श्रीमद्देवीभागवत (तीसरा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 16 (भाग 1) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ राजकुमार सुदर्शन को मारने के लिये युधाजित् का भरद्वाजाश्रम पर जाना, मुनि से मनोरमा तथा सुदर्शन को बलपूर्वक छीन ले जाने की बात कहना तथा मुनि का रहस्यभरा उत्तर देना, ... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्यासजी कहते हैं-युद्ध समाप्त हो जाने पर महाबली युधाजित् लड़ाई के मैदान से लौटकर अयोध्या पहुँचा। जाते ही वध कर डालने की इच्छा से मनोरमा और सुदर्शन को खोजने लगा। 'वह कहाँ चली गयी'–यों बार-बार कहते हुए उसने बहुत-से सेवक इधर-उधर दौड़ाये। फिर एक अच्छा दिन देखकर अपने दौहित्र शत्रुजित् को राजगद्दी पर बैठाने की व्यवस्था की। अथर्ववेद के पावन मन्त्रों का उच्चारण करके जल से भरे हुए सम्पूर्ण कलशों से शत्रुजित् का अभिषेक हुआ। कुरुनन्दन! उस समय भेरी, शंख और तुरही आदि बाजों की ध्वनि से नगर में खूब उत्सव मनाया गया। ब्राह्मण वेद पढ़ते थे। वन्दीगण स्तुतिगान कर रहे थे और सर्वत्र जयध्वनि गूँज रही थी। ऐसा जान पड़ता था, मानो अयोध्यापुरी हँस रही है। उस नये नरेश की राजगद्दी होने पर हृष्ट पुष्ट मनुष्यों से भरी-पूरी तथा स्तुति और बाजों की ध्वनि से निनादित वह अयोध्या एक नवीन पुरी-सी जान पड़ती थी। कुछ सज्जन पुरुष ही अपने घरों में रहकर शोक मनाते थे। वे सोचते थे-'ओह! आज राजकुमार सुदर्शन कहाँ भटक रहा होगा। वह परम साध्वी रानी मनोरमा अपने पुत्र के साथ कहाँ चली गयी। उसके महात्मा पिता वीरसेन तो राज्यलोभी वैरी युधाजित् के हाथ युद्ध में मारे ही गये ।' इस प्रकार चिन्तित रहकर सबमें समान बुद्धि रखने वाले वे सज्जन पुरुष बड़े कष्ट से समय व्यतीत करते थे। शत्रुजित् का शासन मानना उनके लिये अनिवार्य था। यों युधाजित् ने दौहित्र शत्रुजित् को विधिपूर्वक राजगद्दी पर बैठाकर मन्त्रियों को कार्यभार सौंप दिया और स्वयं उज्जयिनी नगरी को चला गया। वहाँ पहुँचने पर उसे समाचार मिला कि सुदर्शन मुनियों के आश्रम पर ठहरा है। फिर तो उसे मारने के लिये वह दुष्ट चित्रकूट के लिये चल पड़ा। उस समय शृंगवेरपुर में दुर्दर्श नामक एक निषाद राज्य करता था। वह बड़ा बली और शूरवीर था। युधाजित् उसे अपना अगुआ बनाकर शीघ्र ही चल दिया। 'युधाजित् सेना सहित आ रहा है'-यह सुनकर मनोरमा के मन में महान् क्लेश हुआ। छोटे-से कुमार की सँभाल करने वाली स्नेहमयी माता भय से घबरा उठी। आँखों से आँसू गिराती हुई अत्यन्त चिन्तित होकर उसने मुनिवर भरद्वाज से कहा - 'मुनिजी! अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ ? युधाजित् यहाँ भी पहुँच गया। इसने मेरे पिता को मारने के पश्चात् अपने दौहित्र शत्रुजित् को राजा बना दिया और अब मेरे इस नन्हें से पुत्र का वध करने के लिये सेनासहित यहाँ आ रहा है। क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

श्रीमद्देवीभागवत (तीसरा स्कन्ध) 
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अध्याय 16 (भाग 1)

॥श्रीभगवत्यै नमः ॥

राजकुमार सुदर्शन को मारने के लिये युधाजित् का भरद्वाजाश्रम पर जाना, मुनि से मनोरमा तथा सुदर्शन को बलपूर्वक छीन ले जाने की बात कहना तथा मुनि का रहस्यभरा उत्तर देना, ...
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व्यासजी कहते हैं-युद्ध समाप्त हो जाने पर महाबली युधाजित् लड़ाई के मैदान से लौटकर अयोध्या पहुँचा। जाते ही वध कर डालने की इच्छा से मनोरमा और सुदर्शन को खोजने लगा। 'वह कहाँ चली गयी'–यों बार-बार कहते हुए उसने बहुत-से सेवक इधर-उधर दौड़ाये। फिर एक अच्छा दिन देखकर अपने दौहित्र शत्रुजित् को राजगद्दी पर बैठाने की व्यवस्था की। अथर्ववेद के पावन मन्त्रों का उच्चारण करके जल से भरे हुए सम्पूर्ण कलशों से शत्रुजित् का अभिषेक हुआ। कुरुनन्दन! उस समय भेरी, शंख और तुरही आदि बाजों की ध्वनि से नगर में खूब उत्सव मनाया गया। ब्राह्मण वेद पढ़ते थे। वन्दीगण स्तुतिगान कर रहे थे और सर्वत्र जयध्वनि गूँज रही थी। ऐसा जान पड़ता था, मानो अयोध्यापुरी हँस रही है। उस नये नरेश की राजगद्दी होने पर हृष्ट पुष्ट मनुष्यों से भरी-पूरी तथा स्तुति और बाजों की ध्वनि से निनादित वह अयोध्या एक नवीन पुरी-सी जान पड़ती थी। कुछ सज्जन पुरुष ही अपने घरों में रहकर शोक मनाते थे। वे सोचते थे-'ओह! आज राजकुमार सुदर्शन कहाँ भटक रहा होगा। वह परम साध्वी रानी मनोरमा अपने पुत्र के साथ कहाँ चली गयी। उसके महात्मा पिता वीरसेन तो राज्यलोभी वैरी युधाजित् के हाथ युद्ध में मारे ही गये ।' इस प्रकार चिन्तित रहकर सबमें समान बुद्धि रखने वाले वे सज्जन पुरुष बड़े कष्ट से समय व्यतीत करते थे। शत्रुजित् का शासन मानना उनके लिये अनिवार्य था। यों युधाजित् ने दौहित्र शत्रुजित् को विधिपूर्वक राजगद्दी पर बैठाकर मन्त्रियों को कार्यभार सौंप दिया और स्वयं उज्जयिनी नगरी को चला गया। वहाँ पहुँचने पर उसे समाचार मिला कि सुदर्शन मुनियों के आश्रम पर ठहरा है। फिर तो उसे मारने के लिये वह दुष्ट चित्रकूट के लिये चल पड़ा। उस समय शृंगवेरपुर में दुर्दर्श नामक एक निषाद राज्य करता था। वह बड़ा बली और शूरवीर था। युधाजित् उसे अपना अगुआ बनाकर शीघ्र ही चल दिया।

'युधाजित् सेना सहित आ रहा है'-यह  सुनकर मनोरमा के मन में महान् क्लेश हुआ। छोटे-से कुमार की सँभाल करने वाली स्नेहमयी माता भय से घबरा उठी। आँखों से आँसू गिराती हुई अत्यन्त चिन्तित होकर उसने मुनिवर भरद्वाज से कहा - 'मुनिजी! अब मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ ? युधाजित् यहाँ भी पहुँच गया। इसने मेरे पिता को मारने के पश्चात् अपने दौहित्र शत्रुजित् को राजा बना दिया और अब मेरे इस नन्हें से पुत्र का वध करने के लिये सेनासहित यहाँ आ रहा है।

क्रमश...
शेष अगले अंक में
जय माता जी की
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KAPIL DEV Mar 1, 2021
जय माता जी की जय जय मां आदिशक्ति की जय

KAPIL DEV Mar 1, 2021
जय माता दी जी की जय जय मां आदिशक्ति की जय

. देवी माहात्म्य अध्याय - 01 इस अध्याय में:- (मेधा ऋषि का राजा सुरथ और समाधि को भगवती की महिमा बताते हुए मधु-कैटभ-वध का प्रसंग सुनाना) भगवान् विष्णु के सो जाने पर मधु और कैटभ को मारने के लिये कमलजन्मा ब्रह्माजी ने जिनका स्तवन किया था, उन महाकाली देवी का मैं सेवन करता हूँ। वे अपने दस हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि, मस्तक और शंख धारण करती हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वे समस्त अंगों में दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं। उनके शरीर की कान्ति नीलमणि के समान है तथा वे दस मुख और दस पैरों से युक्त हैं। मार्कण्डेयजी बोले- 'सूर्य के पुत्र सावर्णि जो आठवें मनु कहे जाते हैं, उनकी उत्पत्ति की कथा विस्तार पूर्वक कहता हूँ , सुनो। सूर्यकुमार महाभाग सावर्णि भगवती महामाया के अनुग्रह से जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुए, वही प्रसंग सुनाता हूँ। पूर्वकाल की बात है, स्वारोचिष मन्वन्तर में सुरथ नाम के एक राजा थे, जो चैत्रवंश में उत्पन्न हुए थे। उनका समस्त भूमण्डल पर अधिकार था। वे प्रजा का अपने औरस पुत्रों की भाँति धर्म पूर्वक पालन करते थे; तो भी उस समय कोलाविध्वंसी नामक कुल के क्षत्रिय उनके शत्रु हो गये। राजा सुरथ की दण्डनीति बड़ी प्रबल थी। उनका शत्रुओं के साथ संग्राम हुआ। यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्या में कम थे, तो भी राजा सुरथ युद्ध में उनसे परास्त हो गये। तब वे युद्धभूमि से अपने नगर को लौट आये और केवल अपने देश के राजा होकर रहने लगे। (समूची पृथ्वी से अब उनका अधिकार जाता रहा), किंतु वहाँ भी उन प्रबल शत्रुओं ने उस समय महाभाग राजा सुरथ पर आक्रमण कर दिया। राजा का बल क्षीण हो चला था; इसलिये उनके दुष्ट, बलवान् एवं दुरात्मा मन्त्रियों ने वहाँ उनकी राजधानी में भी राजकीय सेना और खजाने को हथिया लिया। सुरथ का प्रभुत्व नष्ट हो चुका था, इसलिये वे शिकार खेलने के बहाने घोड़े पर सवार हो वहाँ से अकेले ही एक घने जंगल में चले गये। वहाँ उन्होंने विप्रवर मेधा मुनि का आश्रम देखा, जहाँ कितने ही हिंसक जीव [अपनी स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़कर] परम शान्त भाव से रहते थे। मुनि के बहुत-से शिष्य उस वन की शोभा बढ़़ा रहे थे। वहाँ जाने पर मुनि ने उनका सत्कार किया और वे उन मुनिश्रेष्ठ के आश्रम पर इधर-उधर विचरते हुए कुछ काल तक रहे। फिर ममता से आकृष्टचित्त होकर वहाँ इस प्रकार चिन्ता करने लगे- 'पूर्वकाल में मेरे पूर्वजों ने जिसका पालन किया था, वही नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्म पूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मद की वर्षा करने वाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओं के अधीन होकर न जाने किन भोगों को भोगता होगा? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पाने से सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओं का अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगों के द्वारा सदा खर्च होते रहने के कारण अत्यन्त कष्ट से जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा।' ये तथा और भी कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधा के आश्रम के निकट एक वैश्य को देखा और उससे पूछा- 'भाई ! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आने का क्या कारण है ? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने से दिखायी देते हो?' राजा सुरथ का यह प्रेम पूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्य ने विनीत भाव से उन्हें प्रणाम करके कहा- वैश्य बोला- 'राजन्! मैं धनियों के कुल में उत्पन्न एक वैश्य हूँ। मेरा नाम समाधि है। मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रों ने धन के लोभ से मुझे घर से बाहर निकाल दिया है। मैं इस समय धन, स्त्री और पुत्रों से वंचित हूँ। मेरे विश्वसनीय बन्धुओं ने मेरा ही धन लेकर मुझे दूर कर दिया है, इसलिये दु:खी होकर मैं वन में चला आया हूँ। यहाँ रहकर मैं इस बात को नहीं जानता कि मेरे पुत्रों की, स्त्री की और स्वजनों की कुशल है या नहीं। इस समय घर में वे कुशल से रहते हैं अथवा उन्हें कोई कष्ट है ? वे मेरे पुत्र कैसे हैं? क्या वे सदाचारी हैं अथवा दुराचारी हो गये हैं ?' राजा ने पूछा- 'जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदि ने धन के कारण तुम्हें घर से निकाल दिया, उनके प्रति तुम्हारे चित्त में इतना स्नेह का बन्धन क्यों है ?' वैश्य बोला- 'आप मेरे विषय में जैसी बात कहते हैं, वह सब ठीक है। किंतु क्या करूँ, मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता। जिन्होंने धन के लोभ में पड़कर पिता के प्रति स्नेह, पति के प्रति प्रेम तथा आत्मीयजन के प्रति अनुराग को तिलांजलि दे मुझे घर से निकाल दिया है, उन्हीं के प्रति मेरे हृदय में इतना स्नेह है। महामते! गुणहीन बन्धुओं के प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार प्रेममग्न हो रहा है, यह क्या है- इस बात को मैं जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी साँसे ले रहा हूँ और मेरा हृदय अत्यन्त दुःखित हो रहा है। उन लोगों में प्रेम का सर्वथा अभाव है; तो भी उनके प्रति जो मेरा मन निष्ठुर नहीं हो पाता, इसके लिये क्या करूँ ?' मार्कण्डेयजी कहते हैं- 'ब्रह्मन् ! तदनन्तर राजाओं में श्रेष्ठ सुरथ और वह समाधि नामक वैश्य दोनों साथ-साथ मेधा मुनि की सेवा में उपस्थित हुए और उनके साथ यथायोग्य न्यायानुकूल विनयपूर्ण बर्ताव करके बैठे। तत्पश्चात् वैश्य और राजा ने कुछ वार्तालाप आरम्भ किया। राजा ने कहा- 'भगवन् ! मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, उसे बताइये। मेरा चित्त अपने अधीन न होने के कारण वह बात मेरे मन को बहुत दु:ख देती है। जो राज्य मेरे हाथ से चला गया है, उसमें और उसके सम्पूर्ण अंगों में मेरी ममता बनी हुई है। मुनिश्रेष्ठ! यह जानते हुए भी कि वह अब मेरा नहीं है, अज्ञानी की भाँति मुझे उसके लिये दु:ख होता है। यह क्या है ? इधर यह वैश्य भी घर से अपमानित होकर आया है। इसके पुत्र, स्त्री और भृत्यों ने इसे छोड़ दिया है। स्वजनों ने भी इसका परित्याग कर दिया है, तो भी यह उनके प्रति अत्यन्त हार्दिक स्नेह रखता है। इस प्रकार यह तथा मैं, दोनों ही बहुत दु:खी हैं। जिसमें प्रत्यक्ष दोष देखा गया है, उस विषय के लिये भी हमारे मन में ममता जनित आकर्षण पैदा हो रहा है। महाभाग ! हम दोनों समझदार हैं; तो भी हमें जो मोह पैदा हुआ है, यह क्या है ? विवेक शून्य पुरुष की भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता प्रत्यक्ष दिखायी देती है। ऋषि बोले- 'महाभाग ! विषय मार्ग का ज्ञान सब जीवों को है। इसी प्रकार विषय भी सबके लिये अलग अलग हैं, कुछ प्राणी दिन में नहीं देखते और दूसरे रात में ही नहीं देखते। तथा कुछ जीव ऐसे हैं, जो दिन और रात्रि में भी बराबर ही देखते हैं। यह ठीक है कि मनुष्य समझदार होते हैं; किंतु केवल वे ही ऐसे नहीं होते। पशु, पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी समझदार होते हैं। मनुष्यों की समझ भी वैसी ही होती है, जैसी उन मृग और पक्षियों की होती है। तथा जैसी मनुष्यों की होती है,वैसी ही उन मृग-पक्षी आदि की होती है। यह तथा अन्य बातें भी प्रायः दोनों में समान ही हैं। समझ होने पर भी इन पक्षियों को तो देखो, ये स्वयं भूख से पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चों की चोंच में कितने चाव से अन्न के दाने डाल रहे हैं! नरश्रेष्ठ! क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकार का बदला पाने के लिये पुत्रों की अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उन सबमें समझ की कमी नहीं है, तथापि वे संसार की स्थिति (जन्म-मरण की परम्परा) बनाये रखने वाले भगवती महामाया के प्रभाव द्वारा ममतामय भँवर से युक्त मोह के गहरे गर्त में गिराये गये हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान् विष्णु की योगनिद्रारूपा जो भगवती महामाया हैं, उन्हीं से यह जगत् मोहित हो रहा है। वे भगवती महामायादेवी ज्ञानियों के भी चित्त को बल पूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं। वे ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत् की सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिये वरदान देती हैं। वे ही परा विद्या संसार-बन्धन और मोक्ष की हेतुभूता सनातनीदेवी तथा सम्पूर्ण ईश्वरों की भी अधीश्वरी हैं। राजा ने पूछा- 'भगवन् ! जिन्हें आप महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं ? ब्रह्मन्! उनका आविर्भाव कैसे हुआ ? तथा उनके चरित्र कौन-कौन हैं ? ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे ! उन देवी का जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो और जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो, वह सब मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूँ। ऋषि बोले- 'राजन्! वास्तव में तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत् उन्हीं का रूप है तथा उन्होंने समस्त विश्व को व्याप्त कर रखा है, तथापि उनका प्राकट्य अनेक प्रकार से होता है। वह मुझसे सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि जब देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये प्रकट होती हैं, उस समय लोक में उत्पन्न हुई कहलाती हैं। कल्प के अन्त में जब सम्पूर्ण जगत् एकार्णव में निमग्न हो रहा था और सबके प्रभु भगवान् विष्णु शेषनाग की शय्या बिछाकर योगनिद्रा का आश्रय ले सो रहे थे , उस समय उनके कानों के मैल से दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभ के नाम से विख्यात थे। वे दोनों ब्रह्माजी का वध करने को तैयार हो गये। भगवान् विष्णु के नाभिकमल में विराजमान प्रजापति ब्रह्माजी ने जब उन दोनों भयानक असुरों को अपने पास आया और भगवान् को सोया हुआ देखा, तब एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान् विष्णु को जगाने के लिये उनके नेत्रों में निवास करने वाली योगनिद्रा का स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्व की अधीश्वरी, जगत् को धारण करने वाली, संसार का पालन और संहार करने वाली तथा तेज:स्वरूप भगवान् विष्णु की अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवी की भगवान् ब्रह्मा स्तुति करने लगे। ब्रह्माजी ने कहा- 'देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणव में अकार, उकार, मकार- इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओं के अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है, जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि ! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि ! तुम्हीं इस विश्व-ब्रह्माण्ड को धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत् की सृष्टि होती है। तुम्हीं से इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्प के अन्तर में सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत् की उत्पत्ति के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन काल में स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्त के समय संहाररूप धारण करने वाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महासमृति, महामोहरूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शंख और धनुष धारण करने वाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ-ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो- इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर-सबसे परे रहने वाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्-असत् रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्था में तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है ? जो इस जगत् की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान् को भी जब तुमने निद्रा के अधीन कर दिया है, तब तुम्हारी स्तुति करने में यहाँ कौन समर्थ हो सकता है? मुझको, भगवान् शंकर को तथा भगवान् विष्णु को भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अत: तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है ? देवि ! तुम तो अपने इन उदार प्रभावों से ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोह में डाल दो और जगदीश्वर भगवान् विष्णु को शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान् असुरों को मार डालने की बुद्धि उत्पन्न कर दो। ऋषि कहते हैं- 'राजन्! जब ब्रह्माजी ने वहाँ मधु और कैटभ को मारने के उद्देश्य से भगवान् विष्णु को जगाने के लिये तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी योगनिद्रा की इस प्रकार स्तुति की, तब वे भगवान् के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्ष:स्थल से निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी की दृष्टि के समक्ष खड़ी हो गयीं। योगनिद्रा से मुक्त होने पर जगत् के स्वामी भगवान् जनार्दन उस एकार्णव के जल में शेषनाग की शय्या से जाग उठे। फिर उन्होंने उन दोनों असुरों को देखा। वे दुरात्मा मधु और कैटभ अत्यन्त बलवान् तथा पराक्रमी थे और क्रोध से लाल आँखें किये ब्रह्माजी को खा जाने के लिये उद्योग कर रहे थे।तब भगवान् श्रीहरि ने उठकर उन दोनों के साथ पाँच हजार वर्षों तक केवल बाहुयुद्ध किया। वे दोनों भी अत्यन्त बल के कारण उन्मत्त हो रहे थे। इधर महामाया ने भी उन्हें मोह में डाल रखा था; इसलिये वे भगवान् विष्णु से कहने लगे- 'हम तुम्हारी वीरता से संतुष्ट हैं। तुम हम लोगों से कोई वर माँगो।' श्रीभगवान् बोले- 'यदि तुम दोनों मुझ पर प्रसन्न हो तो अब मेरे हाथ से मारे जाओ। बस, इतना-सा ही मैंने वर माँगा है। यहाँ दूसरे किसी वर से क्या लेना है।' ऋषि कहते हैं- 'इस प्रकार धोखे में आ जाने पर जब उन्होंने सम्पूर्ण जगत् में जल-ही-जल देखा, तब कमलनयन भगवान् से कहा- 'जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो, जहाँ सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो।' ऋषि कहते हैं- 'तब 'तथास्तु' कहकर शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान् ने उन दोनों के मस्तक अपनी जाँघ पर रखकर चक्र से काट डाले। इस प्रकार ये देवी महामाया ब्रह्माजी की स्तुति करने पर स्वयं प्रकट हुई थीं। अब पुनः तुमसे उनके प्रभाव का वर्णन करता हूँ, सुनो। इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य में 'मधु-कैटभ-वध' नामक पहला अध्याय पूरा हुआ॥१॥ ----------:::×:::---------- "ॐ श्री दुर्गायै नमः" *****************************************

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राजा दिलीप की कथा 〰️〰️🔸〰️🔸〰️〰️ रघुवंश का आरम्भ राजा दिलीप से होता है । जिसका बड़ा ही सुन्दर और विशद वर्णन महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य रघुवंशम में किया है । कालिदास ने राजा दिलीप, रघु, अज, दशरथ, राम, लव, कुश, अतिथि और बाद के बीस रघुवंशी राजाओं की कथाओं का समायोजन अपने काव्य में किया है। राजा दिलीप की कथा भी उन्हीं में से एक है। राजा दिलीप बड़े ही धर्मपरायण, गुणवान, बुद्धिमान और धनवान थे । यदि कोई कमी थी तो वह यह थी कि उनके कोई संतान नहीं थी । सभी उपाय करने के बाद भी जब कोई सफलता नहीं मिली तो राजा दिलीप अपनी पत्नी सुदक्षिणा को लेकर महर्षि वशिष्ठ के आश्रम संतान प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचे । महर्षि वशिष्ठ ने राजा का आथित्य सत्कार किया और आने का प्रयोजन पूछा तो राजा ने अपने निसंतान होने की बात बताई । तब महर्षि वशिष्ठ बोले – “ हे राजन ! तुमसे एक अपराध हुआ है, इसलिए तुम्हारी अभी तक कोई संतान नहीं हुई है ।” तब राजा दिलीप ने आश्चर्य से पूछा – “ गुरुदेव ! मुझसे ऐसा कोनसा अपराध हुआ है कि मैं अब तक निसंतान हूँ। कृपा करके मुझे बताइए ?” महर्षि वशिष्ठ बोले – “ राजन ! एक बार की बात है, जब तुम देवताओं की एक युद्ध में सहायता करके लौट रहे थे । तब रास्ते में एक विशाल वटवृक्ष के नीचे देवताओं को भोग और मोक्ष देने वाली कामधेनु विश्राम कर रही थी और उनकी सहचरी गौ मातायें निकट ही चर रही थी। तुम्हारा अपराध यह है कि तुमने शीघ्रतावश अपना विमान रोककर उन्हें प्रणाम नहीं किया । जबकि राजन ! यदि रास्ते में कहीं भी गौवंश दिखे तो दायीं ओर होकर राह देते हुयें उन्हें प्रणाम करना चाहिए । यह बात तुम्हे गुरुजनों द्वारा पूर्वकाल में ही बताई जा चुकी थी । लेकिन फिर भी तुमने गौवंश का अपमान और गुरु आज्ञा का उलंघन किया है । इसीलिए राजन ! तुम्हारे घर में अभी तक कोई संतान नहीं हुई ।” महर्षि वशिष्ठ की बात सुनकर राजा दिलीप बड़े दुखी हुए। आँखों में अश्रु लेकर और विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर राजा दिलीप गुरु वशिष्ठ से प्रार्थना करने लगे – “ गुरुदेव ! मैं मानता हूँ कि मुझसे अपराध हुआ है किन्तु अब इसका कोई तो उपाय होगा ?” तब महर्षि वशिष्ठ बोले – “ एक उपाय है राजन ! ये है मेरी गाय नंदिनी है जो कामधेनु की ही पुत्री है। इसे ले जाओ और इसके संतुष्ट होने तक दोनों पति – पत्नी इसकी सेवा करो और इसी के दुग्ध का सेवन करो । जब यह संतुष्ट होगी तो तुम्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी ।” ऐसा आशीर्वाद देकर महर्षि वशिष्ठ ने राजा दिलीप को विदा किया। अब राजा दिलीप प्राण – प्रण से नंदिनी की सेवा में लग गये । जब नंदिनी चलती तो वह भी उसी के साथ – साथ चलते, जब वह रुक जाती तो वह भी रुक जाते । दिनभर उसे चराकर संध्या को उसके दुग्ध का सेवन करके उसी पर निर्वाह करते थे। एक दिन संयोग से एक सिंह ने नंदिनी पर आक्रमण कर दिया और उसे दबोच लिया । उस समय राजा दिलीप कोई अस्त्र – शस्त्र चलाने में भी असमर्थ हो गया । कोई उपाय न देख राजा दिलीप सिंह से प्रार्थना करने लगे – “ हे वनराज ! कृपा करके नंदिनी को छोड़ दीजिये, यह मेरे गुरु वशिष्ठ की सबसे प्रिय गाय है । मैं आपके भोजन की अन्य व्यवस्था कर दूंगा ।” तो सिंह बोला – “नहीं राजन ! यह गाय मेरा भोजन है अतः मैं उसे नहीं छोडूंगा । इसके बदले तुम अपने गुरु को सहस्त्रो गायें दे सकते हो ।” बिलकुल निर्बल होते हुए राजा दिलीप बोले – “ हे वनराज ! आप इसके बदले मुझे खा लो, लेकिन मेरे गुरु की गाय नंदिनी को छोड़ दो ।” तब सिंह बोला – “यदि तुम्हें प्राणों का मोह नहीं है तो इसके बदले स्वयं को प्रस्तुत करो । मैं इसे अभी छोड़ दूंगा ।” कोई उपाय न देख राजा दिलीप ने सिंह का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और स्वयं सिंह का आहार बनने के लिए तैयार हो गया । सिंह ने नंदिनी गाय को छोड़ दिया और राजा को खाने के लिए उसकी ओर झपटा । लेकिन तत्क्षण हवा में गायब हो गया। तब नंदिनी गाय बोली – “ उठो राजन ! यह मायाजाल, मैंने ही आपकी परीक्षा लेने के लिए रचा था । जाओ राजन ! तुम दोनों दम्पति ने मेरे दुग्ध पर निर्वाह किया है अतः तुम्हें एक गुणवान, बलवान और बुद्धिमान पुत्र की प्राप्ति होगी ।” इतना कहकर नंदिनी अंतर्ध्यान हो गई। उसके कुछ दिन बाद नंदिनी के आशीर्वाद से महारानी सुदक्षिणा ने एक पुत्र को जन्म दिया जो रघु के नाम से विख्यात हुआ और उसके पराक्रम के कारण ही इस वंश को रघुवंश के नाम से जाना जाता है । महाकवि कालिदास ने भी इसी रघु के नाम पर अपने महाकाव्य का नाम “रघुवंशम” रखा । 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (तीसरा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 27 (भाग 2) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ व्यासजी द्वारा नवरात्र व्रत-विधि का वर्णन तथा पूजा में निषिद्ध कन्याओं का विवेचन, सुशील वैश्य को देवी की प्रसन्नता-प्राप्ति... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ प्राचीन समय की बात है-एक निर्धन वैश्य था। वह महान् दुःखी था। राजन्! कोसलदेश के किसी सज्जन ने उसका विवाह भी कर दिया था। उसके बहुत-से बाल-बच्चे हो गये थे, पर उनकी क्षुधा कभी शान्त नहीं होती थी। उसके लड़के सायंकाल में किसी प्रकार कुछ भोजन पाते थे। वैश्य भी कुछ खा लेता था। भूखे रहते हुए वह सर्वदा दूसरे के कार्य में तत्पर रहता था। यों बड़ी कठिनाई से कुटुम्ब का भरण- पोषण चलता था। उस वैश्य के मन में अपार चिन्ता रहती थी, परंतु वह सदा धर्म में तत्पर रहता था। उसकी इन्द्रियाँ शान्त थीं। वह बड़ा सदाचारी था। कभी झूठ नहीं बोलता था। उसके मन में क्रोध नहीं आने पाता था। वह सदा धैर्य से काम लेता। मन में अहंकार और डाह नहीं आने देता था। देवताओं, पितरों और अतिथियों की पूजा करने के पश्चात् अपने आश्रितजनों को खिलाकर तब स्वयं कुछ भोजन करता था। यह उस वैश्य के प्रतिदिन का नियम था। यों उसका समय व्यतीत हो रहा था। उत्तम गुणों के कारण उसका नाम भी 'सुशील' रख दिया गया था। दरिद्रता से अत्यन्त घबराकर उस भूखे वैश्य ने एक शान्तस्वभाव मुनि से पूछा। सुशील ने कहा-ब्राह्मणदेवता! तुम्हारी बुद्धि बड़ी विलक्षण है। आज मुझपर कृपा करके यह बताओ कि मेरी दरिद्रता निश्चयपूर्वक कैसे दूर हो सकती है। मानद! मुझे धन की इच्छा नहीं है; मैं खूब सम्पन्न हो जाऊँ-यह नहीं चाहता। द्विजवर! तुमसे पूछने का मेरा इतना ही अभिप्राय है कि कुटुम्ब का भरण-पोषण करने की शक्ति मुझमें आ जाय। मेरी छोटी बच्ची और बच्चे भोजन पाने के लिये सदा रोते रहते हैं। घर में इतना भी अन्न नहीं है कि मैं उन्हें एक-एक मुट्ठी भी दे सकूँ । रोते हुए मेरे बालक घर से निकल गये। मैंने उन्हें त्याग दिया है। अतः अब मेरे हृदय में आग-सी लग गयी है। परंतु धन के अभाव में मैं कर ही क्या सकता हूँ। मेरी लड़की विवाह के योग्य हो गयी है। मेरे पास धन है नहीं, मैं क्या करूँ? द्विजवर! इसी से मेरा मन चिन्ता के समुद्र में गोते खा रहा है। दयानिधे! तुमसे कोई बात छिपी नहीं है। विप्र! अब तुम तप, दान, व्रत, मन्त्र एवं जप-कोई भी ऐसा उपाय बताओ, जिससे मैं अपने आश्रितजनों का भरण-पोषण सुचारुरूप से कर सकूँ । बस, मुझे इतना ही धन चाहिये। अधिक धन के लिये मैं प्रार्थना नहीं करता। महाभाग! तुम्हारी कृपा से अब मेरा परिवार सुखी हो जाय-एतदर्थ सोच समझकर कोई उपाय बतलाओ। व्यासजी कहते हैं-राजेन्द्र! इस प्रकार सुशील वैश्य के पूछने पर उत्तम व्रत का पालन करने वाले उस ब्राह्मण को बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने वैश्य से कहा-'वैश्यवर! तुम अब श्रेष्ठ नवरात्र-व्रत करो। इसमें भगवती जगदम्बा की पूजा, हवन और ब्राह्मण-भोजन कराना होगा। वेद का पारायण, भगवती के मन्त्र का जप और होमादि सभी कार्य होते हैं। किंतु इस समय तुम अपनी शक्ति के अनुसार करो, तुम्हारा कार्य अवश्य सिद्ध होगा। वैश्य! जगत् में इससे बढ़कर दूसरा कोई व्रत नहीं है। इस परम पावन सुखदायी व्रत को नवरात्र-व्रत कहते हैं। इस व्रत के सर्वदा पालन करने से ज्ञान और मोक्षतक सुलभ हो जाते हैं, सुख और संतान की वृद्धि होती है तथा शत्रु के पैर नहीं टिक सकते। भगवान् राम राज्य से च्युत हो गये थे। उन्हें सीता का वियोग हो गया था उस समय किष्किन्धा में उन्होंने यह व्रत किया था। उस अवसरपर सीता के विरह से भगवान् राम अत्यन्त संतप्त हो उठे थे उन्होंने नवरात्र व्रत करके भगवती जगदम्बा की विधिवत् उपासना की। तब उन्हें जनकनन्दिनी सीता प्राप्त हुई। उन्होंने विशाल समुद्र पर पुल बाँधा। महाबली रावण और कुम्भकर्ण मारे गये। रावणकुमार मेघनाद की जीवनलीला समाप्त हुई। विभीषण को उन्होंने लंका का राजा बनाया, इसके पश्चात् अयोध्या में आकर निष्कण्टक राज्य भोगा। वैश्यवर! अमित तेजस्वी भगवान् श्रीराम को धरातल पर इस प्रकार की सुख-सुविधा इस नवरात्र के प्रभाव से ही सुलभ हुई थी। व्यासजी कहते हैं-राजन्! ब्राह्मण की यह बात सुनकर उस वैश्य ने उसे अपना गुरु बना लिया। साथ ही मायाबीज नामक भुवनेश्वरी मन्त्र को कैसे दीक्षा ले ली। फिर नवरात्र व्रत करके संयमपूर्वक उत्तम भक्ति के साथ उसने जप आरम्भ कर दिया। अनेकों प्रकार के सामान यथाशक्ति एकत्रित करके उनसे उसने भवानी की आदरपूर्वक पूजा की। नौ वर्षों के प्रत्येक नवरात्र में भगवती के मायाबीज-मन्त्र का वह जप करता रहा। नवें वर्ष के नवरात्र में अन्तिम अष्टमी के दिन आधी रात के समय भगवती प्रकट हुईं और उन्होने उस वैश्य को अपने दर्शन दिये। साथ ही विविध प्रकार के वर देकर उसे कृतकृत्य कर दिया। क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चमः स्कन्धः अथ दशमोऽध्यायः जडभरत और राजा रहूगण की भेंट...(भाग 3) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ नाहं विशङ्के सुरराजवज्रा त्र त्र्यक्षशूलान्न यमस्य दण्डात् । नाग्न्यर्कसोमानिलवित्तपास्त्रा- छङ्के भृशं ब्रह्मकुलावमानात् ॥ १७ तद् ब्रह्मङ्गो जडवन्निगूढ- विज्ञानवीय्यो विचरस्यपारः वचांसि योगग्रथितानि साधो । न नः क्षमन्ते मनसापि भेत्तुम् ॥ १८ अहं च योगेश्वरमात्मतत्त्व- विदां मुनीनां परमं गुरुं वै । प्रष्टुं प्रवृत्तः किमिहारणं तत् साक्षाद्धरिं ज्ञानकलावतीर्णम् ॥ १९ स वै भवाँल्लोकनिरीक्षणार्थ- मव्यक्तलिङ्गो विचरत्यपिस्वित् । योगेश्वराणां गतिमन्धबुद्धिः कथं विचक्षीत गृहानुबन्धः ॥ २० दृष्टः श्रमः कर्मत आत्मनो वै भर्तुर्गन्तुर्भवतश्चानुमन्ये यथासतोदानयनाद्यभावात् समूल इष्टो व्यवहारमार्गः ॥ २१ स्थाल्यग्नितापात्पयसोऽभिताप- स्तत्तापतस्तण्डुलगर्भरन्धिः देहेन्द्रियास्वाशयसन्निकर्षात् तत्संसृतिः पुरुषस्यानुरोधात् ॥ २२ शास्ताभिगोप्ता नृपतिः प्रजानां यः किङ्करो वै न पिनष्टि पिष्टम् । स्वधर्ममाराधनमच्युतस्य यदीहमानो विजहात्यघौघम् ॥ २३ तन्मे भवान्नरदेवाभिमान मदेन तुच्छीकृतसत्तमस्य । कृषीष्ट मैत्रीदृशमार्तब्धो यथा तरे सदवध्यानमंहः ॥ २४ न विक्रिया विश्वसुहत्सखस्य साम्येन वीताभिमतेस्तवापि । महद्विमानात् स्वकृता्धि मादृङ् नङ्क्ष्यत्यदूरादपि शूलपाणिः ॥ २५ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ मुझे इन्द्र के वज्र का कोई डर नहीं है, न मैं महादेवजी के त्रिशूल से डरता हूँ और न यमराज के दण्ड से। मुझे अग्नि, सूर्य, चन्द्र, वायु और कुबेर के अस्त्र-शस्त्रों का भी कोई भय नहीं है; परन्तु मैं ब्राह्मणकुल के अपमान से बहुत ही डरता हूँ॥ १७ ॥ अतः कृपया बतलाइये, इस प्रकार अपने विज्ञान और शक्ति को छिपाकर मूर्खों की भाँति विचरने वाले आप कौन हैं ? विषयों से तो आप सर्वथा अनासक्त जान पड़ते हैं । मुझे आपकी कोई थाह नहीं मिल रही है। साधो ! आपके योगयुक्त वाक्यों की बुद्धिद्वारा आलोचना करने पर भी मेरा सन्देह दूर नहीं होता ॥ १८ ॥ मैं आत्मज्ञानी मुनियों के परम गुरु और साक्षात् श्रीहरि की ज्ञानशक्ति के अवतार योगेश्वर भगवान् कपिल से यह पूछने के लिये जा रहा था कि इस लोक में एकमात्र शरण लेने योग्य कौन है।। १९ ॥ क्या आप वे कपिलमुनि ही हैं, जो लोकों की दशा देखने के लिये इस प्रकार अपना रूप छिपाकर विचर रहे है ? भला, घर में आसक्त रहने वाला विवेकहीन पुरुष योगेश्वरों की गति कैसे जान सकता है? ॥२०॥ मैंने युद्धादि कों में अपने को श्रम होते देखा है, इसलिये मेरा अनुमान है कि बोझा ढोने और मार्ग में चलने से आपको भी अवश्य ही होता होगा। मुझे तो व्यवहार-मार्ग भी सत्य ही जान पड़ता है; क्योंकि मिथ्या घड़े से जल लाना आदि कार्य नहीं होता ॥ २१॥ (देहादि के धर्मों का आत्मा पर कोई प्रभाव ही नहीं होता, ऐसी बात भी नहीं है) चूल्हे पर रखी हुई बटलोई जब अग्नि से तपने लगती है, तब उसका जल भी खौलने लगता है और फिर उस जलसे चावल का भीतरी भाग भी पक जाता है। इसी प्रकार अपनी उपाधि के धर्मो का अनुवर्तन कर नेके कारण देह, इन्द्रिय, प्राण और मन की सन्निधि से आत्मा को भी उनके धर्म श्रमादि का अनुभव होता ही है ।। २२ ॥ आपने जो दण्डादि की व्यर्थता बतायी, सो राजा तो प्रजा का शासन और पालन करने के लिये नियुक्त किया हुआ उसका दास ही है। उसका उन्मत्तादि को दण्ड देना पिसे हुएको पीसने के समान व्यर्थ नहीं हो सकता; क्योंकि अपने धर्म का आचरण करना भगवान् की सेवा ही है, उसे करने वाला व्यक्ति अपनी सम्पूर्ण पापराशि को नष्ट कर देता है। २३ ॥ दीनबन्धो ! राजे वके अभिमान से उन्मत्त होकर मैंने आप-जैसे परम साधु की अवज्ञा की है। अब आप ऐसी कृपादृष्टि कीजिये, जिससे इस साधु-अवज्ञारूप अपराध से में मुक्त हो जाऊँ ॥ २४ ।। आप देहाभिमान शून्य और विश्वस श्रीहरि के अनन्य भक्त हैं, इसलिये सब में समान दृष्टि होने से इस मानापमान के कारण आपमें कोई विकार नहीं हो सकता तथापि एक महापुरुष का अपमान करने के कारण मेरे जैसा पुरुष साक्षात् त्रिशूलपाणि महादेवजी के समान प्रभावशाली होने पर भी, अपने अपराध से अवश्य थोड़े ही काल में नष्ट हो जायगा' ॥ २५ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (इक्यावनवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय कुमारषष्ठी व्रत की कथा... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण बोले-भरतसत्तम महाराज युधिष्ठिर! मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि समस्त पापनाशिनी, धन-धान्य तथा शान्ति प्रदायिनी एवं अतिकल्याणकारिणी है। उसी दिन कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया था, इसलिये यह षष्ठी तिथि स्वामिकार्तिकेय को बहुत प्रिय है। इस दिन किया हुआ स्नान-दान आदि कर्म अक्षय होता है। दक्षिण देश में स्थित कार्तिकेय का जो इस तिथिमें दर्शन करता है, वह नि:संदेह ब्रह्महत्यादि पापों से मुक्त हो जाता है, इसलिये इस तिथि में कुमारस्वामी की सोने, चाँदी अथवा मिट्टी की मूर्ति बनवाकर पूजा करनी चाहिये। अपराह्न में स्नान तथा आचमन कर, पद्मासन लगाकर बैठ जाय और स्वामी कुमार का एकाग्रचित्त से ध्यान करे इस दिन उपवासपूर्वक निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए इनके मस्तक पर कलश से अभिषेक करे चन्द्रमण्डलभूतानां भवभूतिपवित्रिता। गङ्गाकुमार धारेयं पतिता तव मस्तके॥ (उत्तरपर्व ४२ । ७) इस प्रकार अभिषेक कर भगवान् सूर्य का पूजन करे, तदनन्तर गन्ध, पुष्प, धूप, नैवेद्य आदि उपचारों द्वारा कृत्तिका पुत्र कार्तिकेय की निम्न मन्त्र से पूजा करे देव सेनापते स्कन्द कार्तिकेय भवोद्भव। कुमार गुह गाङ्गेय शक्तिहस्त नमोऽस्तु ते॥ (उत्तरपर्व ४२ । ९) दक्षिण-देशोत्पन्न अन्न, फल और मलय चन्दन भी चढ़ाये। इसके बाद स्वामिकार्तिकेय के परमप्रिय छाग, कुक्कुट, कलापयुक्त मयूर तथा उनकी माता भगवती पार्वती-इनका प्रत्यक्ष पूजन करे अथवा इनकी सुवर्ण की प्रतिमा बनाकर पूजन करे। पूजन के अनन्तर पूर्वोक्त देवसेनापति तथा स्कन्द आदि नाम-मन्त्रों से आज्ययुक्त तिलों से हवन करे, अनन्तर फल भक्षण कर भूमिपर कुशा की शय्या पर शयन करे। क्रमश: बारह महीनों में नारियल, मातुलुंग (बिजौरा नींबू), नारंगी, पनस (कटहल), जम्बीर (एक प्रकार का नींबू), दाड़िम, द्राक्षा, आम्र, बिल्व, आमलक, ककड़ी तथा केला-इन फलों का भक्षण करे। ये फल उपलब्ध न हों तो उस काल में उपलब्ध फलों का सेवन करे। प्रात:काल सोने के बने छाग अथवा कुक्कुट का 'सेनानी प्रीयताम्' ऐसा कहकर ब्राह्मण को दे। बारह महीनों में क्रम से सेनानी, सम्भूत, क्रौञ्चारि, षण्मुख, गुह, गाङ्गेय, कार्तिकेय, स्वामी, बालग्रहाग्रणी, छागप्रिय, शक्तिधर तथा द्वार-इन नामों से कार्तिकेय का पूजन करे और नामों के अन्त में 'प्रीयताम्' यह पद योजित करे। यथा-'सेनानी प्रीयताम्' इत्यादि। इसके पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं भी मौन होकर भोजन करे वर्ष समाप्त होने पर कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को वस्त्र, आभूषण आदि से कार्तिकेय का पूजन एवं हवन करे और सब सामग्री ब्राह्मण को निवेदित कर दे। इस विधिसे जो पुरुष अथवा स्त्री इस व्रत को करते हैं, वे उत्तम फलों को प्राप्त कर इन्द्रलोक में निवास करते हैं, अत: राजन्! शंकरात्मज कार्तिकेय का सदा प्रयत्न पूर्वक पूजन करना चाहिये। राजाओं के लिये तो कार्तिकेय की पूजा का विशेष महत्त्व है। जो राजा स्वामी कुमार का इस प्रकार पूजन कर युद्ध के लिये जाता है, वह अवश्य ही विजय प्राप्त करता है। विधिपूर्वक पूजा करने पर भगवान् कार्तिकेय पूर्ण प्रसन्न हो जाते हैं। जो षष्ठी को नक्तव्रत करता है, वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर कार्तिकेय के लोक में निवास करता है। दक्षिण दिशा में जाकर जो भक्तिपूर्वक कार्तिकेय का दर्शन और पूजन करता है वह शिवलोक को प्राप्त करता है। जो सदा शरवणोद्भव आदिदेव कार्तिकेय की आराधना करता है, वह बहुत कालतक स्वर्ग का सुख भोगकर पृथ्वी पर जन्म ग्रहण करता तथा चक्रवर्ती सेनापति होता है। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (ग्यारहवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः अविद्या के कार्य संसाररूप विष-लता, विद्या एवं अविद्या के स्वरूप तथा उन दोनों से रहित परमार्थ-वस्तु का वर्णन...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीराम ! यहाँ दृश्यरूप जगत के सम्बन्ध से और कल्पनाओं से रहित, परम शान्त, सबका रामस्वरूप केवल एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही है । जिस प्रकार जल से तरङ्गे प्रकट होती हैं, वैसे ही उस परमात्मा के संकल्प से कलारूप प्रकृति प्रकट होती है । यह प्रकृति सत्त्व, रज, तम-त्रिंगुगमयी है । सत्त्व आदि तीन गुणस्वरूप धर्मो से युक्त प्रकृति ही अविद्या ( माया ) है । यही प्राणियों का संसार है । इस प्रकृति से पार हो जाना ही परमपद की प्राप्ति है । जो कुछ भी यह दृश्य-प्रपञ्च दिखायी पड़ता है, वह सब इसी अविद्या का कार्य होने से उसी के आश्रित है । श्रीराम ! ऋषि, मुनि, सिद्ध, दिव्य नाग, विद्याधर, देवता- इनको प्रकृति के सात्त्विक, अंशस्वरूप जानो । प्रकृति का जो शुद्ध सत्त्व-अंश है, वह विद्या है; उस बिद्या से अविद्या उसी प्रकार उत्पन्न होती है, जिस प्रकार जल से बुबुद उत्पन्न होते हैं । और जिस प्रकार बुद्बुद जल में लीन हो जाते हैं, उसी प्रकार उस विद्या में ही यह अविद्या विलीन भी हो जाती है । जैसे जल और तरङ्ग की द्वित्वभावना से ही भिन्नता है, वैसे ही विद्या और अतिदा-दृष्टियों की भेदभावना से ही भिन्नता है, वस्तुतः नहीं। जिस प्रकार परमार्थतः जल और तरङ्ग की एक रूपता ही है उसी प्रकार विद्या और अविद्या भी एक- रूप ही हैं, पृथक नहीं । वास्तव में एक परमात्मा से भिन्न विद्या और अविद्या नाम की कोई वस्तु ही नहीं है; अत: विद्या और अविद्या-दृष्टि का परित्याग करने पर यहाँ जो कुछ अवशिष्ट रहता है, वह परब्रह्म परमात्मा ही वास्तव में विद्यमान है, दूसरा नहीं; क्योंकि न अविद्या नाम का पदार्थ है और न विद्या नाम का ही पदार्थ है,इसलिये यह कल्पना व्यर्थ है। वास्त वमें परमात्मा को छोड़कर बचे रहने वाला कुछ भी नहीं है; यदि कुछ है तो वह एकमात्र चिन्मय परमात्मा ही है। जब परमात्मा के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नहीं रहता, तब वह अज्ञान ही अविद्या कहलाता है और जब यथार्थ ज्ञान हो जाता है, तब वह ज्ञान ही अविद्याक्षय इस नाम से कहा जाता है। आतप और छाया की तरह परस्पर-विरुद्ध विद्या और अविद्या दोनों में से विद्या का अभाव होने पर अविद्या नामक मिथ्या कल्पना प्रकट होती है, जैसे सूर्य के अस्त हो जा नेपर छाया-ही-छाया रह जाती है । श्रीराम ! अविद्या का विनाश हो जाने पर विद्या और अविद्या दोनों ही कल्पनाओं का विनाश हो जाता है । इन दोनों का अभाव हो जा नेपर एक प्राप्तव्य सच्चिदानन्द परब्रह्म ही बच रहता है । जैसे समुद्र तरङ्गों का और निर्मल मणि रश्मियों का खजाना है, वैसे ही सच्चिदानन्दघन ब्रह्म ही अनन्त चराचर प्राणियों का खजाना है । जैसे अनन्त घड़ों में एक ही आकाश बाहर-भीतर परिपूर्ण है, उसी प्रकार समस्त जड-चेतन वस्तुओं में बाहर और भीतर भी एक अविनाशी सत् वस्तुरूप विज्ञानानन्दघन परमात्मा ही सदा-सर्वदा परिपूर्ण है । जिस प्रकार अयस्कान्तमणि (चुम्बक ) के सकाशमात्र से जड लोह क्रियाशील हो जाता है, वैसे ही एकमात्र चिन्मय परमात्मा के सकाश से जड देहादि पदार्थ क्रियाशील होते हैं । जगत् के एकमात्र कारण उस चिन्मय परमात्मा में उसकी कल्पना से ही यह कल्पित दृश्य जगत् स्थित है- ठीक उसी प्रकार, जैसे चित्र विचित्र चञ्चल तरङ्ग-समूह जल में स्थित है । वास्तव में अनन्त आकाश की तरह निराकार चिन्मय परमात्मा में यह कुछ भी नहीं है । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (तीसरा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 27 (भाग 1) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ व्यासजी द्वारा नवरात्र व्रत-विधि का वर्णन तथा पूजा में निषिद्ध कन्याओं का विवेचन, सुशील वैश्य को देवी की प्रसन्नता-प्राप्ति... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ प्राचीन समय की बात है-दक्ष के यज्ञ को विध्वंस करने वाली भगवती भद्रकाली का अवतार अष्टमी को हुआ था। उनकी आकृति बड़ी भयंकर थी। उनके साथ करोड़ों योगिनियाँ थीं। अतएव भाँति-भाँति के उपहारों, गन्ध एवं मालाओं द्वारा अष्टमी को विशेष विधान के साथ भगवती की निरन्तर पूजा करनी चाहिये। उस दिन हविष्य-हवन, ब्राह्मण भोजन तथा फल- पुष्प का उपहार-दान आदि कार्यों से भगवती जगदम्बा को प्रसन्न करे। राजन्! यदि पूरे नवरात्र में उपवास-व्रत न कर सकता हो तीन दिन उपवास करने पर भी मनुष्य यथोक्त फल का अधिकारी हो जाता है-ऐसा कथन है। सप्तमी, अष्टमी और नवमी-इन तीन रातों में उपवास करके देवी की पूजा करने से सभी फल प्राप्त हो जाते हैं। देवी-पूजन, हवन, कुमारी-पूजन और ब्राह्मण भोजन-इन चार कार्यों के सम्पन्न होने से सांगोपांग नवरात्र-व्रत पूरा होता है। ऐसी उक्ति है। जगत् में अन्य जितने व्रत एवं विविध प्रकार के दान हैं, वे इस नवरात्र-व्रत की तुलना कदापि नहीं कर सकते; क्योंकि यह व्रत धन एवं धान्य प्रदान कर नेवाला, सुख और संतान बढ़ाने वाला; आयु और आरोग्यवर्धक तथा स्वर्ग और मोक्ष तक देने में समर्थ है। अतएव जिसे विद्या, धन या पुत्र पाने की इच्छा हो, वह मनुष्य इस सौभाग्यदायी मंगलमय व्रत का विधिवत् अनुष्ठान करे। विद्या की अभिलाषा रखने वाले पुरुष को इस व्रत के प्रभाव से सम्पूर्ण विद्याएँ सुलभ हो जाती हैं। जिसका राज्य छिन गया हो, ऐसे नरेश को पुनः गद्दी पर बैठाने की क्षमता इस व्रत में है, यह सर्वथा सत्य है। जिन्होंने पूर्वजन्म में इस उत्तम नवरात्र का पालन नहीं | किया है, वे ही दूसरे जन्म में रोगी, दरिद्र और संतानहीन होते हैं। जो स्त्री वन्ध्या, विधवा अथवा धनहीन है, उसके विषय में ऐसा अनुमान कर लेना चाहिये कि अवश्य ही इसने पूर्वजन्म में नवरात्र-व्रत नहीं किया है। जिसने जगत् में आकर उक्त नवरात्र-व्रत का पालन नहीं किया, वह कैसे धनी हो सकता है तथा कैसे उसे स्वर्ग में जाकर आनन्द भोगने की सुविधा मिल सकती है। जिसने कोमल बिल्वपत्रों में रक्तचन्दन लगाकर उनसे भवानी की पूजा की है, वही पृथ्वी पर राजा होता है। भगवती कल्याण स्वरूपिणी हैं। इनका कभी जन्म-मरण नहीं होता। दुःख दूर करने में ये सदा तत्पर रहती हैं। सिद्धि प्रदान करने वाली ये देवी जगत् में सबसे श्रेष्ठ हैं। जिस मनुष्य ने इनकी उपासना नहीं की, वह निश्चय ही इस जगत् में दुःखी, शत्रुग्रस्त एवं दरिद्र होता है। ब्रह्मा, विष्णु , शंकर, सूर्य, अग्नि, वरुण, कुबेर एवं इन्द्रप्रभृति देवता बड़े हर्ष के साथ जिनका ध्यान करते हैं, उन्हीं भगवती चण्डिका को मानव क्यों नहीं भजते ? मनु ने कहा है कि इनके 'स्वाहा' और 'स्वधा'-इन नामों का उच्चारण करने से देवता और पितर तृप्त हो जाते हैं। इसी से श्रेष्ठ मुनिगण सम्पूर्ण यज्ञों में हर्षपूर्वक मन्त्रों के साथ इसका प्रयोग करते हैं। जिनकी इच्छा से ब्रह्मा इस जगत् की सृष्टि करते हैं, विष्णु अनेक अवतार धारण करके पालन करते हैं तथा शंकर संहार करने में तत्पर होते हैं, उन कल्याणदायिनी भगवती को मानव क्यों नहीं भजता नर, नाग, पक्षी, पिशाच, राक्षस और देवता-इनमें कोई एक भी ऐसा नहीं है, जिसमें भगवती की शक्ति न हो और वह हिलडुल तक सके। घर-घर की यही स्थिति है। मंगलमयी भगवती चण्डिका सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध कर देती हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चारों फलों की अभिलाषा करने वाला कौन ऐसा पुरुष है, जो उन भगवती की उपासना न करे अथवा उनके व्रत से वंचित रह जाय ? महान्-से-महान् पापी भी यदि नवरात्र-व्रत कर ले तो सम्पूर्ण पापों से उसका उद्धार हो जाता है। क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चमः स्कन्धः अथ दशमोऽध्यायः जडभरत और राजा रहूगण की भेंट...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ ब्राह्मण उवाच त्वयोदितं व्यक्तमविप्रलब्धं भर्तुः स मे स्याद्यदि वीर भारः । गन्तुर्यदि स्यादधिगम्यमध्वा पीवेति राशौ न विदां प्रवादः ॥ ९ स्थौल्यं कार्यं व्याधय आधयश्च क्षुत्तृड्भयं कलिरिच्छा जरा च । निद्रा रतिर्मन्युरहंमदः शुचो देहेन जातस्य हि मे न सन्ति ॥ १० जीवन्मृतत्वं नियमेन राजन् आद्यन्तवद्यद्विकृतस्य स्वस्वाम्यभावो ध्रुव ईड्य यत्र दृष्टम् । तर्जुच्यतेऽसौ विधिकृत्ययोगः ॥ ११ विशेषबुद्धेर्विवरं मनाक् च पश्याम यन्न व्यवहारतोऽन्यत् । क ईश्वरस्तत्र किमीशितव्यं तथापि राजन् करवाम किं ते ॥ १२ उन्मत्तमत्तजडवत्स्वसंस्थां गतस्य मे वीर चिकित्सितेन । अर्थः कियान् भवता शिक्षितेन स्तब्धप्रमत्तस्य च पिष्टपेषः ।। १३ श्रीशुक उवाच एतावदनुवादपरिभाषया प्रत्युदीर्य मुनिवर उपशमशील उपरतानात्म्यनिमित्त उपभोगेन कर्मारब्धं व्यपनयन् राजयानमपि तथोवाह ॥ १४ ॥ स चापि पाण्डवेय सिन्धुसौवीरपति स्तत्वजिज्ञासायां सम्यक्श्रद्धयाधिकृताधिकार- स्तद्धुदयग्रन्थिमोचनं द्विजवच आश्रुत्य बहुयोगग्रन्थसम्पतं त्वरयावरुह्य शिरसा पादमूलमुपसृतः क्षमापयन् विगतनृपदेवस्मय उवाच ॥ १५ ॥ कस्त्वं निगूढश्चरसि द्विजानां बिभर्षि सूत्रं कतमोऽवधूतः । कस्यासि कुत्रत्य इहापि कस्मात् क्षेमाय नश्चेदसि नोत" शुक्लः ॥ १६ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ जडभरत ने कहा-राजन् ! तुमने जो कुछ कहा वह यथार्थ है। उसमें कोई उलाहना नहीं है। यदि भार ना मकी कोई वस्तु है तो ढोनेवाले के लिये है, यदि कोई मार्ग है तो वह चलनेवाले के लिये है। मोटापन भी उसी का है, यह सब शरीर के लिये कहा जाता है, आत्मा के लिये नहीं । ज्ञानीजन ऐसी बात नहीं करते ॥ ९ ॥ स्थूलता, कृशता, आधि, व्याधि, भूख, प्यास, भय, कलह, इच्छा, बुढ़ापा, निद्रा, प्रेम, क्रोध, अभिमान और शोक-ये सब धर्म देहाभिमान को लेकर उत्पन्न होने वाले जीवमे रहते हैं; मुझ में इनका लेश भी नहीं है ॥ १० ॥ राजन् ! तुमने जो जीने-मरने की बात कही-सो जितने भी विकारी पदार्थ हैं, उन सभी में नियमितरूप से ये दोनों बातें देखी जाती हैं; क्योंकि वे सभी आदि-अन्तवाले हैं। यशस्वी नरेश ! जहाँ स्वामी सेवकभाव स्थिर हो, वहीं आज्ञापालनादि का नियम भी लागू हो सकता है।॥ ११ ॥ 'तुम राजा हो और मैं प्रजा हूँ' इस प्रकार की भेदबुद्धि के लिये मुझे व्यवहार के सिवा और कहीं तनिक भी अवकाश नहीं दिखायी देता। परमार्थदृष्टि से देखा जाय तो किसे स्वामी कहें और किसे सेवक ? फिर भी राजन् तुम्हें यदि स्वामित्वका अभिमान है तो कहो, मैं तुम्हारी क्या सेवा करू ॥ १२ ॥ वीरवर ! मैं मत्त, उन्मत्त और जडके समान अपनी ही स्थितिमें रहता हूँ। मेरा इलाज करके तुम्हें क्या हाथ लगेगा ? यदि मैं वास्तव में जड और प्रमादी ही हूँ, तो भी मुझे शिक्षा देना पिसे हुए को पीसने के समान व्यर्थ ही होगा ॥ १३ ॥ श्रीशुकदेवजी कहते हैं-परीक्षित् ! मुनिवर जडभरत यथार्थ तत्त्व का उपदेश करते हुए इतना उत्तर देकर मौन हो गये। उनका देहात्मबुद्धि का हेतुभूत अज्ञान निवृत्त हो चुका था, इसलिये वे परम शान्त हो गये थे। अतः इतना कहकर भोगद्वारा प्रारब्धक्षय करने के लिये वे फिर पहले के ही समान उस पालकी को कन्धे पर लेकर चलने लगे॥ १४ ॥ सिन्धु- सौवीरनरेश रहूगण भी अपनी उत्तम श्रद्धा के कारण तत्व- जिज्ञासा का पूरा अधिकारी था। जब उसने उन द्विजश्रेष्ठ के अनेकों योग-ग्रन्थों से समर्थित और हृदय की ग्रन्थि का छेदन करने वाले ये वाक्य सुने, तब वह तत्काल पालकी से उतर पड़ा। उसका राजमद सर्वथा दूर हो गया और वह उनके चरणों में सिर रखकर अपना अपराध क्षमा कराते हुए इस प्रकार कहने लगा। १५ ॥ देव ! आपने द्विजों का चिह्न यज्ञोपवीत धारण कर रखा है, बतलाइये इस प्रकार प्रच्छन्नभाव से विचरने वाले आप कौन हैं ? क्या आप दत्तात्रेय आदि अवधूतों से कोई हैं ? आप किसके पुत्र हैं, आपका कहाँ जन्म हुआ है और यहाँ कैसे आपका पदार्पण हुआ है? यदि आप हमारा कल्याण करने पधारे हैं, तो क्या आप साक्षात् सत्त्वमूर्ति भगवान् कपिलजी ही तो नहीं हैं ? ॥ १६ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (पचासवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ललिताषष्ठी व्रत की विधि... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन्! भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को यह व्रत होता है। उस दिन उत्तम रूप, सौभाग्य और संतान की इच्छा वाली स्त्री को चाहिये कि वह नदी में स्नान करे और एक नये बाँस के पात्र में बालू लेकर घर आये। फिर वस्त्र का मण्डप बनाकर उसमें दीप प्रज्वलित करे। मण्डप में वह बाँस का बालुकामय पात्र स्थापित कर उसमें बालुकामयी, तपोवन-निवासिनी भगवती ललितागौरी का ध्यानकर पूजन करे और उस दिन उपवास रहे, तदनन्तर चम्पक, करवीर, अशोक, मालती, नीलोत्पल, केतकी तथा तगर- पुष्प-इनमें से प्रत्येककी १०८ या २८ पुष्पाञ्जलि अक्षतों के साथ निम्नलिखित मन्त्र से दे ललिते ललिते देवि सौख्यसौभाग्यदायिनि। या सौभाग्यसमुत्पन्ना तस्यै देव्यै नमो नमः ॥ (उत्तरपर्व ४१ । ८) इस प्रकार से पूजन करने के पश्चात् तरह-तरह के सोहाल, मोदक आदि पक्वान्न, कूष्माण्ड, ककड़ी, बिल्व, करेला, बैगन, करंज आदि फल भगवती ललिता को निवेदित करे और धूप, दीप, वस्त्राभूषण आदि भी समर्पित करे। इस विधि से पूजनकर रात्रि को जागरण करे तथा गीत-नृत्यादि उत्सव करे। दूसरे दिन प्रातः गीत-वाद्यसहित मूर्ति को नदी के समीप ले जाय। वहाँ पूजनकर पूजन-सामग्री ब्राह्मण को निवेदित कर दे और भगवती ललिता की बालुकामयी मूर्ति को नदी में विसर्जित कर दे। घर आकर हवन करे और देवता, पितर, मनुष्य तथा सुवासिनी स्त्रियों का पूजन करे। पंद्रह कुमारी कन्याओं को और उतने ही ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजनों से संतुष्ट कर दक्षिणा प्रदान करे और 'ललिता प्रीतियुक्ता अस्तु' यह कहकर उन्हें बिदा करे। जो पुरुष अथवा स्त्री इस ललिताषष्ठी व्रत को करते हैं, उन्हें संसार में कोई पदार्थ दुर्लभ नहीं रहता। व्रत करने वाली स्त्री बहुत काल पर्यन्त सुख-सौभाग्य से सम्पन्न रहकर अन्त में गौरीलोक में निवास करती है। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (दसवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः अविद्या के कार्य संसाररूप विष-लता, विद्या एवं अविद्या के स्वरूप तथा उन दोनों से रहित परमार्थ-वस्तु का वर्णन...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीवसिष्ठजी कहते हैं- श्रीराम! यह अविद्या का कार्य संसार-लता कब और किस प्रकार विकसित हुई, इसका मैं वर्णन करता हूँ, सुनो ! यह अविद्या का कार्य संसार लता बड़े-बड़े मेरु आदि पर्वतरूप पर्वो से युक्त, ब्रह्माण्ड रूपी त्वचा से आवृत और जनरूपी पत्र, अङ्कुर आदि विकासों से युक्त है । ये तीनों लोक इसकी देह हैं। इस अविद्या रूपी लता में प्रतिदिन वृद्धि प्राप्त करने वाले सुख, दुःख, जन्म, मृत्यु और ज्ञान तो फल हैं और अज्ञान इसका मूल है। जन्म से ही अविद्या उत्पन्न होती है और वह बादमें जन्मान्तररूप फल प्रदान करती है । जन्म से ही वह संसार के रूप में अपना अस्तित्व प्राप्त करती है और बाद में स्थितिरूप फल प्रदान करती है। वह अविद्या अज्ञान से वृद्धि प्राप्त करती है और बाद में अज्ञान रूप फल देती है। ज्ञान से आत्मा का अनुभव प्राप्त करती और अन्तर्मन आत्मा का अनुभव रूप फल देती है। प्रतिदिन आकाश में चारों ओर से विकसित होने वाली चन्द्र, सूर्य आदि के सहित ग्रहरूप ज्योतियों की जो पंक्तियाँ हैं, वे ही इस सृष्टिरूपा लता के पुष्प हैं। रघुनन्दन ! आकाश मण्डल को व्याप्तकर स्थित इस लता के ऊपर प्रस्फुरित नक्षत्र और तारे ही पुष्पों की कलियाँ हैं । चन्द्र, सूर्य तथा अग्नि के प्रकाश इस लता के पराग हैं । इसी पराग से यह शुभाङ्गी स्त्री के समान लोगों के मन का आकर्षण करती है। यह लता चित्रूप हाथी द्वारा प्रकम्पित, संकल्प रूप मधुर कलनाद करने वाली कोकिल से युक्त, इन्द्रियरूपी साँपों से वेष्टित और तृष्णारूपी त्वचा से आच्छादित, चतुर्दश भुवनरूपी वनों से शोभित, सात समुद्र रूपी सुन्दर खाइयों से आवृत एवं स्त्रीरूप पुष्पसमूहों से शोभित, मन के स्पन्दरूप वायु से कम्पित, शा्त्निषिद्ध कर्मरूपी अजगर से व्याप्त, स्वर्ग की शोभारूपी पुष्पमण्डल से शोभित तथा जीवों की जीविका से पूर्ण एवं अनेक प्रकार के विषयभोगों की वासनारूप गन्धों से अज्ञों को उन्मत्त करने वाली है। वह विद्यार्थी लता अनेक बार उत्पन्न हो चुकी है और उत्पन्न हो रही है, अनेक बार मर चुकी है और मर भी रही है । वह अतीत काल में थी और वर्तमान काल में भी है । वह सर्वदा असत्पदार्थे के सदृश होती हुई भी सत्य पदार्थ के सदृश बार-बार प्रतीत होती है तथा नित्य विनष्ट भी होती है। यह अविद्या का कार्य संसार निश्चय ही महती विषमयी लता है; क्योंकि अविचार से इसका सम्बन्ध होने पर यह तत्क्षण संसाररूपी विष से उत्पन्न होने वाली मूच्छा लाती है और विवेकपूर्वक सत्-असत् के विचार से तत्क्षण नष्ट हो जाती है। इसलिये यह विवेकी के लिये तो नष्ट हो जाती है और अविवेकी के लिये स्थित रहती है । यह सृष्टिरूपा लता जल के रूप में, पर्वतों के रूप में, नागों के रूप में, देवताओं के रूप में, पृथिवी के रूप में,द्युलोक के रूप में,चन्द्र,सूर्य और तारों के रूप में विस्तृत हो रही है। श्रीराम ! इन समस्त भुवन में उत्कृष्ट प्रभाव से चारों ओर व्याप्त अथवा जीर्णता को प्राप्त हुए क्षुद्र तिनके के रूप में जो कुछ यह दृश्य प्रतीत हो रहा है उस सबको अविद्या का कार्य होने से विनाशशील अविद्या ही समझना चाहिये । उसका विवेक-वैराग्यपूर्वक यथार्थ ज्ञान द्वारा विनाश हो जाने पर सच्चिदानन्दधन परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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