर के बाद फूल -पत्ते या तुलसी को तोड़ने से पाप लगता है ऐसा हमारे पुराणों में वर्णित है*।। 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ ************************* 🍃 *Arogya* 🍃 *सावन व भादों मास में खाने पीने का परहेज़* *-----------------------------------* 1. दूध ,दही लस्सी न लें । 2. हरे पत्ते वाली सब्ज़ी न खाएँ । 3. रसदार फल न लें । आम न खाएँ । 4. बैंगन ,लौकी न खाएँ । 5. गाजर मूली चुकंदर ककड़ी खीरा न खाएँ । 6. बाजार से फ़ास्ट फ़ूड न खाएँ। 7. मिठाईयां न खाएँ । 8. किसी प्रकार का माँस व मदिरा न लें । 9. तेज़ खट्टा न खाएँ । 10. ठंडी व बासी चीज़ न खाएँ । 11. आइसक्रीम एवं कोल्ड ड्रिंक का सेवन ना करेंl#आयुर्वेदा *फिर क्या खाएँ ।* -------------------- 1. पनीर , मटर की सब्ज़ी ,दालें सभी खा सकते हैं । 2. गाजर टमाटर का सूप , 3. अदरक,प्याज़ ,लस्सन, 4. सेब ,अनानास,बेल फल ,नारियल । 5. बेकरी व भुजिया products., 6. जलेबी , थोड़ा गर्म गुलाब जामुन व हलवाl 7. बेसन का ज़्यादा प्रयोग करें । 8. पानी उबाल कर , ताज़ा कर के पीएँ । 9. हल्दी वाला गर्म दूध ले सकते हैं । 10. देसी चाय ले सकते है । ब्राह्मी चाय या इम्यून चाय का सेवन इस मौसम में बहुत ही चमत्कारिक लाभ दिखाता हैl 11. विटामिन सी से युक्त आंवले से भरपूर रसायनप्राश का सेवन भी ऐसे मौसम में बहुत लाभ देता है *ध्यान रखें* इन दो महीनों व वर्षा ऋतु में ज्ठराग्नि ( पाचन शक्ति ) कमज़ोर व मंद होती है । इसलिए वात पित् व कफ रोग बड़ जाता है ।इस ऋतु में वर्षा के कारण जलवायु में कई प्रकार के विषाक्त कीटाणुओं का सब्ज़ियों व फलों पर व ठंडे पेय पदार्थों पर हमला हो जाता है जो कि मनुष्य ,पशु ,जानवरों ,पंछियों व पानी में रहने वाले जीवों को भी नुक्सान करता है इसलिए पानी भी उबाल कर पीएँ । तलाब व खड़े पानी व नदी दरिया के पानी में न नहाएँ ।अगर नहाना पड़ जाए तो बाद में नीम् युक्त साबुन से नहाएँ नहीं तो पित रोग का ख़तरा है । *जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌷 *कहानी* *सभी बहनों को समर्पित* क्या बहन बेटियाँ मायके सिर्फ लेने के लिए आती हैं खिडकी के पास खड़ी सिमरन सोचती हैं राखी आने वाली है पर इस बार न तो माँ ने फोन करके भैया के आने की बात कही और न ही मुझे आने को बोला ऐसा कैसे हो सकता है।हे भगवान बस ठीक हो सबकुछ।अपनी सास से बोली माँजी मुझे बहुत डर लग रहा है।पता नहीं क्या हो गया।मुझे कैसे भूल गए इस बार।आगे से सास बोली कोई बात नही बेटा तुम एक बार खुद जाकर देख आओ।सास की आज्ञा मिलनेभर की देर थी सिमरन अपने पति साथ मायके आती हैं परंतु इस बार घर के अंदर कदम रखते ही उसे सबकुछ बदला सा महसूस होता है।पहले जहाँ उसे देखते ही माँ-पिताजी के चेहरे खुशी से खिल उठते थे इसबार उनपर परेशानी की झलक साफ दिखाई दे रही थी, आगे भाभी उसे देखते ही दौडी चली आती और प्यार से गले लगा लेती थी पर इसबार दूर से ही एक हल्की सी मुस्कान दे डाली।भैया भी ज्यादा खुश नही थे।सिमरन ने जैसे-तैसे एक रात बिताई परन्तु अगले दिन जैसे ही उसके पति उसे मायके छोड़ वापिस गये तो उसने अपनी माँ से बात की तो उन्होंने बताया इसबार कोरोना के चलते भैया का काम बिल्कुल बंद हो गया।ऊपर से और भी बहुत कुछ।बस इसी वजह से तेरे भैया को तेरे घर भी न भेज सकी।सिमरन बोली कोई बात नहीं माँ ये मुश्किल दिन भी जल्दी निकल जाएँगे आप चिंता न करो।शाम को भैया भाभी आपस में बात कर रहे थे जो सिमरन ने सुन ली।भैया बोले पहले ही घर चलाना इतना मुश्किल हो रहा था ऊपर से बेटे की कॉलेज की फीस,परसो राखी है सिमरन को भी कुछ देना पड़ेगा।आगे से भाभी बोली कोई बात नहीं आप चिंता न करो।ये मेरी चूड़ियां बहुत पुरानी हो गई हैं।इन्हें बेचकर जो पैसे आएंगे उससे सिमरन दीदी को त्योहार भी दे देंगे और कॉलेज की फीस भी भर देंगे।सिमरन को यह सब सुनकर बहुत बुरा लगा।वह बोली भैया-भाभी ये आप दोनों क्या कह रहे हो।क्या मैं आपको यहां तंग करके कुछ लेने के लिए ही आती हुँ।वह अपने कमरे में आ जाती हैं।तभी उसे याद आता है अपनी शादी से कुछ समय पहले जब वह नौकरी करती थी तो बड़े शौक से अपनी पहली तनख्वाह लाकर पापा को दी तो पापा ने कहा अपने पास ही रख ले बेटा मुश्किल वक़्त में ये पैसे काम आएंगे।इसके बाद वह हर महीने अपनी सारी तनख्वाह बैंक में जमा करवा देती।शादी के बाद जब भी मायके आती तो माँ उसे पैसे निकलवाने को कहती पर सिमरन हर बार कहती अभी मुझे जरूरत नही,पर आज उन पैसों की उसके परिवार को जरुरत है।वह अगले दिन ही सुबह भतीजे को साथ लेकर बैंक जाती है और सारे पैसे निकलवा पहले भतीजे की कॉलेज की फीस जमा करवाती है और फिर घर का जरूरी सामान खरीद घर वापस आती है।अगले दिन जब भैया के राखी बांधती है तो भैया भरी आँखी से उसके हाथ सौ का नोट रखते है।सिमरन मना करने लगती है तो भैया बोले ये तो शगुन है पगली मना मत करना।सिमरन बोली भैया बेटियां मायके शगुन के नाम पर कुछ लेने नही बल्कि अपने माँबाप कीअच्छी सेहत की कामना करने,भैया भाभी को माँबाप की सेवा करते देख ढेरों दुआएं देने, बडे होते भतीजे भतीजियो की नजर उतारने आती हैं।जितनी बार मायके की दहलीज पार करती हैं ईश्वर से उस दहलीज की सलामती की दुआएं माँगती हैं।जब मुझे देख माँ-पापा के चेहरे पर रौनक आ जाती हैं, भाभी दौड़ कर गले लगाती है, आप लाड़ लड़ाते हो,मुझे मेरा शगुन मिल जाता हैं।अगले दिन सिमरन मायके से विदा लेकर ससुराल जाने के लिए जैसे ही दहलीज पार करती हैं तो भैया का फोन बजता है।उन्हें अपने व्यापार के लिए बहुत बड़ा आर्डर मिलता है और वे सोचते है सचमुच बहनें कुछ लेने नही बल्कि बहुत कुछ देने आती हैं मायके और उनकी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगते है। सचमुच बहन बेटियाँ मायके कुछ लेने नही बल्कि अपनी बेशकीमती दुआएं देने आती हैं।जब वे घर की दहलीज पार कर अंदर आती हैं तो बरक़त भी अपनेआप चली आती हैं।हर बहन बेटी के दिल की तमन्ना होती हैं कि उनका मायका हमेशा खुशहाल रहे और तरक्की करे।मायके की खुशहाली देख उनके अंदर एक अलग ही ताकत भर जाती हैं जिससे ससुराल में आने वाली मुश्किलो का डटकर सामना कर पाती है।मेरा यह लेख सभी बहन बेटियों को समर्पित है और साथ ही एक अहसास दिलाने की कोशिश है कि वे मायके का एक अटूट हिस्सा है।जब मन करे आ सकती हैं।उनके लिए घर और दिल के दरवाजे़ हमेशा खुले रहेंगें। ************************************************ 🍁*आज का सुविचार*🍁 🏯🌺✨👏🕉️👏✨🌺🏯 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩 सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है, जो देश की एकता एवं अखंडता के लिए बहुत जरूरी है। प्राणी मात्र की सेवा करना ही विराट ब्रह्म की आराधना है। प्राणी मात्र की सेवा करना मनुष्य का परम कर्त्तव्य है। इसे ही विराट ब्रह्म की आराधना कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है - "ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्व भूत हिते रता: ..."। अर्थात्, जो सब जीवों का हित-चिंतन करते हैं, वे मुझे प्राप्त होते हैं। अत: साधक के लिए तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि वह लोक-आराधक बनें, सेवाभावी बनें। विभिन्न दुर्गुणों का त्याग करने पर ही सेवाव्रत का पालन किया जा सकता है। स्वार्थ को छोड़े बिना सेवा का कार्य नहीं हो सकता। जिन्हें अपने इन्द्रिय सुखों की चिंता रहती है, वे व्यक्ति सेवा-कार्य में कभी भी सफल नहीं हो सकते। सेवाव्रती का हृदय करुणा और दया से ओत-प्रोत होता है। वह विषयों के प्रति आसक्त नहीं रहता। वह सब भोगों से निवृत्त रहता है। त्याग के कारण उसमें गुण-ग्राहयता बढ़ती जाती है। दीन-दु:खियों की सेवा, निर्बलों की रक्षा और रोगियों की सहायता ही सेवा का मुख्य लक्ष्य है। सेवाव्रती साधक किसी की हानि नहीं करता, किसी का निरादर नहीं करता। वह निरभिमानी, विनयी और त्यागी होता है। उसका अंत:करण पवित्र होने से मन की चंचलता भी नष्ट हो जाती है। मन शुद्ध हो तो अपने-पराये में भेद नहीं रहता। जब वस्तुओं का लोभ नष्ट हो जाता है, तब 'सत्' को अपनाना और 'शुद्ध संकल्पों' में लीन रहना साधक के अभ्यास में आ जाता है। उसमें कर्त्तव्य परायणता का उदय होता है और विषमता मिट जाती है। भेदभाव दूर होकर परम तत्व के अस्तित्व का बोध होता है। अहम् का शोधन होने पर मान-अपमान की चिंता नहीं रहती, असत्य से मोह मिट जाता है। अनित्य वस्तुओं के प्रति विरक्ति उत्पन्न हो जाती है और राग-द्वेष, तेरा-मेरा का झंझट समाप्त हो जाता है। जीवन में निर्विकल्पता का आविर्भाव हो जाता है। सेवा द्वारा सुखों के उपभोग की आसक्ति समाप्त हो जाती है। अत: सब प्राणियों में परमात्मा को स्थित मानते हुए निष्काम सेवा करना ही परमात्मा की सच्ची उपासना है। सच्ची सेवा वह है जो संसार के आसक्ति पूर्ण संबंधों को समाप्त कर देती है। इसलिए केवल किसी को अपना मानकर सेवा न करें, बल्कि सेवा को कर्त्तव्य मानकर सभी की सेवा करें; क्योंकि परमात्मा के अंशभूत होने के कारण सभी प्राणियों को अपना समझना ही सद्बुद्धि है ...। 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩☀!! श्री हरि: शरणम् !! ☀ 🍃🎋🍃🎋🕉️🎋🍃🎋🍃 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 🕉👣🕉👣🕉👣🕉👣🕉👣 *👣🙏🏻🌼*जय राधे कृष्णा*🌼🙏🏻🕉* 🕉👣🕉👣🕉👣🕉👣🕉👣

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Manoj Kumar dhawan Aug 10, 2020

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Shraddha Bhardwaj Aug 10, 2020

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""""जानिये ॐ का रहस्य"""" 🌼🌼〰〰🌼〰🌼〰〰🌼🌼 मन पर नियन्त्रण करके शब्दों का उच्चारण करने की क्रिया को मन्त्र कहते है। मन्त्र विज्ञान का सबसे ज्यादा प्रभाव हमारे मन व तन पर पड़ता है। मन्त्र का जाप एक मानसिक क्रिया है। कहा जाता है कि जैसा रहेगा मन वैसा रहेगा तन। यानि यदि हम मानसिक रूप से स्वस्थ्य है तो हमारा शरीर भी स्वस्थ्य रहेगा। मन को स्वस्थ्य रखने के लिए मन्त्र का जाप करना आवश्यक है। ओम् तीन अक्षरों से बना है। अ, उ और म से निर्मित यह शब्द सर्व शक्तिमान है। जीवन जीने की शक्ति और संसार की चुनौतियों का सामना करने का अदम्य साहस देने वाले ओम् के उच्चारण करने मात्र से विभिन्न प्रकार की समस्याओं व व्याधियों का नाश होता है। सृष्टि के आरंभ में एक ध्वनि गूंजी ओम और पूरे ब्रह्माण्ड में इसकी गूंज फैल गयी। पुराणों में ऐसी कथा मिलती है कि इसी शब्द से भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा प्रकट हुए। इसलिए ओम को सभी मंत्रों का बीज मंत्र और ध्वनियों एवं शब्दों की जननी कहा जाता है। इस मंत्र के विषय में कहा जाता है कि, ओम शब्द के नियमित उच्चारण मात्र से शरीर में मौजूद आत्मा जागृत हो जाती है और रोग एवं तनाव से मुक्ति मिलती है। इसलिए धर्म गुरू ओम का जप करने की सलाह देते हैं। जबकि वास्तुविदों का मानना है कि ओम के प्रयोग से घर में मौजूद वास्तु दोषों को भी दूर किया जा सकता है। ओम मंत्र को ब्रह्माण्ड का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि ओम में त्रिदेवों का वास होता है इसलिए सभी मंत्रों से पहले इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है जैसे ओम नमो भगवते वासुदेव, ओम नमः शिवाय। आध्यात्मिक दृष्टि से यह माना जाता है कि नियमित ओम मंत्र का जप किया जाए तो व्यक्ति का तन मन शुद्घ रहता है और मानसिक शांति मिलती है। ओम मंत्र के जप से मनुष्य ईश्वर के करीब पहुंचता है और मुक्ति पाने का अधिकारी बन जाता है। : वैदिक साहित्य इस बात पर एकमत है कि ओ३म् ईश्वर का मुख्य नाम है. योग दर्शन में यह स्पष्ट है. यह ओ३म् शब्द तीन अक्षरों से मिलकर बना है- अ, उ, म. प्रत्येक अक्षर ईश्वर के अलग अलग नामों को अपने में समेटे हुए है. जैसे “अ” से व्यापक, सर्वदेशीय, और उपासना करने योग्य है. “उ” से बुद्धिमान, सूक्ष्म, सब अच्छाइयों का मूल, और नियम करने वाला है। “म” से अनंत, अमर, ज्ञानवान, और पालन करने वाला है. ये तो बहुत थोड़े से उदाहरण हैं जो ओ३म् के प्रत्येक अक्षर से समझे जा सकते हैं. वास्तव में अनंत ईश्वर के अनगिनत नाम केवल इस ओ३म् शब्द में ही आ सकते हैं, और किसी में नहीं. १. अनेक बार ओ३म् का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनावरहित हो जाता है। २. अगर आपको घबराहट या अधीरता होती है तो ओ३म् के उच्चारण से उत्तम कुछ भी नहीं! ३. यह शरीर के विषैले तत्त्वों को दूर करता है, अर्थात तनाव के कारण पैदा होने वाले द्रव्यों पर नियंत्रण करता है। ४. यह हृदय और खून के प्रवाह को संतुलित रखता है। ५. इससे पाचन शक्ति तेज होती है। ६. इससे शरीर में फिर से युवावस्था वाली स्फूर्ति का संचार होता है। ७. थकान से बचाने के लिए इससे उत्तम उपाय कुछ और नहीं। ८. नींद न आने की समस्या इससे कुछ ही समय में दूर हो जाती है. रात को सोते समय नींद आने तक मन में इसको करने से निश्चित नींद आएगी। ९ कुछ विशेष प्राणायाम के साथ इसे करने से फेफड़ों में मजबूती आती है. इत्यादि! ॐ के उच्चारण का रहस्य? ॐ है एक मात्र मंत्र, यही है आत्मा का संगीत ओम का यह चिन्ह 'ॐ' अद्भुत है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक है। बहुत-सी आकाश गंगाएँ इसी तरह फैली हुई है। ब्रह्म का अर्थ होता है विस्तार, फैलाव और फैलना। ओंकार ध्वनि के 100 से भी अधिक अर्थ दिए गए हैं। यह अनादि और अनंत तथा निर्वाण की अवस्था का प्रतीक है। ॐ को ओम कहा जाता है। उसमें भी बोलते वक्त 'ओ' पर ज्यादा जोर होता है। इसे प्रणव मंत्र भी कहते हैं। यही है √ मंत्र बाकी सभी × है। इस मंत्र का प्रारंभ है अंत नहीं। यह ब्रह्मांड की अनाहत ध्वनि है। अनाहत अर्थात किसी भी प्रकार की टकराहट या दो चीजों या हाथों के संयोग के उत्पन्न ध्वनि नहीं। इसे अनहद भी कहते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड में यह अनवरत जारी है। तपस्वी और ध्यानियों ने जब ध्यान की गहरी अवस्था में सुना की कोई एक ऐसी ध्वनि है जो लगातार सुनाई देती रहती है शरीर के भीतर भी और बाहर भी। हर कहीं, वही ध्वनि निरंतर जारी है और उसे सुनते रहने से मन और आत्मा शांती महसूस करती है तो उन्होंने उस ध्वनि को नाम दिया ओम। साधारण मनुष्य उस ध्वनि को सुन नहीं सकता, लेकिन जो भी ओम का उच्चारण करता रहता है उसके आसपास सकारात्मक ऊर्जा का विकास होने लगता है। फिर भी उस ध्वनि को सुनने के लिए तो पूर्णत: मौन और ध्यान में होना जरूरी है। जो भी उस ध्वनि को सुनने लगता है वह परमात्मा से सीधा जुड़ने लगता है। परमात्मा से जुड़ने का साधारण तरीका है ॐ का उच्चारण करते रहना। *त्रिदेव और त्रेलोक्य का प्रतीक : ॐ शब्द तीन ध्वनियों से बना हुआ है- अ, उ, म इन तीनों ध्वनियों का अर्थ उपनिषद में भी आता है। यह ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी है और यह भू: लोक, भूव: लोक और स्वर्ग लोग का प्रतीक है। *बीमारी दूर भगाएँ : तंत्र योग में एकाक्षर मंत्रों का भी विशेष महत्व है। देवनागरी लिपि के प्रत्येक शब्द में अनुस्वार लगाकर उन्हें मंत्र का स्वरूप दिया गया है। उदाहरण के तौर पर कं, खं, गं, घं आदि। इसी तरह श्रीं, क्लीं, ह्रीं, हूं, फट् आदि भी एकाक्षरी मंत्रों में गिने जाते हैं। सभी मंत्रों का उच्चारण जीभ, होंठ, तालू, दाँत, कंठ और फेफड़ों से निकलने वाली वायु के सम्मिलित प्रभाव से संभव होता है। इससे निकलने वाली ध्वनि शरीर के सभी चक्रों और हारमोन स्राव करने वाली ग्रंथियों से टकराती है। इन ग्रंथिंयों के स्राव को नियंत्रित करके बीमारियों को दूर भगाया जा सकता है। *उच्चारण की विधि : प्रातः उठकर पवित्र होकर ओंकार ध्वनि का उच्चारण करें। ॐ का उच्चारण पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन, वज्रासन में बैठकर कर सकते हैं। इसका उच्चारण 5, 7, 10, 21 बार अपने समयानुसार कर सकते हैं। ॐ जोर से बोल सकते हैं, धीरे-धीरे बोल सकते हैं। ॐ जप माला से भी कर सकते हैं। *इसके लाभ : इससे शरीर और मन को एकाग्र करने में मदद मिलेगी। दिल की धड़कन और रक्तसंचार व्यवस्थित होगा। इससे मानसिक बीमारियाँ दूर होती हैं। काम करने की शक्ति बढ़ जाती है। इसका उच्चारण करने वाला और इसे सुनने वाला दोनों ही लाभांवित होते हैं। इसके उच्चारण में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है। *शरीर में आवेगों का उतार-चढ़ाव : प्रिय या अप्रिय शब्दों की ध्वनि से श्रोता और वक्ता दोनों हर्ष, विषाद, क्रोध, घृणा, भय तथा कामेच्छा के आवेगों को महसूस करते हैं। अप्रिय शब्दों से निकलने वाली ध्वनि से मस्तिष्क में उत्पन्न काम, क्रोध, मोह, भय लोभ आदि की भावना से दिल की धड़कन तेज हो जाती है जिससे रक्त में 'टॉक्सिक'पदार्थ पैदा होने लगते हैं। इसी तरह प्रिय और मंगलमय शब्दों की ध्वनि मस्तिष्क, हृदय और रक्त पर अमृत की तरहआल्हादकारी रसायन की वर्षा करती है। कम से कम 108 बार ओम् का उच्चारण करने से पूरा शरीर तनाव रहित हो जाता है। कुछ ही दिनों पश्चात शरीर में एक नई उर्जा का संचरण होने लगता है। । ओम् का उच्चारण करने से प्रकृति के साथ बेहतर तालमेल और नियन्त्रण स्थापित होता है। जिसके कारण हमें प्राकृतिक उर्जा मिलती रहती है। ओम् का उच्चारण करने से परिस्थितियों का पूर्वानुमान होने लगता है। ओम् का उच्चारण करने से आपके व्यवहार में शालीनता आयेगी जिससे आपके शत्रु भी मित्र बन जाते है। ओम् का उच्चारण करने से आपके मन में निराशा के भाव उत्पन्न नहीं होते है। आत्म हत्या जैसे विचार भी मन में नहीं आते है। जो बच्चे पढ़ाई में मन नहीं लगाते है या फिर उनकी स्मरण शक्ति कमजोर है। उन्हें यदि नियमित ओम् का उच्चारण कराया जाये तो उनकी स्मरण शक्ति भी अच्छी हो जायेगी और पढ़ाई में मन भी लगने लगेगा। 🔥 """""गजेन्द्र प्रताप राजभर""""" 🔥 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

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@anshuumraoasha Aug 10, 2020

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