सत्य ः एक ः प्यास

#सत्य_एक_प्यास

पश्चिम ने दुनियां काे भाैतिक रूप से समृद्ध किया ताे पूरब विशेषकर भारत की आध्यात्मिक सम्पदा ने दुनियां में सदा रहने वाले सुख व शांति का कीमिया खाेजकर प्राणीमात्र काे असल अमीरी का स्वाद चखाया।
कभी कृष्ण युद्ध के बीच मैदान गीता का गायन करते है, हजाराें साल बाद भी दुनिया उस गायन के सुराें से सम्माेहित हाेती है।
कभी काेई बुद्ध राजमहलों से निकल पड़ता है, भारत में पाखंड व कर्मकांड से धर्म का़े निकाल कर सत्य का उद्घाेष करता है, अपने भीतर पड़े ख़ज़ाने की खाेज का संदेशां देता है।
ताे कभी काेई महावीर कपड़े तक त्याग कर संदेशा देता है कि असल अमीरी संग्रह में नहीं है।
कभी काेई कबीर धार्मिक पाेंगापंथी ओर पाखंड काे खंड खंड कर जनमानस काे धर्म की असल राह देता है।
कभी राजस्थान के रेगीस्तान में प्रेमदीवानी मीरा राजमहलों की चाैखट काे लात मार समाज के दबे कुचले वर्ग के बीच भक्ति ओर प्रेम का तान छेड़ देती है।

उसी सूखे रेगिस्तान से इसी परम्परा के एक महापुरुष निकलते है *स्वामी अड़गड़ानंद*।थाेड़ी बहुत स्कूली शिक्षा के बाद फाैज की राईफल पकड़ी ओर वहाँ से सन 1952-53 में सत्य की खाेज में भटकना प्रारम्भ हुए। यह खाेज समाप्त हुई चित्रकूट के घनघाेर जंगलाें में एक दिगम्बर सन्यासी परमहंस परमानन्दजी के चरणाे में। श्रद्धा व समर्पण के साथ जुट गए उसी परमसत्य की खाेज में जाे प्राचीन ऋ्षिमुनियाें ने खाेजा अपने भीतर। अगले साठ बरस इन्हीं घाेर निर्जन जंगलाें के पूर्ण एकांतवास व कठाेर तपस्या से अपने भीतर के बुध्दत्व का जागरण किया ओर ईश्वरीय आदेश से उस परम सत्य काे पुनः गीता के माध्यम से जन जन के ह्रदय तक देने का भागवत संकल्प लिया। जातपांत देश धर्म सम्प्रदाय के सारे बंधन व धर्म के नाम पर चल रहे नफरताें की खेती का नाश कर, उस एक परम सत्य की स्थापना जाे प्राणीमात्र का कल्याण करे।यही भारत का ही नहीं विश्व में प्राणी मात्र का सनातन(सदा रहने वाला)धर्म है।आंखाें में करूणा का सागर, व्यवहार में बालकाें सी निश्छलता, वाणी जाे कभी कल्याण की करूणा से ओतप्राेत ताे कभी धर्म के नाम पर चलने वाले गाेरखधंधे काे छिन्नविछन्न करती, हिंदु धर्म में जात पांत के नाम पड़ी धार्मिक विडम्बनाओं पर कड़ा प्रहार करती।
लगता है बनारस के पास के जंगलाें में फिर मगहर का जुलाहा कबीर आ गया हाे, ताे कभी लगता है कि अरुणाचल का रमण महर्षि अधूरे काम काे पूरा करने आ गये हाे, ताे कभी लगता है कि दक्षिणेश्वर के रामकृष्ण परमहंस फिर नए कलेवर में आ गए हाे।लगता है कृष्ण 5200 बरष पहले कही अपनी ही बात काे दाेबारा कहना चाहता हाे। तर्क व बुद्धि से आगे के विज्ञान की खाेज जाे परम सत्य है ऐसे फ़क़ीर करते है, जाे जनमानस काे बरबस अपने सत्य से अपनी ओर खींच लेते है। ऐसे वक़्त जब भारत में धर्म ने एक धंधे का रूप ले लिया है भगवा वस्त्र अब जनश्रद्धा का केन्द्र ना हाेकर शंका व संदेह का कारण बन गए हाे, धार्मिक नफरते सियासती राेटियां सेकने की मुफिद आग दे रही हाे, ताे काेई बिरला सन्यासी बिरला फ़क़ीर उन सब के बीच सत्य की, प्रेम की, करूणा की धारा का प्रवाह कर देता है।

पिछले 6 दिन चुनार(युपी)के पहाड़ी जंगलाें में उनके सान्निध्य से क्या ले पाया यह ताे नहीं कह सकता पर जाे देख पाया उसकाे कह पाने में असमर्थ । फूल की ख़ुशबू काे महसूस ताे किया जा सकता है परिभाषित ताे क़तई नहीं ।पर इतना कह सकता हूँ कि असल संत सन्यासी साधु जिनके बारे में पुरानी कहानियाें में पढ़ते थे उनकी रहनी(व्यवहार )काे देखने का यह दुर्लभ अवसर था। मेरे लिए गर्व का अतिरिक्त कारण यह भी रहा कि उनकी जन्मस्थली राजस्थान है पर ख़ैर संत ताे जाति धर्म जगह सबसे निरपेक्ष हाेता है जैसे कि वाे है भी ।

समस्त सत्य के पिपासु भारत की इस महान धराेहर के दर्शन अवश्य करें विशेष कर तार्किक व नास्तिक साथी।

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Mavjibhai Patel Feb 18, 2020

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Ramkumar Dogra Feb 18, 2020

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Mahesh Malhotra Feb 18, 2020

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Rajkumar Agarwal Feb 18, 2020

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Radha soni Feb 18, 2020

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J. S. Rajaput Feb 18, 2020

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pihu Feb 18, 2020

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