RAJ RATHOD
RAJ RATHOD Feb 24, 2021

🙏Jai shri Ganesh 🙏 Good Night... Sweet dreams 🌷🌷 🌹🌹सुविचार 🌹🌹

🙏Jai shri Ganesh 🙏
Good Night... Sweet dreams 🌷🌷

🌹🌹सुविचार 🌹🌹

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कामेंट्स

dhruv wadhwani Feb 24, 2021
जय श्री राधे कृष्णा शुभ रात्रि जी

Akhilesh Kumar Dubey9580078880 Feb 24, 2021
जय श्री राम, जय जय हनुमान शुभरात्रि शुभमस्तु🚩🚩🙏

Shanti Pathak Feb 24, 2021
🌷🙏 जय श्री राधे कृष्णा जी🙏शुभ रात्रि वंदन जी🌷आपका हर पल शुभ एवं मंगलमय हो 🌷 मनमोहन कान्हा जी की असीम कृपा आप एवं आपके परिवार पर सदैव बनी रहे 🌷🙏🌷

Deepa Binu Feb 24, 2021
HARE KRISHNA 🙏 Good Night JI 🌹 Sweet Dreams 🌹

R.S.PARMAR⚡JAY MAHAKAL Feb 24, 2021
शुभ रात्रि बन्धन जी जय श्री राधे राधे 🌹🙏💐🌱🍃🍃🌷🙏🌹🌻

Sunil Kumar Saini Feb 24, 2021
जय श्री राधे कृष्णा जी ।🌺 शुभ रात्री 🌸 नमन 🙏 वंदन जी 🏵️ राधे राधे जी 🙏 ।। 🌹

Anilkumar Marathe Feb 24, 2021
जय श्रीकृष्ण नमस्कार सदाबहार आदरणीय राठौड़ जी !! 🌹रात की चांदनी आपको सदा सलामत रखे परियों की आवाज़ आपको सदा आबाद रखे पूरी कायनात को खुश रखने वाला वो रब आपकी हर एक ख़ुशी का ख्याल रखे कान्हा जी आप की सभी मनोकामना पूरी करे और आपके घर महालक्ष्मीजी का स्थाई निवाश हो इशी शुभकामनाओ के साथ शुभरात्री वदंन जी !!

Mamta Chauhan Feb 24, 2021
Radhe radhe ji🌷🙏Shubh ratri vandan bhai ji aapka har pal khushion bhra ho aapki sbhi manokamna puri ho 🌷🌷🙏🙏

💞💘❣️सुधा ❣️💘💞 Feb 26, 2021
🌹🌸🌴🌻🌾🌾💐🌸🌹🪴🌴🌻🌾🌷💐🌸🎋🌸🌾💐🌻🎋🌴🌹🌷🌸🌾💐🌻🎋🌴🌹🌷जय माता दी जय श्री राम जी जय हनुमानजी जय श्री राधे कृष्ण आपका हर दिन हर पल शुभ हो जी शुभरात्रि वन्दन जी 🌹👏🌷🌹🌴🎋🌻💐🌾🌸🌷🌹🌴🌻💐💐🌸🌸🌷🌹🎋🌻💐🌾🌸🌷🌹🌴🌴🎋🌻🌾🌸🌸🌷🌹🌴🎋🎋💐🌾🌸🌷🌹🎋🌻💐🌸🌸🌷🌹🌴🎋🌻💐🌸🌾💐🌻🌴🌹🌷🌹🌴🎋💐🌾🌸

BK WhatsApp STATUS Feb 27, 2021
जय श्री कृष्ण शुभ प्रभात स्नेह वंदन धन्यवाद 🌹🌹🌹

Soni Mishra Apr 22, 2021

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Gopal Jalan Apr 22, 2021

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Anita Sharma Apr 22, 2021

. दक्षिण में वेंकटाचल ( तिरुपति बालाजी ) के समीप कूर्मग्राम में एक कुम्हार रहता था। उसका नाम था भीम। . वह भगवान का बड़ा भक्त था। साधारण लोगों की उसकी भाव-भक्ति का कुछ भी पता नहीं था। . परन्तु अन्तर्यामी वेंकटनाथ उसकी प्रत्येक सेवा बड़ी प्रसन्नता के साथ स्वीकार करते थे। . कुम्हार और उसकी पत्नी दोनों भगवान् श्री निवास के अनन्य भक्त थे। . इन्हीं दिनों भक्तप्रवर महाराज तोण्डमान प्रतिदिन भगवान् श्रीनिवास की पूजा सुवर्णमय कमल पुष्पों से किया करते थे। . एक दिन उन्होंने देखा, भगवान के ऊपर मिट्टी के बने हुए कमल तथा तुलसी पुष्प चढ़े हुए हैं। . इससे विस्मित होकर राजा ने पूछा -भगवान् ! ये मिट्टी के कमल और तुलसी पुष्प चढ़ाकर कौन आपकी पूजा करता है ? . भगवान ने कहा.. कूर्मग्राम मे एक कुम्हार है, जो मुझ मे बड़ी भक्ति रखता है। वह अपने घर में बैठकर मेरी पूजा करता है और मैं उसकी प्रत्येक सेवा स्वीकार करता हूँ। . राजा तोण्डमान के हदय मे भगवद्भक्तों के प्रति बड़े आदर का भाव था। . वे उस भक्तशिरोमणि कुम्हार का दर्शन करने के लिये स्वयं उसके घर पर गये। . राजाको आया देख कुम्हार उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़कर खड़ा हुआ। . राजा ने कहा -भीम ! तुम अपने कुल में सबसे श्रेष्ठ हो, क्योंकि तुम्हारे हदय मे भगवान् श्रीनिवास के प्रति परम पावन अनन्य भक्ति का उदय हुआ है। . मैं तुम्हारा दर्शन करने आया हूँ। बताओ, तुम भगवान की पूजा किस प्रकार करते हो ? . कुम्हार बोला.. महाराज ! मैं क्या जानूँ के भगवान की पूजा कैसे की जाती है ? . भला, आपसे किसने कह दिया कि कुम्हार पूजा करता है ? . राजा ने कहा.. स्वयं भगवान् श्रीनिवास ने तुम्हारे पूजन की बात बतायी है। . राजाके इतना कहते ही कुम्हार की सोयी हुई स्मृति जाग उठी। . वह बोला.. महाराज ! पूर्वकाल मे भगवान् वेंकटनाथ ने मुझे वरदान दिया था कि जब तुम्हारी की हुई पूजा प्रकाशित हो जायगी.. . और जब राजा तोण्डमान तुम्हारे द्वार पर आ जायँगे तथा उनके साथ तुम्हारा वार्तालय होगा.. . उसी समय तुम्हें परमधामकी प्राप्ति होगी। . उसकी यह बात जैसे ही पूर्ण हुई, उसी समय ही आकाश से एक दिव्य विमान उतर आया। . उसके ऊपर साक्षात् भगवान् विष्णु विराजमान थे। . कुम्हार और उसकी पत्नी ने भगवान को प्रणाम करते हुए प्राण त्याग दिये तथा राजाके देखते-देखते ही वे दोनों दिव्य रुप धारण करके विमान पर जा बैठे। . विमान उन्हें लेकर परम धाम वैकुण्ठ को चला गया।

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Neha Sharma, Haryana Apr 21, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 161*✳️✳️ ✳️✳️*श्री रघुनाथ भट्ट को प्रभु की आज्ञा*✳️✳️ *दारा: परिभवकारा बन्धुजनो बन्धनं विषं विषया:। *कोऽयं जनस्य मोहो रिपवस्तेषु सुहृदाशा॥ *परमहंस रामकृष्ण देव एक कथा कहा करते थे– ‘एक बगीचें में बहुत से साधु पड़े हुए थे। वहाँ एक परम सुन्दरी स्त्री दर्शनों के लिये गयी। सभी साधु परम विरक्त थे, उन सबके गुरु आजन्म ब्रह्मचारी थे, इसलिये उन्होंने शिष्य भी ऐसे ही किये कि जिन्होंने जन्म से ही संसारी सुख न भोगा हो। व सभी स्त्रीमुख से अनभिज्ञ थे। इसलिये उनके मन में उस माता के दर्शन से किसी प्रकार का विकार नहीं हुआ। उनमें से एक ने पहले स्त्रीमुख भोगा था, इसलिये उस माता के दर्शन से उसकी छिपी हुई कामवासना जाग्रत हो उठी। वह विषय सुख की की इच्छा करने लगा। *इस कथा को कहकर वे कहते– ‘देखो, जिस वर्तन में एक बार दही जम चुका है, उसमे दूध के फटने का सन्देह ही बना रहता है, जो घडा कोरा है उसमें कोई भय नहीं। इसी प्रकार जो विषय सुख से बचे हुए है, वे कोरे घडे के समान हैं।’ इसके उदाहरण में वे अपने युवक भक्तों में से नरेन्द्र (विवेकानन्द) आदि का दृष्टान्त देकर कहते– ‘सर्वोत्तम तो यही है कि संसारी विषयों से एकदम दूर रहा जाय। विषय ही बन्धन के हेतु हैं।’ महाप्रभु चैतन्यदेव भी जिसे वासनाहीन अधिकारी समझते उसे संसार में प्रवेश करने को मना कर देते और आजन्म ब्रह्मचारी रहकर श्रीकृष्ण- कीर्तन करने का ही उपदेश देते। विरक्त भक्तों को तो वे स्त्रियों से तनिक भी संसर्ग न रखने की शिक्षा देते रहते। स्वयं कभी भी न तो स्त्रियों की ओर आँख उठाकर देखते और न उनके अंग का ही कभी स्पर्श करते। *एक दिन की बात है कि आप टोटा यमेश्वर को जा रहे थे। उसी समय रास्ते में एक देवदासी कन्या अपने कोकिलकूजित कमनीय कण्ठ से महाकवि जयदेव के अमर काव्य गीत गोविन्द के पद को गाती जा रही थी। वसन्त का सुहावना समय था, नारीकण्ठ की मधुरिमा से मिश्रित उस त्रैलोक्य पावन पद को सुनते ही प्रभु का मनमयूर नृत्य करने लगा। उनके काना में– *चन्दनचर्चितनीलकलेवरपीतवसनवनमाली। *केलिचलन्मणिकुण्डलमण्डितगण्डयुगस्मितशाली॥ *यह पदावली एक प्रकार की मादकता का संचार करने लगी। अपने प्रियतम के ऐसे सुन्दर स्वरूप का वर्णन सुनते ही वे प्रेम में विह्वल हो गये और कानों में सुधा का संचार करने वाले उस व्यक्ति को आलिंगन करने के लिये दौड़े। *प्रेम के उद्रेक में वे स्त्री-पुरुष का भाव एकदम भूल गये। रास्ते में कांटों की बाढ लगी हुई थी, उसका भी ध्यान नहीं रहा। पैर में कांटे चुभते जाते थे किन्तु आप उनकी कुछ भी परवा न करके उस पद की ही ओर लक्ष्य करके दौड़े जा रहे थे। पीछे आने वाले गोविन्द ने जोरो से दौड़कर और प्रभु को रोककर कहा– ‘प्रभो ! यह आप क्या कर रहे है, देखते नहीं हैं यह तो स्त्री है।’ ‘स्त्री है’, इतना सुनते ही प्रभु सहम गये और वहीं गिरकर बडे ही करुणस्वर में अधीरता के साथ कहने लगे– ‘गोविन्द ! मैं तेरे इस उपकार के लिये सदा ऋणी रहूँगा, तूने आज मुझे स्त्री-स्पर्शरूपी पाप से बचाया। यदि समचमुच मैं भूल से भी स्त्री स्पर्श कर लेता तो समुद्र में कूदकर आज ही अपने प्राणों को गंवा देता।’ *प्रभु की ऐसी दीनतायुक्त बातें सुनकर गोविन्द ने लज्जित भाव से कहा– ‘प्रभो ! आपकी रक्षा करने वाला मैं कौन हूँ, जगन्नाथ जी ने ही आपकी रक्षा की है। मैं भला किस योग्य हूँ?’ *महाप्रभु फिर आगे नहीं गये और लौटकर उन्होंने यह बात अपने सभी विरक्त भक्तों के सम्मुख कही और गोविन्द की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। तभी आपने गोविन्द से कहा– ‘गोविन्द ! तुम सदा मेरे साथ ही रहा करो। मुझे अब शरीर का होश नहीं रहता। पता नहीं, किस समय मैं क्या अनर्थ कर बैठूँ।’ *काशीवासी पण्डित तपन मिश्र को तो पाठक भूले ही न होंगे। उनके पुत्र रघुनाथ भट्टाचार्य प्रभु के अनन्य सेवक थे। प्रभु जब काशी पधारे थे तभी इन्होंने प्रभु को आत्म समर्पण कर दिया था। प्रभु के पुरी आ जाने पर इनकी पुन: प्रभु के पादपद्मों के दर्शनों की इच्छा हुई। अत: ये काशी जी से गौड़ होते हुए नीलाचंल की ओर चल दिये। रास्ते इन्हें रामदास विश्वास नामक एक कायस्थ महाशय मिले। ये गोड़ेश्वर के दरबार में मुनीम थे। रामानन्दी सम्प्रदाय के थे, वैसे बड़े भारी पण्डित, विनयी और ब्रह्मण्य थे। वे भी जगन्नाथ जी के दर्शनों को जा रहे थे। रघुनाथ जी को देखकर उन्होंने प्रणाम किया और इतने योग्य साथी को पाकर वे परम प्रसन्न हुए। उन्होंने रघुनाथ जी की पुटली जबरदस्ती ले ली तथा और भी उनकी विविध प्रकार से सेवा करने लगे। रघुनाथ जी इससे कुछ संकुचित होते और कहते– ‘आप इतने बड़े पण्डित हैं, इतने भारी प्रतिष्ठित पुरुष हैं, आपको मेरी इस प्रकार सेवा करना शोभा नहीं देता।’ वे विनीतभाव से उत्तर देते– ‘मैं नीच, अधम, छोटी जाति में उत्पन्न होने वाला भला आपकी सेवा कर ही क्या सकता हूँ फिर भी जो मुझसे हो सकती है, उससे आप मुझे वंचित न रखिये। साधु-ब्राह्मणों की सेवा करना तो हमारा कर्तव्य है। हम तो इसके दास हैं।’ इस प्रकार दोनों ही बडे आनन्द के साथ प्रेमपूर्वक पुरी पहुँचे। *पुरी में प्रभु के स्थान का पता लगाकर रघुनाथ जी वहाँ पहुँचे और उन्होंने प्रभु के पादपद्मों में श्रद्धा-भक्ति के सहित साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु इन्हें देखकर अत्यन्त ही प्रसन्न हुए और इनका आलिंगन करके तपन मिश्र तथा चन्द्रशेखर आदि भक्तों की कुशल-क्षेम पूछने लगे। रघुनाथ जी सभी की सुनायी और उनके प्रणाम भी निवेदन किये। प्रभु ने उस दिन रघुनाथ अपने पास ही प्रसाद पवाया और उनके रहने के लिये अपने ही स्थान में एक सुन्दर सा स्थान दिया। आठ महीनों तक रघुनाथ भट्ट प्रभु के चरणों के समीप रहे। भोजन बनाने में तो वे बड़े ही प्रवीण थे। प्रभु को वे अपने यहाँ भिक्षा कराया करते थे और उनके उच्छिष्ट प्रसाद को पाकर अपने को कृतकृत्य समझते। महाप्रभु इनके बनाये हुए व्यंजनों को ब ही आनन्द के साथ इनकी प्रशंसा करते हुए पाते थे। आठ महीने के अनन्तर प्रभु ने इन्हें आज्ञा दी– ‘देखो, तुम्हारे माता-पिता वृद्ध हैं, तुम्हीं उनकी एकमात्र सन्तान हो। उनकी स्वाभाविक इच्छा तुम्हें गृहस्थी बनाने की होगी ही, किन्तु तुम गृहस्थी के झंझट में कभी मत पड़ना। इसी प्रकार ब्रह्मचारी रहना और विवाह न करना। वृद्ध माता-पिता की सेवा करना तो तुम्हारा कर्तव्य ही है, क्योंकि उनके दूसरा कोई पुत्र नहीं है। जब वे परलोकवासी हो जायँ तो तुम विरक्त भाव से भगवद्भजन में ही अपना समय बिताना। एक बार पुरी आकर मुझसे फिर मिल जाना।’ इतना कहकर उन्होंने इन्हें विदा किया। ये भी प्रभु से विदा होकर प्रभु के वियोग में रोते-रोते काशी जी को चले गये। *चार-पांच वर्ष में इनके माता तथा पिता दोनों ही परलोकवासी हो गये। शास्त्रीय विधि के अनुसार उनकी क्रिया-कर्म करके ये पुन- पुरी पधारे और प्रभु से सभी बातें जाकर निवेदन की। प्रभु ने इन्हें आठ महीने फिर अपने पास रखकर भक्तितत्त्व की शिक्षा दी और अन्त में इन्हें वृन्दावन में रूपसनातन के समीप रहने की आज्ञा दी। प्रभु की आज्ञा को शिरोधार्य करके ये वृन्दावन की ओर चलने के लिये तैयार हुए। *पूरी के सभी भक्तों की पदधूलि इन्होंने अपने मस्तक पर चढायी। तब ये हाथ जोड़े हुए प्रभु के समीप खड़े हो गये। प्रभु ने इन्हें बार-बार आलिंगन किया और जगन्नाथ जी की प्रसादी चौदह हाथ लम्बी तुलसी की माला और बिना कत्था–चूना लगा हुआ प्रसादी पान इन्हें दिया। महाप्रभु की दी हुई उन दोनों प्रसादी वस्तुओं को इन्होंने श्रद्धापूर्वक मस्तक पर चढ़ाया और डबडबायी आँखों से पृथ्वी की ओर देखते हुए चुपचाप खड़े रहे। *प्रभु इन्हें उपदेश करने लगे– ‘देखो, श्रीवृन्दावन की पवित्र भूमि को त्यागकर कहीं अन्यत्र न जाना। वैराग्य युक्त होकर निरन्तर श्रीमद्भागवत का पाठ किया करना। रूप-सनातन इन दोनों को अपना बडा समझना। जो कोई शंका हुआ करे इन्हें से पूछ लिया करना। निरन्तर नाम-जप करते रहोगे तो कृपालु श्रीकृष्ण कभी-न-कभी तो कृपा करेंगे ही। मंगलमय भगवान तुम्हारा मंगल करें, तुम्हें शीघ्र ही कृष्ण प्रेम की प्राप्ति हो। अब जाओ, सभी वृन्दावन वासी भक्तों को मेरा स्मरण दिलाना।’ इस प्रकार महाप्रभु के शुभाशीर्वाद को पाकर वे काशी, प्रयाग होते हुए श्री वृन्दावन धाम में पहुँचे। वहाँ रूप और सनातन इन दोनों भाइयों ने इनका बड़ा भारी सत्कार किया और अपने पास ही रखा। ये रूप गोस्वामी की सत्संगसभा में श्रीमद्भागवत का पाठ किया करते थे। इनका गला बड़ा ही सुरीला था। भागवत के श्लोकों को इतनी तान के साथ ये कहते कि सुनने वाले राने लगते। एक ही श्लोक का को कई प्रकार से कहते। कहते-कहते स्वयं भी हिचकियाँ भर भरकर रोने लगे। इनका प्रेम अद्भुत था। ये सदा वृन्दावन विहारी के प्रेम में छके से रहते थे। *हृदय में श्री गोविन्द का ध्यान था, जिह्वा सदा हरि रस का पान करती रहती थी। साधुओं का सत्संग और ब्रह्मचर्य पूर्वक जीवन बिताना इससे बढ़कर संसार में सुखकर जीवन और हो ही क्या सकता है? मनीषियों ने संसार की सभी वस्तुओं को भयप्रद बताकर केवल एक वैराग्य को ही भयरहित माना है। ऐसा जीवन बिताना ही सर्वश्रेष्ठ वैराग्य है जैसा कि राजर्षियोगिराज भर्तृहरि ने कहा है– *भक्तिर्भवे मरणजन्मभयं हृदिस्थं *स्नेहो न बन्धुषु न मन्मथा विकारा:। *संसर्गदोषरहिता विजना वनान्ता *वैराग्यमस्ति किमत: परमर्थनीयम॥ *अर्थात् ‘भक्त भयहारी भगवान के पादपद्मों में प्रीति हो। इस शरीर को नाशवान समझकर इसके प्रति अप्रीति हो। संसारी भाई, बन्धु तथा कुटुम्बियों में ममता न हो और हृदय में कामजन्य वासना का अभवा हो, कामिनी के कमनीय कलेवर को देखकर उसमें आसक्ति न होती हो, तथा संसारी लोगों के संसर्गजन्य दोष से रहित पवित्र और शान्त–विजन वन में निवास हो तो इससे बढ़कर वांछनीय वैराग्य और हो क्या सकता है? सचमुच जो स्त्री संसर्ग से रहित होकर एकान्त स्थान में ब्रह्मचर्य पूर्वक वृन्दावन विहारी का ध्यान करता हुआ अपने समय को बिता रहा है, वह देवताओं का भी वन्दनीय है, उसकी पदधूलि इस समस्त पृथ्वी को पावन बना देती है, वह नररूप में साक्षात नारायण है, शरीर धारी ब्रह्म है और वैकुण्ठ पति का परम प्रिय प्रधान पार्षद है। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- -

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Neha Sharma, Haryana Apr 21, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 160*✳️✳️ ✳️✳️*जगदानन्द जी की एकनिष्ठा*✳️✳️ *अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते। *न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः॥ *शास्त्रों में भक्तों के उत्तम, मध्यम और प्राकृत रूप से तीन भेद बताये गये हैं। जो भक्त अपने इष्ट देव को सर्वव्यापक समझकर प्राणिमात्र के प्रति श्रद्धा के भाव रखता है और सभी वस्तुओं में इष्टबुद्धि रखकर उनका आदर करता है, वह सर्वोत्तम भक्त है। जो अपने इष्ट में प्रीति रखता है और अपने ही समान इष्ट बन्धुओं के प्रति श्रद्धा का भाव, असाधकों के प्रति कृपा के भाव, विद्वेषियों और भिन्न मत वालों के प्रति उपेक्षा के भाव रखता है, वह मध्यम भक्त है और जो अपने इष्ट के विग्रह में ही श्रद्धा के साथ उन श्री हरि की पूजा करता तथा भगवत भक्तों की तथा अन्य पुरुषों से एकदम उदासीन रहता है, वह प्राकृत भक्त है। प्राकृत भक्त बुरा नहीं है, सच पूछिये तो भक्ति का सच्चा श्री गणेश तो यहीं से होता है, जो पहले प्राकृत भक्त नहीं बना वह उत्तम तथा मध्यम भक्त बन ही कैसे सकता है। नीचे की सीढ़ियों को छोड़कर सबसे ऊँची पर बिना योगेश्वरेश्वर कृपा से कोई भी नहीं जा सकता। *पण्डित जगदानन्द जी सरल प्रकृति के भक्त थे, वे प्रभु के शरीर सुख के पीछे सब कुछ भूल जाते थे। प्रभु के अतिरिक्त उनके लिये कोई पूजनीय संन्यासी नहीं था, प्रभु के सभी काम लीला हैं, यही उनकी भावना थी। महाप्रभु भी उनके ऊपर परम कृपा रचाते थे। इनके क्षण क्षण में रूठने और क्रुद्ध होने के स्वभाव से वे पूर्णरीत्या परीचित थे, इसीलिये इनसे कुछ भय भी करते थे। साधु-संन्यासी के लिये जिस प्रकार स्त्री स्पर्श पाप है, उसी प्रकार रूई भरे हुए गुदगुदे वस्त्र का उपयोग करना पाप है। इसीलिये महाप्रभु सदा केले के पत्तों पर सोया करते थे। वे दिन रात्रि श्रीकृष्ण विरह में छटपटाते रहते थे। आहार भी उन्होंने बहुत ही कम कर दिया था। इसी कारण उनका शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया था। उस क्षीण शरीर को केले के पत्तों पर पड़ा देखकर सभी भक्तों को अपार दुःख होता था, किन्तु प्रभु के सम्मुख कुछ कहने की हिम्मत ही किसकी थी? सब मन मसोसकर इस दारुण दुःख को सहते और विधाता को धिक्कारते रहते कि ऐसा सुकुमार सुन्दर स्वरूप देकर फिर इस प्रकार का जीवन प्रभु को प्रदान किया, यह उस निर्दयी दैव का क्रूर कर्म है। *जगदानन्द जी प्रभु की इस कठोरता से सदा असन्तुष्ट रहते और अपने भोले स्वभाव के कारण उनसे कभी-कभी इस प्रकार के हठों को त्यागने का आग्रह भी किया करते, किन्तु प्रभु मो धीर थे, वे भला किसी के कहने सूनने से न्यायमार्ग का कब परित्याग करने लगे। इसीलिये जगदानन्द जी के सभी प्रयत्न असफल ही होते, फिर भी वे अपने सीधे स्वभाव के कारण सदा प्रभु को सुखी रखने करने की चेष्टा किया करते। उन्होंने जब देखा कि प्रभु शरीर को केले के पत्तों पर कष्ट होता है तो वे बाजार से एक सुन्दर सा वस्त्र खरीद लाये। उसे गेरुए रंग में रँगकर उसके तोशक-तकिये बनाये। स्वयं सेमर की रूई लाकर उन्होंने गद्दे, तकिये में भरी और उन्हें गोविन्द को ले जाकर दे दिया। *गोविन्द से उन्होंने कह दिया- ‘इसे प्रभु के नीचे बिछा देना और ऊपर से उनका वस्त्र डाल देना।’ गोविन्द ने जगदानन्द जी की आज्ञा से डरते डरते ऐसा ही किया। महाप्रभु ने जब बिस्तर पर पैर रखा तभी उन्हें कुछ गुदगुदा सा प्रतीत हुआ। वस्त्र को हटाकर देखा तो उसके नीचे गद्दा बिछा है और एक रंगीन तकिया लगा हुआ है। गद्दे तकिये को देखकर प्रभु को क्रोध आ गया। उन्होंने उसी समय जोर से गोविन्द को आवाज दी। गोविन्द का दिल धड़कने लगा। वह सब कुछ समझ गया कि प्रभु ने गद्दे-तकिये को देख लिया और अब न जाने मुझे क्या क्या कहेंगे। गोविन्द डरते-डरते धीरे-धीरे किवाड़ की आड़ में जाकर खड़ा हो गया। प्रभु ने फिर आवाज दी- ‘गोविन्द ! कहाँ चला गया, सुनता नहीं।’ *धीरे-धीरे काँपती आवाज में गोविन्द ने कहा- ‘प्रभो ! मैं उपस्थ्सित हूँ, क्या आज्ञा है?’ *प्रभु ने अत्यन्त स्नेह से सने हुए शब्दों में प्रेमयुक्त रोष के साथ कहा- ‘तुम सब मिलकर मुझे धर्म भ्रष्ट करने पर तुले हुए हो। मैंने अपना शरीर तुम लोगों के अधीन कर रखा है, किन्तु तुम चाहते हो कि मैं विषय भोगों में आसक्त रहूँ। विषयों के उपभोग के लिये ही तो मैंने घर बार छोड़कर संन्यास लिया है, घर पर मैं विषय नहीं भोग सकता था। क्यों ठीक हैं न?’ *गोविन्द ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया, वह चुपचाप नीचा सिर किये हुए खड़ा रहा। स्वरूपगोस्वामी एक ओर चुपचाप बैठे हुए प्रभु को पद सुनाने की प्रतीक्षा कर रहे थे। वे भी चुप ही बैठे रहे। प्रभु फिर कहने लगे- ‘पता नहीं, ये लोग भजन-ध्यान सब शरीर सुख के ही लिये करते हैं क्या? दिन रात्रि मेरे शरीर की ही चिन्ता! भाई चैतन्य तो इस शरीर से पृथक हैं, वह तो नित्य सुखमय, आनन्दमय, और प्रेममय है। उसे ये संसारी पदार्थ भला क्या सुख पहुँचा सकते हैं। जिसे चैतन्य समझकर तुम सुखी बनना चाहते हो, वह तो अचैतन्य है, नश्वर है, क्षणभंगुर है, विनाशी और सदा बदलते रहने वाला है, इसी को सुखी बनाने को प्रयत्न करना महामूर्खता है।’ *स्वरूप गोस्वामी चुपचाप सुनते रहे। प्रभु ने फिर उसी प्रकार रोष के स्वर में कहा- ‘क्यों रे गोविन्द ! तुझे यह सूझी क्या? तैंने क्या सोचा कि मैं गद्दा-तकिया लगाकर विषयी पुरुषों की भाँति सोऊँगा? तू ठीक ठीक बता तुझे पैसे कहाँ मिले? यह वस्त्र किससे माँगा? सिलाई के दाम कहाँ से आये?’ *गोविन्द ने धीरे से सिर नीचा किये ही उत्तर दिया- ‘प्रभो ! जगदानन्द पण्डित मुझे इन्हें दे गये हैं और उन्हीं की आज्ञा से मैंने इस बिछा दिया है।’ *जगदानन्द जी का नाम सुनकर प्रभु कुछ सहम गये। उन्हें इसके उपयोग न करने का प्रत्यक्ष परिणाम आँखों के सामने दीखने लगा। उनकी दृष्टि में जगदानन्द जी की रोष भरी दृष्टि साकार होकर नृत्य करने लगी। महाप्रभु फिर कुछ भी न कह सके। वे सोचने लगे कि अब क्या कहूँ, उनका रोष कपूर की तरह एकदम न जाने कहाँ उड़ गया। हृदय के भावों के प्रवीण पारखी स्वरूप गोस्वामी महाप्रभु के मनोभाव को ताड़ गये। इसीलिये धीरे से कहने लगे- ‘प्रभो ! हानि ही क्या है, जगदानन्द जी को कष्ट होगा, इन्होंने प्रेमपूर्वक बड़े परिश्रम से इसे स्वयं बनाया है। सेमल की रूई है, फिर आपका शरीर भी तो अत्यंत ही निर्बल है, मुझे स्वयं इसे केले के पत्तों पर पड़ा हुआ देखकर कष्ट होता है। अस्वस्थावस्था में गद्दे का उपयोग करने मे तो मुझे कोई हानि प्रतीत नहीं होती। रुग्णावस्था को ही आपत्तिकाल कहते हैं और आपत्तिकाल में नियमों का पालन न हो सके तो कोई हानि भी नहीं। कहा भी है, ‘आपत्तिकाले मर्यादा नास्ति।’ *प्रभु ने धीरे-धीरे प्रेम के स्वर मेें स्वरूप गोस्वामी को समझाते हुए कहा- ‘स्वरूप ! तुम स्वयं समझदार हो। तुम स्वयं सब कुछ सीखे हुए हो, तुम्हें कोई सिखा ही क्या सकता है। तुम सोचो तो सही, यदि संन्यासी इसी प्रकार अपने मन को समझाकर विषयों में प्रवृत्त हो जाय तो अन्त में वह धीरे धीरे महाविषयी बनकर पतित हो जायेगा। विषयों का कहीं अन्त ही नहीं। एक के पश्चात् दूसरी इच्छा उत्पन्न होती जाती है। जहाँ एक बार नियम से भ्रष्ट हुए वहाँ फिर नीचे की ओर पतन ही होता जाता है। *पानी का प्रवाह ऊपर से एक बार छूटना चाहिये, बस फिर वह नीचे की ही ओर चलेगा। जिसके खूब साफ-सुधरे वस्त्र होते हैं, वही धूलि, मिट्टी और गन्दी जगह में न बैठने की परवा करता है, जहाँ एक बार वस्त्र मैले हुए कि फिर कहीं भी बैठने में संकोच नहीं होता। फिर वह वस्त्रों की रही सही पवित्रता की भी परवा नहीं करता। इसलिये तुम मुझसे गद्दे पर सोने का आग्रह मत करो। आज गद्दा है तो कल पलंग भी चाहिये। परसों एक पैर दबाने वाले नौकर के रखने की आवश्यकता प्रतीत होगी। क्या इसीलिये मैंने संन्यास लिया है कि ये ही सब कुछ भोगता रहूँ।’ *प्रभु के इस मार्मिक उपदेश को सुनकर स्वरूप गोस्वामी फिर कुछ भी नहीं बोले। उन्होंने गोविन्द से गद्दे तकिये को उठाने का संकेत किया। गोविन्द ने संकेत पाते ही वे मुलायम वस्त्र उठाकर एक ओर रख दिये। प्रभु उन्हीं पड़े हुए पत्तों पर लेट गये। *दूसरे दिन स्वरूप गोस्वामी बहुत से केलों के खोपले उठा लाये और उन्हें अपने नखों से बहुत ही महीन चीर-चीर कर प्रभु के एक पुराने वस्त्र में भर दिया। बहुत कहने सुनने पर प्रभु ने उस गद्दे को बिछाना स्वीकार कर लिया। *जगदानन्द जी ने गोविन्द के द्वारा जब सब समाचार सुना तब तो उन्हें अत्यन्त ही क्षोभ हुआ, किन्तु उन्होंने अपना क्षोभ प्रभु के सम्मुख प्रकट नहीं होने दिया, प्रभु भी सब कुछ समझ गये, इसलिये उन्होंने गद्दे तकिये वाली बात फिर छेड़ी ही नहीं। जगदानन्द जी की बहु दिनों से वृन्दावन जाने की इच्छा थी। उन्होंने प्रभु पर अपनी इच्छा प्रकट भी की थी, किन्तु प्रभु ने इन्हें वृन्दावन जाने की आज्ञा नहीं दी। महाप्रभु जानते थे, ये सरल हैं, सीधे हैं, भोले हैं और संसारी बातों से एकदम अनभिज्ञ हैं। इन्हें देश, काल तथा पात्र देखकर बर्ताव करना नहीं आता। यों ही जो मन में आता है कह देते हैं। सब लोग क्या जानें कि इनके हृदय में द्वेष नहीं है, वे तो इनके क्रोधयुक्त वचनों को सुनकर इन्हें बुरा भला ही कहेंगे। ऐसे सरल मनुष्य को रास्ते में अत्यन्त ही क्लेश होगा। यही सब समझ सोचकर प्रभु इन्हें गौड़ भेज देते थे; क्योंकि वहाँ के सभी भक्त इनके स्वभाव से परिचित थे, किन्तु वृन्दावन जाने की आज्ञा नहीं देते थे। अब जगदानन्द जी ने फिर निश्चय किया कि ‘प्रभु आज्ञा दे दें तो अवश्य व्रजमण्डल की यात्रा कर आवें। यह सोचकर उन्होंने एक दिन एकान्त में स्वरूप गोस्वामी से सलाह करके प्रभु से वृन्दावन जाने की आज्ञा माँगी।’ *प्रभु ने कहा- ‘वैसे तो मैं आपको जाने के लिये अनुमति दे भी देता, किन्तु अब तो कभी अनुमति न दूँगा। मुझसे क्रुद्ध होकर जायँगे तो मेरा मन सदा उदास बना रहेगा।’ *जगदानन्द जी ने प्रेमयुक्त मधुर वाणी से कहा- ‘प्रभो ! आप पर भला कोई क्रोध कर सकता है। फिर मैं तो आपका सेवक हूँ। मैं सच्चे हृदय से कह रहा हूँ, क्रोध करके मैं नहीं जाता हूँ। मेरी तो बहुत दिनों से इच्छा थी। उसे आपके सम्मुख भी कई बार प्रकट कर चुका हूँ।’ *इस पर बात का समर्थन करते हुए स्वरूप दामोदर जी कहने लगे- ‘हाँ प्रभो ! इनकी बहुत दिनों की इच्छा है। भला, ये आप पद कभी क्रुद्ध हो सकते हैं। गसैड़ भी तो ये प्रतिवर्ष जाया ही करते हैं, इसी प्रकार इन्हें व्रज जाने की आज्ञा दे दीजिये।’ *जगदानन्द जी बोले- ‘हाँ प्रभो ! वृन्दावन की पावन धूलि को मस्तक पर चढ़ाने की मेरी उत्कृष्ट इच्छा है, आपकी आज्ञा के बिना जा नहीं सकता।’ *प्रभु ने कहा- ‘अच्छी बात है, आपकी उत्कृष्ट इच्छा है जो जाइये, किन्तु इतना ध्यान रखना कभी किसी से विशेष बातें न करना। यहाँ से काशी जी तक तो कोई भय नहीं। आगे डाकू मिलते हैं, वे बंगाली समझकर आपको मार ही डालेंगे। इसलिये वहाँ से किसी धर्मात्मा क्षत्रिय के साथ जाना। वृन्दावन में सदा सनातन के साथ ही रहना। उन्हीं के साथ तीर्थ और वनों की यात्रा करना। साधु महात्माओं को दूर से ही प्रणाम करना। उनसे बहुत अधिक सम्पर्क न रखना और न उनके साथ अधिक दिन ठहरना ही। व्रज की यात्रा करके शीघ्र ही लौट आना। सनातन से कह देना, मैं भी व्रज आऊँगा, मेरे लिये कोई स्थान ठीक कर लें। इस प्रकार उन्हें भाँति-भाँति से समझा बुझाकर वृन्दावन के लिये विदा किया। *जगदानन्द जी सभी गौर भक्तों की वन्दना करके और महाप्रभु की चरणरज सिर पर चढ़ाकर झाड़ीखण्ड के रास्ते से वृन्दावन की ओर चलने लगे। भिक्षा माँगते-खाते वे काशी, प्रयाग होते हुए वृन्दावन पहुँचे। वहाँ रूप सनातन दोनों भाइयों ने इनका बड़ा सत्कार किया। ये सदा सनातन गोस्वामी के साथ ही रहते थे। उन्हीं को साथ लेकर इन्होंने व्रजमण्डल के बारहों वनों की यात्रा की। सनातन जी घर-घर से भिक्षा माँग लोते थे और इन्हें लाकर दे देते थे और और ये अपना बना लेते थे। सनातन जी तो स्वयं व्रजवासियों के घरों से टुकड़े माँगकर ले आते थे और उन्हीं पर निर्वाह करते थे। कभी जगदानन्द जी के समीप भी प्रसाद पा लेते थे। *सब वनों के दर्शन करते हुए ये महावन होते हुए गोकुल में आये। गोकुल में ये दोनों यमुना जी के तट पर एक गुफा में ठहरे। रहते तो दोनों गुफा में थे किन्तु भोजन के लिये जगदानन्द जी तो एक मन्दिर में जाते थे और वहाँ अपना भोजन अपने हाथ ये बनाकर पाते थे। सनातन जी महावन में से जाकर मधुकरी कर लाते थे। तब तक गोकुल इतना बड़ा गाँव नहीं बना था। गोस्वामियों की ही दो तीन बैठकें तथा मन्दिर थे। इसीलिये भिक्षा के लिये इन्हें डेढ़ दो मील रोज जाना पड़ता था। *एक दिन जगदानन्द जी ने सनातन जी का निमन्त्रण किया। सनातन जी तो समान दृष्टि रचाने वाले उच्च कोटि के भक्त थे। वे संन्यासी मात्र को चैतन्य का ही विग्रह समझकर उनके प्रति उदार भाव रखते थे। वे अपने गुरु में और श्रीकृष्ण में कोई भेदभाव नहीं मानते थे, इसलिये उन्होंने श्री चैतन्य देव को श्रीकृष्ण या अवतारी सिद्ध न करके श्रीकृष्ण लीलाओं का ही वर्णन किया है। उनकी दृष्टि में श्रीकृष्ण और चैतन्य में कोई भेदभाव होता तब तो वे सिद्ध करने की चेष्टा करते। *मुकन्द सरस्वती नाम के एक संन्यासी थे, उन्होंने सनातन गोस्वामी को एक अपने ओढ़ने का गेरुए रंग का वस्त्र दिया था। सनातन जी तो एक गुदड़ी के सिवा कुछ रखते नहीं थे, उसे महात्मा की प्रसादी समझकर उन्होंने रख छोड़ा। उस दिन जगदानन्द जी के निमन्त्रण में उसी वस्त्र को सिर से बाँधकर गये। सनातन जी के सिर पर गेरुए रंग का वस्त्र देखकर जगदानन्द जी ने समझा कि यह प्रभु का प्रसादी वस्त्र है, अतः बड़े ही स्नेह के साथ पूछने लगे- ‘सनातन जी ! आपने यह प्रभु का प्रसादी वस्त्र कहाँ पाया? *सनातन जी ने सरलता से कहा- ‘यह प्रभु की प्रसादी नहीं है। मुकुन्द सरस्वती नामक एक बड़े अच्छे संन्यासी हैं, उन्होंने ही यह वस्त्र मुझे दिया है।’ इतना सुनते ही जगदानन्द जी का क्रोध उमड़ पड़ा। वे भला इस बात को कब सहन कर सकते थे कि गौर भक्त होकर दूसरे संन्यासी के वस्त्र को सिर पर चढ़ावे। उनका आदर केवल चैतन्य देव के ही वस्त्र में सीमित था। जो कोई उसका आदर छोड़कर और का आदर करता है, उनकी दृष्टि में वह बुरा काम करता है। इसीलिये क्रोध मेें वे चूल्हे की हाँडी को उठाकर सनातन जी को मारने दौड़े। सनातन जी उनके ऐसे व्यवहार को देखकर लज्जित से हो गये। जगदानन्द जी ने भी हाँडी को चूल्हे पर रख दिया और अपनी बात के समर्थन में कहने लगे- ‘आप महाप्रभु के प्रधान पार्षदों में से हैं। भला, इस बात को कौन गौर भक्त सहन कर सकेगा कि आप किसी दूसरे संन्यासी के वस्त्र को सिर पर चढ़ावें।’ *इस बात को सुनकर हँसते हुए सनातन जी कहने लगे- ‘मैं दूर से ही आपकी एकनिष्ठा की बातें सुना करता था, किन्तु आज प्रत्यक्ष आपकी निष्ठा का परिचय प्राप्त हुआ। श्रीचैतन्य चरणों में आपका इतना दृढ़ अनुराग है उसका लेशमात्र भी मुझमें नहीं है। आपकी एकनिष्ठा को धन्य है। मैंने तो वैसे ही आपको के लिये इसे पहन लिया था कि आप क्या कहेंगे? वैसे तो मैं गरुए वस्त्र का अधिकारी भी नहीं हूँ। वैष्णव को गेरुए वस्त्र का आग्रह ही नहीं होता।’ इस प्रकार इन्हें समझा बुझाकर शान्त किया। जगदानन्द जी की यह निष्ठा बुरी नहीं थी। किन्तु यही साध्य नहीं है। साध्य तो यही है कि वे गेरुए वस्त्र मात्र में चैतन्य के वस्त्र का अनुभव करते, उसमें शंका का स्थान ही न रह जाता। यदि कहें कि पतिव्रता स्त्री की भाँति पर पुरुष का मुख देखना जिस प्रकार पाप है उसी प्रकार मधु रस के उपासकों की अपने इष्टदेव के प्रति निष्ठा ही सर्वोत्तम कही जाती है, सो ठीक नहीं है। कारण कि पतिव्रता की दृष्टि में तो पति के सिवा संसार में कोई है ही नहीं। उसके लिये तो पति ही सर्वस्व है। पति को छोड़कर दूसरा कोई तीर्थ उसके लिये है ही नहीं। परकीया भाव में ऐसी निष्ठा प्रायः देखी जाती किन्तु उसमें भी संकीर्णता नहीं। वह भी संसार के सम्पूर्ण सौन्दर्य में अपने स्वामी के सौन्दर्य का ही मान करती है। जैसे श्रीकृष्ण के अन्तर्धान हो ताने पर गोपियों ने लता पत्ता और जीव जन्तुओं में श्रीकृष्णस्पर्शजन्य आनन्द का ही अनुभव किया। अस्तु, हमारा मतलब इतना ही है कि हमारी दृष्टि में यह प्राकृत निष्ठा है। उत्तम निष्ठा इससे दूर है, किन्तु इसके द्वारा उसकी प्राप्ति हो सकती है। *जगदानन्द जी कुछ काल व्रज में रहकर महाप्रभु के समीप पुरी में जाने की तैयारियाँ करने लगे। प्रभु के लिये सनातन जी के रासलीला-स्थली की रज, गोवर्धन पर्वत की शिला, गुंजाओं की माला और पके हुए सूखे पीलू ये चीजें प्रसाद के लिये दीं। इन अकिंचन, त्यागी, भिक्षुक भक्तों की ये ही चीजें सर्वस्व थीं। टैंटी और पीलू व्रज में अधिक होते हैं। बंगाल में तो लोग इन्हें पहचानते ही नहीं। पीलू बहुत कड़वा होता है और टैंटी उससे भी अधिक कड़वी। टैंटी का अचार ठीक पड़ता है। पकी टैंटी को व्रज में पैंचू बोलते हैं। देखने में वह लाल-लाल बड़ी ही सुन्दर मालूम पड़ती है, किन्तु खाने में ठीक आती है। *व्रज की गौ चराने वाले ग्वाल पैंचू और पके पीलू खाया करते हैं। उनमें बीज ही बीज भरे रहते हैं। रस तो बहुत थोड़ा बीज में लगा हुआ होता है। बीजों में के रस को चूसकर ‘शरीफे’ के बीजों की भाँति उन्हें थूक देते हैं। ये ही व्रज के मेवा हैं। श्रीकृष्ण भगवान को ये ही बहुत प्रिय थे। क्यों प्रिय थे, इसका क्या पता ? इसी से जो खीजकर किसी भक्त ने कहा है- *काबुल में मेवा करी, ब्रज में टैंटी खायँ। *कहूँ कहूँ गोपाल का, भूलि सिटल्ली जायँ॥ *अस्तु, जगदानन्द जी सनातन जी के दिये हुए प्रसाद को लेकर, उनसे विदा होकर पुरी आये। प्रभु इन्हें सकुशल लौटा हुआ देखकर परम प्रसन्न हुए। इन्होंने सनातन जी की दी हुई सभी चीजें प्रभु के अर्पण कीं। प्रभु ने सभी को श्रद्धापूर्वक सिर पर चढ़ाया। सब चीजें तो प्रभु ने रख लीं, पीलुओं को उन्होंने भक्तों में बाँट दिया। भक्तों ने ‘वृन्दावन के फल’ समझकर उन्हें बड़े आदर से ग्रहण किया। एक तो वृन्दावन के फल फिर महाप्रभु के हाथ से दिये हुए सभी भक्त बड़े चाव से खाने लगे। जो पहले वृन्दावन हो आये थे वे तो जानते थे कि ये अमृतफल किस प्रकार खाये जाते हैं, इसलिये वे तो मुँह में डालकर उनकी गुठलियों को धीरे-धीरे चुसने लगे। जो नहीं जानते थे वे जल्दी में मुँह में डालकर चबाने लगे। चबाते ही मुँह जहर कड़वा हो गया, नेत्रों में पानी आ गया। सभी सी-सी करते हुए इधर-उधर दौड़ने लगे। न तो खाते बनता था। न थूकते ही। वृन्दावन के प्रभुदत्त प्रसाद को भला थूकें कैसे और खाते हैं तो प्राणों पर बीतती है। खैर, जैसे-तैसे जल के साथ भक्त उन्हें निगल गये। प्रभु हँसते-हँसते कह रहे थे- ‘व्रज का प्रसाद पाना कोई सरल नहीं है। जो विषय भोगों को ही सर्वस्व समझ बैठे हैं, उनको न तो व्रज की भूमि में वास करने का अधिकार है और न व्रज के महाप्रसाद को पाने का ही। व्रजवासी बनने का सौभाग्य तो उसे ही प्राप्त हो सकेगा जिसकी सभी वासनाएँ दूर हो गयी होंगी।’ *इस प्रकार जगदानन्द जी के आने से सभी भक्तों को बड़ी प्रसन्नता हुई, वे उसी प्रकार सुखपूर्वक फिर प्रभु के पास रहने लगे। जगदानन्द जी का हृदय शुद्ध था, उनका प्रभु के प्रति प्रगाढ़ प्रेम था। वे प्रभु के शरीर से ही अत्यधिक प्रेम करते थे। यह ठीक भी है। जिस कागज पर चित्र बना हुआ है उस कागज को यदि कोई प्यार करता है तो वह एक-न-एक दिन उस पर खिंचे हुए चित्र के सौन्दर्य से भी प्यार करने लगेगा। जो सौन्दर्य को ही सर्वस्व समझकर कागज को व्यर्थ समझकर फेंक देता है तो कागज तो उसके हाथ से चला ही जाता है, साथ ही उसपर खिंचा हुआ चित्र और उसमें का सौन्दर्य भी उसे फिर कभी नहीं मिल सकता। यह हो नहीं सकता कि हम घृत से तो प्रेम करें और जिस पात्र में घृत रखा है उसकी उपेक्षा कर दें। पात्र के साथ घृत का आधाराधेय भाव का सम्बन्ध है। आधेय से प्रेम करने पर आधार से अपने-आप ही प्रेम हो जाता है। आधार का प्रेम ही आधेय के प्रेम को प्राप्त करा सकता है। यही सर्वशास्त्रों का सिद्धान्त है। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

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Anita Sharma Apr 21, 2021

*रामायण को लाखों वर्ष हो गये लेकिन जनता के हृदयपटल से विलुप्त नहीं हुई, क्योंकि ‘रामायण’ में वर्णित आदर्श चरित्र विश्वसाहित्य में मिलना दुर्लभ है।* *भगवान श्री राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो भगवान श्री राम की धर्मपत्नी माँ सीता ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया। परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मणजी कैसे रामजी से दूर हो जाते? माता सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की... परन्तु जब पत्नी उर्मिला के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी, परन्तु अपनी धर्म पत्नी उर्मिला को कैसे समझाऊंगा? क्या कहूंगा?* *यही सोच विचार करके लक्ष्मणजी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिलाजी आरती का थाल लेकर खड़ी थीं और बोलीं- "आप मेरी चिंता छोड़िये, प्रभु श्री राम की सेवा में वन को जाइए। मैं आपको नहीं रोकूँगी। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।"* *लक्ष्मणजी को कहने में संकोच हो रहा था। परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिलाजी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया। वास्तव में यही पत्नी का धर्म है। पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही धर्मपत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे!!* *लक्ष्मणजी चले गये, परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिलाजी ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया। वन में भैया-भाभी की सेवा में लक्ष्मणजी कभी सोये नहीं, परन्तु उर्मिलाजी ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग-जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया।* *मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मणजी को शक्ति लग जाती है और श्री हनुमानजी उनके लिये संजीवनी का पहाड़ लेके लौट रहे होते हैं, तो बीच में अयोध्या में भरतजी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमानजी गिर जाते हैं। तब हनुमानजी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि माता सीताजी को रावण ले गया, लक्ष्मण जी मूर्छित हैं।* *यह सुनते ही कौशल्याजी कहती हैं कि श्री राम को कहना कि लक्ष्मण के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे। माता सुमित्रा कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं। अभी शत्रुघ्न है। मैं उसे भेज दूंगी। मेरे दोनों पुत्र राम सेवा के लिये ही तो जन्मे हैं। माताओं का प्रेम देखकर श्री हनुमानजी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। परन्तु जब उन्होंने उर्मिलाजी को देखा तो सोचने लगे कि यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी हैं? क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं??* *हनुमानजी पूछते हैं- हे देवी, आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं। सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जायेगा। उर्मिलाजी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणी उनकी वंदना किये बिना नहीं रह पाएगा।* *उर्मिला बोलीं- "मेरा दीपक संकट में नहीं है, वो बुझ ही नहीं सकता। रही सूर्योदय की बात तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिये, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता। आपने कहा कि प्रभु श्रीराम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं। जो योगेश्वर राम की गोदी में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता। यह तो वो दोनों लीला कर रहे हैं। मेरे पति जब से वन गये हैं, तब से सोये नहीं हैं। उन्होंने न सोने का प्रण लिया था। इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं। और जब भगवान् की गोद मिल गयी तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया। वे उठ जायेंगे। और शक्ति मेरे पति को लगी ही नहीं, शक्ति तो रामजी को लगी है। मेरे पतिदेव की हर श्वास में राम हैं, हर धड़कन में राम, उनके रोम-रोम में राम हैं, उनके खून की बूंद-बूंद में राम हैं, और जब उनके शरीर और आत्मा में सिर्फ राम ही हैं, तो शक्ति रामजी को ही लगी, दर्द रामजी को ही हो रहा है। इसलिये हनुमानजी आप निश्चिन्त होके जाएँ। सूर्य उदित नहीं होगा।"* *रामायण का दूसरा प्रसंग* ~~~~~~~~~~~~~~~ *भरतजी नंदिग्राम में रहते हैं, शत्रुघ्नजी उनके आदेश से राज्य संचालन करते हैं।* *एक रात की बात है, माता कौशिल्याजी को सोते में अपने महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी। नींद खुल गई । पूछा कौन है?* *मालूम पड़ा श्रुतिकीर्तिजी हैं। नीचे बुलाया गया।* *श्रुतिकीर्तिजी, जो सबसे छोटी हैं, आकर चरणों में प्रणाम कर खड़ी हो गईं।* *माता कौशिल्याजी ने पूछा, श्रुति ! इतनी रात को अकेली छत पर क्या कर रही हो बिटिया? क्या नींद नहीं आ रही?* *शत्रुघ्न कहाँ है?* *श्रुतिकीर्ति की आँखें भर आईं, माँ की छाती से चिपटी, गोद में सिमट गईं; बोलीं, माँ उन्हें तो देखे हुए तेरह वर्ष हो गए।* *उफ ! कौशल्याजी का हृदय काँप गया।* *तुरंत आवाज लगी, सेवक दौड़े आए। आधी रात ही पालकी तैयार हुई, आज शत्रुघ्नजी की खोज होगी, माँ चली।* *आपको मालूम है, शत्रुघ्न जी कहाँ मिले?* *अयोध्याजी के जिस दरवाजे के बाहर भरतजी नंदिग्राम में तपस्वी होकर रहते हैं, उसी दरवाजे के भीतर एक पत्थर की शिला हैं, उसी शिला पर, अपनी बाँह का तकिया बनाकर लेटे मिले।* *माँ सिराहने बैठ गईं, बालों में हाथ फिराया तो शत्रुघ्न जी ने आँखें खोलीं, माँ ! उठे, चरणों में गिरे। माँ ! आपने क्यों कष्ट किया? मुझे बुलवा लिया होता।* *माँ ने कहा, शत्रुघ्न ! यहाँ क्यों ?* *शत्रुघ्नजी की रुलाई फूट पड़ी, बोले- माँ ! भैया श्री रामजी पिताजी की आज्ञा से वन चले गए, भैया लक्ष्मणजी उनके पीछे चले गए, भैया भरतजी भी नंदिग्राम में हैं, क्या ये महल, ये रथ, ये राजसी वस्त्र, विधाता ने मेरे ही लिए बनाए हैं?* *माता कौशल्या जी निरुत्तर रह गईं।* *देखो यह रामकथा है।* ~~~~~~~~~~~~~~ *यह भोग की नहीं त्याग की कथा है, यहाँ त्याग की प्रतियोगिता चल रही है और सभी प्रथम हैं, कोई पीछे नहीं रहा!* *चारों भाइयों का प्रेम और त्याग एक-दूसरे के प्रति अद्भुत, अभिनव और अलौकिक है।* *रामायण जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती है।* *भगवान श्रीराम के वनवास का मुख्य कारण - मंथरा के लिए भी श्रीराम के हृदय में विशाल प्रेम है। रामायण का कोई भी पात्र तुच्छ नहीं है, हेय नहीं है। श्रीराम की दृष्टि में तो रीछ और बंदर भी तुच्छ नहीं हैं। जामवंत, हनुमान, सुग्रीव, अंगदादि सेवक भी उन्हें उतने ही प्रिय हैं जितने भरत, शत्रुघ्न, लखन और माँ सीता। माँ कौशल्या, कैकयी एवं सुमित्रा जितनी प्रिय हैं, उतनी ही शबरी श्रीराम को प्यारी लगती हैं।

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Gopal Jalan Apr 22, 2021

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सोना एक दैन‍िक द‍िनचर्या है लेक‍िन क्‍या आप जानते हैं वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार अगर गलत द‍िशा में स‍िर रखकर सोएं तो यह आपके ल‍िए प्रॉब्‍लम बढ़ा सकता है। जी हां इससे ड‍िप्रेशन, अन‍िद्रा, उन्‍नत‍ि में रुकावटें, दांपत्‍य सुख में कमी, बुरे सपने और भारी धन हान‍ि की समस्‍या होती है। लेक‍िन सही द‍िशा में स‍िर रखकर सोने से लाइफ की सारी टेंशन खत्‍म हो जाती है और भगवान कुबेर के आशीर्वाद से धन वर्षा भी होती है। तो आइए जानते हैं कि किस दिशा में सिर रखकर सोना द‍िलाता है कुबरे का आशीर्वाद और बुरे सपनों से न‍िजात… तब नहीं आएंगे बुरे सपने, रखें ख्‍याल वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार उतर दिशा में सिर करके सोने से बुरे सपने आते है। इस दिशा में सिर रखकर सोने से ब्लड प्रेशर भी बढ़ता है और मन भी काबू में नहीं रहता है। वहीं जब आपका सिर उतर दिशा में और दक्षिण दिशा में होता है तो बुरे सपने ज्यादा आते है क्योंकि यह शवों को रखने की दिशा है और यमलोक की दिशा है। इसल‍िए इस द‍िशा में भूलकर भी नहीं सोना चाह‍िए। इस द‍िशा में तो कतई न सोएं, बहुत अशुभ वास्‍तुशास्‍त्र के अनुसार कभी भी पश्चिम दिशा में सिर रखके नहीं सोना चाहिए। क्योंकि अगर इस दिशा में सिर रखकर सोने से पैर पूर्व दिशा में होते हैं। ध्‍यान रखें पूर्व दिशा देवी-देवताओं की दिशा है। इस दिशा में सोना अशुभ माना जाता है। इस दिशा में सोने से बुरे सपने तो आते ही है और मन में भी बैचेनी रहती है। इस द‍िशा में सोने से म‍िलता है यह लाभ शास्‍त्रों के अनुसार जो व्यक्ति पूर्व दिशा में सोता है वह बुद्धिमान और ज्ञानी होता है। वह ज‍िस कार्यक्षेत्र में कार्यरत होता है वहां उसे सफलता म‍िलती है और वह धन प्राप्ति में भी सफल होता है। इसल‍िए इस द‍िशा में सोने को शुभ बताया गया है। जय श्री महाकाली जय श्री महाकाल जी ॐ नमो नारायण ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जय श्री राम जय श्री कृष्ण राधे राधे नमस्कार 🙏 शुभ रात्री वंदन 👣 🌹 👏 🌿 🚩 🐚

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Gopal Jalan Apr 20, 2021

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Garima Gahlot Rajput Apr 20, 2021

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