🔴 Suresh Kumar 🔴
🔴 Suresh Kumar 🔴 Apr 14, 2021

OM NAMO BHAGWATE VASUDEWAY NAMAH 🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻 JAI MATA DI 🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴 SHUBH PRABHAT VANDAN 🏵️🏵️🏵️ HAPPY THURSDAY ☀️☀️☀️☀️☀️☀️ 💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠💠 🚩🕉️🚩🕉️🚩🕉️🚩🕉️🚩🕉️🚩🕉️🚩 🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀

OM NAMO BHAGWATE VASUDEWAY NAMAH 🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
JAI MATA DI 🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴🔴
SHUBH PRABHAT VANDAN 🏵️🏵️🏵️
HAPPY THURSDAY ☀️☀️☀️☀️☀️☀️
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कामेंट्स

🌹bk preeti 🌹 Apr 15, 2021
अगर कोई मनुष्य🚩🚩🚩🚩🚩🚩🌹🙏 आपको केवल जरूरत पड़ने पर ही याद करता है.. तो उस बात का बुरा मत मानो क्योकि जब अँधेरा हो जाता है तभी दिए की याद आती है…!!jai mata di 🙏 Mata rani ka Kirpa sada aap aur aap ke family pe bani rahe aap ka har pal Shubh aur mangalmay Ho shubh ratri vandan ji aane wala har ak pal bahot sari khushiyan lekar aaye ji 🍵🍹🍨🚩🌹🙏

🌹bk preeti 🌹 Apr 15, 2021
very sweet good night sweet dreams ji bhaiyaji god bless you and your family have a great day always be happy and healthy jiiiiii 🙏🙏🙏🚩🚩🌹🌹🙏

Shanti pathak Apr 15, 2021
🌷🙏जय माता दी🌷शुभ रात्रि वंदन भाई जी 🌷आपका हर पल शुभ एवं मंगलमय हो 🌷मातारानी की कृपादृष्टि आप एवं आपके परिवार पर सदैव बनी रहे🌷मातारानी आपको ढेरों खुशीयाँ प्रदान करें भाई जी🌷🙏🌷

Kamala Sevakoti Apr 15, 2021
jai lachimi narayin jai lachimi narayin jai lachimi narayin jai lachimi narayin jai lachimi narayin jai lachimi narayin Good night ji 🙏🌻🙏🙏🌻🌻🙏

Sweta Saxena Apr 15, 2021
jai mata di good night mere pyare bhaiya ji God bless you mata rani aapko sda khush rakhe

Mamta Chauhan Apr 15, 2021
Jai mata di🌷🙏shubh ratri vandan mere pyare bhaiya ji aapka har pal khushion bhara ho mata rani ki kripa sda aap or aapke priwar pr bni rhe🌷🌷🌷🙏🙏🙏

Archana Singh Apr 15, 2021
🙏🌹jai mata di 🙏🌹 jai Shree radhe Krishna ji🙏🌹 subh ratri vandan Bhai ji 🙏 aapka har pal mangalmay ho 🙏🌹🌹

💞💘सुधा 💘❣️ Apr 15, 2021
🌹🕉️🌿🌿🕉️🌹🌹🕉️🌿🌷🌹🌿🌿🌷🌹🕉️🌿🌷🌹🕉️🌿🌷🌹🕉️🌿🌷🌹🕉️🌿🌷🌷🌹🌿🕉️🌷🌹🌿🕉️🌷🌹🌿🕉️🌷🌹🌿🕉️🌷🌹🌿🕉️🌷🌹🌿🕉️🌷🌹🌿🕉️🌷🌹🌿🕉️🌷🌾जय माता दी जय श्री राधेश्याम जय श्री राम जी जय हनुमानजी ॐ नमो भगवती वासुदेवाय नमो नमः आपका हर दिन हर पल शुभ हो जी जय श्री हरि शुभरात्रि वन्दन प्यारे भाई जी 🌹👏🕉️🌹🌿🌷🕉️🌹🌿🌷🕉️🌹🌿🌷🕉️🌹🌿🌷🕉️🌹🌿🌷🕉️🌹🌿🌷🕉️🌹🌿🌷🕉️🌹🌿🌷🕉️🌹🌿🌷🕉️🌹🌿🌷🕉️🌹🌿🌷🕉️🌹🌿🌷🕉️🌹🌿

🙋🅰NJALI😊ⓂISH®🅰🙏 Apr 15, 2021
IIॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमःll🌷जय माता दी 🌷शुभ रात्रि वंदन भइया जी🙏भगवान् श्री लक्ष्मी नारायण जी एवम👁️माँ👁️ चंद्रघंटा की कृपा आप और आपके समस्त परिवार पर सदा बनी रहैं🙌 माता जगदंबा जी आप सभी को स्वस्थ और सुखी रखें ( चैत्र नवरात्रि )के तीसरे दिन की आपको शुभकामनाएं मेरे आदरणीय भइया जी🙏🥀🌸🌻🌺🎋🌻🌷🌾!! हरि ओम नमो नारायण !!🌷🙏हर हर महादेव☘️🌿🍃🍊🍊🍎🍎🍇🍇

Ravi Kumar Taneja Apr 15, 2021
🕉या देवी सर्वभूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।🙏 🙏🌷🙏जय मांअम्बे जय जय जगदम्बे 🙏🌷🙏 🚩🚩‘या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नसस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:‘🚩🚩 🌷🌷आप सभी को माँ दुर्गा जी का तृतीय स्वरूप माँ चंद्रघंटा पूजन की हार्दिक शुभकामनाएँ 🌷🌷 माँ चंद्रघंटा की कृपा से सभी के जीवन में उत्साह, उर्जा, सुख ,समृद्धि ,शांति , स्वlस्थ का आगमन हो माता जी का शुभ आशीष सदा बना रहे 🙏🐾🙏 🌹🌹जय माता दी 🌹🌹 माता चंद्रघंटाजी की कृपा से आपका जीवन मंगल मय हो देवी माँ की कृपा से आप स्वस्थ रहें सम्रद्ध रहें भक्ति भाव से भरे रहें!!!🕉🙏🐾🙏🐾🙏🕉

Poonam Aggarwal Apr 16, 2021
🙏🚩 जय माता दी 🚩🙏 *🌷 मां लक्ष्मी का हाथ हो, सरस्वती का साथ हो, गणेश का निवास हो, और मां दुर्गा के आशीर्वाद से आपके जीवन में प्रकाश ही प्रकाश हो*🌷 🌹 सुप्रभात वंदन,,,,,,, आपका हर पल शुभ मंगलमय हो 🌹🙏 💞 राधे राधे जी 💞🙏

💥Radha Sharma💥 Apr 16, 2021
@sureshkumar224 good morning brother ji 🙏भैया सारा दिन मेरे घर का काम खत्म नही होता है इसलिए आज जल्दी पोस्ट कर दी.. जय श्री संतोषी माता जी 🙏🙏🌷🌹

dhruv wadhwani Apr 16, 2021
जय मां लक्ष्मी सदा सहाय जी

dhruv wadhwani Apr 16, 2021
मां लक्ष्मी जी की कृपा आप और आपके पूरे परिवार पर चले वीडियो

dhruv wadhwani Apr 16, 2021
मां लक्ष्मी जी की कृपा आप पर और आपके पूरे परिवार पर सदैव बनी रहे

Manju_chuahan_ May 10, 2021

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Shashi Bhushan Singh May 10, 2021

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💗 Geeta 💓 May 10, 2021

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Raj May 10, 2021

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*मनुष्य का स्वभाव है “कमाना, संग्रह करना” फिर चाहे वो धन हो, नाते हो, संबंध हो या हो प्रसन्नता, परन्तु क्या आपने कभी सोचा है? नियति ने ये संग्रह करने की प्रकृति मनुष्य में क्यों डाली ?* *एक बीज से पौधा पनपता है, उसके भोजन से फल संग्रहित होता है क्यों? इसलिए ताकि वृक्ष उसे स्वयं खा सके? नहीं, बल्कि इसलिए ताकि वो भूखे जीवों में बाँट सके। अब आप पूछेंगे कि इसमें वृक्ष का क्या लाभ ?* *लाभ है, क्योंकि जो बांटता है वो मिटता नहीं। जो फल ये जीव खाते है वो उसके बीजों को वातावरण में बिखेर देते है जिससे जन्म लेते है नए वृक्ष, उसकी जाति, उसका गुण, उसकी मिठास अमर हो जाती है !* *इसलिए स्मरण रखियेगा अमीर होने के लिए एक-एक क्षण संग्रह करना पड़ता है।* *!!!...बुराई बड़ी मीठी है,* *उसकी चाहत कम नहीं होती* *सच्चाई बड़ी कड़वी है,* *सबको हजम नहीं होती...!!!* *जय माता दी*🙏🙏 *कुमार रौनक कश्यप*🙏🙏

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. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 207 स्कन्ध - 09 अध्याय - 24 (अन्तिम) इस अध्याय में:- विदर्भ के वंश का वर्णन श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! राजा विदर्भ की भोज्या नामक पत्नी से तीन पुत्र हुए- कुश, क्रथ और रोमपाद। रोमपाद विदर्भ वंश में बहुत ही श्रेष्ठ पुरुष हुए। रोमपाद का पुत्र बभ्रु, बभ्रु का कृति, कृति का उशिक और उशिक का चेदि। राजन! इस चेदि के वंश में ही दमघोष और शिशुपाल आदि हुए। क्रथ का पुत्र हुआ कुन्ति, कुन्ति का धृष्टि, धृष्टि का निर्वृति, निर्वृति का दशार्ह और दशार्ह का व्योम। व्योम का जीमूत, जीमूत का विकृति, विकृति का भीमरथ, भीमरथ का नवरथ और नवरथ का दशरथ। दशरथ से शकुनि, शकुनि से करम्भि, करम्भि से देवरात, देवरात से देवक्षत्र, देवक्षत्र से मधु, मधु से कुरुवश और कुरुवश से अनु हुए। अनु से पुरुहोत्र, पुरुहोत्र से आयु और आयु से सात्वत का जन्म हुआ। परीक्षित! सात्वत के सात पुत्र हुए- भजमान, भजि, दिव्य, वृष्णि, देवावृध, अन्धक और महाभोज। भजमान की दो पत्नियाँ थीं, एक से तीन पुत्र हुए- निम्लोचि, किंकिण और धृष्टि। दूसरी पत्नी से भी तीन पुत्र हुए- शताजित, सहस्रजित् और अयुताजित। देवावृध के पुत्र का नाम था बभ्रु। देवावृध और बभ्रु के सम्बन्ध में यह बात कही जाती है- ‘हमने दूर से जैसा सुन रखा था, अब वैसा ही निकट से देखते भी हैं। बभ्रु मनुष्यों में श्रेष्ठ है और देवावृध देवताओं के समान है। इसका कारण यह है कि बभ्रु और देवावृध से उपदेश लेकर चौदह हजार पैंसठ मनुष्य परम पद को प्राप्त कर चुके हैं।’ सात्वत के पुत्रों में महाभोज भी बड़ा धर्मात्मा था। उसी के वंश में भोजवंशी यादव हुए। परीक्षित! वृष्णि के दो पुत्र हुए- सुमित्र और युधाजित्। युधाजित् के शिनि और अनमित्र-ये दो पुत्र थे। अनमित्र से निम्न का जन्म हुआ। सत्रजित् और प्रसेन नाम से प्रसिद्ध यदुवंशी निम्न के ही पुत्र थे। अनमित्र का एक और पुत्र था, जिसका नाम था शिनि। शिनि से ही सत्यक का जन्म हुआ। इसी सत्यक के पुत्र युयुधान थे, जो सात्यकि के नाम से प्रसिद्ध हुए। सात्यकि का जय, जय का कुणि और कुणि का पुत्र युगन्धर हुआ। अनमित्र के तीसरे पुत्र का नाम वृष्णि था। वृष्णि के दो पुत्र हुए- श्वफल्क और चित्ररथ। श्वफल्क की पत्नी का नाम था गान्दिनी। उनमें सबसे श्रेष्ठ अक्रूर के अतिरिक्त बारह पुत्र उत्पन्न हुए- आसंग, सारमेय, मृदुर, मृदुविद्, गिरि, धर्मवृद्ध, सुकर्मा, क्षेत्रोपेक्ष, अरिमर्दन, शत्रुघ्न, गन्धमादन और प्रतिबाहु। इनके एक बहिन भी थी, जिसका नाम था सुचीरा। अक्रूर के दो पुत्र थे- देववान् और उपदेव। श्वफल्क के भाई चित्ररथ के पृथु विदूरथ आदि बहुत-से पुत्र हुए-जो वृष्णिवंशियों में श्रेष्ठ माने जाते हैं। सात्वत के पुत्र अन्धक के चार पुत्र हुए- कुकुर, भजमान, शुचि और कम्बलबर्हि। उनमें कुकुर का पुत्र वह्नि, वह्नि का विलोमा, विलोमा का कपोतरोमा और कपोतरोमा का अनु हुआ। तुम्बुरु गन्धर्व के साथ अनु की बड़ी मित्रता थी। अनु का पुत्र अन्धक, अन्धक का दुन्दुभि, दुन्दुभि का अरिद्योत, अरिद्योत का पुनर्वसु और पुनर्वसु के आहुक नाम का एक पुत्र तथा आहुकी नाम की एक कन्या हुई। आहुक के दो पुत्र हुए- देवक और उग्रसेन। देवक के चार पुत्र हुए- देववान्, उपदेव, सुदेव और देववर्धन। इनकी सात बहिनें भी थीं- धृत, देवा, शान्तिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, देवरक्षिता, सहदेवा और देवकी। वसुदेव जी ने इन सबके साथ विवाह किया था। उग्रसेन के नौ लड़के थे- कंस, सुनामा, न्यग्रोध, कंक, शंकु, सुहू, राष्ट्रपाल, सृष्टि और तुष्टिमान। उग्रसेन के पाँच कन्याएँ भी थीं- कंसा, कंसवती, कंका, शूरभू और राष्ट्रपालिका। इनका विवाह देवभाग आदि वसुदेव जी के छोटे भाइयों से हुआ था। चित्ररथ के पुत्र विदूरथ से शूर, शूर से भजमान, भजमान से शिनि, शिनि से स्वयम्भोज और स्वयम्भोज से हृदीक हुए। हृदीक से तीन पुत्र हुए- देवबाहु, शतधन्वा और कृतवर्मा। देवमीढ के पुत्र शूर की पत्नी का नाम था मारिषा। उन्होंने उसके गर्भ से दस निष्पाप पुत्र उत्पन्न किये- वसुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, सृंजय, श्यामक, कंक, शमीक, वत्सक और वृक। ये सब-के-सब बड़े पुण्यात्मा थे। वसुदेव जी के जन्म के समय देवताओं के नगारे और नौबत स्वयं ही बजने लगे थे। अतः वे ‘आनन्ददुन्दुभि’ भी कहलाये। वे ही भगवान् श्रीकृष्ण के पिता हुए। वसुदेव आदि की पाँच बहनें भी थीं- पृथा (कुन्ती), श्रुतदेवा, श्रुतकीर्ति, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी। वसुदेव के पिता शूरसेन के एक मित्र थे- कुन्तिभोज। कुन्तिभोज के कोई सन्तान न थी। इसलिये शूरसेन ने उन्हें पृथा नाम की अपनी सबसे बड़ी कन्या गोद दे दी। पृथा ने दुर्वासा ऋषि को प्रसन्न करके उनसे देवताओं को बुलाने की विद्या सीख ली। एक दिन उस विद्या के प्रभाव की परीक्षा लेने के लिये पृथा ने परम पवित्र भगवान् सूर्य का आवाहन किया। उसी समय भगवान् सूर्य वहाँ आ पहुँचे। उन्हें देखकर कुन्ती का हृदय विस्मय से भर गया। उसने कहा- ‘भगवन! मुझे क्षमा कीजिये। मैंने तो परीक्षा करने के लिये ही इस विद्या का प्रयोग किया था। अब आप पधार सकते हैं’। सूर्यदेव ने कहा- ‘देवि! मेरा दर्शन निष्फल नहीं हो सकता। इसलिय हे सुन्दरी! अब मैं तुझसे एक पुत्र उत्पन्न करना चाहता हूँ। हाँ, अवश्य ही तुम्हारी योनि दूषित न हो, इसका उपाय मैं कर दूँगा।' यह कहकर भगवान सूर्य ने गर्भ स्थापित कर दिया और इसके बाद वे स्वर्ग चले गये। उसी समय उससे एक बड़ा सुन्दर एवं तेजस्वी शिशु उत्पन्न हुआ। वह देखने में दूसरे सूर्य के समान जान पड़ता था। पृथा लोकनिन्दा से डर गयी। इसलिये उसने बड़े दुःख से उस बालक को नदी के जल में छोड़ दिया। परीक्षित! उसी पृथा का विवाह तुम्हारे परदादा पाण्डु से हुआ था, जो वास्तव में बड़े सच्चे वीर थे। परीक्षित! पृथा की छोटी बहिन श्रुतदेवा का विवाह करुष देश के अधिपति वृद्धशर्मा से हुआ था। उसके गर्भ से दन्तवक्त्र का जन्म हुआ। यह वही दन्तवक्त्र है, जो पूर्व जन्म में सनकादि ऋषियों के शाप से हिरण्याक्ष हुआ था। कैकय देश के राजा धृष्टकेतु ने श्रुतकीर्ति से विवाह किया था। उससे सन्तर्दन आदि पाँच कैकय राजकुमार हुए। राजाधिदेवी का विवाह जयसेन से हुआ था। उसके दो पुत्र हुए- विन्द और अनुविन्द। वे दोनों ही अवन्ती के राजा हुए। चेदिराज दमघोष ने श्रुतश्रवा का पाणिग्रहण किया। उसका पुत्र था शिशुपाल, जिसका वर्णन मैं पहले (सप्तम स्कन्ध में) कर चुका हूँ। वसुदेव जी के भाइयों में से देवभाग की पत्नी कंसा के गर्भ से दो पुत्र हुए- चित्रकेतु और बृहद्बल। देवश्रवा की पत्नी कंसवती से सुवीर और इषुमान नाम के दो पुत्र हुए। आनक की पत्नी कंका के गर्भ से भी दो पुत्र हुए- सत्यजित और पुरुजित। सृंजय ने अपनी पत्नी राष्ट्रपालिका के गर्भ से वृष और दुर्मर्षण आदि कई पुत्र उत्पन्न किये। इसी प्रकार श्यामक ने शूरभूमि (शूरभू) नाम की पत्नी से हरिकेश और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र उत्पन्न किये। मिश्रकेशी अप्सरा के गर्भ से वत्सक के भी वृक आदि कई पुत्र हुए। वृक ने दुर्वाक्षी के गर्भ से तक्ष, पुष्कर और शाल आदि कई पुत्र उत्पन्न किये। शमीक की पत्नी सुदामिनी ने भी सुमित्र और अर्जुनपाल आदि कई बालक उत्पन्न किये। कंक की पत्नी कर्णिका के गर्भ से दो पुत्र हुए- ऋतधाम और जय। आनकदुन्दुभि वसुदेव जी की पौरवी, रोहिणी, भद्रा, मदिरा, रोचना, इला और देवकी आदि बहुत-सी पत्नियाँ थीं। रोहिणी के गर्भ से वसुदेव जी के बलराम, गद, सारण, दुर्मद, विपुल, ध्रुव और कृत आदि पुत्र हुए थे। पौरवी के गर्भ से उनके बारह पुत्र हुए- भूत, सुभद्र, भद्रवाह, दुर्मद और भद्र आदि। नन्द, उपनन्द, कृतक, शूर आदि मदिरा के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। कौसल्या ने एक ही वंश-उजागर पुत्र उत्पन्न किया था। उसका नाम था केशी। उसने रोचना से हस्त और हेमांगद आदि तथा इला से उरुवल्क आदि प्रधान यदुवंशी पुत्रों को जन्म दिया। परीक्षित! वसुदेव जी के धृतदेवा के गर्भ से विपृष्ठ नाम का एक ही पुत्र हुआ और शान्तिदेवा से श्रम और प्रतिश्रुत आदि कई पुत्र हुए। उपदेवा के पुत्र कल्पवर्ष आदि दस राजा हुए और श्रीदेवा के वसु, हंस, सुवंश आदि छः पुत्र हुए। देवरक्षिता के गर्भ से गद आदि नौ पुत्र हुए तथा स्वयं धर्म ने आठ वसुओं को उत्पन्न किया था, वैसे ही वसुदेव जी ने सहदेवा के गर्भ से पुरुविश्रुत आदि आठ पुत्र उत्पन्न किये। परम उदार वसुदेव जी ने देवकी के गर्भ से भी आठ पुत्र उत्पन्न किये, जिसमें सात के नाम हैं- कीर्तिमान, सुषेण, भद्रसेन, ऋजु, संमर्दन, भद्र और शेषावतार श्रीबलराम जी। उन दोनों के आठवें पुत्र स्वयं श्रीभगवान् ही थे। परीक्षित! तुम्हारी परासौभाग्यवती दादी सुभद्रा भी देवकी जी की ही कन्या थीं। जब-जब संसार में धर्म का ह्रास और पाप की वृद्धि होती है, तब-तब सर्वशक्तिमान भगवान श्रीहरि अवतार ग्रहण करते हैं। परीक्षित! भगवान् सब के द्रष्टा और वास्तव में असंग आत्मा ही हैं। इसलिये उनकी आत्मस्वरूपिणी योगमाया के अतिरिक्त उनके जन्म अथवा कर्म का और कोई भी कारण नहीं है। उनकी माया का विलास ही जीव के जन्म, जीवन और मृत्यु का कारण है। और उनका अनुग्रह ही माया को अलग करके आत्मस्वरूप को प्राप्त करने वाला है। जब असुरों ने राजाओं का वेष धारण कर लिया और कई अक्षौहिणी सेना इकट्ठी करके वे सारी पृथ्वी को रौंदने लगे, तब पृथ्वी का भार उतारने के लिये भगवान् मधुसूदन बलराम जी के साथ अवतीर्ण हुए। उन्होंने ऐसी-ऐसी लीलाएँ कीं, जिनके सम्बन्ध में बड़े-बड़े देवता मन से अनुमान भी नहीं कर सकते-शरीर से करने की बात तो अलग रही। पृथ्वी का भार तो उतरा ही, साथ ही कलियुग में पैदा होने वाले भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये भगवान् ने ऐसे परम पवित्र यश का विस्तार किया, जिसका गान और श्रवण करने से ही उनके दुःख, शोक और अज्ञान सब-के-सब नष्ट हो जायेंगे। उनका यश क्या है, लोगों को पवित्र करने वाला श्रेष्ठ तीर्थ है। संतों के कानों के लिये तो वह साक्षात् अमृत ही है। एक बार भी यदि कान की अंजलियों से उसका आचमन कर लिया जाता है, तो कर्म की वासनाएँ निर्मूल हो जाती हैं। परीक्षित! भोज, वृष्णि, अन्धक, मधु, शूरसेन, दशार्ह, कुरु, सृंजय और पाण्डुवंशी वीर निरन्तर भगवान की लीलाओं की आदरपूर्वक सराहना करते रहते थे। उनका श्यामल शरीर सर्वांगसुन्दर था। उन्होंने उस मनोहर विग्रह से तथा अपनी प्रेमभरी मुसकान, मधुर चितवन, प्रसादपूर्ण वचन और पराक्रमपूर्ण लीला के द्वारा सारे मनुष्य लोक को आनन्द में सराबोर कर दिया था। भगवान् के मुखकमल की शोभा तो निराली ही थी। मकराकृति कुण्डलों से उनके कान बड़े कमनीय मालूम पड़ते थे। उनकी आभा से कपोलों का सौन्दर्य और भी खिल उठता था। जब वे विलास के साथ हँस देते, तो उनके मुख पर निरन्तर रहने वाले आनन्द में मानो बाढ़-सी आ जाती। सभी नर-नारी अपने नेत्रों के प्यालों से उनके मुख की माधुरी का निरन्तर पान करते रहते, परन्तु तृप्त नहीं होते। वे उसका रस ले-लेकर आनन्दित तो होते ही, परन्तु पलकें गिरने से उनके गिराने वाले निमि पर खीझते भी। लीला पुरुषोत्तम भगवान अवतीर्ण हुए मथुरा में वसुदेव जी के घर, परन्तु वहाँ वे रहे नहीं, वहाँ से गोकुल में नन्दबाबा के घर चले गये। वहाँ अपना प्रयोजन-जो ग्वाल, गोपी और गौओं को सुखी करना था-पूरा करके मथुरा लौट आये। व्रज में, मथुरा में तथा द्वारका में रहकर अनेकों शत्रुओं का संहार किया। बहुत-सी स्त्रियों से विवाह करके हजारों पुत्र उत्पन्न किये। साथ ही लोगों में अपने स्वरूप का साक्षात्कार कराने वाली अपनी वाणीस्वरूप श्रुतियों की मर्यादा स्थापित करने के लिये अनेक यज्ञों के द्वारा स्वयं अपना ही यजन किया। कौरव और पाण्डवों के बीच उत्पन्न हुए आपस के कलह से उन्होंने पृथ्वी का बहुत-सा भार हलका कर दिया और युद्ध में अपनी दृष्टि से ही राजाओं की बहुत-सी अक्षौहिणियों को ध्वंस करके संसार में अर्जुन की जीत का डंका पिटवा दिया। फिर उद्धव को आत्मतत्त्व का उपदेश किया और इसके बाद वे अपने परमधाम को सिधार गये। ~~~०~~~ श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" "कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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Smt Neelam Sharma May 9, 2021

*माँ* आप सभी मातृ शक्तियों को मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः। नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।। *अर्थात, माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है।* 'माँ' यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम−रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ता है और मनो मस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। 'माँ' वह अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। 'माँ' की ममता और उसके आँचल की महिमा को शब्दों से व्यक्त नहीं किया जा सकता है, नौ महीने तक गर्भ में रखना, प्रसव पीड़ा झेलना, स्तनपान करवाना, रात−रात भर बच्चे के लिए जागना, खुद गीले में रहकर बच्चे को सूखे में रखना, मीठी−मीठी लोरियां सुनाना, ममता के आंचल में छुपाए रखना, तोतली जुबान में संवाद व अठखेलियां करना, पुलकित हो उठना, ऊंगली पकड़कर चलना सिखाना, प्यार से डांटना−फटकारना, रूठना−मनाना, दूध−दही−मक्खन का लाड़−लड़ाकर खिलाना−पिलाना, बच्चे के लिए अच्छे−अच्छे सपने बुनना, बच्चे की रक्षा के लिए बड़ी से बड़ी चुनौती का डटकर सामना करना और बड़े होने पर भी वही मासूमियत और कोमलता भरा व्यवहार.....ये सब ही तो हर 'माँ' की मूल पहचान है। इस सृष्टि के हर जीव और जन्तु की 'माँ' की यही मूल पहचान है। मां का अर्थ ही होता है पृथ्वी पर ईश्वर उपस्थिति वैसे तो मां के साथ हर दिन ही जन्नत सा महसूस होता है पर इसके लिए एक विशेष दिन बनाया गया है *मातृ दिवस* मातृ दिवस मनाने का प्रमुख उद्देश्य मां के प्रति सम्मान और प्रेम को प्रदर्शित करना है। *आइए जानते हैं मातृ दिवस सर्वप्रथम कहां से प्रारंभ हुआ* मातृ दिवस मनाने का शुरुआत सर्वप्रथम ग्रीस देश में हुई थी, जहां देवताओं की मां को पूजने का चलन शुरु हुआ था। इसके बाद इसे त्योहार की तरह मनाया जाने लगा। हर मां अपने बच्चों के प्रति जीवन भर समर्पित होती है। मां के त्याग की गहराई को मापना भी संभव नहीं है लेकिन उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता को प्रकट करना हमारा कर्तव्य है। *भारत में मातृ दिवस मई महीने के दूसरे रविवार को मनाया जाता है। इस वर्ष भारत में मातृ दिवस 9 मई को मनाया जाएगा।* मैं अक्सर देखता हूं कि लोग अपनी माताजी को मातृ दिवस पर कोई ना कोई उपहार अवश्य ही भेंट करते हैं। मेरा व्यक्तिगत विचार है कि माँ को देने लायक कोई उपहार नहीं हो सकता है। फिर भी, अगर आप अपनी माँ को मातृ दिवस पर कोई उपहार देना ही चाहते हैं केवल मातृ दिवस पर ही नहीं उन्हें प्रतिदिन सम्मान देना प्रारंभ करें। उनकी इच्छाओं का सम्मान करें। हमारा प्रयास रहना चाहिए जैसे बचपन में हमारी माता हमारा केवल चेहरा देखकर हमारे मन के भाव समझ जाती थी हमें भी बड़े होकर उनके मन के भावों को समझना चाहिए। आप प्रतिदिन उन्हें प्यार से गले भी लगा लेंगे तो उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान यही होगा। अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपनी इच्छा अनुसार जो भी आप अपनी माता जी को देना चाहें उससे वह प्रसन्न हीं होंगी।🙏🏻🙏🏻 🙏🏻🙏🏻मां🙏🏻🙏🏻

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Raj May 10, 2021

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