Neha Sharma, Haryana
Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 181*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 22*🙏🌸 *इस अध्याय में बलि के द्वारा भगवान् की स्तुति और भगवान् का उस पर प्रसन्न होना...... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! इस प्रकार भगवान् ने असुरराज बलि का बड़ा तिरस्कार किया और उन्हें धैर्य से विचलित करना चाहा। परन्तु वे तनिक भी विचलित न हुए, बड़े धैर्य से बोले। *दैत्यराज बलि ने कहा- 'देवताओं के आराध्यदेव! आपकी कीर्ति बड़ी पवित्र है। क्या आप मेरी बात को असत्य समझते हैं? ऐसा नहीं है। मैं उसे सत्य कर दिखाता हूँ। आप धोखे में नहीं पड़ेंगे। आप कृपा करके अपना तीसरा पग मेरे सिर पर रख दीजिये। मुझे नरक में जाने का अथवा राज्य से च्युत होने का भय नहीं है। मैं पाश में बँधने अथवा अपार दुःख में पड़ने से भी नहीं डरता। मेरे पास फूटी कौड़ी भी न रहे अथवा आप मुझे घोर दण्ड दें- यह भी मेरे भय का कारण नहीं है। मैं डरता हूँ तो केवल अपनी अपकीर्ति से। अपने पूजनीय गुरुजनों के द्वारा दिया हुआ दण्ड तो जीवमात्र के लिये अत्यन्त वाञ्छनीय है। क्योंकि वैसा दण्ड माता, पिता, भाई और सुहृद् भी मोहवश नहीं दे पाते। *आप छिपे रूप से अवश्य ही हम असुरों को श्रेष्ठ शिक्षा दिया करते हैं, अतः आप हमारे परम गुरु हैं। जब हम लोग धन, कुलीनता, बल आदि के मद से अंधे हो जाते हैं, तब आप उन वस्तुओं को हमसे छीनकर हमें नेत्रदान करते हैं। आपसे हम लोगों का उपकार होता है, उसे मैं क्या बताऊँ? अनन्य भाव से योग करने वाले योगीगण जो सिद्धि प्राप्त करते हैं, वही सिद्धि बहुत-से असुरों को आपके साथ दृढ़ वैर भाव करने से ही प्राप्त हो गयी है। जिनकी ऐसी महिमा, ऐसी अनन्त लीलाएँ हैं, वही आप मुझे दण्ड दे रहे हैं और वरुण पाश से बाँध रहे हैं। इसकी न तो मुझे कोई लज्जा है और न किसी प्रकार की व्यथा ही। *प्रभो! मेरे पितामह प्रह्लाद जी की कीर्ति सारे जगत् में प्रसिद्ध है। वे आपके भक्तों में श्रेष्ठ माने गये हैं। उनके पिता हिरण्यकशिपु ने आपसे वैर-विरोध रखने के कारण उन्हें अनेकों प्रकार के दुःख दिये। परन्तु वे आपके ही परायण रहे, उन्होंने अपना जीवन आप पर ही निछावर कर दिया। उन्होंने यह निश्चय कर लिया कि शरीर को लेकर क्या करना है, जब यह एक-न-एक दिन साथ छोड़ ही देता है। जो धन-सम्पत्ति लेने के लिये स्वजन बने हुए हैं, उन डाकुओं से अपना स्वार्थ ही क्या है? पत्नी से भी क्या लाभ है, जब वह जन्म-मृत्यु रूप संसार के चक्र में डालने वाली ही है। जब मर ही जाना है, तब घर से मोह करने में भी क्या स्वार्थ है? इन सब वस्तुओं में उलझ जाना तो केवल मेरे पितामह प्रह्लाद जी ने, यह जानते हुए भी कि आप लौकिक दृष्टि से उनके भाई-बन्धुओं के नाश करने वाले शत्रु हैं, फिर आपके ही भयरहित एवं अविनाशी चरणकमलों की शरण ग्रहण की थी। क्यों न हो-वे संसार से परम विरक्त, अगाध बोध सम्पन्न, उदार हृदय एवं संत-शिरोमणि जो हैं। आप उस दृष्टि से मेरे भी शत्रु हैं, फिर भी विधाता ने मुझे बलात् ऐश्वर्य-लक्ष्मी से अलग करके आपके पास पहुँचा दिया है। अच्छा ही हुआ; क्योंकि ऐश्वर्य-लक्ष्मी के कारण जीव की बुद्धि जड़ हो जाती है और वह यह नहीं समझ पाता कि ‘मेरा यह जीवन मृत्यु के पंजे में पड़ा हुआ और अनित्य है’। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! राजा बलि इस प्रकार कह ही रहे थे कि उदय होते हुए चन्द्रमा के समान भगवान के प्रेमपात्र प्रह्लाद जी वहाँ आ पहुँचे। राजा बलि ने देखा कि मेरे पितामह बड़े श्रीसम्पन्न हैं। कमल के समान कोमल नेत्र हैं, लंबी-लंबी भुजाएँ हैं, सुन्दर ऊँचे और श्यामल शरीर पर पीताम्बर धारण किये हुए हैं। *बलि इस समय वरुण पाश में बँधे हुए थे। इसलिये प्रह्लाद जी के आने पर जैसे पहले वे उनकी पूजा किया करते थे, उस प्रकार न कर सके। उनके नेत्र आँसुओं से चंचल हो उठे, लज्जा के मारे मुँह नीचा हो गया। उन्होंने केवल सिर झुकाकर उन्हें नमस्कार किया। प्रह्लाद जी ने देखा कि भक्तवत्सल भगवान वहीं विराजमान हैं और सुनन्द, नन्द आदि पार्षद उनकी सेवा कर रहे हैं। प्रेम के उद्रेक से प्रह्लाद जी का शरीर पुलकित हो गया, उनकी आँखों में आँसू छलक आये। वे आनन्दपूर्ण हृदय से सिर झुकाये अपने स्वामी के पास गये और पृथ्वी पर सिर रखकर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। *प्रह्लाह जी ने कहा- 'प्रभो! आपने ही बलि को यह ऐश्वर्यपूर्ण इन्द्रपद दिया था, अब आज आपने ही उसे छीन लिया। आपका देना जैसा सुन्दर है, वैसा ही सुन्दर लेना भी। मैं समझता हूँ कि आपने इस पर बड़ी भारी कृपा की है, जो आत्मा को मोहित करने वाली राज्यलक्ष्मी से इसे अलग कर दिया। प्रभो! लक्ष्मी के मद से तो विद्वान् पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। उसके रहते भला, अपने वास्तविक स्वरूप को ठीक-ठीक कौन जान सकता है? अतः उस लक्ष्मी को छीनकर महान् उपकार करने वाले, समस्त जगत् के महान् ईश्वर, सबके हृदय में विराजमान और सबके परमसाक्षी श्रीनारायणदेव को मैं नमस्कार करता हूँ।' *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! प्रह्लाद जी अंजलि बाँधकर खड़े थे। उनके सामने ही भगवान ब्रह्मा जी ने वामन भगवान से कुछ कहना चाहा। परन्तु इतने में ही राजा बलि की परमसाध्वी पत्नी विन्ध्यावली ने अपने पति को बँधा देखकर भयभीत हो भगवान के चरणों में प्रणाम किया और हाथ जोड़, मुँह नीचा कर वह भगवान से बोली। *विन्ध्यावली ने कहा- 'प्रभो! आपने अपनी क्रीड़ा के लिये ही इस सम्पूर्ण जगत् की रचना की है। जो लोग कुबुद्धि हैं, वे ही अपने को इसका स्वामी मानते हैं। जब आप ही इसके कर्ता, भर्ता और संहर्ता हैं, तब आपकी माया से मोहित होकर अपने को झूठमूठ कर्ता मानने वाले निर्लज्ज आपको समर्पण क्या करेंगे?' "ब्रह्मा जी ने कहा- 'समस्त प्राणियों के जीवनदाता, उनके स्वामी और जगत्स्वरूप देवाधिदेव प्रभो! अब आप इसे छोड़ दीजिये। आपने इसका सर्वस्व ले लिया है, अतः अब यह दण्ड का पात्र नहीं है। इसने अपनी सारी भूमि और पुण्यकर्मों से उपार्जित स्वर्ग आदि लोक, अपना सर्वस्व तथा आत्मा तक आपको समर्पित कर दिया है एवं ऐसा करते समय इसकी बुद्धि स्थिर रही है, यह धैर्य से च्युत नहीं हुआ है। प्रभो! जो मनुष्य सच्चे हृदय से कृपणता छोड़कर आपके चरणों में जल का अर्ध्य देता है और केवल दूर्वादल से भी आपकी सच्ची पूजा करते है, उसे भी उत्तम गति की प्राप्ति होती है। फिर बलि ने तो बड़ी प्रसन्नता से धैर्य और स्थिरतापूर्वक आपको त्रिलोकी का दान कर दिया है। तब यह दुःख का भागी कैसे हो सकता है?' *श्रीभगवान ने कहा- ब्रह्मा जी! मैं जिस पर कृपा करता हूँ, उसका धन छीन लिया करता हूँ। क्योंकि जब मनुष्य धन के मद से मतवाला हो जाता है, तब मेरा और लोगों का तिरस्कार करने लगता है। यह जीव अपने कर्मों के कारण विवश होकर अनेक योनियों में भटकता रहता है, जब कभी मेरी बड़ी कृपा से मनुष्य का शरीर प्राप्त करता है। मनुष्य योनि में जन्म लेकर यदि कुलीनता, कर्म, अवस्था, रूप, विद्या, ऐश्वर्य और धन आदि के कारण घमंड न हो जाये तो समझना चाहिये कि मेरी बड़ी ही कृपा है। *कुलीनता आदि बहुत-से ऐसे कारण हैं, जो अभिमान और जड़ता आदि उत्पन्न करके मनुष्य को कल्याण के समस्त साधनों से वंचित कर देते हैं; परन्तु जो मेरे शरणागत होते हैं, वे इनसे मोहित नहीं होते। यह बलि दानव और दैत्य दोनों ही वंशों में अग्रगण्य और उनकी कीर्ति को बढ़ाने वाला है। इसने उस माया पर विजय प्राप्त कर ली है, जिसे जीतना अत्यन्त कठिन है। तुम देख ही रहे हो, इतना दुःख भोगने पर भी यह मोहित नहीं हुआ। *इसका धन छीन लिया, राजपद से अलग कर दिया, तरह-तरह के आपेक्ष किये, शत्रुओं ने बाँध लिया, भाई-बन्धु छोड़कर चले गये, इतनी यातनाएँ भोगनी पड़ी-यहाँ तक कि गुरुदेव ने भी इसको डाँटा-फटकारा और शाप तक दे दिया। परन्तु इस दृढ़व्रती ने अपनी प्रतिज्ञा नहीं छोड़ी। मैंने इससे छल भरी बातें कीं, मन में छल रखकर धर्म का उपदेश किया; परन्तु इस सत्यवादी ने अपना धर्म न छोड़ा। अतः मैंने इसे वह स्थान दिया है, जो बड़े-बड़े देवताओं को भी बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है। सावर्णि मन्वन्तर में यह मेरा परम भक्त इन्द्र होगा। तब तक यह विश्वकर्मा के बनाये हुए सुतल लोक में रहे। वहाँ रहने वाले लोग मेरी कृपादृष्टि का अनुभव करते हैं। इसलिये उन्हें शारीरिक अथवा मानसिक रोग, थकावट, तन्द्रा, बाहरी या भीतरी शत्रुओं से पराजय और किसी प्रकार के विघ्नों का सामना नहीं करना पड़ता। *[बलि को सम्बोधित कर] महाराज इन्द्रसेन! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम अपने भाई-बन्धुओं के साथ उस सुतल लोक में जाओ, जिसे स्वर्ग के देवता भी चाहते रहते हैं। बड़े-बड़े लोकपाल भी अब तुम्हें पराजित नहीं कर सकेंगे, दूसरों की तो बात ही क्या है। जो दैत्य तुम्हारी आज्ञा का उल्लंघन करेंगे, मेरा चक्र उनके टुकड़े-टुकड़े कर देगा। मैं तुम्हारी, तुम्हारे अनुचरों की और भोग सामग्री की भी सब प्रकार के विघ्नों से रक्षा करूँगा। *वीर बलि! तुम मुझे वहाँ सदा-सर्वदा अपने पास ही देखोगे। दानव और दैत्यों के संसर्ग से तुम्हारा जो कुछ आसुरभाव होगा, वह मेरे प्रभाव से तुरंत दब जायेगा और नष्ट हो जायेगा। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸
               🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸
 🌸🙏*पोस्ट - 181*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸
                     🌸🙏*अध्याय - 22*🙏🌸
*इस अध्याय में  बलि के द्वारा भगवान् की स्तुति और भगवान् का उस पर प्रसन्न होना......

          *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! इस प्रकार भगवान् ने असुरराज बलि का बड़ा तिरस्कार किया और उन्हें धैर्य से विचलित करना चाहा। परन्तु वे तनिक भी विचलित न हुए, बड़े धैर्य से बोले। 
          *दैत्यराज बलि ने कहा- 'देवताओं के आराध्यदेव! आपकी कीर्ति बड़ी पवित्र है। क्या आप मेरी बात को असत्य समझते हैं? ऐसा नहीं है। मैं उसे सत्य कर दिखाता हूँ। आप धोखे में नहीं पड़ेंगे। आप कृपा करके अपना तीसरा पग मेरे सिर पर रख दीजिये। मुझे नरक में जाने का अथवा राज्य से च्युत होने का भय नहीं है। मैं पाश में बँधने अथवा अपार दुःख में पड़ने से भी नहीं डरता। मेरे पास फूटी कौड़ी भी न रहे अथवा आप मुझे घोर दण्ड दें- यह भी मेरे भय का कारण नहीं है। मैं डरता हूँ तो केवल अपनी अपकीर्ति से। अपने पूजनीय गुरुजनों के द्वारा दिया हुआ दण्ड तो जीवमात्र के लिये अत्यन्त वाञ्छनीय है। क्योंकि वैसा दण्ड माता, पिता, भाई और सुहृद् भी मोहवश नहीं दे पाते। 
          *आप छिपे रूप से अवश्य ही हम असुरों को श्रेष्ठ शिक्षा दिया करते हैं, अतः आप हमारे परम गुरु हैं। जब हम लोग धन, कुलीनता, बल आदि के मद से अंधे हो जाते हैं, तब आप उन वस्तुओं को हमसे छीनकर हमें नेत्रदान करते हैं। आपसे हम लोगों का उपकार होता है, उसे मैं क्या बताऊँ? अनन्य भाव से योग करने वाले योगीगण जो सिद्धि प्राप्त करते हैं, वही सिद्धि बहुत-से असुरों को आपके साथ दृढ़ वैर भाव करने से ही प्राप्त हो गयी है। जिनकी ऐसी महिमा, ऐसी अनन्त लीलाएँ हैं, वही आप मुझे दण्ड दे रहे हैं और वरुण पाश से बाँध रहे हैं। इसकी न तो मुझे कोई लज्जा है और न किसी प्रकार की व्यथा ही। 
          *प्रभो! मेरे पितामह प्रह्लाद जी की कीर्ति सारे जगत् में प्रसिद्ध है। वे आपके भक्तों में श्रेष्ठ माने गये हैं। उनके पिता हिरण्यकशिपु ने आपसे वैर-विरोध रखने के कारण उन्हें अनेकों प्रकार के दुःख दिये। परन्तु वे आपके ही परायण रहे, उन्होंने अपना जीवन आप पर ही निछावर कर दिया। उन्होंने यह निश्चय कर लिया कि शरीर को लेकर क्या करना है, जब यह एक-न-एक दिन साथ छोड़ ही देता है। जो धन-सम्पत्ति लेने के लिये स्वजन बने हुए हैं, उन डाकुओं से अपना स्वार्थ ही क्या है? पत्नी से भी क्या लाभ है, जब वह जन्म-मृत्यु रूप संसार के चक्र में डालने वाली ही है। जब मर ही जाना है, तब घर से मोह करने में भी क्या स्वार्थ है? इन सब वस्तुओं में उलझ जाना तो केवल मेरे पितामह प्रह्लाद जी ने, यह जानते हुए भी कि आप लौकिक दृष्टि से उनके भाई-बन्धुओं के नाश करने वाले शत्रु हैं, फिर आपके ही भयरहित एवं अविनाशी चरणकमलों की शरण ग्रहण की थी। क्यों न हो-वे संसार से परम विरक्त, अगाध बोध सम्पन्न, उदार हृदय एवं संत-शिरोमणि जो हैं। आप उस दृष्टि से मेरे भी शत्रु हैं, फिर भी विधाता ने मुझे बलात् ऐश्वर्य-लक्ष्मी से अलग करके आपके पास पहुँचा दिया है। अच्छा ही हुआ; क्योंकि ऐश्वर्य-लक्ष्मी के कारण जीव की बुद्धि जड़ हो जाती है और वह यह नहीं समझ पाता कि ‘मेरा यह जीवन मृत्यु के पंजे में पड़ा हुआ और अनित्य है’।
          *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! राजा बलि इस प्रकार कह ही रहे थे कि उदय होते हुए चन्द्रमा के समान भगवान के प्रेमपात्र प्रह्लाद जी वहाँ आ पहुँचे। राजा बलि ने देखा कि मेरे पितामह बड़े श्रीसम्पन्न हैं। कमल के समान कोमल नेत्र हैं, लंबी-लंबी भुजाएँ हैं, सुन्दर ऊँचे और श्यामल शरीर पर पीताम्बर धारण किये हुए हैं। 
          *बलि इस समय वरुण पाश में बँधे हुए थे। इसलिये प्रह्लाद जी के आने पर जैसे पहले वे उनकी पूजा किया करते थे, उस प्रकार न कर सके। उनके नेत्र आँसुओं से चंचल हो उठे, लज्जा के मारे मुँह नीचा हो गया। उन्होंने केवल सिर झुकाकर उन्हें नमस्कार किया। प्रह्लाद जी ने देखा कि भक्तवत्सल भगवान वहीं विराजमान हैं और सुनन्द, नन्द आदि पार्षद उनकी सेवा कर रहे हैं। प्रेम के उद्रेक से प्रह्लाद जी का शरीर पुलकित हो गया, उनकी आँखों में आँसू छलक आये। वे आनन्दपूर्ण हृदय से सिर झुकाये अपने स्वामी के पास गये और पृथ्वी पर सिर रखकर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। 
          *प्रह्लाह जी ने कहा- 'प्रभो! आपने ही बलि को यह ऐश्वर्यपूर्ण इन्द्रपद दिया था, अब आज आपने ही उसे छीन लिया। आपका देना जैसा सुन्दर है, वैसा ही सुन्दर लेना भी। मैं समझता हूँ कि आपने इस पर बड़ी भारी कृपा की है, जो आत्मा को मोहित करने वाली राज्यलक्ष्मी से इसे अलग कर दिया। प्रभो! लक्ष्मी के मद से तो विद्वान् पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। उसके रहते भला, अपने वास्तविक स्वरूप को ठीक-ठीक कौन जान सकता है? अतः उस लक्ष्मी को छीनकर महान् उपकार करने वाले, समस्त जगत् के महान् ईश्वर, सबके हृदय में विराजमान और सबके परमसाक्षी श्रीनारायणदेव को मैं नमस्कार करता हूँ।' 
          *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! प्रह्लाद जी अंजलि बाँधकर खड़े थे। उनके सामने ही भगवान ब्रह्मा जी ने वामन भगवान से कुछ कहना चाहा। परन्तु इतने में ही राजा बलि की परमसाध्वी पत्नी विन्ध्यावली ने अपने पति को बँधा देखकर भयभीत हो भगवान के चरणों में प्रणाम किया और हाथ जोड़, मुँह नीचा कर वह भगवान से बोली। 
          *विन्ध्यावली ने कहा- 'प्रभो! आपने अपनी क्रीड़ा के लिये ही इस सम्पूर्ण जगत् की रचना की है। जो लोग कुबुद्धि हैं, वे ही अपने को इसका स्वामी मानते हैं। जब आप ही इसके कर्ता, भर्ता और संहर्ता हैं, तब आपकी माया से मोहित होकर अपने को झूठमूठ कर्ता मानने वाले निर्लज्ज आपको समर्पण क्या करेंगे?' 
          "ब्रह्मा जी ने कहा- 'समस्त प्राणियों के जीवनदाता, उनके स्वामी और जगत्स्वरूप देवाधिदेव प्रभो! अब आप इसे छोड़ दीजिये। आपने इसका सर्वस्व ले लिया है, अतः अब यह दण्ड का पात्र नहीं है। इसने अपनी सारी भूमि और पुण्यकर्मों से उपार्जित स्वर्ग आदि लोक, अपना सर्वस्व तथा आत्मा तक आपको समर्पित कर दिया है एवं ऐसा करते समय इसकी बुद्धि स्थिर रही है, यह धैर्य से च्युत नहीं हुआ है। प्रभो! जो मनुष्य सच्चे हृदय से कृपणता छोड़कर आपके चरणों में जल का अर्ध्य देता है और केवल दूर्वादल से भी आपकी सच्ची पूजा करते है, उसे भी उत्तम गति की प्राप्ति होती है। फिर बलि ने तो बड़ी प्रसन्नता से धैर्य और स्थिरतापूर्वक आपको त्रिलोकी का दान कर दिया है। तब यह दुःख का भागी कैसे हो सकता है?'
          *श्रीभगवान ने कहा- ब्रह्मा जी! मैं जिस पर कृपा करता हूँ, उसका धन छीन लिया करता हूँ। क्योंकि जब मनुष्य धन के मद से मतवाला हो जाता है, तब मेरा और लोगों का तिरस्कार करने लगता है। यह जीव अपने कर्मों के कारण विवश होकर अनेक योनियों में भटकता रहता है, जब कभी मेरी बड़ी कृपा से मनुष्य का शरीर प्राप्त करता है। मनुष्य योनि में जन्म लेकर यदि कुलीनता, कर्म, अवस्था, रूप, विद्या, ऐश्वर्य और धन आदि के कारण घमंड न हो जाये तो समझना चाहिये कि मेरी बड़ी ही कृपा है। 
          *कुलीनता आदि बहुत-से ऐसे कारण हैं, जो अभिमान और जड़ता आदि उत्पन्न करके मनुष्य को कल्याण के समस्त साधनों से वंचित कर देते हैं; परन्तु जो मेरे शरणागत होते हैं, वे इनसे मोहित नहीं होते। यह बलि दानव और दैत्य दोनों ही वंशों में अग्रगण्य और उनकी कीर्ति को बढ़ाने वाला है। इसने उस माया पर विजय प्राप्त कर ली है, जिसे जीतना अत्यन्त कठिन है। तुम देख ही रहे हो, इतना दुःख भोगने पर भी यह मोहित नहीं हुआ। 
          *इसका धन छीन लिया, राजपद से अलग कर दिया, तरह-तरह के आपेक्ष किये, शत्रुओं ने बाँध लिया, भाई-बन्धु छोड़कर चले गये, इतनी यातनाएँ भोगनी पड़ी-यहाँ तक कि गुरुदेव ने भी इसको डाँटा-फटकारा और शाप तक दे दिया। परन्तु इस दृढ़व्रती ने अपनी प्रतिज्ञा नहीं छोड़ी। मैंने इससे छल भरी बातें कीं, मन में छल रखकर धर्म का उपदेश किया; परन्तु इस सत्यवादी ने अपना धर्म न छोड़ा। अतः मैंने इसे वह स्थान दिया है, जो बड़े-बड़े देवताओं को भी बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है। सावर्णि मन्वन्तर में यह मेरा परम भक्त इन्द्र होगा। तब तक यह विश्वकर्मा के बनाये हुए सुतल लोक में रहे। वहाँ रहने वाले लोग मेरी कृपादृष्टि का अनुभव करते हैं। इसलिये उन्हें शारीरिक अथवा मानसिक रोग, थकावट, तन्द्रा, बाहरी या भीतरी शत्रुओं से पराजय और किसी प्रकार के विघ्नों का सामना नहीं करना पड़ता। 
          *[बलि को सम्बोधित कर] महाराज इन्द्रसेन! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम अपने भाई-बन्धुओं के साथ उस सुतल लोक में जाओ, जिसे स्वर्ग के देवता भी चाहते रहते हैं। बड़े-बड़े लोकपाल भी अब तुम्हें पराजित नहीं कर सकेंगे, दूसरों की तो बात ही क्या है। जो दैत्य तुम्हारी आज्ञा का उल्लंघन करेंगे, मेरा चक्र उनके टुकड़े-टुकड़े कर देगा। मैं तुम्हारी, तुम्हारे अनुचरों की और भोग सामग्री की भी सब प्रकार के विघ्नों से रक्षा करूँगा। 
          *वीर बलि! तुम मुझे वहाँ सदा-सर्वदा अपने पास ही देखोगे। दानव और दैत्यों के संसर्ग से तुम्हारा जो कुछ आसुरभाव होगा, वह मेरे प्रभाव से तुरंत दब जायेगा और नष्ट हो जायेगा।
                             ~~~०~~~
                   *श्रीकृष्ण  गोविन्द  हरे मुरारे।
                   *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥
                           "जय जय श्री हरि"
                            🌸🌸🙏🌸🌸
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कामेंट्स

Kamlesh Apr 15, 2021
जय श्री राधे राधे

जितेन्द्र दुबे Apr 15, 2021
🚩🌹🥀जय श्री मंगलमूर्ति गणेशाय नमः 🌺🌹💐🚩🌹🌺 शुभ रात्रि वंदन🌺🌹 राम राम जी 🌺🚩🌹मंदिर के सभी भाई बहनों को राम राम जी परब्रह्म परमात्मा आप सभी की मनोकामना पूर्ण करें 🙏 🚩🔱🚩प्रभु भक्तो को सादर प्रणाम 🙏 🚩🔱 🕉️ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ओम नमो नारायण हरि ऊँ तत्सत परब्रह्म परमात्मा नमः ॐ या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता नमस्तस्ए नमस्तस्ए नमस्तस्ए नमो नमःऊँ माँ ब्रम्हचारिणी नमः🌺🚩 ऊँ उमामहेश्वराभ्यां नमः🌺 ऊँ राम रामाय नमः 🌻🌹ऊँ सीतारामचंद्राय नमः🌹 ॐ राम रामाय नमः🌹🌺🌹 ॐ हं हनुमते नमः 🌻ॐ हं हनुमते नमः🌹🥀🌻🌺🌹ॐ शं शनिश्चराय नमः 🚩🌹🚩ऊँ नमः शिवाय 🚩🌻 जय श्री राधे कृष्णा जी🌹 श्री जगत पिता परम परमात्मा श्री हरि विष्णु जी माता लक्ष्मी माता चंद्रघंटा की कृपा दृष्टि आप सभी पर हमेशा बनी रहे 🌹 आप का हर पल मंगलमय हो 🚩जय श्री राम 🚩🌺हर हर महादेव🚩राम राम जी 🥀शुभ रात्रि स्नेह वंदन💐शुभ गुरुवार🌺 हर हर महादेव 🔱🚩🔱🚩🔱🚩🔱🚩 जय माता दी जय श्री राम 🚩 🚩हर हर नर्मदे हर हर नर्मदे 🌺🙏🌻🙏🌻🥀🌹🚩🚩🚩

Hemant Kasta Apr 15, 2021
Om Namo Bhagvate Vasudevay, Hari Om Tatsat, Jai Shree Krishna Ji Namah, Radhe Radhe Ji, Beautiful Post, Anmol Massage, Shrimad Bhagvat Katha, Gyanvarsha, Dhanywad Vandaniy Gyani Bahena Ji Pranam, Aap Aur Aapka Parivar Har Pal Sukhdayak, Mangalkari Aur Aananddayak Ho, Aapki Har Tamannaye Purn Ho, Vandan Sister Ji, Jai Shree Radhe Krishna Ji, Shubh Ratri.

anju joshi Apr 15, 2021
जय माता दी 🔱🔱🔱🔱🔱 🚩🚩🚩🚩🚩 पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता. 💥💥💥💥💥 प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता.. ईश्वर आपको हमेशा प्रसन्न रखें शुभ रात्रि🙏🌹 आदरणीय बहना जी 💥🔱💫🌹🙏

pawanthakur🙏🙏9716955827 Apr 15, 2021
🙏🌷ऊँ भगवते वासुदेवाय नमः 🌷🙏 🙏🙏शुभ रात्रि वंदन जी 🙏🙏

Sushil Kumar Sharma 🙏🙏🌹🌹 Apr 15, 2021
Good Night My Sister ji 🙏🙏 Jay Mata di 🙏🙏🌹🌹 Jay Shree Radhe Radhe Radhe 🙏🙏🌹🌹🌹 God Bless you and your Family Always Be Happy My Sister ji 🙏 Aapka Har Pal Har Din Shub Mangalmay Ho ji 🙏🙏🌹🌹 Aap Hamesha Khush Rahe ji 🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷.

sanjay choudhary Apr 15, 2021
जय श्री कृष्णा।।।। जय श्री राम ।।।। आपकी रात्रि शुभ रहे।।।🙏🙏

Sanjay Tiwari Apr 15, 2021
राधे राधे बहन जी वेरी वेरी नाइस पोस्ट अति सुन्दर सत्संग 🙏🚩 जय हो 🙏🌹

RAJ RATHOD Apr 15, 2021
🚩🚩जय माता दी 🚩🚩 शुभ रात्रि वंदन जी 🙏🙏

Ranveer soni Apr 15, 2021
🌹🌹जय श्री कृष्णा🌹🌹

Ravi Kumar Taneja Apr 15, 2021
🕉या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।🙏 🙏🌷🙏जय मांअम्बे जय जय जगदम्बे 🙏🌷🙏 🚩🚩‘या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नसस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:‘🚩🚩 🌷🌷आप सभी को माँ दुर्गा जी का तृतीय स्वरूप माँ चंद्रघंटा पूजन की हार्दिक शुभकामनाएँ 🌷🌷 माँ चंद्रघंटा की कृपा से सभी के जीवन में उत्साह, उर्जा, सुख ,समृद्धि ,शांति , स्वlस्थ का आगमन हो माता जी का शुभ आशीष सदा बना रहे 🙏🐾🙏 🌹🌹जय माता दी 🌹🌹 माता चंद्रघंटाजी की कृपा से आपका जीवन मंगल मय हो देवी माँ की कृपा से आप स्वस्थ रहें सम्रद्ध रहें भक्ति भाव से भरे रहें!!!🕉🙏🐾🙏🐾🙏🕉

madan pal 🌷🙏🏼 Apr 15, 2021
जय श्री राधे कृष्णा जी शूभ प्रभात वंदन जी आपका हर पल शूभ मंगल हों जी 🌹🌹👍👍👍🙏🏼🙏🏼👏👏

Khwaish Bawa Apr 18, 2021
जय श्री राधे कृष्णा

Yogi Kashyap May 13, 2021

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Renu Singh May 13, 2021

+835 प्रतिक्रिया 172 कॉमेंट्स • 1083 शेयर
muskan May 13, 2021

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+83 प्रतिक्रिया 11 कॉमेंट्स • 350 शेयर
Mohinder Dhingra May 13, 2021

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Jai Mata Di May 12, 2021

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