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judge VERMA Sep 30, 2017

Happy dussehra

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Pawan Saini Mar 29, 2020

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Archana Singh Mar 29, 2020

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*श्री हरि* *सांसारिक भोगों को बाहर से भी भोगा जा सकता है और मन से भी। बाहर से भोग भोगना और मन से उनके चिंतन का रस लेना दोनों में कोई फर्क नहीं है। बाहर से राग पूर्वक भोग भोगने से जैसा संस्कार पड़ता है वैसा ही संस्कार मन से भोग भोगने से अथार्त मन से भोगों के चिंतन में रस लेने से पड़ता है। भोग की याद आने पर उसकी याद से रस लेते हैं तो कई वर्ष बीतने पर भी वह भोग ज्यों का त्यों बना रहता है। अतः भोग के चिंतन से भी एक नया भोग बनता है। इतना ही नहीं, मन से भोगों के चिंतन का सुख लेने से विशेष हानि होती है।कारण कि लोक लिहाज से,व्यवहार में गड़बड़ी आने के भय से मनुष्य बाहर से से तो भोगों का त्याग कर सकता है पर मन से भोग भोगने में बाहर से कोई बाधा नहीं आती। अतः मन से भोग भोगने का विशेष अवसर मिलता है। इसलिए मन से भोग भोगना साधक के लिए बहुत नुकसान करने वाली बात है। वास्तव में मन से भोगों का त्याग ही वास्तविक त्याग है* *साधक संजीवनी,(लेखक-परम श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज), पृष्ठ १५३*

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Sanjay Singh Mar 29, 2020

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Santosh Jha Mar 29, 2020

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Pooja Ji Mar 29, 2020

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Raj Kumar Sharma Mar 29, 2020

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Sanjay Singh Mar 29, 2020

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Jai Narayan Rana Mar 29, 2020

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