मोहन
मोहन Aug 24, 2017

परमात्मा की प्राप्ति कैसे करे

परमात्मा की प्राप्ति कैसे करे

परमात्मा की प्राप्ति कैसे करे

प्यारे मित्रो , सभी महा पुरुष कहते है की मानव जीवन का एक मात्र उददेश्य  आत्मा का साक्षात्कार करना एवं परमात्मा की अनुभूति करना  है परन्तु बहुत कम लोग यह जानते है की आत्म साक्षात्कार कैसे किया जाता है ; एक बार एक जिज्ञासु व्यक्ति एक बहुत बड़े महापुरुष संत के पास पहुँचता  है और उनसे निवेदन करता है की हे गुरुदेव मैं वर्षो से पूजा पाठ कर रहा हूँ , मैं कर्म कांड  भी सभी करता हूँ , मैंने सारे तीर्थ  भी कर लिए है सत्संग में भी जाता हूँ परन्तु अभी तक मुझे परमात्मा की प्राप्ति नहीं हुई है , कृपया मेरा मार्गदर्शन करे मैं कैसे परमात्मा को प्राप्त करू , उन महापुरुष ने मुस्कुराते हुए कहा , जो भी व्यक्ति अपने जीवन में परमात्मा को प्राप्त करना चाहता है उसे अपने भीतर उतरना होगा , पूजा पाठ , कर्म कांड , तीर्थ , सत्संग करने से परमात्मा की प्राप्ति नहीं होगी हाँ  ये प्रारंभ हो सकते है , साधन हो सकते है , परन्तु परमात्मा की अनुभूति सिर्फ और सिर्फ अपने भीतर उतरने पर ही होगी ,उस व्यक्ति ने प्रशन किया " गुरुदेव अपने भीतर कैसे उतरते  है ? " महात्मा ने कहा अपने भीतर उतरने की सीढ़ियों का नाम है "  स्वास " यदि आप ध्यान दे तो परमात्मा ने यह शरीर बनाने  के बाद हमें पूरी तरह स्वतंत्र छोड़ दिया है की हम अपनी समस्त इन्द्रियो का जैसा चाहे उपयोग करे वो रोज़ - रोज़  हस्तछेप  नहीं करता , हम अपनी ज्ञान इन्द्रियों का कर्म इन्द्रियों का उपयोग करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है  वो नहीं रोकता की  हम आँखों  से क्या देखे , हाथों से क्या स्पर्श करे , कानो से क्या सुने हम पूरी तरह स्वतंत्र है , इतने सब कार्य के स्वतंत्र करने के बाद भी एक चीज परमात्मा ने सीधे अपने पास रखी है , और आदमी हो या औरत उसी काम के लिए दावा करते है की मैं कर रहा हूँ , या मैं कर रही हूँ  , और वो काम है स्वास लेना , हम कहते है मैं स्वास ले रहा हूँ , मैं स्वास ले रही हूँ , यदि ये बात सच है तो इस दुनिया में कोई मरता ही नहीं भला कौन स्वास लेना बंद करता बताइए ? तो हम स्वास नहीं ले रहे कोई दे रहा है , तो हम ले रहे है , जिस दिन उसने अंतिम डोर काट दी , जिस दिन उसने अंतिम स्वास पर हस्ताक्षर कर दिए उस दिन अपने आस पास दुनिया भर के धन्वन्तरी इकट्ठे कर लेना , अपनी सारी  दौलत लगा कर चिकित्सा की व्यवस्था जुटा लेना  अगर उसने अंतिम स्वास तय कर दी है तो जाना पड़ेगा , और जाते है लोग !बाकि वो रोज़ रोज़ हस्तक्षेप नहीं करता ,फिर भी हम कहते मैं स्वास ले रहा हूँ या  मैं स्वास ले रही हूँ , बस यही एक काम ऐसा है की हम स्वास नहीं ले रहे है कोई दे रहा है तो हम ले रहे है  , और जैसे ही हम स्वास से जुड़ते है परमात्मा से जुड़ जाते है , और स्वास लेने के विज्ञानं का नाम है प्राणायाम , " साइंस आफ ब्रीदिंग "
जैसे ही हम अपनी चेतना को आती हुई स्वास और जाती हुई स्वास से जोड़ते है हमारे विचार रुक जाते है - मन शांत होते लगता है और धीरे धीरे भीतर की यात्रा प्रारंभ हो जाती है फिर क्या अनुभूति होती है                   '' शिवोSम  शिवोSम शिवोSम शिवोSम वही  आत्मा सच्चिदानन्द  मैं हूँ अमर आत्मा सच्चिदानन्द  मैं हूँ "

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Uma Sood May 10, 2020

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Swami Lokeshanand May 10, 2020

इधर भरतजी ननिहाल में हैं, उधर अयोध्या में सुमंत्र जी भगवान को वन पहुँचाकर वापिस लौटे। संध्या हो रही है, हल्का प्रकाश है, सुमंत्र जी नगर के बाहर ही रुक गए। जीवनधन लूट गया, अब क्या मुंह लेकर नगर में प्रवेश करूं? अयोध्यावासी बाट देखते होंगे। महाराज पूछेंगे तो क्या उत्तर दूंगा? अभी नगर में प्रवेश करना ठीक नहीं, रात्रि हो जाने पर ही चलूँगा। अयोध्या में आज पूर्ण अमावस हो गई है। रघुकुल का सूर्य दशरथजी अस्त होने को ही है, चन्द्र रामचन्द्रजी भी नहीं हैं, प्रकाश कैसे हो? सामान्यतः पूर्णिमा चौदह दिन बाद होती है, पर अब तो पूर्णिमा चौदह वर्ष बाद भगवान के आने पर ही होगी। दशरथजी कौशल्याजी के महल में हैं, जानते हैं कि राम लौटने वालों में से नहीं, पर शायद!!! उम्मीद की किरण अभी मरी नहीं। सुमंत्रजी आए, कौशल्याजी ने देखकर भी नहीं देखा, जो होना था हो चुका, अब देखना क्या रहा? दशरथजी की दृष्टि में एक प्रश्न है, उत्तर सुमंत्रजी की झुकी गर्दन ने दे दिया। महाराज पथरा गए। बोले- "कौशल्या देखो वे दोनों आ गए" -कौन आ गए महाराज ? कोई नहीं आया। -तुम देखती नहीं हो, वे आ रहे हैं। इतने में वशिष्ठजी भी पहुँच गए। -गुरुजी, कौशल्या तो अंधी हो गई है, आप तो देख रहे हैं, वे दोनों आ गए। -आप किन दो की बात कर रहे हैं, महाराज? -गुरुजी ये दोनों तपस्वी आ गए, मुझे लेने आए हैं, ये श्रवण के मातापिता आ गए। महाराज ने आँखें बंद की, लगे राम राम करने और वह शरीर शांत हो गया। विचार करें, ये चक्रवर्ती नरेश थे, इन्द्र इनके लिए आधा सिंहासन खाली करता था, इनके पास विद्वानों की सभा थी, बड़े बड़े कर्मकाण्डी थे। इनसे जीवन में एकबार कभी भूल हुई थी, इनके हाथों श्रवणकुमार मारा गया था, इतना समय बीत गया, उस कर्म के फल से बचने का कोई उपाय होता तो कर न लेते? यह जो आप दिन रात, उपाय उपाय करते, दरवाजे दरवाजे माथा पटकते फिरते हैं, आप समझते क्यों नहीं? आप को बुद्धि कब आएगी? अब विडियो देखें- दशरथ जी का देह त्याग https://youtu.be/qO3KqNYTVCU

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Swami Lokeshanand May 10, 2020

रामू धोबी अपने गधे के साथ नदी किनारे जा रहा था, कि उसे रेत में एक सुंदर लाल पत्थर दिखाई दिया। वह सूर्य की रोशनी में बड़ा चमक रहा था। "वाह! इतना सुंदर पत्थर!" कहते हुए रामू ने उसे उठा कर, एक धोगे में लपेट अपने गधे के गले में लटका लिया। घर लौटते हुए, वे जौहरी बाजार से निकले। जगता नाम का जौहरी उस पत्थर को देखते ही पहचान गया, वह रंग का ही लाल नहीं था, वह तो सचमुच का लाल था। हीरे से भी कीमती लाल। उसने रामू को बुलाया और कहा- ये पत्थर कहाँ से पाया रे? बहुत सुंदर है। बेचेगा? रामू ने हैरानी से पूछा- ये बिक जाएगा? कितने का? जगता- एक रुपया दूंगा। रामू- दो रुपए दे दो। जगता- तूं पागल है? है क्या यह? पत्थर ही तो है। एक रुपया लेना है तो ले, नहीं तो भाग यहाँ से। रामू के लिए यूं तो एक रुपया भी कम नहीं था। पर वह भी पूरा सनकी था, आगे चल पड़ा। इतने में भगता जौहरी ने, जो यह सब कुछ देख सुन रहा था, रामू को आवाज लगाई और सीधे ही उसके हाथ पर दो रुपए रख कर वह लाल ले लिया। अब जगता, जो पीछे ही दौड़ा आता था, चिल्लाया- मूर्ख! अनपढ़! गंवार! बेवकूफ! हाय हाय! बड़ा पागल है। लाख का लाल दो रुपए में दे रहा है? रामू की भी आँखें घूम गई। पर सौदा हो चुका था, माल बिक गया था। अचानक वह जोर से हंसा, और बोला- सेठ जी! मूर्ख मैं नहीं हूँ, मूर्ख आप हैं। मैं तो कीमत नहीं जानता था, मैंने तो दो रुपए में भी मंहगा ही बेचा है। पर आप तो जानते हुए भी एक रुपया तक नहीं बढ़ा पाए? लोकेशानन्द कहता है कि हम भी जगता जौहरी जैसे ही मूर्ख हैं। ऐसा नहीं है कि हम भगवान की कथा की कीमत न जानते हों। जानते हैं। पर बिना किसी प्रयास के, अपनेआप, घर बैठे ही मिल रही इस कथा की असली कीमत, "अपना पूरा जीवन" देना तो दूर रहा, अपने दो मिनट भी देने को तैयार नहीं होते। फिर हीरा हाथ से निकल जाने पर, पछताने के सिवा हम करेंगे भी क्या?

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white beauty May 9, 2020

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white beauty May 9, 2020

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महाराणा प्रताप जी जन्मदिवस पर विशेष 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸 नाम - कुँवर प्रताप जी (श्री महाराणा प्रताप सिंह जी) जन्म - 9 मई, 1540 ई. जन्म भूमि - कुम्भलगढ़, राजस्थान पुण्य तिथि - 29 जनवरी, 1597 ई. पिता - श्री महाराणा उदयसिंह जी माता - राणी जीवत कँवर जी राज्य - मेवाड़ शासन काल - 1568–1597ई. शासन अवधि - 29 वर्ष वंश - सुर्यवंश राजवंश - सिसोदिया राजघराना - राजपूताना धार्मिक मान्यता - हिंदू धर्म युद्ध - हल्दीघाटी का युद्ध राजधानी - उदयपुर पूर्वाधिकारी - महाराणा उदयसिंह उत्तराधिकारी - राणा अमर सिंह महाराणा प्रताप की संक्षिप्त जानकारी 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ महाराणा प्रताप सिंह जी के पास एक सबसे प्रिय घोड़ा था, जिसका नाम 'चेतक' था। राजपूत शिरोमणि महाराणा प्रतापसिंह उदयपुर, मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे। वह तिथि धन्य है, जब मेवाड़ की शौर्य-भूमि पर मेवाड़-मुकुटमणि राणा प्रताप का जन्म हुआ। महाराणा का नाम इतिहास में वीरता और दृढ़ प्रण के लिये अमर है। महाराणा प्रताप की जयंती विक्रमी सम्वत् कॅलण्डर के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ, शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है। महाराणा प्रताप के बारे में कुछ रोचक जानकारी:- 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 1... महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे। 2.... जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे तब उन्होने अपनी माँ से पूछा कि हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर आए तब माँ का जवाब मिला- ”उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना ” लेकिन बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था। “बुक ऑफ़ प्रेसिडेंट यु एस ए ‘किताब में आप यह बात पढ़ सकते हैं। 3.... महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलोग्राम था और कवच का वजन भी 80 किलोग्राम ही था। कवच, भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाएं तो कुल वजन 207 किलो था। 4.... आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं। 5.... अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी। लेकिन महाराणा प्रताप ने किसी की भी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया। 6.... हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए। 7.... महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुआ है जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है। 8.... महाराणा प्रताप ने जब महलों का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगों ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा कि फौज के लिए तलवारें बनाईं। इसी समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गाढ़िया लोहार कहा जाता है। मैं नमन करता हूँ ऐसे लोगो को। 9.... हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पाई गई। आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला था। 10..... महाराणा प्रताप को शस्त्रास्त्र की शिक्षा "श्री जैमल मेड़तिया जी" ने दी थी जो 8000 राजपूत वीरों को लेकर 60000 मुसलमानों से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे। 11.... महाराणा के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था। 12.... मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था वो महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा बिना भेदभाव के उन के साथ रहते थे। आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत हैं तो दूसरी तरफ भील। 13..... महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक महाराणा को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ। उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहाँ वो घायल हुआ वहां आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है जहाँ पर चेतक की मृत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है। 14..... राणा का घोड़ा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमित करने के लिए हाथी की सूंड लगाई जाती थी। यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे। 15..... मरने से पहले महाराणा प्रताप ने अपना खोया हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और महलो को छोड़कर वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे। 16.... महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो और लम्बाई 7’5” थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे हाथ में। महाराणा प्रताप के हाथी की कहानी: 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ आप सब ने महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के बारे में तो सुना ही होगा, लेकिन उनका एक हाथी भी था। जिसका नाम था रामप्रसाद। उसके बारे में आपको कुछ बाते बताता हुँ। रामप्रसाद हाथी का उल्लेख अल- बदायुनी, जो मुगलों की ओर से हल्दीघाटी के युद्ध में लड़ा था ने अपने एक ग्रन्थ में किया है। वो लिखता है की जब महाराणा प्रताप पर अकबर ने चढाई की थी तब उसने दो चीजो को ही बंदी बनाने की मांग की थी एक तो खुद महाराणा और दूसरा उनका हाथी रामप्रसाद। आगे अल बदायुनी लिखता है की वो हाथी इतना समझदार व ताकतवर था की उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही अकबर के 13 हाथियों को मार गिराया था वो आगे लिखता है कि उस हाथी को पकड़ने के लिए हमने 7 बड़े हाथियों का एक चक्रव्यूह बनाया और उन पर 14 महावतो को बिठाया तब कहीं जाकर उसे बंदी बना पाये। उस हाथी को अकबर के समक्ष पेश किया गया जहा अकबर ने उसका नाम पीरप्रसाद रखा। रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने और पानी दिया। पर उस स्वामिभक्त हाथी ने 18 दिन तक मुगलों का न तो दाना खाया और न ही पानी पिया और वो शहीद हो गया। तब अकबर ने कहा था कि जिसके हाथी को मैं अपने सामने नहीं झुका पाया उस महाराणा प्रताप को क्या झुका पाउँगा। ऐसे ऐसे देशभक्त चेतक व रामप्रसाद जैसे तो यहाँ जानवर थे। महाराणाप्रताप एक अद्वितीय वीर योद्धा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ बहलोल खान अकबर का बड़ा सिपहसालार था,, हाथी जैसा भारी भरकम शरीर , और लम्बाई लगभग 7 फिट 8 इंच ,, क्रूर तो ऐसा था कि,, नवजात बालकों को भी अपने हाथ में लेकर उनका गला रेत देता था,, यदि बालक हिन्दुओं के हों तो,,,, वीर महाराणा प्रताप से युद्ध करने कोई जाना नहीं चाहता था,, क्योंकि उनके सामने युद्ध के लिये जाना मतलब अपनी मौत का चुनाव करना ही था,, अकबर ने दरबार में राणा को समाप्त करने के लिये बहलोल खाँ को चुना,, बहलोल खाँ यद्यपि अकबर के दरबार का सबसे हिम्मत वाला व्यक्ति माना जाता था ।,,, किन्तु वह भी महाराणा के समक्ष जाने से भय खाता था,, उसके मन में महाराणा का ऐसा भय था कि,,, वह घर गया ,और अपनी सारी बेगमों की हत्या कर दी।,,, पता नहीं वापस लौटूं न लौटूं ? इन्हे कोई दूसरे अपनी बेगमें बना लेंगे,, बस इसी भय के कारण उसने सबको मार डाला।,, और आ गया मेवाड़ में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप जी के समक्ष,,आखिर सामना हो ही गया उसका , उसकी मृत्यु से।,,, अफीम के खुमार मे डूबी हुई सुर्ख नशेड़ी आंखों से भगवा अग्नि की लपट से प्रदीप्त रण के मद में डूबी आंखें टकराईं और जबरदस्त भिड़ंत शुरू हो गई,,, एक क्षण तलवार से तलवार टकराईं और राणा की विजय ध्वनि बहलोल खाँ को भी प्रतीत होने लगी,, दूसरे ही क्षण वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप की तलवार नें बहलोल खाँ को उसके शिरस्त्राण, बख्तरबंद, घोड़ा उसके रक्षा कवच सहित दो टुकड़ों में चीर कर रख दिया,,, 7फिट 8 इंच का विशाल शरीर वाला पिशाच बहलोल खाँ का शरीर आधा इस तरफ आधा उस तरफ अलग अलग होकर गिर पड़ा,,, ऐसे महावीर थे वीर महाराणा,,,,।अकबर अपने जीवन में कभी भी महाराणा प्रताप से युद्ध करने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाया,,,, जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र जी नें 14 वर्ष वनवास भोगा,उसी तरह से स्वाभिमान की खातिर महाराणा ने पच्चीस वर्ष का वनवास भोगा।,,, घोड़े की पीठ पर कितनी रातें गुजारी.. जंगल में घास की रोटियाँ खाईं,,, इस वनवास के दौरान उनकी पुत्री की मृत्यु भूख के कारण से हो गई,,, किन्तु कभी भी ना कोई शिकायत ,, ना अपने सिद्धान्तों से कोई समझौता,, पूरे भारत को दबा देने वाले आततायी जिहादियों की नाक में दम बनाके रख दिया। सोते समय भी अकबर जैसे जिहादी को किसी का खौफ सताता था तो,, वो था,, वीर महाराणा प्रताप का,,, महाराणा नें अन्ततः मेवाड़ को आज़ाद करवा लिया । और इन कलमघिस्सू वामपंथी इतिहासकारों के लिये ये महाराणा महान नहीं,,,, धूर्त आततायी, विदेशी हमलावर जिहादी अकबर को महान बता दिया,,, अद्वितीय वीर बलिदानी हिन्दू शिरोमणि वीर महाराणा प्रताप के जन्मोत्सव पर उन्हें शत शत नमन,,, वन्दन,, 🚩 जय भवानी 🚩 🌐http://www.vkjpandey.in 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸

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Ajay Verma May 10, 2020

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Swami Lokeshanand May 9, 2020

एक राजा ने सुना कि शुकदेव जी से भागवत सुन कर परीक्षित मुक्त हो गए थे। राजा ने सोचा कि मैं भी भागवत सुनकर मुक्त होऊँगा। बस फिर क्या था? घोषणा करवा दी गई। एक के बाद एक कथा सुनाने वाले आने लगे। राजा प्रत्येक सप्ताह कथा सुनता, पर मुक्त न होता, और कथा सुनाने वाला कैद में डाल दिया जाता। योंही बहुत समय बीत गया। कल ही एक बूढ़े बाबा को भी जेल में डाला गया है। आज एक युवक दरबार में आया है। कहता है मैं आपको कथा सुनाऊँगा। पर मेरी एक शर्त है। पहले मुझे एक घंटे के लिए राजा बनाया जाए। मंत्रियों की तलवारें खिंच गईं। राजा मुस्कुराया। मंत्रियों को शांत रहने का इशारा कर, सिंहासन से नीचे उतर आया। "सिंहासन स्वीकार करें" राजा ने युवक से कहा। युवक सिंहासन पर बैठा, और बोला- जेल में बंद मेरे दादा, बूढ़े बाबा को दरबार में बुलाया जाए और दो रस्सियाँ मंगवाई जाएँ। ऐसा ही किया गया। बाबा समझ नहीं पाए कि वहाँ क्या हो रहा है? अब युवक ने एक मंत्री से कहा- एक रस्सी से बाबा को एक खम्बे से, तो दूसरी रस्सी से महाराज को दूसरे खम्बे से बाँध दिया जाए। जब दोनों बंध गए तो युवक ने राजा से कहा- महाराज! आप बाबा को खोल सकते हैं? राजा मौन ही रहा। तब युवक बाबा से बोला- दादा जी! आप ही महाराज को खोल दीजिए। बाबा जी चिल्लाए- मूर्ख! तूं कर क्या रहा है? मैं तो जेल में ही था, पर तूं फांसी चढ़ेगा। अभी तक तो मैं यही समझता था कि तूं आधा पागल है, पर तूं तो महामूर्ख है। जब मैं खुद बंधा हूँ, तो महाराज को कैसे खोल सकता हूँ? अब मुस्कुराने की बारी युवक की थी। रस्सियाँ खुलवा कर, वह सिंहासन से उतर गया। राजा के चरणों में झुका और बोला- महाराज! मेरी धृष्टता क्षमा हो। मुझे बस इतना ही कहना था कि जो स्वयं बंधन में पड़ा हो, वह दूसरे को मुक्त कैसे करेगा? आपका सिंहासन आपकी प्रतीक्षा कर रहा है। लोकेशानन्द भी यह कहानी सुन कर मुस्कुरा कर रह जाता है।

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