Krishna Singh
Krishna Singh Oct 25, 2017

क्या आप जानते हैं कि सर्जरी के सर्जक जनक हमारे ऋषि मुनि है

क्या आप जानते हैं कि सर्जरी के सर्जक जनक  हमारे ऋषि मुनि है

कया आप जानते हैं कि सर्जरी के सर्जक जनक हम है
प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणाली अपने समय में अपने समयानुसार अति उन्नत अवस्था में थी। भारतीय चिकित्सा के मूलतः तीन अनुशासन थे --
१. काय चिकित्सा (मेडीसिन) -- जिसके मुख्य प्रतिपादक ऋषि - चरक ,अत्रि, हारीति व अग्निवेश आदि थे ।
२. शल्य चिकित्सा -- मुख्य शल्यक थे- धन्वन्तरि, सुश्रुत, औपधेनव, पुषकलावति।
३. स्त्री एवम बाल रोग -- जिसके मुख्य ऋषि कश्यप थे।
डा ह्रिश्च बर्ग ( जर्मनी) का कथन है -- “ The whole plastic surgery in Europe had taken its new flight when these cunning devices of Indian workers became known to us. The transplaats of sensible skin flaps is also Indian method.” डा ह्वीलोट का कथन है - “vaccination was known to a physician’ Dhanvantari”, who flourished before Hippocrates.” इन से ज्ञात होती है, भारतीय चिकित्सा शास्त्र के स्वर्णिम काल की गाथा।
रोगी को शल्य-परामर्श के लिये उचित प्रकार से भेजा जाता था। एसे रोगियों से काय –चिकित्सक कहा करते थे -- “अत्र धन्वंतरिनाम अधिकारस्य क्रियाविधि।“-- अब शल्य चिकित्सक इस रोगी को अपने क्रियाविधि में ले।
सुश्रुत के समय प्रयोग होने वाली शल्य –क्रिया विधियां --
१. आहार्य -- ठोस वस्तुओंको शरीर से निकालना( Extraction-foren bodies).
२. भेद्य -- काटकर निकालना (Excising).
३. छेद्य -- चीरना (incising)
४. एश्य -- शलाका डालना आदि (Probing)
५. लेख्य -- स्कार, टेटू आदि बनाना (Scarifying)
६. सिव्य -- सिलाई आदि करना (suturing)
७. वेध्य -- छेदना आदि (puncturing etc)
८. विस्रवनिया -- जलीय अप-पदार्थों को निकालना (Tapping body fluids)
शल्य क्रिया पूर्व कर्म (प्री-आपरेटिव क्रिया) -- रात्रि को हलका खाना, पेट, मुख, मलद्वार की सफ़ाई, ईश-प्रार्थना, सुगन्धित पौधे, बत्तियां –नीम, कपूर. लोबान आदि जलाना ताकि कीटाणु की रोकथाम हो।
शल्योपरान्त कर्म -- रोगी को छोडने से पूर्व ईश-प्रार्थना, पुल्टिस लगाकर घाव को पट्टी करना, प्रतिदिन नियमित रूप से पट्टी बदलना जब तक घाव भर न जाय, अधिक दर्द होने पर गुनुगुने घी में भीगा कपडा घाव पर रखा जाता था।
सुश्रुत के समय प्रयुक्त शल्य-क्रिया के यन्त्र व शस्त्र -- (Instuments & Equppements) -- कुल १२५ औज़ारों का सुश्रुत ने वर्णन किया है-- (देखिये संलग्न- चित्र-१,२,३)
(अ) -- यन्त्र -- (अप्लायन्स) -- १०५ -- स्वास्तिक (फ़ोर्सेप्स)२४ प्रकार; सन्डसीज़ (टोन्ग्स)-दो प्रकार; ताल यन्त्र (एकस्ट्रेक्सन फ़ोर्सेप्स)-दो प्रकार; नाडी यन्त्र(केथेटर आदि)-२० प्रकार; शलाक्य (बूझी आदि)-३० प्रकार; उपयन्त्र –मरहम पट्टी आदि का सामान;--कुल १०४ यन्त्र; १०५ वां यन्त्र शल्यक का हाथ।
(ब) -- शस्त्र- (इन्सट्रूमेन्ट्स) -- २० -- चित्रानुसार।
इन्स्ट्रूमेन्ट्स सभी परिष्क्रत लोह (स्टील के बने होते थे। किनारे तेज, धार-युक्त होते थे , वे लकडी के बक्से में ,अलग-अलग भाग बनाकर सुरक्षित रखे जाते थे।
अनुशस्त्र -- (सब्स्टीच्यूड शस्त्र) -- बम्बू, क्रस्टल ग्लास, कोटरी, नेल, हेयर, उन्गली आदि भी घाव खोलने में प्रयुक्त करते थे।
निश्चेतना (एनास्थीसिया) -- बेहोशी के लिये सम्मोहिनी नामक औषधियां व बेहोशी दूर करने के लिये संजीवनी नामक औषधियां प्रयोग की जाती थीं।
शमन- औषधि द्वारा चिकित्सा,
इसकी परिधि बहुत व्याप्त थी। आठ
प्रकार की चिकित्साएं बताई गई हैं।
(१) काय चिकित्सा-सामान्य चिकित्सा
(२) कौमार भृत्यम्-बालरोग चिकित्सा
(३) भूत विद्या- मनोरोग चिकित्सा
(४) शालाक्य तंत्र- उर्ध्वांग अर्थात् नाक,
कान, गला आदि की चिकित्सा
(५) शल्य तंत्र-शल्य चिकित्सा
(६) अगद तंत्र-विष चिकित्सा
(७) रसायन-रसायन चिकित्सा
(८) बाजीकरण-पुरुषत्व वर्धन
औषधियां:- चरक ने कहा, जो जहां रहता है,
उसी के आसपास प्रकृति नेरोगों की औषधियां दे रखी हैं। अत: वे अपनेआसपास के पौधों,
वनस्पतियों का निरीक्षण व प्रयोग करनेका आग्रह करते थे। एक समय विश्व के अनेक
आचार्य एकत्रित हुए, विचार-विमर्श हुआऔर उसकी फलश्रुति आगे चलकर ‘चरक
संहिता‘ के रूप में सामने आई। इस संहिता मेंऔषधि की दृष्टि से ३४१ वनस्पतिजन्य,१७७ प्राणिजन्य, ६४ खनिज द्रव्यों का उल्लेख है। इसी प्रकार सुश्रुतसंहिता में ३८५ वनस्पतिजन्य, ५७प्राणिजन्य तथा ६४ खनिज द्रव्यों से
औषधीय प्रयोग व विधियों का वर्णन है।इनसे चूर्ण, आसव, काढ़ा, अवलेह आदि अनेक में
रूपों औषधियां तैयार होती थीं। इससे पूर्वकाल में भी ग्रंथों में कुछ अद्भुत
औषधियों का वर्णन मिलता है। जैसेबाल्मीकी रामायण में राम-रावण युद्ध केसमय जब लक्ष्मण पर प्राणांतक आघात हुआ
और वे मूर्छित हो गए, उस समय इलाज हेतुजामवन्त ने हनुमान जी के पास हिमालय में
प्राप्त होने वाली चार दुर्लभ औषधियों का वर्णन किया।मृत संजीवनी चैव विशल्यकरणीमपि।
सुवर्णकरणीं चैव सन्धानी च महौषधीम्॥युद्धकाण्ड ७४-३३
(१) विशल्यकरणी-शरीर में घुसे अस्त्रनिकालने वाली
(२) सन्धानी- घाव भरने वाली
(३) सुवर्णकरणी-त्वचा का रंग ठीक रखने वाली
(४) मृतसंजीवनी-पुनर्जीवन देने वाली चरक के बाद बौद्धकाल में नागार्जुन,
वाग्भट्ट आदि अनेक लोगों के प्रयत्न से रस शास्त्र विकसित हुआ। इसमें पारे को शुद्ध
कर उसका औषधीय उपयोग अत्यंत परिणामकारक रहा। इसके अतिरिक्त
धातुओं, यथा-लौह, ताम्र, स्वर्ण, रजत, जस्त को विविध रसों में डालना और गरम करना-
इस प्रक्रिया से उन्हें भस्म में परिवर्तित करने की विद्या विकसित हुई। यह भस्म और पादपजन्य औषधियां भी रोग निदान में
काम आती हैं।
शल्य चिकित्सा- कुछ वर्षों पूर्व इंग्लैण्ड के शल्य चिकित्सकों के विश्व प्रसिद्ध संगठन
ने एक कैलेण्डर निकाला, उसमें विश्व के अब तक के श्रेष्ठ शल्य चिकित्सकों (सर्जन) के
चित्र दिए गए थे। उसमें पहला चित्र आचार्य सुश्रुत का था तथा उन्हें विश्व का पहला शल्य चिकित्सक
बताया गया था।
वैसे भारतीय परम्परा में शल्य चिकित्सा का इतिहास बहुत प्राचीन है।
भारतीय चिकित्सा के देवता धन्वंतरि को शल्य
क्रिया का भी जनक माना जाता है।
प्राचीनकाल में इस क्षेत्र में हमारे देश के चिकित्सकों ने अच्छी प्रगति की थी। अनेक
ग्रंथ रचे गए। ऐसे ग्रंथों के रचनाकारों में सुश्रुत, पुष्कलावत, गोपरक्षित, भोज,
विदेह, निमि, कंकायन, गार्ग्य, गालव, जीवक, पर्वतक, हिरण्याक्ष, कश्यप आदि के
नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।
इन रचनाकारों के अलावा अनेक प्राचीन ग्रंथों से इस क्षेत्र में
भारतीयों की प्रगति का ज्ञान होता है। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में दिल, पेट
तथा वृक्कों के विकारों का विवरण है। इसी तरह शरीर में नवद्वारों तथा दस
छिद्रों का विवरण दिया गया है।
वैदिक काल के शल्य चिकित्सक मस्तिष्क की शल्य क्रिया में निपुण थे। ऋग्वेद (८-८६-२) के
अनुसार जब विमना और विश्वक ऋषि उद्भ्रान्त हो गए थे, तब शल्य
क्रिया द्वारा उनका रोग दूरकिया गया। इसी ग्रंथ में नार्षद ऋषि का भी विवरण है।
जब वे पूर्ण रूप से बधिर हो गए तब अश्विनी कुमारों ने उपचार करके उनकी श्रवण शक्ति वापस
लौटा दी थी। नेत्र जैसे कोमल अंग की चिकित्सा तत्कालीन चिकित्सक कुशलता से कर लेते थे।
ऋग्वेद (१-११६-११) में शल्य क्रिया द्वारा वन्दन ऋषि की ज्योति वापस लाने का उल्लेख
मिलता है।
हमारे पुराणों में भी शल्य क्रिया के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई। ‘शिव पुराण‘के अनुसार
जब शिव जी ने दक्ष का सर काट दिया थाn तब अश्विनी कुमारों ने उनको नया सर लगाया था। इसी तरह गणेश
जी का मस्तक कट जाने पर उनके धड़ पर हाथी का सर जोड़ा गया था।
रामायण‘ तथा ‘महाभारत‘ में भी ऐसे कुछ उदाहरण मिलते हैं। ‘रामायण‘ में एक स्थान पर कहा है कि ‘याजमाने स्वके नेत्रे उद्धृत्याविमना ददौ।‘ अर्थात् आवश्यकता पड़ने पर एक मनुष्य की आंख
निकालकर दूसरे को लगा दी जाती थी।
सुश्रुत द्वारा वर्णित शल्य क्रियाओं के नाम इस प्रकार हैं
१) छेद्य (छेदन हेतु) (२) भेद्य (भेदन हेतु) (३) लेख्य (अलग करने हेतु) (४) वेध्य
(शरीर में हानिकारक द्रव्य निकालने के लिए) (५) ऐष्य (नाड़ी में घाव ढूंढने के लिए)
(६) अहार्य (हानिकारक उत्पत्तियों को निकालने के लिए) (७)विश्रव्य (द्रव निकालने के लिए)
(८) सीव्य (घाव सिलने के लिए)
सुश्रुत संहिता में शस्त्र क्रियाओं के लिए आवश्यक यंत्रों (साधनों) तथा शस्त्रों (उपकरणों) का भी विस्तार से
वर्णन किया गया है। आजकल की शल्यक्रिया में ‘फौरसेप्स‘ तथा ‘संदस‘ यंत्र
फौरसेप्स तथा टोंग से मिलते-जुलते हैं।
सुश्रुत के महान ग्रन्थ में २४ प्रकार के स्वास्तिकों, २ प्रकार के संदसों, २८
प्रकार की शलाकाओं तथा २० प्रकार की नाड़ियों (नलिका) का उल्लेख हुआ है।
इनके अतिरिक्त शरीर के प्रत्येक अंग की शस्त्र-क्रिया के लिए बीस प्रकार के
शस्त्रों (उपकरणों) का भी वर्णन किया गया है। पूर्व में जिन आठ प्रकार
की शल्य क्रियाओं का संदर्भ आया है, वे विभिन्न साधनों व उपकरणों से
की जाती थीं। उपकरणों (शस्त्रों) के नाम इस प्रकार हैं-
अर्द्धआधार, अतिमुख, अरा, बदिशा, दंत
शंकु, एषणी, कर-पत्र, कृतारिका,
कुथारिका, कुश-पात्र, मण्डलाग्र,
मुद्रिका, नख शस्त्र, शरारिमुख, सूचि,
त्रिकुर्चकर, उत्पल पत्र, वृध-पत्र, वृहिमुख
तथा वेतस-पत्र।
आज से कम से कम तीन हजार वर्ष पूर्व सुश्रुत ने सर्वोत्कृष्ट इस्पात के उपकरण
बनाये जाने की आवश्यकता बताई। आचार्य ने इस पर भी बल दिया है कि उपकरण तेज
धार वाले हों तथा इतने पैने कि उनसे बाल को भी दो हिस्सों में काटा जा सके।
शल्यक्रिया से पहले व बाद में वातावरण व उपकरणों की शुद्धता (रोग-
प्रतिरोधी वातावरण) पर सुश्रुत ने इतना जोर दिया है तथा इसके लिए ऐसे
साधनों का वर्णन किया है कि आज के शल्य चिकित्सक भी दंग रह जाएं। शल्य
चिकित्सा (सर्जरी) से पहले रोगी को संज्ञा-शून्य करने (एनेस्थेशिया)
की विधि व इसकी आवश्यकता भी बताई गई है। ‘भोज प्रबंध‘ (९२७ ईस्वी) में
बताया गया है कि राजा भोज को कपाल की शल्य-क्रिया के पूर्व ‘सम्मोहिनी‘
नामक चूर्ण सुंघाकर अचेत किया गया था।
चौदह प्रकार की पट्टियां- इन उपकरणों के साथ ही आवश्यकता पड़ने पर
बांस, स्फटिक तथा कुछ विशेष प्रकार के प्रस्तर खण्डों का उपयोग भी शल्य
क्रिया में किया जाता था। शल्य क्रिया के मर्मज्ञ महर्षि सुश्रुत ने १४
प्रकार की पट्टियों का विवरण किया है। उन्होंने हड्डियों के खिसकने के छह
प्रकारों तथा अस्थि-भंग के १२ प्रकारों की विवेचना की है। यही नहीं,
उनके ग्रंथ में कान संबंधी बीमारियों के २८ प्रकार तथा नेत्र-रोगों के २६ प्रकार
बताए गए हैं।
सुश्रुत संहिता में मनुष्य की आंतों में कर्कट रोग (कैंसर) के कारण उत्पन्न हानिकर
तन्तुओं (टिश्युओं) को शल्य क्रिया से हटा देने का विवरण है।
शल्यक्रिया द्वारा शिशु-जन्म (सीजेरियन) की विधियों का वर्णन किया गया है।
‘न्यूरो-सर्जरी‘ अर्थात् रोग-मुक्ति के लिए नाड़ियों पर शल्य-क्रिया का उल्लेख है
तथा आधुनिक काल की सर्वाधिक पेचीदी क्रिया ‘प्लास्टिक सर्जरी‘
का सविस्तार वर्णन सुश्रुत के ग्रन्थ में है। आधुनिकतम विधियों का भी उल्लेख इसमें है।
कई विधियां तो ऐसी भी हैं जिनके सम्बंध में आज का चिकित्सा शास्त्र भी अनभिज्ञ है।
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि प्राचीन भारत में शल्य क्रिया अत्यंत उन्नत अवस्था में थी, जबकि शेष विश्व इस विद्या से बिल्कुल अनभिज्ञ था।
``जय सनातन´´
``जय भारत´´

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Sunil Jhunjhunwala
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