sanjay Borana
sanjay Borana Sep 3, 2017

पूज्य ललीतप्रभाजी

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लीलाधर की लीला न्यारी — लीलाधर की लीला न्यारी, मानव रूप धरे कंसारी । ( कंस के शत्रु) जन्म लिया माँ देवकी कोख से, खुल गये जेल के सारे ताले। सो गये प्रहरी सारे योग से, पहुँच गये गोकुल बन ग्वाले ।। माँ यशोदा को धन्य-धन्य कर, गौओं के बन गये रखवारे । गोपी, ग्वाल-बाल संग मिलकर, सबहि नचावें नचावनहारे ।। मामा कंस की महिमा न्यारी, प्रतिदिन भेजें मारनहार । मार सके उसको क्या कोई, वही है सबका तारनहार ।। बाल-रूप धर, कृष्ण वर्ण ले, आ गये जग में साँवरिया । नंद-यशोदा भागे पीछे , पागल बनके बावरिया ।। मेरे हृदय में भी बस जाओ, हे! मथुरा के प्रतिपालक। अवगुण सारे गुण बन जायें, हे मधुसूदन ! जनतारक ।। हाथ जोड़कर विनती करूँ मैं, सबका जीवन बने मधुवन। तुम रक्षक बन जाओ सबके, हे करुनामय ! नंदनंदन। ।। 🍃🌺⚜️जय श्री कृष्ण 🌺🍃 🍃🌺⚜️ राधे राधे 🌺🍃

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ओम शांति आत्मा एक चेतन वस्तु है।आत्मा को चेतन इसी कारण कहा जाता है कि वह सोच-विचार कर सकती है, दुख- सुख का अनुभव कर सकती है, अच्छा- बुरा करने का पुरूषार्थ (कर्म) कर सकती है। बल्कि मन स्वयं आत्मा के ही संकल्पों का या दुख-सुख के अनुभव का या इच्छा का नाम है।बुद्धि स्वयं आत्मा के ही निर्णय, विचार, विवेक- शक्ति का नाम है। और संस्कार भी स्वयं आत्मा द्वारा किये हुए अच्छे या बुरे कर्मों के आत्मा पर पडे प्रभाव का नाम है। या इसे ऐसे भी कह सकते हैं, अच्छे या बुरे कर्म करने के बाद आत्मा की जो वृत्ति (व्यवहार) बनती है, उसका नाम संस्कार या स्वभाव है। अतः आत्मा को मन, बुद्धि एवं संस्कारों से अलग मानना तो गोया आत्मा को चेतन न मानना अर्थात उसे जड मानना होगा।चेतन आत्मा में और जड प्रकृति में तो यही अन्तर है कि प्रकृति इच्छा, विचार, प्रयत्न, और अनुभव आदि लक्षण नहीं हैं, पर आत्मा में यह सभी लक्षण है।जब प्रकृति भले-बुरे, सुख- शान्ति आदि का अनुभव नहीं कर सकती, तो उससे निर्मित यह सूक्ष्म शरीर भला कैसे हो सकता है।

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💓 #जिन्दगी_वही_है_जो_हम_आज_जी_ले... आज के इस कोरोना काल में, सब कुछ अनिश्चित है. कब क्या हो जाए, कुछ मालूम नहीं है. कौन बीमार हो जाए, कौन दुनिया से चला जाए, कुछ पता नहीं है... कुछ बातों का ध्यान रखें, जिससे बाद में पछ्ताना न पड़े... 1. ☝️परमात्मा की याद के बिना, एक पल भी व्यर्थ न गवाएं... 2. घर, परिवार, मित्रों को समय दें. जिससे बाद में मलाल न रहे, कि फलाँ व्यक्ति चला गया, मैं बात भी न कर पाया... 3. तन से, मन से जिसकी जितनी सेवा कर सकें, ज़रूर करें। न कर सकें, तो 'मौन रह कर', घर की शान्ति में योगदान दें... 4. कुछ बात बुरी भी लगे किसी की, तो जल्दी खत्म करके, प्रेम से बात कर लें. मालूम नहीं, ये बातचीत ही 'आखिरी' हो जाए... 5. किसी का परचिंतन, मन में बुरा भाव, टिकने न दें. जल्दी से मन को शांत कर, चेक करते रहें कि 'मेरा ध्यान' किधर है.. ? 6. सारी दुनिया कष्ट में है, दुख में है, उदास है. भगवान से सबके लिए, कृपा मांगें, दया मांगें. सबको शान्ति मिले, कष्टों से मुक्ति मिले... 7. दिल ही दिल में, सबको क्षमा कर दें. सब से क्षमा माँग लें, कहीं किसी से खाता, जुड़ा न रह जाए..* 8. जिसने जब, जितना सहयोग दिया, उसका शुक्राना मन ही मन करें। यदि किसी ने हमारी परेशानी को समझा नहीं, सहयोग नहीं दिया, तो भी शुक्राना करें। मन को समझाए, कि इसमें कोई भलाई होगी... 9. स्वयं को Negativity से दूर रख कर, Positive विचार, सब के लिए Blessings, सुमिरन व कृपाओं की तरफ ध्यान दें. स्वयं को, शांत रखें।परमात्मा सब, अच्छा करेगा... 🤗 ओम शांति!!

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शिव का वाहन नंदी बैल, तब संतों ने कहा कि नंदी अल्पायु है। यह सुनकर शिलाद ऋषि चिंतित हो गए। पिता की चिंता को नंदी ने भांप कर पूछा क्या बात है तो पिता ने कहा कि तुम्हारी अल्पायु के बारे में संत कह गए हैं इसीलिए चिंतित हूं। यह सुनकर नंदी हंसने लगा और कहने लगा कि आपने मुझे भगवान शिव की कृपा से पाया है तो मेरी उम्र की रक्षा भी वहीं करेंगे आप क्यों नाहक चिंता करते हैं। इतना कहते ही नंदी भुवन नदी के किनारे शिव की तपस्या करने के लिए चले गए। कठोर तप के बाद शिवजी प्रकट हुए और कहा वरदान मांगों वत्स। तब नंदी के कहा कि मैं ताउम्र आपके सानिध्य में रहना चाहता हूं। नंदी के समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने नंदी को पहले अपने गले लगाया और उन्हें बैल का चेहरा देकर उन्हें अपने वाहन, अपना दोस्त, अपने गणों में सर्वोत्तम के रूप में स्वीकार कर लिया। 🩸💧🩸💧🩸💧🩸💧🍀🍀🍀🍀🍀🙏🙏🌹🙋‍♀️

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Rajendra Jain Sep 26, 2020

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🌹भगवान कैसे निभाते हैं सच्चे भक्त से रिश्ता🌹 🌻एक संत थे वे भगवान राम को मानते थे, कहते है यदि भगवान से निकट आना है तो उनसे कोई रिश्ता जोड़ लो। जहां जीवन में कमी है, वहीं ठाकुर जी को बैठा दो। वे जरूर उस संबंध को निभाएंगे। इसी तरह संत भी भगवान राम को अपना शिष्य मानते थे और शिष्य पुत्र के समान होता है, इसलिए माता सीता को पुत्रवधु के रूप में देखते थे। उनका नियम था रोज मंदिर जाते और अपनी पहनी माला भगवान को पहनाते थे। उनकी यह बात मंदिर के लोगो को अच्छी नहीं लगती थी। उन्होंने पुजारी से कहा- ये बाबा रोज मंदिर आते हैं और भगवान को अपनी उतारी हुई माला पहनाते हैं। उन्होंने पुजारी जी से कहा कि वे बाबा से इस बात का विरोध करें। अगले दिन बाबा मंदिर आए और पुजारी जी को माला उतार कर दी, तो पुजारी जी ने माला भगवान को पहनाने से इंकार कर दिया। साथ ही कहा कि यदि आपको माला पहनानी है तो बाजार से नई माला लेकर आएं, ये पहनी हुई माला ठाकुर जी को नहीं पहनाएंगे। वे बाजार गए और नई माला लेकर आए, आज संत मन में बड़े उदास थे। अब जैसे ही पुजारी जी ने वह नई माला भगवान श्री राम को पहनाई तुरंत वह माला टूट कर नीचे गिर गई। उन्होंने फिर जोड़कर पहनाई, माला फिर टूटकर गिर पड़ी। ऐसा तीन-चार बार किया पर भगवान ने वह माला स्वीकार नहीं की। तब पुजारी जी समझ गए कि उनसे बड़ा अपराध हो गया है और पुजारी जी ने बाबा से क्षमा मांगी। संत सीता जी को बहू मानते थे इसलिए जब भी मंदिर जाते पुजारी जी सीता जी के विग्रह के आगे पर्दा कर देते थे। भाव ये होता था कि बहू ससुर के सामने सीधे कैसे आए और बाबा केवल श्री राम जी के ही दर्शन करते थे। जब भी बाबा मंदिर आते तो बाहर से ही आवाज लगाते पुजारी जी हम आ गए और पुजारी जी झट से सीता जी के आगे पर्दा कर देते। एक दिन बाबा ने बाहर से आवाज लगायी पुजारी जी हम आ गए, उस समय पुजारी जी किसी दूसरे काम में लगे हुए थे, उन्होंने सुना नहीं, तब सीता जी ने तुरत अपने विग्रह से बाहर आईं और अपने आगे पर्दा कर दिया। जब बाबा मंदिर में आए तो यह देखकर पुजारी जी को बड़ा अश्चर्य हुआ कि सीता जी के विग्रह का पर्दा तो लगा है। पुजारी बोले- बाबा, आज आपने आवाज तो लगायी ही नहीं? बाबा बोले- पुजारी जी, मैं तो रोज की तरह आवाज लगाने के बाद ही मंदिर में आया था। यह सुनकर पुजारी जी और बाबा समझ गए कि सीता जी ने स्वयं अपने विग्रह के आगे पर्दा किया था। आज से हम मंदिर में प्रवेश ही नही करेंगे, अब बाबा रोज मंदिर के सामने से निकलते और बाहर से ही आशीर्वाद देकर चले जाते। 🌹शिक्षा : भगवान से अगर रिश्ता जोड़ लिया जाए तो वे भी संबंध को निभाते जरूर हैं। सच्चे भक्त को कभी निराश नहीं करते। 🌹 जय श्री राम 🌹 जय श्री राम 🌹 🙏🙏🙏 🙏🙏🙏

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