Manoj Prasadh
Manoj Prasadh Mar 4, 2021

श्री कृष्ण और बर्बरीक का संवाद

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Jayanti Suvarna Mar 4, 2021
Mujey tho patha he nahi thaa Kattu Shayam ji ka kahani aap ke jaraan patha laag gaya. Om Kattushayam

My Mandir Apr 11, 2021

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M.S.Chauhan Apr 10, 2021

*जय श्रीकृष्ण गोविंद* _*ईश्वर को धन्यवाद दें•••*_ *कोरोना संक्रमण से एक 93 साल का बूढ़ा व्यक्ति ठीक हुआ और जब वह अस्पताल से डिस्चार्ज होने लगा तब उसे उस अस्पताल के स्टॉफ ने एक दिन के वेंटिलेटर के इस्तेमाल करने का बिल 15000 थमा दिया जो किसी कारणवश छूट गया था।* *जिसे देखकर वह बूढ़ा व्यक्ति ज़ोर ज़ोर से रोने लगा।* *उसे रोते देख के डॉक्टर ने उस बूढ़े व्यक्ति को कहा आप रोइए मत, यदि आप यह बिल नहीं भर सकते हैं तो जाने दीजिए।* *तब उस बूढ़े व्यक्ति ने एक ऐसी बात कही जिसे सुनकर सारा स्टॉफ रोने लग गया।* *उसने कहा कि मैं बिल की रकम पर नहीं रो रहा और न ही मैं इसे चुकाने में असमर्थ हूँ, मैं यह बिल भर सकता हूँ।* *मैं तो इसलिये रो रहा हूँ कि मैं 93 साल से ये सांसें ले रहा हूँ किन्तु मैंने कभी भी उसकी पेमेंट नहीं की। यदि एक दिन के सांस लेने की कीमत 15000 है तो* *आपको पता है कि मुझे परमेश्वर को कितनी रकम चुकानी है ? इसके लिए मैंने कभी भी परमेश्वर का धन्यवाद नहीं किया।* _*परमेश्वर का बनाया हुआ यह संसार, यह शरीर, ये सांसे अनमोल हैं जिनकी पेमेंट हम उसका धन्यवाद, उसकी स्तुति, महिमा और उपासना करके कर सकते हैं ।*_ *हर क्षण उस सदगुरु का धन्यवाद कहिए जिसने ईश्वर द्वारा बख्शीश में दी गई हर एक सांस का महत्व बताया* *🙏🏻ॐ परमात्मने नमः🚩* 🌷😷💖🙏💖😷🌷

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M.S.Chauhan Apr 11, 2021

*हिन्दू नव वर्ष की अग्रिम हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं,* *◆◆◆ “रामायण” क्या है??* *●अगर कभी पढ़ो और समझो तो आंसुओ पे काबू रखना......*. *◆रामायण का एक छोटा सा वृतांत है, उसी से शायद कुछ समझा सकूँ... !* *●एक रात की बात हैं, माता कौशल्या जी को सोते में अपने महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी*। *नींद खुल गई, पूछा कौन हैं* ? *मालूम पड़ा श्रुतकीर्ति जी (सबसे छोटी बहु, शत्रुघ्न जी की पत्नी)हैं ।* *माता कौशल्या जी ने उन्हें नीचे बुलाया ।* *श्रुतकीर्ति जी आईं, चरणों में प्रणाम कर खड़ी रह गईं* *माता कौशिल्या जी ने पूछा, श्रुति ! इतनी रात को अकेली छत पर क्या कर रही हो बेटी ? क्या नींद नहीं आ रही ?* *शत्रुघ्न कहाँ है ?* *श्रुतिकीर्ति की आँखें भर आईं, माँ की छाती से चिपटी*, *गोद में सिमट गईं, बोलीं, माँ उन्हें तो देखे हुए तेरह वर्ष हो गए ।* *उफ !* *कौशल्या जी का ह्रदय काँप कर झटपटा गया ।* *तुरंत आवाज लगाई, सेवक दौड़े आए ।* *आधी रात ही पालकी तैयार हुई, आज शत्रुघ्न जी की खोज होगी*, *माँ चली ।* *आपको मालूम है शत्रुघ्न जी कहाँ मिले ?* *अयोध्या जी के जिस दरवाजे के बाहर भरत जी नंदिग्राम में तपस्वी होकर रहते हैं, उसी दरवाजे के भीतर एक पत्थर की शिला हैं, उसी शिला पर, अपनी बाँह का तकिया बनाकर लेटे मिले !!* *माँ सिराहने बैठ गईं*, *बालों में हाथ फिराया तो शत्रुघ्न जी नेआँखें खोलीं*, *माँ !* *उठे, चरणों में गिरे, माँ ! आपने क्यों कष्ट किया ? मुझे बुलवा लिया होता ।* *माँ ने कहा,* *शत्रुघ्न ! यहाँ क्यों ?"* *शत्रुघ्न जी की रुलाई फूट पड़ी, बोले- माँ ! भैया राम जी पिताजी की आज्ञा से वन चले गए, भैया लक्ष्मण जी उनके पीछे चले गए, भैया भरत जी भी नंदिग्राम में हैं, क्या ये महल, ये रथ, ये राजसी वस्त्र, विधाता ने मेरे ही लिए बनाए हैं ?* *माता कौशल्या जी निरुत्तर रह गईं ।* *देखो क्या है ये रामकथा...* *यह भोग की नहीं....त्याग की कथा हैं..!!* *यहाँ त्याग की ही प्रतियोगिता चल रही हैं और सभी प्रथम हैं, कोई पीछे नहीं रहा...* *चारो भाइयों का प्रेम और त्याग एक दूसरे के प्रति अद्भुत-अभिनव और अलौकिक हैं ।* *"रामायण" जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती हैं ।* *भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी सीता माईया ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया..!!* *परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मण जी कैसे राम जी से दूर हो जाते! माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की..* *परन्तु जब पत्नी “उर्मिला” के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी, परन्तु उर्मिला को कैसे समझाऊंगा.??* *क्या बोलूँगा उनसे.?* *यहीं सोच विचार करके लक्ष्मण जी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिला जी आरती का थाल लेके खड़ी थीं और बोलीं-* *"आप मेरी चिंता छोड़ प्रभु श्रीराम की सेवा में वन को जाओ...मैं आपको नहीं रोकूँगीं। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।"* *लक्ष्मण जी को कहने में संकोच हो रहा था.!* *परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिला जी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया..!!* *वास्तव में यहीं पत्नी का धर्म है..पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही पत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे.!!* *लक्ष्मण जी चले गये परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिला ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया.!!* *वन में “प्रभु श्री राम माता सीता” की सेवा में लक्ष्मण जी कभी सोये नहीं , परन्तु उर्मिला ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया.!!* *मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण जी को “शक्ति” लग जाती है और हनुमान जी उनके लिये संजीवनी का पर्वत लेके लौट रहे होते हैं, तो बीच में जब हनुमान जी अयोध्या के ऊपर से गुजर रहे थे तो भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं.!!* *तब हनुमान जी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि, सीता जी को रावण हर ले गया, लक्ष्मण जी युद्ध में मूर्छित हो गए हैं।* *यह सुनते ही कौशल्या जी कहती हैं कि राम को कहना कि “लक्ष्मण” के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे.!!* *माता “सुमित्रा” कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं..अभी शत्रुघ्न है.!!* *मैं उसे भेज दूंगी..मेरे दोनों पुत्र “राम सेवा” के लिये ही तो जन्मे हैं.!!* *माताओं का प्रेम देखकर हनुमान जी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। परन्तु जब उन्होंने उर्मिला जी को देखा तो सोचने लगे कि, यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी हैं?* *क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं?* *हनुमान जी पूछते हैं- देवी!* *आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं...सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जायेगा।* *उर्मिला जी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणी उनकी वंदना किये बिना नहीं रह पाएगा.!!* *उर्मिला बोलीं- "* *मेरा दीपक संकट में नहीं है, वो बुझ ही नहीं सकता.!!* *रही सूर्योदय की बात तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिये, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता.!!* *आपने कहा कि, प्रभु श्रीराम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं..!* *जो “योगेश्वर प्रभु श्री राम” की गोदी में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता..!!* *यह तो वो दोनों लीला कर रहे हैं..* *मेरे पति जब से वन गये हैं, तबसे सोये नहीं हैं..* *उन्होंने न सोने का प्रण लिया था..इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं..और जब भगवान् की गोद मिल गयी तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया...वे उठ जायेंगे..!!* *और “शक्ति” मेरे पति को लगी ही नहीं, शक्ति तो प्रभु श्री राम जी को लगी है.!!* *मेरे पति की हर श्वास में राम हैं, हर धड़कन में राम, उनके रोम रोम में राम हैं, उनके खून की बूंद बूंद में राम हैं, और जब उनके शरीर और आत्मा में ही सिर्फ राम हैं, तो शक्ति राम जी को ही लगी, दर्द राम जी को ही हो रहा.!!* *इसलिये हनुमान जी आप निश्चिन्त होके जाएँ..सूर्य उदित नहीं होगा।"* *राम राज्य की नींव जनक जी की बेटियां ही थीं...* *कभी “सीता” तो कभी “उर्मिला”..!!* *भगवान् राम ने तो केवल राम राज्य का कलश स्थापित किया ..परन्तु वास्तव में राम राज्य इन सबके प्रेम, त्याग, समर्पण और बलिदान से ही आया .!!* *जिस मनुष्य में प्रेम, त्याग, समर्पण की भावना हो उस मनुष्य में राम हि बसता है...* *कभी समय मिले तो अपने वेद, पुराण, गीता, रामायण को पढ़ने और समझने का प्रयास कीजिएगा .,जीवन को एक अलग नज़रिए से देखने और जीने का सऊर मिलेगा .!!* *"लक्ष्मण सा भाई हो, कौशल्या माई हो, स्वामी तुम जैसा, मेरा रघुराइ हो..* *नगरी हो अयोध्या सी, रघुकुल सा घराना हो, चरण हो राघव के, जहाँ मेरा ठिकाना हो.. हो त्याग भरत जैसा, सीता सी नारी हो, लव कुश के जैसी, संतान हमारी हो..* *श्रद्धा हो श्रवण जैसी, सबरी सी भक्ति हो, हनुमत के जैसी, निष्ठा और शक्ति हो... "* *!! जय जय श्री राम !!* 🌷🌞💖🙏💖🌞🌷

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Jaikumar Apr 11, 2021

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Gopal Jalan Apr 12, 2021

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Vrinda S. Apr 12, 2021

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Bhavana Gupta Apr 12, 2021

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Neha Sharma, Haryana Apr 11, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 148*✳️✳️ ✳️✳️*श्री रघुनाथदास जी का गृह त्याग*✳️✳️ *गुरुर्न स स्यात् स्वजनो न स स्यात् *पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात्। *दैवं न तत् स्यान्न पतिश्च स *स्यान्न मोचयेद्य: समुपेतमृत्युम्॥ *सप्तग्राम के भूम्यधिकारी श्री गोवर्धनदास मजूमदार के पुत्र श्री रघुनाथदास जी को पाठक भूले न होंगे। शान्तिपुर में अद्वैताचार्य जी के घर पर ठहरे हुए प्रभु के उन्होंने दर्शन किये थे और प्रभु ने उन्हें मर्कट वैराग्य त्याग कर घर में ही रहते हुए भगवत-भजन करने का उपदेश दिया था और उनके गृहत्याग के अत्यन्त आग्रह करने पर प्रभु ने कह दिया था- 'अच्छा देखा जायगा। अब तो तुम घर चले आओ, हम शीघ्र ही वृन्दावन को जायँगे, यहाँ से लौटकर जब हम आ जायँ, तब जैसा उचित हो वैसा करना।' *अब जब रघुनाथ जी ने सुना की प्रभु व्रजमण्डल की यात्रा करके पुरी लौट आये हैं, तब तो वे चैतन्य चरणों के दर्शनों के लिये अत्यन्त ही लालायित हो उठे। उनका मन-मधुप प्रभु के पादप का मकरन्द पान करने के निमित्त पागल-सा हो गया, वे गौरांग का चिन्तन करते हुए ही समय को व्यतीत लगे। ऊपर से तो सभी संसारी कामों को करते रहते, किन्तु भीतर उनके हृदय में चैतन्य विरहजनित अग्नि जलती रहती। वे उसी समय सब कुछ छोड़-छाड़कर चैतन्य चरणों का आश्रय ग्रहण कर लेते, किन्तु उस समय उनके परिवार में एक विचित्र घटना हो गयी! *सप्तग्राम का ठेका पहले एक मुसलमान भूम्यधिकारी पर था। वही उस मण्डल का चौधरी था, उस पर से ही इन्हें इस इलाके का अधिकार प्राप्त हुआ था। वह प्रतिवर्ष आमदनी का चतुर्थांश अपने पास रखकर तीन अंश बादशाह के दरबार में जमा करता था। उस मण्डल की समस्त आमदनी बीस लाख रूपये सालना की थी। हिसाब से इन मजूमदार भाइयों को पंद्रह लाख राजदरबार में जमा करने चाहिये और पांच लाख अपने पास रखने चाहिये, किन्तु ये अपने कायस्थप ने के बुद्धि कौशल से बारह ही लाख जमा करते और आठ लाख स्वयं रख लेते। चिरकाल से ठेका इन्हीं पर रहने से इन्हें भूम्यधिकारी होने का स्थायी अधिकार प्राप्त हो जाना चाहिये था, क्योंकि बारह वर्ष में ठेका स्थायी हो जाता है, इस बात से उस पुराने चौधरी को चिढ़ हुई। उसने राजदरबार में अपना अधिकार दिखाते हुए इन दोनों भाइयों पर अभियोग चलाया और राजमन्त्री को अपनी ओर मिला लिया। इसीलिये इन्हें पकड़ने के लिये राजकर्मचारी आये। अपनी गिरफ्तारी समाचार सुनकर हिरण्यदास और गोवर्धनदास- दोनों भाई घर छोड़कर भाग गये। घर पर अकेले रघुनाथदास जी ही रह गये, चौधरी ने इन्हें ही गिरफ्तार करा लिया और कारावास में भेज दिया। *यहाँ इन्हें इस बात के लिये रोज डराया और धमकाया जाता था कि ये अपने ताऊ (पिता के बड़े भाई) और पिता का पता बता दें, किन्तु इन्हें उनका क्या पता था, इसलिये वे कुछ भी नहीं बता सकते थे। इससे क्रुद्ध होकर चौधरी इन्हें भाँति-भाँति की यातनाएँ देने की चेष्टा करता, बुद्धिमान और प्रत्युत्पन्नमति रघुनाथदास जी ने सोचा- 'ऐसे काम नहीं चलेगा। किसी-न-किसी प्रकार इस चौधरी को ही वश में करना चाहिये।' *ऐसा निश्चय करके वे मन-ही-मन उपाय सोचने लगे। एक दिन जब चौधरी इन्हें बहुत तंग करना चाहता था, तब इन्होंने स्वाभाविक स्नेह दर्शाते हुए अत्यन्त ही कोमल स्वर से कहा- 'चौधरी जी! आप मुझे क्यों तंग करते हैं? मेरे ताऊ, पिता और आप-तीनों भाई-भाई हैं। मैं अब तक तो आप तीनों को भाई ही समझता हूँ। आप तीनों भाई आपस में चाहे लड़ें या प्रेम से रहें, मुझे बीचे में क्यों तंग करते है? आप तो आज लड़ रहे हैं, कल फिर सभी भाई एक हो जायंगे। मैं तो जैसा उनका लड़का वैसा ही आपका लड़का। मैं तो आपको भी अपना बड़ा ताऊ ही समझता हूँ। आप कोई अनपढ़ तो हैं ही नहीं, सभी बातें जानते हैं। मेरे साथ ऐसा बर्ताव आपको शोभा नहीं देता।' *गुलाब के समान खिले हुए मुख से स्नेह और सरलता के ऐसे शब्द सुनकर चौधरी का कठोर हृदय भी पसीज गया। उसने अपनी मोटी-मोटी भुजाओं से रघुनाथदास जी को छाती से लगाया और आँखों में आंसू भरकर गद्गद कण्ठ से कहने लगा- 'बेटा ! सचमुच धन के लोभ से मैंने बड़ा पाप किया। तुम तो मरे सगे पुत्र के समान हो, आज से तुम मेरे पुत्र हुए। मैं अभी राजमन्त्री से कहकर तुम्हें छुड़वाये देता हूँ। तुम्हारे ताऊ और पिता जहाँ भी हों उन्हें खबर कर देना कि अब डर करने का कोई काम नहीं है। वे खुशी से अपने घर आकर रहें। 'यह कहकर उन्होंने राजमन्त्री से रघुनाथदास जी को मुक्त करा दिया। वे अपने घर आकर रहने लगे। अब तो उन्हें इस संसार का यथार्थ रूप मालूम पड़ गया। अब तक वे समझते थे कि इस संसार में सम्भवतया थोड़ा-बहुत सुख भी हो, किन्तु इस घटना से उन्हें पता चल गया कि संसार दु:ख और कलह का घर है। कहीं तो दीनता के दु:ख से दु:खी होकर लोग मर रहे हैं, कामपीड़ित हुए कामीजन कामिनियों के पीछे कुत्तों की भाँति घूम रहे हैं। कहीं कोई भाई से लड़ रहा है, तो किसी जगह पिता-पुत्र से कलह हो रहा है। कहीं किसी को दस-बीस गांवों की ज़मींदारी मिल गयी है या कोई अच्छी राजनौकरी या राजपदवी प्राप्त हो गयी है तो वह उसी के मद में चूर हुआ लोगों को तुच्छ समझ रहा है। *किसी की कविता की कलाकोविदों ने प्रशंसा कर दी है, तो वह अपने को ही उशना और वेदव्यास समझता है। कोई विद्या के मद में, कोई धन के मद में, कोई सम्पत्ति, अधिकार और प्रतिष्ठा के मद में चूर है। किसी का पुत्र मूर्ख है तो वह उसी की चिन्ता में सदा दु:खी बना रहता है। इसके विपरीत किसी का सर्वगुण सम्पन्न पुत्र है, तो उसे थोड़ा भी रोग होने से पिता का हृदय धड़कने लग जाता है, यदि कहीं वह मर गया तो फिर प्राणान्त के ही समान दु:ख होता है। ऐसे संसार में सुख कहाँ, शान्ति कहाँ, आनन्द तथा उल्लास कहाँ? यहाँ तो चारों ओर घोर विषण्णता, भयंकर दु:ख और भाँति-भाँति की चिन्ताओं का साम्राज्य है। सच्चा सुख तो शरीरधारी श्री गुरु के चरणों में ही है। उन्हीं के चरणों में जाकर परमशान्ति प्राप्त हो सकती है। जो प्रतिष्ठा नहीं चाहते, नेतृत्व नहीं चाहते, मान, सम्मान, बड़ाई और गुरुपने की जिनकी कामना नहीं है, जो इस संसार में नामी पुरुष बनने की वासना को एकदम छोड़ चुके हैं, उनके लिये गुरु चरणों के अतिरिक्त कोई दूसरा सुखकर, शान्तिकर, आनन्दकर तथा शीतलता प्रदान करने वाला स्थान नहीं है। इसलिये अब मैं संसारी भोगों से पूर्ण इस घर में नहीं रहूँगा। अब मैं श्रीचैतन्य चरणों का ही आश्रय ग्रहण करूँगा, उन्हीं की शान्तिदायिनी सुखमयी क्रोड में बालक की भाँति क्रीड़ा करूंगा। उनके अरुण रंगवाले सुन्दर तलुओं को अपनी जिह्वा से चाटूँगा और उसी अमृतोपम माधुरी से मेरी तृप्ति हो सकेगी। *चैतन्यचरणाम्बुजों की पावन पराग के सिवा सुख का कोई भी दूसरा साधन नहीं। यह सोचकर वे कई बार पुरी की ओर भगे भी, किन्तु धनी पिता ने अपने सुचतुर कर्मचारियों द्वारा इन्हें फिर से पकड़वा मंगवाया और सदा इनकी देख-रेख रखने के निमित्त दस-पांच पहरेदार इनके ऊपर बिठा दिये। अब ये बन्दी की तरह पहरों के भीतर रहने लगे। लोगों की आँख बचाकर ये क्षण भर को भी कहीं अकेले नहीं जा सकते। इससे इनकी विरह-व्यथा और भी अधिक बढ़ गयी। ये 'हा गौर! हा प्राणवल्लभ! 'कह-कहकर जोरों से रुदन करने लगते। कभी-कभी जोरों से रुदन करते हुए कहने लगते- 'हे हृदयरमण! इस वेदनापूर्ण सागर से कब उबारोगे? कब अपने चरणों की शरण दोगे? कब इस अधम को अपनाओगे? कब इसे अपने पास बुलाओगे ? किस समय अपनी मधुमयी अमृतवाणी से भक्ति-तत्त्व के सुधासिक्त वचनों इस हृदय की दहकती हुई ज्वाला को बुझाओगे। *हे मेरे जीवनसर्वस्व! हे मेरी बिना डाँड़की नौका के पतवार! मेरी जीर्ण-शीर्ण तरीके कैवर्तक प्रभो! मुझे इस अन्धकूप से बाँह पकड़कर बाहर निकालो।' इनके ऐसे बे-सिर-पैर के प्रलाप को सुनकर प्रेममयी माता को इनके लिये अपार दु:ख होने लगा। उन्होंने अपने पति, इनके पिता गोवर्धनदास मजूमदार से कहा- 'हमारे कुल का एकमात्र सहारा एक रघु पागल हो गया है। इसे बांधकर रखिये, ऐसा न हो यह कहीं भाग जाय।' *पिता ने मार्मिक स्वर में आह भरते हुए कहा- 'रघु को दूसरे प्रकार का पागलपन है। वह संसारी बन्धन को छिन्न-भिन्न करना चाहता है। रस्सी से बाँधने से यह नहीं रुकने का। जिसे कुबेर के समान अतुल सम्पत्ति, राजा के समान अपार सुख, अप्सरा के समान सुन्दर स्त्री और भाग्यहीनों को कभी प्राप्त न होने वाला अतुलनीय ऐश्वर्य ही जब घर में बांध ने को समर्थ नहीं है, उसे बेचारी रस्सी कितने दिनों बांधकर रख सकती है?' माता अपने पति के उत्तर से और पुत्र के पागलपन से अत्यन्त ही दु:खी हुई। पिता भलीभाँति रघुनाथ पर दृष्टि रखने लगे। *उन्हीं दिनों श्रीपाद नित्यानन्द जी ग्रामों में घूम-घूमकर संकीर्तन की धूम मचा रहे थे। वे चैतन्य प्रेम में पागल बने अपने सैकड़ों भक्तों को साथ लिये इधर-उधर घूम रहे थे। उनके उद्दण्ड नृत्य को देखकर लोग आश्चर्यचकित हो जाते, चारों ओर उनके यश और कीर्ति की धूम मच गयी। हजारों, लाखों मनुष्य नित्यानन्द प्रभु के दर्शनों के लिये आने लगे। उन दिनों गौड़ देश में 'निताई' के नाम की धूम थी। अच्छे-अच्छे सेठ-साहूकार और भूम्यधिपति इनके चरणों में आकर लोटते और ये उनके मस्तकों पर निर्भय होकर अपना चरण रखते, वे कृतकृत्य होकर लौट जाते। लाखों रूपये भेंट में आने लगे। नित्यानन्द जी खूब उदारतापूर्वक उन्हें भक्तों में बांटने लगे और सत्कर्मों में द्रव्य को व्यय करने लगे। पानीहाटी संकीर्तन का प्रधान केन्द्र बना हुआ था। वहाँ के राघव पण्डित महाप्रभु तथा नित्यानन्द जी के अनन्य भक्त थे। नित्यानन्द जी उन्हीं के यहाँ अधिक ठहरते थे। रघुनाथ जी जब नित्यानन्द जी का समाचार सुना तो वे पिता की अनुमति लेकर बीसों सेवकों के साथ पानीहाटी में उनके दर्शनों के लिये चल पड़े। उन्होंने दूर से ही गंगा जी के किनारे बहुत-से भक्तों से घिरे हुए देवराज इन्द्र के समान देदीप्यमान उच्चासन पर बैठे हुए नित्यानन्द जी को देखा। उन्हें देखते ही इन्होंने भूमि पर लोटकर साष्टांग प्रणाम किया। किसी भक्त ने कहा- श्रीपाद! हिरण्य मजूमदार के कुँवर शाह रघुनाथदास जी आये हैं, वे प्रणाम कर रहे हैं।' *'खिलखिलाते हुए नित्यानन्द जी ने कहा- 'अहा! रघु आया है? आज यह चोर जेल में से कैसे निकल भागा? इसे यहाँ आने की आज्ञा कैसे मिल गयी? फिर रघुनाथदास जी की ओर देखकर कहने लगे- 'रघु! आ, यहाँ आकर मेरे पास बैठ।' *हाथ जोड़े हुए अत्यन्त ही विनीत भाव से डरते-से सिकुड़े हुए रघुनाथदास जी सभी भक्तों के पीछे जूतियों में बैठ गये। नित्यानन्द जी ने अब रघुनाथदास जी पर अपनी कृपा की। महापुरुष धनिकों को यदि किसी काम के करने की आज्ञा दें, तो उसे उनकी परम कृपा ही समझनी चाहिये। क्योंकि धन अनित्य पदार्थ है और फिर यह एक के पास सदा स्थायी भी नहीं रहता। महापुरुष ऐसी अस्थिर वस्तु को अपनी अमोघ आज्ञा प्रदान कर स्थिर और सार्थक बना देते हैं। धन का सर्वश्रेष्ठ उपयोग ही यह है कि उसका व्यय महापुरुषों की इच्छा से हो, किन्तु सुयोग सभी के भाग्य में नहीं होता। किसी भाग्यशाली को ऐसा अमूल्य और दुर्लभ अवसर प्राप्त हो सकता है। *नित्यानन्द जी के कहने से रघुनाथदास जी ने दो-चार हजार रूपये ही खर्च किये होंगे, किन्तु इतने ही खर्च से उनका वह काम अमर हो गया और आज भी प्रतिवर्ष पानीहाटी में 'चूराउत्सव उनके इस काम की स्मृति दिला रहा है। लाखों मनुष्य उन दिनों रघुनाथदास जी के चिउरों का स्मरण करके उनकी उदारता और त्यागवृत्ति को स्मरण करके गद्गद कण्ठ से अश्रु बहाते हुए प्रेम में विभोर होकर नृत्य करते हैं। महामहिम रघुनाथदास जी सौभाग्यशाली थे, तभी तो नित्यानन्द जी ने कहा- 'रघु! आज तो तुम बुरे फंसे, अब यहाँ से सहज में ही नहीं निकल सकते। मेरे सभी साथी भक्तों को आज दही-चिउरा खिलाना होगा। 'बंगाल तथा बिहार में चिउरा को सर्वश्रेष्ठ भोजन समझते हैं! पता नहीं, वहाँ के लोगों को उनमें क्या स्वाद आता है? चिउरा कच्चे धानों को कूटकर बनाये जाते हैं और उन्हें दही में भिगोकर खाते हैं। बहुत-से लोग दूध में भी चिउरा खाते हैं। दही-चिउरा ही सर्वश्रेष्ठ भोजन है। इसके दो भेद हैं- दही-चिउरा और 'चिउरा-दही'। जिसमें चिउरा के साथ यथेष्ट दही-चीनी दी जाय उसे तो 'दही-चिउरा' कहते हैं और जहाँ दही-चीनी का संकोच हो और चिउरा अधिक होने के कारण पानी में भिगोकर दही-चीनी में मिलाये जायँ वहाँ उन्हें 'चिउरा-दही' कहते हैं। बहुत-से लोग तो पहले चिउरों को दूध में भिगो लेते हैं, फिर उन्हें दही-चीनी से खाते हैं। अजीब स्वाद है। भिन्न-भिन्न प्रान्तों के भिन्न-भिन्न पदार्थों के साथ स्वाद भी भिन्न-भिन्न हैं। एक बात और। चिउरों में छूत-छात नहीं। जो ब्राह्मण किसी के हाथ की बनी पूड़ी तो क्या फलाहारी मिठाई तक नहीं खाते वे भी 'दही-चिउरा, अथवा' चिउरा-दही' को मजे में खा लेते हैं। *नित्यानन्द जी की आज्ञा पाते ही रघुनाथदास जी ने फौरन आदमियों को इधर-उधर भेजा। बोरियों में भरकर मनों बढिया चिउरा आने लगे। इधर-उधर से दूध-दही के सैकड़ों घड़ों को सिर पर रखे हुए सेवक आ पहुँचे। जो भी सुनता वही चिउरा-उत्सव देखने के लिये दौड़ा आता। इस प्रकार थोड़ी ही देर में वहाँ एक बड़ा भारी मेला-सा लग गया। चारों ओर मनुष्यों के सिर-ही-सिर दीखते थे। सामने सैकड़ों घड़ों में दूध-दही भरा हुआ रखा था। हजारों बड़े-बड़े मिट्टी के कुल्हड़ दही-चिउरा खाने के लिये रखे थे। दूध और दही के अलग-अलग चिउरा भिगोये गये। दही में कपूर, केसर आदि सुगन्धित द्रव्य मिलाये गये; केला, सन्देश, नारिकेल आदि भी बहुत-से मंगाये गये। जो भी वहाँ आया सभी को दो-दो कुल्हड़ दिये गये। नित्यानंद ने महाप्रभु का आह्वान किया किया। नित्यानंद जी ऐसा प्रतीत हुआ, मानो प्रत्यक्ष श्रीचैतन्य चिउरा-उत्सव देखने के लिए आये हैं। उन्होंने उनके के लिए अलग पात्रों में चिउरा परोसे और 'हरि-हरि' ध्वनि के साथ सभी को प्रसाद पाने की आज्ञा दी। पचासों आदमी परोस रहे थे। जिसे जहाँ जगह मिली, वह वहीं बैठकर प्रसाद पाने लगा, सभी को उस दिन के चिउरों में एक प्रकार के दिव्य स्वाद का अनुभव हुआ, सभी ने खूब तृप्त हो कर प्रसाद पाया। शाम तक जो भी आता रहा, उसे ही प्रसाद देते रहे। रघुनाथदास जी को नित्यानंद जी का उच्छिष्ट प्रसाद मिला। उस दिन राघव पण्डित के यहाँ नित्यानंद जी का भोजन बना था। उसे सभी भक्तों ने मिलकर शाम को पाया। रघुनाथदास उस दिन वहीं राघव पण्डित के घर रहे। *दूसरे दिन उन्होंने नित्यानंदजी के चरणों मे प्रणाम करके उनसे आज्ञा माँगी। नित्यानन्द जी ने 'चैतन्यचरणप्राप्ति' का आशीर्वाद दिया। इस आशीर्वाद को पाकर रघुनाथदास जी को परम प्रसन्नता हुई। उन्होंने राघव पण्डित को बुलाया और भक्तों को कुछ भेंट करने की इच्छा प्रकट की। राघव पण्डित ने उन्हें सहर्ष सम्मति दे दी। तब रघुनाथ जी ने नित्यानंद जी के भण्डारी को बुलाकर सौ रुपये और सात तौला सोना नित्यानन्द जी के लिए दे दिया और उसे कहे दिया कि हम चले जायँ, तब प्रभु यह बात प्रकट हो। फिर सभी भक्तों को बुलाकर यथायोग्य उन्हें दस, पाँच, बीस या पचास रुपये भेंट दे-देकर सभी की चरणवंदना की। चलते समय राघव पण्डित को भी वे सौ रुपये और दो तौला सोना दे गये। इस प्रकार यथायोग्य पूजा करके रघुनाथदास जी अपने घर लौट आये। *वे शरीर से तो लौट आये, किंतु उनका मन नीलाचल में प्रभु के पास पहुँच गया। अब उन्हें नीलाचल के सिवा कुछ सुझता ही नही था। जब उन्होंने सुना कि गौड़ देश के सैकड़ों भक्त सदा की भाँति रथ यात्रा के उपलक्ष्य से श्रीचैतन्य-चरणों में चार महीने निवास करने के निमित्त नीलाचल जा रहे हैं, तब तो उनकी उत्सुकता परिधि को पार कर गयी, किंतु वे सबके साथ प्रकटरूप से नीलाचल जा ही कैसे सकते थे? इसलिये वे किसी दिन एकान्त में छिपकर घर से भागने का उद्योग करने लगे। समय आने पर प्रारब्ध सभी सुरोगों को स्वयं ही लाकर उपस्थित कर देता है। एक दिन अरुणोदय के समय रघुनाथ जी के गुरु तथा आचार्य यदुनंदन जी उनके पास आये। *प्रभु ने हंसकर कहा-'कहीं अपने दुष्कर्म का फल भोग रहा होगा।' तब उन्होंने उस वैष्णव के मुख से जो बात सुनी थी, वह कह सुनायी। इसके पूर्व ही भक्तों को हरिदास जी की आवाज एकान्त में प्रभु के समीप सुनायी दी थी, मानो वे सूक्ष्म-श्रीर से प्रभु को गायन सुना रहे हों। तब बहुतों ने यही अनुमान किया था कि हरिदास ने विष खाकर या और किसी भाँति आत्मघात कर लिया है और उसी के परिणामस्वरूप उसे प्रेतयोनि प्राप्त हुई है या ब्रह्मराक्षस हुआ है, उसी शरीर से वह प्रभु को गायन सुनाता है। किन्तु कई भक्तों ने कहा- 'जो इतने दिन प्रभु की सेवा में रहा हो और नित्य श्री कृष्ण कीर्तन करता रहा हो, उसकी ऐसी दुर्गति होना सम्भव नहीं। अवश्य ही वह गन्धर्व बनकर अलक्षित भाव से प्रभु को गायन सुना रहा है। 'आज श्रीवास पण्डित से निश्चित रूप से हरिदास जी की मृत्यु का समाचार सुनकर सभी को परम आश्चर्य हुआ और सभी उनके गुणों का बखान करने लगे। प्रभु ने दृढ़ता युक्त प्रसन्नता के स्वर में कहा-'साधु होकर स्त्रियों से संसर्ग रखने वालों को ऐसा ही प्रायश्चित ठीक भी हो सकता है। हरिदास ने अपने पाप के उपयुक्त ही प्रायश्चित किया।' *नित्यानन्द ने महाप्रभु का आह्मन किया! नित्यानन्द जी को ऐसा प्रतीत हुआ, मानो प्रत्यक्ष श्री चैतन्य चिउरा-उत्सव देखने के लिये आये हैं। उन्होंने उनके लिये अलग पात्रों में चिउरा परोसे और 'हरि-हरि' ध्वनि के साथ सभी को प्रसाद पाने की आज्ञा दी। पचासों आदमी परोस रहे थे। जिसे जहाँ जगह मिली, वही वहीं बैठकर प्रसाद पाने लगा, सभी को उस दिन के चिउरों में एक प्रकार के दिव्य स्वाद का अनुभव हुआ, सभी ने खूब तृप्त होकर प्रसार पाया। शाम तक जो भी आता रहा, उसे ही प्रसाद देते रहे। रघुनाथदास जी को नित्यानन्द जी का उच्छिष्ट प्रसार मिला। उस दिन राघव पण्डित के यहाँ नित्यानन्द जी का भोजन बना था। उसे सभी भक्तों ने मिलकर शाम को पाया। रघुनाथदास उस दिन वहीं राघव पण्डित के घर रहे। *दूसरे दिन उन्होंने नित्यानन्द जी के चरणों में प्रणाम करके उनसे आज्ञा मांगी। नित्यानन्द जी ने 'चैतन्यचरणप्राप्ति' का आशीर्वाद दिया। इन आशीर्वाद को पाकर रघुनाथदास जी को परम प्रसन्नता हुई। उन्होंने राघव पण्डित को बुलाया और भक्तों को कुछ भेंट करने की इच्छा प्रकट की। राघव पण्डित उन्हें सहर्ष सम्मति दे दी। तब रघुनाथदास जी ने नित्यानन्द के भण्डारी को बुलाकर सौ रूपये और सात तोला सोना नित्यानन्द जी के लिये दिया और उससे कह दिया कि हम चले जाये, तब प्रभु पर यह बात प्रकट हो। फिर सभी भक्तों को बुलाकर यथायोग्य उन्हें दस, पांच, बीस या पचास रूपये भेंट दे-देकर सभी की चरणवन्दना की। चलते समय राघव पण्डित को भी वे सौ रूपये और दो तोला सोना दे गये। इस प्रकार सभी की यथायोग्य पूजा करके रघुनाथदास जी अपने घर लौट आये। *वे शरीर से तो लौटा आये, किन्तु उनका मन नीलाचल में प्रभु के पास पहुँच गया। अब उन्हें नीलाचल के सिवा कुछ सूझता नहीं था। जब उन्होंने सुना कि गौड़ देश के सैकड़ों भक्त सदा की भाँति रथ यात्रा के उपलक्ष्य से श्रीचैतन्य-चरणों में चार महीने निवास करने के निमित्त नीलाचल जा रहे हैं, तब तो उनकी उत्सुकता परिधि को पार कर गयी, किन्तु वे सबके साथ प्रकट रूप से नीलाचल जा ही कैसे सकते थे? इसलिये वे किसी दिन एकान्त में छिपकर घर से भागने का उद्योग करने लगे। *समय आने पर प्रारब्ध सभी सुयोगों को स्वयं ही लाकर उपस्थित कर देता है। एक दिन अरुणोदय के समय रघुनाथ जी के गुरु तथा आचार्य यदुनन्दन जी उनके पास आये। उन्हें देखते ही रघुनाथदास जी ने उन्हें भक्ति भाव से प्रणाम किया। आचार्य ने स्नेह के साथ इनके कन्धे पर हाथ रखकर कहा- 'भैया रघु! तुम उस पुजारी को क्यों नही समझाते? वह चार-पांच दिन से हमारे यहाँ पूजा करने आया ही नहीं। यदि वह नहीं कर सकता तो किसी दूसरे ही आदमी को नियुक्त कर दो' *धीरे-धीरे रघुनाथदास जी ने कहा- 'नहीं, मैं उसे समझा दूंगा।' यह कहकर वे धीरे-धीरे आचार्य के साथ चलने लगे। उनके साथ-ही-साथ वे बड़े फाटक से बाहर आ गये। प्रात:काल समझकर रात्रि जगे हुए पहरेदार सो गये थे। रघुनाथदास जी को बाहर जाते हुए किसी ने नहीं देखा। जब वे बातें करते-करते यदुनन्दनाचार्य जी के घर के समीप पहुँच गये तब उन्होंने धीरे से कहा- 'अच्छा, तो मैं अब जाऊं?' *कुछ सम्भ्रम के साथ आचार्य ने कहा- 'हाँ, हाँ, तुम जाओ। लो, मुझे पता भी नहीं, तुम बातों-ही-बातों में यहाँ तक चले आये! तुम अब जाकर जो करने योग्य कार्य हों, उन्हें करो। 'बस, इसे ही वे गुरु-आज्ञा समझकर और अपने आचार्य महाराज की चरणवन्दना करके रास्ते को बचाते हुए एक जंगल की ओर हो लिये। *जो शरीर पर पहने थे, वही एक वस्त्र था। पास में न पानी पीने को पात्र था और न मार्गव्यय के लिये एक पैसा। बस, चैतन्यचरणों का आश्रय ही उनका पावन पाथेय था। उसे ही कल्पतरु समझकर वे निश्चिन्त भाव से पगडण्डी के रास्ते से चल पड़े। धूप-छांह की कुल भी परवा न करते हुए वे बिना खाये-पीये 'गौर-गौर' कहकर रुदन करते हुए जा रहे थे। जो घर के पास के बगीचे में भी पालकी से ही जाते थे, जिन्होंने कभी कोस भर भी मार्ग पैदल तय नहीं किया था, वे ही गोवर्धनदास मजूमदार के इकलौते लाड़िले लड़ैते लड़के कुवँर रघुनाथदास आज पंद्रह कोस- 30 मील शाम तक चले और शाम को एक ग्वाले के घर में पड़ रहे। भूख-प्यास का इन्हें ध्यान नहीं था। ग्वाले ने थोड़ा-सा दूध लाकर इन्हें दे दिया, उसे ही पीकर ये सो गये और प्रात:काल बहुत ही सवेरे फिर चल पड़े। वे सोचते थे, यदि पुरी जाने वाले वैष्णवों ने भी हमें देख लिया तो फिर हम पकड़े जायँगे। इसीलिये वे गांवों में न होकर पगडण्डी के रास्ते से जा रहे थे। *इधर प्रात:काल होते ही रघुनाथदास जी खोज होने लगी। रघुनाथ यहाँ, रघुनाथ वहाँ, यही आवाज चारों ओर सुनायी देने लगी। किन्तु रघुनाथ यहाँ वहाँ कहाँ? वह तो जहाँ का था वहाँ ही पहुँच गया। अब झींखते रहो। माता छटपटाने लगी, स्त्री सिर पीटने लगी, पिता आँखें मलने लगे, ताऊ बेहोश होकर भूमि पर गिर पड़े। उसी समय गोवर्धनदास मजूमदार ने पांच घुड़सवारों को बुलाकर उनके हाथों शिवानन्द सेन के पास एक पत्री पठायी कि 'रघु घर से भागकर तुम्हारे साथ पुरी जा रहा है। उसे फौरन इन लोगों के साथ लौटा दो।' घुड़सवार पत्री लेकर पुरी जाने वाले वैष्णवों के पास रास्ते में पहुँचे। पत्र पढ़कर सेन महाशय ने उत्तर लिख दिया- रघुनाथदास जी हमारे साथ नहीं आये हैं, न हमसे उनका साक्षात्कार ही हुआ। यदि वे हमें पुरी मिलेंगे तो हम आपको सूचित करेंगे।' उत्तर लेकर नौकर लौट आये। पत्र को पढ़कर रघुनाथदास जी के सभी परिवार के प्राणी शोकसागर में निमग्न हो गये। *इधर रघुनाथदास जी मार्ग की कठिनाईयों की कुछ परवा न करते हुए भूख-प्यास और सर्दी-गर्मी से उदासीन होते हुए पचीस-तीन दिन के मार्ग को केवल बारह दिनों में ही तय करके प्रभुसेवित श्री नीलाचंलपुरी में जा पहुँचे। उस समय महाप्रभु श्री स्वरूपादि भक्तों के सहित बैठे हुए कृष्ण कथा कर रहे थे। उसी समय दूर से ही भूमि पर लेटकर रघुनाथदास जी ने प्रभु के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। सभी भक्त सम्भ्रम के सहित उनकी ओर देखने लगे। किसी ने उन्हें पहचाना ही नहीं। रास्ते की थकान और सर्दी-गर्मी के कारण उनका चेहरा एकदम बदल गया था। मुकुन्द ने पहचाकर जल्दी से कहा- प्रभो! रघुनाथदास जी हैं।' *प्रभु ने अत्यन्त ही उल्लास के साथ कहा-'हां, रघु आ गया? बड़े आनन्द की बात है।' यह कहरक प्रभु ने उठकर रघुनाथदास जी का आलिंगन किया। प्रभु का प्रेमालिंगन पाते ही रघुनाथदास जी की सभी रास्ते की थकान एकदम मिट गयी। वे प्रेम में विभोर होकर रुदन करने लगे, प्रभु अपने कोमल करों से उनके अश्रु पोंछते हुए धीरे-धीरे उनके सिर पर हाथ फेरने लगे। प्रभु के सुखद स्पर्श से सन्तुष्ट होकर रघुनाथदास जी ने उपस्थित सभी भक्तों के चरणों में श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और सभी ने उनका आलिंगन किया। रघुनाथदास जी के उतरे हुए चेहरे को देखकर प्रभु ने स्वरूप दामोदर जी से कहा-'स्वरूप! देखते हो न, रघुनाथ कितने कष्ट से यहाँ आया है। इसे पैदल चलने का अभ्यास नहीं है। बेचारे को क्या काम पड़ा होगा? इनके पिता और ताऊ को तो तुम जानते ही हो। चक्रवर्ती जी (प्रभु के पूर्वाश्रम के नाना श्री नीलाम्बर चक्रवर्ती)-के साथ उन दोनों का भ्रातृभाव का व्यवहार था, इसी सम्बन्ध से ये दोनों भी हमें अपना देवता करके ही मानते हैं। घोर संसारी हैं। वैसे साधु-वैष्णवों की श्रद्धा के साथ सेवा भी करते हैं, किन्तु उनके लिये धन-सम्पत्ति ही सर्वश्रेष्ठ वस्तु है। वे परमार्थ से बहुत दूर हैं। रघुनाथ के ऊपर भगवान ने परम कृपा की, जो इसे उस अन्धकूप से निकालकर यहाँ ले आये। *रघुनाथदास जी ने धीरे-धीरे कहा- 'मैं तो इसे श्रीचरणों की ही कृपा समझता हूँ, मेरे लिये तो ये ही युगलचरण सर्वस्व हैं।' *महाप्रभु ने स्नेह के स्वर में स्वरूप गोस्वामी से कहा-'रघुनाथ को आज से मैं तुम्हें ही सौंपता हूँ। तुम्हीं आज से इनके पिता, माता, भाई, गुरु और सखा सब कुछ हो। आज से मैं इस 'स्वरूप का रघु' कहा करूंगा।' *यह कहकर प्रभु ने रघुनाथदास जी का हाथ पकड़कर स्वरूप के हाथ में दे दिया। रघुनाथदास जी ने फिर से स्वरूप दामोदर जी के चरणों में प्रणाम किया और स्वरूप गोस्वामी ने भी उन्हें आलिंगन किया। *उसी समय गोविन्द ने धीरे से रघुनाथ को बुलाकर कहा-'रास्ते में न जाने कहाँ पर कब खाने को मिला होगा, थोड़ा प्रसाद पा लो।' रघुनाथ जी ने कहा,'समुद्रस्नान और श्री जगन्नाथ जी के दर्शनों के अनन्तर प्रसाद पाऊंगा।' *यह कहकर वे समुद्रस्नान करने चले गये और वहीं से श्री जगन्नाथ जी के दर्शन करते हुए प्रभु के वासस्थान पर लौटा आये। महाप्रभु के भिक्षा कर लेने पर गोविन्द प्रभु का उच्छिष्ट महाप्रसाद रघुनाथदास जी को दिया। प्रभु का प्रसादी महाप्रसाद पाकर रघुनाथ जी वहीं निवास करने लगे। गोविन्द उन्हें नित्य महाप्रसाद दे देता था और ये उसे भक्ति-भाव से पा लेते थे। इस प्रकार ये घर छोड़कर विरक्त-जीवन बिताने लगे। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

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