https://youtu.be/Vh2eHuYlOH0

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HANSRAJYADAVHANS May 15, 2021

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☀️ जीवन में सुख चाहिए ☀️ 🔷 एक व्यक्ति था. उसके पास नौकरी, घर-परिवार, रुपया-पैसा, रिश्तेदार और बच्चे सभी कुछ था। कहने का सार यह है उस व्यक्ति के पास किसी चीज़ की कोई कमी नही थी। अब जीवन है तो कुछ परेशानियां भी थी उसके जीवन में, जिससे हर पल वह जूझता ही रहता था। वह किसी भी तरह अपनी परेशानियों से मुक्ति चाहता था, कि जीवन में सुख-शांति से रह सके। 🔶 एक बार किसी ने उसे बताया की नगर सीमा पर कोई बहुत बड़े संत ठहरे हुए है, जिनके पास हर समस्या और प्रश्न का हल है। इतना सुनते ही वह व्यक्ति भागा-भागा संत की कुटिया में पहुँचा. वहाँ भीड़ बहुत होने के कारण उसकी बारी आते-आते रात हो गई। उसने संत से पूछा, बाबा, मेरे जीवन की परेशानियां कैसे ख़त्म होगी? मैं भी सुख-शांति से जीवन जीना चाहता हूँ। 🔷 संत ने कहा, ”इसका उत्तर मैं कल सुबह दूंगा। तब तक तुम एक काम करो. मेरे साथ जो ऊँटों का रखवाला आया था वो बीमार हो गया। तुम आज की रात ऊँटों की देखभाल का जिम्मा ले लो. जब यह सभी ऊँट सो जायें, तब तुम भी सो लेना। 🔶 सुबह वह व्यक्ति संत के पास पहुँचा और कहने लगा, मैं तो रात भर जगा रहा, सो ही नही पाया. कभी कोई ऊँट खड़ा हो जाता है तो कभी कोई. एक को बिठाने का प्रयास करता हूँ तो दूसरा खड़ा हो जाता है। कई ऊँट तो बैठना ही नही चाहते तो कई ऊँट थोड़ी देर में अपने आप बैठ जाते है। कुछ ऊँटों ने तो बैठने में बहुत ही समय लिया। मैं तो सारी रात भाग-दौड़ ही करता रहा। 🔷 संत ने मुस्कुराहट के साथ कहा, यही तुम्हारे कल के प्रश्नों का उत्तर है. कल पूरी रात का घटनाक्रम तुम्हारा जीवन है। अगर ऊँटों को परेशानियां मान ली जायें, तो समझना आसान होगा कि जीवन में कभी भी किसी भी क्षण सारी परेशानियां ख़त्म नही हो सकती। कुछ ना कुछ हमेशा लगा ही रहेगा. लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नही है कि हम जीवन का आनंद ही ना ले। हमें समस्याओं के बीच रहते हुए भी सुख के पल खोजने होंगे। 🔶 संत ने आगे कहा, अगर तुम्हारें जीवन में समस्याओं का ताँता लगा हुआ है तो उन्हें सुलझाने का प्रयास करना चाहिए, लेकिन हर पल उनके पीछे ही नही भागना चाहिए. ऊँटों के व्यवहार से तुम जान गये होंगे कि कुछ समस्याएं कोशिशों से ख़त्म हो जाती है, तो कुछ अपने आप सुलझ जाती है, कुछ पे कोई असर नही होगा और कुछ समय के साथ धीरे-धीरे सुलझ जाएंगी। 🔷 लेकिन इस बीच कुछ नई समस्याएं भी जन्म लेगी, जिनका सामना भी ऐसे ही करना पड़ेगा और इस तरह जीवन चलता ही रहेगा। अब यह तुम पर निर्भर करता है कि तुम इस बीच जीवन में आनंद लेते हो या समस्याओं के पीछे हैरान-परेशान व दुखी होकर भागते रहते हो।🌹🙏

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सुनील May 15, 2021

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siddhidatri jaya May 15, 2021

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ज्ञानयोग, कर्मयेाग व भक्तियोग ये तीनों साधन रूप हैं, प्रायः लोगों के मन में प्रश्न उठता है---- हमारे लिए कौन सा योग उत्तम है? निर्विण्णानां ज्ञानयोगो न्यासिनामिह कर्मसु।। जिनको विषयों से शुद्ध वैराग्य हो गया है उनका अधिकार ज्ञानयोग में है। उनको अन्य कर्मों में फँसना छोड़कर विचार करना चाहिए। सच्चे वैराग्य का उदय होने पर व्यक्ति स्वतः ही ज्ञान मार्ग में प्रवृत्त हो जाएगा, इसके लिए उसे कुछ और करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। प्रबल वैराग्य निश्चय ही तीव्र जिज्ञासा को जन्म देता है---- "तेष्वनिर्विण्णचित्तानां कर्मयोगस्तु कामिनाम्" परन्तु जिन्हें अभी विषयों से वैराग्य नहीं हुआ है, घर छोड़ने का साहस नहीं है, भय लगता है और यही विचार आता रहता है कि मैं जाऊँ तो कहाँ जाऊँ? उनके लिए कहा----- अभी तुम कहीं मत जाओ, घर में ही रहो। ऐसे लोगों के लिए कर्मयोग का मार्ग है। "न निर्विण्णो नातिसक्तो भक्तियोगोऽस्य सिद्धिदः" जो पूर्ण विरक्त नहीं है, और जिनकी धर्म में भी अधिक आसक्ति नहीं है, ऐसों के लिए भगवान ने भक्तियोग बताया है। जो नितान्त अनासक्त-विरक्त पुरुष है, उसके लिए ज्ञान योग, जो आसक्त है उसके लिए कर्मयोग तथा जो पूर्ण विरक्त नहीं है परन्तु बहुत आसक्त भी नहीं है, उसके लिए भक्तियोग का मार्ग बताया गया है। यहाँ यह भी बताया है कि कर्म कब तक करते रहना चाहिए------ "तावत् कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता। मत्कथाश्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते।।" व्यक्ति को तब तक गृहस्थाश्रम में रहकर कर्म करना चाहिए जब तक विषयों से वैराग्य नहीं हो जाता। विधेयात्मक रीति से कहें तो जब तक भगवान की कथा में श्रद्धा और रति नहीं हो जाती, तब तक कर्म की स्थिति है। श्रद्धा और रति हो जाने के बाद व्यक्ति को बहुत ज्यादा कर्म नहीं बढ़ाने चाहिए। यही बात गोस्वामी जी ने भी अपने मानस में कही है--- "छठ दम सील बिरति बहु कर्मा" भगवान कहते हैं---- इस लोक में रहते हुए ही निष्ठापूर्वक स्वधर्म का पालन करने से धीरे-धीरे ज्ञान भी प्राप्त होगा और भक्ति भी प्राप्त होगी। श्रीमद्भागवत में भगवान कहते हैं------ नृदेहमाद्यं सुलभं सुदुर्लभं, प्लवं सुकल्पं गुरुकर्णधारम्। मयानुकूलेन नभस्वतेरितं पुमान्, भवाब्धिं न तरेत् स आत्महा।। यह मनुष्य जन्म बड़ा ही दुर्लभ है परन्तु अब वह आपको प्राप्त हो गया है, अतः आपके लिए सुलभ हो गया है। भवसागर, संसार सागर को पार करने के लिए देह रूपी नौका तो मिल गयी है। परन्तु कर्णधार-नौका चलाने वाला कौन है? "गुरुकर्णधारम्" गुरु की कर्णधार हैं। वे ही आपको मिल गये है। यदि समुद्र में तूफान आ जाए और वायु प्रतिकूल चलने लगे तो बडी कठिनाई होती है। लेकिन हमारे लिए तो "मयानुकूलेन नभस्वेतेरितं" भगवान की कृपा रुपी वायु भी अनुकूल ही है। नौका मिल गयी, नाविक भी मिल गये और भगवान की कृपा रुपी अनुकूल वायु भी मिल गयी, इसके बाद भी यदि कोई व्यक्ति संसार-समुद्र पार करने का प्रयास न करे ----- "पुमान भवाब्धिं न तरेत स आत्महा" तो वह आत्महत्यारा है। यहाँ आत्महत्या का तात्पर्य केवल शरीर का अन्त कर देना नहीं है। इतना सुन्दर और सुयोग्य देह प्राप्त करने के पश्चात भी भगवान को प्राप्त नहीं करने वाले ही वास्तव में आत्म हत्यारे हैं। आगे भगवान एक और सुन्दर बात बताते हैं कि जब हमें कोई साधन प्राप्त हो जाये, तो उसमें निष्ठा बनाये रखनी चाहिए। जैसे, एक बार भगवन्नाम का जप करने का निश्चय कर लिया तो उसमें निष्ठावान बने रहना चाहिए----- "यदि कुर्यात् प्रमादेन योगी कर्म विगर्हितम्। योगेनैव दहेदंहो नान्यत्तन्न कदाचन।।" जैसे, आप पूजा करते हैं तो पूजा ही करें। दूसरा कोई यज्ञ-याग करने की आवश्यकता नहीं है। श्रेष्ठ बात तो यही है कि उसमें कोई भूल न हो, परन्तु कभी कोई अपराध हो जाए, पाप हो जाए या प्रमाद हो जाए तो पश्चात्ताप कर लेना चाहिए। उसी साधना के द्वारा उस पाप को दूर कर लेना चाहिए। दूसरे नये-नये कर्म करने की कोई आवश्यकता नहीं है। प्रायः देखा जाता है कि साधना में अपराध हो जाने पर, लोग अनेक प्रकार के समाधान बताने लग जाते हैं -- यह करो, वह करो आदि। इसमें अपनी साधना छूट जाती है। जैसे, नामजप या पूजा छूट जाती है,और हम दूसरे साधन में लग जाते हैं। ऐसा हम तभी करते हैं जब हमें अपनी साधना पर पूर्ण विश्वास नहीं होता कि वह कुछ करने वाली है। दूसरा कोई अपनी पूर्व की साधना छोड़कर नाम जप करने लग जाता है,और नाम जप करने वाला जप छोड़कर कुछ और करने लग जाता है। ऐसा नहीं करना चाहिए---- "स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः" अपने-अपने अधिकारानुरूप जिसकी जिस साधना में निष्ठा हो गई है। वही उसके लिये गुण कहा गया है----- " सर्व मद्भक्तियोगेन मद्भक्तो लभतेऽञ्जसा। स्वर्गापवर्ग मद्धाम कथन्चिद् यदि वान्छति।।" भगवान कहते हैं----- ”मेरी भक्ति से मनुष्य जो चाहे वह प्राप्त कर सकता है। वह स्वर्ग लोग जाना चाहे, ब्रह्मलोक जाना चाहे या जहाँ जाना चाहे जा सकता है, लेकिन जो साधु भक्त हैं, वे कुछ नहीं चाहते।“ "न किञ्चित् साधवो धीरा भक्ता ह्येकान्तिनो मम। वाञ्छन्त्यपि मया दत्तं कैवल्यमपुनर्भवम्।।" ”स्वयं मैं उन्हें मोक्ष देना चाहूँ, तो उसे भी वे नहीं लेना चाहते।“ यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि भगवान से कुछ नहीं चाहना तो ठीक है, परन्तु नहीं चाहने का अभिमान ठीक नहीं है। भगवान कहते हैं---- इस प्रकार जो सन्मार्ग पर चलेगा उसे मेरी प्राप्ति हो जायेगी, यह भक्ति साधन है। साधक को देखना चाहिये कि मुझमें कितना वैराग्य है और मेरे लिए कौन-सा मार्ग उचित है। सामान्यतः लोगों में थोड़ा वैराग्य होता है और थोड़ा राग भी होता है। ऐसों के लिए भक्ति योग उचित साधन है।

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Girraj Meena May 15, 2021

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सुनील May 15, 2021

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