Swami Lokeshanand
Swami Lokeshanand Jun 12, 2019

श्रीमद्भगवद्गीता में जिसे गोरक्षा कहा गया है, उसी को यहाँ नवधा भक्ति के छठे सोपान में कहा है। गो माने इन्द्रियाँ। गोरक्षा माने इन्द्रियों की रक्षा, माने दम-शील। विषय की हवा चली, इन्द्रियों की खिड़कियाँ खुली थीं, बस अन्त:करण में कामना आई, अब दुख तो पीछे चला ही आएगा। लक्ष्य से मन भटकाकर, बंधन प्रगाढ़ करेगा। सावधान साधक अनावश्यक खिड़कियाँ खोलता ही नहीं, जब देखना हो तभी देखता है, जो देखना है वही देखता है, ऐसे ही सब खिड़कियाें का उपयोग विचारपूर्वक करता है। जब जरूरत नहीं तो खोलकर करना भी क्या? तरीका भी बताया है, "विरत बहु कर्मा" बेकार के कामों में मत उलझो। कि चलो बाजार घूम आएँ, कुछ लेना नहीं, देना नहीं, यूंही। कि आपको अमुक समिति का अध्यक्ष बना दें। क्यों भाई? हम यहाँ परमात्मा पाने आए हैं, या दो कौड़ी का पद पाने? संसार की वस्तुओं और व्यक्तियों को "ना" कहना सीखो। जिस गाँव जाना नहीं, उसका रास्ता क्या देखना? जितना बेहद जरूरी है, उतना ही व्यवहार करो, बढ़िया से करो, पर व्यवहार में ही मत लगे रहो, समय बचाओ। भक्तों के चरित्र पढ़ो, और वही वही करो जो उन्होंने किया, उन्हीं के मार्ग का अनुसरण करो, जो नहीं ही करना, वो क्यों करना? "छठ दम शील विरत बहु कर्मा। निरत निरंतर सज्जन धर्मा॥" अब विडियो- https://youtu.be/7UyRJsG1IE8

श्रीमद्भगवद्गीता में जिसे गोरक्षा कहा गया है, उसी को यहाँ नवधा भक्ति के छठे सोपान में कहा है।
गो माने इन्द्रियाँ। गोरक्षा माने इन्द्रियों की रक्षा, माने दम-शील।
विषय की हवा चली, इन्द्रियों की खिड़कियाँ खुली थीं, बस अन्त:करण में कामना आई, अब दुख तो पीछे चला ही आएगा। लक्ष्य से मन भटकाकर, बंधन प्रगाढ़ करेगा।
सावधान साधक अनावश्यक खिड़कियाँ खोलता ही नहीं, जब देखना हो तभी देखता है, जो देखना है वही देखता है, ऐसे ही सब खिड़कियाें का उपयोग विचारपूर्वक करता है। जब जरूरत नहीं तो खोलकर करना भी क्या?
तरीका भी बताया है, "विरत बहु कर्मा" बेकार के कामों में मत उलझो। कि चलो बाजार घूम आएँ, कुछ लेना नहीं, देना नहीं, यूंही। कि आपको अमुक समिति का अध्यक्ष बना दें। क्यों भाई? हम यहाँ परमात्मा पाने आए हैं, या दो कौड़ी का पद पाने?
संसार की वस्तुओं और व्यक्तियों को "ना" कहना सीखो। जिस गाँव जाना नहीं, उसका रास्ता क्या देखना? जितना बेहद जरूरी है, उतना ही व्यवहार करो, बढ़िया से करो, पर व्यवहार में ही मत लगे रहो, समय बचाओ।
भक्तों के चरित्र पढ़ो, और वही वही करो जो उन्होंने किया, उन्हीं के मार्ग का अनुसरण करो, जो नहीं ही करना, वो क्यों करना?
"छठ दम शील विरत बहु कर्मा।
निरत निरंतर सज्जन धर्मा॥"
अब विडियो-
https://youtu.be/7UyRJsG1IE8

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