Vibhor Mittal
Vibhor Mittal Nov 20, 2017

(((( फकीर का भरोसा ))))

(((( फकीर का भरोसा ))))
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एक फकीर के घर रात चोर घुसे। घर में कुछ भी न था। सिर्फ एक कंबल था, जो फकीर ओढ़े लेटा हुआ था।
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सर्द रात, पूर्णिमा की रात। फकीर रोने लगा, क्योंकि घर में चोर आएं और चुराने को कुछ नहीं है, इस पीड़ा से रोने लगा।
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उसकी सिसकियां सुन कर चोरों ने पूछा कि भई क्यों रोते हो ? न रहा गया उनसे।
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उस फकीर ने कहा कि आए थे— कभी तो आए, जीवन में पहली दफा तो आए ! यह सौभाग्य तुमने दिया!
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मुझ फकीर को भी यह मौका दिया! लोग फकीरों के यहां चोरी करने नहीं जाते, सम्राटों के यहां जाते हैं। तुम चोरी करने क्या आए, तुमने मुझे सम्राट बना दिया!
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क्षण भर को मुझे भी लगा कि अपने घर भी चोर आ सकते हैं! ऐसा सौभाग्य! लेकिन फिर मेरी आंखें आंसुओ से भर गई हैं,
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मैं रोका बहुत कि कहीं तुम्हारे काम में बाधा न पड़े, लेकिन न रुक पाया, सिसकियां निकल गईं, क्योंकि घर में कुछ है नहीं।
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तुम अगर जरा दो दिन पहले खबर कर देते तो मैं इंतजाम कर रखता। दुबारा जब आओ तो सूचना तो दे देना।
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मैं गरीब आदमी हूं। दो—चार दिन का समय होता तो कुछ न कुछ मांग—तूंग कर इकट्ठा कर लेता।
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अभी तो यह कंबल भर है मेरे पास, यह तुम ले जाओ। और देखो इनकार मत करना। इनकार करोगे तो मेरे हृदय को बड़ी चोट पहुंचेगी।
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चोर तो घबड़ा गए, उनकी कुछ समझ में ही नहीं आया।
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ऐसा आदमी उन्हें कभी मिला न था। चोरी तो जिंदगी भर से की थी, मगर आदमी से पहली बार मिलना हुआ था।
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भीड़— भाड़ बहुत है, आदमी कहां! शक्लें हैं आदमी की, आदमी कहां!
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पहली बार उनकी आंखों में शर्म आई, हया उठी। और पहली बार किसी के सामने नतमस्तक हुए, मना नहीं कर सके।
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मना करके इसे क्या दुख देना, कंबल तो ले लिया। लेना भी मुश्किल! इस पर कुछ और नहीं है!
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कंबल छूटा तो पता चला कि फकीर नंगा है। कंबल ही ओढ़े हुए था, वही एकमात्र वस्त्र था— वही ओढ़नी, वही बिछौना।
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लेकिन फकीर ने कहा. तुम मेरी फिकर मत करो, मुझे नंगे रहने की आदत है।
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और तुम तीन मील चल कर गांव से आए, सर्द रात, कौन घर से निकलता है। कुत्ते भी दुबके पड़े हैं।
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तुम चुपचाप ले जाओ और दुबारा जब आओ मुझे खबर कर देना।
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चोर तो ऐसे घबड़ा गए कि.. एकदम निकल कर बाहर हो गए। जब बाहर हो रहे थे तब फकीर चिल्लाया कि सुनो, कम से कम दरवाजा बंद करो और मुझे धन्यवाद दो
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आदमी अजीब है, चोरों ने सोचा। और ऐसी कड़कदार उसकी आवाज थी कि उन्होंने उसे धन्यवाद दिया, दरवाजा बंद किया और भागे।
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फिर फकीर खिड़की पर खड़े होकर दूर जाते उन चोरों को देखता रहा और उसने एक गीत लिखा—
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जिस गीत का अर्थ है कि मैं बहुत गरीब हूं मेरा वश चलता तो आज पूर्णिमा का चांद भी आकाश से उतार कर उनको भेंट कर देता! कौन कब किसके द्वार आता है आधी रात!
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यह आस्तिक है। इसे ईश्वर में भरोसा नहीं है, लेकिन इसे प्रत्येक व्यक्ति के ईश्वरत्व में भरोसा है।
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कोई व्यक्ति नहीं है ईश्वर जैसा, लेकिन सभी व्यक्तियों के भीतर जो धड़क रहा है, जो प्राणों का मंदिर बनाए हुए विराजमान है,
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जो श्वासें ले रहा है, उस फैले हुए ईश्वरत्व के सागर में इसकी आस्था है।
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फिर चोर पकड़े गए। अदालत में मुकदमा चला, वह कंबल भी पकड़ा गया।
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और वह कंबल तो जाना—माना कंबल था। वह उस प्रसिद्ध फकीर का कंबल था।
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मजिस्ट्रेट तत्क्षण पहचान गया कि यह उस फकीर का कंबल है—
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तो तुम उस गरीब फकीर के यहां से भी चोरी किए हो!
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फकीर को बुलाया गया। और मजिस्ट्रेट ने कहा कि अगर फकीर ने कह दिया कि यह कंबल मेरा है और तुमने चुराया है,
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तो फिर हमें और किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है। उस आदमी का एक वक्तव्य, हजार आदमियों के वक्तव्यों से बड़ा है।
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फिर जितनी सख्त सजा मैं तुम्हें दे सकता हूं दूंगा। फिर बाकी तुम्हारी चोरियां सिद्ध हों या न हों, मुझे फिकर नहीं है। उस एक आदमी ने अगर कह दिया...।
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चोर तो घबड़ा रहे थे, कंप रहे थे, पसीना—पसीना हुए जा रहे थे... फकीर अदालत में आया।
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और फकीर ने आकर मजिस्ट्रेट से कहा कि नहीं, ये लोग चोर नहीं हैं, ये बड़े भले लोग हैं।
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मैंने कंबल भेंट किया था और इन्होंने मुझे धन्यवाद दिया था। और जब धन्यवाद दे दिया, बात खत्म हो गई।
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मैंने कंबल दिया, इन्होंने धन्यवाद दिया। इतना ही नहीं, ये इतने भले लोग हैं कि जब बाहर निकले तो दरवाजा भी बंद कर गए थे। यह आस्तिकता है।
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मजिस्ट्रेट ने तो चोरों को छोड़ दिया, क्योंकि फकीर ने कहा. इन्हें मत सताओ, ये प्यारे लोग हैं, अच्छे लोग हैं, भले लोग हैं।
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फकीर के पैरों पर गिर पड़े चोर और उन्होंने कहा हमें दीक्षित करो। वे संन्यस्त हुए। और फकीर बाद में खूब हंसा।
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और उसने कहा कि तुम संन्यास में प्रवेश कर सको इसलिए तो कंबल भेंट दिया था।
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इसे तुम पचा थोड़े ही सकते थे। इस कंबल में मेरी सारी प्रार्थनाएं बुनी थीं। इस कंबल में मेरे सारे सिब्दों की कथा थी। यह कंबल नहीं था।
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जैसे कबीर कहते हैं झीनी—झीनी बीनी रे चदरिया! ऐसे उस फकीर ने कहा प्रार्थनाओं से बुना था इसे! इसी को ओढ़ कर ध्यान किया था। इसमें मेरी समाधि का रंग था, गंध थी।
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तुम इससे बच नहीं सकते थे। यह मुझे पक्का भरोसा था, कंबल ले आएगा तुमको भी। और तुम आखिर आ गए।
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उस दिन रात आए थे, आज दिन आए। उस दिन चोर की तरह आए थे, आज शिष्य की तरह आए। मुझे भरोसा था।..


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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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कामेंट्स

Gopal Sajwan"कुँजा जी" Nov 20, 2017
बहुत सुंदर पोस्ट है कहानी अच्छी लगी 🍀🌹🌹🙏🙏🌹🍀🏵 जय श्री राधे कृष्णा

manoj Singh Tomar Nov 20, 2017
बहुत अच्छी लाइन हैं मॅन प्रसन्न ho गया

M.K.Jha Nov 21, 2017
अति सुन्दर

Ravi pandey Nov 21, 2017
jai shree Radhe Krishna radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe radhe Radhe Je

Miss. Sunita Devender kemar Nov 21, 2017
Vibhor Ji. aapko dil se thanks aapne eatna peyara likha ki dil ko eak eak sabed peyara laga. v v nice. Jay shri Krishna

🙏🕉️कृपया एक बार विचार अवश्य करें🕉️🙏 सत्य बोलने मे श्रेष्ठ और महान कार्य करने मे कष्ट के पांच चरण आते है उत्साह गिराने वाले निंदा करने वाले आलोचना करने वाले उपहास उड़ाने वाले विरोध करने वाले जो मनुष्य इन पांच परिस्थिति मे बिना विचलित हुए अडि़ग रहते हुए दृढनिश्चयी , दूरदर्शी , पारदर्शी व ईश्वर पर विश्वास रखने वाला होता है उसकी विजय निश्चित होती है क्योकि सत्य परेशान हो सकता हैं पर पराजित नही ऐसे ही अवतारी युगपुरुष , महापुरुष को ही लोग भ्रम वश भगवान के समान मानने लगते है और उन्हे ईश्वर का अवतार मानकर उनके अनुयायी बन जाते है "जिंदा" जिस्म की कोई "अहमियत" नही ... "मजार" बन जाने दो "मेले" लगा करेगे ..... कृपया सत्य का अनुशरण अवश्य करें 🙏🙏🙏भागो नही , जागो तुम 🙏🙏🙏 🙏🙏🙏🙏 संगठित हो। 🙏🙏🙏🙏 🇳🇵🇳🇵🇳🇵 शशांक आर्य शैंकी 🇳🇵🇳🇵🇳🇵

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pari singh piya Mar 26, 2019

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Meera Dixit Mar 25, 2019

मेरी नन्हीं सी परी कन्या दान करते हैं

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🌿 *आयुर्वेदिक डॉक्टरो को जोलाछाप कहने वालो इस मेसेज को ध़्यान से पढ़े आैर जाने आखिर कोन है जोलाछाप ?* 🌿 ➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖ ❇ हंमेशा से ही ऐलोपैथी विग्यान आयुर्वेद को आधारहीन ऐवं कीसी कामका नही कहकर आयुर्वेदिक डॉक्टरो की बेइज्जती करतां आयां है लेकिन सब पैथी का बाप तो आयुर्वेद ही है | आैर अगर आयुर्वेद नही होतां तो आज ऐलोपैथी भी नही होतां यह बात हमारे इस मेसेज को पुरां पढ़कर आप भी जान जायेंगे | ❇ *ऐलोपैथी मे उपयोग होने वाली महत्वपुर्ण दवाइयां जो निचे दी गइ है वह "आयुर्वेदिक प्लान्ट" से बनती है निचे का मेसेज पुरां पढ़िये आैर जाने केसे ऐलोपैथी वाले आयुर्वेदिक आैषधि को लेटिन नाम देकर अपनी चिकित्सा पैथी कहलाते है |* 1) Tinacardin - यह दवाइ गीलोय के सत्व से बनती है | 2) Curcumin- यह दवाइ आयुर्वेदिक आैषधि हल्दी सत्व से बनती है | 3) Coral - यह दवाइ प्रवाल पिष्टी से बनने वाली दवाइ है | 4) Hyprobromide - यह दवाइ खुरासानी अजवाइन का ऐक्ट्रेक्ट है | 5) Quinone - यह दवाइ कुनैन की जड से तैयार होती है | 6) Pentaprazole - यह दवाइ खाने सा सोडा से तैयार होती है | 7) Pramhexin -यह ऐलोपैथी दवाइ वासा सत्व से बनती है | 8) Revocin - यह दवाइ सर्पगंधा के ऐक्ट्रेक्ट से बनी होती है | 9) Ginseng - यह चाइनां जिनसेंग नामक आैषधि से बनती है | 10) Diclpfenac- यह दवाइ अफिण से बनाइ जाती है | 11) Colcicine - यह दवाइ सुरंजन नामक आैषधी से बनती है | 12) Taxol - यह द्रोणपुष्पी के ऐक्ट्रेक्ट से बनाइ जाती है | 13) Atropine - यह धतुरपञ से बनने वाली ऐलोपैथी दवाइ है | 14 ) Eno - इनो १००% आयुर्वेदिक आैषधी से बनाइ जाती है | ❇ *उपर दी गइ ऐलोपैथी दवाइयो मे १०० % आयुर्वेदिक आैषधी को लेकर इसका ऐक्ट्रेक्ट निकालकर या तो उसका सत्व निकालकर लेटिन नाम देकर अंग्रेजी दवाइयो का नाम देकर मार्केट मे खुब बिक रही है आैर लोग इसको खुब खा भी रहे हे |* यह जानकारी सभी लोगो तक शेयर करें जो आयुर्वेद को जोलाछार समजते है | *राजिव दिक्षित जी अमर रहो* *स्वदेशी अपनाये, देश बचाये |* 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰

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pari singh piya Mar 26, 2019

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pari singh piya Mar 26, 2019

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Rohan Bhardwaj Mar 24, 2019

महाराष्ट्र के 15 प्रमुख संत महाराष्ट्र भारतीय संस्कृति और धर्म का प्रमुख केंद्र रहा है और आज भी है। वैसे तो महाराष्ट्र में बहुत संत हुए हैं। यह संतों की भूमि है। संतों में सबसे प्रमुख वे संत जो राष्ट्र संत हो गए और जिनके विचार आज भी समाज में प्रासंगिक बने हुए हैं उन संतों के बारे में यहां प्रस्तुत है संक्षिप्त जानकारी।    1.गजानन महाराज (1878-1910) गजानन महाराज का जन्म कब हुआ, उनके माता-पिता कौन थे, इस बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं। शेगांव में 23 फरवरी 1878 में बनकट लाला और दामोदर नमक दो व्यक्तियों ने देखा। वे तभी से वहीं रहे। मान्यता के अनुसार 8 सितंबर 1910 को प्रात: 8 बजे उन्होंने शेगांव में समाधि ले ली।     2.शिर्डी के सांई बाबा (1835-1918) ऐसा विश्वास है कि सन्‌ 1835 में महाराष्ट्र के परभणी जिले के पाथरी गांव में सांईं बाबा का जन्म भुसारी परिवार में हुआ था। इसके पश्चात 1854 में वे शिर्डी में ग्रामवासियों को एक नीम के पेड़ के नीचे बैठे दिखाई दिए। बाबा की एकमात्र प्रामाणिक जीवनकथा 'श्री सांईं सत्‌चरित' है जिसे श्री अन्ना साहेब दाभोलकर ने सन्‌ 1914 में लिपिबद्ध किया। 15 अक्टूबर 1918 तक बाबा शिर्डी में अपनी लीलाएं करते रहे और यहीं पर उन्होंने देह छोड़ दी।     3.संत नामदेव : (1267 में जन्म) गुरु विसोबा खेचर थे। गुरुग्रंथ और कबीर के भजनों में इनके नाम का उल्लेख मिलता है। ये महाराष्ट्र के पहुंचे हुए संत हैं। संत नामदेवजी का जन्म कबीर से 130 वर्ष पूर्व महाराष्ट्र के जिला सातारा के नरसी बामनी गांव में हुआ था। उन्होंने ब्रह्मविद्या को लोक सुलभ बनाकर उसका महाराष्ट्र में प्रचार किया तो संत नामदेवजी ने महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक उत्तर भारत में 'हरिनाम' की वर्षा की।     4.संत ज्ञानेश्‍वर : सन् (1275 से 1296 ई.) : संत ज्ञानेश्वर का जन्म महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में पैठण के पास आपेगांव में भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था। ज्ञानेश्वर ने भगवद् गीता के ऊपर मराठी भाषा में एक 'ज्ञानेश्वरी' नामक 10,000 पद्यों का ग्रंथ लिखा है। महाराष्ट्र की भूमि पर नाथ संप्रदाय, दत्त संप्रदाय, महानुभव संप्रदाय, समर्थ संप्रदाय आदि कई पंथ-संप्रदायों का उदय एवं विस्तार हुआ। किन्तु भागवत भक्ति संप्रदाय यानी संत ज्ञानेश्वर जी प्रणीत "वारकरी भक्ति संप्रदाय" इस भूमि पर उदित हुआ सबसे विशाल संप्रदाय रहा है।     5.संत एकनाथ : (1533 ई.-1599 ई.) : महाराष्ट्र के संतों में नामदेव के पश्चात दूसरा नाम एकनाथ का ही आता है। इनका जन्म पैठण में हुआ था। ये वर्ण से ब्राह्मण जाति के थे। इन्होंने जाति प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई तथा अनुपम साहस के कारण कष्ट भी सहे। इनकी प्रसिद्धि भागवत पुराण के मराठी कविता में अनुवाद के कारण हुई। दार्शनिक दृष्टि से ये अद्वैतवादी थे।     6.संत तुकाराम : (1577-1650) महाराष्ट्र के प्रमुख संतों और भक्ति आंदोलन के कवियों में एक तुकाराम का जन्म महाराष्ट्र राज्य के पुणे जिले के अंतर्गत 'देहू' नामक ग्राम में शक संवत् 1520 को अर्थात सन् 1598 में हुआ था। इनके पिता का नाम 'बोल्होबा' और माता का नाम 'कनकाई' था। तुकाराम ने फाल्गुन माह की कृष्ण द्वादशी शाक संवत 1571 को देह विसर्जन किया। इनके जन्म के समय पर मतभेद हैं। कुछ विद्वान इनका जन्म समय 1577, 1602, 1607, 1608, 1618 एवं 1639 में और 1650 में उनका देहांत होने को मानते हैं। ज्यादातर विद्वान 1577 में उनका जन्म और 1650 में उनकी मृत्यु होने की बात करते हैं।     7.समर्थ रामदास (1608-1681) : समर्थ रामदास का जन्म महाराष्ट्र के औरंगाबाद ज़िले के जांब नामक स्थान पर शके 1530 में हुआ। इनका नाम ‘नारायण सूर्याजीपंत कुलकर्णी’ था। उनके पिता का नाम सूर्याजी पंत और माता का नाम राणुबाई था। वे राम और हनुमान के भक्त और वीर शिवाजी के गुरु थे। उन्होंने शक संवत 1603 में 73 वर्ष की अवस्था में महाराष्ट्र में सज्जनगढ़ नामक स्थान पर समाधि ली।     8.भक्त पुंडलिक : 6वीं सदी में संत पुंडलिक हुए जो माता-पिता के परम भक्त थे। उनके इष्टदेव श्रीकृष्ण थे। उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर एक दिन श्रीकृष्ण रुकमणी के साथ प्रकट हो गए। तब प्रभु ने उन्हें स्नेह से पुकार कर कहा, 'पुंडलिक, हम तुम्हारा आतिथ्य ग्रहण करने आए हैं।' पुंडलिक ने जब उस तरफ देखा और कहा कि मेरे पिताजी शयन कर रहे हैं, इसलिए आप इस ईंट पर खड़े होकर प्रतीक्षा कीजिए और वे पुन: पैर दबाने में लीन हो गए। भगवान ने अपने भक्त की आज्ञा का पालन किया और कमर पर दोनों हाथ धरकर और पैरों को जोड़कर ईंटों पर खड़े हो गए।     ईंट पर खड़े होने के कारण श्री विट्ठल के विग्रह रूप में भगवान की लोकप्रियता हो चली। यही स्थान पुंडलिकपुर या अपभ्रंश रूप में पंढरपुर कहलाया, जो महाराष्ट्र का सबसे प्रसिद्ध तीर्थ है। पुंडलिक को वारकरी संप्रदाय का ऐतिहासिक संस्थापक भी माना जाता है, जो भगवान विट्ठल की पूजा करते हैं।     9.संत गोरोबा ( 1267 से 1317) : संत गोरा कुम्हार को संत गोरोबा भी कहा जाता है। महाराष्ट्र के उस्मानाबाद जिले के अंतर्गत धाराशिव नामक गांव है। इस गांव का मूल नाम त्रयीदशा है परंतु वर्तमान में इसका नाम तेरेढोकी है। यही पर संत गोरा कुम्हार का जन्म हुआ। वे निष्ठावान वारकरी संत थे। उनकी गुरु परंपरा श्री ज्ञानदेव और नामदेव की तरह ही नाथपंथीय थी।   10.संत जानाबाई : जनाबाईका जन्म महाराष्ट्रके मराठवाडा प्रदेशमें परभणी मंडलके गांव गंगाखेडमें दमा और उनकी पत्नी करुंड नाम के के विठ्ठलभक्त के घरमें हुआ। उनके पिताने पत्नीके निधनके उपरांत जनाबाई को पंढरपुरके विठ्ठलभक्त दामाशेटी के हाथों में सौंप दिया और स्वयं भी संसार से विदा ली। इस प्रकार 6-7 वर्ष की आयु में ही जनाबाई अनाथ होकर दामाशेटी के घर में रहने लगीं। उनके घर में आने के उपरांत दामाशेटीको पुत्ररत्न प्राप्त हुआ, वही प्रसिद्ध संत नामदेव महाराज थे। आजीवन जनाबाई ने उन्हीं की सेवा की। संत नामदेव महाराजके सत्संगसे ही जनाबाईको भी विठ्ठल भक्तिकी आस लगी। श्रीसंत ज्ञानदेव-विसोबा खेचर-संत नामदेव-संत जनाबाई यह उनकी गुरुपरंपरा है। जनाबाई के नाम पर लगभग 350 'अभंग' सकल संत गाथा में मुद्रित है। इसके अलावा भी उनके कई ग्रंथ हैं।     11.संत कन्होपात्रा : महिला संत कन्होपात्र एक कवियत्री थीं। इनका जन्म 14वीं सदी के मध्य में मंगल वेद में हुआ था। यह हिंदू धर्म के वरकारि संप्रदाय द्वारा सम्मानित थी। उनका देहांत पंढरपुर के विठोबा मंदिर में हुआ।    12.संत सेन महाराज : संत शिरोमणि सेन महाराज का जन्म विक्रम संवत 1557 में वैशाख कृष्ण-12 (द्वादशी), दिन रविवार को वृत योग तुला लग्न पूर्व भाद्रपक्ष को चन्दन्यायी के घर में हुआ। बचपन में इनका नाम नंदा रखा गया। संत सेना महाराज का जन्म मध्यप्रदेश के बांधवगड़ में हुआ, लेकिन वे महाराष्ट्र की संत परंपरा से आते हैं। वे पंढरपुर के एक महान वारकरी संत थे।     13.संत चोखामेळा (1300-1400) : महाराष्ट्र के संत शिरोमणि चोखामेला ने कई अभंग लिखे हैं। संत नामदेव को उनका गुरु कहा जाता है। चोखामेला का जन्म महाराष्ट्र के गरीब परिवार में जन्म हुआ। उनका जन्म मेहुनाराजा नामक गावं में हुआ, जो महाराष्ट्र के बुलढाना जिले की दियोलगावं राजा तहसील में आता है। चोखामेला बचपन से ही विठोबा के भक्त थे।     14.संत भानुदास महाराज : ये भी विठोबा का भक्त और वारंकरी संप्रदाय के संत थे। भानुदास के परपोता थे एकनाथजी। वे भगवान की भक्ति ही करते रहते थे जिसके चलते घर में आर्थिक संकट था। उनको सबने पैसा इकट्ठा करके उनका कपड़े का धंधा करने को कहा। वे कपड़ा बेचते थे तो कहते थे कि इतने में खरीदा और इतने में बेचूंगा। बाकी लोग बेइमानी से कपड़ा बेचते थे। कई दिनों तक भानुदास का धंधा नहीं चला लेकिन भानुदास के सत्य बोलने को लोगों ने समझा और उनकी जीत हुई। ऐसे में दूसरे व्यापारी भानुदास से जलने लगे। एक दिन एक हाट के दौरान वे धर्मशाला में ठहरे थे वहां उनके साथ अन्य व्यापारी भी ठहरे थे। रात को भानुदास को कीर्तन की आवाज सुनाई दी, तो उन्होंने अन्य व्यापारियों से कहा आप भी कीर्तन सुनने चले। सभी ने मना कर दिया। भानुदास के जाने के बाद व्यापारियों ने उनकी कपड़े की गठरी फेंक दी और बहार खड़ा उनके घोड़े को खोलकर चाबुक चलाकर दूर भगा दिया। उधर वे कीर्तन में मगन थे इधर धर्मशाला में रात को डकैती पड़ गई। डकैत व्यापारियों को लूटने के बाद घोड़े भी ले गए। भानुदास रात को दो बजे कीर्तन से वापस आए तो पता चला कि व्यापारियों के पैसे तो गई साथ ही उनकी पिटाई भी हुई। तब भानुदास ने अपना घोड़ा ढूंढा तो एक युवक ने बताया कि वहां है आपका घोड़ा। युवक ने यह भी बताया कि आपकी कपड़े की गठरी व्यापारियों ने यहां फेंकी थी वे भी ले ले। भानुदास ने पूछा तुम कौन हो। युवक ने कहा जो जैसा मानता है वैसा रहता हूं। भानु ने फिर पूछा तुम हां रहते हो, तो उन्होंने कहा सर्वत्र रहता हूं। तुम्हारा नाम कया तो युवक ने कहा कोई भी रख दें। मा बाप कौन तो कहा कि कोई भी बन जाओ। तुम क्या करते हो, भक्तों की सेवा करता हूं। तब भानुदास ने कहा तुम्हारी बात समझ में नहीं आती तो उसने कहा मैं सारी समझ के पार हूं।...और ऐसा कहते हूं युवक गायब हो गया।... बस इस घटना के बाद भानुदास का जीवन बदल गया।     15.संत बहिणाबाई : संत तुकाराम की समकालीन संत बहिणाबाई का स्थान भी मुक्ताबाई, कान्होपात्रा, जनाबाई, वेणाबाई, आक्काबाई, मीराबाई के समान है। बहिणाबाई का जन्म वैजपुर तालुका के देवगांव में सन् 1551 में हुआ। पति का नाम था रत्नाकर। बहिणाबाई जयराम के सत्संग सुन सुन कर भक्त बन गई। वह अपने बछड़े को कथा में ले जाती थी, जिसके चलते उसकी निंदा होने लगती थी। बहिणाबाई के पति को लोगों ने भड़काया तब पति ने उसकी कुटाई कर दी। कुटाई से बेहोश हो गई। तीन दिन तक बेहोश रही तब तक बछड़े ने भी अन्न जल ग्रहण नहीं किया। जब बहिणाबाई उठी तो उसने बछड़े को गोद में लिया और बछड़े ने गोद में ही प्राण त्याग दिया। तुकाराम को यह पता चला तो उन्होंने बहिणाबाई को दर्शन दिया और उनको अपना शिष्य बनाया। संत बहिणाबाई वारकरी संप्रदाय के भक्तों से सबसे लोकप्रिय थीं।

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pari singh piya Mar 26, 2019

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