Shivani
Shivani Apr 20, 2019

🏵️🚩जय श्री राधे 🚩🏵️ 🌷हम एक शब्द है तो वह पूरी परिभाषा है हम कुठिंत है? वह एक पूरी अभिलाषा है बस यही माँ की परिभाषा है 💮💮💮💮💮 माँ तुझे सलाम 💮🙏🙏🙏💮

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कामेंट्स

Akash Kumar Apr 20, 2019
🙏🕉🌹Jai Mata Di Beautiful V V Very Nice Post Ji Aap Aur Aap Ke Parvar Ka Har Pal Mangalmay Kare Ram Ji Shubh Prabhat Ji Jai Mata Rani Ji 🙏🕉🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

Shiv Dass Apr 20, 2019
https://youtu.be/HFqGpv4kZEo HAR HAR MAHADEV JI.. . 🙏🙏🙏🙏🙏💐💐💐💐💐🌹🌹🌹🌹🌹🤗🤗🤗🤗🤗

keerti Ballabh kand pal Apr 20, 2019
जय श्री राधे कृष्णा जी शुभ प्रभात वंदन गुड मोड़िग जी आप का हर दिन शुभ मंगलमय हो भेरी गुड नाईस जी

Anju Saini Apr 20, 2019
जय श्री राधे कृष्णा गुड मॉर्निंग

Rajesh Gupta Apr 20, 2019
🙏🌹Jai Shri Ram 🌹🙏 🙏🌹Jai Shri Shani Dev 🌹🙏 🙏🌹Jai Bajarangbali 🌹🙏

Bajrang mangal Apr 20, 2019
कैसा है अनोखा दृश्य कैसा ये अभिराम है मुरली की तान पर नाच रहे घनश्याम है...!!!! राधा ने छेड़ी है ऐसी कोई तान है जगत को नचाने वाले हुए उसपे कुर्बान है....!!!! राधा को मनाने आए मोर बन कर रिझाएं कैसी अनोखी सी उनकी आन बान है....!!!! मन्द मन्द राधा जी मन ही मन मुस्काए रही कान्हा आज बन गया कितना नादान है....!!!! एक एक अदा उनकी कनखियों से निहार रही प्यारी ये छवि उनकी कितनी महान है....!!!! एक एक शे देखो नाच रही श्याम संग नाच उठा जैसे सारा ये जहान है....!!!! ✍🏻मतवारी जोगन ✍🏻

,OP JAIN (RAJ) Apr 20, 2019
जय श्री हनुमान जी जय श्री शनिदेव जी आपका हर एक पल शुभ और मंगलमय हो हैप्पी शनिवार दीदी very happy Good Morning didi

🌸🍁 गोपालप्रिया 🍁🌸💜 Apr 20, 2019
सत्य हैं बहन । माँ की बराबरी कोई नही कर सकता। सुन्दर पोस्ट , आप का जीवन शुभ हो। ।। ॐ नमः शिवय ।। 🍁🌸🕉🌸🍁

🌷🌷🌷mukseh nagar🌷🌷🌷 Apr 20, 2019
@ 🍁💦🍁💦🍁💦🍁 हे मेरे करूणानिधि हरि प्रितम...🙏 🌴💕💞 दो नैनों में भर प्रितम तुझे खुद ही खुद इतराता हूँ..... 🌴💕💞 रसना ना बोले ना सही हर घड़कन में हरि को पाता हूँ... 🌴💕💞 जानता हूँ तुझे जान ना पाउँगा फिर भी तुझे ही प्रितम कहता हूँ.... 🌴💕💞 कभी मिलन की क्या सोचूँ प्यारे तुझमें ही घुला घुला सा खुद को पाता हूँ.... 🌴💕💞 जानता हूँ तृण भी नहीं मैं हरिप्रितम का हूँ ऐसा भाव फिर भी रखता हूँ... 🌴💖🌴💖 " श्री राधा विजेयते नमः " " नमामि श्री बरसाना धाम " 🌴💖🌴💖 🙏🙏🌹🌷जय श्री राधे राधे जी🌷🌹

Sandhya Nagar Apr 20, 2019
एक बार ठाकुर जी और राधा रानी रास के बाद निधिवन से वापिस आ रहे थे.. आते आते अचानक ठाकुर जी की नजर राधा रानी के चरणों पर पडी , राधा रानी के चरणों में बृज रज लगी थी...यमुना किनारे पंहुच कर ठाकुर जी ने राधा रानी से कहा किशोरी जी आपके चरणों में बृज रज लगी है आप यमुना जल में अपनें चरण धो लीजिए तो राधा रानी ने साफ मना कर दिया ....बार बार ठाकुर जी चरण धोने को कहते और राधा रानी मना कर देती....जब ठाकुर जी ने इसका कारण पूछा तो राधा रानी ने बहुत सुंदर जवाब दिया कि जो एक बार मेरे चरणों से लग जाए मैं उसे कभी दूर नही करती.. राधे राधे🙏🙏

poonam aggarwal Apr 20, 2019
Very nice post 👌👌👍 Radhe krishna ji 🌹🌹🙏God bless you always be happy tc good afternoon dear sister ji 💐💐🍫🍫🍫💞💞

Akash Kumar Apr 20, 2019
🙏🕉🌹Jai Shree Radhe Krishna Ji Aap Aur Aap Ke Parvar Ka Har Pal Shubh Ho Ji Shubh Ratri Ji Jai Mata Rani Ji 🙏🕉🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

jpshrivastava Apr 20, 2019
जय श्री कृष्ण जय श्री राधे जय श्री गणेश शुभ रात्रि जी बहुत सुंदर पोस्ट जी श्री माता सरस्वती जी की कृपा सदा ही आप पर एवं आपके परिवार पर बनी रहे जी। सदा ही सुखी एवं आनंदित रहें श्री जी

Vikash Srivastava May 21, 2019

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सम्राट चंद्रगुप्त अपने मंत्रियों के साथ एक विशेष मंत्रणा में व्यस्त थे कि प्रहरीने सूचित किया कि आचार्य चाणक्य राजभवन में पधार रहे हैं । सम्राट चकित रह गए । इस असमय में गुरू का आगमन ! वह घबरा भी गए । अभी वह कुछ सोचते ही कि लंबे-लंबे डग भरते चाणक्य ने सभा में प्रवेश किया । सम्राट चंद्रगुप्त सहित सभी सभासद सम्मान में उठ गए । सम्राट ने गुरूदेव को सिंहासन पर आसीन होने को कहा । आचार्य चाणक्य बोले – ”भावुक न बनो सम्राट, अभी तुम्हारे समक्ष तुम्हारा गुरू नहीं, तुम्हारे राज्य का एक याचक खड़ा है, मुझे कुछ याचना करनी है ।”चंद्रगुप्त की आँखें डबडबा आईं। बोले – ” आप आज्ञा दें, समस्त राजपाट आपके चरणों में डाल दूं ।” चाणक्य ने कहा – ” मैंने आपसे कहा भावना में न बहें, मेरी याचना सुनें । ” गुरूदेव की मुखमुद्रा देख सम्राट चंद्रगुप्त गंभीर हो गए । बोले -” आज्ञा दें । चाणक्य ने कहा – ” आज्ञा नहीं , याचना है कि मैं किसी निकटस्थ सघन वन में साधना करना चाहता हूं । दो माह के लिए राजकार्य से मुक्त कर दें और यह स्मरण रहे वन में अनावश्यक मुझसे कोई मिलने न आए । आप भी नहीं । मेरा उचित प्रबंध करा दें । चंद्रगुप्त ने कहा – ” सब कुछ स्वीकार है । ” दूसरे दिन प्रबंध कर दिया गया । चाणक्य वन चले गए । अभी उन्हें वन गए एक सप्ताह भी न बीता था कि यूनान से सेल्युकस (सिकन्दर का सेनापति) अपने जामाता चंद्रगुप्त से मिलने भारत पधारे । उनकी पुत्री हेलेन का विवाह चंद्रगुप्त से हुआ था । दो – चार दिन के बाद उन्होंने चाणक्य से मिलने की इच्छा प्रकट कर दी । सेल्युकस ने कहा – ”सम्राट, आप वन में अपने गुप्तचर भेज दें । उन्हें मेरे बारे में कहें । वह मेरा बड़ा आदर करते है । वह कभी इन्कार नहीं करेंगे ।“ अपने श्वसुर की बात मान चंद्रगुप्त ने ऐसा ही किया। गुप्तचर भेज दिए गए । चाणक्य ने उत्तर दिया – ”ससम्मान सेल्युकस वन लाए जाएं, मुझे उनसे मिल कर प्रसन्नता होगी ।” सेना के संरक्षण में सेल्युकस वन पहुंचे । औपचारिक अभिवादन के बाद चाणक्यने पूछा – ”मार्ग में कोई कष्ट तो नहीं हुआ । ”इस पर सेल्युकस ने कहा – ”भला आपके रहते मुझे कष्ट होगा ? आपने मेरा बहुत ख्याल रखा ।“ न जाने इस उत्तर का चाणक्य पर क्या प्रभाव पड़ा कि वह बोल उठे – “हां, सचमुच आपका मैंने बहुत ख्याल रखा ।”इतना कहने के बाद चाणक्य ने सेल्युकस के भारत की भूमि पर कदम रखने के बाद से वन आने तक की सारी घटनाएं सुना दीं । उसे इतना तक बताया कि सेल्युकस ने सम्राट से क्या बात की, एकांत में अपनी पुत्री से क्या बातें हुईं । मार्ग में किस सैनिक से क्या पूछा । सेल्युकस व्यथित हो गए । बोले – ”इतना अविश्वास ? मेरी गुप्तचरी की गई । मेरा इतना अपमान ।“ चाणक्य ने कहा – ”न तो अपमान, न अविश्वास और न ही गुप्तचरी । अपमान की तो बात मैं सोच भी नहीं सकता । सम्राट भी इन दो महीनों में शायद न मिल पाते । आप हमारे अतिथि हैं । रह गई बात सूचनाओं की तो वह मेरा ”राष्ट्रधर्म” है । आप कुछ भी हों, पर विदेशी हैं । अपनी मातृभूमि से आपकी जितनी प्रतिबद्धता है, वह इस राष्ट्र से नहीं हो सकती । यह स्वाभाविक भी है । मैं तो सम्राज्ञी की भी प्रत्येक गतिविधि पर दृष्टि रखता हूं । मेरे इस ‘धर्म‘ को अन्यथा न लें । मेरी भावना समझें ।“ सेल्युकस हैरान हो गया । वह चाणक्य के पैरों में गिर पड़ा । उसने कहा – ” जिस राष्ट्र में आप जैसे राष्ट्रभक्त हों, उस देश की ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देख सकता ।” सेल्युकस वापस लौट गया । मित्रों… क्या हम भारतीय राष्ट्रधर्म का पालन कर रहे है???

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Anoop Tripathi May 21, 2019

*अच्छा हुआ हम इन्सान नहीं बने।* 【 बहुत सुन्दर दृष्टान्त 】 आज बन्दर और बन्दरिया के विवाह की वर्षगांठ थी। बन्दरिया बड़ी खुश थी। एक नज़र उसने अपने परिवार पर डाली। तीन प्यारे - प्यारे बच्चे , नाज उठाने वाला साथी , हर सुख-दु:ख में साथ देने वाली बन्दरों की टोली। पर फिर भी मन उदास है। सोचने लगी - "काश ! मैं भी मनुष्य होती तो कितना अच्छा होता ! आज केक काटकर सालगिरह मनाते , दोस्तों के साथ पार्टी करते। हाय ! सच में कितना मजा आता ! बन्दर ने अपनी बन्दरिया को देखकर तुरन्त भांप लिया कि इसके दिमाग में जरुर कोई ख्याली पुलाव पक रहा है। उसने तुरन्त टोका - "अजी , सुनती हो ! ये दिन में सपने देखना बन्द करो। जरा अपने बच्चों को भी देख लो , जाने कहाँ भटक रहे हैं.? मैं जा रहा हूँ बस्ती में कुछ खाने का सामान लेकर आऊँगा तेरे लिए। आज तुम्हें कुछ अच्छा खिलाने का मन कर रहा है मेरा। बन्दरिया बुरा सा मुँह बनाकर चल दी अपने बच्चों के पीछे जैसे-जैसे सूरज चढ़ रहा था , उसका पारा भी चढ़ रहा था अच्छे पकवान के विषय में सोचती तो मुँह में पानी आ जाता। पता नहीं मेरा बन्दर आज मुझे क्या खिलाने वाला है ? अभी तक नहीं आया। जैसे ही उसे अपना बन्दर आता दिखा झट से पहुँच गई उसके पास। बोली - क्या लाए हो जी ! मेरे लिए। दो ना , मुझे बड़ी भूख लगी है। ये क्या तुम तो खाली हाथ आ गये। बन्दर ने कहा :-- हाँ , कुछ नहीं मिला। यहीं जंगल से कुछ लाता हूँ। बन्दरिया नाराज होकर बोली :-- नहीं चाहिए मुझे कुछ भी सुबह तो मजनू बन रहे थे , अब साधु क्यों बन गए..?? बन्दर :-- अरी भाग्यवान ! जरा चुप भी रह लिया कर। पूरे दिन कच-कच करती रहती हो। बन्दरिया :-- हाँ - हाँ ! क्यों नहीं , मैं ही ज्यादा बोलती हूँ। पूरा दिन तुम्हारे परिवार की देखरेख करती हूँ , तुम्हारे बच्चों के आगे-पीछे दौड़ती रहती हूँ। इसने उसकी टांग खींची , उसने इसकी कान खींची , सारा दिन झगड़े सुलझाती रहती हूँ। बन्दर :-- अब बस भी कर , मुँह बन्द करेगी तभी तो मैं कुछ बोलूँगा। गया था मैं तेरे लिए पकवान लाने शर्मा जी की छत पर। रसोई की खिड़की से एक आलू का परांठा झटक भी लिया था मैंने पर तभी शर्मा जी की बड़ी बहू की आवाज़ सुनाई पड़ी . . अरी अम्मा जी ! अब क्या बताऊँ , ये और बच्चे नाश्ता कर चुके हैं। मैंने भी खा लिया है और आपके लिए भी एक परांठा रखा था मैंने पर खिड़की से बन्दर उठा ले गया। अब क्या करुँ , फिर से चुल्हा चौंका तो नहीं कर सकती मैं। आप देवरानी जी के वहाँ जाकर खा लें। अम्मा ने रुँधाए से स्वर में कहा :- - पर मुझे दवा खानी है , बेटा.! बहू ने तुरन्त पलटकर कहा :-- तो मैं क्या करुँ.? अम्मा जी ! वैसे भी आप शायद भूल गयीं हैं आज से आपको वहीं खाना है। एक महीना पूरा हो गया है आपको मेरे यहाँ खाते हुए। देवरानी जी तो शुरु से ही चालाक है वो नहीं आयेंगी आपको बुलाने। पर तय तो यही हुआ था कि एक महीना आप यहाँ खायेंगी और एक महीना वहाँ। अम्मा जी की आँखों में आँसू थे , वे बोल नहीं पा रहीं थीं। बड़ी बहू फिर बोली :-- ठीक है , अभी नहीं जाना चाहती तो रुक जाईये। मैं दो घण्टे बाद दोपहर का भोजन बनाऊँगी तब खा लीजिएगा। बन्दर ने बन्दरिया से कहा :-- भाग्यवान ! मुझसे यह सब देखा नहीं गया और मैंने परांठा वहीं अम्मा जी के सामने गिरा दिया। बन्दरिया की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे अपने बन्दर पर बड़ा गर्व हो रहा था और बोली :-- ऐसे घर का अन्न हम नहीं खायेंगे जहाँ माँ को बोझ समझते हैं। अच्छा हुआ जो हम इन्सान नहीं हुए। हम जानवर ही ठीक हैं।।

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Raj May 21, 2019

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Saroj Devi May 22, 2019

Jai matha di

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Shashi May 21, 2019

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MAMTA Kapoor May 21, 2019

+7 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 28 शेयर
Shri Radhe Krishna May 21, 2019

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