💐गजेन्द्र मोक्ष💐

💐गजेन्द्र मोक्ष💐

भगवान श्री कृष्ण चंद्र की जय


क्षीरसागर में स्थित त्रिकूट पर्वत पर लोहे, चांदी और सोने की तीन विशाल चोटियां थीं. उनके बीच विशाल जंगल में गजेंद्र हाथी अपनी असंख्य पत्नियों के साथ रहता था.

एक बार गजेंद्र अपनी पत्नियों के साथ प्यास बुझाने के लिए एक तालाब पर पहुंचा. प्यास बुझाने के बाद गजेंद्र की जल-क्रीड़ा करने की इच्छा हुई. वह पत्नियों के साथ तालाब में क्रीडा करने लगा.

दुर्भाग्यवश उसी समय एक अत्यंत विशालकाय ग्राह(मगरमच्छ) वहां पहुंचा. उसने गजेंद्र के दाएं पैर को अपने दाढ़ों में जकड़कर तालाब के भीतर खींचना शुरू किया.

गजेंद्र पीड़ा से चिंघाड़ने लगा. उसकी पत्नियां तालाब के किनारे अपने पति के दुख पर आंसू बहाने लगीं. गजेंद्र अपने पूरे बल के साथ ग्राह से युद्ध कर रहा था.

परंतु वह ग्राह की पकड़ से मुक्त नहीं हो पा रहा था. गजेंद्र अपने दाँतों से मगरमच्छ पर वार करता तो ग्राह उसके शरीर को अपने नाखूनों से खरोंच लेता और खून की धारा निकल आतीं. ग्राह और हाथी के बीच बहुत समय तक युद्ध हुआ. पानी के अंदर ग्राह की शक्ति ज़्यादा होती है. ग्राह गजेंद्र का खून चूसकर बलवान होता गया जबकि गजेंद्र के शरीर पर मात्र कंकाल शेष था.
गजेंद्र दुखी होकर सोचने लगा- मैं अपनी प्यास बुझाने यहां आया था. प्यास बुझाकर मुझे चले जाना चाहिए था. मैं क्यों इस तालाब में उतर पड़ा? मुझे कौन बचायेगा?

उसे अपनी मृत्यु दिख रही थी. फिर भी मन के किसी कोने में यह विश्वास था कि उसने इतना लंबा संघर्ष किया है, उसकी जान बच सकती है. उसे ईश्वर का स्मरण हुआ तो नारायण की स्तुति कर उन्हें पुकारने लगा.

सारा संसार जिनमें समाया हुआ है, जिनके प्रभाव से संसार का अस्तित्व है, जो इसमें व्याप्त होकर इसके रूपों में प्रकट होते हैं, मैं उन्हीं नारायण की शरण लेता हूं. हे नारायण मुझ शरणागत की रक्षा करिए.

विविधि लीलाओं के कारण देवों, ऋषियों के लिए अगम्य अगोचर बने जिन श्रीहरि की महिमा वर्णन से परे है. मैं उस दयालु नारायण से प्राण रक्षा की गुहार लगाता हूं.

नारायण के स्मरण से गजेंद्र की पीड़ा कुछ कम हुई. प्रभु के शरणागत को कष्ट देने वाले ग्राह के जबड़ों में भयंकर दर्द शुरू हुआ फिर भी वह क्रोध में जोर से उसके पैर चबाने लगा. छटपटाते गजेंद्र ने स्मरण किया- मुझ जैसे घमण्डी जब तक संकट में नहीं फंसते, तब तक आपको याद नहीं करते. यदि दुख न हो तो हमें आपकी ज़रूरत का बोध नहीं होता.
आप जब तक प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देते, तब तक प्राणी आपका अस्तित्व तक नहीं मानता लेकिन कष्ट में आपकी शरण में पहुंच जाता है. जीवों की पीड़ा को हरने वाले देव आप सृष्टि के मूलभूत कारण हैं.

गजेंद्र ने श्रीहरि की स्तुति जारी रखी- मेरी प्राण शक्ति जवाब दे चुकी हैं. आंसू सूख गए हैं. मैं ऊंचे स्वर में पुकार भी नहीं सकता. आप चाहें तो मेरी रक्षा करें या मेरे हाल पर छोड़ दें.

सब आपकी दया पर निर्भर है. आपके ध्यान के सिवा दूसरा कोई मार्ग नहीं. मुझे बचाने वाला भी आपके सिवाय कोई नहीं है. यदि मृत्यु भी हुई तो आपका स्मरण करते मरूंगा.

पीड़ा से तड़पता गजेंद्र सूंड उठाकर आसमान की ओर देखने लगा. मगरमच्छ को लगा कि उसकी शक्ति जवाब देती जा रही है. उसका मुंह खुलता जा रहा है.

भक्त की करूणाभरी पुकार सुनकर नारायण आ पहुंचे. गजेंद्र ने उस अवस्था में भी तालाब का कमलपुष्प और जल प्रभु के चरणों में अर्पण किया. प्रभु भक्त की रक्षा को कूद पड़े.

उन्होंने ग्राह के जबड़े से गजेंद्र का पैर निकाला और चक्र से ग्राह का मुख चीर दिया. ग्राह तुरंत एक गंधर्व में बदल गया. दरअसल वह ग्राह हुहू नामक एक गंधर्व था.

एक बार देवल ऋषि पानी में खड़े होकर तपस्या कर रहे थे. गंधर्व को शरारत सूझी. उसने ग्राह रूप धरा और जल में कौतुक करते हुए ऋषि के पैर पकड़ लिए. क्रोधित ऋषि ने उसे शाप दिया कि तुम मगरमच्छ की तरह इस पानी में पड़े रहो किंतु नारायण के प्रभाव से वह शापमुक्त होकर अपने लोक को चला गया.
श्रीहरि के दर्शन से गजेंद्र भी अपनी खोई हुई ताक़त और पूर्व जन्म का ज्ञान भी प्राप्त कर सका. गजेंद्र पिछले जन्म में इंद्रद्युम्न नामक एक विष्णुभक्त राजा थे.

श्रीविष्णु के ध्यान में डूबे राजा ने एक बार ऋषि अगस्त्य के आगमन का ख़्याल न किया. राजा ने युवावस्था में ही गृहस्थ आश्रम को त्यागकर वानप्रस्थ ले लिया.

राजा ब्रह्मा द्वारा प्रतिपादित आश्रम व्यवस्था को भंग कर रहा था, ऋषि इससे भी क्षुब्ध थे. उन्होंने शाप दिया- तुम किसी व्यवस्था को नहीं मानते इसलिए अगले जन्म में मत्त हाथी बनोगे.

राजा ने शाप स्वीकार करते हुए ऋषि से अनुरोध किया कि मैं अगले जन्म में भी नारायण भक्त रहूं. अगस्त्य उसकी नारायण भक्ति से प्रसन्न हुए और तथास्तु कहा.

श्रीहरि की कृपा से गजेंद्र शापमुक्त हुआ. नारायण ने उसे अपना सेवक पार्षद बना लिया. गजेंद्र ने पीड़ा में छटपटाते हुए नारायण की स्तुति में जो श्लोक कहे थे उसे गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र कहा जाता है. (भागवत महापुराण)

।। राधे राधे गोविंदा ।।

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Khanuram Bargot Sep 5, 2017
jai shree krishna radhe radhe 🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌🙌

Dr Komal ram sahu rajim Apr 1, 2018
बहुत अच्छा लगा आपके विचार और लेखन को सार्थक कर धन्यवाद देना चाहता हूँ

VARUN KUMAR Oct 14, 2018
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय🙏

शनिदेव का लोहे से क्या है संबंध? जानें हनुमान जी से जुड़ी यह कथा शनिदेव को सूर्य पुत्र के नाम से भी जाना जाता है। अत्यंत तेज सूर्य की ऊष्मा की झलक शनिदेव में दिखाई देती है। धार्मिक कथानुसार, जब लंका से हनुमान जी ने शनि भगवान को शनिचरा मंदिर मुरैना में फेंका था तब से इस स्थान पर लोहे के मात्रा प्रचुर हो गयी थी। भगवान शनि का वार शनिवार को बताया गया है। शनिवार को कुछ चीजे खरीदना वर्जित है जिसमें से एक है घर पर नया लोहा खरीद कर लाना। इसे घर पर लाने से शनि का प्रकोप सहन करना पड़ता है। घर में कलह और अशांति हो जाती है| हालांकि इस दिन लोहे का दान करना अत्यंत शुभ माना गया है। शनिदेव के अशुभ प्रभावों की शांति या साढ़े साती या ढैय्या से बचाव हेतु लोहा धारण किया जाता है किन्तु यह लौह मुद्रिका सामान्य लोहे की नहीं बनाई जाती। यह घोड़े के नाल से बनती है जो उसके खुर के बचाव के लिए लगाई जाती है। इस लोहे से रिंग बनाई जाती है जो शनि के कुपित प्रभाव को शांत करती है। इसे आप सही और उत्तम समय जैसे शनिवार, पुष्य, रोहिणी, श्रवण नक्षत्र हो अथवा चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी तिथि पर खरीदे और धारण करें। काले घोड़े की नाल के प्रभावशाली उपाय और लाभ से कई कार्य सिद्ध होते हैं। नाव की कील भी इस कार्य के लिए उपयुक्त रहती है।

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शनिदेव कथा एक समय सभी नवग्रहओं : सूर्य, चंद्र, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु में विवाद छिड़ गया, कि इनमें सबसे बड़ा कौन है? सभी आपस मेंं लड़ने लगे, और कोई निर्णय ना होने पर देवराज इंद्र के पास निर्णय कराने पहुंचे. इंद्र इससे घबरा गये, और इस निर्णय को देने में अपनी असमर्थता जतायी. परन्तु उन्होंने कहा, कि इस समय पृथ्वी पर राजा विक्रमादित्य हैं, जो कि अति न्यायप्रिय हैं। वे ही इसका निर्णय कर सकते हैं। सभी ग्रह एक साथ राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचे, और अपना विवाद बताया। साथ ही निर्णय के लिये कहा। राजा इस समस्या से अति चिंतित हो उठे, क्योंकि वे जानते थे, कि जिस किसी को भी छोटा बताया, वही कुपित हो उठेगा. तब राजा को एक उपाय सूझा. उन्होंने स्वर्ण, रजत, कांस्य, पीतल, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लौह से नौ सिंहासन बनवाये, और उन्हें इसी क्रम से रख दिये. फ़िर उन सबसे निवेदन किया, कि आप सभी अपने अपने सिंहासन पर स्थान ग्रहण करें। जो अंतिम सिंहासन पर बेठेगा, वही सबसे छोटा होगा। इस अनुसार लौह सिंहासन सबसे बाद में होने के कारण, शनिदेव सबसे बाद में बैठे. तो वही सबसे छोटे कहलाये. उन्होंने सोचा, कि राजा ने यह जान बूझ कर किया है। उन्होंने कुपित हो कर राजा से कहा “राजा! तू मुझे नहीं जानता. सूर्य एक राशि में एक महीना, चंद्रमा सवा दो महीना दो दिन, मंगल डेड़ महीना, बृहस्पति तेरह महीने, व बुद्ध और शुक्र एक एक महीने विचरण करते हैं. परन्तु मैं ढाई से साढ़े-सात साल तक रहता हुँ. बड़े बड़ों का मैंने विनाश किया है. श्री राम की साढ़े साती आने पर उन्हें वनवास हो गया, रावण की आने पर उसकी लंका को बंदरों की सेना से परास्त होना पड़ा.अब तुम सावधान रहना. ” ऐसा कहकर कुपित होते हुए शनिदेव वहां से चले गये. अन्य देवता खुशी खुशी चले गये। कुछ समय बाद राजा की साढ़े साती आयी। तब शनि देव घोड़ों के सौदागर बनकर वहां आये। उनके साथ कई बढ़िया घोड़े थे। राजा ने यह समाचार सुन अपने अश्वपाल को अच्छे घोड़े खरीदने की आज्ञा दी। उसने कई अच्छे घोड़े खरीदे व एक सर्वोत्तम घोड़े को राजा को सवारी हेतु दिया। राजा ज्यों ही उस पर बैठा, वह घोड़ा सरपट वन की ओर भागा,भिषण वन में पहुंच वह अंतर्धान हो गया, और राजा भूखा प्यासा भटकता रहा। तब एक ग्वाले ने उसे पानी पिलाया. राजा ने प्रसन्न हो कर उसे अपनी अंगूठी दी। वह अंगूठी देकर राजा नगर को चल दिया, और वहां अपना नाम उज्जैन निवासी वीका बताया। वहां एक सेठ की दूकान में उसने जल इत्यादि पिया. और कुछ विश्राम भी किया। भाग्यवश उस दिन सेठ की बड़ी बिक्री हुई। सेठ उसे खाना इत्यादि कराने खुश होकर अपने साथ घर ले गया। वहां उसने एक खूंटी पर देखा, कि एक हार टंगा है, जिसे खूंटी निगल रही है। थोड़ी देर में पूरा हार गायब था। तब सेठ ने आने पर देखा कि हार गायब है। उसने समझा कि वीका ने ही उसे चुराया है। उसने वीका को कोतवाल के पास पकड़वा दिया। फिर राजा ने भी उसे चोर समझ कर हाथ पैर कटवा दिये। वह चौरंगिया बन गया।और नगर के बाहर फिंकवा दिया गया। वहां से एक तेली निकल रहा था, जिसे दया आयी, और उसने वीका को अपनी गाडी़ में बिठा लिया। वह अपनी जीभ से बैलों को हांकने लगा। उस काल राजा की शनि दशा समाप्त हो गयी। वर्षा काल आने पर वह मल्हार गाने लगा। तब वह जिस नगर में था, वहां की राजकुमारी मनभावनी को वह इतना भाया, कि उसने मन ही मन प्रण कर लिया, कि वह उस राग गाने वाले से ही विवाह करेगी। उसने दासी को ढूंढने भेजा। दासी ने बताया कि वह एक चौरंगिया है। परन्तु राजकुमारी ना मानी। अगले ही दिन से उठते ही वह अनशन पर बैठ गयी, कि विवाह करेगी तो उसी से। उसे बहुतेरा समझाने पर भी जब वह ना मानी, तो राजा ने उस तेली को बुला भेजा, और विवाह की तैयारी करने को कहा।फिर उसका विवाह राजकुमारी से हो गया। तब एक दिन सोते हुए स्वप्न में शनिदेव ने राजा से कहा: राजन्, देखा तुमने मुझे छोटा बता कर कितना दुःख झेला है। तब राजा ने उनसे क्षमा मांगी, और प्रार्थना की , कि हे शनिदेव जैसा दुःख मुझे दिया है, किसी और को ना दें। शनिदेव मान गये, और कहा: जो मेरी कथा और व्रत कहेगा, उसे मेरी दशा में कोई दुःख ना होगा। जो नित्य मेरा ध्यान करेगा, और चींटियों को आटा डालेगा, उसके सारे मनोरथ पूर्ण होंगे। साथ ही राजा को हाथ पैर भी वापस दिये। प्रातः आंख खुलने पर राजकुमारी ने देखा, तो वह आश्चर्यचकित रह गयी। वीका ने उसे बताया, कि वह उज्जैन का राजा विक्रमादित्य है। सभी अत्यंत प्रसन्न हुए। सेठ ने जब सुना, तो वह पैरों पर गिर कर क्षमा मांगने लगा। राजा ने कहा, कि वह तो शनिदेव का कोप था। इसमें किसी का कोई दोष नहीं। सेठ ने फिर भी निवेदन किया, कि मुझे शांति तब ही मिलेगी जब आप मेरे घर चलकर भोजन करेंगे। सेठ ने अपने घर नाना प्रकार के व्यंजनों से राजा का सत्कार किया। साथ ही सबने देखा, कि जो खूंटी हार निगल गयी थी, वही अब उसे उगल रही थी। सेठ ने अनेक मोहरें देकर राजा का धन्यवाद किया, और अपनी कन्या श्रीकंवरी से पाणिग्रहण का निवेदन किया। राजा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। कुछ समय पश्चात राजा अपनी दोनों रानीयों मनभावनी और श्रीकंवरी को सभी उपाहार् सहित लेकर उज्जैन नगरी को चले। वहां पुरवासियों ने सीमा पर ही उनका स्वागत किया। सारे नगर में दीपमाला हुई, व सबने खुशी मनायी। राजा ने घोषणा की , कि मैंने शनि देव को सबसे छोटा बताया था, जबकि असल में वही सर्वोपरि हैं। तबसे सारे राज्य में शनिदेव की पूजा और कथा नियमित होने लगी। सारी प्रजा ने बहुत समय खुशी और आनंद के साथ बीताया। जो कोई शनि देव की इस कथा को सुनता या पढ़ता है, उसके सारे दुःख दूर हो जाते हैं। व्रत के दिन इस कथा को अवश्य पढ़ना चाहिये।

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌼🌼🌼〰️〰️ ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ★ब्राह्म पर्व★ (एक सौ छब्बीसवाँ दिन) भगवान आदित्य की सप्तावरण-पूजन-विधि... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गतांक से आगे... भगवान् श्रीकृष्ण बोले-वत्स! अब मैं दिवाकर भगवान् सूर्यनारायण की पूजा विधि बतलाता हूँ। एक वेदी पर अष्टदल कमलयुक्त मण्डल बनाकर उसमें कालचक्र की कल्पना करनी चाहिये। उसे बारह अरों से युक्त होना चाहिये। ये ही सर्वात्मा, सभी देवताओं में श्रेष्ठ, उज्ज्वल किरणों से युक्त खखोल्क नामक भगवान् सूर्यदेव हैं। इसमें हजार किरणों से युक्त चतुर्बाहु भगवान् सूर्य की पूजा करनी चाहिये। इनके पश्चिम में अरुण, दक्षिण में निक्षुभा देवी, दक्षिण में ही रेवन्त तथा उत्तर में पिंगल की पूजा करनी चाहिये और वहीं संज्ञा की भी पूजा करनी चाहिये। अग्नि कोण में लेखक की, नैर्ऋत्य में अश्विनीकुमारों की और वायव्यकोण में वैवस्वत मनु की तथा ईशान कोण में लोकपावनी देवी यमुना की पूजा करनी चाहिये। द्वितीय आवरण में पूर्व में आकाश की, दक्षिण में देवी की, पश्चिम में गरुड की और उत्तर में नागराज ऐरावत की पूजा शुभ होती है। अग्निकोण में हेलि, नै्ऋत्यकोण में प्रहेलि, वायव्य में उर्वशी और ईशानकोण में विनता देवी की पूजा करनी चाहिये। तृतीयावरण में पूर्व में शुक्र, पश्चिम में शनि, उत्तर में बृहस्पति, ईशान में बुध और मण्डल के अग्निकोण में चन्द्रमा की पूजा करनी चाहिये। नैरऋत्य कोण में राहु तथा वायव्यकोण में केतु की पूजा करनी चाहिये। चौथे आवरण में लेखक, शाण्डिली पुत्र, यम, विरूपाक्ष, वरुण, वायुपुत्र, ईशान तथा कुबेर आदि की उन -उनकी दिशाओं में पूजा करनी चाहिये। पाँचवें आवरण में पूर्वादि क्रम से महाश्वेता, श्री, ऋद्धि, विभूति, धृति, उन्नति, पृथ्वी तथा महाकीर्ति आदि देवियों की पूजा करनी चाहिये तथा इन्द्र, विष्णु, अर्यमा, भग, पर्जन्य,विवस्वान्, अर्क, त्वष्टा आदि द्वादश आदित्यों की पूजा छठे आवरण में करनी चाहिये। सिर, नेत्र, अस्त्र-शस्त्र से युक्त रथ सहित सूर्य की सातवें आवरण में पूजा करनी चाहिये। यक्ष, गन्धर्व, मासाधिपति तथा संवत्सर आदि की भी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद भगवान् भास्कर का पुष्प, गन्ध आदि से विधिपूर्वक पूजन कर-'ॐ खखोल्काय नम: ' इस मूल मन्त्र से अपने अङ्गों का स्पर्श अर्थात हृदयादिन्यास करते हुए पूजन करना चाहिये। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक इस विधि से सूर्य की नित्य अथवा दोनों पक्षों की सप्तमी के दिन पूजन करता है, वह परमपद को प्राप्त कर लेता है। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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शनिदेव की पौराणिक कथा 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ राजा नल और शनिदेव 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ नल निषध देश के राजा थे, विदर्भ देश के राजा भीष्मक की कन्या दमयन्ती उनकी महारानी थी। पुण्यश्लोक महाराज नल सत्य के प्रेमी थे, अतः कलियुग उनसे स्वाभाविक द्वेष करता था। कलिकी कुचाल से राजा नल द्यूतक्रीड़ा में अपना सम्पूर्ण राज्य और ऐश्वर्य हार गये तथा महारानी दमयन्ती के साथ वन-वन भटकने लगे। राजा नल ने अपनी इस दुर्दशा से मुक्ति के लिये शनिदेव से प्रार्थना की। राज्य नष्ट हुए राजा नल को शनिदेव ने स्वप्न में अपने एक प्रार्थना-मन्त्र का उपदेश दिया था। उसी नाम-स्तुतिसे उन्हें पुन: राज्य उपलब्ध हुआ था। सर्वकामप्रद वह स्तुति इस प्रकार है। क्रोडं नीलाञ्जनप्रख्यं नीलवर्णसमस्रजम्। छायामार्तण्डसम्भूतं नमस्यामि शनैश्चरम्॥ नमोऽर्कपुत्राय शनैश्चराय नीहारवर्णाञ्जनमेचकाय। श्रुत्वा रहस्यं भव कामदश्च फलप्रदो मे भव सूर्यपुत्र॥ नमोऽस्तु प्रेतराजाय कृष्णदेहाय वै नमः। शनैश्चराय क्रूराय शुद्धबुद्धिप्रदायिने॥ य एभिर्नामभिः स्तौति तस्य तुष्टो भवाम्यहम्। मदीयं तु भयं तस्य स्वप्नेऽपि न भविष्यति॥ अर्थात्👉 क्रूर, नील अंजन के समान आभावाले, नीलवर्ण की माला धारण करने वाले, छाया और सूर्य से उत्पन्न शनिदेव को मैं नमस्कार करता हूँ। जिनका धूम्र और नील अंजन के समान वर्ण है, ऐसे अर्क (सूर्य)- पुत्र शनैश्चर के लिये नमस्कार है। इस रहस्य (प्रार्थना)- को सुनकर हे सूर्यपुत्र ! मेरी कामना पूर्ण करने वाले और फल प्रदान करने वाले हों। प्रेतराज के लिये नमस्कार है, कृष्ण वर्ण के शरीर वाले के लिये नमस्कार है; क्रूर, शुद्ध बुद्धि प्रदान करने वाले शनैश्चर के लिये नमस्कार हो। [इस स्तुतिको सुनकर शनिदेवने कहा-] जो मेरी इन नामों से स्तुति करता है, मैं उससे सन्तुष्ट होता हूँ। उसको मुझसे स्वप्नमें भी भय नहीं होगा। [भविष्यपुराण] 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (उत्पत्ति-प्रकरण) (चतुर्थ दिवस) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः मन के स्वरूप का विवेचन, मन एवं मनकल्पिलत दृश्य जगत की असत्ता का निरूपण तथा महाप्रलय काल में समस्त जगत को अपने मे लीन करके एकमात्र परमात्मा ही शेष रहते है और वे ही सबके मूल है, इसका प्रतिपादन...(भाग 1) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गतांक से आगे... श्रीरामचन्द्रजी ने पूछा- भगवन् ! मन का स्वरूप कैसा है, यह मुझे स्पष्ट रूप से बताइये; क्योंकि मन ही इस सम्पूर्ण लोकंमञ्जरी का विस्तार करता है। श्रीवसिष्ठजी ने कहा--श्रीराम ! जैसे शून्य तथा जड कोई आकार वाले आकाश का नाममात्र के अतिरिक्त दूसरा रूप दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी प्रकार शून्य एवं जड रूप इस संकल्पात्मक मन का नाम के सिवा कोई भी वास्तविक रूप नहीं दिखायी देता। यह जगत् क्षणिक संकल्परूपी मन से उत्पन्न हुआ है। मृगतृष्णा में प्रतीत होने वाले जल तथा चन्द्रमा में भ्रम से दीखने वाले द्वितीय चंद्रमा के समान ही इस मनःकल्पित जगत् का स्वरूप है। रघुनन्दन ! संकल्प को ही मन समझो। जैसे द्रवस्व (द्रवरूपता) से जल का भेद नहीं है और जैसे वायु से स्पन्दन (चेष्टा या गतिशीलता) भिन्न नहीं है, उसी प्रकार संकल्प से मन भिन्न नहीं है । प्रियवर श्रीराम ! जिस विषय के लिये सङ्कल्प होता है, उसमें मन सङ्कल्प रूप से स्थित रहता है । तात्पर्य यह कि जो सङ्कल्प है वही मन है। सङ्कल्प और मन को कभी कोई पृथक् नहीं कर पाया है (इन दोनों के पार्थक्य का अनुभव किसी को नहीं हुआ है)। मन को सङ्कल्प मात्र समझो। वह समष्टिगत मन ही पितामह ब्रह्मा है। अतिवाहिक देह (सङ्कल्पमय शरीर) रूपी ब्रह्मा को लोक में समष्टिगत मन कहा गया है। अतिद्या, संसार, चित्त, मन, बन्धन, मळ और तम-इन्हें श्रेष्ठ विद्वानों ने दृश्य के पर्यायवाची नाम माना है । संकल्प रूप दृश्य से अतिरिक्त मन का कुछ भी स्वरूप नहीं हैं । यह दृश्य-प्रपञ्च वास्तव में उत्पन्न ही नहीं हुआ है, यह बात में आगे चलकर फिर बताऊँगा। जैसे प्रकाश का आलोक स्वभाव है, जैसे चपलता वायु का स्वभाव है और जिस प्रकार द्रवीभूत होना जल का स्वभाव है, उसी प्रकार द्रष्टा में दृश्यव्व स्वभाव से ही विद्यवान है (अर्थात् द्रष्टा से दृश्य मिन्न नहीं है), जैसे सुवर्ण में बाजूबंद और कटक-कुण्डल आदि की स्थिति है जैसे मृगतृष्णा की नदी में जल की स्थिति है और जैसे सपने की नगरी में उठायी गयी दीवारकी स्थिति है, उसी प्रकार द्रष्टा में दश्य की स्थिति मानी गयी है। अर्थात् जैसे उपर्युक्त वस्तुएँ अपने अधिष्ठान से मिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार द्रष्टा से दृश्य की पृथक् सत्ता नहीं है द्रष्टा से दृश्य की पृथक् सत्ता न होने के कारण दृश्य का अभाव हो जाने पर जो द्रष्टा में बलात् द्रष्टपन को अभाव प्राप्त होता है, उसी को तुम असत् (मिथ्या दृश्य) के बाधित होने से सन्मात्र चिन्मयरूप में अवशिष्ट हुए आत्मा का केवली भाव ( या कैवल्य ) समझो । जब चित्त आत्मा के कैवल्य ( अद्वितीय चिन्मात्रस्वरूपता ) के बोध से तदाकार ( कैवल्यभाव को प्राप्त ) हो जाता है, तब उसकी राग-द्वेष आदि वासनाएँ उसी तरह शान्त हो जाती हैं, जैसे हवा के न चलने पर वृक्षों में कम्पन और जलाशय आदि में लहरों का उठना बंद हो जाता है । दिशा, भूमि और आकाश रूपी सभी प्रकाशनीय पदार्थों के न रहने पर जिस तरह प्रकाश का शुद्ध रूप ही अवशिष्ट रहता है, उसी प्रकार तीनों लोक, तू और मैं इश्यादि दृश्य-प्रपन्च की सत्ता न होने पर शुद्ध रूप से अवशिष्ट चिन्मय द्रष्टा का केवली भाव (कैश्ल्य) ही रह् जाता है । श्रीरामजी ने पूछा--ब्रह्मन् ! यदि दृश्य सत् है, तब तो यह शान्त या निवृत्त नहीं हो सकता; क्योंकि सत् का कभी अभाव नही होता और यदि यह दोष प्रदान करने वाला दृश्य असत् है, तब यह बात हमारी समझ में आती नहीं। इसलिये यह दृश्यरूपिणी बिषूचिका (हैजा) , जो मन से जन्म आदि के भ्रम को उत्पन्न करने वाली और दुःख की परम्परा को देनेवाली है, कैसे शान्त होगी ? ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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Anuradha Tiwari Jan 23, 2020

*उर्मिला* भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ तो उनकी पत्नी माँ सीता ने भी सहर्ष वनवास स्वीकार कर लिया। परन्तु बचपन से ही बड़े भाई की सेवा मे रहने वाले लक्ष्मण जी कैसे राम जी से दूर हो जाते! माता -सुमित्रा से तो उन्होंने आज्ञा ले ली थी, वन जाने की.. परन्तु जब पत्नी उर्मिला के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे तो सोच रहे थे कि माँ ने तो आज्ञा दे दी, परन्तु उर्मिला को कैसे समझाऊंगा!! क्या कहूंगा!! यदि बिना बताए जाऊंगा तो रो रो कर जान दे देगी और यदि बताया तो साथ जाने की ज़िद्द करने लगेगी और कहेगी कि यदि सीता जी अपने पति के साथ जा सकती हैं तो मैं क्यों नहीं!! यहीं सोच विचार कर के लक्ष्मण जी जैसे ही अपने कक्ष में पहुंचे तो देखा कि उर्मिला जी आरती का थाल हाथ में लेकर खड़ी थीं और बोलीं- "आप मेरी चिंता छोड़ प्रभु की सेवा में वन को जाओ। मैं आपको नहीं रोकुंगीं। मेरे कारण आपकी सेवा में कोई बाधा न आये, इसलिये साथ जाने की जिद्द भी नहीं करूंगी।" लक्ष्मण जी को कहने में संकोच हो रहा था। परन्तु उनके कुछ कहने से पहले ही उर्मिला जी ने उन्हें संकोच से बाहर निकाल दिया। वास्तव में यहीं पत्नी का धर्म है। पति संकोच में पड़े, उससे पहले ही पत्नी उसके मन की बात जानकर उसे संकोच से बाहर कर दे!! पत्नी का इतना त्याग और प्रेम देखकर लक्ष्मण जी भी रो पड़े। उर्मिला जी ने एक दीपक जलाया और विनती की कि मेरी इस आस को कभी बुझने नहीं देना। लक्ष्मण जी तो चले गये परन्तु 14 वर्ष तक उर्मिला ने एक तपस्विनी की भांति कठोर तप किया। वन में भैया-भाभी की सेवा में लक्ष्मण जी कभी सोये नहीं परन्तु उर्मिला ने भी अपने महलों के द्वार कभी बंद नहीं किये और सारी रात जाग जागकर उस दीपक की लौ को बुझने नहीं दिया। मेघनाथ से युद्ध करते हुए जब लक्ष्मण को शक्ति लग जाती है और हनुमान जी उनके लिये संजीवनी का पहाड़ लेकर लौट रहे होते हैं, तो बीच में अयोध्या में भरत जी उन्हें राक्षस समझकर बाण मारते हैं और हनुमान जी गिर जाते हैं। तब हनुमान जी सारा वृत्तांत सुनाते हैं कि सीता जी को रावण ले गया, लक्ष्मण जी मूर्छित हैं। यह सुनते ही कौशल्या जी कहती हैं कि राम को कहना कि लक्ष्मण के बिना अयोध्या में पैर भी मत रखना। राम वन में ही रहे। माता सुमित्रा कहती हैं कि राम से कहना कि कोई बात नहीं। अभी शत्रुघ्न है। मैं उसे भेज दूंगी। मेरे दोनों पुत्र राम सेवा के लिये ही तो जन्मे हैं। माताओं का प्रेम देखकर हनुमान जी की आँखों से अश्रुधारा बह रही थी। परन्तु जब उन्होंने उर्मिला जी को देखा तो सोचने लगे कि यह क्यों एकदम शांत और प्रसन्न खड़ी हैं? क्या इन्हें अपनी पति के प्राणों की कोई चिंता नहीं?? हनुमान जी पूछते हैं- देवी! आपकी प्रसन्नता का कारण क्या है? आपके पति के प्राण संकट में हैं। सूर्य उदित होते ही सूर्य कुल का दीपक बुझ जायेगा। उर्मिला जी का उत्तर सुनकर तीनों लोकों का कोई भी प्राणि उनकी वंदना किये बिना नहीं रह पाएगा। वे बोलीं- " मेरा दीपक संकट में नहीं है, वो बुझ ही नहीं सकता। रही सूर्योदय की बात तो आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में विश्राम कर लीजिये, क्योंकि आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदित हो ही नहीं सकता। आपने कहा कि प्रभु श्रीराम मेरे पति को अपनी गोद में लेकर बैठे हैं। जो योगेश्वर राम की गोदी में लेटा हो, काल उसे छू भी नहीं सकता। यह तो वो दोनों लीला कर रहे हैं। मेरे पति जब से वन गये हैं, तबसे सोये नहीं हैं। उन्होंने न सोने का प्रण लिया था। इसलिए वे थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं। और जब भगवान् की गोद मिल गयी तो थोड़ा विश्राम ज्यादा हो गया। वे उठ जायेंगे। और शक्ति मेरे पति को लगी ही नहीं शक्ति तो राम जी को लगी है। मेरे पति की हर श्वास में राम हैं, हर धड़कन में राम, उनके रोम रोम में राम हैं, उनके खून की बूंद बूंद में राम हैं, और जब उनके शरीर और आत्मा में हैं ही सिर्फ राम, तो शक्ति राम जी को ही लगी, दर्द राम जी को ही हो रहा। इसलिये हनुमान जी आप निश्चिन्त होके जाएँ। सूर्य उदित नहीं होगा।" वास्तव में सूर्य में भी इतनी ताकत नहीं थी कि लक्ष्मण जी के जागने से पहले वो उदित हो जाते! एक पतिव्रता तपस्विनी का तप उनके सामने खड़ा था। और मेघनाथ को भी लक्ष्मण जी ने नहीं, अयोध्या में बैठी एक तपस्विनी उर्मिला ने मारा। राम राज्य की नींव जनक की बेटियां ही थीं... कभी सीता तो कभी उर्मिला। भगवान् राम ने तो केवल राम राज्य का कलश स्थापित किया परन्तु वास्तव में राम राज्य इन सबके प्रेम, त्याग, समपर्ण, बलिदान से ही आया,, *।।श्री राम जय राम जय जय राम।।*🌹🙏🏻

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माघ महात्म्य चौदहवां अध्याय 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ कार्तवीर्य जी बोले कि हे विप्र श्रेष्ठ! किस प्रकार एक वैश्य माघ स्नान के पुण्य से पापों से मुक्त होकर दूसरे के साथ स्वर्ग को गया सो मुझसे कहिए तब दत्तात्रेय जी कहने लगे कि जल स्वभाव से ही उज्जवल, निर्मल, शुद्ध, मलनाशक और पापों को धोने वाला है. जल सब प्राणियों का पोषण करने वाला है, ऎसा वेदों ने कहा है. मकर के सूर्य माघ मास में गौ के पैर डूबने योग्य जल से भी स्नान करने से मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त होता है. यदि सारा मास स्नान करने से अशक्त हो तो तीन दिन ही स्नान करने से पापों का नाश होता है. जो व्यक्ति थोड़ा ही दान करे वह भी धनी और दीर्घायु होता है. पांच दिन स्नान करने से चंद्रमा के सदृश शोभायमान होता है इसलिए अपना शुभ चाहने वालों को माघ से बाहर स्नान करना चाहिए। अब माघ में स्नान करने वालों के नियम कहता हूँ. अधिक भोजन का उपयोग नहीं करना चाहिए, भूमि पर सोना चाहिए, भगवान की त्रिकाल पूजा करनी चाहिए. ईंधन, वस्त्र, कम्बल, जूता, कुंकुम, घृत, तेल, कपास, रुई, वस्त्र तथा अन्न का दान करना चाहिए. दूसरे की अग्नि न तपे, ब्राह्मणों को भोजन कराए और उनको दक्षिणा दे तथा एकादशी के नियम से माघ स्नान का उद्यापन करे. भगवान से प्रार्थना करें कि हे देव! इन स्नान का मुझको यथोक्त फल दीजिए. मौन रहकर मंत्र का उच्चारण करे फिर भगवान का स्मरण करें. जो मनुष्य श्री गंगाजी में माघ में स्नान करते हैं वे चार हजार युग तक स्वर्ग से नहीं गिरते. जो कोई माघ मास में गंगा और यमुना का स्नान करता है वह प्रतिदिन हजार कपिला गौ के दान का फल पाता है। क्रमशः... अगले लेख में माघ मास पंद्रहवे अध्याय की कथा। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌼🌼🌼〰️〰️ ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ★ब्राह्म पर्व★ (एक सौ पच्चीसवाँ दिन) सूर्य चक्र का निर्माण और सूर्य दीक्षा की विधि... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गतांक से आगे... साम्ब ने पूछा-भगवन्! भगवान् सूर्य के चक्र का और उस में स्थित पद्म का कितने विस्तार में किस प्रकार निर्माण करना चाहिये तथा नेमि. अर और नाभि का विभाग किस प्रकार करना चाहिये। भगवान् श्रीकृष्ण बोले-साम्ब! चक्र चौँसठ और नेमि आठ अङ्गुल की बनानी चाहिये। अङ्गुल का नाभि का विस्तार भी आठ अङ्गुल का होना चाहिये और पद्म नाभि का तीन गुना अर्थात् चौबीस अङ्गुल का होना चाहिये। कमल में नाभि, कर्णिका और केसर भी बनाने चाहिये। नाभि से कमल की ऊँचाई अधिक होनी चाहिये। वहीं पर द्वार के कोण में कमल-पुष्प के मुखर की कल्पना करनी चाहिये। ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्र के लिये चार द्वारों की कल्पना करनी चाहिये। द्वारों को बनाने के पश्चात् ब्रह्मा आदि देवताओं का उनके नाम-मन्त्रों से भक्तिपूर्वक आवाहन कर पूजन करना चाहिये। अर्क-मण्डल की पूजा के लिये इस यज्ञ-क्रिया के अनुरूप दीक्षित होना चाहिये, भगवान् सूर्यने इसे मुझसे पूर्वकाल में कहा था। साम्ब ने पूछा-भगवन्! सूर्यचक्र-यज्ञ के लिये देवताओं ने किन मन्त्रोंको कहा है? तथा यज्ञ के स्वरूप और क्रम को भी आप बताने की कृपा करें। भगवान् श्रीकृष्ण बोले-सौम्य! सूर्यनारायण के चक्र में कमल बनाकर पूर्व की भाँति हृदय में स्थित भगवान् सूर्य का 'खखोल्क' नाम से कमल की कर्णिका-दलों में नाममन्त्र पूर्वक चतुर्थ्यन्त विभक्ति और क्रिया लगाते हुए 'नमः' लगाकर अङ्गन्यास एवं हृदयादि न्यास तथा पूजन करना चाहिये हवन करते समय नाम के अन्त में 'स्वाहा' शब्द का प्रयोग करना चाहिये । यथा-'ॐ खखोल्काय स्वाहा।" ॐ खखोल्काय विद्यहे दिवाकराय धीमहि । तन्नः सूर्य: प्रचोदयात् ॥' इन चौबीस अक्षरों वाली सूर्यगायत्री का जप सभी कर्मों में करना चाहिये, अन्यथा कर्मों का फल प्राप्त नहीं होता। यह सूर्यगायत्री ब्रह्मगोत्र वाली सर्वतत्त्वमयी तथा परम पवित्र है। एवं भगवान् सूर्य को अत्यन्त प्रिय है, इसलिये प्रयत्न पूर्वक मन्त्र के ज्ञान और कर्म की विधि को जानना चाहिये। इससे अभीष्ट मनोरथ सिद्ध होता है । साम्ब ने पूछा-भगवन्! आदित्य-मण्डल में किसकी, किस कार्य के लिये और कैसी दीक्षा होनी चाहिये ? इसे बतायें। भगवान् श्रीकृष्ण बोले-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और कुलीन शूद्र, पुरुष अथवा स्त्री भी सूर्य-मण्डल में दीक्षा के अधिकारी हैं। सूर्य शास्त्र के जानने वाले सत्यवादी, शुचि, वेदवेत्ता ब्राह्मण को गुरु बनाना चाहिये और भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम करना चाहिये। षष्ठी तिथि में पूर्वोक्त विधि के अनुसार अग्नि स्थापन कर विधिपूर्वक सूर्य तथा अग्नि की पूजा करके हवन करना चाहिये। तदनन्तर गुरु पवित्र शिष्य को कुशों और अक्षतों के द्वारा उसके प्रत्येक अङ्ग में सूर्य की भावना कर उसका स्पर्श करे। शिष्य वस्त्रादि से अलंकृत होकर पुष्प, अक्षत, गन्ध आदि से भगवान् सूर्य की पूजा करे तथा बलि भी दे। आदित्य, वरुण, अग्नि आदि का अपने हृदय में ध्यान करे। घी, गुड़, दधि, दूध, चावल आदि रखकर तीन बार जल से अग्नि को सिंचित कर अग्नि में पुन: हवन करे। उसके बाद गुरु शिष्टाचार स्वरूप शिष्य को दातून दे। वह दातून दूध वाले वृक्ष का हो और उसकी लम्बाई बारह अङ्गुल होनी चाहिये। दातून करने के पश्चात् उसे पूर्व-दिशा में फेंक देना चाहिये, उस दिशा में देखे नहीं। पूर्व, पश्चिम और ईशान कोण की ओर मुख करके दातून करना शुभ होता है और अन्य दिशाओं में दातून करना अशुभ माना गया है। निन्दित दिशा में दन्त धावन से जो दोष लगता है, उसकी शान्ति के लिये पूजन-अर्चन करना चाहिये। पुन: गुरु शिष्य के अङ्गों का स्पर्श करे। सूर्यगायत्री का जप पूर्वक उसके आँखों का स्पर्श करे। इन्द्रिय संयम के लिये शिष्य से संकल्प कराये। तदनन्तर आशीर्वाद देकर उसे शयन करने की आज्ञा दे। दूसरे दिन आचमन कर सूर्य को प्रात:काल नमस्कार कर अग्नि-स्थापन करे और हवन करे। स्वप्न में कोई शुभ संवाद सुने अथवा दिन में यदि कोई अशुभ लक्षण दिखायी पड़े तो सूर्यनारायण को एक सौ आहुति दे। स्वप्न में यदि देवमन्दिर, अग्नि, नदी, सुन्दर उद्यान, उपवन, पत्र, पुष्प, फल, कमल, चाँदी आदि और वेदवेत्ता ब्राह्मण, शौर्यसम्पन्न राजा, धनाढ्य क्षत्रिय, सेवामें संलग्न कुलीन शूद्र, तत्त्व को जानने वाला, सुन्दर भाषण देने वाला अथवा उत्तम वाहन पर सवार, वस्त्र, रत्न आदि की प्राप्ति, वाहन, गाय, धान्य आदि उपकरण अथवा समृद्धि की प्राप्ति आदि स्वप्न में दिखायी दे तो उस स्वप्न को शुभ मानना चाहिये। शुभ कर्म दिखायी पड़े तो सब कार्य शुभ ही होते हैं। अनिष्टकारक स्वप्न दिखायी पड़ने पर सप्तमी को सूर्य चक्र लिखकर सूर्यदेव की पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मणों तथा गुरु को संतुष्ट करना चाहिये। आदित्य मण्डल पवित्र और सभी को मुक्ति प्रदान करने वाला है। इसलिये अपने मन में ही आदित्य मण्डल का ध्यान कर एक सौ आहुति देनी चाहिये। इस क्रम से दीक्षा-विधि और मन्त्र का अनुसरण करते हुए आदित्य मण्डल पर पुष्पाङ्जलि प्रदान करे। इससे व्यक्ति के कुल का उद्धार हो जाता है। सूर्यप्रोक्त पुराणादि का श्रवण करना चाहिये। पूजन के बाद विसर्जन करे। सूर्य का दर्शन करने के पश्चात् ही भोजन करना चाहिये। प्रतिमा की छाया का और न ही ग्रह-नक्षत्र-योग और तिथि का लंघन करना चाहिये। सूर्य अयन, ऋतु, पक्ष, दिन, काल, संवत्सर आदि सभी के अधिपति हैं और वे सभी के पूज्य तथा नमस्कार करने योग्य हैं। सूर्य की स्तुति, वन्दना और पूजा सदा करनी चाहिये। मन, और कर्म से देवताओं की निन्दा का परित्याग करना चाहिये। हाथ-पाँव धोकर, सभी प्रकार के शोक को त्यागकर शुद्ध अन्त:करण से सूर्य को नमस्कार करना चाहिये। इस प्रकार संक्षेप से मैंने सूर्य-दीक्षा की विधि को कहा है, जो सुख भोग और मुक्ति को प्रदान करने वाली है। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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माघ महात्म्य – तेरहवाँ अध्याय 🔸🔸🔹🔸🔸🔸🔸🔹🔸🔸 विकुंडल कहने लगा कि तुम्हारे वचनों से मेरा चित्त अति प्रसन्न हुआ है क्योंकि सज्जनों के वचन सदैव गंगाजल के सदृश पापों का नाश करने वाले होते हैं. उपकार करना तथा मीठा बोलना सज्जनों का स्वभाव ही होता है. जैसे अमृत मंडल चंद्रमा को भी ठंडा कर देता है. अब कृपा करके यह भी बतलाइए कि किस प्रकार मेरे भाई का नरक से उद्धार हो सकता है? तब दूत कुछ देर ज्ञान दृष्टि से विचार कर मित्रता रूपी रस्से से बंधा हुआ बोला कि हे वैश्य! यदि तुम अपने भाई के लिए स्वर्ग की कामना करते हो तो जल्दी ही अपने आठ जन्म के पुण्य फल को उसके निमित्त अर्पण कर दो तब विकुंडल ने कहा कि हे दूत! वह पुण्य क्या है और मैने कौन से जन्म में और कैसे किया है, सो सब बतलाओ फिर मैं अपना पुण्य अपने भाई को दे दूंगा। दूत कहने लगा कि हे वैश्य! सुनो, मैं तुम्हारे पुण्य की सब कथा कहता हूँ. पूर्व समय में मधुवन में शालकी नाम का ऋषि था. वह बड़ा तपेश्वरी, ब्रह्मा के समान तेज वाला था. नवग्रह की तरह उसकी स्त्री रेवती के नौ पुत्र थे. जिनके नाम ध्रुव, शशि, बुध, तार, ज्योतिमान थे. इन पांचों ने गृहस्थाश्रम धारण किया तथा निर्मोह, जितमाय, ध्याननिष्ठ और गुणातग ये चारों सन्यास ग्रहण कर वन में रहने लगे. ये शिखा सूत्र से रहित पत्थर और सोने को समान समझते थे। जो कोई अच्छा या बुरा उनको अन्न देता वही खा लेते और कोई कैसा ही कपड़ा दे देता उसको ही पहन लेते. सदैव ब्रह्म के ही ध्यान में लगे रहते. इन चारों ने व्रत, शीत, निद्रा और आहार सबको जीत लिया. बस चर-अचर को विष्णु रूप समझते हुए मौन धारण करके संसार में विचरते थे. ये चारो महात्मा तुम्हारे घर आये जब तुमने मध्यान्ह के समय भूखे-प्यासे इनको आंगन में देखा तो तुमने गदगद कंठ से आँखों में आँसू भरकर इनको नमस्कार करके इनका बड़ा आदर-सत्कार किया. इनके चरणों को धोकर बड़े प्रेम से तुम इनसे कहने लगे कि आज मेरे अहोभाग्य हैं। आज मेरा जन्म सफल हुआ, मुझ पर भगवान प्रसन्न हुए, मैं सनाथ हुआ. मेरे माता, पिता, पत्नी, पुत्र, गौ आदि सभी धन्य हैं जो आज मैंने हरि के सदृश आपके दर्शन किए. सो हे वैश्य! इस प्रकार तुमने श्रद्धा से उनका पूजन किया और चरण धोकर जल को मस्तक से लगाया फिर विधिपूर्वक इनका पूजन करके तुमने इन सन्यासियों को भोजन कराया. इन सन्यासियों ने भोजन करके रात को तुम्हारे घर में विश्राम किया और ब्रह्मा के ध्यान में लीन हो गये. इन सन्यासियों के सत्कार से जो पुण्य तुमको मिला सो मैं भी कहने में असमर्थ हूँ क्योंकि सब भूतों में प्राणी श्रेष्ठ है। प्राणियों में बुद्धि वाले, बुद्धि वालों में मनुष्य, मनुष्यों में ब्राह्मण, विद्वानों में पुण्यात्मा और पुण्यात्मों में ब्रह्मज्ञानी सर्वश्रेष्ठ हैं. ऎसी ही संगति से बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं. यह पुण्य तुमने अपने पहले आठवें जन्म में किया था सो यदि तुम अपने भाई को नरक से मुक्त कराना चाहते हो तो यह पुण्य दे दो. सो दूत के ऎसे वाक्य सुनकर उसने प्रसन्नचित्त से अपना पुण्य अपने भाई कुंडल को दे दिया और वह नरक से मुक्त हो गया और दोनो भाई देवताओं से पूजित किए गए तब दूत अपने स्थान को चला गया। इस प्रकार वैश्य के पुत्र विकुंडल ने अपना पुण्य देकर अपने भाई को नरक की यातना से छुड़वाया। सो हे राजन! जो कोई इस इतिहास को पढ़ता या सुनता है वह हजार गोदान का फल प्राप्त करता है। क्रमशः... अगले लेख में चैदहवें अध्याय की कथा। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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जानिए माघ स्नान की पौराणिक कथा जानिए माघ स्नान और शुभव्रत के कल्याण की रोचक कथा  स्कंदपुराण के रेवाखंड में माघ स्नान की कथा के उल्लेख में आया है कि प्राचीन काल में नर्मदा तट पर शुभव्रत नामक ब्राह्मण निवास करते थे। वे सभी वेद शास्त्रों के अच्छे ज्ञाता थे। किंतु उनका स्वभाव धन संग्रह करने का अधिक था। उन्होंने धन तो बहुत एकत्रित किया। वृद्घावस्था के दौरान उन्हें अनेक रोगों ने घेर लिया। तब उन्हें ज्ञान हुआ कि मैंने पूरा जीवन धन कमाने में लगा दिया अब परलोक सुधारना चाहिए। वह परलोक सुधारने के लिए चिंतातुर हो गए।   अचानक उन्हें एक श्लोक याद आया जिसमें माघ मास के स्नान की विशेषता बताई गई थी। उन्होंने माघ स्नान का संकल्प लिया और 'माघे निमग्ना: सलिले सुशीते विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयान्ति।।' इसी श्लोक के आधार पर नर्मदा में स्नान करने लगे। नौ दिनों तक प्रात: नर्मदा में जल स्नान किया और दसवें दिन स्नान के बाद उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।    शुभव्रत ने जीवन भर कोई अच्छा कार्य नहीं किया था लेकिन माघ मास में स्नान करके पश्चाताप करने से उनका मन निर्मल हो गया। माघ मास के स्नान करने से उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई।

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