aman
aman Dec 30, 2017

कैलाशगिरि दिगम्बर जैन मंदिर hounslow- london

कैलाशगिरि दिगम्बर जैन मंदिर hounslow- london

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🌹भगवान कैसे निभाते हैं सच्चे भक्त से रिश्ता🌹 🌻एक संत थे वे भगवान राम को मानते थे, कहते है यदि भगवान से निकट आना है तो उनसे कोई रिश्ता जोड़ लो। जहां जीवन में कमी है, वहीं ठाकुर जी को बैठा दो। वे जरूर उस संबंध को निभाएंगे। इसी तरह संत भी भगवान राम को अपना शिष्य मानते थे और शिष्य पुत्र के समान होता है, इसलिए माता सीता को पुत्रवधु के रूप में देखते थे। उनका नियम था रोज मंदिर जाते और अपनी पहनी माला भगवान को पहनाते थे। उनकी यह बात मंदिर के लोगो को अच्छी नहीं लगती थी। उन्होंने पुजारी से कहा- ये बाबा रोज मंदिर आते हैं और भगवान को अपनी उतारी हुई माला पहनाते हैं। उन्होंने पुजारी जी से कहा कि वे बाबा से इस बात का विरोध करें। अगले दिन बाबा मंदिर आए और पुजारी जी को माला उतार कर दी, तो पुजारी जी ने माला भगवान को पहनाने से इंकार कर दिया। साथ ही कहा कि यदि आपको माला पहनानी है तो बाजार से नई माला लेकर आएं, ये पहनी हुई माला ठाकुर जी को नहीं पहनाएंगे। वे बाजार गए और नई माला लेकर आए, आज संत मन में बड़े उदास थे। अब जैसे ही पुजारी जी ने वह नई माला भगवान श्री राम को पहनाई तुरंत वह माला टूट कर नीचे गिर गई। उन्होंने फिर जोड़कर पहनाई, माला फिर टूटकर गिर पड़ी। ऐसा तीन-चार बार किया पर भगवान ने वह माला स्वीकार नहीं की। तब पुजारी जी समझ गए कि उनसे बड़ा अपराध हो गया है और पुजारी जी ने बाबा से क्षमा मांगी। संत सीता जी को बहू मानते थे इसलिए जब भी मंदिर जाते पुजारी जी सीता जी के विग्रह के आगे पर्दा कर देते थे। भाव ये होता था कि बहू ससुर के सामने सीधे कैसे आए और बाबा केवल श्री राम जी के ही दर्शन करते थे। जब भी बाबा मंदिर आते तो बाहर से ही आवाज लगाते पुजारी जी हम आ गए और पुजारी जी झट से सीता जी के आगे पर्दा कर देते। एक दिन बाबा ने बाहर से आवाज लगायी पुजारी जी हम आ गए, उस समय पुजारी जी किसी दूसरे काम में लगे हुए थे, उन्होंने सुना नहीं, तब सीता जी ने तुरत अपने विग्रह से बाहर आईं और अपने आगे पर्दा कर दिया। जब बाबा मंदिर में आए तो यह देखकर पुजारी जी को बड़ा अश्चर्य हुआ कि सीता जी के विग्रह का पर्दा तो लगा है। पुजारी बोले- बाबा, आज आपने आवाज तो लगायी ही नहीं? बाबा बोले- पुजारी जी, मैं तो रोज की तरह आवाज लगाने के बाद ही मंदिर में आया था। यह सुनकर पुजारी जी और बाबा समझ गए कि सीता जी ने स्वयं अपने विग्रह के आगे पर्दा किया था। आज से हम मंदिर में प्रवेश ही नही करेंगे, अब बाबा रोज मंदिर के सामने से निकलते और बाहर से ही आशीर्वाद देकर चले जाते। 🌹शिक्षा : भगवान से अगर रिश्ता जोड़ लिया जाए तो वे भी संबंध को निभाते जरूर हैं। सच्चे भक्त को कभी निराश नहीं करते। 🌹 जय श्री राम 🌹 जय श्री राम 🌹 🙏🙏🙏 🙏🙏🙏

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॥ ॐ गं गणपतेय नमः ॥ ॥ जय श्री गणेशा ॥ 🌹💐Mattoo नीयत में खोट ​🍂👏🍃👏🍂👏🍃👏🍂👏 एक बुढ़िया दूसरे गांव जाने के लिए अपने घर से निकली। उसके पास एक गठरी भी थी। चलते-चलते वह थक गई। थकान की वजह से उसे गठरी का बोझ भारी लगने लगा था। तभी उसने देखा कि पीछे से एक घुड़सवार चला आ रहा है। बुढ़िया ने उसे आवाज दी। घुड़सवार पास आया और बोला, 'क्या बात है अम्मा, मुझे क्यों बुलाया.....?' बुढ़िया ने कहा, 'बेटा, मुझे सामने वाले गांव जाना है। बहुत थक गई हूं। गठरी उठाई नहीं जाती। तू भी शायद उधर ही जा रहा है। ये गठरी घोड़े पर रख ले। मुझे चलने में आसानी हो जाएगी।' घुड़सवार ने कहा, 'अम्मा, तू पैदल है। मैं घोड़े पर हूं। गांव अभी दूर है। पता नहीं तू कब तक वहां पहुंचेगी। मैं तो थोड़ी ही देर में पहुंच जाऊंगा। मुझे तो आगे जाना है। वहां क्या तेरा इंतजार करते थोड़े ही बैठा रहूंगा..?' यह कहकर वह चल पड़ा। कुछ दूर जाने के बाद वह सोचने लगा, 'मैं भी कितना मूर्ख हूं। बुढ़िया ढंग से चल भी नहीं सकती। क्या पता, उसे ठीक से दिखाई भी देता हो या नहीं? वह मुझे गठरी दे रही थी। संभव है, उसमें कीमती सामान हो। मैं उसे लेकर भाग जाता तो कौन पूछता ! बेकार ही मैंने उसे मना कर दिया।' गलती सुधारने की गरज से वह फिर बुढ़िया के पास आकर बोला,'अम्मा, लाओ अपनी गठरी। मैं ले चलता हूं। गांव में रुककर तेरी राह देखूंगा।' किंतु बुढ़िया ने कहा, 'ना बेटा, अब तू जा, मुझे गठरी नहीं देनी।' यह सुन घुड़सवार बोला, 'अभी तो तू कह रही थी कि ले चल! अब ले चलने को तैयार हुआ तो गठरी दे नहीं रही। यह उल्टी बात तुझे किसने समझाई ?' बुढ़िया मुस्कराकर बोली, 'उसी ने समझाई है जिसने तुझे यह समझाया कि बुढ़िया की गठरी ले ले। जो तेरे भीतर बैठा है, वही मेरे भीतर भी बैठा है। जब तू लौटकर आया तभी मुझे शक हो गया कि तेरी नीयत में खोट आ गयी है।' _/\_ जय श्रीहरि ॥🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹 good morning ji

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