pari singh piya
pari singh piya Mar 26, 2019

radhe radhe ji

radhe radhe ji

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N. K. Mishra Mar 26, 2019
beautiful morning ji right per Har ghaav samay bhar deta hea ji

जुगल किशोर त्रिपाठी Mar 27, 2019
अगर कोई भूलता नहीं, तो समझो कि उसमें हमारा स्वार्थ निहित है। आसक्ति प्रेम नहीं है। बह बंधन है। प्रेम वह जो हमें मुक्त करे। जिसमें प्रेमी के सुख की कामना करता हो। जय श्री राम।

Swami Lokeshanand Apr 22, 2019

भरतजी अयोध्या पहुँचे, आज अयोध्या शमशान लग रही है। कोई नगरवासी भरत जी की ओर सीधे नहीं देखता। आज तो सब उन्हें संत मानते हैं, पर उस समय सब के मन में भरतजी को लेकर संशय था। यही संसार की रीत है, जीवित संत को पहचान लेना हर किसी के बस की बात नहीं, क्योंकि संत चमड़े की आँख से नहीं, हृदय की आँख से पहचाना जाता है। पर वह है कितनों के पास? हाँ! उनके जाने के बाद तो सब छाती पीटते हैं। भरतजी सीधे कैकेयी के महल में गए, क्योंकि रामजी वहीं मिलते थे। कैकेयीजी आरती का थाल लाई है, भरतजी पूछते हैं, भैया राम कहाँ हैं? पिताजी कहाँ हैं? काँपती वाणी से उत्तर मिला। वही हुआ जिसका कैकेयीजी को भय था। भरतजी की आँखों से दो वस्तु गिर गई, एक वो जो फिर गिरते ही रहे, आँसू। और दूसरी जो फिर नजरों में कभी उठ नहीं पाईं, कैकेयीजी। संत की नजरों से गिर जाना और जीवन नष्ट हो जाना, एक जैसी बात है। भगवान के राज्याभिषेक के बाद की घटना है, कैकेयीजी रामजी के पास आईं, बोलीं- राम! मैं कुछ माँगूगी तो मिलेगा? रामजी की आँखें भीग आईं, कहने लगे, माँ! मेरा सौभाग्य है, कि आपके काम आ सकूं, आदेश दें। कैकेयीजी ने कहा, हो सके तो एकबार भरत के मुंह से मुझे "माँ" कहलवा दो। रामजी ने तुरंत भरतजी को बुलवा भेजा। भरतजी दौड़े आए, दरबार में कदम धरते ही कनखियों से समझ लिया कि वहाँ और कौन बैठा है। तो कैकेयीजी को पीठ देकर खड़े हो गए। रामजी ने पूछा, भरत! मेरी एक बात मानोगे भाई? भरतजी के प्राण सूख गए, गला रुंध गया, परीक्षा की घड़ी आ गई। बोले, मानूँगा भगवान, जो आदेश देंगे मानूँगा, पर एक बात को छोड़ कर। रामजी ने पूछा, वह क्या भरत? भरतजी कहते हैं, इन्हें माँ नहीं कहूँगा॥ अब विडियो देखें- भरत जी अयोध्या आए- https://youtu.be/9TWpf3t8gIs

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विचार देते हैं हौसला, समझदारी और शक्ति दो तिनके एक नदी में गिर गए। दोनों एक ही हवा के झोंके से उड़कर एक ही साथ नदी तक आ पहुंचे थे। दोनों की परिस्थितियां समान थीं। परंतु दोनों की मानसिक स्थिति एक न थी। एक पानी में बह  रहा था सुख-पूर्वक। तैरने का आनंद लेते हुए, तो दूसरे को किनारे पर पहुंचने की जल्दी थी। वह बड़े प्रयास करता। पूरी ताकत लगाता, परंतु नदी के शक्तिशाली बहाव के आगे बेचारे तिनके की ताकत ही क्या थी। उसके सारे प्रयास व्यर्थ होते रहे। बहता तो वह उसी दिशा में रहा, जिस दिशा में  नदी बह रही थी, परंतु पहले तिनके की तरह सुखपूर्वक नहीं, बल्कि दुखी मन से। कुछ आगे जाने पर नदी की धारा धीमी हुई। पहला तिनका दूसरे से बोला- आओ मित्र, अब प्रयास करने के लिए समय अनुकूल है। चलो, मिलकर कोशिश करें। किनारे पर घास उगी है, जो नदी के बहाव को रोक भी रही है। थोड़ा प्रयास करने से  हम अपनी दुनिया में पहुंच जाएंगे। परंतु दूसरा तिनका इतनी मेहनत कर चुका था कि वह थक गया था। वह आगे प्रयास न कर सका। परंतु पहला तिनका अपने मित्र को मुसीबत में छोड़कर किनारे नहीं गया।  खुद को उससे उलझा दिया, जिससे तिनके की कुछ शक्ति बढ़ी। फिर जोर लगाया और एक लंबी घास को किसी तरह पकड़ लिया। कुछ देर सुस्ताने के बाद आखिरकार दोनों धीरे-धारे सूखे किनारे पर पहुंच ही गए।  पहला तिनका पुराने साथियों की मीठी यादों से खुश था। किनारे नए मित्रों के बीच प्रसन्न था। दूसरा तिनका अब भी अपने पुराने स्थान के साथी तिनकों से बिछड़ने के कारण उदास, डूबने की याद से परेशान और भीग जाने से दुखी था।  संक्षेप में  सकारात्मक विचारधारा हमें हौसला, समझदारी और शक्ति देती है, जिससे हम जीवन में किसी भी परिस्थिति का सामना कर लेते हैं। हर हर महादेव जय शिव शंकर

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Naval Sharma Apr 21, 2019

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Neeru Miglani Apr 19, 2019

*ना जाने क्यों यदा-कदा खयाल आता है...?* ● घर में सबसे पहले गाय की, कूकर की, पक्षियों की, खूब सारे मेहमानों की रोटी रोज़ बनती थी। फिर भी घर का बज़ट संतुलित रहता था। आज सिर्फ अपने परिवार की रोटी महंगी हो गई...जाने क्यों...? ● परिवार बहुत बड़ा होता था, उसमें खेलते बहुत सारे परिवार और पड़ोसियों के भी बच्चे। फिर भी घर में शांति होती थी...जाने क्यों...? ● महिलाओं के लिए कोई जिम या कसरत के विशेष साधन नही थे, लेकिन फिर भी महिलाएं पूर्णतः स्वस्थ रहती थी...जाने क्यों...? ● खाने को सादा दाल रोटी होती थी। लेकिन फिर भी किसी को खून की कमी नही होती थी...जाने क्यों...? ● भाई बहनों में खूब मार पिटाई होती थी, लेकिन मनमुटाव नही होते थे...जाने क्यों ? ● स्कूल में अध्यापक खूब कान खींचते थे। डंडों से पिटाई होती थी। लेकिन कोई बच्चा स्कूल में डिप्रेशन के कारण आत्महत्या नही करता था...जाने क्यों...? ● महंगे खिलौने नही मिलते थे, लेकिन हर खेल बहुत आनंदित करता था...जाने क्यों...? ● माता पिता ज़रा सी बात पे थप्पड़ जड़ दिया करते थे, फिर भी उनका सम्मान कम नही होता था...जाने क्यों...? ● घर कच्चे होते थे, कमरे कम होते थे, लेकिन माँ-बाप कभी वृद्धाश्रम नही जाते थे...जाने क्यों...? *अगर आप इस क्यों के जवाब ढूँढ़ पाएं, तो कृपया अपने मित्रों और संबंधियों से साझा ज़रूर करें। यूँ ही एक से दो मिलने से कड़ी बनेगी, जो पहले जैसा सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाने में अमुल्य योगदान देगी...!*🆎💐🙏💐

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