Bhavesh Dalakiya
Bhavesh Dalakiya Mar 24, 2020

श्री शनिदेव जी के आज के संध्या समय दर्शन शनिधाम शिगणापुर महाराष्ट्र से मंगलवार 24-3-2020

श्री शनिदेव जी के 
आज के संध्या समय दर्शन 
शनिधाम शिगणापुर महाराष्ट्र से 
मंगलवार 24-3-2020
श्री शनिदेव जी के 
आज के संध्या समय दर्शन 
शनिधाम शिगणापुर महाराष्ट्र से 
मंगलवार 24-3-2020

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🕉शनिदेवाय नमः 🌹🙏 अधर्म को क्षमा 🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹 एक बार की बात है। धर्म और अधर्म दोनों अपने अपने रथ पर बैठकर कहीं जा रहे थे। तभी उन दोनों के रथ एक ही राह में आमने सामने हो गए। अब कौन दूसरे के लिए रास्ता छोड़े, इस पर उनमें विवाद छिड़ गया। धर्म ने अधर्म को समझाया, 'भाई, तू अधर्म है, मैं धर्म हूं। मेरा मार्ग ठीक होता है। अपना रथ हटा कर मुझे रास्ता दे। मैं फलदायक, पुण्यदायक, विद्वानों द्वारा प्रशंसित और देवों तथा मनुष्यों सभी के द्वारा पूजित हूं। इसलिए मार्ग दिए जाने योग्य मैं ही हूं।' अधर्म ने जवाब दिया, 'हे धर्म, मैं अधर्म हूं और निर्भय-बलवान हूं। मैंने आज तक कभी भी किसी को मार्ग नहीं दिया। यह मेरे स्वभाव के ही विरुद्ध है। मैं तुझे कैसे मार्ग दे सकता हूं ? धर्म ने फिर समझाया, 'देखो भाई, लोक में पहले धर्म का प्रादुर्भाव हुआ, बाद में अधर्म का। धर्म ही ज्येष्ठ है, धर्म ही श्रेष्ठ है, सनातन है। इसलिए हे कनिष्ठ, तू मुझ ज्येष्ठ के लिए मार्ग छोड़ दे।' इस पर अधर्म बोला, 'यह सब कोई उचित कारण नहीं हैं। और तू मुझसे याचना थोड़े ही कर रहा है। इस तरह मैं मार्ग छोड़ूंगा भी नहीं। आओ, युद्ध करें। जिसकी जीत हो, रास्ता उसी का।' फिर धर्म ने समझाने की कोशिश की, 'हे अधर्म! मै चारों दिशाओं में फैला हुआ हूं, महाबलवान हूं, अनन्त यशस्वी और अतुलनीय हूं। सभी गुणों से युक्त हूं। मुझसे युद्ध में तू कैसे जीतेगा ?' व्यंग्य करते हुए अधर्म ने जवाब दिया, 'लोहे से सोना पिघलता है, सोने से लोहा नहीं! आज अधर्म ही धर्म को पराजित करेगा!' यह सुनकर धर्म को बड़ा दुख हुआ। लेकिन फिर अपने को संभालते हुए सहज भाव से वह बोला, 'भाई, तुझे यदि युद्ध करने की ही चाह है, तेरे लिए न कोई ज्येष्ठ है न आदरणीय, तो मैं अप्रिय की अपेक्षा प्रिय की तरह ही तुझे स्वयं मार्ग देता हूं और तेरे वचनों को भी क्षमा करता हूं।' और शांत भाव से अधर्म को जाने का मोका दे दिया ।

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Anjana Gupta May 9, 2020

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