sn vyas
sn vyas Apr 20, 2021

🖼⚗🖼⚗🖼⚗🖼⚗🖼⚗ *🙏🏻सादर वन्दे🙏🏻* *🚩धर्मयात्रा🚩* *⛩️चौबीस खम्बा ⛩️* *🔱महालया एवं महामाया देवियाँ 🔱* श्री महाकालेश्वर मन्दिर के पास से पटनी बाजार की ओर जाने वाले मार्ग पर यह पुरातन द्वार *‘ चौबीस खम्बा ’* कहलाता है। यह द्वार बहुत प्राचीन है। यहाँ पर 12 वीं शताब्दी का एक शिलालेख लगा हुआ था उसमें लिखा था कि अनहीलपट्टन के राजा ने अवन्ति में व्यापार करने के लिए नागर व चतुर्वेदी व्यापारियों को यहाँ लाकर बसाया था। ऐसा अनुमान होता है , कि द्वार के दोनों पार्श्व भागों में चौबीस खम्बे लगे हैं और इसलिए इसे चौबीस खम्बा दरवाजा कहते हैं। इस दरवाजे को महामाया देवी मानते हैं , यहाँ पर *महालया एवं महामाया दो देवियों* की मूर्तियाँ हैं और शारदीय नवरात्री की महाष्टमी पर कलेक्टर दोनों देवियों को मदिरा पिलाकर शासकीय पूजा करते है।इसके बाद नगर के अन्य देवी व भैरव मंदिर में पूजा होती है । तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध उज्जयिनी के चारों द्वार पर भैरव तथा देवी विराजित है , जो आपदा-विपदा से नगर की रक्षा करते है ,चौबीसखंबा माता उनमे से एक है । कभी यह महाकाल वन का मुख्य प्रवेश द्वार रहा है । अब कालांतर में यह नगर के मध्य विराजित है। मंदिर के समीप पटनी बाज़ार तथा सराफा बाजार जैसे प्रमुख बाज़ार है। जिससे बड़े व छोटे कारोबारी जुड़े हुए है ।चौबीसखंबा माता मंदिर पुरात्तव विभाग के अधीन संरक्षित स्मारक है । यह मंदिर करीब १००० साल पुराना होकर परमारकालीन स्थापत्य कला तथा द्वार परंपरा का उत्कृष्ट उदारहण है । 🖼⚗🖼⚗🖼⚗🖼⚗🖼⚗🖼⚗

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*🙏🏻सादर वन्दे🙏🏻*
  *🚩धर्मयात्रा🚩*
*⛩️चौबीस खम्बा ⛩️*
*🔱महालया एवं महामाया देवियाँ 🔱*
श्री महाकालेश्वर मन्दिर के पास से पटनी बाजार की ओर जाने वाले मार्ग पर यह पुरातन द्वार *‘ चौबीस खम्बा ’* कहलाता है। यह द्वार बहुत प्राचीन है। यहाँ पर 12 वीं शताब्दी का एक शिलालेख लगा हुआ था उसमें लिखा था कि अनहीलपट्टन के राजा ने अवन्ति में व्यापार करने के लिए नागर व चतुर्वेदी व्यापारियों को यहाँ लाकर बसाया था। ऐसा अनुमान होता है , कि  द्वार के दोनों पार्श्व भागों में चौबीस खम्बे लगे हैं और इसलिए इसे चौबीस खम्बा दरवाजा कहते हैं। इस दरवाजे को महामाया देवी मानते हैं , यहाँ पर *महालया एवं महामाया दो देवियों* की मूर्तियाँ हैं और शारदीय नवरात्री की महाष्टमी पर कलेक्टर दोनों देवियों को मदिरा पिलाकर शासकीय पूजा करते है।इसके बाद नगर के अन्य देवी व भैरव मंदिर में पूजा होती है । तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध उज्जयिनी के चारों द्वार पर भैरव तथा देवी विराजित है , जो आपदा-विपदा से नगर की रक्षा करते है ,चौबीसखंबा माता उनमे से एक है । कभी यह महाकाल वन का मुख्य प्रवेश द्वार रहा है । अब कालांतर में यह नगर के मध्य विराजित है। मंदिर के समीप पटनी बाज़ार तथा सराफा बाजार जैसे प्रमुख बाज़ार है। जिससे बड़े व छोटे कारोबारी जुड़े हुए है ।चौबीसखंबा माता मंदिर पुरात्तव विभाग के अधीन संरक्षित स्मारक है । यह मंदिर करीब १००० साल पुराना होकर परमारकालीन स्थापत्य कला तथा द्वार परंपरा का उत्कृष्ट उदारहण है । 


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Anita Sharma May 14, 2021

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Pritam Chhabariy May 15, 2021

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Anita Sharma May 14, 2021

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Anita Sharma May 13, 2021

एक बार नारद जी के मन में एक विचित्र सा कौतूहल पैदा हुआ। वैसे नारदजी के साथ विचित्र घटनाएं होती ही रहती हैं। उन्हें यह जानने की धुन सवार हुई कि ब्रह्मांड में सबसे बड़ा और महान कौन है? नारद जी ने अपनी जिज्ञासा भगवान विष्णु के सामने ही रख दी। भगवान विष्णु मुस्कुराने लगे। फिर बोले-नारद जी सब पृथ्वी पर टिका है। इसलिए पृथ्वी को बड़ा कह सकते हैं। परंतु नारद जी यहां भी एक शंका है। स्वयं नारायण अपने उत्तर के साथ ही परंतु लगा रहे हैं। नारद जी का कौतूहल शांत होने की बजाय और बढ़ गया। नारद जी ने पूछा स्वयं आप सशंकित हैं फिर तो विषय गंभीर है। कैसी शंका है प्रभु? विष्णु जी बोले-समुद्र ने पृथ्वी को घेर रखा है। इसलिए समुद्र उससे भी बड़ा है। अब नारद जी बोले-प्रभु आप कहते हैं तो मान लेता हूं कि समुद्र सबसे बड़ा है। यह सुनकर विष्णु जी ने एक बात और छेड़ दी-परंतु नारद जी समुद्र को अगस्त्य मुनि ने पी लिया था। इसलिए समुद्र कैसे बड़ा हो सकता है? बड़े तो फिर अगस्त्य मुनि ही हुए। नारद जी के माथे पर बल पड़ गया। फिर भी उन्होंने कहा-प्रभु आप कहते हैं तो अब अगस्त्य मुनि को ही बड़ा मान लेता हूं। नारद जी अभी इस बात को स्वीकारने के लिए तैयार हुए ही थे कि विष्णु ने नई बात कहकर उनके मन को चंचल कर दिया। श्री विष्णु जी बोले-नारद जी पर ये भी तो सोचिए वह रहते कहां हैं। आकाशमंडल में एक सूई की नोक बराबर स्थान पर जुगनू की तरह दिखते हैं। फिर वह कैसे बड़े, बड़ा तो आकाश को होना चाहिए। नारद जी बोले-हां प्रभु आप यह बात तो सही कर रहे हैं। आकाश के सामने अगस्त्य ऋषि का तो अस्तित्व ही विलीन हो जाता है। आकाश ने ही तो सारी सृष्टि को घेर आच्छादित कर रखा है। आकाश ही श्रेष्ठ और सबसे बड़ा है। भगवान विष्णु जी ने नारद जी को थोड़ा और भ्रमित करने की सोची। श्रीहरि बोल पड़े, पर नारदजी आप एक बात भूल रहे हैं। वामन अवतार ने इस आकाश को एक ही पग में नाप लिया था मैंने। फिर आकाश से विराट तो वामन हुए। नारदजी ने श्रीहरि के चरण पकड़ लिए और बोले भगवन आप ही तो वामन अवतार में थे। फिर अपने सोलह कलाएं भी धारण कीं और वामन से बड़े स्वरूप में भी आए। इसलिए यह तो निश्चय हो गया कि सबसे बड़े आप ही हैं। भगवान विष्णु ने कहा-नारद, मैं विराट स्वरूप धारण करने के उपरांत भी अपने भक्तों के छोटे हृदय में विराजमान हूं। वहीं निवास करता हूं। जहां मुझे स्थान मिल जाए वह स्थान सबसे बड़ा हुआ न। इसलिए सर्वोपरि और सबसे महान तो मेरे वे भक्त हैं जो शुद्ध हृदय से मेरी उपासना करके मुझे अपने हृदय में धारण कर लेते हैं। उनसे विस्तृत और कौन हो सकता है। तुम भी मेरे सच्चे भक्त हो इसलिए वास्तव में तुम सबसे बड़े और महान हो। श्रीहरि की बात सुनकर नारद जी के नेत्र भर आए। उन्हें संसार को नचाने वाले भगवान के हृदय की विशालता को देखकर आनंद भी हुआ और अपनी बुद्धि के लिए खेद भी। नारद जी ने कहा-प्रभु संसार को धारण करने वाले आप स्वयं खुद को भक्तों से छोटा मानते हैं। फिर भक्तगण क्यों यह छोटे-बड़े का भेद करते हैं। मुझे अपनी अज्ञानता पर दुख है। मैं आगे से कभी भी छोटे-बड़े के फेर में नहीं पड़ूंगा। इसीलिए तो कहते हैं भक्त के वश में हैं भगवान। भक्त अपनी निष्काम भक्ति से भगवान को वश में कर लेता है। तेरा तुझको सौंपते क्या लागे है मोरा इसी भाव में रहिए तो त्रिलोक के स्वामी आपके पास आकर बस जाने को लालायित रहेंगे।

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Anita Sharma May 13, 2021

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Suchitra Singh May 13, 2021

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