mOhAn singh bisht
mOhAn singh bisht Jul 13, 2019

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Sandhya Nagar Jul 13, 2019
प्रेम में विरह और मिलन........... एक समय श्री यमुनाजी के तट पर श्रीराधा-माधव विहार कर रहे है.वृंदा देवी कर्ण-भूषण के योग्य (कान में पहनने योग्य)दो कमल श्रीमाधव को लाकर देती है. श्रीकृष्ण सहर्ष उनको लेकर श्रीराधा के कानो में पहनाने लगते है, इतने में ही देखते है कि कमल में एक भ्रमर (भौरा)बैठा है. भ्रमर उड़ा,उसने कमल को तो छोड़ दिया और श्रीराधा के मुख को कमल समझकर उसकी ओर चला,श्री राधा ने श्री हस्त के द्वारा उसको हटाना चाहा, भ्रमर राधारानी जी के श्री करतल को एक कमल समझकर उसकी ओर उड़ा, ढीठ भ्रमर जा नहीं रहा है. इससे डरकर श्री राधा अपनी ओढनी का आँचल फटकारने लगी. मधुमंगल ने जब ये देखा तो तुरंत छड़ी मारकर भ्रमर को बहुत दूर हटा दिया और लौटकर कहा - "मधुसूदन (भ्रमर) चला गया". इतना सुनते ही 'मधुसूदन' शब्द से भगवान श्रीकृष्ण समझकर श्रीराधा जी हाय! हाय! मधुसूदन कहाँ चले गए' पुकारकर रोने लगी! " श्रीकृष्ण इस वन में मुझको त्यागकर क्यों चले गए ?यो कहकर वे आर्तनाद करने लगी.कृष्ण पास ही बैठे थे क्योकि वे ही तो फूल लाकर पहना रहे थे. जब कृष्ण ने अपनी प्रियतमा के इस मधुरतम प्रेम वैचित्तय जनित विरह को देखा तो सब को चुप हो जाने के लिए कहा और स्वयं मधुर हास्य करने लगे. ये प्रेम वैचित्तय है जहाँ श्याम सुदंर पास में ही है फिर भी श्यामा जू विरह में डूबी हुई है,मिलन और विरह का अद्भुत और विलक्षण द्रश्य है,इसी तरह का एक उदाहरण और भी है. प्रसंग 1 - कृष्ण विरह की असीम वेदना से पीड़ित श्रीराधा भयानक सर्पविष से विषमय हुए एक सरोवर में प्राण त्याग के लिए कूद पड़ती है, इतने में ही श्रीकृष्ण दौड़ आते है और पीछे से दोनों भुजाओ के द्वारा श्रीराधा का कंठ धारण कर लेते है. श्रीराधा, कृष्ण की दोनों भुजाओ को कालसर्प समझती है और मन ही मन कहती है - कि कैसा सौभाग्य है कि में दो सर्पो के द्वारा पकड़ ली गई हूँ, ये अभी मुझे डस लेगे और डसते ही इस विरह दग्ध जीवन का अंत हो जायेगा. 'विधाता बड़ा ही अनुकूल है' जो मेरी मन चाही मृत्यु को अभी तुरंत ही बुला देगा'. सर्प डस नहीं रहे ये देखकर और स्पर्श सुख का अनुभव करके श्रीराधा मन ही मन कहती है 'उपयुक्त समय अपकार करने वाली वस्तुये भी प्रिय हो जाती है' सर्प डस तो नहीं रहे है, उल्टा स्पर्श सुख दे रहे है'.श्रीकृष्ण राधा के मणिबंधन में स्मन्तकमणि बाँध देतेहै, मणि की ज्योति को देखकर राधा कहती है बड़ा ही आश्चर्य है कि मणि विभूषित मस्तक काल सर्प भी मुझे डसने में देर कर रहा है हाय ! कृष्ण रहित इस जीवन का कब सदा के लिए अंत होगा! श्रीकृष्ण के ह्रदय से चिपटी हुई राधा इस प्रकार विरह-वेदना से छटपटाती हुई, मृत्यु की बाट देख रही है. यह "मिलन और विरह" का बड़ा मनोरम दृश्य हैं। जय जय श्यामाश्याम

शनिदेव का लोहे से क्या है संबंध? जानें हनुमान जी से जुड़ी यह कथा शनिदेव को सूर्य पुत्र के नाम से भी जाना जाता है। अत्यंत तेज सूर्य की ऊष्मा की झलक शनिदेव में दिखाई देती है। धार्मिक कथानुसार, जब लंका से हनुमान जी ने शनि भगवान को शनिचरा मंदिर मुरैना में फेंका था तब से इस स्थान पर लोहे के मात्रा प्रचुर हो गयी थी। भगवान शनि का वार शनिवार को बताया गया है। शनिवार को कुछ चीजे खरीदना वर्जित है जिसमें से एक है घर पर नया लोहा खरीद कर लाना। इसे घर पर लाने से शनि का प्रकोप सहन करना पड़ता है। घर में कलह और अशांति हो जाती है| हालांकि इस दिन लोहे का दान करना अत्यंत शुभ माना गया है। शनिदेव के अशुभ प्रभावों की शांति या साढ़े साती या ढैय्या से बचाव हेतु लोहा धारण किया जाता है किन्तु यह लौह मुद्रिका सामान्य लोहे की नहीं बनाई जाती। यह घोड़े के नाल से बनती है जो उसके खुर के बचाव के लिए लगाई जाती है। इस लोहे से रिंग बनाई जाती है जो शनि के कुपित प्रभाव को शांत करती है। इसे आप सही और उत्तम समय जैसे शनिवार, पुष्य, रोहिणी, श्रवण नक्षत्र हो अथवा चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी तिथि पर खरीदे और धारण करें। काले घोड़े की नाल के प्रभावशाली उपाय और लाभ से कई कार्य सिद्ध होते हैं। नाव की कील भी इस कार्य के लिए उपयुक्त रहती है।

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Neetu koshik Jan 25, 2020

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Radhesyam Dangi Jan 26, 2020

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Ramesh Soni.33 Jan 25, 2020

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N.K.Rana Jan 25, 2020

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Sanjay Singh Jan 25, 2020

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