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Bhakti Vat
Bhakti Vat May 23, 2019

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Durga Pawan Sharma Jun 19, 2019

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shrikant mundra Jun 19, 2019

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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सोलहवाँ अध्याय:(दैवासुरसंपद्विभागयोग) पंचदश दिवस 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः। आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्‌ ।।22।। हे कुन्तीपुत्र! जो वयक्ति इन तीनों नरक-द्वारों से बच पाता हैं, वह आत्म-साक्षात्कार के लिये कल्याणकारी कार्य करता है और इस प्रकार क्रमश: परम गति को प्राप्त होता हैं। सज्जनों, मनुष्य को मानव-जीवन के तीन शत्रुओं यानी काम, क्रोध तथा लोभ से अत्यन्त सावधान रहना चाहिये, जो वयक्ति जितना ही इन तीनों से मुक्त होगा, उतना ही उसका जीवन शुद्ध होगा, तब वह वैदिक शास्त्रों में आदिष्ट विधि-विधानों का पालन कर सकता हैं, इस प्रकार मानव जीवन के विधि-विधानों का पालन करते हुये वह अपने आपको धीरे-धीरे आत्म-साक्षात्कार के पद पर प्रतिष्ठित कर सकता हैं, यदि वह इतना भाग्यशाली हुआ कि इस अभ्यास से भगवद्भक्ति के पद तक उठ सके तो उसकी आध्यात्मिक सफलता निश्चित हैं। वैदिक शास्त्रों में कर्म तथा कर्मफल की विधियों का आदेश है, जिससे मनुष्य शुद्धि की अवस्था यानी संस्कार तक पहुँच सके, सारी विधि काम, क्रोध तथा लोभ के परित्याग पर आधारित है, इस विधि का ज्ञान प्राप्त करके मनुष्य आत्म-साक्षात्कार के उच्चपद तक उठ सकता है और इस आत्म-साक्षात्कार की पूर्णता भक्ति में हैं, भक्ति में बद्धजीव की मुक्ति निश्चित है, इसलिये वैदिक पद्धति के अनुसार चार आश्रमों तथा चार वर्णों का विधान किया गया है, विभिन्न वर्णों के लिये विभिन्न विधि-विधानों की व्यवस्था हैं, यदि मनुष्य उनका पालन कर पाता है, तो वह स्वत: ही आत्म-साक्षात्कार के सर्वोच्चपद को प्राप्त कर लेता हैं, तब उसकी मुक्ति में कोई सन्देह नहीं रह जाता। यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌ ।।23।। जो शास्त्रों के आदेशों की अवहेलना करता है और मनमाने ढंग से कार्य करता है, उसे न तो सिद्धि, न सुख और न ही परमगति की प्राप्ति हो पाती है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है मानव समाज के विभिन्न आश्रमों तथा वर्णों के लिये शास्त्रविधि दी गयी हैं, प्रत्येक वयक्ति को इन विधि-विधानों का पालन करना होता हैं, यदि कोई इनका पालन न करके काम, क्रोध और लोभवश स्वेच्छा से कार्य करता है तो उसे जीवन में कभी सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती, यानी भले ही मनुष्य ये सारी बातें सिद्धान्त के रूप में जानता रहें, लेकिन यदि वह इन्हें अपने जीवन में नहीं उतार पाता, तो वह अधम जाना जाता है, मनुष्ययोनि में जीव से यह आशा की जाती है कि वह बुद्धिमान बने और सर्वोच्चपद तक जीवन को ले जाने वाले विधानों का पालन करें। यदि मनुष्य इनका पालन नहीं करता तो उसका अध:पतन हो जाता है, लेकिन फिर भी जो विधि-विधानों तथा नैतिक सिद्धान्तों का पालन करता है, किन्तु अन्ततोगत्वा परमेश्वर को समझ नहीं पाता, तो उसका सारा ज्ञान व्यर्थ जाता है, और यदि वह ईश्वर के अस्तित्व को मान भी ले, किन्तु यदि वह भगवान् की सेवा नहीं करता तो भी उसके प्रयास निष्फल हो जाते हैं, इसलिये मनुष्य को चाहिये कि अपने आप को भगवद्भक्ति के पद तक ऊपर ले जाये, तभी वह परम सिद्धावस्था को प्राप्त कर सकता है, अन्यथा नहीं। जो वयक्ति जानबूझ कर नियमों का अतिक्रमण करता हैं वह काम के वश में होकर कर्म करता हैं, इस श्लोक में "काम-कारत:" शब्द इसलिये ही प्रयुक्त हुआ हैं, वयक्ति जानता है कि ऐसा करना मना है, लेकिन फिर भी वह ऐसा करता है, इसी को स्वेच्छाचार कहते है, यह जानते हुये भी कि अमुक काम करना चाहिये फिर भी वह उसे नहीं करता हैं, इसीलिये उसे स्वेच्छाचारी कहा जाता है, ऐसे वयक्ति अवश्य ही भगवान् द्वारा दंडित होते हैं, ऐसे वयक्तियों को मनुष्य जीवन की सिद्धि प्राप्त नहीं हो पाती, मनुष्य जीवन तो अपने आपको शुद्ध बनाने के लिये है, किन्तु जो वयक्ति विधि-विधानों का पालन नहीं करता, वह अपने को न तो शुद्ध बना सकता है, न ही वास्तविक सुख प्राप्त कर सकता हैं। हमारा अन्तर्ह्रदय ही कुरूक्षेत्र हैं और वही धर्मक्षेत्र भी, श्रीकॄष्ण उसी युद्ध के प्रांगण में खड़े होकर एक युद्ध का आह्वान करते है, वह आदमी ही क्या, उस आदमी का पौरूष ही क्या, जो लड़ न सके, लड़ो, अपने आप से, बाह्य युद्ध तो अब बहुत हो चुके,बाह्य युद्ध में तो अन्तत: हार ही होगी, महान् कहलाने वाला सिकन्दर भी हार गया, हम किसी से भी न हारे, मगर मौत से तो हार ही जायेंगे, मैं तो उस विजय की बात करता हूँ जिसके आगे मौत भी परास्त हो जाये, तब मनुष्य की मॄत्यु नहीं होती, मॄत्यु से पहले मोक्ष हो जाता है, कृष्णत्व मुखरित हो जाता है, पूर्ण शान्ति उपलब्ध हो जाती हैं। बाहर का युद्ध तो अहंकार युद्ध हैं जिसकी अन्तिम परिणती तो पराजय ही हैं, ईगो की लड़ाई हमें कब तक जिताती रहेगी? आखिर तो हारना ही हैं, अहंकार टूटेगा तो हम भी टूट ही जायेंगे, वह युद्ध ही क्या जो पराजय दें, जीवन कोई पराजय का उपक्रम नहीं, यह तो विजय की दास्तान हैं, इसलिये हमें ऐसा युद्ध लड़ना है जो हमें अपने आपको जिता सकें, आदमी अपने क्रोध से लड़े, जिस क्रोध ने सारे घर में कोहराम मचा रखा हैं, उन विकारों से लड़े, जिनके चंगुल में फँसकर मनुष्य अपने वास्तविक मूल्यों को पहचान नहीं पाता, उस स्वार्थ से लड़े, जिसके चलते मनुष्य अपने पड़ोसी का भी ख्याल नहीं रख पाता, यदि बाहरी युद्ध ही करते रहें तो ये युद्ध कोई समाधान नहीं दे पायेंंगे। आज प्रत्येक देश के राजनेता कबूतर तो शान्ति के उड़़ाते हैं पर उनकी योजना बमों की होती हैं, आज सारे संसार में अपने विनाश के लिये इतने इन्तजाम कर लिये है कि इस सृष्टि को एक बार नहीं, कई-कई बार नष्ट किया जा सकता हैं, दोस्तों! जरा कल्पना कीजिये कि जब एक अणुबम से सारा नागासाकी ध्वस्त हो सकता है तो आज तो कई राष्टों के पास हजारों-हजार ऐसे बम मौजूद हैं, विचार करों हमारी हालत कैसी है? हम न तो पूरी तरह मर पा रहें हैं और न पूरी तरह जी पा रहे हैं, जी इसलिये रहे है कि मौत नहीं आई और मर इसलिये रहे हैं कि जीने की कला नहीं सीख पाये। हम तो दोनों से ही वंचित हैं, जीवन नरक बना है, जीवन स्वर्ग नहीं बन पाया, सोचियें हम सब की स्थिति कहीं अधर में लटके त्रिसंकू जैसी तो नहीं बन गई हैं, हमारे लिये जीवन समय गुजारना भर हैं, सत्संग भी हमारे लिये ऐसे ही कुछ हो गया हैं कि मेरे उम्र वाले सेवानिवृत वयक्ति आये और समय गुजारे, समय गुजारने के लिये ही गीता को पढ़ते हैं, तो गीता हमें क्या परिणाम देगी, गीता हमारा कल्याण नहीं करेगी, तब एक बार नहीं, बल्कि जीवन भर गीता को पढ़ लेंगे तो भी गीता जीवन के लिये सार्थकता का सूत्र नहीं दे पायगी, समय गुजारने के लिये मत पढ़ो, समय को सार्थक करने के लिये गीता का सान्निध्य लो तथा गीता का आकंठ पान करों। शेष जारी ॰॰ जय श्री कॄष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️

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Omprakash Upadhyay Jun 19, 2019

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ramkumar verma Jun 18, 2019

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suraj bhardwaj Jun 19, 2019

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