Aman
Aman Dec 30, 2017

कैलाशगिरि दिगम्बर जैन मंदिर hounslow- london

कैलाशगिरि दिगम्बर जैन मंदिर hounslow- london

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🍁💎💓🍁💎💓🍁💎💓🍁 ♦️♦️ *रात्रि कहानी* ♦️♦️ *💥ईश्वर बहुत ही दयालु है😇☝🏻* ✍एक राजा का एक विशाल फलों का बगीचा था। उसमें तरह-तरह के फल लगते थे। उस बगीचे की सारी देख-रेख एक किसान‌‌ अपने परिवार के साथ करता था। और वो किसान हर दिन बगीचे के ताजे फल लेकर राजा‌ के राजमहल में जाता था। एक दिन किसान ने पेड़ों पर देखा, कि नारियल, अनार, अमरूद और अंगूर आदि पक कर‌‌ तैयार हो रहे हैं। फिर वो किसान सोचने लगा- कि आज कौन सा फल‌ राजा को अर्पित करूं? और उसे लगा कि आज राजा को अंगूर अर्पित करने चाहिएं, क्योंकि वो बिल्कुल पक कर तैयार हैं। फिर उसने अंगूरों की टोकरी भर ली और राजा को देने चल पड़ा। किसान जब राजमहल में पहुंचा, तो राजा किसी दूसरे ख्याल में खोया हुआ था और थोड़ी सा नाराज भी लग रहा था। किसान ने रोज की तरह मीठे रसीले अंगूरों की टोकरी राजा के सामने रख दी, और थोड़ी दूरी पर बैठ गया। अब राजा उसी ख्यालों में टोकरी में से अंगूर उठाता, एक खाता और एक खींचकर किसान के माथे पर निशाना साधकर फेंक देता। राजा का अंगूर जब भी किसान के माथे या शरीर पर लगता था, तो किसान कहता- ईश्वर बड़ा ही दयालु है। राजा फिर और जोर से अंगूर फेंकता था, और किसान फिर वही कहता- ईश्वर बड़ा ही दयालु है। थोड़ी देर बाद जब राजा को एहसास हुआ, कि वो क्या कर रहा है और प्रत्युत्तर क्या आ रहा है, तो वो संभलकर बैठ गया और फिर किसान से कहा- मैं तुम्हें बार-बार अंगूर मार रहा हूं, और ये अंगूर तुम्हें लग भी रहे हैं, पर फिर भी तुम बार-बार यही क्यों कह रहे हो- ईश्वर बड़ा ही दयालु है। किसान बड़ी ही नम्रता से बोला- राजा जी! बागान में आज नारियल, अनार, अमरुद और अंगूर आदि फल तैयार थे, पर मुझे भान हुआ कि क्यों न मैं आज आपके लिए अंगूर ले चलूं। अब लाने को तो मैं नारियल, अनार और अमरुद भी ला सकता था, पर मैं अंगूर लाया। यदि अंगूर की जगह नारियल, अनार या अमरुद रखे होते, तो आज मेरा हाल क्या होता? इसीलिए मैं कह रहा था- ईश्वर बड़ा ही दयालु है। तात्पर्य------ इसी प्रकार ईश्वर भी हमारी कई मुसीबतों को बहुत ही हल्का करके हमें उबार लेता है। पर ये तो हम ही नाशुकरे हैं जो शुक्र न करते हुए, उल्टा उसे ही गुनहगार ठहरा देते हैं। मेरे साथ ही ऐसा क्यूं हुआ? मेरा क्या कसूर था ? *नित याद करो मन से शिव को💥* 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁

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🌺🍁🌺🍁🌺🍁🌺🍁🌺 🤔 *जीवन : मीठा या खारा*❓ एक बार एक परेशान और निराश व्यक्ति अपने गुरु के पास पहुंचा और बोला– “गुरूजी मैं जिंदगी से बहुत परेशान हूँ। मेरी जिंदगी में परेशानियों और तनाव के सिवाय कुछ भी नहीं है। कृपया मुझे सही राह दिखाइये।” गुरु ने कुछ सोचकर एक गिलास में पानी भरा और उसमें मुट्ठी भर नमक डाल दिया। फिर गुरु ने उस व्यक्ति से पानी पीने को कहा। उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया। गुरु– इस पानी का स्वाद कैसा है ? “बहुत ही ख़राब है” उस व्यक्ति ने कहा। फिर गुरु उस व्यक्ति को पास के सरोवर ले गए। गुरु ने उस सरोवर में भी मुठ्ठी भर नमक डाल दिया फिर उस व्यक्ति से कहा– इसका पानी पीकर बताओ की कैसा है। उस व्यक्ति ने सरोवर का पानी पिया और बोला– गुरूजी यह पानी तो मीठा है। गुरु ने कहा– “बेटा जीवन के दुःख भी इस मुठ्ठी भर नमक के समान ही है। जीवन में दुखों की मात्रा वही रहती है– न ज्यादा न कम। लेकिन यह हम पर निर्भर करता है कि हम दुखों का कितना स्वाद लेते हैं। यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपनी सोच एवं ज्ञान को गिलास की तरह सीमित रखकर रोज खारा पानी पीते हैं या फिर उस बड़े सरोवर की तरह विशालबुद्धि बनकर मीठा पानी पीते हैं।” 😇 *सदैव प्रसन्न रहिये।* *जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।* 🌸💥🌸💥🌸💥🌸💥🌸

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🌼क्षमा करना🌼 जय माता दी 🌹🌹🌹🙏🌹🌹🌹🌹 -संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिस में अपराध बोध न हो ,और जिसने कोई गलती न की हो । भगवान अपनी शरण में आने वाले हरेक व्यक्ति की रक्षा करता है । इसलिए भगवान के चित्र के सामने या मन में भगवान से शक्ति, और विल पावर बढ़ाने की कामना करें । -दूसरों के प्रति द्वेष, घृणा या स्वयं के प्रति ,अपराध बोध इस से हम स्वयं को ही हानि पहुंचाते हैं । -दूसरों से आहत हो कर हम स्वयं को अधिक अशांत करते हैं । -जब हम स्वयं अशांत होंगे तो अपने आस पास ,तथा विश्व में शांति स्थापन की बात कैसे कर सकते हैं ! -कुछ उंच पदों पर बैठी मनुष्यात्माएं बदले की भावना से काम करती हैं, वह आप की आवाज को दबा देगीं । आप ऐसों के प्रति भी कल्याण का भाव रखो । अपने सकारात्मक काम में लगे रहो । ऐसों को सरकार या भगवान समय आने पर सुधार देगा । वो तब तक मानसिक रूप से पीड़ित रहेगी चाहे उनकी कितनी ही आरतियाँ उतारी जा रही हों । याद रखो गॉड इज ट्रुथ । मन में निष्कपट भाव नहीं तो शांति नहीं आएगी चाहे कितने ही कोई आडम्बर रच ले । -ऐसी स्थिति से बचने के लिये आप अपने को पढ़ने में व्यस्त कर दो । -क्षमा करके भी प्राय व्यक्ति उन बातों को याद रखता है, जिस से मन अशांत रहता है । भूलना आसान नहीं है परंतु भूलने के सिवा कोई चारा नहीं है । -अन्याय करने वाले के सम्बंध में किसी से भी अप शब्द न कहें , उसके लिये अच्छा बोले । नहीं तो आप के अपशब्द उस तक पंहुचा दिये जायेंगे जिस से समस्या बढ़ जायेगी । -आप अच्छे काम करने में लगे रहो, उचित सहयोग देते रहो, ज़्यादा से ज्यादा ज्ञान अर्जित करने में लगे रहो, दोषी व्यक्ति को बदलने का यह सब से कारगार तरीका हैं। ओम शांति ➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖

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जय माता 🌹🌹दी🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏 *दादी ,नानी की कहानी* *एक राजा धर्मपरायण, प्रजापालक न्याय के लिए प्रसिद्ध था। रानी अपने सहेलियों संग हर एक मौसम में नित्य प्रति गंगा स्नान करने जाती थी। जाडे का दिन था। शरीर कंपाने वाली कडाके की ठंड पड़ रही थी।रानी को गंगा स्नान के बाद जोर की ठंढ लगने लगी। तभी रानी को पास में एक गरीब की झोपड़ी दिखाई दी । बिना कुछ सोचे समझे ठंढ से बचने के लिए रानी सहेलियों से बोली कि पास के इस गरीब की झोपड़ी मे यदि आग लगा दी जाय ,तो उस जलती झोपड़ी का ताप मुझे ठंढ से राहत पहुँचा सकता है।* *रानी के आदेशानुसार झोपड़ी में आग लगा दी गयी। जलती झोपड़ी की आग से अपने शरीर को राहत पहुँचाकर रानी हँसी खुशी सहेलियों संग राज महल वापस पहुंच गई।* *अपनी जली झोपड़ी देखकर दुखी गरीब किसान अपने पत्नी एवं बच्चों को साथ लेकर राजा के यहाँ न्याय माँगने पहुँचा।* *चुकि मामला राजपरिवार से जुड़ा था। न्यायप्रिय राजा की परीक्षा की घडी थी, इसलिए राजा ने रानी को बुलवाकर उन्हे अपनी बात कहनें का पुरा मौका दिया।* *रानी बोली कि ठंढ से बचने के लिए मै झोपडी जलाने का हुक्म दिया। घास फुस की झोपडी तो थी,उसे मै नयी बनवाकर दे दूँगी। इतनी छोटी बात के लिये इतना परेशान क्यों होना?* *रानी की बात सुनकर राजा अपना निर्णय सुनाते हुए बोलै कि "रानी अपने परिश्रम से गरीब किसान की झोपडी बनायेगी। झोपडी बनाने मे राजपरिवार से कोई सहायता नही लेंगी "।* *रानी को मालुम था कि राजा के निर्णय को बदला नही जा सकता। निर्णय पर अमल करना ही होगा ।* *रानी को परिश्रम करके कमाने खाने और झोपडी बनाने के लिए एक एक पैसा बचाने मे पता चला कि एक गरीब किसान कैसे अपनी अति आवश्यक आवश्यकताओं मे कटौती करके अपना एक छोटा सा चर बनाता है।* *शिवानन्द तिवारी*

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Om namah Lakshmi Narayan Ji 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙋‍♀️🙏 प्रेरक प्रसंग (सुप्रभात)🙏 👉👀विद्वत्ता का घमंड़ 👀👈 .👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀 महाकवि कालिदास के कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था. शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था. अपार यश, प्रतिष्ठा और सम्मान पाकर एक बार कालिदास को अपनी विद्वत्ता का घमंड हो गया. . उन्हें लगा कि उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है और अब सीखने को कुछ बाकी नहीं बचा. उनसे बड़ा ज्ञानी संसार में कोई दूसरा नहीं. एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ का निमंत्रण पाकर कालिदास विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर रवाना हुए. . गर्मी का मौसम था. धूप काफी तेज़ और लगातार यात्रा से कालिदास को प्यास लग आई. थोङी तलाश करने पर उन्हें एक टूटी झोपड़ी दिखाई दी. पानी की आशा में वह उस ओर बढ चले. झोपड़ी के सामने एक कुआं भी था. . कालिदास ने सोचा कि कोई झोपड़ी में हो तो उससे पानी देने का अनुरोध किया जाए. उसी समय झोपड़ी से एक छोटी बच्ची मटका लेकर निकली. बच्ची ने कुएं से पानी भरा और वहां से जाने लगी. . कालिदास उसके पास जाकर बोले- बालिके ! बहुत प्यास लगी है ज़रा पानी पिला दे. बच्ची ने पूछा- आप कौन हैं ? मैं आपको जानती भी नहीं, पहले अपना परिचय दीजिए. कालिदास को लगा कि मुझे कौन नहीं जानता भला, मुझे परिचय देने की क्या आवश्यकता ? . फिर भी प्यास से बेहाल थे तो बोले- बालिके अभी तुम छोटी हो. इसलिए मुझे नहीं जानती. घर में कोई बड़ा हो तो उसको भेजो. वह मुझे देखते ही पहचान लेगा. मेरा बहुत नाम और सम्मान है दूर-दूर तक. मैं बहुत विद्वान व्यक्ति हूं. . कालिदास के बड़बोलेपन और घमंड भरे वचनों से अप्रभावित बालिका बोली-आप असत्य कह रहे हैं. संसार में सिर्फ दो ही बलवान हैं और उन दोनों को मैं जानती हूं. अपनी प्यास बुझाना चाहते हैं तो उन दोनों का नाम बाताएं ? . थोङा सोचकर कालिदास बोले- मुझे नहीं पता, तुम ही बता दो मगर मुझे पानी पिला दो. मेरा गला सूख रहा है. बालिका बोली- दो बलवान हैं ‘अन्न’ और ‘जल’. भूख और प्यास में इतनी शक्ति है कि बड़े से बड़े बलवान को भी झुका दें. देखिए प्यास ने आपकी क्या हालत बना दी है. . कलिदास चकित रह गए. लड़की का तर्क अकाट्य था. बड़े-बड़े विद्वानों को पराजित कर चुके कालिदास एक बच्ची के सामने निरुत्तर खङे थे. बालिका ने पुनः पूछा- सत्य बताएं, कौन हैं आप ? वह चलने की तैयारी में थी. . कालिदास थोड़ा नम्र होकर बोले-बालिके ! मैं बटोही हूं. मुस्कुराते हुए बच्ची बोली- आप अभी भी झूठ बोल रहे हैं. संसार में दो ही बटोही हैं. उन दोनों को मैं जानती हूं, बताइए वे दोनों कौन हैं ? तेज़ प्यास ने पहले ही कालिदास की बुद्धि क्षीण कर दी थी पर लाचार होकर उन्होंने फिर से अनभिज्ञता व्यक्त कर दी. . बच्ची बोली- आप स्वयं को बङा विद्वान बता रहे हैं और ये भी नहीं जानते ? एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना थके जाने वाला बटोही कहलाता है. बटोही दो ही हैं, एक चंद्रमा और दूसरा सूर्य जो बिना थके चलते रहते हैं. आप तो थक गए हैं. भूख प्यास से बेदम हैं. आप कैसे बटोही हो सकते हैं ? . इतना कहकर बालिका ने पानी से भरा मटका उठाया और झोपड़ी के भीतर चली गई. अब तो कालिदास और भी दुखी हो गए. इतने अपमानित वे जीवन में कभी नहीं हुए. प्यास से शरीर की शक्ति घट रही थी. दिमाग़ चकरा रहा था. उन्होंने आशा से झोपड़ी की तरफ़ देखा. तभी अंदर से एक वृद्ध स्त्री निकली. . उसके हाथ में खाली मटका था. वह कुएं से पानी भरने लगी. अब तक काफी विनम्र हो चुके कालिदास बोले- माते पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा. . स्त्री बोली- बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं. अपना परिचय दो. मैं अवश्य पानी पिला दूंगी. कालिदास ने कहा- मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें. स्त्री बोली- तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं. पहला धन और दूसरा यौवन. इन्हें जाने में समय नहीं लगता. सत्य बताओ कौन हो तुम ? . अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश कालिदास बोले- मैं सहनशील हूं. अब आप पानी पिला दें. स्त्री ने कहा- नहीं, सहनशील तो दो ही हैं. पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है. उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है. . दूसरे, पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं. तुम सहनशील नहीं. सच बताओ तुम कौन हो ? कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले- मैं हठी हूं. . स्त्री बोली- फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं. सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ? पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके कालिदास ने कहा- फिर तो मैं मूर्ख ही हूं. . नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो. मूर्ख दो ही हैं. पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है. . कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे. वृद्धा ने कहा- उठो वत्स ! आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी. कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए. . माता ने कहा- शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार. तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा. . कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े. 🙏🙏🙏👀जय श्री राधेकृष्ण जी 👀🙏🙏🙏 *संकलित*

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. (((( वृंदावन की रज )))) . किसी आयुर्वैदिक संस्थान से रिटायर होकर एक वैद्य जी अपनी पत्नी से बोले:- . आज तक मैं संसार में रहा अब ठाकुर जी के चरणों में रहना चाहता हूं। तुम मेरे साथ चलोगी या अपना शेष जीवन बच्चों के साथ गुजारोगी। . पत्नी बोली:- "चालीस वर्ष साथ रहने के बाद भी आप मेरे ह्रदय को नहीं पहचान पाए मैं आपके साथ चलूंगी।" . वैद्य जी बोले:- "कल सुबह वृन्दावन के लिए चलना है।" अगले दिन सुबह दोंनो वृन्दावन जाने के लिए तैयार हुए। . अपने बच्चों को बुलाया और कहा:- "प्यारे बच्चों हम जीवन के उस पार हैं तुम इस पार हो। . आज से तुम्हारे लिए हम मर गए और हमारे लिए तुम। तुमसे तो हमारा हाट बाट का साथ है। असली साथी तो सबके श्री हरि ही है।" . वृन्दावन आए तो दैवयोग से स्वामी जी से भेंट हुई। उन्होंने गुजारे लायक चीजों का इन्तजाम करवा दिया। . दोंनो का आपस में बोलना चालना भी कम हो गया केवल नाम जाप में लगे रहते और स्वामी जी का सत्संग सुनते। . जैसा कुछ ठाकुर जी की कृपा से उपलब्ध होता बनाते पकाते और प्रेम से श्री हरि जी को भोग लगाकर खा लेते। . किन्तु अभाव का एहसास उन्हें कभी नहीं हुआ था। . जाड़े का मौसम था। तीन दिन से दोंनो ने कुछ नहीं खाया था। भूख और ठंड खूब सता रही थी। . अचानक दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी... वैद्य जी ने उठ कर दरवाजा खोला सामने एक किशोरी खड़ी थी बोली:- . "स्वामी जी के यहां आज भंडारा था उन्होंने प्रशाद भेजा है।" . वैद्य जी ने प्रशाद का टिफिन पकड़ा तभी एक किशोर अंदर आया और दोनों के लिए गर्म बिस्तर लगाने लगा। . वैद्य जी की पत्नी बोली:- ध्यान से बच्चों हमारे यहां रोशनी का कोई प्रबंध नहीं है। कहीं चोट न लग जाए। . इतने में किशोर बाहर गया और मोमबत्तियों का डिब्बा और दिया सलाई लेकर आ गया। कोठरी में रोशनी कर दोनों चले गए। . दोनों ने भर पेट खाना खाया और गर्म बिस्तर में सो गए। . अगले दिन स्वामी जी का टिफिन वापिस करने गए तो उन्होंने कहा:- "टिफिन तो हमारा है पर यहां कल कोई भंडारा नहीं था और न ही उन्होंने कोई प्रशाद या अन्य सामान भिजवाया है।" . यह सुनकर दोनों सन्न रह गए। वह समझ गए ये सब बांके बिहारी जी की कृपा है। . दोनों को बहुत ग्लानि हो रही थी प्रभु को उनके कष्ट दूर करने स्वयं आना पड़ा। Bolo Radhe Radhe. .. 🌹🌹तू मूझे संभालता है, ये तेरा उपकार है मेरे दाता, वरना तेरी मेहरबानी के लायक मेरी हस्ती कहाँ, रोज़ गलती करता हूं, तू छुपाता है अपनी बरकत से, मैं मजबूर अपनी आदत से, तू मशहूर अपनी रहमत से! तू वैसा ही है जैसा मैं चाहता हूँ..I बस.. मुझे वैसा बना दे जैसा तू चाहता है।🌹🌹 🌿🌺❄जय श्री राधे कृष्णा जी❄🌺 ❤💦।।राधे राधे जी।।💦❤ 🌸🐾🌸🐾🌸🐾🌸🐾🌸🐾🌸

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Om namah Lakshmi Narayan Ji 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙋‍♀️🙏 प्रेरक प्रसंग (सुप्रभात)🙏 👉👀विद्वत्ता का घमंड़ 👀👈 .👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀👀 महाकवि कालिदास के कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था. शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था. अपार यश, प्रतिष्ठा और सम्मान पाकर एक बार कालिदास को अपनी विद्वत्ता का घमंड हो गया. . उन्हें लगा कि उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है और अब सीखने को कुछ बाकी नहीं बचा. उनसे बड़ा ज्ञानी संसार में कोई दूसरा नहीं. एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ का निमंत्रण पाकर कालिदास विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर रवाना हुए. . गर्मी का मौसम था. धूप काफी तेज़ और लगातार यात्रा से कालिदास को प्यास लग आई. थोङी तलाश करने पर उन्हें एक टूटी झोपड़ी दिखाई दी. पानी की आशा में वह उस ओर बढ चले. झोपड़ी के सामने एक कुआं भी था. . कालिदास ने सोचा कि कोई झोपड़ी में हो तो उससे पानी देने का अनुरोध किया जाए. उसी समय झोपड़ी से एक छोटी बच्ची मटका लेकर निकली. बच्ची ने कुएं से पानी भरा और वहां से जाने लगी. . कालिदास उसके पास जाकर बोले- बालिके ! बहुत प्यास लगी है ज़रा पानी पिला दे. बच्ची ने पूछा- आप कौन हैं ? मैं आपको जानती भी नहीं, पहले अपना परिचय दीजिए. कालिदास को लगा कि मुझे कौन नहीं जानता भला, मुझे परिचय देने की क्या आवश्यकता ? . फिर भी प्यास से बेहाल थे तो बोले- बालिके अभी तुम छोटी हो. इसलिए मुझे नहीं जानती. घर में कोई बड़ा हो तो उसको भेजो. वह मुझे देखते ही पहचान लेगा. मेरा बहुत नाम और सम्मान है दूर-दूर तक. मैं बहुत विद्वान व्यक्ति हूं. . कालिदास के बड़बोलेपन और घमंड भरे वचनों से अप्रभावित बालिका बोली-आप असत्य कह रहे हैं. संसार में सिर्फ दो ही बलवान हैं और उन दोनों को मैं जानती हूं. अपनी प्यास बुझाना चाहते हैं तो उन दोनों का नाम बाताएं ? . थोङा सोचकर कालिदास बोले- मुझे नहीं पता, तुम ही बता दो मगर मुझे पानी पिला दो. मेरा गला सूख रहा है. बालिका बोली- दो बलवान हैं ‘अन्न’ और ‘जल’. भूख और प्यास में इतनी शक्ति है कि बड़े से बड़े बलवान को भी झुका दें. देखिए प्यास ने आपकी क्या हालत बना दी है. . कलिदास चकित रह गए. लड़की का तर्क अकाट्य था. बड़े-बड़े विद्वानों को पराजित कर चुके कालिदास एक बच्ची के सामने निरुत्तर खङे थे. बालिका ने पुनः पूछा- सत्य बताएं, कौन हैं आप ? वह चलने की तैयारी में थी. . कालिदास थोड़ा नम्र होकर बोले-बालिके ! मैं बटोही हूं. मुस्कुराते हुए बच्ची बोली- आप अभी भी झूठ बोल रहे हैं. संसार में दो ही बटोही हैं. उन दोनों को मैं जानती हूं, बताइए वे दोनों कौन हैं ? तेज़ प्यास ने पहले ही कालिदास की बुद्धि क्षीण कर दी थी पर लाचार होकर उन्होंने फिर से अनभिज्ञता व्यक्त कर दी. . बच्ची बोली- आप स्वयं को बङा विद्वान बता रहे हैं और ये भी नहीं जानते ? एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना थके जाने वाला बटोही कहलाता है. बटोही दो ही हैं, एक चंद्रमा और दूसरा सूर्य जो बिना थके चलते रहते हैं. आप तो थक गए हैं. भूख प्यास से बेदम हैं. आप कैसे बटोही हो सकते हैं ? . इतना कहकर बालिका ने पानी से भरा मटका उठाया और झोपड़ी के भीतर चली गई. अब तो कालिदास और भी दुखी हो गए. इतने अपमानित वे जीवन में कभी नहीं हुए. प्यास से शरीर की शक्ति घट रही थी. दिमाग़ चकरा रहा था. उन्होंने आशा से झोपड़ी की तरफ़ देखा. तभी अंदर से एक वृद्ध स्त्री निकली. . उसके हाथ में खाली मटका था. वह कुएं से पानी भरने लगी. अब तक काफी विनम्र हो चुके कालिदास बोले- माते पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा. . स्त्री बोली- बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं. अपना परिचय दो. मैं अवश्य पानी पिला दूंगी. कालिदास ने कहा- मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें. स्त्री बोली- तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं. पहला धन और दूसरा यौवन. इन्हें जाने में समय नहीं लगता. सत्य बताओ कौन हो तुम ? . अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश कालिदास बोले- मैं सहनशील हूं. अब आप पानी पिला दें. स्त्री ने कहा- नहीं, सहनशील तो दो ही हैं. पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है. उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है. . दूसरे, पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं. तुम सहनशील नहीं. सच बताओ तुम कौन हो ? कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले- मैं हठी हूं. . स्त्री बोली- फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं. सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ? पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके कालिदास ने कहा- फिर तो मैं मूर्ख ही हूं. . नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो. मूर्ख दो ही हैं. पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है. . कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे. वृद्धा ने कहा- उठो वत्स ! आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी. कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए. . माता ने कहा- शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार. तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा. . कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े. 🙏🙏🙏👀जय श्री राधेकृष्ण जी 👀🙏🙏🙏 *संकलित*

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