MANOJ VERMA
MANOJ VERMA Dec 18, 2017

भगवान् के दर्शन

भगवान् के दर्शन

भगवान् के दर्शन 🚩
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महर्षि रमण से कुछ भक्तों ने पूछा, 'क्या हमें भगवान् के दर्शन हो सकते हैं ?'
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'हां, क्यों नहीं हो सकते ? परंतु भगवान् को देखने के लिए उन्हें पहचानने वाली आंखें चाहिए होती हैं,' महर्षि रमण ने भक्तों को बताया।
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'एक सप्ताह तक चलने वाले समारोह के अंतिम दिन भगवान् आएंगे, उन्हें पहचानकर, उनके दर्शन कर तुम सब स्वयं को धन्य कर सकते हो,' महर्षि ने कहा।
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भगवान् के स्वयं आने की बात सुनकर भक्तों ने मंदिर को सजाया, अत्यंत सुदंर ढंग से भगवान् का श्रृंगार किया तथा संकीर्तन शुरू कर दिया।
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महर्षि रमण भी समय-समय पर संकीर्तन में जाकर बैठ जाते।
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सातवें दिन भंडारा करने का कार्यक्रम था। भगवान् के भोग के लिए तरह-तरह के व्यंजन बनाए गए थे।
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भगवान् को भोग लगाने के बाद उन व्यंजनों का प्रसाद स्वरूप वितरण शुरू हुआ।
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मंदिर के ही सामने एक पेड़ था जिसके नीचे मैले कपड़े पहने एक कोढ़ी खड़ा हुआ था।
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वह एकटक देख रहा था और इस आशा में था कि शायद उसे भी कोई प्रसाद देने आए।
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एक व्यक्ति दया करके साग-पूरी से भरा एक दोना उसके लिए ले जाने लगा तो एक ब्राह्मण ने उसे लताड़ते हुए कहा, 'यह प्रसाद भक्तजनों के लिए हैं, किसी कंगाल कोढ़ी के लिए नहीं बनाया गया।'
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ब्राह्मण की लताड़ सुनकर वह साग-पूरी से भरा दोना वापस ले गया। महर्षि रमण मंदिर के प्रांगण में बैठे यह दृश्य देख रहे थे।
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भंडारा संम्पन्न होने पर भक्तों ने महर्षि से पूछा, 'आज सातवां दिन है, किंतु भगवान् तो नहीं आए।'
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'मंदिर के बाहर जो कोढ़ी खड़ा था, वे ही तो भगवान् थे। तुम्हारे चर्म चक्षुओं ने उन्हें कहां पहचाना ?
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भंडारे के प्रसाद को बांटते समय भी तुम्हें इंसानों में अंतर नजर आता है,' महर्षि ने कहा।
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इतना सुनना था कि भगवान् के दर्शनों के इच्छुक लोगों का मुंह उतर गया।
राधे राधे 🚩

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कामेंट्स

Sunil Varma May 29, 2018
जय श्री राधे राधे

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Swami Lokeshanand Apr 17, 2019

आज यहाँ भगवान की विलक्षण कृपा बरस रही है, सब ओर धन्यता छा रही है, क्योंकि प्रिय भरतलालजी महाराज का प्रसंग प्रारम्भ हो रहा है। अयोध्याकांड मुख्य रूप से भगवान के हृदय भरतजी का ही चरित्र है। भरतजी कौन हैं? "भावेन् रत: स भरत" जो परमात्म् प्रेम में रत है वो भरत। भरत माने संत, भरत माने सद्गुरु। और अयोध्याकांड में गुरुओं की ही महिमा है। पहले भारद्वाज जी, फिर वाल्मीकि जी और अब भरतजी। नाम ही भिन्न भिन्न हैं, तत्व, अनुभूति, प्रेमभाव तो एक ही है। यहाँ जो है, जैसा है, जिस स्थिति में है, बस भरतलाल जी के साथ हो ले, संत का संग कर ले, गुरुजी के बताए साधन और उपदेश को पकड़ ले, उसे भगवान मिलते ही हैं। कोई लाख पापी हो, उसके माथे पर कितना ही कलंक क्यों न लगा हो, पतित हो, योगभ्रष्ट हो, पात्र न हो, सामर्थ्य न हो, भरतजी के यहाँ सबका स्वागत है। उन्हें किसी से कोई अपेक्षा नहीं, किसी से कुछ चाहिए नहीं, बस उसमें भगवान को पाने की तड़प होनी चाहिए। देखो, भगवंत की कृपा के बिना संत नहीं मिलते, और संत की कृपा के बिना भगवंत नहीं मिलते। वास्तव में ये दिखते ही दो हैं, दो हैं नहीं, भगवान ही भक्त की तड़प को देखकर, संत बन आते हैं। ध्यान दो, आज अयोध्या की क्या स्थिति है। भगवान चले गए, सब रोते बिलखते पीछे छूट गए। अब न मालूम कब भगवान से मिलना होगा? एक ओर भगवान हैं, दूसरी ओर मृत्यु है, न मालूम पहले कौन आए, कहीं उनके आने से पहले मौत तो नहीं आ खड़ी होगी? हाय! हाय! बड़ी भूल लग गई, अब कैसे उनको पाएँ? और सब पाएँगे, कैसे? भरतजी मिलवाने ले जाएँगे। भरतजी हमें भी ले जाएँगे, तैयार हो रहो॥

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Neeru Miglani Apr 17, 2019

मैं पैदल घर आ रहा था । रास्ते में एक बिजली के खंभे पर एक कागज लगा हुआ था । पास जाकर देखा, लिखा था: कृपया पढ़ें "इस रास्ते पर मैंने कल एक 50 का नोट गंवा दिया है । मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता । जिसे भी मिले कृपया इस पते पर दे सकते हैं ।" ... यह पढ़कर पता नहीं क्यों उस पते पर जाने की इच्छा हुई । पता याद रखा । यह उस गली के आखिरी में एक घऱ था । वहाँ जाकर आवाज लगाया तो एक वृद्धा लाठी के सहारे धीरे-धीरे बाहर आई । मुझे मालूम हुआ कि वह अकेली रहती है । उसे ठीक से दिखाई नहीं देता । "माँ जी", मैंने कहा - "आपका खोया हुआ 50 मुझे मिला है उसे देने आया हूँ ।" यह सुन वह वृद्धा रोने लगी । "बेटा, अभी तक करीब 50-60 व्यक्ति मुझे 50-50 दे चुके हैं । मै पढ़ी-लिखी नहीं हूँ, । ठीक से दिखाई नहीं देता । पता नहीं कौन मेरी इस हालत को देख मेरी मदद करने के उद्देश्य से लिख गया है ।" बहुत ही कहने पर माँ जी ने पैसे तो रख लिए । पर एक विनती की - ' बेटा, वह मैंने नहीं लिखा है । किसी ने मुझ पर तरस खाकर लिखा होगा । जाते-जाते उसे फाड़कर फेंक देना बेटा ।'मैनें हाँ कहकर टाल तो दिया पर मेरी अंतरात्मा ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि उन 50-60 लोगों से भी "माँ" ने यही कहा होगा । किसी ने भी नहीं फाड़ा ।जिंदगी मे हम कितने सही और कितने गलत है, ये सिर्फ दो ही शक्स जानते है.. परमात्मा और अपनी अंतरआत्मा..!! मेरा हृदय उस व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता से भर गया । जिसने इस वृद्धा की सेवा का उपाय ढूँढा । सहायता के तो बहुत से मार्ग हैं , पर इस तरह की सेवा मेरे हृदय को छू गई । और मैंने भी उस कागज को फाड़ा नहीं ।मदद के तरीके कई हैं सिर्फ कर्म करने की तीव्र इच्छा मन मॆ होनी चाहिए 🌿 *कुछ नेकियाँ* *और* *कुछ अच्छाइयां..* *अपने जीवन में ऐसी भी करनी चाहिए,* *जिनका ईश्वर के सिवाय..* *कोई और गवाह् ना हो...!!*❤❤🙏😊

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Vijay Yadav Apr 17, 2019

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Mysuvichar Apr 17, 2019

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