Dr.janhavi
Dr.janhavi Oct 2, 2017

Jai Shri Hari

Jai Shri Hari

भगवान विष्णु व श्री कृष्ण के हर चित्र व मूर्ति में उन्हें सुदर्शन चक्र धारण किए दिखाया जाता है।

यह सुदर्शन चक्र भगवान शंकर ने ही जगत कल्याण के लिए भगवान विष्णु को दिया था।

इस संबंध में शिवमहापुराण के कोटिरुद्रसंहिता में एक कथा का उल्लेख है।

प्राचीन समय में 'वीतमन्यु' नामक एक ब्राह्मण थे। वह वेदों के ज्ञाता थे। उनकी 'आत्रेयी' नाम की पत्नी थी, जो सदाचार युक्त थीं। उन्हें लोग 'धर्मशीला' के नाम से भी बुलाते थे। इस ब्राह्मण दंपति का एक पुत्र था, जिसका नाम 'उपमन्यु' था। परिवार बेहद निर्धनता में पल रहा था। धर्मशीला अपने पुत्र को दूध भी नहीं दे सकती थी। वह बालक दूध के स्वाद से अनभिज्ञ था। धर्मशीला उसे चावल का धोवन ही दूध कहकर पिलाया करती थी।

एक दिन ऋषि वीतमन्यु अपने पुत्र के साथ कहीं प्रीतिभोज में गये। वहाँ उपमन्यु ने दूध से बनी हुई खीर का भोजन किया, तब उसे दूध के वास्तविक स्वाद का पता लग गया। घर आकर उसने चावल के धोवन को पीने से इंकार कर दिया।

दूध पाने के लिए हठ पर अड़े बालक से उसकी माँ धर्मशीला ने कहा- "पुत्र, यदि तुम दूध को क्या, उससे भी अधिक पुष्टिकारक तथा स्वादयुक्त पेय पीना चाहते हो तो विरूपाक्ष महादेव की सेवा करो। उनकी कृपा से अमृत भी प्राप्त हो सकता है।"

उपमन्यु ने अपनी माँ से पूछा- "माता, आप जिन विरूपाक्ष भगवान की सेवा-पूजा करने को कह रही हैं, वे कौन हैं?"

धर्मशीला ने अपने पुत्र को बताया कि

- प्राचीन काल में श्रीदामा नाम से विख्यात एक महान असुर राज था। उसने सारे संसार को अपने अधीन करके लक्ष्मी को भी अपने वश में कर लिया। उसके यश और प्रताप से तीनों लोक श्रीहीन हो गये। उसका मान इतना बढ़ गया था कि वह भगवान विष्णु के श्रीवत्स को ही छीन लेने की योजना बनाने लगा। उस महाबलशाली असुर की इस दूषित मनोभावना को जानकर उसे मारने की इच्छा से भगवान विष्णु महेश्वर शिव के पास गये। उस समय महेश्वर हिमालय की ऊंची चोटी पर योगमग्न थे। तब भगवान विष्णु जगन्नाथ के पास जाकर कई वर्षो तक पैर के अंगूठे पर खड़े रह कर परब्रह्म की उपासना करते रहे। भगवान विष्णु की इस प्रकार कठोर साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें 'सुदर्शन चक्र' प्रदान किया।

उन्होंने सुदर्शन चक्र को देते हुए भगवान विष्णु से कहा- "देवेश! यह सुदर्शन नाम का श्रेष्ठ आयुध बारह अरों, छह नाभियों एवं दो युगों से युक्त, तीव्र गतिशील और समस्त आयुधों का नाश करने वाला है। सज्जनों की रक्षा करने के लिए इसके अरों में देवता, राशियाँ, ऋतुएँ, अग्नि, सोम, मित्र, वरुण, शचीपति इन्द्र, विश्वेदेव, प्रजापति, हनुमान, धन्वन्तरि, तप तथा चैत्र से लेकर फाल्गुन तक के बारह महीने प्रतिष्ठित हैं।

आप इसे लेकर निर्भीक होकर शत्रुओं का संहार करें। तब भगवान विष्णु ने उस सुदर्शन चक्र से असुर श्रीदामा को युद्ध में परास्त करके मार डाला।

भगवान विष्णु को सुदर्शन चक्र की प्राप्ति से सम्बन्धित एक अन्य प्रसंग निम्नलिखित है-

एक बार जब दैत्यों के अत्याचार बहुत बढ़ गए तब सभी देवता श्रीहरि विष्णु के पास आए। तब भगवान विष्णु ने कैलाश पर्वत पर जाकर भगवान शिव की विधिपूर्वक आराधना की। वे हजार नामों से शिव की स्तुति करने लगे। वे प्रत्येक नाम पर एक कमल पुष्प भगवान शिव को चढ़ाते। तब भगवान शंकर ने विष्णु की परीक्षा लेने के लिए उनके द्वारा लाए एक हजार कमल में से एक कमल का फूल छिपा दिया। शिव की माया के कारण विष्णु को यह पता न चला। एक फूल कम पाकर भगवान विष्णु उसे ढूंढने लगे। परंतु फूल नहीं मिला। तब विष्णु ने एक फूल की पूर्ति के लिए अपना एक नेत्र निकालकर शिव को अर्पित कर दिया। विष्णु की भक्ति देखकर भगवान शंकर बहुत प्रसन्न हुए और श्रीहरि के समक्ष प्रकट होकर वरदान मांगने के लिए कहा।

तब विष्णु ने दैत्यों को समाप्त करने के लिए अजेय शस्त्र का वरदान मांगा। तब भगवान शंकर ने विष्णु को सुदर्शन चक्र प्रदान किया। विष्णु ने उस चक्र से दैत्यों का संहार कर दिया। इस प्रकार देवताओं को दैत्यों से मुक्ति मिली तथा सुदर्शन चक्र उनके स्वरूप के साथ सदैव के लिए जुड़ गया।

यह चक्र भगवान विष्णु को 'हरिश्वरलिंग' (शंकर) से प्राप्त हुआ था। सुदर्शन चक्र को विष्णु ने उनके कृष्ण के अवतार में धारण किया था। श्रीकृष्ण ने इस चक्र से अनेक राक्षसों का वध किया था। सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का अमोघ अस्त्र है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि इस चक्र ने देवताओं की रक्षा तथा राक्षसों के संहार में अतुलनीय भूमिका का निर्वाह किया था.

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Neha Sharma, Haryana Feb 26, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 136*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 06*🙏 🌸🙏*अध्याय - 11*🙏🌸 *इस अध्याय में वृत्रासुर की वीरवाणी और भगवत्प्राप्ति...... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! असुर सेना भयभीत होकर भाग रही थी। उसके सैनिक इतने अचेत हो रहे थे कि उन्होंने अपने स्वामी के धर्मानुकूल वचनों पर भी ध्यान न दिया। वृत्रासुर ने देखा कि समय की अनुकूलता के कारण देवता लोग असुरों की सेना को खदेड़ रहे हैं और वह इस प्रकार छिन्न-भिन्न हो रही है, मानो बिना नायक की हो। *राजन्! यह देखकर वृत्रासुर असहिष्णुता और क्रोध के मारे तिलमिला उठा। उसने बलपूर्वक देवसेना को आगे बढ़ने से रोक दिया और उन्हें डाँटकर ललकारते हुए कहा- ‘क्षुद्र देवताओं! रणभूमि में पीठ दिखलाने वाले कायर असुरों पर पीछे से प्रहार करने में क्या लाभ है। ये लोग तो अपने माँ-बाप के मल-मूत्र हैं। परन्तु अपने को शूरवीर मानने वाले तुम्हारे-जैसे पुरुषों के लिये भी तो डरपोकों को मारना कोई प्रशंसा की बात नहीं है और न इससे तुम्हें स्वर्ग ही मिल सकता है। यदि तुम्हारे मन में युद्ध करने की शक्ति और उत्साह है तथा अब जीवित रहकर विषय-सुख भोगने की लासला नहीं है, तो क्षण भर मेरे सामने डट जाओ और युद्ध का मजा चख लो’। *परीक्षित! वृत्रासुर बड़ा बली था। वह अपने डील-डौल से ही शत्रु देवताओं को भयभीत करने लगा। उसने क्रोध में भरकर इतने जोर का सिंहनाद किया कि बहुत-से लोग तो उसे सुनकर ही अचेत हो गये। वृत्रासुर की भयानक गर्जना से सब-के-सब देवता मुर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े, मानो उन पर बिजली गिर गयी हो। अब जैसे मदोन्मत्त गजराज नरकट का वन रौंद डालता है, वैसे ही रण बाँकुरा वृत्रासुर हाथ में त्रिशूल लेकर भय से नेत्र बंद किये पड़ी हुई देव सेना को पैरों से कुचलने लगा। उसके वेग से धरती डगमगाने लगी। *वज्रपाणि देवराज इन्द्र उसकी यह करतूत सह न सके। जब वह उनकी ओर झपटा, तब उन्होंने और भी चिढ़कर अपने शत्रु पर एक बहुत बड़ी गदा चलायी। अभी वह असह्य गदा वृत्रासुर के पास पहुँची भी न थी कि उसने खेल-ही खेल में बायें हाथ से उसे पकड़ लिया। राजन्! परमपराक्रमी वृत्रासुर ने क्रोध से आग-बबूला होकर उसी गदा से इन्द्र के वाहन ऐरावत के सिर पर बड़े जोर से गरजते हुए प्रहार किया। उसके इस कार्य की सभी लोग बड़ी प्रशंसा करने लगे। वृत्रासुर की गदा के आघात से ऐरावत हाथी वज्राहत पर्वत के समान तिलमिला उठा। सिर फट जाने से वह अत्यन्त व्याकुल हो गया और खून उगलता हुआ इन्द्र को लिये हुए अट्ठाईस हाथ पीछे हट गया। देवराज इन्द्र अपने वाहन ऐरावत के मुर्च्छित हो जाने से स्वयं भी विषादग्रस्त हो गये। यह देखकर युद्ध धर्म के मर्मज्ञ वृत्रासुर ने उनके ऊपर फिर से गदा नहीं चलायी। तब तक इन्द्र ने अपने अमृतस्रावी हाथ के स्पर्श से घायल ऐरावत की व्यथा मिटा दी और वे फिर रणभूमि में आ डटे। *परीक्षित! जब वृत्रासुर ने देखा कि मेरे भाई विश्वरूप का वध करने वाला शत्रु इन्द्र युद्ध के लिये हाथ में वज्र लेकर फिर सामने आ गया है, तब उसे उनके उस क्रूर पापकर्म का स्मरण हो आया और वह शोक और मोह से युक्त हो हँसता हुआ उनसे कहने लगा। *वृत्रासुर बोला- आज मेरे लिये बड़े सौभाग्य का दिन है कि तुम्हारे-जैसा शत्रु-जिसने विश्वरूप के रूप में ब्राह्मण, अपने गुरु एवं मेरे भाई की हत्या की है-मेरे सामने खड़ा है। अरे दुष्ट! अब शीघ्र-से-शीघ्र मैं तेरे पत्थर के समान कठोर हृदय को अपने शूल से विदीर्ण करके भाई से उऋण होऊँगा। अहा! यह मेरे लिये कैसे आनन्द की बात होगी। इन्द्र! तूने मेरे आत्मवेत्ता और निष्पाप बड़े भाई के, जो ब्राह्मण होने के साथ ही यज्ञ में दीक्षित और तुम्हारा गुरु था, विश्वास दिलाकर तलवार से तीनों सिर उतार लिये-ठीक वैसे ही जैसे स्वर्गकामी निर्दय मनुष्य यज्ञ में पशु का सिर काट डालता है। दया, लज्जा, लक्ष्मी और कीर्ति तुझे छोड़ चुकी है। तूने ऐसे-ऐसे नीच कर्म किये हैं, जिनकी निन्दा मनुष्यों की तो बात ही क्या-राक्षस तक करते हैं। आज मेरे त्रिशूल से तेरा शरीर टूक-टूक हो जायेगा। बड़े कष्ट से तेरी मृत्यु होगी। तेरे-जैसे पापी को आग भी नहीं जलायेगी, तुझे तो गीध नोंच-नोंचकर खायेंगे। ये अज्ञानी देवता तेरे-जैसे नीच और क्रूर के अनुयायी बनकर मुझ पर शस्त्रों से प्रहार कर रहे हैं। मैं अपने तीखे त्रिशूल से उनकी गरदन काट डालूँगा और उनके द्वारा गुणों के सहित भैरवादि भूतनाथों को बलि चढ़ाऊँगा। *वीर इन्द्र! यह भी सम्भव है कि तू मेरी सेना को छिन्न-भिन्न करके अपने वज्र से मेरा सिर काट ले। तब तो मैं अपने शरीर की बलि पशु-पक्षियों को समर्पित करके, कर्म-बन्धन से मुक्त हो महापुरुषों की चरणरज का आश्रय ग्रहण करूँगा-जिस लोक में महापुरुषों जाते हैं, वहाँ पहुँच जाऊँगा। देवराज! मैं तेरे सामने खड़ा हूँ, तेरा शत्रु हूँ; अब तू मुझ पर अपना अमोघ वज्र क्यों नहीं छोड़ता? तू यह सन्देह न कर कि जैसे तेरी गदा निष्फल हो गयी, कृपण पुरुष से की हुई याचना के समान यह वज्र भी वैसे ही निष्फल हो जायेगा। *इन्द्र! तेरा यह वज्र श्रीहरि के तेज और दधीचि ऋषि की तपस्या से शक्तिमान् हो रहा है। विष्णु भगवान् ने मुझे मारने के लिये तुझे आज्ञा भी दी है। इसलिये अब तू उसी वज्र से मुझे मार डाल। क्योंकि जिस पक्ष में भगवान् श्रीहरि हैं, उधर ही विजय, लक्ष्मी और सारे गुण निवास करते हैं। देवराज! भगवान् संकर्षण के आज्ञानुसार मैं अपने मन को उनके चरणकमलों में लीन कर दूँगा। तेरे वज्र का वेग मुझे नहीं, मेरे विषय-भोगरूप फंदे को काट डालेगा और मैं शरीर त्यागकर मुनिजनोचित गति प्राप्त करूँगा। जो पुरुष भगवान् से अनन्य प्रेम करते हैं-उनके निजजन हैं-उन्हें वे स्वर्ग, पृथ्वी अथवा रसातल की सम्पत्तियाँ नहीं देते। क्योंकि उनसे परमानन्द की उपलब्धि होती ही नहीं; उलटे द्वेष, उद्वेग, अभिमान, मानसिक पीड़ा, कलह, दुःख और परिश्रम ही हाथ लगते हैं। *इन्द्र! हमारे स्वामी अपने भक्त के अर्थ, धर्म एवं काम सम्बन्धी प्रयास को व्यर्थ कर दिया करते हैं और सच पूछो तो इसी से भगवान् की कृपा का अनुमान होता है। क्योंकि उनका ऐसा कृपा-प्रसाद अकिंचन भक्तों के लिये ही अनुभवगम्य है, दूसरों के लिये तो अत्यन्त दुर्लभ ही है। (भगवान् को प्रत्यक्ष अनुभव करते हुए वृत्रासुर ने प्रार्थना की-) ‘प्रभो! आप मुझ पर ऐसी कृपा कीजिये कि अनन्य भाव से आपके चरणकमलों के आश्रित सेवकों की सेवा करने का अवसर मुझे अगले जन्म में भी प्राप्त हो। प्राणवल्लभ! मेरा मन आपके मंगलमय गुणों का स्मरण करता रहे, मेरी वाणी उन्हीं का गान करे और शरीर आपकी सेवा में ही सलंग्न रहे। *सर्वसौभाग्यनिधे! मैं आपको छोड़कर स्वर्ग, ब्रह्मलोक, भूमण्डल का साम्राज्य, रसातल का एकच्छत्र राज्य, योग की सिद्धियाँ-यहाँ तक कि मोक्ष भी नहीं चाहता। *जैसे पक्षियों के पंखहीन बच्चे अपनी माँ की बाट जोहते रहते हैं, जैसे भूखे बछड़े अपनी माँ का दूध पीने के लिये आतुर रहते हैं और जैसे वियोगिनी पत्नी अपने प्रवासी प्रियतम से मिलने के लिये उत्कण्ठित रहती है-वैसे ही कमलनयन! मेरा मन आपके दर्शन के लिये छटपटा रहा है। *प्रभो! मैं मुक्ति नहीं चाहता। मेरे कर्मों के फलस्वरूप मुझे बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्कर में भटकना पड़े, इसकी परवा नहीं। परन्तु मैं जहाँ-जहाँ जाऊँ, जिस-जिस योनि में जन्मूँ, वहाँ-वहाँ भगवान् के प्यारे भक्तजनों से मेरी प्रेम-मैत्री बनी रहे। *स्वामिन्! मैं केवल यही चाहता हूँ कि जो लोग आपकी माया से देह-गेह और स्त्री-पुत्र आदि में आसक्त हो रहे हैं, उनके साथ मेरा कभी किसी प्रकार का भी सम्बन्ध न हो’। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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Anmol Mishra Feb 25, 2021

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Neha Sharma, Haryana Feb 25, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 135*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 06*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 10*🙏🌸 *इस अध्याय में देवताओं द्वारा दधीचि ऋषि की अस्थियों से वज्र-निर्माण और वृत्रासुर की सेना पर आक्रमण...... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! विश्व के जीवनदाता श्रीहरि इन्द्र को इस प्रकार आदेश देकर देवताओं के सामने वहीं-के-वहीं अन्तर्धान हो गये। *अब देवताओं ने उदारशिरोमणि अथर्ववेदी दधीचि ऋषि के के पास जाकर भगवान् के आज्ञानुसार याचना की। देवताओं की याचना सुनकर दधीचि ऋषि को बड़ा आनन्द हुआ। उन्होंने हँसकर देवताओं से कहा- ‘देवताओ! आप लोगों को सम्भवतः यह बात नहीं मालूम है कि मरते समय प्राणियों को बड़ा कष्ट होता है। उन्हें जब तक चेत रहता है, बड़ी असह्य पीड़ा सहनी पड़ती है और अन्त में वे मुर्च्छित हो जाते हैं। जो जीव जगत् में जीवित रहना चाहते हैं, उनके लिये शरीर बहुत ही अनमोल, प्रियतम एवं अभीष्ट वस्तु है। ऐसी स्थिति में स्वयं विष्णु भगवान् भी यदि जीव से उसका शरीर माँगें तो कौन उसे देने का साहस करेगा। *देवताओं ने कहा- ब्रह्मन्! आप-जैसे उदार और प्राणियों पर दया करने वाले महापुरुष, जिनके कर्मों की बड़े-बड़े यशस्वी महानुभाव भी प्रशंसा करते हैं, प्राणियों की भलाई के लिये कौन-सी वस्तु निछावर नहीं कर सकते। भगवन्! इसमें सन्देह नहीं कि माँगने वाले लोग स्वार्थी होते हैं। उसमें देने वालों की कठिनाई का विचार करने की बुद्धि नहीं होती। यदि उनमें इतनी समझ होती तो वे माँगते ही क्यों। इसी प्रकार दाता भी माँगने वाले की विपत्ति नहीं जानता। अन्यथा उसके मुँह से कदापि नाहीं न निकलती (इसलिये आप हमारी विपत्ति समझकर हमारी याचना पूर्ण कीजिये।)। *दधीचि ऋषि ने कहा- देवताओं! मैंने आप लोगों के मुँह से धर्म की बात सुनने के लिये ही आपकी माँग के प्रति उपेक्षा दिखलायी थी। यह लीजिये, मैं अपने प्यारे शरीर को आप लोगों के लिये अभी छोड़े देता हूँ। क्योंकि एक दिन यह स्वयं ही मुझे छोड़ने वाला है। देवशिरोमणियों! जो मनुष्य इस विनाशी शरीर से दुःखी प्राणियों पर दया करके मुख्यतः धर्म और गौणतः यश का सम्पादन नहीं करता, वह जड़ पेड़-पौधों से भी गया-बीता है। बड़े-बड़े महात्माओं ने इस अविनाशी धर्म की उपासना की है। उसका स्वरूप बस, इतना ही है कि मनुष्य किसी भी प्राणी के दुःख में दुःख का अनुभव करे और सुख में सुख का। जगत् के धन, जन और शरीर आदि पदार्थ क्षणभंगुर हैं। ये अपने किसी काम नहीं आते, अन्त में दूसरों के ही काम आयेंगे। ओह! यह कैसी कृपणता है, कितने दुःख की बात है कि यह मरणधर्मा मनुष्य इनके द्वारा दूसरों का उपकार नहीं कर लेता। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! अथर्ववेदी महर्षि दधीचि ने ऐसा निश्चय करके अपने को परब्रह्म परमात्मा श्रीभगवान् में लीन करके अपना स्थूल शरीर त्याग दिया। उनके इन्द्रिय, प्राण, मन और बुद्धि संयत थे, दृष्टि तत्त्वमयी थी, उनके सारे बन्धन कट चुके थे। अतः जब वे भगवान् से अत्यन्त युक्त होकर स्थित हो गये, तब उन्हें इस बात का पता ही न चल कि मेरा शरीर छूट गया। भगवान् की शक्ति पाकर इन्द्र का बल-पौरुष उन्नति की सीमा पर पहुँच गया। अब विश्वकर्मा जी ने दधीचि ऋषि की हड्डियों से वज्र बनाकर उन्हें दिया और वे उसे हाथ में लेकर ऐरावत हाथी पर सवार हुए। उनके साथ-साथ सभी देवता लोग तैयार हो गये। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि देवराज इन्द्र की स्तुति करने लगे। अब उन्होंने त्रिलोकी को हर्षित करते हुए वृत्रासुर का वध करने के लिये उस पर पूरी शक्ति लगाकर धावा बोल दिया- ठीक वैसे ही, जैसे भगवान् रुद्र क्रोधित होकर स्वयं काल पर ही आक्रमण कर रहे हों। *परीक्षित! वृत्रासुर भी दैत्य-सेनापतियों की बहुत बड़ी सेना के साथ मोर्चे पर डटा हुआ था। *जो वैवस्वत मन्वन्तर इस समय चल रहा है, इसकी पहली चतुर्युगी का त्रेतायुग अभी आरम्भ ही हुआ था। उसी समय नर्मदा तट पर देवताओं का दैत्यों के साथ यह भयंकर संग्राम हुआ। उस समय देवराज इन्द्र हाथ में वज्र लेकर रुद्र, वसु, आदित्य, दोनों अश्विनीकुमार, पितृगण, अग्नि, मरुद्गण, ऋभुगण, साध्यगण और विश्वेदेव आदि के साथ अपनी कान्ति से शोभायमान हो रहे थे। वृत्रासुर आदि दैत्य उनको अपने सामने आया देख और भी चिढ़ गये। तब नमुचि, शम्बर, अनर्वा, द्विमूर्धा, ऋषभ, अम्बर, हयग्रीव, शंकुशिरा, विप्रचित्ति, अयोमुख, पुलोमा, वृषपर्वा, प्रहेति, हेति, उत्कल, सुमाली, माली आदि हजारों दैत्य-दानव एवं यक्ष-राक्षस स्वर्ण के साज-सामान से सुसज्जित होकर देवराज इन्द्र की सेना को आगे बढ़ने से रोकने लगे। *परीक्षित! उस समय देवताओं की सेना स्वयं मृत्यु के लिये भी अजेय थी। वे घमंडी असुर सिंहनाद करते हुए बड़ी सावधानी से देवसेना पर प्रहार करने लगे। उन लोगों ने गदा, परिघ, बाण, प्रास, मुद्गर, तोमर, शूल, फरसे, तलवार, शतघ्नी (तोप), भुशुण्डि आदि अस्त्र-शस्त्रों की बौछार से देवताओं को सब ओर से ढक दिया। एक-पर-एक इतने बाण चारों ओर से आ रहे थे कि उनसे ढक जाने के कारण देवता दिखलायी भी नहीं पड़ते थे-जैसे बादलों से ढक जाने पर आकाश के तारे नहीं दिखायी देते। परीक्षित! वह शस्त्रों और अस्त्रों की वर्षा देवसैनिकों को छू तक न सकी। उन्होंने अपने हस्तलाघव से आकाश में ही उनके हजार-हजार टुकड़े कर दिये। जब असुरों के अस्त्र-शस्त्र समाप्त हो गये, तब वे देवताओं की सेना पर पर्वतों के शिखर, वृक्ष और पत्थर बरसाने लगे। परन्तु देवताओं ने उन्हें पहले की ही भाँति काट गिराया। *परीक्षित! जब वृत्रासुर के अनुयायी असुरों ने देखा कि उनके असंख्य अस्त्र-शस्त्र भी देवसेना का कुछ न बिगाड़ सके-यहाँ तक कि वृक्षों, चट्टानों और पहाड़ों के बड़े-बड़े शिखर से भी उनके शरीर पर खरोंच तक नहीं आयी, सब-के-सब सकुशल हैं, तब तो वे बहुत डर गये। दैत्य लोग देवताओं को पराजित करने के लिये जो-जो प्रयत्न करते, वे सब-के-सब निष्फल हो जाते-ठीक वैसे ही, जैसे भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा सुरक्षित भक्तों पर क्षुद्र मनुष्यों के कठोर और अमंगलमय दुर्वचनों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। *भगवद्विमुख असुर अपना प्रयत्न व्यर्थ देखकर उत्साहरहित हो गये। उनका वीरता का घमंड जाता रहा। अब वे अपने सरदार वृत्रासुर को युद्धभूमि में ही छोड़कर भाग खड़े हुए; क्योंकि देवताओं ने उनका सारा बल-पौरुष छीन लिया था। जब धीर-वीर वृत्रासुर ने देखा कि मेरे अनुयायी असुर भाग रहे हैं और अत्यन्त भयभीत होकर मेरी सेना भी तहस-नहस और तितर-बितर हो रही है, तब वह हँसकर कहने लगा। *वीरशिरोमणि वृत्रासुर ने समयानुसार वीरोचित वाणी से विप्रचित्ति, नमुचि, पुलोमा, मय, अनर्वा, शम्बर आदि दैत्यों को सम्बोधित करके कहा- ‘असुरों! भागो मत, मेरी एक बात सुन लो। इसमें सन्देह नहीं कि जो पैदा हुआ है, उसे एक-न-एक दिन अवश्य मरना पड़ेगा। इस जगत् में विधाता ने मृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं बताया है। ऐसी स्थिति में यदि मृत्यु के द्वारा स्वर्गादि लोक और सुयश भी मिल रहा हो तो ऐसा कौन बुद्धिमान् है, जो उस उत्तम मृत्यु को न अपनायेगा। संसार में दो प्रकार की मृत्यु परम दुर्लभ और श्रेष्ठ मानी गयी है-एक तो योगी पुरुष का अपने प्राणों को वश में करके ब्रह्मचिन्तन के द्वारा शरीर का परित्याग और दूसरा युद्धभूमि में सेना के आगे रहकर बिना पीठ दिखाये जूझ मरना (तुम लोग भला, ऐसा शुभ अवसर क्यों खो रहे हो)। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 **************************************************

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Ramesh Agrawal Feb 24, 2021

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Govind Singh Chauhan Feb 25, 2021

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