येथे राञी थांबयला भितात लोकं

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येथे राञी थांबयला भितात लोकं

"MYTH: येथे रात्री थांबायला घाबरतात लोक, कोणी थांबले तर घडते ही घटना
राजस्थानातील एक मंदिर प्राचीन काळापासूनच खूप गूढ रहस्य राहिले आहे. बाडमेर जिल्ह्यात स्थित असलेल्या या मंदिराचे नाव किराडू मंदिर असे आहे. संपूर्ण राजस्थानमध्ये खजुराहो मंदिर नावाने प्रसिद्ध असलेले हे मंदिर प्रेमी युगुलांना विशेष आकर्षित करते. परंतु येथील एक भयावह सत्य जाणून घेतल्यानंतर संध्याकाळनंतर या मंदिरात कोणताही व्यक्ती थांबण्याचे धाडस करत नाही. असे मानले जाते की, या मंदिरात सूर्यास्तानंतर थांबलेला व्यक्ती दगड बनतो. किराडूमध्ये मुख्यतः पाच मंदिर असून हे 900 वर्ष जुने आहेत.
पुढील स्लाईडवर जाणून घ्या, या मंदिरात रात्री थांबणारे लोक का बनतात दगड....

कोणी आणि का दिला होता शाप
या मान्यतेमागे एक रोचक कथा आहे. असे सांगितले जाते की, कधीकाळी किराडूच्या जवळपास लोकांची वस्ती होती. ही जागा एका शापामुळे उजाड झाली. हजारो वर्षांपूर्वी येथे एक तपस्वी आले होते. त्यांचासोबत त्यांचे शिष्य होते. तपस्वी एके दिवशी शिष्यांना गावात सोडून देश भ्रमणासाठी निघून गेले. या दरम्यान शिष्यांची तब्येत बिघडली. गावकर्‍यांनी शिष्यांची कोणत्याच प्रकारे मदत केली नाही.
तपस्वी परत किराडूमध्ये आल्यानंतर त्यांनी शिष्यांची दुर्दशा पाहून गावकर्‍यांना शाप दिला की, ज्या लोकांचे हृदय दगडाचे आहे त्यांना मनुष्य रुपात राहण्याचा हक्क नाही. यामुळे तुम्ही सर्व दगड व्हाल. गावामध्ये केवळ एका महिलेने शिष्यांची मदत केली होती. तपस्वीने तिच्यावर दया करून तिला गावातून निघून जाण्यास सांगितले. गावातून जाताना मागे वळून पाहू नको असेही सांगितले. ती महिला गावातून निघून गेली परंतु तिच्या मनात शंका होती की, तपस्वीचा शाप खरा आहे की नाही. तिने मागे वळून पाहिले आणि तीसुद्धा दगड झाली.
पुढील स्लाईड्सवर क्लिक करून जाणून घ्या, या मंदिराविषयीच्या इतर काही रोचक गोष्टी..

दगड बनलेल्या महिलेची मूर्ती आजही उपस्थित
किराडू मंदिरापासून काही अंतरावर असलेल्या सिहणी गावामध्ये दगड बनलेल्या महिलेची मूर्ती पहावयास मिळते. त्या महिलेची दगडाची मूर्ती या घटनेचा पुरावा मानली जाते. यामुळे या मंदिर परिसरात रात्रीच्या वेळी कोणीही जात नाही.
पुढे जाणून घ्या, किराडू मंदिरांचे निर्माण कोणी केले...

किराडू मंदिरांचे निर्माण -
किराडू मंदिरांचे निर्माण कोणी केले याविषयी कोणतीही ठोस माहिती उपलब्ध नाही. परंतु या ठिकाणी 12 व्या शतकातील तीन शिलालेख उपलब्ध असून यावरही या मंदिरांच्या उभारणीविषयी कोणतीही माहिती उपलब्ध नाही. पहिला शिलालेख विक्रम संवत 1209 माघ चुतुर्दशी तिथीनुसार 24 जानेवारी 1153 चा असून हा गुजरातच्या चौलुक्य कुमार पाल यांच्या काळातील आहे. दुसरा शिलालेख विक्रम संवत 1235 चा असून तोसुद्धा चौलुक्य राजा भीमदेव द्वितीयचे सामंत चौहान मदन ब्रह्मदेव यांचा आहे. इतिहासकारांच्या माहितीनुसार किराडू मंदिरांचे निर्माण 11 व्या शतकात झाले असून यांचे निर्माण परमार वंशाचे राजा दुलशालराज आणि त्यांच्या वंशजांनी केले होते.

किराडूमध्ये प्राचीन काळी पाच भव्य मंदिरे होते. परंतु 19 व्या शतकाच्या सुरुवातीला आलेल्या भूकंपामध्ये या मंदिरांचे खूप नुकसान झाले. आज या पाच मंदिरांमधील केवळ विष्णू आणि सोमेश्वर मंदिर थोड्याफार प्रमाणात ठीक स्थितीमध्ये आहेत. सोमेश्वर मंदिर येथील सर्वात मोठे मंदिर आहे. स्थानिक मान्यतेनुसार विष्णू मंदिरापासून येथे स्थापत्य कलेची सुरुवात झाली आणि सोमेश्वर मंदिराला या कलेच्या उत्कर्षाचा अंत मानले जाते.

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हम मनुष्यों की एक सामान्य सी आदत है कि दुःख की घड़ी में विचलित हो उठते हैं और परिस्थितियों का कसूरवार भगवान को मान लेते हैं। भगवान को कोसते रहते हैं कि 'हे भगवान हमने आपका क्या बिगाड़ा जो हमें यह दिन देखना पड़ रहा है।' गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि "जीव बार-बार अपने कर्मों के अनुसार अलग-अलग योनी और शरीर प्राप्त करता है। यह सिलसिला तब तक चलता है जब तक जीवात्मा परमात्मा से साक्षात्कार नहीं कर लेता। इसलिए जो कुछ भी संसार में होता है या व्यक्ति के साथ घटित होता है उसका जिम्मेदार जीव खुद होता है।" संसार में कुछ भी अपने आप नहीं होता है, हमें जो कुछ भी प्राप्त होता है वह कर्मों का फल है। ईश्वर तो कमल के फूल के समान है जो संसार में होते हुए भी संसार में लिप्त नहीं होता है। ईश्वर न तो किसी को दुःख देता है और न सुख। इस संदर्भ में एक कथा प्रस्तुत हैः- गौतमी नामक एक शाक्य वृद्धा थी, जिसका एक मात्र सहारा उसका पुत्र था। शक्या अपने पुत्र से अत्यंत स्नेह करती थी, एक दिन एक सर्प ने शक्या के पुत्र को डंस लिया। पुत्र की मृत्यु से शाक्य व्रद्धा व्याकुल होकर विलाप करने लगी। पुत्र को डंसने वाले सांप के ऊपर उसे बहुत क्रोध आ रहा था। सर्प को सजा देने के लिए शक्या ने एक सपेरे को बुलाया। सपेरे ने सांप को पकड़ कर शक्या के सामने लाकर कहा कि इसी सांप ने तुम्हारे पुत्र को डंसा है, इसे मार दो। शक्या ने संपरे से कहा कि इसे मारने से मेरा पुत्र जीवित नहीं होगा, सांप को तुम्ही ले जाओ और जो उचित समझो सो करो। सपेरा सांप को जंगल में ले आया, सांप को मारने के लिए सपेरे ने जैसे ही पत्थर उठाया, सांप ने कहा मुझे क्यों मारते हो, मैंने तो वही किया जो काल ने कहा था। सपेरे ने काल को ढूंढा और बोला तुमने सर्प को शक्या के बच्चे को डंसने के लिए क्यों कहा। काल ने कहा 'शक्या के पुत्र का कर्म फल यही था, मेरा कोई कसूर नहीं है। सपेरा कर्म के पहुंचा और पूछा तुमने ऐसा बुरा कर्म क्यों किया। कर्म ने कहा 'मुझ से क्यों पूछते हो, यह तो मरने वाले से पूछो' मैं तो जड़ हूं। इसके बाद संपेरा शक्या के पुत्र की आत्मा के पास पहुंचा। आत्मा ने कहा सभी ठीक कहते हैं, मैंने ही वह कर्म किया था जिसकी वजह से मुझे सर्प ने डंसा, इसके लिए कोई अन्य दोषी नहीं है। महाभारत के युद्ध में अर्जुन ने भीष्म को बाणों से छलनी कर दिया और भीष्म पितामह को बाणों की शैय्या पर सोना पड़ा। इसके पीछे भी भीष्म पितामह के कर्म का फल ही था। बाणों की शैय्या पर लेटे हुए भीष्म ने जब श्री कृष्ण से पूछा, किस अपराध के कारण मुझे इसे तरह बाणों की शैय्या पर सोना पड़ रहा है। इसके उत्तर में श्री कृष्ण ने कहा था कि, आपने कई जन्म पहले एक सर्प को नागफनी के कांटों पर फेंक दिया था। इसी अपराध के कारण आपको बाणों की शैय्या मिली है। इसलिए हमे कभी भी जाने-अनजाने किसी भी जीव को नहीं सताना चाहिए। हम जैसा कर्म करते हैं उसका फल हमें कभी न कभी जरूर मिलता है।

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RAJ RATHOD Mar 5, 2021

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हर साल माता सीता का जन्म फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. इस साल 2021 में यह जानकी जयंती (Janaki Jayanti) 7 मार्च को है. इस दिन मिथिला के राजा जनक और रानी सुनयना की गोद में सीता आईं. अयोध्या के राजा दशरथ के बड़े पुत्र राम से सीता का विवाह हुआ. विवाह के बाद उन्होंने पति राम और देवर लक्ष्मण के साथ 14 साल का वनवास भी भोगा. इतना ही नहीं, इस वनवास के दौरान उनका लंका के राजा रावण ने अपहरण किया. वनवास के बाद भी वह हमेशा के लिए अयोध्या वापस नहीं जा सकीं. अपने पुत्रों के साथ उन्हें आश्रम में ही अपना जीवन व्यतीत करना पड़ा और आखिर में उन्हें अपने सम्मान की रक्षा के लिए धरती में ही समाना पड़ा. अपने जीवन में इतने कष्टों को देखने वाली माता सीता आखिरकार थीं कौन? यहां जानें माता सीता का जन्म कैसे हुआ. कैसे हुआ जन्म? रामायण के अनुसार एक बार मिथिला के राजा जनक यज्ञ के लिए खेत को जोत रहे थे. उसी समय एक क्यारी में दरार हुई और उसमें से एक नन्ही बच्ची प्रकट हुईं. उस वक्त राजा जनक की कोई संतान नहीं थी. इसीलिए इस कन्या को देख वह मोहित हो गए और गोद ले लिया. आपको बता दें हल को मैथिली भाषा में सीता कहा जाता है और यह कन्या हल चलाते हुए ही मिलीं इसीलिए इनका नाम सीता रखा गया. कैसे मनाई जाती है जानकी जयंती? इस दिन माता सीता की पूजा की जाती है, लेकिन पूजा की शुरुआत गणेश जी और अंबिका जी से होती है. इसके बाद माता सीता को पीले फूल, कपड़े और सुहागिन के श्रृंगार का सामान चढ़ाया जाता है. बाद में 108 बार इस मंत्र का जाप किया जाता है. श्री जानकी रामाभ्यां नमः जय श्री सीता राम श्री सीताय नमः मान्यता है कि यह पूजा खासकर विवाहित महिलाओं के लिए लाभकारी होती है. इससे वैवाहिक जीवन की समस्याएं ठीक हो जाती हैं. नमस्कार 🙏 शुभ संध्या वंदन 🌹 👏 🚩 जय श्री राम 🌹 जय श्री लक्ष्मी नारायण 🙏 जय श्री सिता माता की 💐 👏 🚩 🐚 🌹 नमस्कार 🙏 🚩

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Anita Sharma Mar 4, 2021

. "गुरु अवज्ञा" एक बार की बात है, एक भक्त के दिल में आया कि गुरु महाराज जी को रात में देखना चाहिए कि क्या वो भी भजन सिमरन करते हैं ? वो रात को गुरु महाराज जी के कमरे की खिड़की के पास खड़ा हो गया। गुरु महाराज जी रात 9:30 तक भोजन और बाकी काम करके अपने कमरे में आ गये। वो भक्त देखता है कि गुरु महाराज जी एक पैर पर खड़े हो कर भजन सिमरन करने लग गये। वो कितनी देर तक देखता रहा और फिर थक कर खिड़की के बाहर ही सो गया। 3 घंटे बाद जब उसकी आँख खुली तो वो देखता है कि गुरु महाराज जी अभी भी एक पैर पर खड़े भजन सिमरन कर रहे हैं, फिर थोड़ी देर बाद गुरु महाराज जी भजन सिमरन से उठ कर थोड़ी देर कमरे में ही इधर उधर घूमें और फिर दोनों पैरो पर खड़े होकर भजन सिमरन करने लगे। वो भक्त देखता रहा और देखते-देखते उसकी आँख लग गई और वो सो गया। जब फिर उसकी आँख खुली तो 4 घंटे बीत चुके थे और अब गुरु महाराज जी बैठ कर भजन सिमरन कर रहे थे। थोड़ी देर में सुबह हो गई और गुरु महाराज जी उठ कर तैयार हुए और सुबह की सैर पर चले गये। वो भक्त भी गुरु महाराज जी के पीछे ही चल गया और रास्ते में गुरु महाराज जी को रोक कर हाथ जोड़ कर बोलता है कि गुरु महाराज जी मैं सारी रात आपको खिड़की से देख रहा था कि आप रात में कितना भजन सिमरन करते हो। गुरु महाराज जी हंस पड़े और बोले:- बेटा देख लिया तुमने फिर ? वो भक्त शर्मिंदा हुआ और बोला कि गुरु महाराज जी देख लिया पर मुझे एक बात समझ नहीं आई कि आप पहले एक पैर पर खड़े होकर भजन सिमरन करते रहे फिर दोनों पैरों पर और आखिर में बैठ कर जैसे कि भजन सिमरन करने को आप बोलते हो, ऐसा क्यूँ ? गुरु महाराज जी बोले बेटा एक पैर पर खड़े होकर मुझे उन सत्संगियो के लिए खुद भजन सिमरन करना पड़ता है जिन्होंने नाम दान लिया है मगर बिलकुल भी भजन सिमरन नहीं करते। दोनों पैरो पर खड़े होकर मैं उन सत्संगियो के लिए भजन सिमरन करता हूँ जो भजन सिमरन में तो बैठते हैं मगर पूरा समय नहीं देते। बेटा जिनको नाम दान मिला है, उनका जवाब सतपुरख को मुझे देना पडता है, क्योंकि मैंने उनकी जिम्मेदारी ली है नाम दान देकर। और आखिर में मैं बैठ कर भजन सिमरन करता हूँ, वो मैं खुद के लिए करता हूँ, क्योंकि मेरे गुरु ने मुझे नाम दान दिया था और मैं नहीं चाहता की उनको मेरी जवाबदारी देनी पड़े। भक्त ये सब सुनकर एक दम सन्न खड़ा रह गया।

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white beauty Mar 5, 2021

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white beauty Mar 5, 2021

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