murlidhargoyal39
murlidhargoyal39 Jan 10, 2018

हृदय में प्रभु भक्ति

हृदय में प्रभु भक्ति

हृदय में प्रभुभक्ति.........

एक बार रहीम के मन में जिज्ञासा हुई कि कोई व्यक्ति गृहस्थी के जंजाल में फंसे रहकर भी भगवद्भक्ति कैसे कर सकता है ?

गृहस्थी और प्रभु भक्ति तो परस्पर विपरीत हैं।एक बिलकुल लौकिक औऱ दूसरी अलौकिक।दोनों का एक साथ निबाह कैसे संभव है ?

उन्होंने तुलसीदास को, जोउस समय चित्रकूटमें थे,यह दोहा लिखा-
चलन चहत संसार की मिलन चहत करतार। .. दो घोड़े की सवारी कैसे निभे सवार।।।

सांसारिक चलन में चलकर भी उस करतार से मिलने का प्रयास करना दो घोड़ों की सवारी नही है?

हरकारा रहीम का यह संदेश लेकर आगरा से चला और चित्रकूट पहुँचकर गोस्वामी जी के.चरणों मे प्रणाम कर उन्हें रहीम की प्रश्न पाती सौंपी

तुलसीदास ने पहले तो अपने परममित्र के पत्र को सम्मान पूर्वक सिर से लगाया औऱ उसका उत्तर लिखा-

चलत -चलत संसार की हरि पर राखो टेक।। तुलसी यूं निभ जाएंगे दो घोड़े रथ एक।।

अर्थात हमारे हाथ औऱ मस्तिष्क संसार के कर्म करें और ह्दय प्रभुभक्ति में लीन हो तो गृहस्थ रहकर भी हरिभक्ति संभव है।

जय जय श्री राधे

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Tejbir Singh Feb 18, 2020

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Mukesh Kanwar Feb 18, 2020

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Krishna Kumar Feb 18, 2020

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Malti Gaur Feb 18, 2020

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adarsh pandey Feb 18, 2020

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