आज का गीता ज्ञान ।।

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MeenaDubey Jan 22, 2019
Jai Shree Krishna Ji Radhe Radhe Ji ati Sundar Ji

" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ बारहवाँ अध्याय : भक्तियोग अष्टम दिवस 〰️〰️🔸〰️〰️🔸🔸〰️〰️🔸〰️〰️ अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः। सर्वारम्भपरित्यागी यो मदभक्तः स मे प्रियः ।।16।। मेरा ऐसा भक्त जो सामान्य कार्य-कलापों पर आश्रित नहीं है, जो शुद्ध है, दक्ष है, चिन्तारहित है, समस्त कष्टों से रहित हैं और किसी फल के लिये प्रयत्नशील नहीं रहता, मुझे अतिशय प्रिय है। सज्जनों, भक्त को धन दिया जा सकता है, किन्तु भक्त को धन अर्जित करने के लिये संघर्ष नहीं करना चाहिये, भगवत्कृपा से यदि उसे स्वयं धन की प्राप्ति हो तो भक्त उद्विग्न नहीं होता, स्वाभाविक है कि भक्त दिनभर में दो बार स्नान करता है और भक्ति के लिये प्रातः जल्दी उठता है, इस प्रकार वह बाहर तथा भीतर से स्वच्छ रहता है, भक्त जीवन के समस्त कार्यकलापों के सार को जानता है और प्रामाणिक शास्त्रों में दृढ़विश्वास रखता है, भक्त कभी किसी दल में भाग नहीं लेता, अतएव भक्त चिन्तामुक्त रहता है। भक्त समस्त उपाधियों से मुक्त होने के कारण कभी व्यथित नहीं होता, वह जानता है कि उसका शरीर एक उपाधि है, शुद्धभक्त कभी भी ऐसी किसी वस्तु के लिये प्रयास नहीं करता, जो भक्ति के नियमों के प्रतिकूल हो, भक्त भगवान् के लिये मन्दिर का निर्माण करा सकता है और उसके लिये भक्त सभी प्रकार की चिन्तायें उठा सकता है, लेकिन वह अपने परिवार वालों के लिये बड़ा सा मकान नहीं बनाता, भक्त तकलीफ उठा सकता है केवल भगवान् के लिये, इसलिये भक्त कभी ऐसे कार्य में हाथ नहीं लगाता, जिससे उसकी भक्ति में प्रगति न होती हो। यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न कांक्षति। शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ।।17।। जो न कभी हर्षित होता है, न शोक करता है जो न तो पछताता है, न इच्छा करता है, तथा जो शुभ तथा अशुभ दोनों प्रकार की वस्तुओं का परित्याग कर देता है, ऐसा भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय है। सज्जनों! शुद्ध भक्त भौतिक लाभ से न तो हर्षित होता है और नहीं हानि से दुखी होता है, भक्त न तो पाने के लिये उत्सुक रहता है, न ही नहीं मिलने पर दुखी होता है, भक्त अपनी किसी प्रिय वस्तु के खो जाने पर उसके लिये पछतावा नहीं करता, इसी प्रकार यदि भक्त को मन मुताबिक वस्तु की प्राप्ति नहीं हो पाती तो वह दुखी नहीं होता, भक्त समस्त प्रकार के शुभ, अशुभ तथा पापकर्मों से सदैव परे रहता है, भक्त भगवान् की प्रसन्नता के लिये बड़ी से बड़ी विपत्ति सहने को तैयार रहता है, भक्ति के पालन में उसके लिये कुछ भी बाधक नहीं बनता, ऐसा भक्त श्रीकृष्ण को अतिशय प्रिय है। समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः। शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ।।18। तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी संतुष्टो येन केनचित्। अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ।।19।। जो मित्रों तथा शत्रुओं के लिये समान है, जो मान तथा अपमान, शीत तथा गर्मी, सुख तथा दुख, यश तथा अपयश में समभाव रहता है, जो दूषित संगति से सदैव मुक्त रहता है, जो सदैव मौन और किसी भी वस्तु से संतुष्ट रहता है, जो किसी प्रकार के घर-बार की परवाह नहीं करता, जो ज्ञान में दृढ़ है और जो भक्ति में संलग्न है, ऐसा पुरूष मुझे अत्यन्त प्रिय है। सज्जनों! भक्त सदैव कुसंगति से दूर रहता है मानव समाज का यह स्वभाव है कि कभी किसी की प्रशंसा की जाती है, तो कभी उसकी निन्दा भी की जाती है, लेकिन भक्त कृत्रिम यश तथा अपयश, दुख या सुख से ऊपर उठा हुआ होता है, भक्त अत्यन्त धैर्यवान होता है और भगवत् चर्चा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बोलता, अतः भक्त को मौनी कहा जाता है, मौनी का अर्थ यह नहीं है कि वह बोले नहीं, अपितु यह कि वह अनर्गल वार्तालाप नहीं करता, मनुष्य को आवश्यकता पर बोलना चाहिये और भक्त के लिये सर्वाधिक अनिवार्य वाणी तो भगवान् के लिये बोलना है। भक्त समस्त परिस्थतियों में सुखी रहता है, कभी उसे स्वादिष्ट भोजन मिलता है तो कभी नहीं, किन्तु वह सन्तुष्ट रहता है, भक्त आवास की सुविधा की चिन्ता नहीं करता, वह कभी वृक्ष के नीचे रह सकता है, तो कभी अत्यन्त उच्च भवन में, किन्तु वह इनमें से किसी के प्रति आसक्त नहीं रहता, क्योकि भक्त अपने संकल्प तथा ज्ञान में दृढ़ होता है, इसलिये वह स्थिर कहलाता है, भले ही भक्त के लक्षणों की कुछ पुनरावृत्ति हुई हो, लेकिन यह इस बात पर बल देने के लिये है कि भक्त को ये सारे गुण अर्जित करने चाहिये। सज्जनों! सद्गुणों के बिना कोई शुद्धभक्त नहीं बन सकता, "हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणाः" जो भक्त नहीं है, उसमें सद्गुण नहीं होता, जो भक्त कहलाना चाहता है, उसे सद्गुणों का विकास करना चाहिये, यह बात पक्की है कि मनुष्य को ऐसे सद्गुण प्राप्ति के लिये अलग से बाह्य प्रयास नहीं करना पड़ता, अपितु भगवद्भक्ति में संलग्न रहने के कारण उसमें ये गुण स्वतः ही विकसित हो जाते हैं, भाई-बहनों! कल की पोस्ट से इस भक्तियोग नाम के बाहरवें अध्याय को विराम देंगे और तेहरवें अध्याय में प्रवेश करेंगे, कल की पोस्ट अवश्य पढ़े, यह मेरा निवेदन है। शेष जारी • • • जय श्री कृष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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Shiva Gaur Apr 19, 2019

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Shiva Gaur Apr 19, 2019

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ramkumar verma Apr 17, 2019

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Shakuntla Apr 18, 2019

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Shrikrishna Cholkar Apr 18, 2019

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