!! माता वैष्णो देवी की अमर कथा !!

!! माता वैष्णो देवी की अमर कथा !!

माता वैष्णो देवी की अमर कथा
वैष्णो देवी उत्तरी भारत के सबसे पूजनीय और पवित्र स्थलों में से एक है। यह मंदिर पहाड़ पर स्थित होने के कारण अपनी भव्यता व सुंदरता के कारण भी प्रसिद्ध है। वैष्णो देवी भी ऐसे ही स्थानों में एक है जिसे माता का निवास स्थान माना जाता है। मंदिर, 5,200 फीट की ऊंचाई और कटरा से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हर साल लाखों तीर्थ यात्री मंदिर के दर्शन करते हैं।यह भारत में तिरुमला वेंकटेश्वर मंदिर के बाद दूसरा सर्वाधिक देखा जाने वाला धार्मिक तीर्थस्थल है। वैसे तो माता वैष्णो देवी के सम्बन्ध में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं लेकिन मुख्य 2 कथाएँ अधिक प्रचलित हैं।

माता वैष्णो देवी की प्रथम कथा

मान्यतानुसार एक बार पहाड़ों वाली माता ने अपने एक परम भक्तपंडित श्रीधर की भक्ति से प्रसन्न होकर उसकी लाज बचाई और पूरे सृष्टि को अपने अस्तित्व का प्रमाण दिया। वर्तमान कटरा कस्बे से 2 कि.मी. की दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे। वह नि:संतान होने से दु:खी रहते थे। एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुँवारी कन्याओं को बुलवाया। माँ वैष्णो कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं। पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गई पर माँ वैष्णो देवी वहीं रहीं और श्रीधर से बोलीं- ‘सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ।’ श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस – पास के गाँवों में भंडारे का संदेश पहुँचा दिया। वहाँ से लौटकर आते समय गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ जी के साथ उनके दूसरे शिष्यों को भी भोजन का निमंत्रण दिया। भोजन का निमंत्रण पाकर सभी गांववासी अचंभित थे कि वह कौन सी कन्या है जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है? इसके बाद श्रीधर के घर में अनेक गांववासी आकर भोजन के लिए एकत्रित हुए। तब कन्या रुपी माँ वैष्णो देवी ने एक विचित्र पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया।

भैरव ने फिर भी हार नहीं मानी जब वीर हनुमान निढाल होने लगे, तब माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप लेकर भैरवनाथ का संहार कर दिया। भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से 8 किमी दूर त्रिकूट पर्वत की भैरव घाटी में गिरा। उस स्थान को भैरोनाथ के मंदिर के नाम से जाना जाता है। जिस स्थान पर माँ वैष्णो देवी ने हठी भैरवनाथ का वध किया, वह स्थान पवित्र गुफा’ अथवा ‘भवन के नाम से प्रसिद्ध है। इसी स्थान पर माँ काली (दाएँ), माँ सरस्वती (मध्य) और माँ लक्ष्मी (बाएँ) पिंडी के रूप में गुफा में विराजित हैं। इन तीनों के सम्मिलत रूप को ही माँ वैष्णो देवी का रूप कहा जाता है। इन तीन भव्य पिण्डियों के साथ कुछ श्रद्धालु भक्तों एव जम्मू कश्मीर के भूतपूर्व नरेशों द्वारा स्थापित मूर्तियाँ एवं यन्त्र इत्यादी है। कहा जाता है कि अपने वध के बाद भैरवनाथ को अपनी भूल का पश्चाताप हुआ और उसने माँ से क्षमादान की भीख माँगी।

माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव की प्रमुख मंशा मोक्ष प्राप्त करने की थी, उन्होंने न केवल भैरव को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति प्रदान की, बल्कि उसे वरदान देते हुए कहा कि मेरे दर्शन तब तक पूरे नहीं माने जाएँगे, जब तक कोई भक्त मेरे बाद तुम्हारे दर्शन नहीं करेगा। उसी मान्यता के अनुसार आज भी भक्त माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के बाद 8 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर भैरवनाथ के दर्शन करने को जाते हैं। इस बीच वैष्णो देवी ने तीन पिंड (सिर) सहित एक चट्टान का आकार ग्रहण किया और सदा के लिए ध्यानमग्न हो गईं। इस बीच पंडित श्रीधर अधीर हो गए। वे त्रिकुटा पर्वत की ओर उसी रास्ते आगे बढ़े, जो उन्होंने सपने में देखा था, अंततः वे गुफ़ा के द्वार पर पहुंचे, उन्होंने कई विधियों से ‘पिंडों’ की पूजा को अपनी दिनचर्या बना ली, देवी उनकी पूजा से प्रसन्न हुईं, वे उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें आशीर्वाद दिया। तब से, श्रीधर और उनके वंशज देवी मां वैष्णो देवी की पूजा करते आ रहे हैं।

भोजन परोसते हुए जब वह कन्या भैरवनाथ के पास गई। तब उसने कहा कि मैं तो खीर – पूड़ी की जगह मांस भक्षण और मदिरापान करुंगा। तब कन्या रुपी माँ ने उसे समझाया कि यह ब्राह्मण के यहां का भोजन है, इसमें मांसाहार नहीं किया जाता। किंतु भैरवनाथ ने जान – बुझकर अपनी बात पर अड़ा रहा। जब भैरवनाथ ने उस कन्या को पकडऩा चाहा, तब माँ ने उसके कपट को जान लिया। माँ ने वायु रूप में बदलकरत्रिकूट पर्वत की ओर उड़ चली। भैरवनाथ भी उनके पीछे गया। माना जाता है कि माँ की रक्षा के लिए पवनपुत्र हनुमान भी थे। मान्यता के अनुसार उस वक़्त भी हनुमानजी माता की रक्षा के लिए उनके साथ ही थे। हनुमानजी को प्यास लगने पर माता ने उनके आग्रह पर धनुष से पहाड़ पर बाण चलाकर एक जलधारा निकाला और उस जल में अपने केश धोए। आज यह पवित्र जलधारा बाणगंगा के नाम से जानी जाती है, जिसके पवित्र जल का पान करने या इससे स्नान करने से श्रद्धालुओं की सारी थकावट और तकलीफें दूर हो जाती हैं।

इस दौरान माता ने एक गुफा में प्रवेश कर नौ माह तक तपस्या की। भैरवनाथ भी उनके पीछे वहां तक आ गया। तब एक साधु ने भैरवनाथ से कहा कि तू जिसे एक कन्या समझ रहा है, वह आदिशक्ति जगदम्बा है। इसलिए उस महाशक्ति का पीछा छोड़ दे। भैरवनाथ साधु की बात नहीं मानी। तब माता गुफा की दूसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। यह गुफा आज भी अर्धकुमारी या आदिकुमारी या गर्भजून के नाम से प्रसिद्ध है। अर्धक्वाँरी के पहले माता की चरण पादुका भी है। यह वह स्थान है, जहाँ माता ने भागते – भागते मुड़कर भैरवनाथ को देखा था। गुफा से बाहर निकल कर कन्या ने देवी का रूप धारण किया। माता ने भैरवनाथ को चेताया और वापस जाने को कहा। फिर भी वह नहीं माना। माता गुफा के भीतर चली गई। तब माता की रक्षा के लिए हनुमानजी ने गुफा के बाहर भैरव से युद्ध किया।

माता वैष्णो देवी की अन्य कथा

हिन्दू पौराणिक मान्यताओं में जगत में धर्म की हानि होने और अधर्म की शक्तियों के बढऩे पर आदिशक्ति के सत, रज और तम तीन रूप महासरस्वती, महालक्ष्मी और महादुर्गा ने अपनी सामूहिक बल से धर्म की रक्षा के लिए एक कन्या प्रकट की। यह कन्या त्रेतायुग में भारत के दक्षिणी समुद्री तट रामेश्वर में पण्डित रत्नाकर की पुत्री के रूप में अवतरित हुई। कई सालों से संतानहीन रत्नाकर ने बच्ची को त्रिकुता नाम दिया, परन्तु भगवान विष्णु के अंश रूप में प्रकट होने के कारण वैष्णवी नाम से विख्यात हुई। लगभग 9 वर्ष की होने पर उस कन्या को जब यह मालूम हुआ है भगवान विष्णु ने भी इस भू-लोक में भगवान श्रीराम के रूप में अवतार लिया है। तब वह भगवान श्रीराम को पति मानकर उनको पाने के लिए कठोर तप करने लगी।

जब श्रीराम सीता हरण के बाद सीता की खोज करते हुए रामेश्वर पहुंचे। तब समुद्र तट पर ध्यानमग्र कन्या को देखा। उस कन्या ने भगवान श्रीराम से उसे पत्नी के रूप में स्वीकार करने को कहा। भगवान श्रीराम ने उस कन्या से कहा कि उन्होंने इस जन्म में सीता से विवाह कर एक पत्नीव्रत का प्रण लिया है। किंतुकलियुग में मैं कल्कि अवतार लूंगा और तुम्हें अपनी पत्नी रूप में स्वीकार करुंगा। उस समय तक तुम हिमालय स्थित त्रिकूट पर्वत की श्रेणी में जाकर तप करो और भक्तों के कष्ट और दु:खों का नाश कर जगत कल्याण करती रहो। जब श्री राम ने रावण के विरुद्ध विजय प्राप्त किया तब मां ने नवरात्रमनाने का निर्णय लिया। इसलिए उक्त संदर्भ में लोग, नवरात्र के 9 दिनों की अवधि में रामायण का पाठ करते हैं। श्री राम ने वचन दिया था कि समस्त संसार द्वारा मां वैष्णो देवी की स्तुति गाई जाएगी, त्रिकुटा, वैष्णो देवी के रूप में प्रसिद्ध होंगी और सदा के लिए अमर हो जाएंगी।

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Neha Sharma, Haryana Nov 23, 2020

🌸*श्री मद् देवी भागवत महापुराण ( उनतीसवां अध्याय )*🌸 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 🌸🙏*ओम् गं गणपतये नमः*🙏🌸 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 🌸🙏*ओम् ह्रीं श्रीं नमः*🙏🌸 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 *इस अध्याय में शिव-पार्वती का एकान्त-विहार है, पृथ्वी देवी का गोरूप धारण कर देवताओं के साथ ब्रह्माजी के पास जाना, ब्रह्माजी का उन्हें आश्वस्त करना और कुमार कार्तिकेय के प्रादुर्भाव होने की बात बताने का वर्णन है. "श्रीमहादेव जी बोले – (मुने !) पार्वती को प्राप्त करने के उद्देश्य से की गई तपस्या के क्लेश का दिन-रात स्मरण करके महादेवजी उन पार्वती में प्रेमासक्त हो गये।।1।। *भगवती के वचन को सुनने में ही अपने कानों को निरन्तर नियुक्त कर दिया था. आँखें उनके रूप्-दर्शन में समर्पित थीं, उनके मन को प्रसन्न करने के लिए उनके चित्त की सारी चेष्टाएँ निरन्तर नियोज्य थीं. इस प्रकार पार्वती में प्रेमासक्त भगवान ने उनमें प्रीति उत्पन्न की।।2।। *एक समय की बात है – महेश्वर ने वन से पुष्प लाकर एक सुन्दर माला बनायी और उसे कपूर तथा अगरु से विलेपित करके पार्वती के गले में डाल दी. पुन: प्रेमपूर्वक भगवान महादेव ने पुत्र प्राप्ति की कामना से पार्वती के प्रति अपने मन में आदरपूर्वक सहधर्मिता की भावना धारण की।।3-4।। *भगवान शिव ने नन्दी से कहा – “तुम सभी प्रमथगणों के साथ पुर की इस प्रकार रखवाली करो कि मेरी आज्ञा के बिना यहाँ कोई भी प्राणी न आ सके, चाहे वह कोई देवता हो अथवा देववन्द्य ही क्यों न हो”।।5-6।। *यह सुनकर देवाधिदेव की आज्ञा से वे नन्दी समस्त प्रमथगणों के साथ उस पुर के द्वार की रक्षा में तत्पर हो गये।।7।। *तदनन्तर भगवान शिव पार्वती के साथ दीर्घकाल तक विहार करते रहे. उस समय स्नेहयुक्त मनवाले शिव को प्रेम के आनन्द में निमग्न रहने के कारण न तो दिन अथवा रात का भान ही रहा और न शान्ति ही मिली।।8-10।। *मुनिश्रेष्ठ ! उनके पैर के प्रहार से पीड़ित हुई पृथ्वी गाय का रूप धारण करके सूर्य के पास गई और आँखों में आँसू भरकर रोते हुए उसने महेश के पादप्रहार से उत्पन्न हुए अपने प्रति किये गये उपद्रव के विषय में सूर्य से इस प्रकार निवेदन किया -।।11-12।। *दिवाकर ! जगत के स्वामी भगवान शिव हिमालय के शिखर पर पार्वती के साथ दीर्घकाल से लीला-विहार में स्थित हैं. शिव तथा शक्ति के भार से दिन-रात व्यथित मैं अब उसे सहन करने में असमर्थ हूँ, अत: आप मेरे कष्ट के निवारणार्थ शीघ्र ही कोई उपाय बताइये. पार्वती को प्राप्त करके उन जगत्पति महादेव को न तो रात का ज्ञान रह गया है और न दिन का. वे महेश क्षण भर के लिये भी पार्वती से विरत नहीं हो रहे हैं, तथापि उन्हें शान्ति नहीं मिल रही है।।13-16।। *श्रीमहादेवजी बोले – इस प्रकार पृथ्वी का वचन सुनकर भगवान सूर्य उस पृथ्वी के साथ वहाँ गये, जहाँ इन्द्र आदि प्रधान देवता विद्यमान थे. वहाँ पर उन्होंने उनसे वह सब घटना बतायी, जैसा पृथ्वी ने उनसे निवेदन किया था. महामुने ! उसे सुनकर सभी देवतागण पृथ्वी को साथ लेकर तत्काल ब्रह्माजी के पास पहुँचे।।17-18।। *मुनिश्रेष्ठ ! तत्पश्चात उन देवताओं ने गोरूप धारण की हुई पृथ्वी को आगे करके जगत के पति उन ब्रह्माजी से कहा – ब्रह्मन् ! सुनिए, महादेव हिमालय के शिखर पर जगद्धात्री पार्वती के साथ दीर्घकाल से विहार कर रहे हैं फिर भी उन्हें शान्ति नहीं मिल रही है. इस प्रकार वे महेश्वर किसी भी प्रकार धैर्य धारण नहीं कर पा रहे हैं।।19-22।। *शिव तथा शक्ति के भार से पीड़ित यह वसुन्धरा रसातल जाने की स्थिति बनने पर हम लोगों के पास आयी है. त्रिजगत्पते ! इस स्थिति में क्या किया जाए, वह हमें बताइये।।23-24।। *उनका यह वचन सुनकर लोकपितामाह ब्रह्मा ने देवताओं को बार-बार सान्त्वना देकर उनसे कहा – वे महेश्वर देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए ही लीला-विहार में संलग्न हैं. इससे स्खलित तेज के प्रभाव से जो पुत्र उत्पन्न होगा, वही तारकासुर का संहारक होगा, इसमें संशय नहीं है. किंतु यदि पार्वती के गर्भ से शम्भु का पुत्र उत्पन्न होगा तो वह देवता तथा असुर – इन दोनों का विनाश कर देगा. उसके इस पराक्रम को संसार भी सहन नहीं कर पाएगा. अत: देवतागण ! जिस किसी भी तरह से सम्भव हो, शम्भु के इस रेत से किसी अन्य स्थान में एक पुत्र उत्पन्न हो – वैसी चेष्टा आप लोग करें।।25-28।। *मैं वहीं चल रहा हूँ, जहाँ वे महेश्वर विराजमान हैं और पार्वती के साथ स्थित हैं. शम्भु के संसर्ग से विलग रहने के लिए महेश्वरी पार्वती से प्रार्थना करते हुए आप सभी लोग भी मेरे साथ वहाँ तत्काल चलिए।।29-31।। *नारद ! देवताओं से ऎसा कहकर ब्रह्माजी तत्काल वहाँ के लिए प्रस्थित हो गये, जहाँ देवेश्वर शिव उमा के साथ विहार कर रहे थे।।32।। महामते ! तत्पश्चात सभी देवता भी वहाँ पहुँच गये और उन्होंने पार्वती तथा शिवजी को आनन्द में निमग्न देखा।।33।। *उनके आ जाने पर भी भगवान शिव विरत नहीं हुए, पार्वती देवी भी संकुचित नहीं हुई और उन्होंने भगवान महेश्वर का परित्याग नहीं किया।।34-35।। ।। इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत *श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “श्रीशिवपार्वतीविहारवर्णन” नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।29।। ।। जय माता दी ।। 🌸🌸🙏🌸🌸 ~~~~~~~~~

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Neha Sharma, Haryana Nov 23, 2020

🌸*श्री मद् देवीभागवत महापुराण ( अठ्ठाईसवां अध्याय )*🌸 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 🌸🙏*ॐ श्री गणेशाय नम:*🙏🌸 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 🌸🙏*महादेव्यै नमः*🙏🌸 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁 *इस अध्याय में हिमालय द्वारा बारात का यथोचित सत्कार करना है, शिव-पार्वती के मांगलिक विवाहोत्सव का वर्णन है, शिव-पार्वती के विवाहोत्सव के पाठ की महिमा का वर्णन है। *श्रीमहादेवजी बोले – इसके बाद महेश्वर को आया हुआ जानकर गिरिराज हिमालय ने वहाँ आकर उनकी विधिवत पूजा की और उन्हें स्वयं पुर में प्रवेश कराया, साथ ही हिमालय ने ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओं की यथोचित पूजा करके उन्हें भी अपने पुर में प्रवेश कराया, इसी प्रकार प्रसन्नचित गिरिराज हिमालय मरीचि आदि महर्षियों की भी यथोचित पूजा करके उन्हें अपने पुर ले गये।।1-3।। *रत्नों के आभूषणों से अलंकृत, सोने के दिव्य मुकुट से सुशोभित, दो भुजाओं तथा अत्यन्त सुन्दर मुख वाले, चन्द्रमा से सुशोभित सिर वाले और सैकड़ों सूर्यों की प्रभा के तुल्य प्रतीत होने वाले शान्तस्वभाव पार्वतीनाथ शिव को देखकर मेनका और उसी तरह गिरिराज हिमालय भी अत्यन्त आनन्दित हुए।।4-5।। *उस अवसर पर जो अन्य देव, गन्धर्व तथा किन्नर आये हुए थे, वे एकटक पार्वतीनाथ शिवजी को ही देख रहे थे और अन्यत्र कहीं भी दृष्टि नहीं ले जा रहे थे. सभी लोग आपस में यह कहते थे कि जैसे गौरी रूपवती हैं, वैसे ही जगत्पति महादेव भी रूपसम्पन्न हैं।।6-7।। *इसके बाद सुन्दर लक्षणों से युक्त मुहूर्त आने पर गिरिराज हिमालय ने पार्वती का पूजन करके वैवाहिक विधि से देवाधिदेव शिव को प्रदान कर दी और प्रसन्न मन शम्भु ने जगत का सृजन, पालन एवं संहार करने वाली उन हिमालय पुत्री पार्वती का पत्नीरूप पाणिग्रहण किया।।8-9।। *उस समय गिरीन्द्र हिमालय के नगर में ऎसा महान उत्सव सम्पन्न हुआ, जैसा कभी हुआ नहीं था और आगे कहीं होने वाला भी नहीं है. महामते ! उस समय सभी देवताओं के मन में प्रसन्नता छायी हुई थी।।10½।। *इस प्रकार पार्वती के साथ महादेव का विवाह सम्पन्न हो जाने पर देवताओं का मनोरथ पूर्ण हो गया और वे महादेव को मुग्ध करने वाले कामदेव की बार-बार प्रशंसा करने लगे।।11।। *वहाँ पर पार्वती सहित भगवान शंकर को देखकर सभी देवता, गन्धर्व और ऋषिगण परस्पर कहने लगे – “अहो, बुद्धिसम्पन्न गिरिराज हिमालय का महान सौभाग्य है कि साक्षात जगज्जननी भगवती उन्हें कन्यारूप में प्राप्त हुई हैं।।12-13।। *जो परा प्रकृति अपनी इच्छा से सम्पूर्ण विश्व का सृजन करती हैं, उन्होंने जो हिमालय के घर में लीलापूर्वक कन्यारूप में जन्म लिया है, वह इन गिरिराज हिमालय की अल्प तपस्या का फल नहीं है. मेना के पूर्वजन्म के संचित अतुलनीय भाग्य का क्या वर्णन किया जाए जो कि ये जगज्जननी इन पार्वती की भी माता के रूप में प्रतिष्ठित हुई हैं. लोक में ऎसा कौन है जो वाणी से परे तथा मन के लिए अत्यन्त दुर्गम महेश्वर के प्रभाव, रूप तथा वैभव का वर्णन करने में समर्थ है? इस प्रकार रूप से सम्पन्न पार्वती तथा परमेश्वर को देखकर सभी लोग आपस में अन्य प्रकार की बहुत-सी बातें कर रहे थे।।14-18।। *ब्रह्मा और भगवान विष्णु पार्वती सहित हर्षयुक्त तथा शान्त भगवान महेश्वर से इस प्रकार कहने लगे – ।।19।। *ब्रह्मा और विष्णु बोले – प्रभो ! देव ! आपकी भार्या ये पार्वती वे ही सती हैं, जिनके वियोगजनित दु:ख से व्यथित होकर आप पूर्वकाल में तपस्या में लीन हो गये थे. ये वे ही जगत की आदिस्वरुपिणी सनातनी भगवती देवी हैं।।20।। *श्रीमहादेवजी बोले – [मुने !] तदनन्तर हिमालय भक्तिपूर्वक शम्भु की स्तुति करने लगे।।21।। *हिमालय बोले – भक्तों पर दया करने वाले देवदेव ! महादेव ! शंकर ! आपको नमस्कार है, आपको नमस्कार है, आपको नमस्कार है, आपको बार-बार नमस्कार है. आज मेरा जन्म सफल हो गया और मेरा जीवन सज्जीवन बन गया जो कि मैं अपने नेत्रों से जगज्जननी सहित जगन्नाथ शिव को देख रहा हूँ।।22-23।। *श्रीमहादेवजी बोले – महामुने ! इस प्रकार परा भक्ति से स्तुति करते हुए गिरिराज हिमालय से भगवान शंकर ने अपनी अमृतरूपी वाणी से उन्हें प्रसन्न करते हुए कहा – गिरीन्द्र ! महाप्राज्ञ ! आप स्वयं मेरे ही अन्य विग्रह के रूप में हैं, आप भाग्यशाली हैं और देवताओं के लिए भी विशेषरूप से आदरणीय हैं. आज से मैं आपके लिए यज्ञभाग सुनिश्चित कर दे रहा हूँ. गिरीश्वर ! मृत्युलोक में आपके बिना लोग यज्ञ सम्पन्न नहीं करेंगे. गिरे ! जिस प्रकार सभी हविभोक्ता देवतागण यज्ञोत्सव में अपना-अपना भाग प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार आप भी मृत्युलोक में सम्पन्न होने वाले यज्ञों में भाग प्राप्त करेंगे।।24-27।। *हिमालय बोले – प्रभो ! जगद्गुरो ! आपके वरदान से मैं कृतार्थ हो गया हूँ. शम्भो ! कृपानिधे ! अब मैं एक अन्य वरदन के लिए प्रार्थना कर रहा हूँ. शरणागतों पर वात्सल्यभाव रखने वाले महेश्वर ! देव ! इस पार्वती के साथ आप यहीं पर रमण कीजिए और मुझे पवित्र कर दीजिए।।28-29।। *श्रीमहादेवजी बोले – पर्वतराज ! मैं देवी पार्वती सहित प्रसन्नचित रहते हुए आपके इस पुर के समीप में आपके शिखर पर वास करूँगा. गिरे ! इसी कारण से लोग मुझे गिरीश के नाम से जानेंगे।।30-31।। *श्रीमहादेवजी बोले – (मुने !) इस प्रकार उन हिमालय को यह वर प्रदान करके भगवान शिव उसी उत्तम हिमालय पर्वत पर सुरम्य नगर का निर्माण कर पार्वती के साथ वहाँ रहने लगे. इसके बाद ब्रह्मा आदि सभी देवता अपने-अपने स्थान को चले गए।।32।। *जो प्राणी पार्वती के शुभ विवाहोत्सव संबंधी इस मांगलिक अध्याय का श्रवण या पाठ करता है, वह भगवती के चरणों की सन्निधि प्राप्त कर लेता है और उसे शत्रु या राजा का भी भय नहीं रह जाता है. इसका एक बार भी श्रवण कर लेने पर मनुष्य मनोवांछित फल प्राप्त करता है और देवी की कृपा से वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।।33-35।। *मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार मैंने आपको वह सब बता दिया, जिस प्रकार भगवान महेश्वर ने पूर्णाप्रकृति दक्षकन्या सती को फिर से प्राप्त किया था।।36।। *अब आप वह कथा सुनिए, जिस प्रकार देवताओं के रक्षक, तारक का वध करने वाले तथा विशाल भुजाओं वाले शिवपुत्र कार्तिकेय उत्पन्न हुए, जिनके समान महान बलशाली, पराक्रमी तथा धनुर्धर तीनों लोकों में भी न कोई है और न होगा ही।।37-38।। ।। इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत *श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “पार्वतीविवाहमंगल” नामक अठ्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।28।। ।। जय माता दी ।। 🌸🌸🙏🌸🌸 ~~~~~~~~~

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Garima Gahlot Rajput Nov 23, 2020

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Garima Gahlot Rajput Nov 23, 2020

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Gopal Jalan Nov 23, 2020

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Jagdish Raj Nov 23, 2020

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Garima Gahlot Rajput Nov 23, 2020

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