*श्री हनुमान जी महाराज,* *श्री हनुमान गढ़ी अयोध्या धाम के आज 10-04-2021 के अद्भुत एवं अलौकिक दर्शन…* *श्री हनुमान जी की कृपा सभी पर बनी रहे.. ऐसी मंगल कामना…!!!* *#जय_श्री_राम* 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

*श्री हनुमान जी महाराज,*
*श्री हनुमान गढ़ी अयोध्या धाम के आज 10-04-2021 के अद्भुत एवं अलौकिक दर्शन…*
*श्री हनुमान जी की कृपा सभी पर बनी रहे.. ऐसी मंगल कामना…!!!*
*#जय_श्री_राम*
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RamniwasSoni May 6, 2021

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RamniwasSoni May 6, 2021

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‼🐘‼🐁जय श्री गणेश जी🐁‼🐘‼ भगवान गणेश के साथ क्यों लेते हैं शुभ-लाभ का नाम बुधवार को पूरे विधि विधान के साथ भगवान गणेश की पूजा की जाती है. भगवान गणेश भक्तों पर प्रसन्न होकर उनके दुखों को हरते हैं और सभी की मनोकामनाएं पूरी करते हैं. हिंदू मान्यताओं के अनुसार कोई भी शुभ कार्य करने से पहले भगवान गणेश की पूजा की जानी जरूरी है. भगवान गणेश सभी लोगों के दुखों को हरते हैं. भगवान गणेश खुद रिद्धि-सिद्धि के दाता और शुभ-लाभ के प्रदाता हैं। वह भक्तों की बाधा, सकंट, रोग-दोष तथा दरिद्रता को दूर करते हैं. शास्‍त्रों के अनुसार माना जाता है कि श्री गणेश जी की विशेष पूजा का दिन बुधवार है. कहा जाता है कि बुधवार को गणेश जी की पूजा और उपाय करने से हर समस्‍या का समाधान हो जाता है. अक्सर लोग अपने मुख्य दरवाजे के बाहर या फिर उसके आसपास की दीवारों पर लाभ और शुभ लिखते हैं. यह क्यों लिखते हैं और क्या है इनका भगवान गणेशजी से संबंध आइए आपको बताते हैं. गणेशजी के दो पुत्र शुभ और लाभ भगवान शिव के पुत्र गणेशजी का विवाह प्रजापति विश्वकर्मा की पुत्री ऋद्धि और सिद्धि नामक दो कन्याओं से हुआ था. सिद्धि से 'क्षेम' और ऋद्धि से 'लाभ' नाम के दो पुत्र हुए. लोक-परंपरा में इन्हें ही शुभ-लाभ कहा जाता है. गणेश पुराण के अनुसार शुभ और लाभ को केशं और लाभ नामों से भी जाना जाता है. रिद्धि शब्द का अर्थ है 'बुद्धि' जिसे का हिंदी में शुभ कहते हैं. ठीक इसी तरह सिद्धी इस शब्द का अर्थ होता है 'आध्यात्मिक शक्ति' की पूर्णता यानी 'लाभ'. चौघड़ियां जब हम कोई चौघड़िया या मुहूर्त देखते हैं जो उसमें अमृत के अलावा लाभ और शुभ को ही महत्वपूर्ण माना जाता है. द्वार पर गणेशजी के पुत्रों के नाम 'स्वास्तिक' के दाएं-बाएं लिखा जाता है. घर के मुख्य दरवाजे पर 'स्वास्तिक' मुख्य द्वार के ऊपर मध्य में और शुभ और लाभ बाईं तरफ लिखते हैं. स्वास्तिक की दोनों अलग-अलग रेखाएं गणपति जी की पत्नी रिद्धि-सिद्धि को दर्शाती हैं. घर के बाहर शुभ-लाभ लिखने का मतलब यही है कि घर में सुख और समृद्धि सदैव बनी रहे. लाभ लिखने का भाव यह है कि भगवान से लोग प्रार्थना करते हैं कि उनके घर की आय और धन हमेशा बढ़ता रहे, लाभ होता रहे.

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Shyam Yadav May 6, 2021

🌞🌼🌞🌼🌞🌼🌞🌼🌞🌼🌞 🌹👣🌹 || गुरुभक्तियोग कथा अमृत || 🙏 *🌹रामानुज जी का प्रसंग...(भाग - 6)🌹* जिसके ऊपर सदैव गुरु की कृपा रहती है ऐसे शिष्य को धन्यवाद है। हिंदुओं के पुराणों में एवं अन्य पवित्र ग्रंथों में गुरुभक्ति की महत्ता गाने वाले सैंकड़ों उदाहरण भरे हुए हैं। जिसको सच्चे गुरु प्राप्त हुए हैं ऐसे शिष्य के लिए कोई भी वस्तु अप्राप्य नहीं रहती। आप अपने इष्ट देवता को गुरुकृपा के द्वारा ही प्रत्यक्ष मिल सकते हैं। गुरु एक प्रकार के माध्यम हैं जिनके द्वारा ईश्वर की कृपा भक्त के प्रति बहती है। सच्चे गुरु की अपेक्षा अधिक प्रेम बरसाने वाला, अधिक हितकारी, अधिक कृपालु और अति प्रिय व्यक्ति इस विश्व में मिलना दुर्लभ है। शिष्य के लिए तो गुरु से उच्चत्तर देवता कोई नहीं है। सचमुच गुरु के सत्संग जितनी उन्नतिकारक दूसरी एक भी वस्तु नहीं है। गुरु की आवश्यकता के संबंध में प्राचीन काल के तमाम साधू सन्यासियों का एक समान ही अभिप्राय था। गुरु के बिना साधक अपने लक्ष्य पर पहुंच सकता है ऐसा कहने का अर्थ होता है कि प्रवासी बाढ़ में उफनती हुई तूफानी नदी को नौका की सहायता के बिना ही पार कर सकता है। सत्संग माने गुरु का सहवास, सत्संग के बिना मन ईश्वर की ओर नहीं मुड़ सकता। कल हमने सुना रामानुजाचार्य के जीवन प्रसंग में कि रामानुज ने अर्थात लक्ष्मण ने यादव प्रकाश की व्याख्या को एक और बार खंडित किया। *सत्यम ज्ञानम अनंत्तम ब्रह्म* इससे यादव प्रकाश रूष्ट होकर कहने लगे, कि अरे दृष्ट बालक तू यदि हमारी व्याख्या नहीं सुनना चाहता तो व्यर्थ यहां क्यूं आया है। अपने घर जाकर पाठशाला में क्यूं नहीं पढ़ाता। तदनंतर पुनः अध्यापक ने स्थिर होकर कहा तेरी व्याख्या शंकराचार्य के मतानुकूल नहीं है और अन्य किसी पूर्वाचार्य के भी मतानुकूल नहीं है। अतः अब से फिर ऐसी दृष्टता ना करना। श्री रामानुज अर्थात लक्ष्मण यह सुनते ही ठिठक गए। लक्ष्मण स्वभाव से ही अधिक नम्र और गुरुभक्त थे। पाठ के समय वे मौन धारण करके रहने लगे । प्रतिवाद करने की उनकी बिलकुल इच्छा नहीं थी, परंतु करते क्या! जब अध्यापक की व्याख्या से वे सत्य का अपलाब होते देखते थे तब उनका ह्रदय कांप जाता था और इच्छा ना रहने पर भी उनका उसका प्रतिवाद करना ही पड़ता है। यादव यद्यपि उनके प्रतिवाद को अपनी शिष्य मंडली को निसार ठहरा देते थे तथापि यादव धीरे-धीरे लक्ष्मण से भय करने लगे । यादव ने सोचा संभव है यह बालक समय पाकर अद्वैत का खंडन करके द्वैत मत की स्थापना कर देगा। किसी प्रकार इससे छुटकारा मिलना चाहिए । सनातन अद्वैत मत की रक्षा के लिए इसका प्राण संहार करना ही उचित है। यादव प्रकाश ने अद्वैत मत पर अधिक भक्ति के कारण ऐसा पार्श्व सिद्धांत स्थिर नहीं किया किंतु प्रबल ईर्ष्या ही इसका कारण है। यादव स्थित प्रज्ञ नहीं हैं, इसलिए उनकी मति में विकृति हुई और द्वेष, ईर्ष्या, दाह ने घर कर लिया। जो मात्र शास्त्रों को ही रट लेते हैं लेकिन उसके मर्म को नहीं जानते वे सचमुच में दया के पात्र बन जाते हैं। स्थितप्रज्ञ उनका तो ना कोई शत्रु है और ना कोई मित्र। वे सबका कल्याण चाहते हैं, वे नित्य संतुष्ट और सर्वत्रपूर्ण होते हैं, परंतु जो स्वयं को बड़ा व्यक्ति समझता है वह कहता है कि *कोअन्यो अस्ति सदृशो मम* मेरे समान कोई और कौन हो सकता है। यादव प्रकाश भी ऐसे ही बड़े आदमी थे। अतः ईर्ष्या के वशवर्ती उनका ह्रदय लक्ष्मण के वध की कामना करने लगा। यद्यपि यह साधारण बुद्धि की सहायता से उन्होंने वेदांत के कठिन तर्कों को अधीन कर लिया था। यद्यपि वे ब्रह्म ही सत्य हैं और जगत मिथ्या है। इस तत्व को सबके सामने स्पष्ट रूप से प्रमाणित कर सकते थे। यद्यपि उनकी कीर्ति, कांचीपुर में व्याप्त हो गई थी। यद्यपि उनकी शिष्य मंडली उन्हें शंकरावतार समझती थी। तथापि साधनहीन होने के कारण उनका ज्ञान केवल वाचक था। वे वासनाओं की दासता से अपना उद्धार नहीं कर सकते थे। एक दिन एकांत में यादव ने अपने शिष्यों को बुलाकर कहा देखो तुम लोग तो हमारी व्याख्या में किसी प्रकार के दोष नहीं देखते। परंतु वह दृष्ट रामानुज जब देखो तब हमारी व्याख्या में दोष दिखाया करता है। अरे हम तो शंकराचार्य के मत पर चलते हैं और वह दुष्ट हमारी ही व्याख्या को खंडित करने चलता है। बुद्धिमान होने से क्या हुआ उसका मन द्वैत रूप भक्ति के पाखंड से परिपूर्ण है। इस पाखंड से बचने का उपाय क्या है ? यह सुनकर एक शिष्य बोल उठा कि महाराज उसको अपने यहां आने ही ना दिया जाए। इसी समय एक दूसरे शिष्य ने कहा कि इससे क्या होगा। जिसका डर है उसका तो कोई उपाय हुआ ही नहीं। अपने यहां ना आने देने से लक्ष्मण एक पाठशाला खोलकर द्वैत मत का प्रचार करेगा। क्या तुमने सुना नहीं कि *सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म* इसकी एक बृहत व्याख्या कर लक्ष्मण ने अद्वैतमत का खंडन किया है और वास्तव में सचमुच लक्ष्मण ने अर्थात श्री रामानुज ने *सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म* की एक बृहत व्याख्या की थी। जिससे वहां के पंडितों में उनका बड़ा आदर होने लगा था। खैर कुछ देर यहां वादानुवाद के पश्चात यह स्थिर हुआ कि लक्ष्मण के वध के अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है। इसके निश्चित होने पर किस प्रकार यह काम अनायास और बिना किसी के जाने सिद्ध होगा। यह बात की मीमांसा होने लगी, अंत में यादव प्रकाश ने योजना बनाते हुए कहा कि चलो हम लोग गंगा स्नान से पाप दूर करने के लिए तीर्थ यात्रा को चलें। तुम सब मिलकर यह बात लक्ष्मण को बता दो और वह भी तीर्थ यात्रा में हम लोगों के साथ चले, इसके लिए प्रयत्न करो । क्यूंकि तीर्थ यात्रा का और कुछ उद्देश्य नहीं है केवल इस पाखंडी का नाश करना ही है। समय और स्थान देखकर मार्ग में उसका वध करके गंगा स्नान के द्वारा हम लोग ब्रह्म हत्या का दोष भी छुड़ा लेंगे और अद्वैत मत का कंटक भी सदा के लिए उखड़ जाएगा। यह हमारी संस्कृति के लिए बहुत बड़ी सेवा हो जायेगी। शिष्यगण अध्यापक का ऐसा साधुक्ति पूर्ण परामर्श सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और वे लक्ष्मण को तीर्थ यात्रा का प्रलोभन देने को चले। लक्ष्मण जिस समय यादव प्रकाश का शिष्यत्व ग्रहण किया था, उसी समय उनकी मौसी के लड़के ने भी जिसका नाम गोविंद, उसने भी यादव प्रकाश का शिष्यत्व ग्रहण किया था। दोनों भाई प्रायः एक ही साथ पढ़ते थे । यादव के शिष्यों ने लक्ष्मण को गंगा स्नान करने के लिए उद्वत कराया। अतः गोविंद भी बड़े आग्रह से उनके साथ जाने के लिए उद्वत हुआ। शुभ दिन और शुभ मुहूर्त में यादव प्रकाश के साथ उनकी शिष्य मंडली तीर्थ यात्रा करने की इच्छा से आर्यवर्त की ओर प्रस्थित हुई। कतिपय दिनों के अनंत्र शिष्य मंडली के साथ यादव विंध्याचल के समीपस्थ गोडा अरण्य में उपस्थित हुए। सरल चित्त लक्ष्मण इस भयंकर षड्यंत्र का बिंदू विसर्ग भी नहीं जानते थे। 🌿🙏👣🙏🌿🌿🙏👣🙏🌿🙏

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Shyam Yadav May 6, 2021

🌞🌼🌞🌼🌞🌼🌞🌼🌞🌼🌞 🌹👣🌹 || गुरुभक्तियोग कथा अमृत || 🙏 *🌹रामानुज जी का प्रसंग...(भाग - 5)🌹* गुरुभक्तियोग माने गुरु की सेवा के द्वारा मन और उसके विकारों पर नियंत्रण एवं पुनः संस्करण। गुरु को सम्पूर्ण बिनशर्ती शरणागति करना गुरुभक्ति प्राप्त करने के लिए निश्चित मार्ग है। गुरुभक्तियोग की नींव गुरु के ऊपर अखंड श्रद्धा में निहित है। अगर आपको सचमुच ईश्वर की आवश्यकता हो तो सांसारिक सुख-भोगों से दूर रहो और गुरुभक्तियोग का आश्रय लो। किसी भी प्रकार की रुकावट के बिना गुरुभक्तियोग का अभ्यास जारी रखो। गुरुभक्तियोग का अभ्यास ही मनुष्य को जीवन के हर क्षेत्र में निर्भय एवं सदासुखी बना सकता है। गुरुभक्तियोग के द्वारा अपने भीतर ही अमर-आत्मा की खोज करो। गुरुभक्तियोग को जीवन का एकमात्र हेतु, उद्देश्य एवं सच्चे रस का विषय बनाओ, इससे आपको परम-सुख की प्राप्ति होगी। गुरुभक्तियोग आपको ज्ञान प्राप्ति में सहायक है। गुरुभक्तियोग का मुख्य हेतु तूफानी इंद्रियों एवं भटकते हुए मन पर नियंत्रण पाना है। गुरुभक्तियोग हिंदू संस्कृति की एक प्राकृतिक प्राचीन शाखा है। जो मनुष्य को शाश्वत सुख के मार्ग पर ले जाती है और ईश्वर के साथ सुखद समन्वय कर देती है। गुरुभक्तियोग अध्यात्मिक और मानसिक विकास का शास्त्र है । श्री रामानुजाचार्य के जीवन-प्रसंग में कल हमने सुना कि बालक लक्ष्मण ने शिक्षक यादव प्रकाश के सभी प्रश्नों का उत्तर दिया और यादव प्रकाश ने लक्ष्मण को अपने यहां रहने की और शास्त्र अध्ययन की अनुमति प्रदान की। नवीन शिष्य की प्रतिभा देखकर यादव प्रकाश बड़े ही प्रसन्न हुए। थोड़े ही दिनों में लक्ष्मण यादव प्रकाश के सर्व-प्रधान अत्यंत प्रिय शिष्य हो गए परंतु यह शिष्य और गुरु की प्रीति बहुत दिनों तक रह ना सकी। यादव प्रकाश एक अद्वैतीय बुद्धिमान मनुष्य थे। बुद्धिमत्ता तो यादव प्रकाश में थी परंतु बुद्धि ब्रह्म में प्रतिष्ठित ना थी। आज भी यादव प्रकाश का कहा हुआ अद्वैत सिद्धांत "यादवीय सिद्धांत" के नाम से शास्त्रों में बड़ा प्रसिद्ध है । वे एक प्रकार से शुद्ध अद्वैतवादी थे, परंतु वे ईश्वर की साकार मूर्ति नहीं मानते थे। जगत ईश्वर की परिवर्तनशील, नित्य नश्वर विराट मूर्ति है, इसी विराट मूर्ति के पश्चात जो देश काल निमित्तातीत अक्षर सच्चिदानंद सत्ता है, वही विराट सत्ता है, वही उपाधेय और ज्ञेय है। पूज्यपाद शंकराचार्य के समान वे विराटमय माया अथवा रज्जू में सर्प का विवर्त एक में अन्य ज्ञान ऐसा नहीं कहते । जगत उनकी दृष्टि से मरीचिका के समान मिथ्या है। यह ईश्वर का एक रूप है जो नित्य और परिवर्तनशील है। सतत चंचल होने के कारण ही यह और सत्तत स्थिर है, इस कारण स्वराट उपाद्येय है। यादव प्रकाश उस काल के वेदांत के अच्छे विद्वान तो थे, सरल भाषा में कहा जाए तो वेदांतवादी थे परंतु भक्ति से शून्य थे। ऐसे जनों को मनीषियों ने रूखा वेदांती कहा है जो भक्ति के रस से हीन होते हैं। वहीं लक्ष्मण को उनके पिता ने शास्त्रों के साथ-साथ भक्ति का भी बीज उनके हृदय में बोया था, उनके जीवन में भक्ति का भी प्रादुर्भाव कराया था इसलिए लक्ष्मण का जीवन ईश्वराभक्ति से सरावोर था। और इसी कारण यादवीय सिद्धांत कभी भी लक्ष्मण को पसंद नहीं आया, परंतु गुरु का गौरव रखने के लिए उन्होंने कभी यादव की शिक्षा का दोष दिखाने का साहस नहीं किया। इच्छा रहने पर भी वे गुरु के सिद्धांत के दोष दिखाने का साहस ना कर सकते थे। एक दिन प्रातः काल का पाठ समाप्त होने पर शिष्य वर्ग मध्यान्ह की संध्या क्रिया करने के लिए अपने-अपने घर गए। उस समय यादव प्रकाश ने अपने प्रियतम शिष्य लक्ष्मण को शरीर पर तेल लगाने के लिए कहा । उस समय भी एक छात्र पढ़ रहा था, वह छांदुक्य उपनिषद पढ़ता था उसके प्रथम अध्याय के सष्ट खंड के सप्तम मंत्र के पूर्वाश में जो कप्यास शब्द है उसका अर्थ वह पुंडरीक मीम मक्षिणी से किया। यादव प्रकाश ने कप्यास शब्द का अर्थ वानर के पृष्ठ अर्थात अंतिम भाग से करते हुए कहा कि भगवान की आंखें बंदर के पिछले भाग की तरह लाल हैं। इस विस्दृष और हीनोपमायुक्त व्याख्या को सुनकर तेल लगाते हुए लक्ष्मण का स्वभाव कोमल और भक्ति मधुर हृदय पिघल गया और अश्रु का आकार धारण करके आंखों के कोने से निकलकर यादव प्रकाश के शरीर पर पड़ा। जलते हुए अंगार के तुल्य अश्रु धार पड़ने से यादव प्रकाश चकित होकर ऊपर देखने लगे। उस समय उन्हें मालूम हुआ कि यह कोई अंगारा नहीं किंतु उनके प्रिय शिष्य लक्ष्मण की अश्रु धारा है। उन्होंने विस्मित होकर लक्ष्मण से इसका कारण पूछा तो उत्तर मिला कि भगवन आपके समान महानुभाव से इस प्रकार के अर्थ सुनकर मैं बड़ा मर्माहत हुआ हूं। सर्वकल्याणमय निखिल सौंदर्य का आकार सच्चिदानंद मय विग्रह प्रात्पर भगवान के मुख के सहित वानर के अपान देश की तुलना करना कितना अन्याय और पापजनक लगता है । सो मैं क्या कहूं ? आपके समान बुद्धिमान के मुख से ऐसा अनर्थ सुनने की आशा ना थी। यादव प्रकाश ने कहा वत्स मैं भी तुम्हारी दाम्भिकता से अधिक दुखित हुआ हूँ। तुम मेरे ही अर्थ का विघटन कर रहे हो, तुम तो अपने गुरु से ही तर्क लड़ा रहे हो। कुछ देर शांत होने के बाद, अच्छा इसका इससे अधिक अच्छा अर्थ तुम कर सकते हो ? लक्ष्मण ने कहा आपके आशीर्वाद से सभी संभव हो सकता है। यादव प्रकाश ने ईर्ष्यत्व घृणित हास्य करते हुए कहा ठीक है, ठीक है । तुम अपना नया अर्थ कहो। अब लक्ष्मण ने कहा कि, "कप्यासम" शब्द में पद का अर्थ जल को और पिवती का अर्थ पान करना अर्थात कपि का अर्थ सूर्य होगा। इसका अर्थ हुआ विकसित फलतः सम्पूर्ण शब्द का अर्थ हुआ सूर्य के द्वारा जो विकसित होता है अर्थात पदम्। इस प्रकार आंखों की लालिमा की उपमा पदम सरीखे लाल से की जा सकती है कि भगवान की आंखें पदम् के समान लाल हैं। इस विद्वितापूर्ण व्याख्या को सुनकर यादव प्रकाश चौंक उठे, उनका ही शिष्य इतनी ऊंची कल्पना कर सकता है, इसका उन्हें स्वप्न में भी विश्वास ना था। ऐसे तीक्ष्णादि बालक को कब्जे में लाना कठिन है। ऊपरी मन से उन्होंने लक्ष्मण की प्रशंसा की वाह क्या व्याख्या है, परंतु भीतर से वह कुढ़ते रहे। इतने में एक दूसरी घटना घटी, एक दिन तैतरीय उपनिषद के *सत्यम ज्ञानम अनंतम ब्रह्म* इस मंत्र की जब यादव प्रकाश ने ब्रह्म को असत्यावृत, अज्ञानवृत और परिच्छिन्नवृत कहकर व्याख्या की तब श्री रामानुज अर्थात लक्ष्मण उसका प्रतिवाद करने के लिए फिर से उद्वत हुए और उन्होंने कहा ब्रह्म सत्य स्वरूप है, ज्ञान स्वरूप है और वे अनंत हैं अर्थात वे सत्यत्व, ज्ञानत्व और अनंतत्व आदि गुणों से गुणी हैं। यह गुण उनके स्वरूप मात्र नहीं हो सकते। यह सब भगवान के गुण हैं। इस व्याख्या को सुनकर अध्यापक गर्म तेल में भुने हुए बैंगन के समान लहक उठे। उन्होंने कहा अरे दुष्ट बालक ! यदि तू हमारी व्याख्या ही नहीं सुनना चाहता तो व्यर्थ यहां क्यूं आया है ? तेरी व्याख्या शंकराचार्य की मतांत अनुकूल नहीं है और अन्य किसी पूर्वाचार्य के भी मतानुकूल नहीं है। अतः अब से ऐसी दुष्टता ना करना। लक्ष्मण शिक्षक यादव प्रकाश की डांट सुनकर वहीं ठिठक गए। 🌿🙏👣🙏🌿🌿🙏👣🙏🌿🙏

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