💐गजेन्द्र मोक्ष💐

💐गजेन्द्र मोक्ष💐

भगवान श्री कृष्ण चंद्र की जय


क्षीरसागर में स्थित त्रिकूट पर्वत पर लोहे, चांदी और सोने की तीन विशाल चोटियां थीं. उनके बीच विशाल जंगल में गजेंद्र हाथी अपनी असंख्य पत्नियों के साथ रहता था.

एक बार गजेंद्र अपनी पत्नियों के साथ प्यास बुझाने के लिए एक तालाब पर पहुंचा. प्यास बुझाने के बाद गजेंद्र की जल-क्रीड़ा करने की इच्छा हुई. वह पत्नियों के साथ तालाब में क्रीडा करने लगा.

दुर्भाग्यवश उसी समय एक अत्यंत विशालकाय ग्राह(मगरमच्छ) वहां पहुंचा. उसने गजेंद्र के दाएं पैर को अपने दाढ़ों में जकड़कर तालाब के भीतर खींचना शुरू किया.

गजेंद्र पीड़ा से चिंघाड़ने लगा. उसकी पत्नियां तालाब के किनारे अपने पति के दुख पर आंसू बहाने लगीं. गजेंद्र अपने पूरे बल के साथ ग्राह से युद्ध कर रहा था.

परंतु वह ग्राह की पकड़ से मुक्त नहीं हो पा रहा था. गजेंद्र अपने दाँतों से मगरमच्छ पर वार करता तो ग्राह उसके शरीर को अपने नाखूनों से खरोंच लेता और खून की धारा निकल आतीं. ग्राह और हाथी के बीच बहुत समय तक युद्ध हुआ. पानी के अंदर ग्राह की शक्ति ज़्यादा होती है. ग्राह गजेंद्र का खून चूसकर बलवान होता गया जबकि गजेंद्र के शरीर पर मात्र कंकाल शेष था.
गजेंद्र दुखी होकर सोचने लगा- मैं अपनी प्यास बुझाने यहां आया था. प्यास बुझाकर मुझे चले जाना चाहिए था. मैं क्यों इस तालाब में उतर पड़ा? मुझे कौन बचायेगा?

उसे अपनी मृत्यु दिख रही थी. फिर भी मन के किसी कोने में यह विश्वास था कि उसने इतना लंबा संघर्ष किया है, उसकी जान बच सकती है. उसे ईश्वर का स्मरण हुआ तो नारायण की स्तुति कर उन्हें पुकारने लगा.

सारा संसार जिनमें समाया हुआ है, जिनके प्रभाव से संसार का अस्तित्व है, जो इसमें व्याप्त होकर इसके रूपों में प्रकट होते हैं, मैं उन्हीं नारायण की शरण लेता हूं. हे नारायण मुझ शरणागत की रक्षा करिए.

विविधि लीलाओं के कारण देवों, ऋषियों के लिए अगम्य अगोचर बने जिन श्रीहरि की महिमा वर्णन से परे है. मैं उस दयालु नारायण से प्राण रक्षा की गुहार लगाता हूं.

नारायण के स्मरण से गजेंद्र की पीड़ा कुछ कम हुई. प्रभु के शरणागत को कष्ट देने वाले ग्राह के जबड़ों में भयंकर दर्द शुरू हुआ फिर भी वह क्रोध में जोर से उसके पैर चबाने लगा. छटपटाते गजेंद्र ने स्मरण किया- मुझ जैसे घमण्डी जब तक संकट में नहीं फंसते, तब तक आपको याद नहीं करते. यदि दुख न हो तो हमें आपकी ज़रूरत का बोध नहीं होता.
आप जब तक प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देते, तब तक प्राणी आपका अस्तित्व तक नहीं मानता लेकिन कष्ट में आपकी शरण में पहुंच जाता है. जीवों की पीड़ा को हरने वाले देव आप सृष्टि के मूलभूत कारण हैं.

गजेंद्र ने श्रीहरि की स्तुति जारी रखी- मेरी प्राण शक्ति जवाब दे चुकी हैं. आंसू सूख गए हैं. मैं ऊंचे स्वर में पुकार भी नहीं सकता. आप चाहें तो मेरी रक्षा करें या मेरे हाल पर छोड़ दें.

सब आपकी दया पर निर्भर है. आपके ध्यान के सिवा दूसरा कोई मार्ग नहीं. मुझे बचाने वाला भी आपके सिवाय कोई नहीं है. यदि मृत्यु भी हुई तो आपका स्मरण करते मरूंगा.

पीड़ा से तड़पता गजेंद्र सूंड उठाकर आसमान की ओर देखने लगा. मगरमच्छ को लगा कि उसकी शक्ति जवाब देती जा रही है. उसका मुंह खुलता जा रहा है.

भक्त की करूणाभरी पुकार सुनकर नारायण आ पहुंचे. गजेंद्र ने उस अवस्था में भी तालाब का कमलपुष्प और जल प्रभु के चरणों में अर्पण किया. प्रभु भक्त की रक्षा को कूद पड़े.

उन्होंने ग्राह के जबड़े से गजेंद्र का पैर निकाला और चक्र से ग्राह का मुख चीर दिया. ग्राह तुरंत एक गंधर्व में बदल गया. दरअसल वह ग्राह हुहू नामक एक गंधर्व था.

एक बार देवल ऋषि पानी में खड़े होकर तपस्या कर रहे थे. गंधर्व को शरारत सूझी. उसने ग्राह रूप धरा और जल में कौतुक करते हुए ऋषि के पैर पकड़ लिए. क्रोधित ऋषि ने उसे शाप दिया कि तुम मगरमच्छ की तरह इस पानी में पड़े रहो किंतु नारायण के प्रभाव से वह शापमुक्त होकर अपने लोक को चला गया.
श्रीहरि के दर्शन से गजेंद्र भी अपनी खोई हुई ताक़त और पूर्व जन्म का ज्ञान भी प्राप्त कर सका. गजेंद्र पिछले जन्म में इंद्रद्युम्न नामक एक विष्णुभक्त राजा थे.

श्रीविष्णु के ध्यान में डूबे राजा ने एक बार ऋषि अगस्त्य के आगमन का ख़्याल न किया. राजा ने युवावस्था में ही गृहस्थ आश्रम को त्यागकर वानप्रस्थ ले लिया.

राजा ब्रह्मा द्वारा प्रतिपादित आश्रम व्यवस्था को भंग कर रहा था, ऋषि इससे भी क्षुब्ध थे. उन्होंने शाप दिया- तुम किसी व्यवस्था को नहीं मानते इसलिए अगले जन्म में मत्त हाथी बनोगे.

राजा ने शाप स्वीकार करते हुए ऋषि से अनुरोध किया कि मैं अगले जन्म में भी नारायण भक्त रहूं. अगस्त्य उसकी नारायण भक्ति से प्रसन्न हुए और तथास्तु कहा.

श्रीहरि की कृपा से गजेंद्र शापमुक्त हुआ. नारायण ने उसे अपना सेवक पार्षद बना लिया. गजेंद्र ने पीड़ा में छटपटाते हुए नारायण की स्तुति में जो श्लोक कहे थे उसे गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र कहा जाता है. (भागवत महापुराण)

।। राधे राधे गोविंदा ।।

+692 प्रतिक्रिया 44 कॉमेंट्स • 756 शेयर

कामेंट्स

Khanuram Bargot Sep 5, 2017
jai shree krishna radhe radhe 🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌

Dr Komal ram sahu rajim Apr 1, 2018
बहुत अच्छा लगा आपके विचार और लेखन को सार्थक कर धन्यवाद देना चाहता हूँ

VARUN KUMAR Oct 14, 2018
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🙏

संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌼🌼🌼〰️〰️ ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ★ब्राह्म पर्व★ (बयासीवां दिन) सूर्यदेव की उपासना में विविध उपचार और फल आदि निवेदन करने का महात्म्य (भाग 2)... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गतांक से आगे... ब्रह्माजी बोले- दिण्डिन् उदयकाल में सूर्य देव को मात्र एक दिन यदि घृत से स्नान करा दिया जाय तो एक लाख गोदान का फल प्राप्त होता है। गाय के दूध द्वारा स्नान कराने से पुण्डरीक-यज्ञ का फल मिलता है। इक्षुरस से स्नान कराने पर अश्वमेध-यज्ञ के फल का लाभ होता है। भगवान् सूर्य के लिये पहली बार ब्यायी हुई सुपुष्ट गौ तथा शस्य प्रदान करने वाली पृथ्वी का जो दान करता है, वह अचल लक्ष्मी को प्राप्त कर पुनः सूर्यलोक को चला जाता है और गौ के शरीर में जितने रोयें होते हैं, उतने ही करोड़ वर्ष तक वह सूर्यलोक में पूजित होता है। जो मनुष्य भगवान् सूर्य के निमित्त भेरी, शंख, वेणु आदि वाद्य दान करते हैं, वे सूर्यलोक को जाते हैं। जो मनुष्य भक्तिभाव से सूर्यनारायण की पूजा करके उन्हें छत्र, ध्वजा, पताका, वितान, चामर तथा सुवर्ण दण्ड आदि समर्पित करता है, वह दिव्य छोटी-छोटी किंकिणियों से युक्त सुन्दर विमान के द्वारा सूर्यलोक में जाकर आनन्दित होता है और चिरकाल तक वहाँ रहकर पुनः मनुष्य-जन्म ग्रहण कर सभी राजाओं के द्वारा अभिवन्दित राजा होता है। जो मनुष्य विविध सुगन्धित पुष्पों तथा पत्रों से सूर्य की अर्चना करता है और विविध स्तोत्रों से सूर्य का संस्तवन-गान आदि करता है, वह उन्हीं के लोक को प्राप्त होता है। जो पाठक और चारणगण सदा प्रात:काल सूर्य सम्बन्धी ऋचाओं एवं विविध स्तोत्रों का उपगान करते हैं, वे सभी स्वर्गगामी होते हैं। जो मनुष्य अश्वों से युक्त, सुवर्ण, रजत या मणिजटित सुन्दर रथ अथवा दारुमय रथ सूर्यनारायण को समर्पित करता है, वह सूर्य के वर्ण के समान किंकिणी-जालमाला से समन्वित विमान में बैठकर सूर्यलोक की यात्रा करता है। जो लोग वर्षभर या छ: मास नित्य इनकी रथयात्रा करते हैं, वे उस परमगति को प्रास करते हैं, जिसे ध्यानी, योगी तथा सूर्यभक्ति के अनुगामी श्रेष्ठ जन प्राप्त करते हैं। जो मनुष्य भक्तिभाव समन्वित होकर भगवान सूर्य के रथ को खींचते है वे बार-बार जन्म लेने पर भी नीरोग तथा दरिद्रता से रहित होते हैं। जो मनुष्य भास्करदेव की रथयात्रा करते हैं, वे सूर्यलोक को प्राप्तकर यथाभिलषित सुख का आनन्द प्राप्त करते हैं, परंतु जो मोह अथवा क्रोधवश रथयात्रा में बाधा उत्पन्न करते हैं, उन्हें पाप-कर्म करनेवाले मंदेह नामक राक्षस ही समझना चाहिये। सूर्यभगवान के लिये धन-धान्य-हिरण्य अथवा विविध प्रकार के वस्त्रों का दान करने वाले परमगति को प्राप्त होते हैं। गौ, भैंस अथवा हाथी या सुन्दर घोड़ों का दान करने वाले लोग अक्षय अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले अश्वमेध-यज्ञ के फल को प्राप्त करते हैं और उन्हें उस दान से हजार गुना पुण्य-लाभ होता है । जो सूर्यनारायण के लिये खेती करने योग्य सुन्दर उपजाऊ भूमि-दान देता है, वह अपनी पीढ़ी से पहले के दस कुल और पश्चात् के दस कुल को तार देता है तथा दिव्य विमान से सूर्यलोक को चला जाता है। जो बुद्धिमान् मनुष्य भगवान् सूर्य के लिये भक्ति पूर्वक ग्राम-दान करता है, वह सूर्य के समान वर्ण वाले विमान में आरूढ़ होकर परमगति को प्राप्त होता है। भक्तिपूर्वक जो लोग फल-पुष्प आदि से परिपूर्ण उद्यान का दान सूर्यनारायण के लिये देते हैं, वे परमगति को प्राप्त होते हैं। मनसा-वाचा-कर्मणा जो भी दुष्कृत होता है, वह सब भगवान् सूर्य की कृपा से नष्ट हो जाता है। चाहे आर्त हो या रोगी हो अथवा दरिद्र या दुःखी हो, यदि वह भगवान् आदित्य की शरण में आ जाता है तो उसके सम्पूर्ण कष्ट दूर हो जाते हैं। एक दिन की सूर्य-पूजा करने से जो फल प्राप्त होता है, वह अनेक इष्टापूर्ती की अपेक्षा श्रेष्ठ है। जो भगवान् सूर्य के मन्दिर के सामने भगवान् सूर्य की कल्याण कारी लीला करता है, उसे सभी अभीष्ट कामनाओं को सिद्ध करने वाले राजसूय- यज्ञ का फल प्राप्त होता है। गणाधिप! जो मनुष्य सूर्यदेव के लिये महाभारत ग्रन्थ का दान करता है, वह सभी पापों से विमुक्त होकर विष्णुलोक में पूजित होता है। रामायण की पुस्तक देकर मनुष्य वाजपेय-यज्ञ के फल को प्राप्त कर सूर्यलोक को प्राप्त करता है। सूर्यभगवान् के लिये भविष्यपुराण अथवा साम्बपुराण की पुस्तक का दान करने पर मानव राजसूय तथा अश्वमेध-यज्ञ करने का फल प्राप्त करता है तथा अपनी सभी मन:कामनाओं को प्राप्त कर सूर्यलोक को पा लेता है और वहाँ चिरकाल तक रहकर ब्रह्मलोक में जाता है। वहाँ सौ कल्प तक रहकर पुनः वह पृथ्वीबपर राजा होता है। जो मनुष्य सूर्यमन्दिरबमें कुआँ तथा तालाब बनवाता है, वह मनुष्य आनन्दमय दिव्य लोक को प्राप्त करता है। जो मनुष्य सूर्यमन्दिर में शीतकालबमें मनुष्यों के शीत-निवारण के योग्य कम्बल आदि का दान करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य सूर्यमन्दिर में नित्य पवित्र पुस्तक, इतिहास तथा पुराण का वाचन करता है, वह उस फल को प्राप्त करता है, जो नित्य हजारों अश्वमेध-यज्ञ को करने से भी प्राप्त नहीं होता। अतः सूर्य के मन्दि रमें प्रयत्न पूर्वक पवित्र पुस्तक, इतिहास तथा पुराण का वाचन करना चाहिये। भगवान् भास्कर पुण्य आख्यान- कथा से सदा संतुष्ट होते हैं। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

+19 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 9 शेयर

पुनर्जन्म सिद्धान्त समीक्षा 🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹 प्रश्न :- पुनर्जन्म किसे कहते हैं ? उत्तर :- आत्मा और इन्द्रियों का शरीर के साथ बार बार सम्बन्ध टूटने और बनने को पुनर्जन्म या प्रेत्याभाव कहते हैं । प्रश्न :- प्रेत किसे कहते हैं ? उत्तर :- जब आत्मा और इन्द्रियों का शरीर से सम्बन्ध टूट जाता है तो जो बचा हुआ शरीर है उसे शव या प्रेत कहा जाता है । प्रश्न :- भूत किसे कहते हैं ? उत्तर :- जो व्यक्ति मृत हो जाता है वह क्योंकि अब वर्तमान काल में नहीं है और भूतकाल में चला गया है इसी कारण वह भूत कहलाता है । प्रश्न :- पुनर्जन्म को कैसे समझा जा सकता है ? उत्तर :- पुनर्जन्म को समझने के लिये आपको पहले जन्म और मृत्यु के बारे मे समझना पड़ेगा । और जन्म मृत्यु को समझने से पहले आपको शरीर को समझना पड़ेगा । प्रश्न :- शरीर के बारे में समझाएँ । उत्तर :- शरीर दो प्रकार का होता है :- (१) सूक्ष्म शरीर ( मन, बुद्धि, अहंकार, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ ) (२) स्थूल शरीर ( ५ कर्मेन्द्रियाँ = नासिका, त्वचा, कर्ण आदि बाहरी शरीर ) और इस शरीर के द्वारा आत्मा कर्मों को करता है । प्रश्न :- जन्म किसे कहते हैं ? उत्तर :- आत्मा का सूक्ष्म शरीर को लेकर स्थूल शरीर के साथ सम्बन्ध हो जाने का नाम जन्म है । और ये सम्बन्ध प्राणों के साथ दोनो शरीरों में स्थापित होता है । जन्म को जाति भी कहा जाता है ( उदाहरण :- पशु जाति, मनुष्य जाति, पक्षी जाति, वृक्ष जाति आदि ) प्रश्न :- मृत्यु किसे कहते हैं ? उत्तर :- सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर के बीच में प्राणों का सम्बन्ध है । उस सम्बन्ध के टूट जाने का नाम मृत्यु है । प्रश्न :- मृत्यु और निद्रा में क्या अंतर है ? उत्तर :- मृत्यु में दोनों शरीरों के सम्बन्ध टूट जाते हैं और निद्रा में दोनों शरीरों के सम्बन्ध स्थापित रहते हैं । प्रश्न :- मृत्यु कैसे होती है ? उत्तर :- आत्मा अपने सूक्ष्म शरीर को पूरे स्थूल शरीर से समेटता हुआ किसी एक द्वार से बाहर निकलता है । और जिन जिन इन्द्रियों को समेटता जाता है वे सब निष्क्रिय होती जाती हैं । तभी हम देखते हैं कि मृत्यु के समय बोलना, दिखना, सुनना सब बंद होता चला जाता है । प्रश्न :- जब मृत्यु होती है तो हमें कैसा लगता है ? उत्तर :- ठीक वैसा ही जैसा कि हमें बिस्तर पर लेटे लेटे नींद में जाते हुए लगता है । हम ज्ञान शून्य होने लगते हैं । यदि मान लो हमारी मृत्यु स्वाभाविक नहीं है और कोई तलवार से धीरे धीरे गला काट रहा है तो पहले तो निकलते हुए रक्त और तीव्र पीड़ा से हमें तुरंत मूर्छा आने लगेगी और हम ज्ञान शून्य हो जायेंगे और ऐसे ही हमारे प्राण निकल जायेंगे । प्रश्न :- मृत्यु और मुक्ति में क्या अंतर है ? उत्तर :- जीवात्मा को बार बार कर्मो के अनुसार शरीर प्राप्त करे के लिये सूक्ष्म शरीर मिला हुआ होता है । जब सामान्य मृत्यु होती है तो आत्मा सूक्ष्म शरीर को लेकर उस स्थूल शरीर ( मनुष्य, पशु, पक्षी आदि ) से निकल जाता है परन्तु जब मुक्ति होती है तो आत्मा स्थूल शरीर ( मनुष्य ) को तो छोड़ता ही है लेकिन ये सूक्ष्म शरीर भी छोड़ देता है और सूक्ष्म शरीर प्रकृत्ति में लीन हो जाता है । ( मुक्ति केवल मनुष्य शरीर में योग समाधि आदि साधनों से ही होती है ) प्रश्न :- मुक्ति की अवधि कितनी है ? उत्तर :- मुक्ति की अवधि 36000 सृष्टियाँ हैं । 1 सृष्टि = 8640000000 वर्ष । यानी कि इतनी अवधि तक आत्मा मुक्त रहता है और ब्रह्माण्ड में ईश्वर के आनंद में मग्न रहता है । और ये अवधि पूरी करते ही किसी शरीर में कर्मानुसार फिर से आता है । प्रश्न :- मृत्यु की अवधि कितनी है ? उत्तर :- एक क्षण के कई भाग कर दीजिए उससे भी कम समय में आत्मा एक शरीर छोड़ तुरंत दूसरे शरीर को धारण कर लेता है । प्रश्न :- जन्म किसे कहते हैं ? उत्तर :- ईश्वर के द्वारा जीवात्मा अपने सूक्ष्म शरीर के साथ कर्म के अनुसार किसी माता के गर्भ में प्रविष्ट हो जाता है और वहाँ बन रहे रज वीर्य के संयोग से शरीर को प्राप्त कर लेता है । इसी को जन्म कहते हैं । प्रश्न :- जाति किसे कहते हैं ? उत्तर :- जन्म को जाति कहते है । कर्मों के अनुसार जीवात्मा जिस शरीर को प्राप्त होता है वह उसकी जाति कहलाती है । जैसे :- मनुष्य जाति, पशु जाति, वृक्ष जाति, पक्षी जाति आदि । प्रश्न :- ये कैसे निश्चय होता है कि आत्मा किस जाति को प्राप्त होगा ? उत्तर :- ये कर्मों के अनुसार निश्चय होता है । ऐसे समझिए ! आत्मा में अनंत जन्मों के अनंत कर्मों के संस्कार अंकित रहते हैं । ये कर्म अपनी एक कतार में खड़े रहते हैं जो कर्म आगे आता रहता है उसके अनुसार आत्मा कर्मफल भोगता है । मान लो आत्मा ने कभी किसी शरीर में ऐसे कर्म किये हों जिसके कारण उसे सूअर का शरीर मिलना हो । और ये सूअर का शरीर दिलवाने वाले कर्म कतार में सबसे आगे खड़े हैं तो आत्मा उस प्रचलित शरीर को छोड़ तुरंत किसी सूअरिया के गर्भ में प्रविष्ट होगी और सूअर का जन्म मिलेगा । अब आगे चलिये सूअर के शरीर को भोग जब आत्मा के वे कर्म निवृत होंगे तो कतार में उससे पीछे मान लो भैंस का शरीर दिलाने वाले कर्म खड़े हो गए तो सूअर के शरीर में मरकर आत्मा भैंस के शरीर को भोगेगा । बस ऐसे ही समझते जाइए कि कर्मों की कतार में एक के बाद एक एक से दूसरे शरीर में पुनर्जन्म होता रहेगा । यदि ऐसे ही आगे किसी मनुष्य शरीर में आकर वो अपने जीवन की उपयोगिता समझकर योगी हो जायेगा तो कर्मो की कतार को 36000 सृष्टियों तक के लिये छोड़ देगा । उसके बाद फिर से ये क्रम सब चालू रहेगा । प्रश्न :- लेकिन हम देखते हैं एक ही जाति में पैदा हुई आत्माएँ अलग अलग रूप में सुखी और दुखी हैं ऐसा क्यों ? उत्तर :- ये भी कर्मों पर आधारित है । जैसे किसी ने पाप पुण्य रूप में मिश्रित कर्म किये और उसे पुण्य के आधार पर मनुष्य शरीर तो मिला परंतु वह पाप कर्मों के आधार पर किसी ऐसे कुल मे पैदा हुआ जिसमें उसे दुख और कष्ट अधिक झेलने पड़े । आगे ऐसे समझिए जैसे किसी आत्मा ने किसी शरीर में बहुत से पाप कर्म और कुछ पुण्य कर्म किए जिस पाप के आधार पर उसे गाँय का शरीर मिला और पुण्यों के आधार उस गाँय को ऐसा घर मिला जहाँ उसे उत्तम सुख जैसे कि भोजन, चिकित्सा आदि प्राप्त हुए । ठीक ऐसे ही कर्मों के मिश्रित रूप में शरीरों का मिलना तय होता है । प्रश्न :- जो आत्मा है उसकी स्थिति शरीर में कैसे होती है ? क्या वो पूरे शरीर में फैलकर रहती है या शरीर के किसी स्थान विशेष में ? उत्तर :- आत्मा एक सुई की नोक के करोड़वें हिस्से से भी अत्यन्त सूक्ष्म होती है और वह शरीर में हृदय देश में रहती है वहीं से वो अपने सूक्ष्म शरीर के द्वारा स्थूल शरीर का संचालन करती है । आत्मा पूरे शरीर में फैली नही होती या कहें कि व्याप्त नहीं होती । क्योंकि मान लें कोई आत्मा किसी हाथी के शरीर को धारण किये हुए है और उसे त्यागकर मान लो उसे कर्मानुसार चींटी का शरीर मिलता है तो सोचो वह आत्मा उस चींटी के शरीर में कैसे घुसेगी ? इसके लिये तो उस आत्मा की पर्याप्त काट छांट करनी होगी जो कि शास्त्र विरुद्ध सिद्धांत है, कोई भी आत्मा काटा नहीं जा सकता । ये बात वेद, उपनिषद्, गीता आदि भी कहते हैं । प्रश्न :- लोग मृत्यु से इतना डरते क्यों हैं ? उत्तर :- अज्ञानता के कारण । क्योंकि यदि लोग वेद, दर्शन, उपनिषद् आदि का स्वाध्याय करके शरीर और आत्मा आदि के ज्ञान विज्ञान को पढ़ेंगे तो उन्हें सारी स्थिति समझ में आ जायेगी और लेकिन इससे भी ये मात्र शाब्दिक ज्ञान होगा यदि लोग ये सब पढ़कर अध्यात्म में रूचि लेते हुए योगाभ्यास आदि करेंगे तो ये ज्ञान उनको भीतर से होता जायेगा और वे निर्भयी होते जायेंगे । आपने महापुरुषों के बारे में सुना होगा कि जिन्होंने हँसते हँसते अपने प्राण दे दिए । ये सब इसलिये कर पाए क्योंकि वे लोग तत्वज्ञानी थे जिसके कारण मृत्यु भय जाता रहा । सोचिए महाभारत के युद्ध में अर्जुण भय के कारण शिथिल हो गया था तो योगेश्वर कृष्ण जी ने ही उनको सांख्य योग के द्वारा ये शरीर, आत्मा आदि का ज्ञान विज्ञान ही तो समझाया था और उसे निर्भयी बनाया था । सामान्य मनुष्य को तो अज्ञान मे ये भय रहता ही है । प्रश्न :- क्या वास्तव में भूत प्रेत नहीं होते ? और जो हम ये किसी महिला के शरीर मे चुड़ैल या दुष्टात्मा आ जाती है वो सब क्या झूठ है ? उत्तर :- झूठ है । लीजिए इसको क्रम से समझिए । पहली बात तो ये है कि किसी एक शरीर कां संचालन दो आत्माएँ कभी नहीं कर सकतीं । ये सिद्धांत विरुद्ध और ईश्वरीय नियम के विरुद्ध है । तो किसी एक शरीर में दूसरी आत्मा का आकर उसे अपने वश में कर लेना संभव ही नही है । और जो आपने बोला कि कई महिलाओं में जो डायन या चुड़ैल आ जाती है जिसके कारण उनकी आवाज़ तक बदल जाति है तो वो किसी दुष्टात्मा के कारण नहीं बल्कि मन के पलटने की स्थिति के कारण होता है । विज्ञान की भाषा में इसे कहते हैं जिसमें एक व्यक्ति परिवर्तित होकर अगले ही क्षण दूसरे में बदल जाता है । ये एक मान्सिक रोग है । प्रश्न :- पुनर्जन्म का साक्ष्य क्या है ? ये सिद्धांतवादी बातें अपने स्थान पर हैं पर इसके प्रत्यक्ष प्रमाण क्या हैं ? उत्तर :- आपने ढेरों ऐसे समाचार सुने होंगे कि किसी घर में कोई बालक पैदा हुआ और वह थोड़ा बड़ा होते ही अपने पुराने गाँव, घर, परिवार और उन सदस्यों के बारे में पूरी जानकारी बताता है जिनसे उसका प्रचलित जीवन में दूर दूर तक कोई संबन्ध नहीं रहा है । और ये सब पुनर्जन्म के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं । सुनिए ! होता ये है कि जैसा आपको ऊपर बताया गया है कि आत्मा के सूक्ष्म शरीर में कर्मो के संस्कार अंकित होते रहते हैं और किसी जन्म में कोई अवसर पाकर वे उभर आते हैं इसी कारण वह मनुष्य अपने पुराने जन्म की बातें बताने लगता है । लेकिन ये स्थिति सबके साथ नहीं होती । क्योंकि करोड़ों में कोई एक होगा जिसके साथ ये होता होगा कि अवसर पाकर उसके कोई दबे हुए संस्कार उग्र हो गए और वह अपने बारे में बताने लगा । प्रश्न :- क्या हम जान सकते हैं कि हमारा पूर्व जन्म कैसा था ? उत्तर :- महर्षि दयानंद सरस्वति जी कहते हैं कि सामान्य रूप में तो नहीं परन्तु यदि आप योगाभ्यास को सिद्ध करेंगे तो आपके करोंड़ों वर्षों का इतिहास आपके सामने आकर खड़ा हो जायेगा । और यही तो मुक्ति के लक्षण है|| 🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹🔸🔹🔹

+36 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 42 शेयर

श्री सत्यनारायण व्रत कथा विशेष 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 पूर्णिमा पर क्यों सुनी जाती है सत्‍यनारायण व्रत कथा...? 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ आमतौर पर देखा जाता है किसी भी शुभ काम से पहले या मनोकामनाएं पूरी होने पर सत्यनारायण व्रत की कथा सुनी जाती है। सनातन धर्म से जुड़ा शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने श्रीसत्यनारायण कथा का नाम न सुना हो । इस कथा को सुनने का फल हजारों सालों तक किए गये यज्ञ के बराबर माना जाता है । शास्त्रों के मुताबिक ऐसा माना गया है कि इस कथा को सुनने वाला व्यक्ति अगर व्रत रखता है तो उसेके जीवन के दुखों को श्री हरि विष्णु खुद ही हर लेते हैं । स्कन्द पुराण के मुताबिक भगवान सत्यनारायण श्री हरि विष्णु का ही दूसरा रूप हैं । इस कथा की महिमा को भगवान सत्यनारायण ने अपने मुख से देवर्षि नारद को बताया है । पूर्णिमा के दिन इस कथा को सुनने का विशेष महत्व है । कलयुग में इस व्रत कथा को सुनना बहुत प्रभावशाली माना गया है । जो लोग पूर्णिमा के दिन कथा नहीं सुन पाते हैं , वे कम से कम भगवान सत्यनारायण का मन में ध्यान कर लें । विशेष लाभ होगा । पुराणों में ऐसा भी बताया गया है कि जिस स्थान पर भी श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा होती है, वहां गौरी-गणेश, नवग्रह और समस्त दिक्पाल आ जाते हैं। केले के पेड़ के नीचे अथवा घर के ब्रह्म स्थान पर पूजा करना उत्तम फल देता है। भोग में पंजीरी, पंचामृत, केला और तुलसी दल विशेष रूप से शामिल करें। सिर्फ पूर्णिमा को ही नहीं परिस्थितियों के मुताबिक किसी भी दिन कथा सुनी जा सकती है, बृहस्पतिवार को कथा सुनना विशेष लाभकारी होता है, भगवान तो बस भाव के भूखे हैं । मन में उनके प्रति अगर सच्चा प्रेम है तो कोई भी दिन हो प्रभु की कृपा बरसती रहेगी । इस कथा के प्रभाव से खुशहाल जीवन, दाम्पत्य सुख, मनचाहे वर-वधु, संतान, स्वास्थ्य जैसी समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति होती है । अगर पैसों से जुड़ी कोई समस्या है तो ये कथा किसी संजीवनी से कम नहीं है । तो जब भी मौका मिले भगवान की कथा सुने और सुनाएं । श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पूरा सन्दर्भ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ पुराकालमें शौनकादिऋषि नैमिषारण्य स्थित महर्षि सूत के आश्रम पर पहुंचे। ऋषिगण महर्षि सूत से प्रश्न करते हैं कि लौकिक कष्टमुक्ति, सांसारिक सुख समृद्धि एवं पारलौकिक लक्ष्य की सिद्धि के लिए सरल उपाय क्या है? महर्षि सूत शौनकादिऋषियों को बताते हैं कि ऐसा ही प्रश्न नारद जी ने भगवान विष्णु से किया था। भगवान विष्णु ने नारद जी को बताया कि लौकिक क्लेशमुक्ति, सांसारिक सुखसमृद्धि एवं पारलौकिक लक्ष्य सिद्धि के लिए एक ही राजमार्ग है, वह है सत्यनारायण व्रत। सत्यनारायण का अर्थ है सत्याचरण, सत्याग्रह, सत्यनिष्ठा। संसार में सुखसमृद्धि की प्राप्ति सत्याचरणद्वारा ही संभव है। सत्य ही ईश्वर है। सत्याचरणका अर्थ है ईश्वराराधन, भगवत्पूजा। सत्यनारायण व्रत कथा के पात्र दो कोटि में आते हैं, निष्ठावान सत्यव्रतीएवं स्वार्थबद्धसत्यव्रती। शतानन्द, काष्ठ-विक्रेता भील एवं राजा उल्कामुखनिष्ठावान सत्यव्रतीथे। इन पात्रों ने सत्याचरणएवं सत्यनारायण भगवान की पूजार्चाकरके लौकिक एवं पारलौकिक सुखोंकी प्राप्ति की। शतानन्दअति दीन ब्राह्मण थे। भिक्षावृत्तिअपनाकर वे अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। अपनी तीव्र सत्यनिष्ठा के कारण उन्होंने सत्याचरणका व्रत लिया। भगवान सत्यनारायण की विधिवत् पूजा अर्चना की। वे इहलोकेसुखंभुक्त्वाचान्तंसत्यपुरंययौ (इस लोक में सुखभोग एवं अन्त में सत्यपुरमें प्रवेश) की स्थिति में आए। काष्ठ-विक्रेता भील भी अति निर्धन था। किसी तरह लकडी बेचकर अपना और अपने परिवार का पेट पालता था। उसने भी सम्पूर्ण निष्ठा के साथ सत्याचरणकिया; सत्यनारायण भगवान की पूजार्चाकी। राजा उल्कामुखभी निष्ठावान सत्यव्रतीथे। वे नियमित रूप से भद्रशीलानदी के किनारे सपत्नीक सत्यनारायण भगवान की पूजार्चाकरते थे। सत्याचरणही उनके जीवन का मूलमन्त्र था। दूसरी तरफ साधु वणिक एवं राजा तुंगध्वजस्वार्थबद्धकोटि के सत्यव्रतीथे। स्वार्थ साधन हेतु बाध्य होकर इन दोनों पात्रों ने सत्याचरणकिया ; सत्यनारायण भगवान की पूजार्चाकी। साधु वणिक की सत्यनारायण भगवान में निष्ठा नहीं थी। सत्यनारायण पूजार्चाका संकल्प लेने के उपरान्त उसके परिवार में कलावतीनामक कन्या-रत्न का जन्म हुआ। कन्याजन्मके पश्चात उसने अपने संकल्प को भुला दिया और सत्यनारायण भगवान की पूजार्चानहीं की। उसने पूजा कन्या के विवाह तक के लिए टाल दी। कन्या के विवाह-अवसर पर भी उसने सत्याचरणएवं पूजार्चासे मुंह मोड लिया और दामाद के साथ व्यापार-यात्रा पर चल पडा। दैवयोग से रत्नसारपुरमें श्वसुर-दामाद के ऊपर चोरी का आरोप लगा। यहां उन्हें राजा चंद्रकेतुके कारागार में रहना पडा। श्वसुर और दामाद कारागार से मुक्त हुए तो श्वसुर (साधु वाणिक) ने एक दण्डीस्वामीसे झूठ बोल दिया कि उसकी नौका में रत्नादिनहीं, मात्र लता-पत्र है। इस मिथ्यावादनके कारण उसे संपत्ति-विनाश का कष्ट भोगना पडा। अन्तत:बाध्य होकर उसने सत्यनारायण भगवान का व्रत किया। साधु वाणिकके मिथ्याचार के कारण उसके घर पर भी भयंकर चोरी हो गई। पत्नी-पुत्र दाने-दाने को मुहताज। इसी बीच उन्हें साधु वाणिकके सकुशल घर लौटने की सूचना मिली। उस समय कलावतीअपनी माता लीलावती के साथ सत्यनारायण भगवान की पूजार्चाकर रही थी। समाचार सुनते ही कलावतीअपने पिता और पति से मिलने के लिए दौडी। इसी हडबडी में वह भगवान का प्रसाद ग्रहण करना भूल गई। प्रसाद न ग्रहण करने के कारण साधु वाणिकऔर उसके दामाद नाव सहित समुद्र में डूब गए। फिर अचानक कलावतीको अपनी भूल की याद आई। वह दौडी-दौडी घर आई और भगवान का प्रसाद लिया। इसके बाद सब कुछ ठीक हो गया। लगभग यही स्थिति राजा तुंगध्वजकी भी थी। एक स्थान पर गोपबन्धुभगवान सत्यनारायण की पूजा कर रहे थे। राजसत्तामदांधतुंगध्वजन तो पूजास्थलपर गए और न ही गोपबंधुओंद्वारा प्रदत्त भगवान का प्रसाद ग्रहण किया। इसीलिए उन्हें कष्ट भोगना पडा। अंतत:बाध्य होकर उन्होंने सत्यनारायण भगवान की पूजार्चाकी और सत्याचरणका व्रत लिया। सत्यनारायण व्रतकथाके उपर्युक्त पांचों पात्र मात्र कथापात्रही नहीं, वे मानवमनकी दो प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं। ये प्रवृत्तियां हैं, सत्याग्रह एवं मिथ्याग्रह। लोक में सर्वदाइन दोनों प्रवृत्तियों के धारक रहते हैं। इन पात्रों के माध्यम से स्कंदपुराणयह संदेश देना चाहता है कि निर्धन एवं सत्ताहीनव्यक्ति भी सत्याग्रही, सत्यव्रती, सत्यनिष्ठ हो सकता है और धन तथा सत्तासंपन्नव्यक्ति मिथ्याग्रहीहो सकता है। शतानन्दऔर काष्ठ-विक्रेता भील निर्धन और सत्ताहीनथे। फिर भी इनमें तीव्र सत्याग्रहवृत्तिथी। इसके विपरीत साधु वाणिकएवं राजा तुंगध्वजधनसम्पन्न एवं सत्तासम्पन्नथे। पर उनकी वृत्ति मिथ्याग्रहीथी। सत्ता एवं धनसम्पन्न व्यक्ति में सत्याग्रह हो, ऐसी घटना विरल होती है। सत्यनारायण व्रतकथाके पात्र राजा उल्कामुखऐसी ही विरल कोटि के व्यक्ति थे। पूरी सत्यनारायण व्रतकथाका निहितार्थ यह है कि लौकिक एवं परलौकिकहितों की साधना के लिए मनुष्य को सत्याचरणका व्रत लेना चाहिए। सत्य ही भगवान है। सत्य ही विष्णु है। लोक में सारी बुराइयों, सारे क्लेशों, सारे संघर्षो का मूल कारण है सत्याचरणका अभाव। सत्यनारायण व्रत कथा पुस्तिका में इस संबंध में श्लोक इस प्रकार है : यत्कृत्वासर्वदु:खेभ्योमुक्तोभवतिमानव:। विशेषत:कलियुगेसत्यपूजाफलप्रदा। केचित् कालंवदिष्यन्तिसत्यमीशंतमेवच। सत्यनारायणंकेचित् सत्यदेवंतथाऽपरे। नाना रूपधरोभूत्वासर्वेषामीप्सितप्रद:। भविष्यतिकलौविष्णु: सत्यरूपीसनातन:। अर्थात् सत्यनारायण व्रत का अनुष्ठान करके मनुष्य सभी दु:खों से मुक्त हो जाता है। कलिकाल में सत्य की पूजा विशेष रूप से फलदायीहोती है। सत्य के अनेक नाम हैं, यथा-सत्यनारायण, सत्यदेव। सनातन सत्यरूपीविष्णु भगवान कलियुग में अनेक रूप धारण करके लोगों को मनोवांछित फल देंगे। भगवन सत्यनारायण की मूर्ति या फ़ोटो 1 चौकी या पटला तथा उस पर बिछाने के लिए एक मीटर पीला या सफ़ेद कपडा अबीर गुलाल कुमकुम (रोली) सिंदूर हल्दी मोली धुप अगरबत्ती 10 ग्राम लौंग 10 ग्राम इलायची 32 सुपारी चन्दन 500 ग्राम चावल 250 गेहूँ 50 ग्राम कपूर इत्र कापूस गंगाजल गुलाबजल गोमूत्र पञ्च मेवा 5 जनेऊ 1 नारियल भगवन के वस्त्र 250 ग्राम घी 10 ग्राम पीली राई 5 पान के पत्ते 5 आम के पत्ते हार फूल तुलसी पत्र 4 केले के खम्बे 250 ग्राम मिठाई 1 लीटर दूध 250 ग्राम दही 100 ग्राम चीनी 50 ग्राम शहद भगवन के भोग के लिये चूरमा, पंजीरी या हलुआ इत्यादि हवन प्रकरण (यदि हवन करना हो तो ) हवन सामग्री तिल चावल जौ चीनी घी नव ग्रह समिधा 2 बण्डल 1 किलो आम की लकड़ी पूजा के पूर्व की तैयारी 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ जिस दिन पूजा करनी हो एक या दो दिन पूर्व ही यतन अनुसार पूजा की सभी सामग्री बाजार से ला कर उसे चेक कर ले ताकि पूजा के समय असुविधा न हो। पूजन विधि 〰️〰️〰️〰️ श्री सत्यनारायण का पूजन महीने में एक बार पूर्णिमा या संक्रांति को या किसी भी दिन या समयानुसार किया जा सकता है। सत्यनारायण का पूजन जीवन में सत्य के महत्तव को बतलाता है। इस दिन स्नान करके कोरे अथवा धुले हुए शुद्ध वस्त्र पहनें। माथे पर तिलक लगाएं। अब भगवान गणेश का नाम लेकर पूजन शुरु करें। पूजन का मंडप तैयार करना 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ पूर्वाभिमुख हो कर एक चोकी पर पीला कपडा बिछा कर केले के खम्बे को लगा दे उस के बाद चित्रानुसार भगवन श्री सत्यनाराण गणेश नवग्रह कलश षोडश मातृकाएँ वास्तुदेवता की स्थापना करें अष्टदल या स्वस्तिक बनाएं। बीच में चावल रखें। पान सुपारी से भगवान गणेश की स्थापना करें। अब भगवान सत्यनारायण की तस्वीर रखें। श्री कृष्ण या नारायण की प्रतिमा की भी स्थापना करें। सत्यनारायण के दाहिनी ओर शंख की स्थापना करें। जल से भरा एक कलश भी दाहिनी ओर रखें। कलश पर शक्कर या चावल से भरी कटोरी रखें। कटोरी पर नारियल भी रखा जा सकता है। अब बायी ओर दीपक रखें। केले के पत्तों से पाटे के दोनो ओर सजावट करें। अब पाटे के आगे एक सफेद कपड़ा बिछाकर उस पर नौ जगह चावल की ढेरी रखें तथा नवग्रह मंडल बनाएं पूजन के समय इनमें नवग्रहों का पूजन किया जाना है। और उस के साथ ही गेहूँ की सोलह ढेरी रखें तथा षोडशमातृका मंडल तैयार करने के बाद पूजन शुरु करें। प्रसाद के लिए पंचामृत, गेहूं के आटे को सेंककर तैयार की गई पंजीरी या शक्कर का बूरा, फल, नारियल इन सबको सवाया मात्रा में इकठ्ठा कर लें। या जितना शक्ति हो उस अनुसार इकठ्ठा कर लें। भगवान की तस्वीर के आगे ये सभी पदार्थ रख दें। सकंल्प ; 〰️〰️〰️ संकल्प करने से पहले हाथों मेे जल, फूल व चावल लें। सकंल्प में जिस दिन पूजन कर रहे हैं उस वर्ष, उस वार, तिथि उस जगह और अपने नाम को लेकर अपनी इच्छा बोले। अब हाथों में लिए गए जल को जमीन पर छोड़ दें। पवित्रकरण ; 〰️〰️〰️〰️ बाएँ हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ की अनामिका से निम्न मंत्र बोलते हुए अपने ऊपर एवं पूजन सामग्री पर जल छिड़कें- अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः।। पुनः पुण्डरीकाक्षं, पुनः पुण्डरीकाक्षं, पुनः पुण्डरीकाक्षं । आसन शुद्धि 〰️〰️〰️〰️ निम्न मंत्र से अपने आसन पर उपरोक्त तरह से जल छिड़कें- पृथ्वी त्वया घता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता । त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु च आसनम्। ग्रंथि बंधन 〰️〰️〰️ यदि यजमान या पूजा करने वाले भक्त सपत्नीक बैठ रहे हों तो निम्न मंत्र के पाठ से ग्रंथि बंधन या गठजोड़ा करें- यदाबध्नन दाक्षायणा हिरण्य(गुं)शतानीकाय सुमनस्यमानाः । तन्म आ बन्धामि शत शारदायायुष्यंजरदष्टियर्थासम्। आचमन करें 〰️〰️〰️〰️ इसके बाद दाहिने हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें व तीन बार कहें- ऊँ केशवाय नमः ऊँ नारायणाय नमः ऊँ माधवाय नमः यह मंत्र बोलकर हाथ धोएं ऊँ गोविन्दाय नमः हस्तं प्रक्षालयामि । स्वस्तिवाचन मंत्र 〰️〰️〰️〰️〰️ सबसे पहले स्वस्तिवाचन किया जाना चाहिए। स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्र्षयो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु। द्यौः शांतिः अंतरिक्षगुं शांतिः पृथिवी शांतिरापः शांतिरोषधयः शांतिः। वनस्पतयः शांतिर्विश्वे देवाः शांतिर्ब्रह्म शांतिः सर्वगुं शांतिः शांतिरेव शांति सा मा शांतिरेधि। यतो यतः समिहसे ततो नो अभयं कुरु । शंन्नः कुरु प्राजाभ्यो अभयं नः पशुभ्यः। सुशांतिर्भवतु। अब सभी देवी-देवताओं को प्रणाम करें- श्रीमन्महागणाधिपतये नमः । लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः । उमा महेश्वराभ्यां नमः । वाणी हिरण्यगर्भाभ्यां नमः । शचीपुरन्दराभ्यां नमः । मातृ-पितृचरणकमलेभ्यो नमः । इष्टदेवताभ्यो नमः । कुलदेवताभ्यो नमः । ग्रामदेवताभ्यो नमः । वास्तुदेवताभ्यो नमः । स्थानदेवताभ्यो नमः । सर्वेभ्योदेवेभ्यो नमः । सर्वेभ्यो ब्राह्मणोभ्यो नमः। सिद्धि बुद्धि सहिताय श्री मन्यहा गणाधिपतये नमः। भगवान गणेश को स्नान कराएं। वस्त्र अर्पित करें। जनेऊ अर्पित करें। गंध, पुष्प, अक्षत अर्पित करें। भगवान नारायण को स्नान कराएं। जनेऊ अर्पित करें। गधं, पुष्प,अक्षत अर्पित करें। अब दीपक प्रज्वलित करें। धूप, दीप करें। भगवान गणेश और सत्यनारायण धूप-दीप अर्पित करें। ‘‘ऊँ सत्यनारायण नमः’’ कहते हुए सत्यनारायण का पूजन करें। अब चावल की ढेरी में नवग्रहों का पूजन करें। अष्टगंध, पुष्प को नवग्रहों को अर्पित करें। नवग्रहों का पूजन का मंत्र 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च गुरुश्च शुक्रः शनि राहुकेतवः सर्वेग्रहाः शांतिकरा भवन्तु। इस मंत्र से नवग्रहों का पूजन करें। अब कलश में वरुण देव का पूजन करें। दीपक में अग्नि देव का पूजन करें। कलश पूजन 〰️〰️〰️〰️ कलशस्य मुखे विष्णु कंठे रुद्र समाश्रिताः मूलेतस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मात्र गणा स्मृताः। कुक्षौतु सागरा सर्वे सप्तद्विपा वसुंधरा, ऋग्वेदो यजुर्वेदो सामगानां अथर्वणाः अङेश्च सहितासर्वे कलशन्तु समाश्रिताः। ऊँ अपां पतये वरुणाय नमः। इस मंत्र के साथ कलश में वरुण देवता का पूजन करें। दीपक 〰️〰️ दीपक प्रज्वलित करें एवं हाथ धोकर दीपक का पुष्प एवं कुंकु से पूजन करें- भो दीप देवरुपस्त्वं कर्मसाक्षी ह्यविन्घकृत । यावत्कर्मसमाप्तिः स्यात तावत्वं सुस्थिर भवः। कथा-वाचन और आरती 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ पूजन के बाद सत्यनारायण की कथा का पाठ करें अथवा सुनें। कथा पूरी होने पर भगवान की आरती करें। प्रदक्षिणा करें। अब नेवैद्य अर्पित करें। फल, मिठाई, शक्कर का बूरा जो भी पदार्थ सवाया इकठ्ठा करा हो। उन सभी पदार्थों का भगवान को भोग अर्पित करें। भगवान का प्रसाद सभी भक्तों को बांटे। श्रीस्कन्दपुराण के अन्तर्गत रेवाखण्ड में श्रीसत्यनारायणव्रत कथा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ पहला अध्याय ,,एक समय की बात है नैषिरण्य तीर्थ में शौनिकादि, अठ्ठासी हजार ऋषियों ने श्री सूतजी से पूछा हे प्रभु! इस कलियुग में वेद विद्या रहित मनुष्यों को प्रभु भक्ति किस प्रकार मिल सकती है? तथा उनका उद्धार कैसे होगा? हे मुनि श्रेष्ठ ! कोई ऎसा तप बताइए जिससे थोड़े समय में ही पुण्य मिलें और मनवांछित फल भी मिल जाए. इस प्रकार की कथा सुनने की हम इच्छा रखते हैं. सर्व शास्त्रों के ज्ञाता सूत जी बोले – हे वैष्णवों में पूज्य ! आप सभी ने प्राणियों के हित की बात पूछी है इसलिए मैं एक ऎसे श्रेष्ठ व्रत को आप लोगों को बताऊँगा जिसे नारद जी ने लक्ष्मीनारायण जी से पूछा था और लक्ष्मीपति ने मनिश्रेष्ठ नारद जी से कहा था. आप सब इसे ध्यान से सुनिए – एक समय की बात है, योगीराज नारद जी दूसरों के हित की इच्छा लिए अनेकों लोको में घूमते हुए मृत्युलोक में आ पहुंचे. यहाँ उन्होंने अनेक योनियों में जन्मे प्राय: सभी मनुष्यों को अपने कर्मों द्वारा अनेकों दुखों से पीड़ित देखा. उनका दुख देख नारद जी सोचने लगे कि कैसा यत्न किया जाए जिसके करने से निश्चित रुप से मानव के दुखों का अंत हो जाए. इसी विचार पर मनन करते हुए वह विष्णुलोक में गए. वहाँ वह देवों के ईश नारायण की स्तुति करने लगे जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे, गले में वरमाला पहने हुए थे. स्तुति करते हुए नारद जी बोले – हे भगवान! आप अत्यंत शक्ति से संपन्न हैं, मन तथा वाणी भी आपको नहीं पा सकती हैं. आपका आदि, मध्य तथा अंत नहीं है. निर्गुण स्वरुप सृष्टि के कारण भक्तों के दुख को दूर करने वाले है, आपको मेरा नमस्कार है. नारद जी की स्तुति सुन विष्णु भगवान बोले – हे मुनिश्रेष्ठ! आपके मन में क्या बात है? आप किस काम के लिए पधारे हैं? उसे नि:संकोच कहो. इस पर नारद मुनि बोले कि मृत्युलोक में अनेक योनियों में जन्मे मनुष्य अपने कर्मों के द्वारा अनेको दुख से दुखी हो रहे हैं. हे नाथ! आप मुझ पर दया रखते हैं तो बताइए कि वो मनुष्य थोड़े प्रयास से ही अपने दुखों से कैसे छुटकारा पा सकते है। श्रीहरि बोले – हे नारद! मनुष्यों की भलाई के लिए तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है. जिसके करने से मनुष्य मोह से छूट जाता है, वह बात मैं कहता हूँ उसे सुनो. स्वर्ग लोक व मृत्युलोक दोनों में एक दुर्लभ उत्तम व्रत है जो पुण्य़ देने वाला है. आज प्रेमवश होकर मैं उसे तुमसे कहता हूँ। श्रीसत्यनारायण भगवान का यह व्रत अच्छी तरह विधानपूर्वक करके मनुष्य तुरंत ही यहाँ सुख भोग कर, मरने पर मोक्ष पाता है. श्रीहरि के वचन सुन नारद जी बोले कि उस व्रत का फल क्या है? और उसका विधान क्या है? यह व्रत किसने किया था? इस व्रत को किस दिन करना चाहिए? सभी कुछ विस्तार से बताएँ. नारद की बात सुनकर श्रीहरि बोले – दुख व शोक को दूर करने वाला यह सभी स्थानों पर विजय दिलाने वाला है. मानव को भक्ति व श्रद्धा के साथ शाम को श्रीसत्यनारायण की पूजा धर्म परायण होकर ब्राह्मणों व बंधुओं के साथ करनी चाहिए. भक्ति भाव से ही नैवेद्य, केले का फल, घी, दूध और गेहूँ का आटा सवाया लें. गेहूँ के स्थान पर साठी का आटा, शक्कर तथा गुड़ लेकर व सभी भक्षण योग्य पदार्थो को मिलाकर भगवान का भोग लगाएँ। ब्राह्मणों सहित बंधु-बाँधवों को भी भोजन कराएँ, उसके बाद स्वयं भोजन करें. भजन, कीर्तन के साथ भगवान की भक्ति में लीन हो जाएं. इस तरह से सत्य नारायण भगवान का यह व्रत करने पर मनुष्य की सारी इच्छाएँ निश्चित रुप से पूरी होती हैं. इस कलि काल अर्थात कलियुग में मृत्युलोक में मोक्ष का यही एक सरल उपाय बताया गया है. ।। इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का प्रथम अध्याय संपूर्ण।। श्री सत्यनारायण भगवान की जय ।। दूसरा अध्याय 〰️〰️〰️〰️ सूत जी बोले ,, हे ऋषियों ! जिसने पहले समय में इस व्रत को किया था उसका इतिहास कहता हूँ, ध्यान से सुनो! सुंदर काशीपुरी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था. भूख प्यास से परेशान वह धरती पर घूमता रहता था. ब्राह्मणों से प्रेम से प्रेम करने वाले भगवान ने एक दिन ब्राह्मण का वेश धारण कर उसके पास जाकर पूछा ,, हे विप्र! नित्य दुखी होकर तुम पृथ्वी पर क्यूँ घूमते हो? दीन ब्राह्मण बोला ,, मैं निर्धन ब्राह्मण हूँ. भिक्षा के लिए धरती पर घूमता हूँ. हे भगवान ! यदि आप इसका कोई उपाय जानते हो तो बताइए. वृद्ध ब्राह्मण कहता है कि सत्यनारायण भगवान मनोवांछित फल देने वाले हैं इसलिए तुम उनका पूजन करो. इसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है. वृद्ध ब्राह्मण बनकर आए सत्यनारायण भगवान उस निर्धन ब्राह्मण को व्रत का सारा विधान बताकर अन्तर्धान हो गए. ब्राह्मण मन ही मन सोचने लगा कि जिस व्रत को वृद्ध ब्राह्मण करने को कह गया है मैं उसे जरुर करूँगा. यह निश्चय करने के बाद उसे रात में नीँद नहीं आई. वह सवेरे उठकर सत्यनारायण भगवान के व्रत का निश्चय कर भिक्षा के लिए चला गया. उस दिन निर्धन ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत धन मिला. जिससे उसने बंधु-बाँधवों के साथ मिलकर श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत संपन्न किया। भगवान सत्यनारायण का व्रत संपन्न करने के बाद वह निर्धन ब्राह्मण सभी दुखों से छूट गया और अनेक प्रकार की संपत्तियों से युक्त हो गया. उसी समय से यह ब्राह्मण हर माह इस व्रत को करने लगा. इस तरह से सत्यनारायण भगवान के व्रत को जो मनुष्य करेगा वह सभी प्रकार के पापों से छूटकर मोक्ष को प्राप्त होगा. जो मनुष्य इस व्रत को करेगा वह भी सभी दुखों से मुक्त हो जाएगा। सूत जी बोले कि इस तरह से नारद जी से नारायण जी का कहा हुआ श्रीसत्यनारायण व्रत को मैने तुमसे कहा. हे विप्रो ! मैं अब और क्या कहूँ? ऋषि बोले – हे मुनिवर ! संसार में उस विप्र से सुनकर और किस-किस ने इस व्रत को किया, हम सब इस बात को सुनना चाहते हैं. इसके लिए हमारे मन में श्रद्धा का भाव है. सूत जी बोले – हे मुनियों! जिस-जिस ने इस व्रत को किया है, वह सब सुनो ! एक समय वही विप्र धन व ऎश्वर्य के अनुसार अपने बंधु-बाँधवों के साथ इस व्रत को करने को तैयार हुआ. उसी समय एक एक लकड़ी बेचने वाला बूढ़ा आदमी आया और लकड़ियाँ बाहर रखकर अंदर ब्राह्मण के घर में गया. प्यास से दुखी वह लकड़हारा उनको व्रत करते देख विप्र को नमस्कार कर पूछने लगा कि आप यह क्या कर रहे हैं तथा इसे करने से क्या फल मिलेगा? कृपया मुझे भी बताएँ. ब्राह्मण ने कहा कि सब मनोकामनाओं को पूरा करने वाला यह सत्यनारायण भगवान का व्रत है. इनकी कृपा से ही मेरे घर में धन धान्य आदि की वृद्धि हुई है। विप्र से सत्यनारायण व्रत के बारे में जानकर लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ. चरणामृत लेकर व प्रसाद खाने के बाद वह अपने घर गया. लकड़हारे ने अपने मन में संकल्प किया कि आज लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा उसी से श्रीसत्यनारायण भगवान का उत्तम व्रत करूँगा. मन में इस विचार को ले बूढ़ा आदमी सिर पर लकड़ियाँ रख उस नगर में बेचने गया जहाँ धनी लोग ज्यादा रहते थे. उस नगर में उसे अपनी लकड़ियों का दाम पहले से चार गुना अधिक मिलता है। बूढ़ा प्रसन्नता के साथ दाम लेकर केले, शक्कर, घी, दूध, दही और गेहूँ का आटा ले और सत्यनारायण भगवान के व्रत की अन्य सामग्रियाँ लेकर अपने घर गया. वहाँ उसने अपने बंधु-बाँधवों को बुलाकर विधि विधान से सत्यनारायण भगवान का पूजन और व्रत किया. इस व्रत के प्रभाव से वह बूढ़ा लकड़हारा धन पुत्र आदि से युक्त होकर संसार के समस्त सुख भोग अंत काल में बैकुंठ धाम चला गया. ।।इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का द्वितीय अध्याय संपूर्ण।। श्री सत्यनारायण भगवान की जय ।। तीसरा अध्याय 〰️〰️〰️〰️〰️ सूतजी बोले ,, हे श्रेष्ठ मुनियों, अब आगे की कथा कहता हूँ. पहले समय में उल्कामुख नाम का एक बुद्धिमान राजा था. वह सत्यवक्ता और जितेन्द्रिय था. प्रतिदिन देव स्थानों पर जाता और निर्धनों को धन देकर उनके कष्ट दूर करता था. उसकी पत्नी कमल के समान मुख वाली तथा सती साध्वी थी. भद्रशीला नदी के तट पर उन दोनो ने श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत किया. उसी समय साधु नाम का एक वैश्य आया. उसके पास व्यापार करने के लिए बहुत सा धन भी था. राजा को व्रत करते देखकर वह विनय के साथ पूछने लगा – हे राजन ! भक्तिभाव से पूर्ण होकर आप यह क्या कर रहे हैं? मैं सुनने की इच्छा रखता हूँ तो आप मुझे बताएँ। राजा बोला – हे साधु! अपने बंधु-बाँधवों के साथ पुत्रादि की प्राप्ति के लिए एक महाशक्तिमान श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत व पूजन कर रहा हूँ. राजा के वचन सुन साधु आदर से बोला – हे राजन ! मुझे इस व्रत का सारा विधान कहिए. आपके कथनानुसार मैं भी इस व्रत को करुँगा. मेरी भी संतान नहीं है और इस व्रत को करने से निश्चित रुप से मुझे संतान की प्राप्ति होगी. राजा से व्रत का सारा विधान सुन, व्यापार से निवृत हो वह अपने घर गया। साधु वैश्य ने अपनी पत्नी को संतान देने वाले इस व्रत का वर्णन कह सुनाया और कहा कि जब मेरी संतान होगी तब मैं इस व्रत को करुँगा. साधु ने इस तरह के वचन अपनी पत्नी लीलावती से कहे. एक दिन लीलावती पति के साथ आनन्दित हो सांसारिक धर्म में प्रवृत होकर सत्यनारायण भगवान की कृपा से गर्भवती हो गई. दसवें महीने में उसके गर्भ से एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया. दिनोंदिन वह ऎसे बढ़ने लगी जैसे कि शुक्ल पक्ष का चंद्रमा बढ़ता है. माता-पिता ने अपनी कन्या का नाम कलावती रखा। एक दिन लीलावती ने मीठे शब्दों में अपने पति को याद दिलाया कि आपने सत्यनारायण भगवान के जिस व्रत को करने का संकल्प किया था उसे करने का समय आ गया है, आप इस व्रत को करिये. साधु बोला कि हे प्रिये! इस व्रत को मैं उसके विवाह पर करुँगा. इस प्रकार अपनी पत्नी को आश्वासन देकर वह नगर को चला गया. कलावती पिता के घर में रह वृद्धि को प्राप्त हो गई. साधु ने एक बार नगर में अपनी कन्या को सखियों के साथ देखा तो तुरंत ही दूत को बुलाया और कहा कि मेरी कन्या के योग्य वर देख कर आओ. साधु की बात सुनकर दूत कंचन नगर में पहुंचा और वहाँ देखभाल कर लड़की के सुयोग्य वाणिक पुत्र को ले आया. सुयोग्य लड़के को देख साधु ने बंधु-बाँधवों को बुलाकर अपनी पुत्री का विवाह कर दिया लेकिन दुर्भाग्य की बात ये कि साधु ने अभी भी श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत नहीं किया। इस पर श्री भगवान क्रोधित हो गए और श्राप दिया कि साधु को अत्यधिक दुख मिले. अपने कार्य में कुशल साधु बनिया जमाई को लेकर समुद्र के पास स्थित होकर रत्नासारपुर नगर में गया. वहाँ जाकर दामाद-ससुर दोनों मिलकर चन्द्रकेतु राजा के नगर में व्यापार करने लगे. एक दिन भगवान सत्यनारायण की माया से एक चोर राजा का धन चुराकर भाग रहा था. उसने राजा के सिपाहियों को अपना पीछा करते देख चुराया हुआ धन वहाँ रख दिया जहाँ साधु अपने जमाई के साथ ठहरा हुआ था. राजा के सिपाहियों ने साधु वैश्य के पास राजा का धन पड़ा देखा तो वह ससुर-जमाई दोनों को बाँधकर प्रसन्नता से राजा के पास ले गए और कहा कि उन दोनों चोरों हम पकड़ लाएं हैं, आप आगे की कार्यवाही की आज्ञा दें. राजा की आज्ञा से उन दोनों को कठिन कारावास में डाल दिया गया और उनका सारा धन भी उनसे छीन लिया गया. श्रीसत्यनारायण भगवान से श्राप से साधु की पत्नी भी बहुत दुखी हुई. घर में जो धन रखा था उसे चोर चुरा ले गए. शारीरिक तथा मानसिक पीड़ा व भूख प्यास से अति दुखी हो अन्न की चिन्ता में कलावती के ब्राह्मण के घर गई. वहाँ उसने श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा फिर कथा भी सुनी वह प्रसाद ग्रहण कर वह रात को घर वापिस आई. माता के कलावती से पूछा कि हे पुत्री अब तक तुम कहाँ थी़? तेरे मन में क्या है? कलावती ने अपनी माता से कहा – हे माता ! मैंने एक ब्राह्मण के घर में श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत देखा है. कन्या के वचन सुन लीलावती भगवान के पूजन की तैयारी करने लगी. लीलावती ने परिवार व बंधुओं सहित सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और उनसे वर माँगा कि मेरे पति तथा जमाई शीघ्र घर आ जाएँ. साथ ही यह भी प्रार्थना की कि हम सब का अपराध क्षमा करें. श्रीसत्यनारायण भगवान इस व्रत से संतुष्ट हो गए और राजा चन्द्रकेतु को सपने में दर्शन दे कहा कि – हे राजन ! तुम उन दोनो वैश्यों को छोड़ दो और तुमने उनका जो धन लिया है उसे वापिस कर दो. अगर ऎसा नहीं किया तो मैं तुम्हारा धन राज्य व संतान सभी को नष्ट कर दूँगा. राजा को यह सब कहकर वह अन्तर्धान हो गए। प्रात:काल सभा में राजा ने अपना सपना सुनाया फिर बोले कि बणिक पुत्रों को कैद से मुक्त कर सभा में लाओ. दोनो ने आते ही राजा को प्रणाम किया. राजा मीठी वाणी में बोला – हे महानुभावों ! भाग्यवश ऎसा कठिन दुख तुम्हें प्राप्त हुआ है लेकिन अब तुम्हें कोई भय नहीं है. ऎसा कह राजा ने उन दोनों को नए वस्त्राभूषण भी पहनाए और जितना धन उनका लिया था उससे दुगुना धन वापिस कर दिया. दोनो वैश्य अपने घर को चल दिए। ।।इति श्रीसत्यनारायण भगवान व्रत कथा का तृतीय अध्याय संपूर्ण ।। श्री सत्यनारायण भगवान की जय ।। चतुर्थ अध्याय 〰️〰️〰️〰️ सूतजी बोले ,, वैश्य ने मंगलाचार कर अपनी यात्रा आरंभ की और अपने नगर की ओर चल दिए. उनके थोड़ी दूर जाने पर एक दण्डी वेशधारी श्रीसत्यनारायण ने उनसे पूछा – हे साधु तेरी नाव में क्या है? अभिवाणी वणिक हंसता हुआ बोला – हे दण्डी ! आप क्यों पूछते हो? क्या धन लेने की इच्छा है? मेरी नाव में तो बेल व पत्ते भरे हुए हैं. वैश्य के कठोर वचन सुन भगवान बोले – तुम्हारा वचन सत्य हो! दण्डी ऎसे वचन कह वहाँ से दूर चले गए. कुछ दूर जाकर समुद्र के किनारे बैठ गए. दण्डी के जाने के बाद साधु वैश्य ने नित्य क्रिया के पश्चात नाव को ऊँची उठते देखकर अचंभा माना और नाव में बेल-पत्ते आदि देख वह मूर्छित हो जमीन पर गिर पड़ा। मूर्छा खुलने पर वह अत्यंत शोक में डूब गया तब उसका दामाद बोला कि आप शोक ना मनाएँ, यह दण्डी का शाप है इसलिए हमें उनकी शरण में जाना चाहिए तभी हमारी मनोकामना पूरी होगी. दामाद की बात सुनकर वह दण्डी के पास पहुँचा और अत्यंत भक्तिभाव नमस्कार कर के बोला – मैंने आपसे जो जो असत्य वचन कहे थे उनके लिए मुझे क्षमा दें, ऎसा कह कहकर महान शोकातुर हो रोने लगा तब दण्डी भगवान बोले – हे वणिक पुत्र ! मेरी आज्ञा से बार-बार तुम्हें दुख प्राप्त हुआ है. तू मेरी पूजा से विमुख हुआ. साधु बोला – हे भगवान ! आपकी माया से ब्रह्मा आदि देवता भी आपके रूप को नहीं जानते तब मैं अज्ञानी कैसे जान सकता हूँ. आप प्रसन्न होइए, अब मैं सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा करूँगा. मेरी रक्षा करो और पहले के समान नौका में धन भर दो। साधु वैश्य के भक्तिपूर्वक वचन सुनकर भगवान प्रसन्न हो गए और उसकी इच्छानुसार वरदान देकर अन्तर्धान हो गए. ससुर-जमाई जब नाव पर आए तो नाव धन से भरी हुई थी फिर वहीं अपने अन्य साथियों के साथ सत्यनारायण भगवान का पूजन कर अपने नगर को चल दिए. जब नगर के नजदीक पहुँचे तो दूत को घर पर खबर करने के लिए भेज दिया. दूत साधु की पत्नी को प्रणाम कर कहता है कि मालिक अपने दामाद सहित नगर के निकट आ गए हैं। दूत की बात सुन साधु की पत्नी लीलावती ने बड़े हर्ष के साथ सत्यनारायण भगवान का पूजन कर अपनी पुत्री कलावती से कहा कि मैं अपने पति के दर्शन को जाती हूँ तू कार्य पूर्ण कर शीघ्र आ जा! माता के ऎसे वचन सुन कलावती जल्दी में प्रसाद छोड़ अपने पति के पास चली गई. प्रसाद की अवज्ञा के कारण श्रीसत्यनारायण भगवान रुष्ट हो गए और नाव सहित उसके पति को पानी में डुबो दिया. कलावती अपने पति को वहाँ ना पाकर रोती हुई जमीन पर गिर गई. नौका को डूबा हुआ देख व कन्या को रोता देख साधु दुखी होकर बोला कि हे प्रभु ! मुझसे तथा मेरे परिवार से जो भूल हुई है उसे क्षमा करें. साधु के दीन वचन सुनकर श्रीसत्यनारायण भगवान प्रसन्न हो गए और आकाशवाणी हुई – हे साधु! तेरी कन्या मेरे प्रसाद को छोड़कर आई है इसलिए उसका पति अदृश्य हो गया है. यदि वह घर जाकर प्रसाद खाकर लौटती है तो इसे इसका पति अवश्य मिलेगा. ऎसी आकाशवाणी सुन कलावती घर पहुंचकर प्रसाद खाती है और फिर आकर अपने पति के दर्शन करती है. उसके बाद साधु अपने बंधु-बाँधवों सहित श्रीसत्यनारायण भगवान का विधि-विधान से पूजन करता है. इस लोक का सुख भोग वह अंत में स्वर्ग जाता है। ।।इति श्री सत्यनारायण भगवान व्रत कथा का चतुर्थ अध्याय संपूर्ण ।। श्री सत्यनारायण भगवान की जय ।। पाँचवां अध्याय 〰️〰️〰️〰️〰️ सूतजी बोले ,, हे ऋषियों ! मैं और भी एक कथा सुनाता हूँ, उसे भी ध्यानपूर्वक सुनो! प्रजापालन में लीन तुंगध्वज नाम का एक राजा था. उसने भी भगवान का प्रसाद त्याग कर बहुत ही दुख सान किया. एक बार वन में जाकर वन्य पशुओं को मारकर वह बड़ के पेड़ के नीचे आया. वहाँ उसने ग्वालों को भक्ति-भाव से अपने बंधुओं सहित सत्यनारायण भगवान का पूजन करते देखा. अभिमानवश राजा ने उन्हें देखकर भी पूजा स्थान में नहीं गया और ना ही उसने भगवान को नमस्कार किया. ग्वालों ने राजा को प्रसाद दिया लेकिन उसने वह प्रसाद नहीं खाया और प्रसाद को वहीं छोड़ वह अपने नगर को चला गया. जब वह नगर में पहुंचा तो वहाँ सबकुछ तहस-नहस हुआ पाया तो वह शीघ्र ही समझ गया कि यह सब भगवान ने ही किया है. वह दुबारा ग्वालों के पास पहुंचा और विधि पूर्वक पूजा कर के प्रसाद खाया तो श्रीसत्यनारायण भगवान की कृपा से सब कुछ पहले जैसा हो गया. दीर्घकाल तक सुख भोगने के बाद मरणोपरांत उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई। जो मनुष्य परम दुर्लभ इस व्रत को करेगा तो भगवान सत्यनारायण की अनुकंपा से उसे धन-धान्य की प्राप्ति होगी. निर्धन धनी हो जाता है और भयमुक्त हो जीवन जीता है. संतान हीन मनुष्य को संतान सुख मिलता है और सारे मनोरथ पूर्ण होने पर मानव अंतकाल में बैकुंठधाम को जाता है. सूतजी बोले – जिन्होंने पहले इस व्रत को किया है अब उनके दूसरे जन्म की कथा कहता हूँ. वृद्ध शतानन्द ब्राह्मण ने सुदामा का जन्म लेकर मोक्ष की प्राप्ति की. लकड़हारे ने अगले जन्म में निषाद बनकर मोक्ष प्राप्त किया. उल्कामुख नाम का राजा दशरथ होकर बैकुंठ को गए. साधु नाम के वैश्य ने मोरध्वज बनकर अपने पुत्र को आरे से चीरकर मोक्ष पाया. महाराज तुंगध्वज ने स्वयंभू होकर भगवान में भक्तियुक्त हो कर्म कर मोक्ष पाया. ।।इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पंचम अध्याय संपूर्ण ।। श्री सत्यनारायण भगवान की जय ।। कथा श्रवण के बाद श्री सत्यनारायणजी की आरती करें और अंत मे 3 बार प्रदक्षिणा कर आटे की पंजीरी में विविध फल और दही लस्सी का चरणामृत बना कर सभी लोगो प्रसाद स्वरूप बांटे और स्वयं भी ग्रहण करें। श्री सत्यनारायणजी की आरती 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । सत्यनारायण स्वामी, जन-पातक-हरणा ॥ जय लक्ष्मी... ॥ रत्न जड़ित सिंहासन, अद्भुत छवि राजे । नारद करत नीराजन, घंटा वन बाजे ॥ जय लक्ष्मी... ॥ प्रकट भए कलि कारण, द्विज को दरस दियो । बूढ़ो ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो ॥ जय लक्ष्मी... ॥ दुर्बल भील कठारो, जिन पर कृपा करी । चंद्रचूड़ एक राजा, तिनकी बिपति हरी ॥ जय लक्ष्मी... ॥ वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीन्हीं । सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति किन्हीं ॥ जय लक्ष्मी... ॥ भाव-भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धर्‌यो । श्रद्धा धारण किन्ही, तिनको काज सरो ॥ जय लक्ष्मी... ॥ ग्वाल-बाल संग राजा, बन में भक्ति करी । मनवांछित फल दीन्हों, दीन दयालु हरि ॥ जय लक्ष्मी... ॥ चढ़त प्रसाद सवायो, कदली फल मेवा । धूप-दीप-तुलसी से, राजी सत्यदेवा ॥ जय लक्ष्मी... ॥ सत्यनारायणजी की आरती जो कोई नर गावे । तन-मन-सुख-संपति मनवांछित फल पावै॥ जय लक्ष्मी... ॥ 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

+50 प्रतिक्रिया 7 कॉमेंट्स • 43 शेयर

संक्षिप्त योगवशिष्ठ (वैराग्य प्रकरण) (चौबीसवां दिन) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः वृद्धावस्था की दुखरूपता... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गतांक से आगे... श्रीरामचन्द्र जी कहते हैं--महर्षे ! जैसे हिमरूपी वज्र कमल को, आँधी ओसकण को और नदी तटवर्ती वृक्ष को नष्ट कर देती है, उसी प्रकार वृद्धावस्था शरीर-का नाश कर डालती है । जैसे लेशमात्र विष का भक्षण शरीर को शीघ्र ही कुरूप बना देता है, उसी प्रकार बुढ़िया जरावस्था मनुष्य के सारे अङ्गों को जर्जर करके शीघ्र ही कुरूप कर देती है। जिनके सारे अङ्ग शिथिल होकर झुर्रियों से भर गये हैं और जरा-वस्था ने जिनके सारे अङ्गों को जर्जर बना दिया है, उन समस्त पुरुषों को कामिनियाँ ऊँट के समान समझती हैं। वृद्धावस्था के कारण जिसके अङ्ग काँपते रहते हैं, ऐसे मनुष्य को नौकर-चाकर, स्त्री-पुत्र, बधु बान्धव तथा सुहृद्गण भी उन्मत्त के समान समझकर उसकी हँसी उड़ाते हैं। जो दीनता रूपी दोष से परिपूर्ण, हृदय में संताप पहुँचाने वाली तथा समस्त आपत्तियों की एकमात्र सहचरी है, वह विशाल तृष्णा वृद्धावस्था में बढ़ती ही जाती है । 'हाय ! बड़े खेद की बात है, मैं परलोक में क्या करूँगा !' इस प्रकार का अत्यन्त दारुण भय, जो प्रतीकार के योग्य नहीं है, वृद्धावस्था में बढ़ता जाता है। बुढ़ापे में मैं बेचारा कौन हूँ ! मेरी हस्ती ही क्या है ! मैं किस प्रकार क्या करूँ अच्छा, मैं चुप ही रहता हूँ।' इस प्रकार की दीनता का उदय होता है। 'मुझे किसी स्वजन से कब, क्या और किस प्रकार का खादिष्ट भोजन प्राप्त हो सकता है ?' इस प्रकार चिन्ता रूपिणी दूसरी जरावस्था बुढ़ापे में निरन्तर चित्त को जलाती रहती है । वृद्धावस्था में मनुष्य अपनी शक्ति का संतुलन खो बैठता है-कभी खाने की शक्ति होने पर पचाने की शक्ति नहीं रहती और कभी पचाने की शक्ति होने पर खाने की ही शक्ति नहीं रहती । इस प्रकार शक्ति ह्रास के कारण भोग की इच्छा तो बड़ी प्रबल हो उठती है, परंतु उपभोग किया नहीं जा सकता। उस दशामें निश्चय ही हृदय जलता रहता है । मुने! शरीररूपी वृक्ष के सिरे पर बैठी हुई जरावस्थारू पिणी वृद्धा बगुली, जो नाना प्रकार के क्लेशों से शरीर का अपकार करने वाली है, रोग रूपी साँसे आक्रान्त होकर ज्यों ही चें-में करने लगती है, त्यों ही मूर्छारूपी गहरे अन्धकार की इच्छा रखने वाला मृत्युरूपी उल्लू कहीं से झटपट आया हुआ ही दिखायी देता है। जैसे सायंकाल की संव्या के प्रकट होते ही अन्धकार दौड़ पड़ता है, उसी प्रकार शरीर में जरावस्था को देखते ही मृत्यु दौड़ी चली आती है । सूना नगर, जिसकी लतार कट गयी हों वह वृक्ष तथा जहाँ वर्षा न हुई हो, वह देश भी कुछ-कुछ शोभित होता है, किंतु जरा से जर्जर हुए शरीर की तनिक भी शोभा नहीं होती। वृद्धावस्था की मार खाकर जर्जर हुआ शरीर हिमसमूह से आक्रान्त हो मुरझाये हुए कमल की-सी शोभा को धारण करता है। मस्तक रूपी पर्वत के शिखर पर उगी हुई यह वृद्धावस्था-रूपिणी चाँदनी वातरोग और खाँसी रूपिणी कुमुदिनी-को यत्न पूर्वक विकसित कर देती है । यह बुढ़ापा रूपिणी वेगवती गङ्गा आयु के समाप्त होने पर शरीररूपी तटवर्ती वृक्ष की जड़ों को तुरंत ही काट गिराती है । तात ! जैसे श्वेत पत्रवाली और फूलों से लदी हुई पतली लता कुछ टेढ़ी हो जाती है, उसी प्रकार जिसके सारे अवयव सफेद हो गये हैं, मनुष्यों का वह दुबला-पतला शरीर वृद्धावस्था से टेढ़ा हो जाता है-कमान की तरह झुक जाता है । मुने ! जैसे कपूर से सफेद हुए केले के पेड़ को हाथी क्षणभर में उखाड़ फेंकता है, उसी प्रकार मृत्युरूपी गजराज वृद्धावस्था से कपूर की भाँति सफेद हुई देह को निश्चय ही क्षणभर में उखाड़ फेंकता है। तात ! जो वृद्धावस्था को प्राप्त होकर भी जीता है, उस दुष्ट जीवन के लिये दुगग्रह रखने से क्या लाभ ? भूतल पर किसी से पराजित न होने वाली यह जरावस्था मनुष्यों की समस्त एषणाओं का तिरस्कार कर देती है-उनकी किसी भी इच्छाको सफल नहीं होने देती। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

+25 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 8 शेयर

जानिए कौन थे हनुमान के पुत्र, कैसे हुई उससे मुलाकात हनुमान जी के पसीने की एक बूंद पानी में टपकी और उस बूंद को मछली ने पी लिया. उसी पसीने की बूंद से मछली गर्भवती हो गई और उससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम पड़ा मकरध्वज. जीवन में कोई काम ना बने तो करें हनुमान जी का व्रत, ये है प्रक्रिया हनुमान जी का यह बेटा किसी स्त्री से नहीं बल्कि एक मछली से हुआ. प्रचलित कथा के अनुसार रावण ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगाई और अपनी पूंछ से हनुमान से पूरी लंका जला दी. लंका जलाने के बाद वह पूंछ में लगी आग को बुझाने समुद्र में उतरे. उसी समय उनके पसीने की एक बूंद पानी में टपकी और उस बूंद को मछली ने पी लिया. उसी पसीने की बूंद से वह मछली गर्भवती हो गई और उससे उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम पड़ा मकरध्वज. हनुमान और मकरध्वज की मुलाकात एक युद्ध के दौरान हुई. जब अहिरावण श्रीराम और लक्ष्मण को देवी के समक्ष बलि चढ़ाने के लिए पाताल ले गए थे तब उन्हें मुक्त कराने के लिए हनुमान पाताल लोक पहुंचे और वहां उनकी भेंट मकरध्वज से हुई. यहां मकरध्वज ने अपनी पूरी कथा हनुमान को सुनाई. हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया और मकरध्वज को पाताल लोक का अधिपति नियुक्त कर वहां से चले गए.

+104 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 20 शेयर

संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌼🌼🌼〰️〰️ ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ★ब्राह्म पर्व★ (इक्यासीवां दिन) सूर्यदेव की उपासना में विविध उपचार और फल आदि निवेदन करने का महात्म्य (भाग 1)... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गतांक से आगे... ब्रह्माजी बोले-दिण्डिन् ! जो प्राणी भगवान् सर्यनारायण के निमित्त सभी धर्म कार्य करते हैं, उनके कुल में रोगी और दरिद्री उत्पन्न नहीं होते। जो व्यक्ति भगवान् सूर्य के मन्दिर में भक्तिपूर्वक गोबर से लेपन करता है, वह तत्क्षण सभी पापों से मुक्त हो जाता है। श्वेत-रक्त अथवा पीली मिट्टी से जो मन्दिर में लेप करता है, वह मनोवाञ्छित फल प्राप्त करता है। जो व्यक्ति उपवास पूर्वक अनेक प्रकार के सुगन्धित फूलों से सूर्यनारायण का पूजन करता है, वह समस्त अभीष्ट फलों को प्राप्त करता है। घृत या तिल-तेल से मन्दिर में दीपक प्रज्वलित करने वाला सूर्यलोक को तथा सूर्यनारायण के प्रीत्यर्थ चौराहे, तीर्थ, देवालयादि में दीपक प्रज्वलित करने वाला ओजस्वी रूप को प्राप्त करता है। भक्तिभाव से समन्वित होकर जिस मनुष्य के द्वारा सूर्य के लिये दीपक जलवाया जाता है, वह अपनी अभीष्ट कामनाओं को प्राप्त कर देवलोक को प्राप्त करता है। जो चन्दन, अगरु, कुंकुम, कपूर तथा कस्तूरी आदि मिलाकर तैयार किये गये उबटन से सूर्यनारायण के शरीर का लेपन करता है, वह करोड़ों वर्ष तक स्वर्ग में विहार कर पुन: पृथ्वी पर सभी इच्छाओं से संतृप्त रहता है और समस्त लोकों का पूज्य बनकर चक्रवर्ती राजा होता है। चन्दन और जल से मिश्रित पुष्पों के द्वारा सूर्य को अर्घ्य प्रदान करने पर पुत्र, पौत्र, पत्नी सहित स्वर्गलोक में पूज्य होता है। सुगन्धित पदार्थ तथा पुष्पों से युक्त जल के द्वारा सूर्य को अर्घ्य देकर मनुष्य देवलोक में बहुत समय तक रहकर पुन: पृथ्वी पर राजा होता है। स्वर्ण से युक्त जल अथवा लाल वर्ण के जल से अर्घ्य देने पर करोड़ों वर्ष तक स्वर्गलोक में पूजित होता है। कमल पुष्प से सूर्य की पूजा करके मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त करता है। श्रद्धा-भक्तिपूर्वक सूर्यनारायण को गुग्गुल तथा घृतमिश्रित धूप देने से तत्काल ही सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। जो मनुष्य पूर्वाह्न में भक्ति और श्रद्धा से सूर्यदेव का पूजन करता है, उसे सैकड़ों कपिला गोदान करने का फल मिलता है। मध्याह्नकाल में जो जितेन्द्रिय होकर उनकी पूजा करता है, उसे भूमिदान और सौ गोदान का फल प्रास होता है। सायंकाल की संध्या में जो मनुष्य पवित्र होकर श्वेत वस्त्र तथा उष्णीष (पगड़ी) धारण करके भगवान् भास्कर की पूजा करता है, उसे हजार गौओं के दानका फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य अर्धरात्रि में भक्तिपूर्वक भगवान् सूर्य की पूजा करता है, उसे जातिस्मरता प्राप्त होती है और उसके कुल में धार्मिक व्यक्ति उत्पन्न होते हैं। प्रदोष-वेला में जो मनुष्य भगवान् सूर्यदेव की पूजा करता है, वह स्वर्गलोक में अक्षयकाल तक आनन्द का उपभोग करता है। प्रभातकाल में भक्ति पूर्वक सूर्य की पूजा करने पर देवलोक की प्राप्ति होती है। इस प्रकार सभी वेलाओं में अथवा जिस किसी भी समय जो मनुष्य भक्तिपूर्वक मन्दार-पुष्पों से भगवान् सूर्य की पूजा करता है, वह तेज में भगवान् सूर्य के समान होकर सूर्यलोक में पूज्य बन जाता है। जो व्यक्ति दोनों अयन-संक्रान्तियों में भगवान् सूर्य की भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह ब्रह्मा के लोक को प्राप्त करता है और वहाँ देवताओं द्वारा पूजित होताहै। ग्रहण आदि अवसरों पर पूजन करने वाला चिन्तित नहीं होता। जो निद्रा से उठने पर सूर्यदेव को प्रणाम करता है, उसे प्रसन्न होकर भगवान् अभिलषित गति प्रदान करते हैं। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

+18 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 9 शेयर

संक्षिप्त योगवशिष्ठ (वैराग्य प्रकरण) (तेइसवां दिन) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः स्त्री-शरीर की रमणीयता का निराकरण... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गतांक से आगे... श्रीरामचन्द्र जी कहते हैं-मुनीश्वर ! इधर केश हैं, इधर रक्त और मांस है, यही तो युवती स्त्री का शरीर है। जिसका हृदय विवेक से विशाल हो गया है, उस ज्ञानी पुरुष को इस निन्दित नारी-शरीर से क्या काम ? आदरणीय मुने ! बहुमूल्य वस्त्र और केसर-कस्तूरी आदि के लेप से जिन्हें बार बार सजाकर दुलराया गया था, समस्त देहधारियों के उन्हीं अङ्गो को किसी समय गीध और सियार आदि मांसाहारी जीव नोचते और घसीटते हैं । जिस स्तनमण्डल पर मेरु पर्वत के शिखर प्रान्त से सोल्लास प्रवाहित होने वाली गङ्गा-जी के जल की धारा के समान मोतियों के हार की शोभा देखी गयी थी, मृत्यु के पश्चात् सम्पूर्ण दिशाओं की श्मशान-भूमियों में नारी के उसी स्तनका कुत्ते अन्न के छोटे-से पिण्ड. की भाँति आस्वादन करते हैं। जैसे वन में चरने वाले गदहे या ऊँट के अङ्ग रक्त-मांस और हड्डियों से सम्पन्न हैं, उसी प्रकार कामिनियों के अङ्ग भी उन्हीं उपकरणों से युक्त हैं। फिर नारी के प्रति ही लोगों का इतना आग्रह या आकर्षण क्यों है ? मुने ! लोग केवल स्त्री के शरीर में जिस आपात-रमणीयता की कल्पना करते हैं, मेरी मान्यता के अनुसार वह भी उसमें है नहीं । उसमें जो रमणीयता की प्रतीति होती है, उसका एकमात्र कारण मोह ही है । मन में विकार उत्पन्न करने वाली मदिरा में और युवती स्त्री में क्या अन्तर है ? एक जहाँ मद ( नशे ) के द्वारा मनुष्य को प्रचुर उल्लास प्रदान करती है, वहाँ दूसरी काम का भाव जगाकर पुरुष के लिये आनन्ददायिनी बनती है ( अत:अपना कल्याण चाहने वाले पुरुष के लिये दोनों ही सामान्य रूप से त्याज्य हैं )। जैसे धूम को ही केश के रूप में धारण करने वाली प्रज्वलित अग्निशिखा, जो देखने में सुन्दर किंतु छूने में दुस्सह है, तिनकों को जला डालती है, उसी प्रकार केश और काजल धारण करने वाली तथा नेत्रों को प्रिय लगने वाली नारियाँ, जिनका स्पर्श परिणाम में दुःख देने वाला है, पुरुष को वासना की आग से जलाती रहती हैं। जैसे विष की लता सुन्दर फूलों से मनोहर लगती, नये-नये पल्लवों से सुशोभित होती, भ्रमरों की क्रीडास्थली बनती, पुष्प गुच्छ धारण करती, फूलों के केसर से पीले रंग की प्रतीत होती, अपना सेवन करने वाले मनुष्य को मार डालती या पागल बना देती है, उसी प्रकार कमनीया कामिनी फूलों का शृङ्गार धारण करने के कारण मनोहारिणी लगती, करपल्लवों से सुशोभित होती, भ्रमरों के समान चञ्चल नेत्रों के कटाक्ष-त्रिलास का प्रदर्शन करती, पुष्प-गुच्छों के समान स्तनों को वक्ष पर धारण करती, फूलों के केसर की भाँति सुनहरी गौर कान्ति से प्रकाशित होती, मनुष्यों के विनाश के लिये तत्पर रहती और काम-भाव से अपना सेवन करने वालों को उन्माद एवं मृत्यु आदि के अधीन कर देती है । मुनिश्रेष्ठ ! कामरूपी किरात ( बहेलिये ) ने मूद-चित्त मानवरूपी पक्षियों को फांसने के लिये स्त्रीरूपी जाल को फैला रक्खा है। जन्म-स्थान रूप छोटे-छोटे जलाशयों में उत्पन्न हो धन रूपी पङ्क में विचरने वाले पुरुष रूपी मत्स्यों को फँसाने के लिये नारी बंसो के काँटे में लगी हुई आटे को गोली के समान है और दुर्वासना ही उसकी डोर है । नारी के स्तन से, नेत्र से, नितम्ब से अथवा भौंइ से, जिसमें सार वस्तु के नाम पर केवल मांस है, अतएव जो किसी काम की वस्तु नहीं है, मेरा क्या प्रयोजन है ! मैं वह सब लेकर क्या करूँगा ! ब्रह्मन् ! इधर मांस, इधर रक्त और इधर हड्डियाँ हैं; यही नारी का शरीर है, जो कुछ ही दिनों में जीर्ण-शीर्ण हो जाता है । संसार के मनुष्यो ! नारी के अङ्गों का थोड़े ही समय में होने वाला यह परिणाम मैंने तुम्हें बताया है, फिर तुम क्यों भ्रम के पीछे दौड़ रहे हो ! पाँच भूतों के सम्मिश्रण से बना हुआ अङ्गो का संगठन ही नारी नाम से प्रसिद्ध हो रहा है; अत: विवेक-बुद्धि से सम्पन्न कोई भी पुरुष आसक्ति से प्रेरित होकर क्यों उसकी ओर टूट पड़ेगा ! जैसे हथिनी के लिये चञ्चल हुआ हाथी विन्ध्याचल पर्वत पर उसे फंसाने के लिये बनाये हुर गड्ढे में गिरकर बंध जाता और परम शोचनीय अवस्था को पहुँच जाता है, यही दशा तरुणी स्त्री के मोहमें फंसे हुए तरुण पुरुषकी होती है। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

+15 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 15 शेयर

देवादिदेव महादेव जी द्वारा राम नाम की महिमा 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ महादेव जी को एक बार बिना कारण के किसी को प्रणाम करते देखकर पार्वती जी ने पूछा आप किसको प्रणाम करते रहते हैं? शिव जी ने अपनी धर्मपत्नी पार्वती जी से कहते हैं की, हे देवी! जो व्यक्ति एक बार *राम* कहता है उसे मैं तीन बार प्रणाम करता हूँ। पार्वती जी ने एक बार शिव जी से पूछा आप श्मशान में क्यूँ जाते हैं और ये चिता की भस्म शरीर पे क्यूँ लगते हैं? उसी समय शिवजी पार्वती जी को श्मशान ले गए। वहाँ एक शव अंतिम संस्कार के लिए लाया गया। लोग *राम नाम सत्य है कहते हुए शव को ला रहे थे। शिव जी ने कहा की देखो पार्वती इस श्मशान की ओर जब लोग आते हैं तो *राम* नाम का स्मरण करते हुए आते हैं। और इस शव के निमित्त से कई लोगों के मुख से मेरा अतिप्रिय दिव्य *राम* नाम निकलता है उसी को सुनने मैं श्मशान में आता हूँ, और इतने लोगो के मुख से *राम* नाम का जप करवाने में निमित्त बनने वाले इस शव का मैं सम्मान करता हूँ, प्रणाम करता हूँ, और अग्नि में जलने के बाद उसकी भस्म को अपने शरीर पर लगा लेता हूँ। *राम* नाम बुलवाने वाले के प्रति मुझे इतना प्रेम है। एक बार शिवजी कैलाश पर पहुंचे और पार्वती जी से भोजन माँगा। पार्वती जी विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर रहीं थी। पार्वती जी ने कहा अभी पाठ पूरा नही हुआ, कृपया थोड़ी देर प्रतीक्षा कीजिए। शिव जी ने कहा की इसमें तो समय और श्रम दोनों लगेंगे। संत लोग जिस तरह से सहस्र नाम को छोटा कर लेते हैं और नित्य जपते हैं वैसा उपाय कर लो। पार्वती जी ने पूछा वो उपाय कैसे करते हैं? मैं सुनना चाहती हूँ। शिव जी ने बताया, केवल एक बार *राम* कह लो तुम्हे सहस्र नाम, भगवान के एक हज़ार नाम लेने का फल मिल जाएगा। एक *राम* नाम हज़ार दिव्य नामों के समान है। पार्वती जी ने वैसा ही किया। पार्वत्युवाच - केनोपायेन लघुना विष्णोर्नाम सहस्रकं? पठ्यते पण्डितैर्नित्यम् श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो।। ईश्वर उवाच- श्री राम राम रामेति, रमे रामे मनोरमे। सहस्र नाम तत्तुल्यम राम नाम वरानने।। यह *राम* नाम सभी आपदाओं को हरने वाला, सभी सम्पदाओं को देने वाला दाता है, सारे संसार को विश्राम/शान्ति प्रदान करने वाला है। इसीलिए मैं इसे बार बार प्रणाम करता हूँ। आपदामपहर्तारम् दातारम् सर्वसंपदाम्। लोकाभिरामम् श्रीरामम् भूयो भूयो नमयहम्।। भव सागर के सभी समस्याओं और दुःख के बीजों को भूंज के रख देनेवाला/समूल नष्ट कर देने वाला, सुख संपत्तियों को अर्जित करने वाला, यम दूतों को खदेड़ने/भगाने वाला केवल *राम* नाम का गर्जन(जप) है। भर्जनम् भव बीजानाम्, अर्जनम् सुख सम्पदाम्। तर्जनम् यम दूतानाम्, राम रामेति गर्जनम्। प्रयास पूर्वक स्वयम् भी *राम* नाम जपते रहना चाहिए और दूसरों को भी प्रेरित करके *राम* नाम जपवाना चाहिए। इस से अपना और दोसरों का तुरन्त कल्याण हो जाता है। यही सबसे सुलभ और अचूक उपाय है। इसीलिए हमारे देश में प्रणाम *राम राम* कहकर किया जाता है। *।।राम राम।।* 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

+23 प्रतिक्रिया 5 कॉमेंट्स • 40 शेयर

भगवान शिव के जन्म की कथा? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ हम सबके प्रिय भगवान शिव का जन्म नहीं हुआ है वे स्वयंभू हैं। लेकिन पुराणों में उनकी उत्पत्ति का विवरण मिलता है। विष्णु पुराण के अनुसार ब्रह्मा भगवान विष्णु की नाभि कमल से पैदा हुए जबकि शिव भगवान विष्णु के माथे के तेज से उत्पन्न हुए बताए गए हैं। विष्णु पुराण के अनुसार माथे के तेज से उत्पन्न होने के कारण ही शिव हमेशा योगमुद्रा में रहते हैं। श्रीमद् भागवत के अनुसार एक बार जब भगवान विष्णु और ब्रह्मा अहंकार से अभिभूत हो स्वयं को श्रेष्ठ बताते हुए लड़ रहे थे तब एक जलते हुए खंभे से भगवान शिव प्रकट हुए। विष्णु पुराण में वर्णित शिव के जन्म की कहानी शायद भगवान शिव का एकमात्र बाल रूप वर्णन है। इसके अनुसार ब्रह्मा को एक बच्चे की जरूरत थी। उन्होंने इसके लिए तपस्या की। तब अचानक उनकी गोद में रोते हुए बालक शिव प्रकट हुए। ब्रह्मा ने बच्चे से रोने का कारण पूछा तो उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया कि उसका कोई नाम नहीं है इसलिए वह रो रहा है। तब ब्रह्मा ने शिव का नाम ‘रूद्र’ रखा जिसका अर्थ होता है ‘रोने वाला’। शिव तब भी चुप नहीं हुए। इसलिए ब्रह्मा ने उन्हें दूसरा नाम दिया पर शिव को नाम पसंद नहीं आया और वे फिर भी चुप नहीं हुए। इस तरह शिव को चुप कराने के लिए ब्रह्मा ने 8 नाम दिए और शिव 8 नामों (रूद्र, शर्व, भाव, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव) से जाने गए। शिव पुराण के अनुसार यह नाम पृथ्वी पर लिखे गए थे। शिव के इस प्रकार ब्रह्मा पुत्र के रूप में जन्म लेने के पीछे भी विष्णु पुराण की एक पौराणिक कथा है। इसके अनुसार जब धरती, आकाश, पाताल समेत पूरा ब्रह्माण्ड जलमग्न था तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) के सिवा कोई भी देव या प्राणी नहीं था। तब केवल विष्णु ही जल सतह पर अपने शेषनाग पर लेटे नजर आ रहे थे। तब उनकी नाभि से कमल नाल पर ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा-विष्णु जब सृष्टि के संबंध में बातें कर रहे थे तो शिव जी प्रकट हुए। ब्रह्मा ने उन्हें पहचानने से इंकार कर दिया। तब शिव के रूठ जाने के भय से भगवान विष्णु ने दिव्य दृष्टि प्रदान कर ब्रह्मा को शिव की याद दिलाई। ब्रह्मा को अपनी गलती का एहसास हुआ और शिव से क्षमा मांगते हुए उन्होंने उनसे अपने पुत्र रूप में पैदा होने का आशीर्वाद मांगा। शिव ने ब्रह्मा की प्रार्थना स्वीकार करते हुए उन्हें यह आशीर्वाद प्रदान किया। जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना शुरू की तो उन्हें एक बच्चे की जरूरत पड़ी और तब उन्हें भगवान शिव का आशीर्वाद ध्यान आया। अत: ब्रह्मा ने तपस्या की और बालक शिव बच्चे के रूप में उनकी गोद में प्रकट हुए। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

+28 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 59 शेयर

जानिए कौन थे हनुमान के पुत्र, कैसे हुई उससे मुलाकात हनुमान जी के पसीने की एक बूंद पानी में टपकी और उस बूंद को मछली ने पी लिया. उसी पसीने की बूंद से मछली गर्भवती हो गई और उससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम पड़ा मकरध्वज. जीवन में कोई काम ना बने तो करें हनुमान जी का व्रत, ये है प्रक्रिया हनुमान जी का यह बेटा किसी स्त्री से नहीं बल्कि एक मछली से हुआ. प्रचलित कथा के अनुसार रावण ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगाई और अपनी पूंछ से हनुमान से पूरी लंका जला दी. लंका जलाने के बाद वह पूंछ में लगी आग को बुझाने समुद्र में उतरे. उसी समय उनके पसीने की एक बूंद पानी में टपकी और उस बूंद को मछली ने पी लिया. उसी पसीने की बूंद से वह मछली गर्भवती हो गई और उससे उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम पड़ा मकरध्वज. हनुमान और मकरध्वज की मुलाकात एक युद्ध के दौरान हुई. जब अहिरावण श्रीराम और लक्ष्मण को देवी के समक्ष बलि चढ़ाने के लिए पाताल ले गए थे तब उन्हें मुक्त कराने के लिए हनुमान पाताल लोक पहुंचे और वहां उनकी भेंट मकरध्वज से हुई. यहां मकरध्वज ने अपनी पूरी कथा हनुमान को सुनाई. हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया और मकरध्वज को पाताल लोक का अधिपति नियुक्त कर वहां से चले गए.

+6 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 3 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB