Raj
Raj Mar 2, 2021

जय जिनेन्द्र

जय जिनेन्द्र

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🌹bk preeti 🌹 Apr 12, 2021

🏵️ *ताँबा - कोरोना के लिए घातक* 🏵️ ताँबा धातु और कोरोना वायरस को लेकर एक हैरान कर देने वाली बात सामने आ रही है। कहा जा रहा है ताँबा धारण करने वाले पर कोरोना का असर नहीं हो रहा. अगर किसी ने शुद्ध ताँबे की अंगूठी, कड़ा या पैंडेंट पहना हुआ है तो कोरोना वायरस उस पर बेअसर है। ब्रिटेन के माइक्रोबायोलॉजी रिसर्चर कीविल का दावा है ताँबा वायरसों का काल है. कीविल काफी समय से ताँबे का विभिन्न वायरसों पर प्रयोग कर रहे हैं. उनका कहना है कोविड 19 ही नहीं कोरोना परिवार के अन्य वायरस भी ताँबे के संपर्क में आते ही तुरंत नष्ट हो जाते हैं। मेडिकल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैरोलिना में माइक्रोबायोलॉजी और इम्यूनोलॉजी के प्रोफेसर माइकल जी श्मिट कहते हैं कीविल का काम हमारे पूर्वजों द्वारा ताँबे के अधिक से अधिक प्रयोग के कारण को सत्यापित करता है। खासकर भारत में तो ताँबे का बहुत ही व्यापक प्रयोग मिलता है। नदियों को साफ़ रखने के लिए उनमें ताँबे के सिक्के डालने से लेकर रसोई में ताँबे के बर्तनों के इस्तेमाल तक ताँबे के चमत्कारिक गुणों का उपयोग हुआ है। कीविल का कहना है ताँबा मनुष्य को प्रकृति का वरदान है। प्राचीनकाल से ही मनुष्य ने इसकी जर्म्स और बैक्टीरिया नष्ट करने की प्रकृति को जान लिया था। उनका मानना है यदि अस्पतालों, सार्वजानिक स्थानों और घरों के हैंडल और रेलिंग्स ताँबे के बनाये जाएं तो संक्रमणजनित रोगों पर बड़ी आसानी से विजय पाई जा सकती है। सनातन में सूर्य को सबसे बड़ा इम्युनिटी बूस्टर माना गया है और ताँबा सूर्य की धातु है. ताँबे को सबसे पवित्र और शुद्ध धातु भी माना गया है। 1918 में भारत में फ्लू महामारी से लगभग दो करोड़ लोग मारे गए थे, कहते हैं तब भी जिन लोगों ने ताँबा पहना हुआ था उन पर इस महामारी का कोई असर नहीं हुआ...! 🌹 *ज्ञानस्य मूलम धर्मम्* 🌹

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🌹bk preeti 🌹 Apr 12, 2021

ओम शांति।। *यदि "महाभारत" को पढ़ने का समय न हो तो भी इसके नौ सार- सूत्र हमारे जीवन में उपयोगी सिद्ध हो सकते है....!!* *1.संतानों की गलत माँग और हठ पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया, तो अंत में आप असहाय हो जायेंगे-* *कौरव* *2.आप भले ही कितने बलवान हो लेकिन अधर्म के साथ हो तो, आपकी विद्या, अस्त्र-शस्त्र शक्ति और वरदान सब निष्फल हो जायेगा -* *कर्ण* *3.संतानों को इतना महत्वाकांक्षी मत बना दो कि विद्या का दुरुपयोग कर स्वयंनाश कर सर्वनाश को आमंत्रित करे-* *अश्वत्थामा* *4.कभी किसी को ऐसा वचन मत दो कि आपको अधर्मियों के आगे समर्पण करना पड़े -* *भीष्म पितामह* *5.संपत्ति, शक्ति व सत्ता का दुरुपयोग और दुराचारियों का साथ अंत में स्वयंनाश का दर्शन कराता है -* *दुर्योधन* *6.अंध व्यक्ति- अर्थात मुद्रा, मदिरा, अज्ञान, मोह और काम ( मृदुला) अंध व्यक्ति के हाथ में सत्ता भी विनाश की ओर ले जाती है -* *धृतराष्ट्र* *7.यदि व्यक्ति के पास विद्या, विवेक से बँधी हो तो विजय अवश्य मिलती है -* *अर्जुन* *8.हर कार्य में छल, कपट, व प्रपंच रच कर आप हमेशा सफल नहीं हो सकते -* *शकुनि* *9.यदि आप नीति, धर्म, व कर्म का सफलता पूर्वक पालन करेंगे, तो विश्व की कोई भी शक्ति आपको पराजित नहीं कर सकती -* *युधिष्ठिर* *यदि इन नौ सूत्रों से सबक लेना सम्भव नहीं होता है तो जीवन मे महाभारत संभव हो जाता है।* नित याद करो मन से शिव को 🙏

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🌹bk preeti 🌹 Apr 12, 2021

Har har mahadev j🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌹🌹🙏🙏🙏✍️ श्मशान में जब महर्षि दधीचि के मांसपिंड का दाह संस्कार हो रहा था तो उनकी पत्नी अपने पति का वियोग सहन नहीं कर पायीं और पास में ही स्थित विशाल पीपल वृक्ष के कोटर में 3 वर्ष के बालक को रख स्वयम् चिता में बैठकर सती हो गयीं। इस प्रकार महर्षि दधीचि और उनकी पत्नी का बलिदान हो गया किन्तु पीपल के कोटर में रखा बालक भूख प्यास से तड़प तड़प कर चिल्लाने लगा।जब कोई वस्तु नहीं मिली तो कोटर में गिरे पीपल के गोदों(फल) को खाकर बड़ा होने लगा। कालान्तर में पीपल के पत्तों और फलों को खाकर बालक का जीवन येन केन प्रकारेण सुरक्षित रहा। एक दिन देवर्षि नारद वहाँ से गुजरे। नारद ने पीपल के कोटर में बालक को देखकर उसका परिचय पूंछा-नारद- बालक तुम कौन हो ?बालक- यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ ।नारद- तुम्हारे जनक कौन हैं ?बालक- यही तो मैं जानना चाहता हूँ ।तब नारद ने ध्यान धर देखा।नारद ने आश्चर्यचकित हो बताया कि हे बालक ! तुम महान दानी महर्षि दधीचि के पुत्र हो। तुम्हारे पिता की अस्थियों का वज्र बनाकर ही देवताओं ने असुरों पर विजय पायी थी। नारद ने बताया कि तुम्हारे पिता दधीचि की मृत्यु मात्र 31 वर्ष की वय में ही हो गयी थी।बालक- मेरे पिता की अकाल मृत्यु का कारण क्या था ?नारद- तुम्हारे पिता पर शनिदेव की महादशा थी।बालक- मेरे ऊपर आयी विपत्ति का कारण क्या था ?नारद- शनिदेव की महादशा। इतना बताकर देवर्षि नारद ने पीपल के पत्तों और गोदों को खाकर जीने वाले बालक का नाम पिप्पलाद रखा और उसे दीक्षित किया।नारद के जाने के बाद बालक पिप्पलाद ने नारद के बताए अनुसार ब्रह्मा जी की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया। ब्रह्मा जी ने जब बालक पिप्पलाद से वर मांगने को कहा तो पिप्पलाद ने अपनी दृष्टि मात्र से किसी भी वस्तु को जलाने की शक्ति माँगी।ब्रह्मा जी से वरदान मिलने पर सर्वप्रथम पिप्पलाद ने शनि देव का आह्वाहन कर अपने सम्मुख प्रस्तुत किया और सामने पाकर आँखे खोलकर भष्म करना शुरू कर दिया।शनिदेव सशरीर जलने लगे। ब्रह्मांड में कोलाहल मच गया। सूर्यपुत्र शनि की रक्षा में सारे देव विफल हो गए। सूर्य भी अपनी आंखों के सामने अपने पुत्र को जलता हुआ देखकर ब्रह्मा जी से बचाने हेतु विनय करने लगे।अन्ततः ब्रह्मा जी स्वयम् पिप्पलाद के सम्मुख पधारे और शनिदेव को छोड़ने की बात कही किन्तु पिप्पलाद तैयार नहीं हुए।ब्रह्मा जी ने एक के बदले दो वरदान माँगने की बात कही। तब पिप्पलाद ने खुश होकर निम्नवत दो वरदान मांगे-1- जन्म से 5 वर्ष तक किसी भी बालक की कुंडली में शनि का स्थान नहीं होगा।जिससे कोई और बालक मेरे जैसा अनाथ न हो।2- मुझ अनाथ को शरण पीपल वृक्ष ने दी है। अतः जो भी व्यक्ति सूर्योदय के पूर्व पीपल वृक्ष पर जल चढ़ाएगा उसपर शनि की महादशा का असर नहीं होगा। ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह वरदान दिया।तब पिप्पलाद ने जलते हुए शनि को अपने ब्रह्मदण्ड से उनके पैरों पर आघात करके उन्हें मुक्त कर दिया । जिससे शनिदेव के पैर क्षतिग्रस्त हो गए और वे पहले जैसी तेजी से चलने लायक नहीं रहे।अतः तभी से शनि "शनै:चरति य: शनैश्चर:" अर्थात जो धीरे चलता है वही शनैश्चर है, कहलाये और शनि आग में जलने के कारण काली काया वाले अंग भंग रूप में हो गए।सम्प्रति शनि की काली मूर्ति और पीपल वृक्ष की पूजा का यही धार्मिक हेतु है।आगे चलकर पिप्पलाद ने प्रश्न उपनिषद की रचना की,जो आज भी ज्ञान का वृहद भंडार है !! !!! 🙏🙏 !!! संकलित

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🌹bk preeti 🌹 Apr 11, 2021

🌹प्रभू की दुकान 🌹 एक दिन में सड़क से जा रहा था । रास्ते में एक जगह बोर्ड लगा था 🙏🏻ईश्वरीय किरायाने की ⚖️दुकान मेरी जिज्ञासा बढ़ गई क्यों ना इस दुकान पर जाकर देखो इसमें बिकता क्या है? जैसे ही यह ख्याल आया🪟 दरवाजा अपने आप खुल गया । मैंने खुद को दुकान के अंदर पाया। जरा सी जिज्ञासा रखते हैं द्वार अपने आप खुल जाते हैं। खोलने नहीं पड़ते। मैंने दुकान के अंदर देखा जगह-जगह देवदूत खड़े थे एक देवदूत ने । मुझे टोकरी देते हुए कहा ,मेरे बच्चे ध्यान से खरीदारी करो वहा वह सब कुछ था जो एक इंसान को चाहिए होता है। देवदूत ने कहा एक बार में टोकरी भर कर ना ले जा सको, तो दोबारा आ जाना फिर दोबारा टोकरी भर लेना। अब मैंने सारी चीजें देखी ।सबसे पहले धीरज खरीदा फिर प्रेम भी ले लिया, फिर समझ भी ले ली। फिर एक दो डिब्बे विवेक भी ले लिया। आगे जाकर विश्वास के दो तीन डिब्बे उठा लिए ।मेरी टोकरी भरती गई । आगे गया पवित्रता मिली सोचा इसको कैसे छोड़ सकता हूं , फिर शक्ति का बोर्ड आया शक्ति भी ले ली। हिम्मतभी ले ली सोचा हिम्मत के बिना तो जीवन में काम ही नहीं चलता। आगे सहनशीलता ली फिर मुक्ति का डिब्बा भी ले लिया । मैंने वह सब चीजें खरीद ली जो मेरे मालिक खुदा को पसंद है। फिर जिज्ञासु की नजर प्रार्थना पर पड़ी मैंने उसका भी एक डिब्बा उठा लिया। कि सब गुण होते हुए भी अगर मुझसे कभी कोई भूल हो जाए तो मैं प्रभु 🙏🏻से प्रार्थना कर लूंगा कि मुझे भगवान माफ 🙏🏻कर देना आनंद शांति गीतों से मैंने basket 🛒को भर लिया। फिर मैं काउंटर🚶🏻‍♂️ पर गया और देवदूत से पूछा सर -मुझे इन सब समान का कितना बिल चुकाना है देवदूत बोला मेरे बच्चे यहां के bill को चुकाने का ढंग भी ईश्ववरीय है। अब तुम जहां भी जाना इन चीजों को भरपूर बांटना और लुटाना। इन चीजों का बिल इसी तरह चुकाया जाता है । कोई- कोई विरला इस दुकान पर प्रवेश करता है। जो प्रवेश कर लेता है वह मालो- माल हो जाता है। वह इन गुणों को खूब भोगता भी है ,और लुटाता भी है। प्रभू की यह दुकान शिव सतगुरु के सत्संग की दुकान है। शिव सतगुरु की शरण🧘🏻‍♂️ में आकर, उसके वचनों से प्रीत करते हैं तो सब गुणों के खजाने हमको मिल जाते हैं फिर कभी खाली हो भी जाए फिर सत्संग में आ कर बास्केट भर लेना 🙏🙏🙏 🌹तू ही तू 🌹

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🌹bk preeti 🌹 Apr 11, 2021

आप सभी उदास ना हों , बहुत ही जल्दी सब ठीक होगा.. और फिर से ज़िंदगी की उड़ान शुरू होगी , अभी के दौर के लिए कुछ पंक्तियाँ ... आज सलामत रहे , तो कल की सहर देखेंगे... आज पहरे मे रहे तो कल का पहर देखेंगें । सासों के चलने के लिए , कदमों का रुकना ज़रूरी है... घरों में बंद रहना दोस्तों हालात की मजबूरी है । अब भी न संभले तो बहुत पछताएँगे.. सूखे पत्तों की तरह हालात की आँधी में बिखर जाएँगे । यह जंग मेरी या तेरी नहीं , हम सब की है.. इस की जीत या हार भी हम सब की है । अपने लिए नहीं , अपनों के लिए जीना है... यह जुदाई का ज़हर दोस्तों , घूँट- घूँट पीना है । आज महफूज़ रहे , तो कल मिल के खिलखिलाएँगे.. गले भी मिलेंगे , और हाथ भी मिलाएँगे। शुभ रात्रि 💐💐🌹🌹🙏

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🌹bk preeti 🌹 Apr 10, 2021

**( भगवान् क्यो आते हैं )** .ram ram ji ✍️✍️🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏🙏🙏 . एक बार अकबर ने बीरबल से पूछाः तुम्हारे भगवान और हमारे खुदा में बहुत फर्क है। . हमारा खुदा तो अपना पैगम्बर भेजता है जबकि तुम्हारा भगवान बार- बार आता है। यह क्या बात है ? . बीरबलः जहाँपनाह ! इस बात का कभी व्यवहारिक तौर पर अनुभव करवा दूँगा। आप जरा थोड़े दिनों की मोहलत दीजिए। . चार-पाँच दिन बीत गये। बीरबल ने एक आयोजन किया। . अकबर को यमुनाजी में नौका विहार कराने ले गये। कुछ नावों की व्यवस्था पहले से ही करवा दी थी। . उस समय यमुनाजी छिछली न थीं। उनमें अथाह जल था। . बीरबल ने एक युक्ति की कि जिस नाव में अकबर बैठा था, उसी नाव में एक दासी को अकबर के नवजात शिशु के साथ बैठा दिया गया। . सचमुच में वह नवजात शिशु नहीं था। मोम का बालक पुतला बनाकर उसे राजसी वस्त्र पहनाये गये थे ताकि वह अकबर का बेटा लगे। . दासी को सब कुछ सिखा दिया गया था। नाव जब बीच मझधार में पहुँची और हिलने लगी तब 'अरे.... रे... रे.... ओ.... ओ.....' कहकर दासी ने स्त्री चरित्र करके बच्चे को पानी में गिरा दिया और रोने बिलखने लगी। . अपने बालक को बचाने-खोजने के लिए अकबर धड़ाम से यमुना में कूद पड़ा। . खूब इधर-उधर गोते मारकर, बड़ी मुश्किल से उसने बच्चे को पानी में से निकाला। . वह बच्चा तो क्या था मोम का पुतला था। . अकबर कहने लगाः बीरबल ! यह सारी शरारत तुम्हारी है। तुमने मेरी बेइज्जती करवाने के लिए ही ऐसा किया। . बीरबलः जहाँपनाह ! आपकी बेइज्जती के लिए नहीं, बल्कि आपके प्रश्न का उत्तर देने के लिए ऐसा ही किया गया था। . आप इसे अपना शिशु समझकर नदी में कूद पड़े। उस समय आपको पता तो था ही इन सब नावों में कई तैराक बैठे थे, नाविक भी बैठे थे और हम भी तो थे ! . आपने हमको आदेश क्यों नहीं दिया ? हम कूदकर आपके बेटे की रक्षा करते ! . अकबरः बीरबल ! यदि अपना बेटा डूबता हो तो अपने मंत्रियों को या तैराकों को कहने की फुरसत कहाँ रहती है ? . खुद ही कूदा जाता है। . बीरबलः जैसे अपने बेटे की रक्षा के लिए आप खुद कूद पड़े, ऐसे ही हमारे भगवान जब अपने बालकों को संसार एवं संसार की मुसीबतों में डूबता हुआ देखते हैं तो वे पैगम्बर-वैगम्बर को नहीं भेजते, वरन् खुद ही प्रगट होते हैं। . वे अपने बेटों की रक्षा के लिए आप ही अवतार ग्रहण करते है और संसार को आनंद तथा प्रेम के प्रसाद से धन्य करते हैं।

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🌹bk preeti 🌹 Apr 10, 2021

अध्यात्म बड़ा सरल है। फिर भी लोग मन में कई भ्रांतियां पाल लेते हैं कि कहीं आध्यात्मिक होने पर घर छोड़कर संन्यास लेना पड़ जाए, कहीं बैरागी न हो जाऊं, कहीं गृहस्थ धर्म न छोड़ दूं। अध्यात्म तो हमें जीवन जीना सिखाता है। जैसे कोई भी मशीन खरीदने पर उसके साथ एक मैन्युअल बुक आती है, ऐसे ही तन-मन को चलाने के लिए मैन्युअल बुक गीता आदि आध्यात्मिक शास्त्र और गुरु होते हैं जो हमें शरीर, इंद्रियों, मन, बुद्धि अहंकार का प्रयोग करना सिखाते हैं। घर-गृहस्थी में तालमेल बिठाना सिखाते हैं, समाज में आदर्श के रूप में रहना सिखाते हैं, मन को सुलझाना सिखाते हैं। अत: धर्म कोई भी हो, लेकिन सभी को आध्यात्मिक अवश्य होना चाहिए। अब प्रश्र उठता है कि अध्यात्म का लक्ष्य क्या है? यह समझो जैसे आप कभी पहाडिय़ों पर घूमने जाते हैं। पहाडिय़ों पर मंजिल भी वैसी ही होती है, जैसा रास्ता। फिर आप रास्ते के साइड सीन का आनंद लेते हैं, हर सीन को देखकर प्रसन्न होते हैं, उसका मजा लेते हैं। फिर अंत में जहां पहुंचते हैं, वहां भी वही दृश्य पाते हैं। अत: रास्ते का ही मजा है। लॉन्ग ड्राइव में आप रास्ते का ही आनंद लेते हैं। अध्यात्म की यात्रा भी ऐसी ही होती है जिसमें रास्ते का ही मजा है। अध्यात्म कहता है कि बीतते हुए हर पल का आनंद लो, उस पल में रहो, हर पल को खुशी के साथ जियो। हर परिस्थिति, सुख-दुख, मान-सम्मान, लाभ-हानि से गुजरते हुए अपने में मस्त रहो। द्वंद्वों में सम्भाव में रहो क्योंकि मुक्ति मरने के बाद नहीं, जीते जी की अवस्था है। जब हम अपने स्वरूप के साथ जुड़कर हर पल को जीते हैं, तब वह जीते जी मुक्त भाव में ही बना रहता है। अध्यात्म कोई मंजिल नहीं, बल्कि यात्रा है। इसमें जीवन भर चलते रहना है। यह यात्रा हमें वर्तमान में रहना और अभी में आनंद लेना सिखाती है। यदि ‘अभी में’ रहकर उस आनंद भाव में नहीं आए तो कभी हम आनंद में नहीं आ पाएंगे और जब भी आएंगे, उस समय भी अभी ही होगा। वैसे हम पूरा जीवन अभी-अभी की शृंखला में जीते हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक अभी-अभी-अभी में ही जीते हैं। फिर भी मन भूतकाल या भविष्य में ही बना रहता है और भूतकाल का दुख या भविष्य का डर या लालच में ही मन घूमता रहता है लेकिन जब हम अभी में आते हैं, उसी समय से हमारे जीवन में अध्यात्म का प्रारम्भ होता है और फिर हम इस अभी-अभी की कड़ी को पकड़ कर रखते हैं। इसलिए मुक्ति अभी में है, भविष्य में नहीं। अत: यदि हम जीवन भर अभी को पकड़ कर रखें फिर हम जहां हैं जैसे हैं, वहीं आध्यात्मिक हो सकते हैं।

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