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Krishna Singh
Krishna Singh Oct 25, 2017

क्या आप जानते हैं कि सर्जरी के सर्जक जनक हमारे ऋषि मुनि है

क्या आप जानते हैं कि सर्जरी के सर्जक जनक  हमारे ऋषि मुनि है

कया आप जानते हैं कि सर्जरी के सर्जक जनक हम है
प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणाली अपने समय में अपने समयानुसार अति उन्नत अवस्था में थी। भारतीय चिकित्सा के मूलतः तीन अनुशासन थे --
१. काय चिकित्सा (मेडीसिन) -- जिसके मुख्य प्रतिपादक ऋषि - चरक ,अत्रि, हारीति व अग्निवेश आदि थे ।
२. शल्य चिकित्सा -- मुख्य शल्यक थे- धन्वन्तरि, सुश्रुत, औपधेनव, पुषकलावति।
३. स्त्री एवम बाल रोग -- जिसके मुख्य ऋषि कश्यप थे।
डा ह्रिश्च बर्ग ( जर्मनी) का कथन है -- “ The whole plastic surgery in Europe had taken its new flight when these cunning devices of Indian workers became known to us. The transplaats of sensible skin flaps is also Indian method.” डा ह्वीलोट का कथन है - “vaccination was known to a physician’ Dhanvantari”, who flourished before Hippocrates.” इन से ज्ञात होती है, भारतीय चिकित्सा शास्त्र के स्वर्णिम काल की गाथा।
रोगी को शल्य-परामर्श के लिये उचित प्रकार से भेजा जाता था। एसे रोगियों से काय –चिकित्सक कहा करते थे -- “अत्र धन्वंतरिनाम अधिकारस्य क्रियाविधि।“-- अब शल्य चिकित्सक इस रोगी को अपने क्रियाविधि में ले।
सुश्रुत के समय प्रयोग होने वाली शल्य –क्रिया विधियां --
१. आहार्य -- ठोस वस्तुओंको शरीर से निकालना( Extraction-foren bodies).
२. भेद्य -- काटकर निकालना (Excising).
३. छेद्य -- चीरना (incising)
४. एश्य -- शलाका डालना आदि (Probing)
५. लेख्य -- स्कार, टेटू आदि बनाना (Scarifying)
६. सिव्य -- सिलाई आदि करना (suturing)
७. वेध्य -- छेदना आदि (puncturing etc)
८. विस्रवनिया -- जलीय अप-पदार्थों को निकालना (Tapping body fluids)
शल्य क्रिया पूर्व कर्म (प्री-आपरेटिव क्रिया) -- रात्रि को हलका खाना, पेट, मुख, मलद्वार की सफ़ाई, ईश-प्रार्थना, सुगन्धित पौधे, बत्तियां –नीम, कपूर. लोबान आदि जलाना ताकि कीटाणु की रोकथाम हो।
शल्योपरान्त कर्म -- रोगी को छोडने से पूर्व ईश-प्रार्थना, पुल्टिस लगाकर घाव को पट्टी करना, प्रतिदिन नियमित रूप से पट्टी बदलना जब तक घाव भर न जाय, अधिक दर्द होने पर गुनुगुने घी में भीगा कपडा घाव पर रखा जाता था।
सुश्रुत के समय प्रयुक्त शल्य-क्रिया के यन्त्र व शस्त्र -- (Instuments & Equppements) -- कुल १२५ औज़ारों का सुश्रुत ने वर्णन किया है-- (देखिये संलग्न- चित्र-१,२,३)
(अ) -- यन्त्र -- (अप्लायन्स) -- १०५ -- स्वास्तिक (फ़ोर्सेप्स)२४ प्रकार; सन्डसीज़ (टोन्ग्स)-दो प्रकार; ताल यन्त्र (एकस्ट्रेक्सन फ़ोर्सेप्स)-दो प्रकार; नाडी यन्त्र(केथेटर आदि)-२० प्रकार; शलाक्य (बूझी आदि)-३० प्रकार; उपयन्त्र –मरहम पट्टी आदि का सामान;--कुल १०४ यन्त्र; १०५ वां यन्त्र शल्यक का हाथ।
(ब) -- शस्त्र- (इन्सट्रूमेन्ट्स) -- २० -- चित्रानुसार।
इन्स्ट्रूमेन्ट्स सभी परिष्क्रत लोह (स्टील के बने होते थे। किनारे तेज, धार-युक्त होते थे , वे लकडी के बक्से में ,अलग-अलग भाग बनाकर सुरक्षित रखे जाते थे।
अनुशस्त्र -- (सब्स्टीच्यूड शस्त्र) -- बम्बू, क्रस्टल ग्लास, कोटरी, नेल, हेयर, उन्गली आदि भी घाव खोलने में प्रयुक्त करते थे।
निश्चेतना (एनास्थीसिया) -- बेहोशी के लिये सम्मोहिनी नामक औषधियां व बेहोशी दूर करने के लिये संजीवनी नामक औषधियां प्रयोग की जाती थीं।
शमन- औषधि द्वारा चिकित्सा,
इसकी परिधि बहुत व्याप्त थी। आठ
प्रकार की चिकित्साएं बताई गई हैं।
(१) काय चिकित्सा-सामान्य चिकित्सा
(२) कौमार भृत्यम्-बालरोग चिकित्सा
(३) भूत विद्या- मनोरोग चिकित्सा
(४) शालाक्य तंत्र- उर्ध्वांग अर्थात् नाक,
कान, गला आदि की चिकित्सा
(५) शल्य तंत्र-शल्य चिकित्सा
(६) अगद तंत्र-विष चिकित्सा
(७) रसायन-रसायन चिकित्सा
(८) बाजीकरण-पुरुषत्व वर्धन
औषधियां:- चरक ने कहा, जो जहां रहता है,
उसी के आसपास प्रकृति नेरोगों की औषधियां दे रखी हैं। अत: वे अपनेआसपास के पौधों,
वनस्पतियों का निरीक्षण व प्रयोग करनेका आग्रह करते थे। एक समय विश्व के अनेक
आचार्य एकत्रित हुए, विचार-विमर्श हुआऔर उसकी फलश्रुति आगे चलकर ‘चरक
संहिता‘ के रूप में सामने आई। इस संहिता मेंऔषधि की दृष्टि से ३४१ वनस्पतिजन्य,१७७ प्राणिजन्य, ६४ खनिज द्रव्यों का उल्लेख है। इसी प्रकार सुश्रुतसंहिता में ३८५ वनस्पतिजन्य, ५७प्राणिजन्य तथा ६४ खनिज द्रव्यों से
औषधीय प्रयोग व विधियों का वर्णन है।इनसे चूर्ण, आसव, काढ़ा, अवलेह आदि अनेक में
रूपों औषधियां तैयार होती थीं। इससे पूर्वकाल में भी ग्रंथों में कुछ अद्भुत
औषधियों का वर्णन मिलता है। जैसेबाल्मीकी रामायण में राम-रावण युद्ध केसमय जब लक्ष्मण पर प्राणांतक आघात हुआ
और वे मूर्छित हो गए, उस समय इलाज हेतुजामवन्त ने हनुमान जी के पास हिमालय में
प्राप्त होने वाली चार दुर्लभ औषधियों का वर्णन किया।मृत संजीवनी चैव विशल्यकरणीमपि।
सुवर्णकरणीं चैव सन्धानी च महौषधीम्॥युद्धकाण्ड ७४-३३
(१) विशल्यकरणी-शरीर में घुसे अस्त्रनिकालने वाली
(२) सन्धानी- घाव भरने वाली
(३) सुवर्णकरणी-त्वचा का रंग ठीक रखने वाली
(४) मृतसंजीवनी-पुनर्जीवन देने वाली चरक के बाद बौद्धकाल में नागार्जुन,
वाग्भट्ट आदि अनेक लोगों के प्रयत्न से रस शास्त्र विकसित हुआ। इसमें पारे को शुद्ध
कर उसका औषधीय उपयोग अत्यंत परिणामकारक रहा। इसके अतिरिक्त
धातुओं, यथा-लौह, ताम्र, स्वर्ण, रजत, जस्त को विविध रसों में डालना और गरम करना-
इस प्रक्रिया से उन्हें भस्म में परिवर्तित करने की विद्या विकसित हुई। यह भस्म और पादपजन्य औषधियां भी रोग निदान में
काम आती हैं।
शल्य चिकित्सा- कुछ वर्षों पूर्व इंग्लैण्ड के शल्य चिकित्सकों के विश्व प्रसिद्ध संगठन
ने एक कैलेण्डर निकाला, उसमें विश्व के अब तक के श्रेष्ठ शल्य चिकित्सकों (सर्जन) के
चित्र दिए गए थे। उसमें पहला चित्र आचार्य सुश्रुत का था तथा उन्हें विश्व का पहला शल्य चिकित्सक
बताया गया था।
वैसे भारतीय परम्परा में शल्य चिकित्सा का इतिहास बहुत प्राचीन है।
भारतीय चिकित्सा के देवता धन्वंतरि को शल्य
क्रिया का भी जनक माना जाता है।
प्राचीनकाल में इस क्षेत्र में हमारे देश के चिकित्सकों ने अच्छी प्रगति की थी। अनेक
ग्रंथ रचे गए। ऐसे ग्रंथों के रचनाकारों में सुश्रुत, पुष्कलावत, गोपरक्षित, भोज,
विदेह, निमि, कंकायन, गार्ग्य, गालव, जीवक, पर्वतक, हिरण्याक्ष, कश्यप आदि के
नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।
इन रचनाकारों के अलावा अनेक प्राचीन ग्रंथों से इस क्षेत्र में
भारतीयों की प्रगति का ज्ञान होता है। ऋग्वेद तथा अथर्ववेद में दिल, पेट
तथा वृक्कों के विकारों का विवरण है। इसी तरह शरीर में नवद्वारों तथा दस
छिद्रों का विवरण दिया गया है।
वैदिक काल के शल्य चिकित्सक मस्तिष्क की शल्य क्रिया में निपुण थे। ऋग्वेद (८-८६-२) के
अनुसार जब विमना और विश्वक ऋषि उद्भ्रान्त हो गए थे, तब शल्य
क्रिया द्वारा उनका रोग दूरकिया गया। इसी ग्रंथ में नार्षद ऋषि का भी विवरण है।
जब वे पूर्ण रूप से बधिर हो गए तब अश्विनी कुमारों ने उपचार करके उनकी श्रवण शक्ति वापस
लौटा दी थी। नेत्र जैसे कोमल अंग की चिकित्सा तत्कालीन चिकित्सक कुशलता से कर लेते थे।
ऋग्वेद (१-११६-११) में शल्य क्रिया द्वारा वन्दन ऋषि की ज्योति वापस लाने का उल्लेख
मिलता है।
हमारे पुराणों में भी शल्य क्रिया के बारे में पर्याप्त जानकारी दी गई। ‘शिव पुराण‘के अनुसार
जब शिव जी ने दक्ष का सर काट दिया थाn तब अश्विनी कुमारों ने उनको नया सर लगाया था। इसी तरह गणेश
जी का मस्तक कट जाने पर उनके धड़ पर हाथी का सर जोड़ा गया था।
रामायण‘ तथा ‘महाभारत‘ में भी ऐसे कुछ उदाहरण मिलते हैं। ‘रामायण‘ में एक स्थान पर कहा है कि ‘याजमाने स्वके नेत्रे उद्धृत्याविमना ददौ।‘ अर्थात् आवश्यकता पड़ने पर एक मनुष्य की आंख
निकालकर दूसरे को लगा दी जाती थी।
सुश्रुत द्वारा वर्णित शल्य क्रियाओं के नाम इस प्रकार हैं
१) छेद्य (छेदन हेतु) (२) भेद्य (भेदन हेतु) (३) लेख्य (अलग करने हेतु) (४) वेध्य
(शरीर में हानिकारक द्रव्य निकालने के लिए) (५) ऐष्य (नाड़ी में घाव ढूंढने के लिए)
(६) अहार्य (हानिकारक उत्पत्तियों को निकालने के लिए) (७)विश्रव्य (द्रव निकालने के लिए)
(८) सीव्य (घाव सिलने के लिए)
सुश्रुत संहिता में शस्त्र क्रियाओं के लिए आवश्यक यंत्रों (साधनों) तथा शस्त्रों (उपकरणों) का भी विस्तार से
वर्णन किया गया है। आजकल की शल्यक्रिया में ‘फौरसेप्स‘ तथा ‘संदस‘ यंत्र
फौरसेप्स तथा टोंग से मिलते-जुलते हैं।
सुश्रुत के महान ग्रन्थ में २४ प्रकार के स्वास्तिकों, २ प्रकार के संदसों, २८
प्रकार की शलाकाओं तथा २० प्रकार की नाड़ियों (नलिका) का उल्लेख हुआ है।
इनके अतिरिक्त शरीर के प्रत्येक अंग की शस्त्र-क्रिया के लिए बीस प्रकार के
शस्त्रों (उपकरणों) का भी वर्णन किया गया है। पूर्व में जिन आठ प्रकार
की शल्य क्रियाओं का संदर्भ आया है, वे विभिन्न साधनों व उपकरणों से
की जाती थीं। उपकरणों (शस्त्रों) के नाम इस प्रकार हैं-
अर्द्धआधार, अतिमुख, अरा, बदिशा, दंत
शंकु, एषणी, कर-पत्र, कृतारिका,
कुथारिका, कुश-पात्र, मण्डलाग्र,
मुद्रिका, नख शस्त्र, शरारिमुख, सूचि,
त्रिकुर्चकर, उत्पल पत्र, वृध-पत्र, वृहिमुख
तथा वेतस-पत्र।
आज से कम से कम तीन हजार वर्ष पूर्व सुश्रुत ने सर्वोत्कृष्ट इस्पात के उपकरण
बनाये जाने की आवश्यकता बताई। आचार्य ने इस पर भी बल दिया है कि उपकरण तेज
धार वाले हों तथा इतने पैने कि उनसे बाल को भी दो हिस्सों में काटा जा सके।
शल्यक्रिया से पहले व बाद में वातावरण व उपकरणों की शुद्धता (रोग-
प्रतिरोधी वातावरण) पर सुश्रुत ने इतना जोर दिया है तथा इसके लिए ऐसे
साधनों का वर्णन किया है कि आज के शल्य चिकित्सक भी दंग रह जाएं। शल्य
चिकित्सा (सर्जरी) से पहले रोगी को संज्ञा-शून्य करने (एनेस्थेशिया)
की विधि व इसकी आवश्यकता भी बताई गई है। ‘भोज प्रबंध‘ (९२७ ईस्वी) में
बताया गया है कि राजा भोज को कपाल की शल्य-क्रिया के पूर्व ‘सम्मोहिनी‘
नामक चूर्ण सुंघाकर अचेत किया गया था।
चौदह प्रकार की पट्टियां- इन उपकरणों के साथ ही आवश्यकता पड़ने पर
बांस, स्फटिक तथा कुछ विशेष प्रकार के प्रस्तर खण्डों का उपयोग भी शल्य
क्रिया में किया जाता था। शल्य क्रिया के मर्मज्ञ महर्षि सुश्रुत ने १४
प्रकार की पट्टियों का विवरण किया है। उन्होंने हड्डियों के खिसकने के छह
प्रकारों तथा अस्थि-भंग के १२ प्रकारों की विवेचना की है। यही नहीं,
उनके ग्रंथ में कान संबंधी बीमारियों के २८ प्रकार तथा नेत्र-रोगों के २६ प्रकार
बताए गए हैं।
सुश्रुत संहिता में मनुष्य की आंतों में कर्कट रोग (कैंसर) के कारण उत्पन्न हानिकर
तन्तुओं (टिश्युओं) को शल्य क्रिया से हटा देने का विवरण है।
शल्यक्रिया द्वारा शिशु-जन्म (सीजेरियन) की विधियों का वर्णन किया गया है।
‘न्यूरो-सर्जरी‘ अर्थात् रोग-मुक्ति के लिए नाड़ियों पर शल्य-क्रिया का उल्लेख है
तथा आधुनिक काल की सर्वाधिक पेचीदी क्रिया ‘प्लास्टिक सर्जरी‘
का सविस्तार वर्णन सुश्रुत के ग्रन्थ में है। आधुनिकतम विधियों का भी उल्लेख इसमें है।
कई विधियां तो ऐसी भी हैं जिनके सम्बंध में आज का चिकित्सा शास्त्र भी अनभिज्ञ है।
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि प्राचीन भारत में शल्य क्रिया अत्यंत उन्नत अवस्था में थी, जबकि शेष विश्व इस विद्या से बिल्कुल अनभिज्ञ था।
``जय सनातन´´
``जय भारत´´

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कामेंट्स

Prakash Sep 10, 2018
In kannada language required

+478 प्रतिक्रिया 48 कॉमेंट्स • 176 शेयर
Swami Lokeshanand Jul 16, 2019

हनुमानजी ने रात में लंका में प्रवेश किया, वह भी मच्छर बन कर। भक्ति को पाना है तो छोटे बनकर जाओ, कोई देखे न, इसीलिए रात को, प्रदर्शन मत करो, निराभिमानी होकर रहो। लंकिनी मिली "सो कह चलेसि मोहि निंदरी" मेरी उपेक्षा? यही राक्षसी स्वभाव है, संत कितना ही छोटा बनकर क्यों न चले, वे लोग सरल को मूर्ख, सहज को मजबूर और विनम्र को कायर समझते हैं। लंकिनी बोली, मैं चोरों को खाती हूँ। हनुमानजी ने एक मुक्का मार दिया। लोगों ने पूछा कि वह तो अपना काम ही कर रही थी, आपने बिना बात के उसे मुक्का क्यों मार दिया? देखो, हनुमानजी ने उसे झूठ बोलने का दंड दिया। कि तूं चोरों को नहीं खाती, तूं तो भक्तों को खाना चाहती है। अगर तूं चोरों को खाती, तो रावण जब सीताजी को चुरा कर आ रहा था, तब तूं रावण को क्यों नहीं खा गई? ध्यान दें, अविद्या ही लंकिनी है, यही शरीर रूपी लंका की चौकीदारी करती है। मुक्का बाहर निकलती इन्द्रियों को समेट कर अंतर्मुखी कर लेने का संकेत है। बहिर्मुखी मनुष्य अविद्या का पार नहीं पा सकता। इन्द्रियाँ संयमित हुईं कि अविद्या का प्रभाव समाप्त हुआ, विद्या के क्षेत्र में प्रवेश मिला, आवरण हटा, जो अविद्या रास्ता रोक रही थी, वही विद्या होकर लंका का ग्यान देने लगी। संतसंग हुआ तो सत्संग मिला, सत्संग से लंकिनी को अपवर्ग सुख से भी अधिक सुख मिला। अ-पवर्ग, जिसमें "प फ ब भ म" ना हो, पाप, फंदा, वासना, भ्रम-भय, मोह-ममता-मद-मत्सर न हो, माने मोक्ष के सुख से भी, क्षणभर के सत्संग का सुख अधिक है। जो सुख रामकथा में है वह कैवल्य में भी नहीं है। और भी, संत सजा देकर सज़ा देता है, वह मारता नहीं, सुधारता है। किसी को मिटाना संत का उद्देश्य नहीं, उसके भीतर की बुराई मिटा देना उद्देश्य है। हनुमानजी भी बुरे के नहीं, बुराई के विरोधी हैं। अब विडियो देखें- लंकिनी प्रसंग- https://youtu.be/rngZoXyopLU

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gopal Krishna Jul 16, 2019

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Basanta Kumar Sahu Jul 16, 2019

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*गुरुपूर्णिमा 16 जुलाई* अवश्य पढ़ें "गुरु गूंगे गुरू बावरे गुरू के रहिये दास " एक बार की बात है नारद जी विष्णु भगवानजी से मिलने गए ! भगवान ने उनका बहुत सम्मान किया ! जब नारद जी वापिस गए तो विष्णुजी ने कहा हे लक्ष्मी जिस स्थान पर नारद जी बैठे थे ! उस स्थान को गाय के गोबर से लीप दो ! जब विष्णुजी यह बात कह रहे थे तब नारदजी बाहर ही खड़े थे ! उन्होंने सब सुन लिया और वापिस आ गए और विष्णु भगवान जी से पुछा हे भगवान जब मै आया तो आपने मेरा खूब सम्मान किया पर जब मै जा रहा था तो आपने लक्ष्मी जी से यह क्यों कहा कि जिस स्थान पर नारद बैठा था उस स्थान को गोबर से लीप दो ! *भगवान ने कहा हे नारद मैंने आपका सम्मान इसलिए किया क्योंकि आप देव ऋषि है और मैंने देवी लक्ष्मी से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि आपका कोई गुरु नहीं है ! आप निगुरे है ! जिस स्थान पर कोई निगुरा बैठ जाता है वो स्थान गन्दा हो जाता है !* यह सुनकर नारद जी ने कहा हे भगवान आपकी बात सत्य है पर मै गुरु किसे बनाऊ ! नारायण! बोले हे नारद धरती पर चले जाओ जो व्यक्ति सबसे पहले मिले उसे अपना गुरु मानलो ! नारद जी ने प्रणाम किया और चले गए ! जब नारद जी धरती पर आये तो उन्हें सबसे पहले एक मछली पकड़ने वाला एक मछुवारा मिला ! नारद जी वापिस नारायण के पास चले गए और कहा महाराज वो मछुवारा तो कुछ भी नहीं जानता मै उसे गुरु कैसे मान सकता हूँ ? यह सुनकर भगवान ने कहा नारद जी अपना प्रण पूरा करो ! नारद जी वापिस आये और उस मछुवारे से कहा मेरे गुरु बन जाओ ! पहले तो मछुवारा नहीं माना बाद में बहुत मनाने से मान गया ! मछुवारे को राजी करने के बाद नारद जी वापीस भगवान के पास गए और कहा हे भगवान! मेरे गुरूजी को तो कुछ भी नहीं आता वे मुझे क्या सिखायेगे ! यह सुनकर विष्णु जी को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा हे नारद गुरु निंदा करते हो जाओ मै आपको श्राप देता हूँ कि आपको 84 लाख योनियों में घूमना पड़ेगा ! यह सुनकर नारद जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा हे भगवान! इस श्राप से बचने का उपाय भी बता दीजिये !भगवान नारायण ने कहा इसका उपाय जाकर अपने गुरुदेव से पूछो ! नारद जी ने सारी बात जाकर गुरुदेव को बताई ! गुरूजी ने कहा ऐसा करना भगवान से कहना 84 लाख योनियों की तस्वीरे धरती पर बना दे फिर उस पर लेट कर गोल घूम लेना और विष्णु जी से कहना 84 लाख योनियों में घूम आया मुझे माफ़ करदो आगे से गुरु निंदा नहीं करूँगा ! नारद जी ने विष्णु जी के पास जाकर ऐसा ही किया उनसे कहा 84 लाख योनिया धरती पर बना दो और फिर उन पर लेट कर घूम लिए और कहा नारायण मुझे माफ़ कर दीजिये आगे से कभी गुरु निंदा नहीं करूँगा ! यह सुनकर विष्णु जी ने कहा देखा जिस गुरु की निंदा कर रहे थे उसी ने मेरे श्राप से बचा लिया !नारदजी गुरु की महिमा अपरम्पार है ! गुरु गूंगे गुरु बाबरे गुरु के रहिये दास, गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस ! गुरु चाहे गूंगा हो चाहे गुरु बाबरा हो (पागल हो) गुरु के हमेशा दास रहना चाहिए ! गुरु यदि नरक को भेजे तब भी शिष्य को यह इच्छा रखनी चाहिए कि मुझे स्वर्ग प्राप्त होगा ,अर्थात इसमें मेरा कल्याण ही होगा! यदि शिष्य को गुरु पर पूर्ण विश्वास हो तो उसका बुरा "स्वयं गुरु" भी नहीं कर सकते ! गुरु पर तो वचन विश्वास रखने वाले का उद्धार निश्चित है। *🌹जय सच्चिदानंद जी* 🌹

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Vijay Yadav Jul 16, 2019

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MasterJi Jul 16, 2019

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ताली विन ताला 🔐 ना खुले, गुरू विन मिले ना ज्ञान,,, ज्ञान विना नहीं मुक्ति हैं, कहे वेद पुराण,,, “गुरु कृपा चार प्रकार से होती है ।” ०१ स्मरण से ०२ दृष्टि से ०३ शब्द से ०४ स्पर्श से ०१ जैसे कछुवी रेत के भीतर अंडा देती है पर खुद पानी के भीतर रहती हुई उस अंडे को याद करती रहती है तो उसके स्मरण से अंडा पक जाता है । ऐसे ही गुरु की याद करने मात्र से शिष्य को ज्ञान हो जाता है । यह है स्मरण दीक्षा ।। ०२ दूसरा जैसे मछली जल में अपने अंडे को थोड़ी थोड़ी देर में देखती रहती है तो देखने मात्र से अंडा पक जाता है । ऐसे ही गुरु की कृपा दृष्टि से शिष्य को ज्ञान हो जाता है । यह दृष्टि दीक्षा है ।। ०३ तीसरा जैसे कुररी पृथ्वी पर अंडा देती है , और आकाश में शब्द करती हुई घूमती है तो उसके शब्द से अंडा पक जाता है । ऐसे ही गुरु अपने शब्दों से शिष्य को ज्ञान करा देता है । यह शब्द दीक्षा है ।। ०४ चौथा जैसे मयूरी अपने अंडे पर बैठी रहती है तो उसके स्पर्श से अंडा पक जाता है । ऐसे ही गुरु के हाथ के स्पर्श से शिष्य को ज्ञान हो जाता है । यह स्पर्श दीक्षा है।। हर हर महादेव जय शिव शंकर

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