राम दुआरे तुम रखवारे,,,,,,

राम दुआरे तुम रखवारे,,,,,,

*प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यान घन।
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥

मैं पवनकुमार श्री हनुमान्‌जी को प्रणाम करता हूँ, जो दुष्ट रूपी वन को भस्म करने के लिए अग्निरूप हैं, जो ज्ञान की घनमूर्ति हैं और जिनके हृदय रूपी भवन में धनुष-बाण धारण किए श्री रामजी निवास करते हैं॥

हनुमानजी महाराज भगवान् के भवन के मुख्य द्वारपाल हैं, भगवान् ने कहा है कि जब भी मेरे द्वार पर मेरा दर्शन करने आओगे तो तब तुम्हें पहले हनुमानजी का दर्शन करना होगा, तभी मेरा दर्शन मिलेगा, इसलिये आपको भगवान् के मन्दिर में प्रथम दर्शन हनुमानजी के होते हैं, भगवान् का जो निजधाभ है परम ब्रह्म भगवान राम जहाँ निवास करते हैं यानी साकेत में, श्रीहनुमानजी एक रूप में साकेत में हमेशा निवास करते हैं।

जो भी कोई भक्त अपनी याचना लेकर हनुमानजी के पास आता है तो हनुमानजी ही प्रभु के पास जाकर प्रार्थना करते हैं कि प्रभु इस पर कृपा करें, सकाम भाव से जो भक्त आते हैं हनुमानजी हमेशा उनको द्वार पर बैठे मिलते हैं और हनुमानजी की इच्छा है कि यह छोटे-छोटे काम जो तुम लेकर आए हो मेरे प्रभु को अकारण कष्ट मत दो,

प्रभु बहुत कोमल हैं, बहुत सरल हैं लाओ इनको मैं निपटाता हूँ इसलिए हनुमानजी हमेशा द्वार पर मिलते हैं, और कोई प्रेम के वशीभूत, भाव के वशीभूत आता है तो हनुमानजी उसे भगवान् के भवन के द्वार में अन्दर प्रवेश करा देते हैं, दर्शन के लिए कोई आता है तो उसको प्रवेश करा देते हैं, मनोकामना लेकर आता है तो स्वयं हनुमानजी पूरी करा देते हैं क्योंकि माता सीताजी ने हनुमानजी को पहले ही आशीर्वाद दे दिया था।

अष्ट सिद्धी नव निधि के दाता।
अस बर दीन्ह जानकी माता।।

माँ को भी मालूम था कि संसार में कितने लोग हैं जिनके कितने प्रकार के काम हैं, प्रतिदिन भीड़ लगेगी, भगवान् के दरबार पर कौन निपटायेगा? तो हनुमान यह काम तुम पूरा करोगे, शायद इसीलिये ही "राम दुआरे तुम रखवारे" का दूसरा भाव ऐसा ही लगता है जैसे कथा से पहले कथा का मंगलाचरण होता है,राम दर्शन से पहले मंगलमूर्ति मारूति नन्दन हनुमानजी का दर्शन आवश्यक है।

सज्जनों! घर के बाहर जब कोई विशेष दिन होता है तो हम लोग मंगल कलश सजाकर रखते है, भगवान् श्रीराम ने अपने घर के बाहर प्रतिदिन मंगल कलश के रूप मे हनुमानजी को विराजित किया है, भगवान् का भवन तो मंगल भवन अमंगलहारी है पर उनके द्वार पर भी तो मंगल कलश चाहिए, अपना जो मंगलमय परिवार का चिन्ह है यह मंगल कलश है, इस कलश के रूप मे श्रीहनुमानजी मंगल मूर्ति विराजमान हैं।

मंगल मूरति मारूति नन्दन, सकल अमंगल मूल निकन्दन।
पवन तनय संतन हितकारी, ह्रदय विराजत अवध बिहारी।।

सज्जनों! जो हनुमानजी की शरण में आता उसे सुख मिलता ही है, सुख का अनुभव होता ही है, सुख का अनुभव करती है हमारी ज्ञानेन्द्रियां और हनुमानजी तो ज्ञान गुणसागर है, कान, नाक, त्वचा, आँख व जीभ ज्ञानेन्द्रियां हैं, इसका रस तो भगवत रस है यही रस का, सुख का अनुभव कराते है हनुमानजी महाराज, क्योंकि? हनुमानजी "ज्ञानिनामग्रगंण्यम" हैं, कुछ लोग कहते है कि बिना भाव के कीर्तन करने से फायदा क्या? सज्जनों! ऐसा बिल्कुल नहीं कीर्तन तो बिना भाव के भी करो, आप सोचोगे भाव आयेगा तो कीर्तन करेंगे परन्तु न भाव आयेगा और न कीर्तन होगा।

भाव कूभाव अनख आलसहुं।
नाम जपत मंगल दिस दसहुं।।

किसान जब बीज बोता है, तो ये कभी नहीं देखता कि बीज टेढ़ा जा रहा है कि सीधा जा रहा है, या उल्टा जा रहा है, उसको बीज बोने से मतलब, एक बार खेत में बीज बो दिया तो वो उगे बिना नहीं रह सकता, इसलिये नाम को कैसे भी गाओ, किसी भी तरह गाओं, कोई भी भाषा में बोलों, वाणी और भाषा तो परमात्मा के ही वरदान हैं, किसी को ठीक बोलना नहीं आया या किसी को सही भाषा नहीं आई तो कुछ फर्क नहीं पड़ता, भाव-भावना सही होनी चाहिये।

तुलसी रघुवर नाम को रिज भजो चाहे खीज।
उल्टो सुल्टो ऊगसी धरती पड़ियो बीज।।

परमात्मा का कीर्तन गाओ, हम कीर्तन को जितना जोर से जायेंगे, जितना कीर्तन को स्वर लहरी से गायेंगे, उतना ही भाव बढ़ता है, संसार की हर चीज ऐसी है कि खर्च करने से वह कम हो जाती है, लेकिन कीर्तन की स्वर लहरी को जितना गायेंगे, उतना ही कीर्तन भजन बढ़ता रहेगा, सज्जनों! प्रेम की नौ परिस्थितियाँ होती हैं, भक्ति की दववीं परिस्थिति में जब व्यक्ति पहुँच जाता है तो उसका सम्पूर्ण शरीर पानी बनकर प्रभु के चरणों में समा जाता है, मीराबाई के साथ भी ऐसा ही हुआ, उनका सम्पूर्ण शरीर ही द्वारिकाधीश के श्रीचरणों में समा गया।

परमात्मा से मिलने की आकांक्षा जिस दिन जग जावे, बस उसी दिन शुरू हो जाओं, कभी तारीख मत बदलो, समय का क्या भरोसा है? आज हम बूढ़े हो रहे हैं पर भजन करने का विचार नहीं आता, कई लोग विचार करते रहते है कि कल भगवान् का भजन करेंगे, कल भजन करेंगे, कल-कल करते काल आ जाता है, न भजन हो पाता है और समय निकल जाता है, एक पल का भी सत्संग किसी को मिल जाये, तो उस सत्संग की बराबरी कोई कर नहीं सकता, न स्वर्ग कर सकता है, न मुक्ति कर सकती हैं, ये बात नितांत सत्य हैं।

क्या दुर्योधन ने जीवन में सौ-दो सौ बार भगवान् श्रीकृष्ण का दर्शन नहीं किया था? क्या शिशुपाल ने दस-पाँच बार भी श्रीकृष्ण का दर्शन नहीं किया था? पर वे क्रोध को तो नहीं जीत सके, क्रोध पर विजय तो प्राप्त नहीं कर सके, इसका बहुत सीधा सा मतलब है कि उन्हें भगवान् का दर्शन तो मिला था, लेकिन सत्संग नहीं मिला, बिना सत्संग के जीव को मोक्ष नहीं मिल सकता।

बिनु सत्संग विवेक न होई।
राम कृपा बिन सुलभ न सोई।।

बिना सत्संग के जीव को विवेक नहीं मिलता और राम कृपा बिना सत्संग भी सुलभ नहीं होता, परमात्मा जब पूरी कृपा करते हैं तो ही सत्संग मिलता है, नहीं तो, मैं ऐसे कितने लोगों को जानता हूँ कि- सामने मैदान में भागवत हो रही है, उसके पीछे गली में ताश खेल रहे है, उनको भगवान् से कोई लेना-देना नहीं है, कई तो भागवत कथा में रूचि रखते है कई टीवी में ही मस्त है, सत्य की यात्रा में निकलते ही नहीं, जीवन उसी में बीत जाता है।

सत्संग का चस्का जिसको लग जाता है, सत्संग का एक बार अनुराग जिसको हो जाय, उसको सत्संग के आगे कुछ भी अच्छा नहीं लगता और सत्संग की कृपा जिस पर हो जाय, उस पर परमात्मा की कृपा तो बरसती ही है, लक्ष्मी भी उस घर को छोड़कर कभी नहीं जाती, परमात्मा की कृपा बरसती है, और लक्ष्मी स्थायी रूप से वहाँ वास करती है, सत्संग के प्रति रूझान हो ऐसा प्रयत्न हमेशा करना चाहिये।

भगवान् के भक्त के लक्षण क्या हैं? कण-कण में परमात्मा का दर्शन करना, भक्त को तितिक्षु होना चाहिये, करूणावान होना चाहिये, सज्जनों! संत के स्वभाव के दर्शन किजियें, एक संत स्नान कर रहे थे, स्नान करते समय संत ने एक बिच्छु को बहते हुए देखा, बिच्छु को बहते देखकर संत के मन में दया आ गयी, ये बिच्छु तो बह जायेगा, तुरन्त हाथ बढ़ा कर बिच्छु को हाथ में लिया, लेकिन बिच्छु ने तुरन्त डंक मार दिया, संत का हाथ हिल गया, बिच्छु फिर नदी में गिर गया।

संत ने देखा कि यह तो बह जायेगा, जल में हाथ डालकर फिर निकाल लिया, बिच्छु ने फिर डंक मार दिया, तीन-चार बार ऐसा हुआ तो वहाँ किनारे बैठे एक व्यक्ति ने कहा- बाबा, बार-बार ये बिच्छु आपको डंक मारता है, बार-बार आप इसको निकालते है, बह जाने दो, इसका बहना ही ठीक है, संत ने क्या कहा? संत ने कहा- देखो, ये पाँच ग्राम का बिच्छु अपने स्वभाव को नहीं छोड़ सकता, जो भी इसको पकड़ेगा उसे डंक मारेगा।

तो मैं अपने स्वभाव को नहीं छोड़ सकता, मैं अस्सी किलो का संत होकर अपने स्वभाव को कैसे छोडूं? बिच्छु का स्वभाव है पकड़ने वाले को डंक मारना और संत का स्वभाव है बहते हुये को बचाना, जब ये अपना स्वभाव नहीं छोड़ता तो मैं अपना स्वभाव कैसे छोड सकता हूँ? सज्जनों! इस आर्टिकल के माध्यम से एक बात और कहना चाहता हूँ, दिपावली आ रही है और आप सभी लक्ष्मीजी को प्रसन्न करने की कोई कसर नहीं छोड़ने वाले।

लेकिन लक्ष्मीजी भी प्रसन्न उसी पर होती है जिनके के घर की लक्ष्मी प्रसन्न हो, नारी शक्ति की रक्षा और सम्मान होना चाहिये, शास्त्र कहते है- "नगृहं गृहमित्याहु गृहणि गृहमुच्यते" वास्तव में घर को घर नहीं कहते, बल्कि गृहिणी को ही घर कहते हैं, नारी का नाम ही घर हैं, जिस घर में नारी का आदर हैं वहाँ देवताओं का वास हैं, घर तो घर की लक्ष्मी के कारण ही अच्छा होता है, जिस घर में सुलक्षण स्त्री को शराब के नशे में मारा जाता है, उस घर से लक्ष्मी थोड़े ही दिनों में चली जाती है।Rpd

जिस घर में नारी यानी माता, बहन, पत्नी, पुत्री, इनकी मर्यादा नहीं रखी जाती उस घर में शान्ति कभी नहीं रहती, नारी को नारी मत समझों, नारी तो घर को स्वर्ग बनाने वाली देवी है, इसलिये भाई-बहनों, हनुमानजी भी हमको शरण में तब ही लेंगे जब हमारे घर की बहू-बेटी प्रसन्न रहेगी, श्री हनुमानजी की शरण में जो भी आ जाता है उसकी वह रक्षा करते हैं किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता, उसकी दशा और दिशा दोनों सुधर जाती है।

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कामेंट्स

Santosh Chandoskar Dec 26, 2017
Rudraavtar.Jai.Bajrang.Bali.Aapke.Jivan.Me.Matarani.Krupadrushti.Bani.Rahe.Jai.Shreeram.Good.Moring

Babbu Dixit Dec 26, 2017
ओम हनुमते रामदूताय नमः

Mani Rana Dec 26, 2017
Jai Siya Ram ji good good afternoon ji nice ji

Ajnabi Dec 26, 2017
very nice jay shree Radhe krishna veeruda

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Priti Agarwal May 23, 2019

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Sunil upadhyaya May 23, 2019

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Swami Lokeshanand May 23, 2019

पंचवटी में सूर्पनखा का बड़ा प्रकोप है। सूर्पनखा वासना है, वही इस जगत के दुखों का एकमात्र कारण है। जो भी दुखी है, समझ लो उससे सूर्पनखा चिपटी है। जो इस देह रूपी पंचवटी में आया, सूर्पनखा ने सब पर डोरे डाले। जो इसकी चिकनी चुपड़ी बातों में आ गया, उसकी नाक कटी, वह मारा गया। वही बचा जिसने सत्संग किया और इसकी ओर झांका तक नहीं। उसने नाक कटवाई नहीं, बल्कि इसी की नाक काट दी। जैसे पढ़ाई पूरी होते ही परीक्षा आती है, रामजी का सत्संग पूरा होते ही सूर्पनखा आ गई। अब कच्चे और सच्चे का भेद मालूम पड़ेगा। सूर्पनखा भेष बदलकर आई है, बहुत बनावट के साथ आई है, क्योंकि भेष बदलना तो लंकावालों की परंपरा ही है, मारीच ने बदला, रावण ने बदला। इससे बचने का उपाय देखें, यह आँख से मन में घुसती है, इसीलिए सच्चे सत्संगी लक्षमणजी तुरंत भगवान की ओर देखने लगे। सीता जी ने भी उसे नहीं देखा, वे रामजी के चरणों की ओर देखने लगीं। रामजी सीताजी को ही देखते रहे, उन्होंने भी सूर्पनखा को दृष्टि नहीं दी। माने वासना आक्रमण करे तो भगवान के रूप का चिंतन करें, भगवान के चरणों का आश्रय लें, तब वासना भीतर प्रवेश नहीं कर पाएगी। साधक कभी भी अपने आचरण के बल पर निश्चिंत न रहे, भगवान के चरण के बल पर निश्चिंत रहे। सूर्पनखा की बात नहीं बनी, बने भी कैसे? जहाँ ज्ञानदेव रामजी हों, भक्तिदेवी सीताजी विराजमान हों, वैराग्यदेव लक्षमणजी हों, माने ज्ञान भक्ति और वैराग्य तीनों हों, वहाँ वासना की दाल कैसे गले? अब विशेष ध्यान दें, वासना में बाधा पड़ी तो क्रोध उत्पन्न हुआ, क्रोध हुआ तो भक्ति पर प्रहार का प्रयास हुआ। भगवान कुछ भी सह लेते हैं, भक्ति पर चोट कैसे सहन हो? भगवान ने तुरंत संकेत किया, सावधान जीव ने वासना को नाक कान विहीन कर दिया, वासना का विरूपीकरण कर दिया, कि भविष्य में कभी छल न पाए। देखो, जहाँ वासना घुस जाए वहाँ न ज्ञान बचता, न मान। तो जहाँ ज्ञान नहीं, वहाँ कान किस काम के, और जहाँ मान नहीं, वहाँ नाक कैसी? यों परीक्षा उतीर्ण हुई। भक्ति की रक्षा हुई।

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RenuSuresh May 22, 2019

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Anju Mishra May 22, 2019

विचित्र पेड़ों के बारे में जानकारी जय श्री राधे कृष्णा 🙏🌹 चमत्कारिक बरगद : यह वृक्ष आंध्रप्रदेश के नालगोंडा में स्थित है। इसकी खासियत यह है कि इस पर विभिन्न जंगली जानवरों की आकृतियां बनी हुई है। सांप, बिच्छु, मगरमच्छ, शेर, अजगर आदि खतरनाक पशु और पक्षियों की आकृतियां संपूर्ण वृक्ष पर बनी हुई है। कहते हैं कि यह बाओबाज़ ट्री है और इसका तना दुनिया में किसी भी वृक्ष से बड़ा है।  लोगों का मानना है कि इस पेड़ के तनों पर किसी ने इन कलाकृतियों को गढ़ा है। उनका मानना है कि यह कोई चमत्कार नहीं है। दरअसल आंध्रप्रदेश के नलगोंडा में ऐसा कोई पेड़ नहीं है। ये तो डिज़्नी लैंड में कला का एक नमूना है। हालांकि वहीं बहुतयात लोगों का मानना है कि यह अनोखी प्रजाति का पेड़ है जोकि पूरी दुनिया में इकलौता है। नालगोंडा आंध्रप्रदेश का एक महत्‍वपूर्ण जिला है इस जिले का पहले नाम नीलगिरी था। नालगोंडा को पुरातत्‍वशास्त्रियों का स्‍वर्ग कहा जाता क्योंकि यहां पाषाणयुग और पूर्वपाषाण युग के अवशेष पाए गए हैं। ता फ्रोम ट्री ऑफ कंबोडिया :कंबोडिया के अंगारकोट में स्थित इस वृक्ष को देखने के लिए विश्‍व के कोने-कोने से लोग आते हैं। अंगारकोट में विश्‍व प्रसिद्ध हिन्दू मंदिर भी है। यहां का जंगली क्षेत्र सिल्क कॉटन के वृक्षों के लिए भी प्रसिद्ध है।  यहां का 'ता फ्रोम बौ‍द्ध मंदिर' 12वीं शताब्दी में बनाया गया था हालांकि अब तो यह खंडहर में बदल चुका है। सैकड़ों साल पुराने मंदिर और इन पेड़ों को विश्‍व धरोहर घोषित कर दिया गया है। यहां के विशालकाय मंदिरों को इन वृक्षों ने ढंक कर रखा है। मंदिर और वृक्ष का यह अद्भुत मिलन देखना किसी आश्चर्य से कम नहीं। कैलीफोर्निया का ग्रेट सिकुआ : अमेरिका के कैलीफोर्निया राज्य के सियेरा नेवादा ढलानों के सबसे बड़े पेड़ के लिए प्रसिद्ध है। ग्रेट सिकुआ नामक यह पेड़ 'सिकुआ डेन्ड्रान' वंश का है और इसका जातिगत नाम 'जाइगे स्टिअम' है। इस पेड़ का व्यास 12 मीटर तथा कुल ऊंचाई 82 मीटर है। भूमि से 54 मीटर की ऊंचाई पर इसका तना 4 मीटर मोटा है और इसकी सबसे लंबी शाखा की लंबाई 42.3 मीटर तथा व्यास 1.8 मीटर है। इसके तने का कुल आयतन 1401.84 घनमीटर है। अमेरिका के सिकुआ राष्ट्रीय पार्क में इस प्रकार के 300 से अधिक पेड़ हैं। इनमें से कुछ का नाम अमेरिका के प्रसिद्ध व्यक्तियों के नाम पर रखा गया है। ड्रैगन ट्री, कैनरी द्वीप : ड्रैगन वृक्ष को जीवित जीवाश्म इसीलिए माना जाता है, क्योंकि जब इसे काटा जाता है तो इसमें से खून की तरह लाल रंग का रस निकलता है। इस वृक्ष का आधार चौड़ा, मध्य भाग संकरा और ऊपर का भाग किसी छतरी की तरह तना हुआ है। इसी कारण यह भाग ऐसा लगता है कि सैंकड़ों पेड़ उगकर एकसाथ बंध गए हो। अफ्रीका के उत्तरी पश्‍चिमी तट पर कैनरी आयलैंड स्थित है, इस वृक्ष को देखने के लिए विश्वभर से लोग आते हैं। लेकिन इसे ड्रैगन ट्री क्यों कहा जाता है यह समझ से परे है।

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