🙏🙏🙏" तिनके का रहस्य " -🙏🙏🙏

🙏🙏🙏" तिनके का रहस्य " -🙏🙏🙏

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राक्षस रावण जब माता सीता का हरण करके लंका ले गया, तब लंका मे सीता जी अशोक वृक्ष के नीचे बैठ कर चिंतन करने लगी, लंकेश बार बार आकर माता सीता को धमकाता था !
लेकिन सीता जी कुछ नहीं बोलती थी,यहाँ तक की रावण ने श्री राम का वेश धारण कर सीता जी को
भ्रमित करने का प्रयास किया था ! लेकिन फिर भी सफल नहीं हुआ, रावण थक हार कर जब अपने शयन कक्ष मे गया तो मंदोदरी बोली आप तो राम का वेश धर कर गए थे फिर क्या हुआ ?
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रावण बोला जब मैं राम का रूप लेकर सीता के समक्ष गया तो मुझे सीता नजर ही नहीं आ रही थी ! मेरे विचार पूर्ण रूप से सात्विक हो गए ! ऐसे समय में सभी बहन , बेटिया एवं माता के रूप में ही दिखती है !
रावण अपनी बुद्धि से सीता जी को लुभाने के सारे प्रयास कर चुका था लेकिन जगत
जननी माँ के दिल को नहीं जीत सका था !
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रावण एक बार फिर आया और बोला मैं तुमसे सीधे सीधे संवाद करता हूँ लेकिन तुम कैसी नारी
हो की मेरे आते ही घास का तिनका उठाकर उसे ही घूर घूर कर देखने लगती हो,
क्या घास का तिनका तुम्हें राम से भी ज्यादा प्यारा है ? रावण के इस प्रश्न को सुनकर माँ सीता जी बिलकुल चुप हो गयी,और आँख से आसुओं की धार बह पड़ी !
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जब श्री राम जी का विवाह सीता जी के साथ हुआ, तब सीता जी का बड़े आदर सत्कार के साथ गृह प्रवेश भी हुआ बहुत उत्सव मनाया गया, जैसे की एक प्रथा है की नव वधू जब ससुराल आती है तो उस नववधू के हाथ से कुछ मीठा पकवान बनवाया जाता है,ताकि जीवन भर घर में सम्बन्धो में मिठास बनी रहे !
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इसलिए माँ सीता जी ने उस दिन अपने हाथो से घर पर खीर बनाई और समस्त परिवार राजा दशरथ सहित चारो भ्राता और ऋषि संत भी भोजन पर आमंत्रित थे ! माँ सीता ने सभी को खीर परोसना शुरू किया, और भोजन शुरू होने ही वाला था की ज़ोर से एक हवा का झोका आया सभी ने अपनी अपनी पत्तल सम्हाली !
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सीता जी देख रही थी, ठीक उसी समय राजा दशरथ जी की खीर पर एक छोटा सा घास का तिनका गिर गया, माँ सीता जी ने उस तिनके को देख लिया, लेकिन अब खीर मे बिना हाथ डालें कैसे उस तिनके को निकाले !
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यह छोटी सी घटना माता सीता को परेशान करने लगी ! वे नहीं चाहती थी की उस तिनके से राजा दशरथ को किसी प्रकार की हानि हो अथवा स्वाद में अंतर लगे !
तब जगत जननी माता सीता जी ने अपनी दिव्य शक्तियों का आव्हान कर दूर से ही उस तिनके को घूर कर जो देखा, तो वो तिनका जल कर राख की छोटी बिंदु बनकर रह गया !
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लेकिन राजा दशरथ माँ सीता जी का यह भव्य रूप देख चुके थे , परन्तु वे चुप रहे और अपने कक्ष मे जाकर माँ सीता जी को बुलवाया ! तब राजा दशरथ बोले मैंने आज भोजन के समय आपका भव्य रूप देख लिया था !
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आप साक्षात जगत जननी का दूसरा रूप हैं,लेकिन एक बात आप मेरी जरूर याद रखना
आपने जिस दृष्टि से आज उस तिनके को देखा था उस दृष्टि ( मारक दृष्टि ) से आप अपने शत्रु को भी मत देखना !
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इसीलिए माँ सीता जी के सामने जब भी रावण आता था तो वो उस घास के तिनके को
उठाकर राजा दशरथ जी की बात याद कर लेती थी यानि अपनी मारक दृष्टि से रावण को माता जगत जननी नहीं देखती थी !
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यही है उस तिनके का रहस्य !
मात सीता जी चाहती तो रावण को उसी जगह पर ही राख़ कर सकती थी लेकिन राजा दशरथ जी को दिये वचन के परिणाम स्वरुप वे शांत रही !

🙏🏻🙏🏻💐जय श्री राम, जय जगत जननी माता सीता 💐🙏🏻🙏🏻
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🙏🙏🙏🌹🌹🚩 संकटमोचन 🚩🌹🌹🙏🙏🙏

बाल समय रबि भक्षि लियो तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो,
ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो।
देवन आनि करी बिनती तब छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो,
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥
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भावार्थ : हे हनुमान जी! आप जब बालक थे तब आपने सूर्य को निगल लिया था तब तीनो लोकों में अन्धकार छा जाने के कारण संसार विपत्ति में आ गया, इस संकट को कोई भी दूर नही कर सका। जब देवताओं ने आकर आपसे जब प्रार्थना की तब आपने सूर्य को मुक्त करके संकट दूर किया था, हे कपीश्वर! संसार में ऎसा कौन है जो आपको "संकटमोचन" नाम से नहीं जानता है

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कामेंट्स

Jaipal Dutt Sharma Sep 8, 2018
श्री राम राम रामेति, रमे रामे मनोरमे सहस्त्रनाम तत्तुल्यं, श्री राम नाम वरानने ।।

susheel Sep 8, 2018
जय श्री राम

MAMTA Kapoor Apr 20, 2019

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Amit Kumar sager Apr 20, 2019

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हनुमान जी के जन्मोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं दर्शन करिए हनुमान जी के हनुमान टिल्ला शामली से दोहा श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि । बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ।। बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार । बल बुधि बिद्या देहु मोहि, हरहु कलेस विकार ।। चौपाई जय हनुमान ज्ञान गुन सागर । जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ।। राम दूत अतुलित बल धामा । अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा ।। महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ।। कचन बरन बिराज सुबेसा । कानन कुंडल कुंचित केसा ।। हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै । काँधे मूँज जनेऊ साजै ।। संकर सुवन केसरीनंदन । तेज प्रताप महा जग बंदन ।। बिद्यावान गुनी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुरा ।। प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया । राम लषन सीता मन बसिया ।। सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा । बिकट रूप धरि लंक जरावा ।। भीम रूप धरि असुर सँहारे । रामचन्द्र के काज सँवारे ।। लाय सजीवन लखन जियाये । श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ।। रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई । तुम मम प्रिय भरतहि सैम भाई ।। सहस बदन तुम्हरो जस गावैं । अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं ।। सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा । नारद सारद सहित अहीसा ।। जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते । कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ।। तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा । राम मिलाय राज पद दीन्हा ।। तुम्हरो मन्त्र बिभीषन माना । लंकेस्वर भए सब जग जाना ।। जुग सहस्त्र जोजन यर भानू । लील्यो ताहि मधुर फल जानू ।। प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं । जलधि लाँघि गये अचरज नाहीँ ।। दुर्गम काज जगत के जेते । सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ।। राम दुआरे तुम रखवारे । होत न आज्ञा बिनु पैसारे ।। सब सुख लहै तुम्हारी सरना । तुम रच्छक काहू को डर ना ।। आयन तेज सम्हारो आपै । तीनों लोक हाँक तें काँपै ।। भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै ।। नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरंतर हनुमत बीरा ।। संकट तें हनुमान छुड़ावैं । मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ।। सब पर राम तपस्वी राजा । तिन के काज सकल तुम साजा ।। और मनोरथ जो कोई लावै । सोइ अमित जीवन फल पावै ।। चारों जुग परताप तुम्हारा । है परसिद्ध जात उजियारा ।। साधु संत के तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ।। अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता ।। राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ।। तुम्हरे भजन राम को पावै । जनम जनम के दुख बिसरावै ।। अंत काल रघुबर पुर जाई । जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई ।। और देवता चित्त न धरई । हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ।। संकट कटै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ।। जै जै जै हनुमान गोसाईं । कृपा करहु गुरु देव की नाईं ।। जो सत पार पाठ कर कोई । छूटहि बंदि महा सुख होई ।। जो यह पढ़ै हनुमान चलीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ।। तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ।। दोहा पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप । राम लषन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ।।

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Swamini Apr 19, 2019

*श्री हनुमान चालिसा पाठ* 🌹🍃🌹🍃🌹🍃🌹 *श्रीगुरु चरन सरोज रज, निजज मनु मुकुरु सुधारि।* *बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।* *बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।* *बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।* *चौपाई :* *जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।* *जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।* *रामदूत अतुलित बल धामा।* *अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।* *महाबीर बिक्रम बजरंगी।* *कुमति निवार सुमति के संगी।।* *कंचन बरन बिराज सुबेसा।* *कानन कुंडल कुंचित केसा।।* *हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।* *कांधे मूंज जनेऊ साजै।* *संकर सुवन केसरीनंदन।* *तेज प्रताप महा जग बन्दन।।* *विद्यावान गुनी अति चातुर।* *राम काज करिबे को आतुर।।* *प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।* *राम लखन सीता मन बसिया।।* *सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।* *बिकट रूप धरि लंक जरावा।।* *भीम रूप धरि असुर संहारे।* *रामचंद्र के काज संवारे।।* *लाय सजीवन लखन जियाये।* *श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।* *रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।* *तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।* *सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।* *अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।* *सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।* *नारद सारद सहित अहीसा।।* *जम कुबेर दिगपाल जहां ते।* *कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।* *तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।* *राम मिलाय राज पद दीन्हा।।* *तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।* *लंकेस्वर भए सब जग जाना।।* *जुग सहस्र जोजन पर भानू।* *लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।* *प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।* *जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।* *दुर्गम काज जगत के जेते।* *सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।* *राम दुआरे तुम रखवारे।* *होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।* *सब सुख लहै तुम्हारी सरना।* *तुम रक्षक काहू को डर ना।।* *आपन तेज सम्हारो आपै।* *तीनों लोक हांक तें कांपै।।* *भूत पिसाच निकट नहिं आवै।* *महाबीर जब नाम सुनावै।।* *नासै रोग हरै सब पीरा।* *जपत निरंतर हनुमत बीरा।।* *संकट तें हनुमान छुड़ावै।* *मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।* *सब पर राम तपस्वी राजा।* *तिन के काज सकल तुम साजा।* *और मनोरथ जो कोई लावै।* *सोइ अमित जीवन फल पावै।।* *चारों जुग परताप तुम्हारा।* *है परसिद्ध जगत उजियारा।।* *साधु-संत के तुम रखवारे।* *असुर निकंदन राम दुलारे।।* *अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।* *अस बर दीन जानकी माता।।* *राम रसायन तुम्हरे पासा।* *सदा रहो रघुपति के दासा।।* *तुम्हरे भजन राम को पावै।* *जनम-जनम के दुख बिसरावै।।* *अन्तकाल रघुबर पुर जाई।* *जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।।* *और देवता चित्त न धरई।* *हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।* *संकट कटै मिटै सब पीरा।* *जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।* *जै जै जै हनुमान गोसाईं।* *कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।* *जो सत बार पाठ कर कोई।* *छूटहि बंदि महा सुख होई।।* *जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।* *होय सिद्धि साखी गौरीसा।।* *तुलसीदास सदा हरि चेरा।* *कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।।* *दोहा :* *पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।* *राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।* 🌹🍃🌹🍃🌹🍃🌹 *जय श्री राम जय हनुमान...*

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ASHOK KUMAR Apr 20, 2019

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Champatlal mali Apr 20, 2019

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Kaushik Vishwakarma Apr 19, 2019

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