Mukesh Sharma
Mukesh Sharma Apr 15, 2021

♦️♦️♦️ ⚜🕉⚜ ♦️♦️♦️ *🙏ॐ श्रीगणेशाय नम:🙏* *🙏शुभप्रभातम् जी🙏* *इतिहास की मुख्य घटनाओं सहित पञ्चांग-मुख्यांश ..* *📝आज दिनांक 👉* *📜 15 अप्रैल 2021* *बृहस्पतिवार* *🏚नई दिल्ली अनुसार🏚* *🇮🇳शक सम्वत-* 1943 *🇮🇳विक्रम सम्वत-* 2078 *🇮🇳मास-* चैत्र *🌓पक्ष-* शुक्लपक्ष *🗒तिथि-* तृतीया-15:28 तक *🗒पश्चात्-* चतुर्थी *🌠नक्षत्र-* कृत्तिका-20:33 तक *🌠पश्चात्-* रोहिणी *💫करण-* गर-15:28 तक *💫पश्चात्-* वणिज *✨योग-* आयुष्मान-17:18 तक *✨पश्चात्-* सौभाग्य *🌅सूर्योदय-* 05:56 *🌄सूर्यास्त-* 18:46 *🌙चन्द्रोदय-* 07-48 *🌛चन्द्रराशि-* वृषभ-दिनरात *🌞सूर्यायण -* उत्तरायण *🌞गोल-* दक्षिणगोल *💡अभिजित-* 11:55 से 12:47 *🤖राहुकाल-* 13:57 से 15:34 *🎑ऋतु-* वसन्त *⏳दिशाशूल-* दक्षिण *✍विशेष👉* *_🔅आज बृहस्पतिवार को 👉 चैत्र सुदी तृतीया 15:28 तक पश्चात् चतुर्थी शुरु , गणगौर / गणगौरी व्रत , नवरात्रि का तीसरा दिन - मां चंद्रघंटा व्रत - पूजा , अरून्धती व्रत - पूजन , सौभाग्य शयन तृतीया , आन्दोलन 3 , सायं दोलारुढ़ शिव गौरी पूजन , सरहुल (बिहार) , मनोरथ तृतीया व्रत , मन्वादि 3 , सर्वदोषनाशक रवि योग 20:33 से , विघ्नकारक भद्रा 28:47 से , यमघण्ट योग सूर्योदय से 20:32 तक , सौर ( मेष ) वैशाख मासारम्भ , मेवाड़ उत्सव प्रारम्भ ( उदय. ) , भगवान कुन्थुनाथ ज्ञान कल्याणक ( चैत्र शुक्ल तृतीया ) ,श्री मत्स्य जयन्ती , गुरु नानक देव जयन्ती ( तारीखानुसार ) , गुरु अर्जुनदेव जयन्ती (तारीखानुसार) , दक्षिणी पश्चिमी कमान दिवस ( 2005 ) व हिमाचल प्रदेश दिवस ( 1948 , पूर्ण राज्य 25 जनवरी 1971 को ) ।_* *नोट- सभी तरह की लेटेस्ट विविध एवं शैक्षणिक खबरों एवं इस पंचांग के लिए "हरियाणा एजुकेशनल अपडेट" फेसबुक पेज ज्वाइन करें।* *_🔅कल शुक्रवार को 👉 चैत्र बदी चतुर्थी 18:07 तक पश्चात् पंचमी शुरु , वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी व्रत , ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक , नवरात्रि का चौथा दिन - मां कुष्मांडा व्रत - पूजा , बुध अश्विनी नक्षत्र मेष राशि में 20ः57 पर , सर्वदोषनाशक रवि योग 11:40 तक , विघ्नकारक भद्रा 18:06 तक , यमघण्ट योग सूर्योदय से 23:40 तक , सौभाग्यसूचक रोहिणी व्रत (जैन ) , गुरू अंगददेव जोति जोत (प्राचीनपरम्परानुसार ) , मेला गणगौर का दूसरा दिन , राजस्थान पुलिस दिवस , भारतीय रेलवे परिवहन दिवस , Foursquare Day , World Voice Day & National Healthcare Decisions Day (US)._* *🎯आज की वाणी👉* 🌹 *पिण्डजप्रवरारूढा* *चण्डकोपास्त्रकैर्युता।* *प्रसादं तनुते मह्यं* *चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥* *भावार्थ👉* _पिंडज प्राणियों में श्रेष्ठ अर्थात् सिंह पर सवार, भयानक व शत्रुओं के संहार के लिए सन्नद्ध अस्त्रों से सुसज्जित विख्यात चंद्रघंटा देवी की कृपा मुझ पर छाई रहे ।_ 🌹 *15 अप्रॅल की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ👉* 1689 – फ्रांस ने स्पेन के खिलाफ युद्ध की घोषणा की। 1715 - दक्षिण कैरोलिना में यकाय युद्ध की शुरुआत पोकोलागो नरसंहार से हुई। 1716 - ग्रेट नॉर्दर्न वॉर: प्रशियाई सैनिकों ने स्वीडन के जर्मन नियंत्रण विस्मर के बंदरगाह पर कब्जा कर किया। 1726 - न्यूटन विलियम ने सुप्रीम पी आइजैक स्टैकली को अपने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत बारे में बताया। 1729 - लीपज़िग के शहर जोहान सेबस्टियन बाख में "सेंट मैथ्यू पैशन" का उद्घाटन हुआ। 1755 - शमूएल जॉनसन का "ए डिक्शनरी ऑफ द इंग्लिश लैंग्वेज" लंदन में प्रकाशित की गयी। 1784 – आयरलैंड में दुनिया का पहला गुब्बारा उड़ाया गया। *ये पंचांग डायरेक्ट प्राप्त करें👇* https://www.facebook.com/groups/1677111972387804/ *शिक्षक समाज हरियाणा टेलीग्राम👇* http://t.me//sikshahsamajharyana 1817 – अमेरिका में पहला स्कूल बधिर बच्चों के लिए खोला गया। 1820 - वुर्टेमबर्ग के राजा विलियम-I ने अपने चचेरे भाई पॉलिन थेरेसे से स्टटगार्ट में शादी की। 1840 - किंग्स कॉलेज अस्पताल लंदन में खुला। 1847 - लॉरेंस स्कूल सानवार की स्थापना की गयी। 1858 - अज़ीमघुर की लड़ाई, मैक्सिकन स्पैनिश को हराया। 1877 - टोक्यो विश्वविद्यालय आधिकारिक तौर पर जापान में स्थापित किया गया। 1892 - जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी न्यूयॉर्क में स्थापित की गयी। 1895 – बाल गंगाधर तिलक ने राजगढ़ किले में शिवाजी उत्सव का उद्घाटन किया। 1923 – डाईबिटीज से पीड़ित लोगों के लिए इंन्सुलिन बाजार में उपलब्ध हुआ। 1927 – स्विट्जरलैंड और तत्कालीन सोवियत संघ राजनयिक संबंध बनाने पर सहमत हुए। 1940 – मैकडोनाल्ड का पहला रेस्त्रां कैलिफोर्निया में खुला। 1948 – हिमाचल प्रदेश राज्य की स्थापना हुई। 1986 – अमरीका ने लीबिया के त्रिपोली और बिनग़ाज़ी नगरों पर आक्रमण किया। 1992 – संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद ने लीबिया पर वायु और हथियार प्रतिबंध लगाने से संबंधित एक प्रस्ताव पारित किया और इस देश से बाहर इस देश की सारी सम्पत्ति को जब्त कर लिया। 1994 - भारत सहित 109 देशों द्वारा 'गैट' समझौते की स्वीकृति। 1999 - पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो तथा उनके पति आसिफ़ अली जरदारी को सरकारी ठेकों में दलाली खाने के आरोप में पांच वर्ष की क़ैद की सज़ा, पाकिस्तान ने परमाणु क्षमता वाले अपने दूसरे प्रक्षेपास्त्र शाहीन-1 का परीक्षण किया। 2000 - आतंकवाद से निपटने के लिए सहयोग के आहवान के साथ जी -77 शिखर सम्मेलन हवाना में सम्पन्न। 2002 – दक्षिण कोरिया में बुसान के निकट एयर चाइना का विमान दुर्घटनाग्रस्त होने से 128 लोगों की मौत हुई। 2003 - ब्रिटेन में आयरिश रिपब्लिकन आर्मी ने हथियार डाल देने का निर्णय लिया। 2004 - राजीव गांधी हत्याकांड से जुड़े लिट्टे उग्रवादी वी. मुरलीधरन की कोलम्बो में हत्या की गयी। 2006 – नेपाल में माओवादीयों ने संघर्षविराम की घोषणा की। 2006 - इंटरपोल ने जकार्ता सम्मेलन में एंटी करप्शन एकेडमी के गठन का प्रस्ताव सुझाया। 2008 - राज्यसभा के सभापति मोहम्मद हामिद अंसारी ने बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन नव निर्वाचित 55 सदस्यों में से 50 को शपथ दिलायी। 2008 - भारतीय मूल के कनाडाई मंत्री दीपक ओबेरॉय को अफ़ग़ानिस्तान पर गठित कनाडाई संसद की विशेष समिति का सदस्य चुना गया। 2010 - भारत में निर्मित पहले क्रायोजेनिक रॉकेट जीएसएलवी-डी3 का प्रक्षेपण नाकाम हो गया। 2012 – पाकिस्तान की एक जेल पर हमले के बाद 400 आतंकवादी फरार हुए। 2013 – इराक में बम विस्फोट से 33 मरे और 163 घायल हुए। 2013 – निकोलस मदुरो वेनेजुएला के राष्ट्रपति बने। 2019 - पेरिस के 850 साल पुराने विश्वप्रसिद्ध चर्च नॉट्र डाम में आग लग गई जिससे चर्च की मुख्य मीनार और उसकी छत ढह गई । 2019 - प्रथम स्वदेशी (भारत में निर्मित )क्रूज मिसाइल ‘निर्भय’ का सफल परीक्षण , DRDO ने किया कीर्तिमान स्थापित। 2020 - इलेक्‍ट्रोनिक्‍स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने आरोग्‍य ऐप विकसित किया।इस ऐप की शुरूआत से 13 दिन के अंदर ही पांच करोड़ से अधिक लोग इसे डाउनलोड कर चुके। *15 अप्रॅल को जन्मे व्यक्ति👉* 1452 - लिओनार्दो दा विंची, इटलीवासी, महान चित्रकार। 1469 – सिख धर्म के संस्थापक गुरू नानक का जन्म हुआ। 1563 - गुरु अर्जन देव - सिक्खों के पाँचवें गुरु। 1707 – स्वीटज़रलैंड के खगोलशास्त्री गणितज्ञ और भौतिकशस्त्री लयूनार्ड ओलेर का जन्म हुआ। 1731 – ब्रिटिश दार्शनिक और भौतिकशास्त्री हेनरी काउन्डेश का फ़्रांस में जन्म हुआ।य 1865 - अयोध्यासिंह उपाध्याय - खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्यकार। 1919 - अर्जन सिंह - भारतीय वायु सेना के सबसे वरिष्ठ और पांच सितारा वाले रैंक तक पहुँचने वाले एकमात्र मार्शल थे (भारतीय वायु सेना के पहले एयर चीफ मार्शल)। 1940 - सुल्तान ख़ान - भारत के प्रसिद्ध सारंगी वादक और शास्त्रीय गायक। 1960 - नरोत्तम मिश्रा - मध्य प्रदेश की राजनीति में 'भारतीय जनता पार्टी' के प्रसिद्ध नेता। 1972 - मंदिरा बेदी- बालीवुड अभिनेत्री, क्रिकेट ग्लैमर और फैशन की मूर्ति। *15 अप्रॅल को हुए निधन👉* 1865 - अब्राहम लिंकन - अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति थे। 1985 - शंभुनाथ डे - हैजा के जीवाणु पर शोध कार्य करने वाले भारतीय वैज्ञानिक थे। 1998 – थम्पी गुरु के नाम से प्रसिद्ध फ़्रेडरिक लेंज का निधन हुआ। 2020 - दिग्गज अभिनेता रंजीत चौधरी का निधन। *15 अप्रॅल के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव👉* 🔅 मेवाड़ उत्सव प्रारम्भ ( उदय. )। 🔅 भगवान कुन्थुनाथ ज्ञान कल्याणक (जैन , चैत्र शुक्ल तृतीया)। 🔅 श्री मतस्य जयन्ती। 🔅 गुरु नानक देव जयन्ती (तारीखानुसार) । 🔅 गुरु अर्जुनदेव जयन्ती (तारीखानुसार) । 🔅 हिमाचल प्रदेश दिवस (1948 , पूर्ण राज्य 25 जनवरी 1971 को) । 🔅 दक्षिणी पश्चिमी कमान दिवस ( 2005 ) । 🔅 विश्व कला दिवस। *कृपया ध्यान दें जी👉* *यद्यपि इसे तैयार करने में पूरी सावधानी रखने की कोशिश रही है। फिर भी किसी घटना , तिथि या अन्य त्रुटि के लिए मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं है ।* 🌻आपका दिन *_मंगलमय_* हो जी ।🌻 ⚜⚜ 🌴 💎 🌴⚜⚜

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    *🙏ॐ श्रीगणेशाय नम:🙏*
       *🙏शुभप्रभातम् जी🙏*

*इतिहास की मुख्य घटनाओं सहित पञ्चांग-मुख्यांश ..*

     *📝आज दिनांक 👉*
     
   *📜 15 अप्रैल 2021*
           *बृहस्पतिवार*
 *🏚नई  दिल्ली अनुसार🏚*

*🇮🇳शक सम्वत-* 1943
*🇮🇳विक्रम सम्वत-* 2078
*🇮🇳मास-* चैत्र
*🌓पक्ष-* शुक्लपक्ष
*🗒तिथि-* तृतीया-15:28 तक
*🗒पश्चात्-* चतुर्थी
*🌠नक्षत्र-* कृत्तिका-20:33 तक
*🌠पश्चात्-* रोहिणी
*💫करण-* गर-15:28 तक
*💫पश्चात्-* वणिज
*✨योग-* आयुष्मान-17:18 तक
*✨पश्चात्-* सौभाग्य
*🌅सूर्योदय-* 05:56
*🌄सूर्यास्त-* 18:46
*🌙चन्द्रोदय-* 07-48
*🌛चन्द्रराशि-* वृषभ-दिनरात
*🌞सूर्यायण -* उत्तरायण
*🌞गोल-* दक्षिणगोल
*💡अभिजित-* 11:55 से 12:47
*🤖राहुकाल-* 13:57 से 15:34
*🎑ऋतु-* वसन्त
*⏳दिशाशूल-* दक्षिण

*✍विशेष👉*

*_🔅आज बृहस्पतिवार को 👉 चैत्र सुदी तृतीया 15:28 तक पश्चात् चतुर्थी शुरु , गणगौर / गणगौरी व्रत , नवरात्रि का तीसरा दिन - मां चंद्रघंटा व्रत - पूजा , अरून्धती व्रत - पूजन , सौभाग्य शयन तृतीया , आन्दोलन 3 , सायं दोलारुढ़ शिव गौरी पूजन , सरहुल (बिहार) , मनोरथ तृतीया व्रत , मन्वादि 3 , सर्वदोषनाशक रवि योग 20:33 से , विघ्नकारक भद्रा 28:47 से , यमघण्ट योग सूर्योदय से 20:32 तक , सौर ( मेष ) वैशाख मासारम्भ , मेवाड़ उत्सव प्रारम्भ ( उदय. ) , भगवान कुन्थुनाथ ज्ञान कल्याणक ( चैत्र शुक्ल तृतीया ) ,श्री मत्स्य जयन्ती , गुरु नानक देव जयन्ती ( तारीखानुसार ) , गुरु अर्जुनदेव जयन्ती (तारीखानुसार) , दक्षिणी पश्चिमी कमान दिवस ( 2005 ) व हिमाचल प्रदेश दिवस ( 1948 , पूर्ण राज्य 25 जनवरी 1971 को ) ।_*
 *नोट- सभी तरह की लेटेस्ट विविध एवं शैक्षणिक खबरों एवं इस पंचांग के लिए "हरियाणा एजुकेशनल अपडेट" फेसबुक पेज ज्वाइन करें।*
*_🔅कल शुक्रवार को 👉 चैत्र बदी चतुर्थी 18:07 तक पश्चात् पंचमी शुरु , वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी व्रत , ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक , नवरात्रि का चौथा दिन - मां कुष्मांडा व्रत - पूजा , बुध अश्विनी नक्षत्र मेष राशि में 20ः57 पर , सर्वदोषनाशक रवि योग 11:40 तक , विघ्नकारक भद्रा 18:06 तक , यमघण्ट योग सूर्योदय से 23:40 तक , सौभाग्यसूचक रोहिणी व्रत (जैन ) , गुरू अंगददेव जोति जोत (प्राचीनपरम्परानुसार ) , मेला गणगौर का दूसरा दिन , राजस्थान पुलिस दिवस , भारतीय रेलवे परिवहन दिवस , Foursquare Day , World Voice Day & National Healthcare Decisions Day (US)._*

*🎯आज की वाणी👉*

🌹
*पिण्डजप्रवरारूढा*
      *चण्डकोपास्त्रकैर्युता।*
*प्रसादं  तनुते  मह्यं*
      *चन्द्रघण्टेति विश्रुता ॥*
*भावार्थ👉* 
            _पिंडज प्राणियों में श्रेष्ठ अर्थात् सिंह पर सवार, भयानक व शत्रुओं के संहार के लिए सन्नद्ध अस्त्रों से सुसज्जित विख्यात चंद्रघंटा देवी की कृपा मुझ पर छाई रहे ।_
🌹

*15 अप्रॅल की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ👉*

1689 – फ्रांस ने स्पेन के खिलाफ युद्ध की घोषणा की। 
1715 - दक्षिण कैरोलिना में यकाय युद्ध की शुरुआत पोकोलागो नरसंहार से हुई। 
1716 - ग्रेट नॉर्दर्न वॉर: प्रशियाई सैनिकों ने स्वीडन के जर्मन नियंत्रण विस्मर के बंदरगाह पर कब्जा कर किया। 
1726 - न्यूटन विलियम ने सुप्रीम पी आइजैक स्टैकली को अपने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत बारे में बताया। 
1729 - लीपज़िग के शहर जोहान सेबस्टियन बाख में "सेंट मैथ्यू पैशन" का उद्घाटन हुआ। 
1755 - शमूएल जॉनसन का "ए डिक्शनरी ऑफ द इंग्लिश लैंग्वेज" लंदन में प्रकाशित की गयी।
1784 – आयरलैंड में दुनिया का पहला गुब्बारा उड़ाया गया।

*ये पंचांग डायरेक्ट प्राप्त करें👇*
https://www.facebook.com/groups/1677111972387804/
*शिक्षक समाज हरियाणा टेलीग्राम👇*
http://t.me//sikshahsamajharyana

1817 – अमेरिका में पहला स्कूल बधिर बच्चों के लिए खोला गया।
1820 - वुर्टेमबर्ग के राजा विलियम-I ने अपने चचेरे भाई पॉलिन थेरेसे से स्टटगार्ट में शादी की। 
1840 - किंग्स कॉलेज अस्पताल लंदन में खुला। 
1847 - लॉरेंस स्कूल सानवार की स्थापना की गयी। 
1858 - अज़ीमघुर की लड़ाई, मैक्सिकन स्पैनिश को हराया। 
1877 - टोक्यो विश्वविद्यालय आधिकारिक तौर पर जापान में स्थापित किया गया। 1892 - जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी न्यूयॉर्क में स्थापित की गयी।
1895 – बाल गंगाधर तिलक ने राजगढ़ किले में शिवाजी उत्सव का उद्घाटन किया।
1923 – डाईबिटीज से पीड़ित लोगों के लिए इंन्सुलिन बाजार में उपलब्ध हुआ।
1927 – स्विट्जरलैंड और तत्कालीन सोवियत संघ राजनयिक संबंध बनाने पर सहमत हुए।
1940 – मैकडोनाल्ड का पहला रेस्त्रां कैलिफोर्निया में खुला।
1948 – हिमाचल प्रदेश राज्य की स्थापना हुई।
1986 – अमरीका ने लीबिया के त्रिपोली और बिनग़ाज़ी नगरों पर आक्रमण किया।
1992 – संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद ने लीबिया पर वायु और हथियार प्रतिबंध लगाने से संबंधित एक प्रस्ताव पारित किया और इस देश से बाहर इस देश की सारी सम्पत्ति को जब्त कर लिया।
1994 - भारत सहित 109 देशों द्वारा 'गैट' समझौते की स्वीकृति।
1999 - पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो तथा उनके पति आसिफ़ अली जरदारी को सरकारी ठेकों में दलाली खाने के आरोप में पांच वर्ष की क़ैद की सज़ा, पाकिस्तान ने परमाणु क्षमता वाले अपने दूसरे प्रक्षेपास्त्र शाहीन-1 का परीक्षण किया।
2000 - आतंकवाद से निपटने के लिए सहयोग के आहवान के साथ जी -77 शिखर सम्मेलन हवाना में सम्पन्न।
2002 – दक्षिण कोरिया में बुसान के निकट एयर चाइना का विमान दुर्घटनाग्रस्त होने से 128 लोगों की मौत हुई।
2003 - ब्रिटेन में आयरिश रिपब्लिकन आर्मी ने हथियार डाल देने का निर्णय लिया।
2004 - राजीव गांधी हत्याकांड से जुड़े लिट्टे उग्रवादी वी. मुरलीधरन की कोलम्बो में हत्या की गयी।
2006 – नेपाल में माओवादीयों ने संघर्षविराम की घोषणा की।
2006 - इंटरपोल ने जकार्ता सम्मेलन में एंटी करप्शन एकेडमी के गठन का प्रस्ताव सुझाया।
2008 - राज्यसभा के सभापति मोहम्मद हामिद अंसारी ने बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन नव निर्वाचित 55 सदस्यों में से 50 को शपथ दिलायी।
2008 - भारतीय मूल के कनाडाई मंत्री दीपक ओबेरॉय को अफ़ग़ानिस्तान पर गठित कनाडाई संसद की विशेष समिति का सदस्य चुना गया।
2010 - भारत में निर्मित पहले क्रायोजेनिक रॉकेट जीएसएलवी-डी3 का प्रक्षेपण नाकाम हो गया।
2012 – पाकिस्तान की एक जेल पर हमले के बाद 400 आतंकवादी फरार हुए।
2013 – इराक में बम विस्फोट से 33 मरे और 163 घायल हुए।
2013 – निकोलस मदुरो वेनेजुएला के राष्ट्रपति बने।
2019 - पेरिस के 850 साल पुराने विश्वप्रसिद्ध चर्च नॉट्र डाम में आग लग गई जिससे चर्च की मुख्य मीनार और उसकी छत ढह गई ।
2019 - प्रथम स्वदेशी (भारत में निर्मित )क्रूज मिसाइल ‘निर्भय’ का सफल परीक्षण , DRDO ने किया कीर्तिमान स्थापित।
2020 - इलेक्‍ट्रोनिक्‍स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने आरोग्‍य ऐप विकसित किया।इस ऐप की शुरूआत से 13 दिन के अंदर ही पांच करोड़ से अधिक लोग इसे डाउनलोड कर चुके।
 
*15 अप्रॅल को जन्मे व्यक्ति👉*

1452 - लिओनार्दो दा विंची, इटलीवासी, महान चित्रकार।
1469 – सिख धर्म के संस्थापक गुरू नानक का जन्म हुआ।
1563 - गुरु अर्जन देव - सिक्खों के पाँचवें गुरु।
1707 – स्वीटज़रलैंड के खगोलशास्त्री गणितज्ञ और भौतिकशस्त्री लयूनार्ड ओलेर का जन्म हुआ।
1731 – ब्रिटिश दार्शनिक और भौतिकशास्त्री हेनरी काउन्डेश का फ़्रांस में जन्म हुआ।य
1865 - अयोध्यासिंह उपाध्याय - खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्यकार।
1919 - अर्जन सिंह - भारतीय वायु सेना के सबसे वरिष्ठ और पांच सितारा वाले रैंक तक पहुँचने वाले एकमात्र मार्शल थे (भारतीय वायु सेना के पहले एयर चीफ मार्शल)।
1940 - सुल्तान ख़ान - भारत के प्रसिद्ध सारंगी वादक और शास्त्रीय गायक।
1960 - नरोत्तम मिश्रा - मध्य प्रदेश की राजनीति में 'भारतीय जनता पार्टी' के प्रसिद्ध नेता।
1972 - मंदिरा बेदी- बालीवुड अभिनेत्री, क्रिकेट ग्लैमर और फैशन की मूर्ति।

*15 अप्रॅल को हुए निधन👉*

1865 - अब्राहम लिंकन - अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति थे। 
1985 - शंभुनाथ डे - हैजा के जीवाणु पर शोध कार्य करने वाले भारतीय वैज्ञानिक थे।
1998 – थम्पी गुरु के नाम से प्रसिद्ध फ़्रेडरिक लेंज का निधन हुआ।
2020 - दिग्गज अभिनेता रंजीत चौधरी का निधन।

*15 अप्रॅल के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव👉*

🔅 मेवाड़ उत्सव प्रारम्भ ( उदय. )।
🔅 भगवान कुन्थुनाथ ज्ञान कल्याणक (जैन , चैत्र शुक्ल तृतीया)।
🔅 श्री मतस्य जयन्ती।
🔅 गुरु नानक देव जयन्ती (तारीखानुसार) ।
🔅 गुरु अर्जुनदेव जयन्ती (तारीखानुसार) ।
🔅 हिमाचल प्रदेश दिवस (1948 , पूर्ण राज्य 25 जनवरी 1971 को) ।
🔅  दक्षिणी पश्चिमी कमान दिवस ( 2005 ) ।
🔅 विश्व कला दिवस।

*कृपया ध्यान दें जी👉*
    *यद्यपि इसे तैयार करने में पूरी सावधानी रखने की कोशिश रही है। फिर भी किसी घटना , तिथि या अन्य त्रुटि के लिए मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं है ।*

🌻आपका दिन *_मंगलमय_*  हो जी ।🌻

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Raj May 10, 2021

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. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 207 स्कन्ध - 09 अध्याय - 24 (अन्तिम) इस अध्याय में:- विदर्भ के वंश का वर्णन श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! राजा विदर्भ की भोज्या नामक पत्नी से तीन पुत्र हुए- कुश, क्रथ और रोमपाद। रोमपाद विदर्भ वंश में बहुत ही श्रेष्ठ पुरुष हुए। रोमपाद का पुत्र बभ्रु, बभ्रु का कृति, कृति का उशिक और उशिक का चेदि। राजन! इस चेदि के वंश में ही दमघोष और शिशुपाल आदि हुए। क्रथ का पुत्र हुआ कुन्ति, कुन्ति का धृष्टि, धृष्टि का निर्वृति, निर्वृति का दशार्ह और दशार्ह का व्योम। व्योम का जीमूत, जीमूत का विकृति, विकृति का भीमरथ, भीमरथ का नवरथ और नवरथ का दशरथ। दशरथ से शकुनि, शकुनि से करम्भि, करम्भि से देवरात, देवरात से देवक्षत्र, देवक्षत्र से मधु, मधु से कुरुवश और कुरुवश से अनु हुए। अनु से पुरुहोत्र, पुरुहोत्र से आयु और आयु से सात्वत का जन्म हुआ। परीक्षित! सात्वत के सात पुत्र हुए- भजमान, भजि, दिव्य, वृष्णि, देवावृध, अन्धक और महाभोज। भजमान की दो पत्नियाँ थीं, एक से तीन पुत्र हुए- निम्लोचि, किंकिण और धृष्टि। दूसरी पत्नी से भी तीन पुत्र हुए- शताजित, सहस्रजित् और अयुताजित। देवावृध के पुत्र का नाम था बभ्रु। देवावृध और बभ्रु के सम्बन्ध में यह बात कही जाती है- ‘हमने दूर से जैसा सुन रखा था, अब वैसा ही निकट से देखते भी हैं। बभ्रु मनुष्यों में श्रेष्ठ है और देवावृध देवताओं के समान है। इसका कारण यह है कि बभ्रु और देवावृध से उपदेश लेकर चौदह हजार पैंसठ मनुष्य परम पद को प्राप्त कर चुके हैं।’ सात्वत के पुत्रों में महाभोज भी बड़ा धर्मात्मा था। उसी के वंश में भोजवंशी यादव हुए। परीक्षित! वृष्णि के दो पुत्र हुए- सुमित्र और युधाजित्। युधाजित् के शिनि और अनमित्र-ये दो पुत्र थे। अनमित्र से निम्न का जन्म हुआ। सत्रजित् और प्रसेन नाम से प्रसिद्ध यदुवंशी निम्न के ही पुत्र थे। अनमित्र का एक और पुत्र था, जिसका नाम था शिनि। शिनि से ही सत्यक का जन्म हुआ। इसी सत्यक के पुत्र युयुधान थे, जो सात्यकि के नाम से प्रसिद्ध हुए। सात्यकि का जय, जय का कुणि और कुणि का पुत्र युगन्धर हुआ। अनमित्र के तीसरे पुत्र का नाम वृष्णि था। वृष्णि के दो पुत्र हुए- श्वफल्क और चित्ररथ। श्वफल्क की पत्नी का नाम था गान्दिनी। उनमें सबसे श्रेष्ठ अक्रूर के अतिरिक्त बारह पुत्र उत्पन्न हुए- आसंग, सारमेय, मृदुर, मृदुविद्, गिरि, धर्मवृद्ध, सुकर्मा, क्षेत्रोपेक्ष, अरिमर्दन, शत्रुघ्न, गन्धमादन और प्रतिबाहु। इनके एक बहिन भी थी, जिसका नाम था सुचीरा। अक्रूर के दो पुत्र थे- देववान् और उपदेव। श्वफल्क के भाई चित्ररथ के पृथु विदूरथ आदि बहुत-से पुत्र हुए-जो वृष्णिवंशियों में श्रेष्ठ माने जाते हैं। सात्वत के पुत्र अन्धक के चार पुत्र हुए- कुकुर, भजमान, शुचि और कम्बलबर्हि। उनमें कुकुर का पुत्र वह्नि, वह्नि का विलोमा, विलोमा का कपोतरोमा और कपोतरोमा का अनु हुआ। तुम्बुरु गन्धर्व के साथ अनु की बड़ी मित्रता थी। अनु का पुत्र अन्धक, अन्धक का दुन्दुभि, दुन्दुभि का अरिद्योत, अरिद्योत का पुनर्वसु और पुनर्वसु के आहुक नाम का एक पुत्र तथा आहुकी नाम की एक कन्या हुई। आहुक के दो पुत्र हुए- देवक और उग्रसेन। देवक के चार पुत्र हुए- देववान्, उपदेव, सुदेव और देववर्धन। इनकी सात बहिनें भी थीं- धृत, देवा, शान्तिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, देवरक्षिता, सहदेवा और देवकी। वसुदेव जी ने इन सबके साथ विवाह किया था। उग्रसेन के नौ लड़के थे- कंस, सुनामा, न्यग्रोध, कंक, शंकु, सुहू, राष्ट्रपाल, सृष्टि और तुष्टिमान। उग्रसेन के पाँच कन्याएँ भी थीं- कंसा, कंसवती, कंका, शूरभू और राष्ट्रपालिका। इनका विवाह देवभाग आदि वसुदेव जी के छोटे भाइयों से हुआ था। चित्ररथ के पुत्र विदूरथ से शूर, शूर से भजमान, भजमान से शिनि, शिनि से स्वयम्भोज और स्वयम्भोज से हृदीक हुए। हृदीक से तीन पुत्र हुए- देवबाहु, शतधन्वा और कृतवर्मा। देवमीढ के पुत्र शूर की पत्नी का नाम था मारिषा। उन्होंने उसके गर्भ से दस निष्पाप पुत्र उत्पन्न किये- वसुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, सृंजय, श्यामक, कंक, शमीक, वत्सक और वृक। ये सब-के-सब बड़े पुण्यात्मा थे। वसुदेव जी के जन्म के समय देवताओं के नगारे और नौबत स्वयं ही बजने लगे थे। अतः वे ‘आनन्ददुन्दुभि’ भी कहलाये। वे ही भगवान् श्रीकृष्ण के पिता हुए। वसुदेव आदि की पाँच बहनें भी थीं- पृथा (कुन्ती), श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी। वसुदेव के पिता शूरसेन के एक मित्र थे- कुन्तिभोज। कुन्तिभोज के कोई सन्तान न थी। इसलिये शूरसेन ने उन्हें पृथा नाम की अपनी सबसे बड़ी कन्या गोद दे दी। पृथा ने दुर्वासा ऋषि को प्रसन्न करके उनसे देवताओं को बुलाने की विद्या सीख ली। एक दिन उस विद्या के प्रभाव की परीक्षा लेने के लिये पृथा ने परम पवित्र भगवान् सूर्य का आवाहन किया। उसी समय भगवान् सूर्य वहाँ आ पहुँचे। उन्हें देखकर कुन्ती का हृदय विस्मय से भर गया। उसने कहा- ‘भगवन! मुझे क्षमा कीजिये। मैंने तो परीक्षा करने के लिये ही इस विद्या का प्रयोग किया था। अब आप पधार सकते हैं’। सूर्यदेव ने कहा- ‘देवि! मेरा दर्शन निष्फल नहीं हो सकता। इसलिय हे सुन्दरी! अब मैं तुझसे एक पुत्र उत्पन्न करना चाहता हूँ। हाँ, अवश्य ही तुम्हारी योनि दूषित न हो, इसका उपाय मैं कर दूँगा।' यह कहकर भगवान सूर्य ने गर्भ स्थापित कर दिया और इसके बाद वे स्वर्ग चले गये। उसी समय उससे एक बड़ा सुन्दर एवं तेजस्वी शिशु उत्पन्न हुआ। वह देखने में दूसरे सूर्य के समान जान पड़ता था। पृथा लोकनिन्दा से डर गयी। इसलिये उसने बड़े दुःख से उस बालक को नदी के जल में छोड़ दिया। परीक्षित! उसी पृथा का विवाह तुम्हारे परदादा पाण्डु से हुआ था, जो वास्तव में बड़े सच्चे वीर थे। परीक्षित! पृथा की छोटी बहिन श्रुतदेवा का विवाह करुष देश के अधिपति वृद्धशर्मा से हुआ था। उसके गर्भ से दन्तवक्त्र का जन्म हुआ। यह वही दन्तवक्त्र है, जो पूर्व जन्म में सनकादि ऋषियों के शाप से हिरण्याक्ष हुआ था। कैकय देश के राजा धृष्टकेतु ने श्रुतकीर्ति से विवाह किया था। उससे सन्तर्दन आदि पाँच कैकय राजकुमार हुए। राजाधिदेवी का विवाह जयसेन से हुआ था। उसके दो पुत्र हुए- विन्द और अनुविन्द। वे दोनों ही अवन्ती के राजा हुए। चेदिराज दमघोष ने श्रुतश्रवा का पाणिग्रहण किया। उसका पुत्र था शिशुपाल, जिसका वर्णन मैं पहले (सप्तम स्कन्ध में) कर चुका हूँ। वसुदेव जी के भाइयों में से देवभाग की पत्नी कंसा के गर्भ से दो पुत्र हुए- चित्रकेतु और बृहद्बल। देवश्रवा की पत्नी कंसवती से सुवीर और इषुमान नाम के दो पुत्र हुए। आनक की पत्नी कंका के गर्भ से भी दो पुत्र हुए- सत्यजित और पुरुजित। सृंजय ने अपनी पत्नी राष्ट्रपालिका के गर्भ से वृष और दुर्मर्षण आदि कई पुत्र उत्पन्न किये। इसी प्रकार श्यामक ने शूरभूमि (शूरभू) नाम की पत्नी से हरिकेश और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र उत्पन्न किये। मिश्रकेशी अप्सरा के गर्भ से वत्सक के भी वृक आदि कई पुत्र हुए। वृक ने दुर्वाक्षी के गर्भ से तक्ष, पुष्कर और शाल आदि कई पुत्र उत्पन्न किये। शमीक की पत्नी सुदामिनी ने भी सुमित्र और अर्जुनपाल आदि कई बालक उत्पन्न किये। कंक की पत्नी कर्णिका के गर्भ से दो पुत्र हुए- ऋतधाम और जय। आनकदुन्दुभि वसुदेव जी की पौरवी, रोहिणी, भद्रा, मदिरा, रोचना, इला और देवकी आदि बहुत-सी पत्नियाँ थीं। रोहिणी के गर्भ से वसुदेव जी के बलराम, गद, सारण, दुर्मद, विपुल, ध्रुव और कृत आदि पुत्र हुए थे। पौरवी के गर्भ से उनके बारह पुत्र हुए- भूत, सुभद्र, भद्रवाह, दुर्मद और भद्र आदि। नन्द, उपनन्द, कृतक, शूर आदि मदिरा के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। कौसल्या ने एक ही वंश-उजागर पुत्र उत्पन्न किया था। उसका नाम था केशी। उसने रोचना से हस्त और हेमांगद आदि तथा इला से उरुवल्क आदि प्रधान यदुवंशी पुत्रों को जन्म दिया। परीक्षित! वसुदेव जी के धृतदेवा के गर्भ से विपृष्ठ नाम का एक ही पुत्र हुआ और शान्तिदेवा से श्रम और प्रतिश्रुत आदि कई पुत्र हुए। उपदेवा के पुत्र कल्पवर्ष आदि दस राजा हुए और श्रीदेवा के वसु, हंस, सुवंश आदि छः पुत्र हुए। देवरक्षिता के गर्भ से गद आदि नौ पुत्र हुए तथा स्वयं धर्म ने आठ वसुओं को उत्पन्न किया था, वैसे ही वसुदेव जी ने सहदेवा के गर्भ से पुरुविश्रुत आदि आठ पुत्र उत्पन्न किये। परम उदार वसुदेव जी ने देवकी के गर्भ से भी आठ पुत्र उत्पन्न किये, जिसमें सात के नाम हैं- कीर्तिमान, सुषेण, भद्रसेन, ऋजु, संमर्दन, भद्र और शेषावतार श्रीबलराम जी। उन दोनों के आठवें पुत्र स्वयं श्रीभगवान् ही थे। परीक्षित! तुम्हारी परासौभाग्यवती दादी सुभद्रा भी देवकी जी की ही कन्या थीं। जब-जब संसार में धर्म का ह्रास और पाप की वृद्धि होती है, तब-तब सर्वशक्तिमान भगवान श्रीहरि अवतार ग्रहण करते हैं। परीक्षित! भगवान् सब के द्रष्टा और वास्तव में असंग आत्मा ही हैं। इसलिये उनकी आत्मस्वरूपिणी योगमाया के अतिरिक्त उनके जन्म अथवा कर्म का और कोई भी कारण नहीं है। उनकी माया का विलास ही जीव के जन्म, जीवन और मृत्यु का कारण है। और उनका अनुग्रह ही माया को अलग करके आत्मस्वरूप को प्राप्त करने वाला है। जब असुरों ने राजाओं का वेष धारण कर लिया और कई अक्षौहिणी सेना इकट्ठी करके वे सारी पृथ्वी को रौंदने लगे, तब पृथ्वी का भार उतारने के लिये भगवान् मधुसूदन बलराम जी के साथ अवतीर्ण हुए। उन्होंने ऐसी-ऐसी लीलाएँ कीं, जिनके सम्बन्ध में बड़े-बड़े देवता मन से अनुमान भी नहीं कर सकते-शरीर से करने की बात तो अलग रही। पृथ्वी का भार तो उतरा ही, साथ ही कलियुग में पैदा होने वाले भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये भगवान् ने ऐसे परम पवित्र यश का विस्तार किया, जिसका गान और श्रवण करने से ही उनके दुःख, शोक और अज्ञान सब-के-सब नष्ट हो जायेंगे। उनका यश क्या है, लोगों को पवित्र करने वाला श्रेष्ठ तीर्थ है। संतों के कानों के लिये तो वह साक्षात् अमृत ही है। एक बार भी यदि कान की अंजलियों से उसका आचमन कर लिया जाता है, तो कर्म की वासनाएँ निर्मूल हो जाती हैं। परीक्षित! भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन, दशार्ह, कुरु, सृंजय और पाण्डुवंशी वीर निरन्तर भगवान की लीलाओं की आदरपूर्वक सराहना करते रहते थे। उनका श्यामल शरीर सर्वांगसुन्दर था। उन्होंने उस मनोहर विग्रह से तथा अपनी प्रेमभरी मुसकान, मधुर चितवन, प्रसादपूर्ण वचन और पराक्रमपूर्ण लीला के द्वारा सारे मनुष्य लोक को आनन्द में सराबोर कर दिया था। भगवान् के मुखकमल की शोभा तो निराली ही थी। मकराकृति कुण्डलों से उनके कान बड़े कमनीय मालूम पड़ते थे। उनकी आभा से कपोलों का सौन्दर्य और भी खिल उठता था। जब वे विलास के साथ हँस देते, तो उनके मुख पर निरन्तर रहने वाले आनन्द में मानो बाढ़-सी आ जाती। सभी नर-नारी अपने नेत्रों के प्यालों से उनके मुख की माधुरी का निरन्तर पान करते रहते, परन्तु तृप्त नहीं होते। वे उसका रस ले-लेकर आनन्दित तो होते ही, परन्तु पलकें गिरने से उनके गिराने वाले निमि पर खीझते भी। लीला पुरुषोत्तम भगवान अवतीर्ण हुए मथुरा में वसुदेव जी के घर, परन्तु वहाँ वे रहे नहीं, वहाँ से गोकुल में नन्दबाबा के घर चले गये। वहाँ अपना प्रयोजन-जो ग्वाल, गोपी और गौओं को सुखी करना था-पूरा करके मथुरा लौट आये। व्रज में, मथुरा में तथा द्वारका में रहकर अनेकों शत्रुओं का संहार किया। बहुत-सी स्त्रियों से विवाह करके हजारों पुत्र उत्पन्न किये। साथ ही लोगों में अपने स्वरूप का साक्षात्कार कराने वाली अपनी वाणीस्वरूप श्रुतियों की मर्यादा स्थापित करने के लिये अनेक यज्ञों के द्वारा स्वयं अपना ही यजन किया। कौरव और पाण्डवों के बीच उत्पन्न हुए आपस के कलह से उन्होंने पृथ्वी का बहुत-सा भार हलका कर दिया और युद्ध में अपनी दृष्टि से ही राजाओं की बहुत-सी अक्षौहिणियों को ध्वंस करके संसार में अर्जुन की जीत का डंका पिटवा दिया। फिर उद्धव को आत्मतत्त्व का उपदेश किया और इसके बाद वे अपने परमधाम को सिधार गये। ~~~०~~~ श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" "कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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Raj May 10, 2021

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. वैशाखमास-माहात्म्य पोस्ट - 13 (अन्तिम) वैशाख मास की अन्तिम तीन तिथियों की महत्ता तथा ग्रन्थ का उपसंहार - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - श्रुतदेवजी कहते हैं- राजेन्द्र ! वैशाख के शुक्ल पक्ष में जो अन्तिम तीन त्रयोदशीसे लेकर पूर्णिमा तक की तिथियाँ हैं, वे बड़ी पवित्र और शुभकारक हैं। उनका नाम 'पुष्करिणी' है, वे सब पापों का क्षय करने वाली हैं। जो सम्पूर्ण वैशाख मास में स्नान करने में असमर्थ हो, वह यदि इन तीन तिथियों में भी स्नान करे तो वैशाख मास का पूरा फल पा लेता है। पूर्व काल में वैशाख मास की एकादशी तिथि को शुभ अमृत प्रकट हुआ। द्वादशी को भगवान् विष्णु ने उसकी रक्षा की। त्रयोदशी को उन श्रीहरि ने देवताओं को सुधा-पान कराया। चतुर्दशी को देव विरोधी दैत्यों का संहार किया और पूर्णिमा के दिन समस्त देवताओं को उनका साम्राज्य प्राप्त हो गया। इसलिये देवताओं ने सन्तुष्ट होकर इन तीन तिथियों को वर दिया-' वैशाख मास की ये तीन शुभ तिथियाँ मनुष्यों के पापों का नाश करने वाली तथा उन्हें पुत्र-पौत्रादि फल देने वाली हों। जो मनुष्य इस सम्पूर्ण मास में स्नान न कर सका हो, वह इन तिथियों में स्नान कर लेने पर पूर्ण फल को ही पाता है। वैशाख मास में लौकिक कामनाओं का नियमन करने पर मनुष्य निश्चय ही भगवान् विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है। महीने भर नियम निभाने में असमर्थ मानव यदि उक्त तीन दिन भी कामनाओं का संयम कर सके तो उतने से ही पूर्ण फल को पाकर भगवान् विष्णु के धाम में आनन्द का अनुभव करता है।' इस प्रकार वर देकर देवता अपने धाम को चले गये। अत: पुष्करिणी नाम से प्रसिद्ध अन्तिम तीन तिथियाँ पुण्यदायिनी, समस्त पापराशि का नाश करने वाली तथा पुत्र - पौत्र को बढ़ाने वाली हैं। जो वैशाख मास में अन्तिम तीन दिन गीता का पाठ करता है, उसे प्रतिदिन अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जो उक्त तीनों दिन विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करता है, उसके पुण्यफल का वर्णन करने में इस भूलोक तथा स्वर्गलोक में कौन समर्थ है ? पूर्णिमा को सहस्रनामों के द्वारा भगवान् मधुसूदन को दूध से नहला कर मनुष्य पापहीन वैकुण्ठधाम में जाता है। वैशाख मास में प्रतिदिन भागवत के आधे या चौथाई श्लोक का पाठ करने वाला मनुष्य ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है। जो वैशाख के अन्तिम तीन दिनों में भागवतशास्त्र का श्रवण करता है, वह जल से कमल के पत्ते की भाँति कभी पापों से लिप्त नहीं होता। उक्त तीनों दिनों के सेवन से कितने ही मनुष्यों ने देवत्व प्राप्त कर लिया, कितने ही सिद्ध हो गये और कितनों ने ब्रह्मत्व पा लिया। ब्रह्मज्ञान से मुक्ति होती है। अथवा प्रयाग में मृत्यु होने से या वैशाख मास में नियम पूर्वक प्रात:काल जल में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिये वैशाख के अन्तिम तीन दिनों में स्नान, दान और भगवत् पूजन आदि अवश्य करना चाहिये। वैशाख मास के उत्तम माहात्म्य का पूरा-पूरा वर्णन रोग-शोक से रहित जगदीश्वर भगवान् नारायण के सिवा दूसरा कौन कर सकता है। तुम भी वैशाख मास में दान आदि उत्तम कर्म का अनुप्ठान करो। इससे निश्चय ही तुम्हें भोग और मोक्ष की प्राप्ति होगी। इस प्रकार मिथिलापति जनक को उपदेश देकर श्रुतदेवजी ने उनकी अनुमति ले वहाँ से जाने का विचार किया। तब राजर्षि जनक ने अपने अभ्युदय के लिये उत्तम उत्सव कराया और श्रुतदेवजी को पालकी पर बिठाकर विदा किया। वस्त्र, आभूषण, गौ, भूमि, तिल और सुवर्ण आदि से उनकी पूजा और वन्दना करके राजा ने उनकी परिक्रमा की। तत्पश्चात् उनसे विदा हो महातेजस्वी एवं परम यशस्वी श्रुतदेवजी सन्तुष्ट हो प्रसन्नता पूर्वक वहाँ से अपने स्थान को गये। राजा ने वैशाख धर्म का पालन करके मोक्ष प्राप्त किया। नारदजी कहते हैं- अम्बरीष! यह उत्तम उपाख्यान मैंने तुम्हें सुनाया है, जो कि सब पापों का नाशक तथा सम्पृर्ण सम्पत्तियों को देने वाला है। इससे मनुष्य भुक्ति, मुक्ति, ज्ञान एवं मोक्ष पाता है। नारदजी का यह वचन सुनकर महायशस्वी राजा अम्बरीष मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने बाह्य जगत् के व्यापारों से निवृत्त होकर मुनि को साष्टांग प्रणाम किया और अपने सम्पूर्ण वैभवों से उनकी पूजा की। तत्पश्चात् उनसे विदा लेकर देवर्षि नारदजी दूसरे लोक में चले गये; क्योंकि दक्ष प्रजापति के शाप से वे एक स्थान पर नहीं ठहर सकते। राजर्षि अम्बरीष भी नारदजी के बताये हुए सब धर्मो का अनुष्ठान करके निर्गुण परब्रह्म परमात्मा में विलीन हो गये जो इस पापनाशक एवं पुण्यवर्द्धक उपाख्यान को सुनता अथवा पढ़ता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। जिनके घर में यह लिखी हुई पुस्तक रहती है उनके हाथ में मुक्ति आ जाती है। फिर जो सदा इसके श्रवण में मन लगाते हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है। ----------:::×:::---------- वैशाखमास-माहात्म्य सम्पूर्ण ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" "कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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J.K.Sharma May 11, 2021

*परशुराम जन्मोत्सव* हिंदू कैलेंडर इस दिन को वैशाख माह के शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन यानि अक्षय तृतीया को मनाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, यह दिन अप्रैल या मई के महीने में मनाया जाता है। इस वर्ष यह 14 मई 2021 को हैं, एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे परशुराम महर्षि जमदग्नि और रेणुका के पांचवें पुत्र थे। मान्यता है कि पराक्रम के प्रतीक भगवान परशुराम का जन्म 6 उच्च ग्रहों के योग में हुआ, इसलिए वह तेजस्वी, ओजस्वी और वर्चस्वी महापुरुष बने। वे एक अच्छी तरह से निर्मित काया के साथ, ताकत और अपार शक्ति के ऋषि माने जाते हैं। अपनी भक्ति और तपस्या (तपस्या) से परशुराम जी ने भगवान शिव को प्रसन्न किया। जिसके चलते शिव ने उसे अपने शक्तिशाली हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए एक फरसा दिया। एक महान योद्धा होने के नाते, परशुराम जीवन भर मानवता के अधिकारों के लिए जीते रहे। मान्यता के अनुसार परशुराम जन्मदिवस का दिन इतना पवित्र होता है कि, इस दिन किए गए किसी भी कार्य का फल मिलता है। *परशुराम का अर्थ...* परशु शब्द का अर्थ है 'कुल्हाड़ी/फरसा' और राम भगवान राम के प्रतीक हैं। इसलिए, इस शब्दों को एक साथ जोड़ने का मतलब है, भगवान राम फरसे के साथ... भगवान परशुराम भगवान विष्णु के 6 वें अवतार थे जिन्होंने इसे क्रूर क्षत्रियों के अत्याचारों से बचाने के लिए पृथ्वी पर जन्म लिया। जिस दिन परशुराम अवतरित हुए थे उस दिन को परशुराम जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन देश के अधिकांश हिस्सों में अक्षय तृतीया के रूप में भी प्रसिद्ध है और मनाया जाता है। सनातन धर्म में भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। फरसे के साथ राम के नाम से लोकप्रिय, परशुराम शक्ति, ज्ञान और नैतिकता के प्रतीक हैं। भगवान परशुराम किसी समाज विशेष के आदर्श ही नहीं है, बल्कि वे संपूर्ण हिन्दू समाज के हैं और उन्हें चिरंजीवी माना जाता है। इनका जन्म समय सतयुग और त्रेता का संधिकाल माना जाता है। उन्हें सतयुग में जब एक बार गणेशजी ने परशुराम को शिव दर्शन से रोक लिया तो, रुष्ट परशुराम ने उन पर परशु प्रहार कर दिया, जिससे गणेश का एक दांत टूट गया और वे एकदंत कहलाए। वहीं भगवान विष्णु के सातवें अवतार राम के काल यानि त्रेता युग में वे सीता स्वयंवर में सामने आए,मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान राम ने जब शिव धनुष को तोड़ा तो परशुराम जी महेंद्र पर्वत पर तपस्या में लीन थे, लेकिन जैसे ही उन्हें धनुष टूटने का पता चला तो क्रोध में आ गए। लेकिन जब उन्हें प्रभु श्रीराम के बारे में मालूम हुआ तो उन्होंने श्रीराम को प्रणाम किया बाद में श्रीराम ने परशुराम जी को अपना सुदर्शन चक्र भेट किया और बोले द्वापर युग में जब उनका अवतार होगा तब उन्हें इसकी जरूरत होगी। इसके बाद भगवान विष्णु के आठवें श्रीकृष्ण के काल यानि द्वापर युग में भी उन्हें देखा गया। द्वापर में उन्होंने कौरव-सभा में कृष्ण का समर्थन किया और इससे पहले उन्होंने श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र उपलब्ध करवाया था। इसके अलावा द्वापर में ही उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्र विद्या प्रदान की थी। मान्यता है कि वे कलिकाल के अंत में उपस्थित होंगे। ऐसा माना जाता है कि वे कल्प के अंत तक धरती पर ही तपस्यारत रहेंगे। पौराणिक कथा में वर्णित है कि महेंद्रगिरि पर्वत भगवान परशुराम की तप की जगह थी और अंतत: वह उसी पर्वत पर कल्पांत तक के लिए तपस्यारत होने के लिए चले गए थे। *परशुराम जन्मदिवस के अनुष्ठान* अन्य हिंदू त्योहारों के समान, इस दिन सूर्योदय से पहले पवित्र स्नान करना शुभ माना जाता है। स्नान करने के बाद, भक्त ताजे और साफ़ सुथरे पूजा के वस्त्र पहनते हैं। भक्त पूजा करते हैं और भगवान विष्णु को चंदन, तुलसी के पत्ते, कुमकुम, अगरबत्ती, फूल और मिठाई चढ़ाकर पूजा करते हैं। परशुराम जयंती का व्रत रखना अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन उपवास करने से भक्तों को पुत्र की प्राप्ति होती है। जो श्रद्धालु उपवास करते हैं, वे दाल या अनाज का सेवन इस दिन नहीं करते हैं और केवल दूध उत्पादों और फलों का सेवन करते हैं। *भगवान परशुराम की पूजा* इसके तहत इस दिन सुबह स्नान करने के बाद मंदिर और पूजा आसन को शुद्ध करने के बाद भगवान परशुराम जी को पुष्प और जल अर्पित करें और उनका आव्हान करें। मान्यता है कि भगवान परशुराम विष्णु के ऐसे अवतार हैं जो हनुमानजी और अश्वत्थामा की तरह सशरीर पृथ्वी पर उपस्थित हैं। परशुराम का जन्मदिन अक्षय तृतीया को आता है, अपनी भक्ति और तपस्या (तपस्या) से परशुराम जी ने भगवान शिव को प्रसन्न किया। जिसके चलते शिव ने उसे अपने शक्तिशाली हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए एक फरसा दिया। एक महान योद्धा होने के नाते, परशुराम जीवन भर मानवता के अधिकारों के लिए जीते रहे। मान्यता के अनुसार परशुराम जयंती का दिन इतना पवित्र होता है कि, इस दिन किए गए किसी भी कार्य का फल मिलता है। इसलिए, माना जाता है कि परशुराम जन्मोत्सव यानि अक्षय तृतीया वह दिन है जब आप कोई कार्य, नया उपक्रम या शुभ कार्य कर सकते हैं। *भगवान परशुराम के जन्म से जुड़ी कथाएं...* हरिवंश पुराण में दी गई कथा के अनुसार, एक समय 'महिष्मती नगरी ’के नाम से एक शहर था। शहर का शासक कार्तवीर्य अर्जुन था, जो एक क्रूर राजा था। उसकी यातना से परेशान होकर एक बार देवी पृथ्वी भगवान विष्णु से मदद मांगने गईं। इस पर, भगवान विष्णु ने उन्हें यह कहते हुए सांत्वना दी कि वह महर्षि जमदग्नि के पुत्र के रूप में जन्म लेने के बाद उसके साम्राज्य को समाप्त कर देंगे। उनके शब्दों को ध्यान में रखते हुए, भगवान ने जमदग्नि के घर में जन्म लिया और भगवान परशुराम के रूप में अवतार लेकर उसके साम्राज्य का अंत किया। वैसे तो भगवान परशुराम के जन्मस्थान को लेकर कई बातें कहीं जाती हैं, लेकिन... : एक किंवदंती के अनुसार मध्यप्रदेश के इंदौर के पास स्थित महू से कुछ ही दूरी पर स्थित यशवंतपुर के आगे जानापाव की पहाड़ी पर भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। यहां पर परशुराम के पिता ऋर्षि जमदग्नि का आश्रम था। कहते हैं कि प्राचीन काल में इंदौर के पास ही मुंडी गांव में स्थित रेणुका पर्वत पर माता रेणुका रहती थीं। पवित्र तीर्थ जानापाव से दो दिशा में नदियां बहतीं हैं। यह नदियां चंबल में होती हुईं यमुना और गंगा से मिलती हैं और बंगाल की खाड़ी में जाता है। कारम में होता हुआ नदियों का पानी नर्मदा में मिलता है। यहां 7 नदियां चोरल, मोरल, कारम, अजनार, गंभीर, चंबल और उतेड़िया नदी मिलती हैं। हर साल यहां कार्तिक और क्वांर के माह में मेला लगता है। : एक अन्य मान्यता अनुसार उत्तर प्रदेश में शाहजहांपुर के जलालाबाद में जमदग्नि आश्रम से करीब दो किलोमीटर पूर्व दिशा में हजारों साल पुराने मन्दिर के अवशेष मिलते हैं जिसे भगवान परशुराम की जन्मस्थली कहा जाता है। महर्षि ऋचीक ने महर्षि अगत्स्य के अनुरोध पर जमदग्नि को महर्षि अगत्स्य के साथ दक्षिण में कोंकण प्रदेश मे धर्म प्रचार का कार्य करने लगे। कोंकण प्रदेश का राजा जमदग्नि की विद्वता पर इतना मोहित हुआ कि उसने अपनी पुत्री रेणुका का विवाह इनसे कर दिया। इन्ही रेणुका के पांचवें गर्भ से भगवान परशुराम जी का जन्म हुआ। जमदग्नि ने गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के बाद धर्म प्रचार का कार्य बन्द कर दिया और राजा गाधि की स्वीकृति लेकर इन्होंने अपना जमदग्नि आश्रम स्थापित किया और अपनी पत्नी रेणुका के साथ वहीं रहने लगे। राजा गाधि ने वर्तमान जलालाबाद के निकट की भूमि जमदग्नि के आश्रम के लिए चुनी थी। जमदग्नि ने आश्रम के निकट ही रेणुका के लिए कुटी बनवाई थी आज उस कुटी के स्थान पर एक अति प्राचीन मन्दिर बना हुआ है जो आज 'ढकियाइन देवी' के नाम से सुप्रसिद्ध है। 'ढकियाइन' शुद्ध संस्कृत का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है वह देवी जिसका जन्म दक्षिण में हुआ हो। रेणुका कोंकण नरेश की पुत्री थी तथा कोंकण प्रदेश दक्षिण भारत में स्थित है। यह वही पवित्र भूमि है जिस पर भगवान परशुराम पैदा हुए थे। जलालाबाद से पश्चिम करीब दो किलोमीटर दूर माता रेणुका देवी तथा ऋषि जमदग्नि की मूर्तियों वाला अति प्राचीन मन्दिर इस आश्रम में आज भी मौजूद है तथा पास में ही कई एकड़ मे फैली जमदग्नि नाम की बह रही झील भगवान परशुराम के जन्म इसी स्थान पर होने की प्रामाणिकता को और भी सिद्ध करती है। : वहीं भृगुक्षेत्र के शोधकर्ता साहित्यकार शिवकुमार सिंह कौशिकेय के अनुसार परशुराम का जन्म वर्तमान बलिया के खैराडीह में हुआ था। उन्होंने अपने शोध और खोज में अभिलेखिय और पुरातात्विक साक्ष्यों को प्रस्तुत किया हैं। श्रीकौशिकेय अनुसार उत्तर प्रदेश के शासकीय बलिया गजेटियर में इसका चित्र सहित संपूर्ण विवरण मिल जाएगा। 1981 ई. में बीएचयू के प्रोफेसर डॉ. केके सिन्हा की देखरेख में हुई पुरातात्विक खुदाई में यहां 900 ईसा पूर्व के समृद्ध नगर होने के प्रमाण मिले थे। ऐतिहासिक, सांस्कृतिक धरोहर पाण्डुलिपि संरक्षण के जिला समन्वयक श्रीकौशिकेय द्वारा की गई इस ऐतिहासिक खोज से वैदिक ॠषि परशुराम की प्रामाणिकता सिद्ध होने के साथ-साथ इस कालखण्ड के ॠषि-मुनियों वशिष्ठ, विश्वामित्र, पराशर, वेदव्यास के आदि के इतिहास की कड़ियां भी सुगमता से जुड़ जाती है। *भगवान परशुराम की आरती और स्तुति...* *भगवान परशुराम की आरती-* शौर्य तेज बल-बुद्धि धाम की॥ रेणुकासुत जमदग्नि के नंदन। कौशलेश पूजित भृगु चंदन॥ अज अनंत प्रभु पूर्णकाम की। आरती कीजे श्री परशुराम की॥ नारायण अवतार सुहावन। प्रगट भए महि भार उतारन॥ क्रोध कुंज भव भय विराम की। आरती कीजे श्री परशुराम की॥ परशु चाप शर कर में राजे। ब्रह्मसूत्र गल माल विराजे॥ मंगलमय शुभ छबि ललाम की। आरती कीजे श्री परशुराम की॥ जननी प्रिय पितृ आज्ञाकारी। दुष्ट दलन संतन हितकारी॥ ज्ञान पुंज जग कृत प्रणाम की। आरती कीजे श्री परशुराम की॥ परशुराम वल्लभ यश गावे। श्रद्घायुत प्रभु पद शिर नावे॥ छहहिं चरण रति अष्ट याम की। आरती कीजे श्री परशुराम की॥ : ऊॅं जय परशुधारी, स्वामी जय परशुधारी। ऊॅं जय परशुधारी, स्वामी जय परशुधारी। सुर नर मुनिजन सेवत, श्रीपति अवतारी।। ऊॅं जय।। जमदग्नी सुत नरसिंह, मां रेणुका जाया। मार्तण्ड भृगु वंशज, त्रिभुवन यश छाया।। ऊॅं जय।। कांधे सूत्र जनेऊ, गल रुद्राक्ष माला। चरण खड़ाऊँ शोभे, तिलक त्रिपुण्ड भाला।। ऊॅं जय।। ताम्र श्याम घन केशा, शीश जटा बांधी। सुजन हेतु ऋतु मधुमय, दुष्ट दलन आंधी।। ऊॅं जय।। मुख रवि तेज विराजत, रक्त वर्ण नैना। दीन-हीन गो विप्रन, रक्षक दिन रैना।। ऊॅं जय।। कर शोभित बर परशु, निगमागम ज्ञाता। कंध चार-शर वैष्णव, ब्राह्मण कुल त्राता।। ऊॅं जय।। माता पिता तुम स्वामी, मीत सखा मेरे। मेरी बिरत संभारो, द्वार पड़ा मैं तेरे।। ऊॅं जय।। अजर-अमर श्री परशुराम की, आरती जो गावे। पूर्णेन्दु शिव साखि, सुख सम्पति पावे।। ऊॅं जय।। *परशुरामजी स्तुति* कुलाचला यस्य महीं द्विजेभ्यः प्रयच्छतः सोमदृषत्त्वमापुः। बभूवुरुत्सर्गजलं समुद्राः स रैणुकेयः श्रियमातनीतु॥ नाशिष्यः किमभूद्भवः किपभवन्नापुत्रिणी रेणुका, नाभूद्विश्वमकार्मुकं किमिति यः प्रीणातु रामत्रपा। विप्राणां प्रतिमंदिरं मणिगणोन्मिश्राणि दण्डाहतेर्नांब्धीनो, स मया यमोऽर्पि महिषेणाम्भांसि नोद्वाहितः॥ पायाद्वो यमदग्निवंश तिलको वीरव्रतालंकृतो, रामो नाम मुनीश्वरो नृपवधे भास्वत्कुठारायुधः। येनाशेषहताहिताङरुधिरैः सन्तर्पिताः पूर्वजा, भक्त्या चाश्वमखे समुद्रवसना भूर्हन्तकारीकृता॥ द्वारे कल्पतरुं गृहे सुरगवीं चिन्तामणीनंगदे पीयूषं, सरसीषु विप्रवदने विद्याश्चस्रो दश॥ एव कर्तुमयं तपस्यति भृगोर्वंशावतंसो मुनिः , पायाद्वोऽखिलराजकक्षयकरो भूदेवभूषामणिः॥ _॥ इति श्री परशुराम स्तुति ॥_ *परशुराम जन्मदिवस समारोह...* परशुराम जन्मदिवस को हिंदू समुदाय द्वारा उत्साह और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह दिन हिंदूओं के लिए प्रमुख दिनों में से एक है और ऐसे में परशुराम जन्मोत्सव के तहत इस दिन निम्नलिखित गतिविधियां की जाती हैं: : भक्त भगवान परशुराम के सम्मान में परशुराम शोभा यात्रा का आयोजन करते हैं। : हवन, सत्संग और कथा भी की जाती हैं। : प्रसाद (पवित्र भोजन) और अन्य खाद्य पदार्थों के साथ लोगों की सेवा के लिए भंडारों का आयोजन भी किया जाता है। : भगवान परशुराम का सम्मान करने के लिए, कुछ लोगों द्वारा उपवास भी रखा जाता है। भगवान विष्णु की भक्ति में देश के कई क्षेत्रों में भक्ति कार्यक्रम देखे जाते हैं। वहीं इस बार लॉकडाउन के चलते सभी लोग घरों में ही भगवान श्री परशुराम की पूजा कर उनका जन्मोत्सव मनाएंगे। 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 आप सभी को भगवान परशुराम जी के जन्मदिवस की अग्रिम शुभकामनाएं. 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

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🙏मृत्यु,के बाद क्या होता है,श्रीमदभगवत गीता🙏 भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को गीता का ज्ञान दे रहे हैं,,, अर्जुन पूछता है – हे त्रिलोकीनाथ! आप आवागमन अर्थात पुनर्जन्म के बारे में कह रहे हैं, इस सम्बन्ध में मेरा ज्ञान पूर्ण नहीं है। यदि आप पुनर्जन्म की व्याख्या करें तो कृपा होगी। कृष्ण बताते हैं – इस सृष्टि के प्राणियों को मृत्यु के पश्चात् अपने-अपने कर्मों के अनुसार पहले तो उन्हें परलोक में जाकर कुछ समय बिताना होता है जहाँ वो पिछले जन्मों में किये हुए पुण्यकर्मों अथवा पापकर्म का फल भोगते हैं। फिर जब उनके पुण्यों और पापों के अनुसार सुख दुःख को भोगने का हिसाब खत्म हो जाता है तब वो इस मृत्युलोक में फिर से जन्म लेते हैं। इस मृत्युलोक को कर्मलोक भी कहा जाता है। क्योंकि इसी लोक में प्राणी को वो कर्म करने का अधिकार है जिससे उसकी प्रारब्ध बनती है। अर्जुन पूछते हैं – हे केशव! हमारी धरती को मृत्युलोक क्यों कहा जाता है? कृष्ण बताते हैं – क्योंकि हे अर्जुन, केवल इसी धरती पर ही प्राणी जन्म और मृत्यु की पीड़ा सहते हैं। अर्जुन पूछता है – अर्थात दूसरे लोकों में प्राणी का जन्म और मृत्यु नहीं होती? कृष्ण बताते हैं – नहीं अर्जुन! उन लोकों में न प्राणी का जन्म होता है और न मृत्यु। क्योंकि मैंने तुम्हें पहले ही बताया था कि मृत्यु केवल शरीर की होती है, आत्मा की नहीं। आत्मा तो न जन्म लेती है और न मरती है। अर्जुन फिर पूछते हैं – तुमने तो ये भी कहा था कि आत्मा को सुख-दुःख भी नहीं होते। परन्तु अब ये कह रहे हो कि मृत्यु के पश्चात आत्मा को सुख भोगने के लिए स्वर्ग आदि में अथवा दुःख भोगने के लिए नरक आदि में जाना पड़ता है। तुम्हारा मतलब ये है कि आत्मा को केवल पृथ्वी पर ही सुख दुःख नहीं होते, स्वर्ग अथवा नरक में आत्मा को सुख या दुःख भोगने पड़ते हैं। कृष्ण बताते हैं – नहीं अर्जुन! आत्मा को कहीं, किसी भी स्थान पर या किसी काल में भी सुख दुःख छू नहीं सकते। क्योंकि आत्मा तो मुझ अविनाशी परमेश्वर का ही प्रकाश रूप है। हे अर्जुन! मैं माया के आधीन नहीं, बल्कि माया मेरे आधीन है और सुख दुःख तो माया की रचना है। इसलिए जब माया मुझे अपने घेरे में नहीं ले सकती तो माया के रचे हुए सुख और दुःख मुझे कैसे छू सकते हैं। सुख दुःख तो केवल शरीर के भोग हैं, आत्मा के नहीं। अर्जुन कहता है – हे केशव! लगता है कि तुम मुझे शब्दों के मायाजाल में भ्रमा रहे हो। मान लिया कि सुख दुःख केवल शरीर के भोग हैं, आत्मा इनसे अलिप्त है। फिर जो शरीर उनको भोगता है उसकी तो मृत्यु हो जाती है। वो शरीर तो आगे नहीं जाता, फिर स्वर्ग अथवा नरक में सुख दुःख को भोगने कौन जाता है? अर्जुन पूछता है – जीव आत्मा? ये जीव आत्मा क्या है केशव! कृष्ण कहते हैं – हाँ पार्थ! जीव आत्मा। देखो, जब किसी की मृत्यु होती है तो असल में ये जो बाहर का अस्थूल शरीर है केवल यही मरता है। इस अस्थूल शरीर के अंदर जो सूक्ष्म शरीर है वो नहीं मरता। वो सूक्ष्म शरीर आत्मा के प्रकाश को अपने साथ लिए मृत्युलोक से निकलकर दूसरे लोकों को चला जाता है। उसी सूक्ष्म शरीर को जीवात्मा कहते हैं। अर्जुन पूछता है – इसका अर्थ है- जब आत्मा एक शरीर को छोड़कर जाती है तो साथ में जीवात्मा को भी ले जाती है? कृष्ण कहते हैं – नहीं अर्जुन! ये व्याख्या इतनी सरल नहीं है। देखो, जैसे समुद्र के अंदर जल की एक बून्द समुद्र से अलग नहीं है उसी महासागर का एक हिस्सा है वो बून्द अपने आप सागर से बाहर नहीं जाती, हाँ! कोई उस जल की बून्द को बर्तन में भरकर ले जाये तो वो समुद्र से अलग दिखाई देती है, इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर रूपी जीवात्मा उस आत्म ज्योति के टुकड़े को अपने अंदर रखकर अपने साथ ले जाता है। यही जीवात्मा की यात्रा है जो एक शरीर से दूसरे शरीर में, एक योनि से दूसरी योनि में विचरती रहती है। इस शरीर में सुन अर्जुन एक सूक्ष्म शरीर समाये रे, ज्योति रूप वही सूक्ष्म शरीर तो जीवात्मा कहलाये रे। मृत्यु समय जब यह जीवात्मा तन को तज कर जाये रे, धन दौलत और सगे सम्बन्धी कोई संग ना आये रे। पाप पुण्य संस्कार वृत्तियाँ ऐसे संग ले जाए रे, जैसे फूल से उसकी खुशबु पवन उड़ा ले जाए रे। संग चले कर्मों का लेखा जैसे कर्म कमाए रे, अगले जन्म में पिछले जन्म का आप हिसाब चुकाए रे। हे अर्जुन! जीवात्मा जब एक शरीर को छोड़कर जाती है तो उसके साथ उसके पिछले शरीर की वृत्तियाँ, उसके संस्कार और उसके भले कर्मों का लेखा जोखा अर्थात उसकी प्रारब्ध सूक्ष्म रूप में साथ जाती है। अर्जुन पूछते हैं – हे मधुसूदन! मनुष्य शरीर त्यागने के बाद जीवात्मा कहाँ जाता है? कृष्ण कहते हैं – मानव शरीर त्यागने के बाद मनुष्य को अपने प्रारब्ध अनुसार अपने पापों और पुण्यों को भोगना पड़ता है। इसके लिए भोग योनियाँ बनी हैं जो दो प्रकार की हैं- उच्च योनियाँ और नीच योनियाँ। स्वर्ग नर्क क्या है, श्रीमद भागवत गीता?????? एक पुण्य वाला मनुष्य का जीवात्मा उच्च योनियों में स्वर्ग में रहकर अपने पुण्य भोगता है और पापी मनुष्य का जीवात्मा नीच योनियों में, नरक में रहकर अपने पापों को भोगता है। कभी ऐसा भी होता है कि कई प्राणी स्वर्ग नरक का सुख दुःख पृथ्वी लोक पर ही भोग लेते हैं। अर्जुन पूछता है- इसी लोक में? वो कैसे? कृष्ण कहते हैं – इसे तुम यूं समझों अर्जुन कि जैसे कोई सम्पन्न मनुष्य है, महल में रहता है, उसकी सेवा के लिए दास-दासियाँ हर समय खड़ी है, उसका एक इकलौता जवान बेटा है, जिसे वो संसार में सबसे अधिक प्रेम करता है और अपने आपको संसार का सबसे भाग्यशाली मनुष्य समझता है। परन्तु एक दिन उसका जवान बेटा किसी दुर्घटना में मारा जाता है। दुखों का पहाड़ उस पर टूट पड़ता है। संसार की हर वस्तु उसके पास होने के बावजूद भी वो दुखी ही रहता है और मरते दम तक अपने पुत्र की मृत्यु की पीड़ा से मुक्त नहीं होता। तो पुत्र के जवान होने तक उस मनुष्य ने जो सुख भोगे हैं वो स्वर्ग के सुखों की भांति थे और पुत्र की मृत्यु के बाद उसने जो दुःख भोगे हैं वो नरक के दुखों से बढ़कर थे जो मनुष्य को इसी तरह, इसी संसार में रहकर भी अपने पिछले जन्मों के सुख दुःख को भोगना पड़ता है। अर्जुन पूछता है – हे मधुसूदन! अब ये बताओ कि मनुष्य अपने पुण्यों को किन-किन योनियों में और कहाँ भोगता है? कृष्ण बताते हैं – पुण्यवान मनुष्य अपने पुण्यों के द्वारा किन्नर, गन्धर्व अथवा देवताओं की योनियाँ धारण करके स्वर्ग लोक में तब तक रहता है जब तक उसके पुण्य क्षीण नहीं हो जाते। अर्जुन पूछता है – अर्थात? कृष्ण कहते हैं – अर्थात ये कि प्राणी के हिसाब में जितने पुण्य कर्म होते हैं उतनी ही देर तक उसे स्वर्ग में रखा जाता है। जब पुण्यों के फल की अवधि समाप्त हो जाती है तो उसे फिर पृथ्वीलोक में वापिस आना पड़ता है और मृत्युलोक में पुनर्जन्म धारण करना पड़ता है। प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः। शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते।। अर्थ :- वह योगभ्रष्ट पुण्यकर्म करने वालों के लोकों को प्राप्त होकर और वहाँ बहुत वर्षों तक रहकर फिर यहाँ शुद्ध श्रीमानों(धनवान) के घर में जन्म लेता है। अर्जुन पूछता है – परन्तु स्वर्ग लोक में मनुष्य के पुण्य क्यों समाप्त हो जाते हैं? वहाँ जब वो देव योनि में होता है तब वो अवश्य ही अच्छे कर्म करता होगा, उसे इन अच्छे कर्मों का पुण्य तो प्राप्त होता होगा? कृष्ण बताते हैं – नहीं अर्जुन! उच्च योनि में देवता बनकर प्राणी जो अच्छे कर्म करता है या नीच योनि में जाकर प्राणी जो क्रूर कर्म करता है, उन कर्मों का उसे कोई फल नहीं मिलता। अर्जुन पूछता है – क्यों? कृष्ण कहते हैं – क्योंकि वो सब भोग योनियाँ है। वहाँ प्राणी केवल अपने अच्छे बुरे कर्मों का फल भोगता है। इन योनियों में किये हुए कर्मों का पुण्य अथवा पाप उसे नहीं लगता। हे पार्थ! केवल मनुष्य की योनि में ही किये हुए कर्मों का पाप या पुण्य होता है क्योंकि यही एक कर्म योनि है। पाप पुण्य का लेखा जोखा कैसे होता है? अर्जुन पूछते हैं – इसका अर्थ ये हुआ यदि कोई पशु किसी की हत्या करे तो उसका पाप उसे नहीं लगेगा और यदि कोई मनुष्य किसी की अकारण हत्या करे तो पाप लगेगा? परन्तु ये अंतर क्यों? कृष्ण कहते हैं – इसलिए कि पृथ्वी लोक में समस्त प्राणियों में केवल मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो विवेकशील है, वो अच्छे बुरे की पहचान रखता है। दूसरा कोई भी प्राणी ऐसा नहीं कर सकता। इसलिए यदि सांप किसी मनुष्य को अकारण भी डस ले और वो मर जाये तो साप को उसकी हत्या का पाप नहीं लगेगा। इसी कारण दूसरे जानवरों की हत्या करता है तो उसे उसका पाप नहीं लगता या बकरी का उदाहरण लो, बकरी किसी की हत्या नहीं करती, घास फूंस खाती है, इस कारण वो पुण्य की भागी नहीं बनती। पाप पुण्य का लेखा जोखा अर्थात प्रारब्ध केवल मनुष्य का बनता है। इसलिए जब मनुष्य अपने पाप और पुण्य भोग लेता है तो उसे फिर मनुष्य की योनि में भेज दिया जाता है। ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं- क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति । एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना- गतागतं कामकामा लभन्ते ॥ अर्थ :- वे उस विशाल स्वर्गलोकके भोगोंको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकमें आ जाते हैं। इस प्रकार तीनों वेदोंमें कहे हुए सकाम धर्मका आश्रय लिये हुए भोगोंकी कामना करनेवाले मनुष्य आवागमनको प्राप्त होते हैं। अर्जुन पूछता है – अर्थात देवों की योनियों में जो मनुष्य होते हैं वो अपने सुख भोगकर स्वर्ग से भी लौट आते हैं? कृष्ण कहते हैं – हाँ! और मनुष्य की योनि प्राप्त होने पर फिर कर्म करते हैं और इस तरह सदैव जन्म मृत्यु का कष्ट भोगते रहते हैं। अर्जुन पूछता है – हे मधुसूदन! क्या कोई ऐसा स्थान नहीं, जहाँ से लौटकर आना न पड़े और जन्म मरण का ये चक्कर समाप्त हो जाये? कृष्ण बताते हैं – ऐसा स्थान केवल परम धाम है अर्थात मेरा धाम। जहाँ पहुँचने के बाद किसी को लौटकर नहीं आना पड़ता, इसी को मोक्ष कहते हैं। 🙏💞💕❤•༆$जय श्री राधे $༆•❤💖💞🙏 💖´ *•.¸♥¸.•**कुमार रौनक कश्यप**•.¸♥¸.•*´💖

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white beauty May 9, 2021

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