श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथ द्वादशोऽध्यायः रहूगण का प्रश्न और भरतजी का समाधान...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ नमो नमः कारणविग्रहाय स्वरूपतुच्छीकृतविग्रहाय नमोऽवधूत द्विजबन्धुलिङ्ग निगूढनित्यानुभवाय तुभ्यम् ॥ १ ज्वरामयार्तस्य यथागदं सत् निदाघदग्धस्य यथा हिमाम्भः । कुदेहमानाहिविदष्टदृष्ट ब्रह्मन् वचस्तेऽमृतमौषधं मे ॥ २ तस्माद्भवन्तं मम संशयार्थं प्रक्ष्यामि पश्चादधुना सुबोधम् । अध्यात्मयोगग्रथितं तवोक्त- माख्याहि कौतूहलचेतसो मे ॥३ यदाह योगेश्वर दृश्यमानं क्रियाफलं सदव्यवहारमूलम् । न हाञ्जसा तत्त्वविमर्शनाय भवानमुष्पिन् भ्रमते मनो मे ॥४ ब्राह्मण उवाच अयं जनो नाम चलन् पृथिव्यां य: पार्थिवः पार्थिव कस्य हेतोः । तस्यापि चाङ्घ्योरधि गुल्फजङ्का- जानूरुमध्योरशिरोधरांसाः॥ ५ अंसेऽधि दार्वी शिबिका च यस्यां सौवीरराजेत्यपदेश आस्ते । यस्मिन् भवान् रूढनिजाभिमानो राजास्मि सिन्धुष्टिति दुर्मदान्धः ।।६ शोच्यानिरमांस्वमधिकष्टदीनान् विष्ट्या निगृह्न्निरनुग्रहोऽसि । जनस्य गोप्तास्मि विकत्थमानो न शोभसे वृद्धसभाषु धृष्टः' ॥ ७ यदा क्षितावेव चराचरस्य विदाम निष्ठां प्रभवं च नित्यम् । तत्रामतोऽन्यद् व्यवहारमूलं निरूप्यतां सत् क्रिययानुमेयम् ॥ ८ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ राजा रहूगण ने कहा -भगवन् ! मैं आपको - नमस्कार करता हूँ। आपने जगत् का उद्धार करने के लिये ही यह देह धारण की है । योगेश्वर ! अपने परमानन्दमय स्वरूप का अनुभव करके आप इस स्थूलशरीर से उदासीन हो गये हैं तथा एक जड ब्राह्मण के वेष से अपने नित्यज्ञानमय स्वरूप को जनसाधारण की दृष्टि से ओझल किये हुए हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥ ब्रह्मन् ! जिस प्रकार ज्वर से पीड़ित रोगी के लिये मीठी ओषधि और धूप से तपे हुए पुरुष के लिये शीतल जल अमृततुल्य होता है, उसी प्रकार मेरे लिये, जिसकी विवेकबुद्धि को देहाभिमानरूप विषैले सर्पने डस लिया है, आपके वचन अमृतमय ओषधि के समान हैं॥ २ ॥ देव ! मैं आपसे अपने संशयों की निवृत्ति तो पीछे कराऊँगा। पहले तो इस समय आपने जो अध्यात्म योगमय उपदेश दिया है, उसी को सरल करके समझाइये, उसे समझने की मुझे बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ३ ॥ योगेश्वर ! आपने जो यह कहा कि भार उठाने की क्रिया तथा उससे जो श्रमरूप फल होता है, वे दोनों ही प्रत्यक्ष होने पर भी केवल व्यवहारमूल के ही हैं, वास्तव में सत्य नहीं है-वे तत्त्वविचार के सामने कुछ भी नहीं ठहरते-सो इस विषय में मेरा मन चक्कर खा रहा है, आपके इस कथन का मर्म मेरी समझ में नहीं आ रहा है॥४॥ जडभरत ने कहा-पृथ्वीपते ! यह देह पृथ्वी का विकार है, पाषाणादि से इसका क्या भेद है ? जब यह किसी कारण से पृथ्वी पर चलने लगता है, तब इसके भारवाही आदि नाम पड़ जाते हैं। इसके दो चरण हैं; उनके ऊपर क्रमशः टखने, पिंडली, घुटने, जाँघ, कमर, वक्षःस्थल, गर्दन और कंधे आदि अङ्ग ॥ ५ ॥ कंधों के ऊपर लकड़ी की पालकी रखी हुई है; उसमें भी सौवीरराज नाम का एक पार्थिव विकार ही है, जिसमें आत्मबुद्धि रूप अभिमान करने से तुम 'मैं सिन्धु देश का राजा हूँ इस प्रबल मद से अंधे हो रहे हो । ६ ॥ किन्तु इसी से तुम्हारी कोई श्रेष्ठता सिद्ध नहीं होती, वास्तव में तो तुम बड़े क्रूर और धृष्ट ही हो। तुमने इन बेचारे दीन-दुखिया कहारों को बेगार में पकड़कर पालकी में जोत रखा है और फिर महापुरुषों की सभा में बढ़-बढ़कर बातें बनाते हो कि मैं लोकों की रक्षा करने वाला हूँ। यह तुम्हें शोभा नहीं देता ॥ ७ ॥ हम देखते हैं कि सम्पूर्ण चराचर भूत सर्वदा पृथ्वी से ही उत्पन्न होते हैं और पृथ्वी में ही लीन होते हैं; अतः उनके क्रियाभेद के कारण जो अलग-अलग नाम पड़ गये हैं-बताओ तो, उनके सिवा व्यवहार का और क्या मूल है ? ॥ ८ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

श्रीमद्भागवत महापुराणम्  
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पञ्चम स्कन्ध: अथ द्वादशोऽध्यायः

रहूगण का प्रश्न और भरतजी का समाधान...(भाग 1)
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नमो नमः कारणविग्रहाय स्वरूपतुच्छीकृतविग्रहाय
नमोऽवधूत द्विजबन्धुलिङ्ग
निगूढनित्यानुभवाय तुभ्यम् ॥ १

ज्वरामयार्तस्य यथागदं सत् 
निदाघदग्धस्य यथा हिमाम्भः ।
कुदेहमानाहिविदष्टदृष्ट
ब्रह्मन् वचस्तेऽमृतमौषधं मे ॥ २

तस्माद्भवन्तं मम संशयार्थं
प्रक्ष्यामि पश्चादधुना सुबोधम् ।
अध्यात्मयोगग्रथितं तवोक्त-
माख्याहि कौतूहलचेतसो मे ॥३

यदाह योगेश्वर दृश्यमानं
क्रियाफलं सदव्यवहारमूलम् ।
न हाञ्जसा तत्त्वविमर्शनाय
भवानमुष्पिन् भ्रमते मनो मे ॥४

ब्राह्मण उवाच

अयं जनो नाम चलन् पृथिव्यां
य: पार्थिवः पार्थिव कस्य हेतोः । 
तस्यापि चाङ्घ्योरधि गुल्फजङ्का-
जानूरुमध्योरशिरोधरांसाः॥ ५

अंसेऽधि दार्वी शिबिका च यस्यां सौवीरराजेत्यपदेश आस्ते ।
यस्मिन् भवान् रूढनिजाभिमानो 
राजास्मि सिन्धुष्टिति दुर्मदान्धः ।।६

शोच्यानिरमांस्वमधिकष्टदीनान्
विष्ट्या निगृह्न्निरनुग्रहोऽसि ।
जनस्य गोप्तास्मि विकत्थमानो
न शोभसे वृद्धसभाषु धृष्टः' ॥ ७ 

यदा क्षितावेव चराचरस्य 
विदाम निष्ठां प्रभवं च नित्यम् । 
तत्रामतोऽन्यद् व्यवहारमूलं
निरूप्यतां सत् क्रिययानुमेयम् ॥ ८

श्लोकार्थ
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राजा रहूगण ने कहा -भगवन् ! मैं आपको - नमस्कार करता हूँ। आपने जगत् का उद्धार करने के लिये ही यह देह धारण की है । योगेश्वर ! अपने परमानन्दमय स्वरूप का अनुभव करके आप इस स्थूलशरीर से उदासीन हो गये हैं तथा एक जड ब्राह्मण के वेष से अपने नित्यज्ञानमय स्वरूप को जनसाधारण की दृष्टि से ओझल किये हुए हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥ 

ब्रह्मन् ! जिस प्रकार ज्वर से पीड़ित रोगी के लिये मीठी ओषधि और धूप से तपे हुए पुरुष के लिये शीतल जल अमृततुल्य होता है, उसी प्रकार मेरे लिये, जिसकी विवेकबुद्धि को देहाभिमानरूप विषैले सर्पने डस लिया है, आपके वचन अमृतमय ओषधि के समान हैं॥ २ ॥ 

देव ! मैं आपसे अपने संशयों की निवृत्ति तो पीछे कराऊँगा। पहले तो इस समय आपने जो अध्यात्म योगमय उपदेश दिया है, उसी को सरल करके समझाइये, उसे समझने की मुझे बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ३ ॥

योगेश्वर ! आपने जो यह कहा कि भार उठाने की क्रिया तथा उससे जो श्रमरूप फल होता है, वे दोनों ही प्रत्यक्ष होने पर भी केवल व्यवहारमूल के ही हैं, वास्तव में सत्य नहीं है-वे तत्त्वविचार के सामने कुछ भी नहीं ठहरते-सो इस विषय में मेरा मन चक्कर खा रहा है, आपके इस कथन का मर्म मेरी समझ में नहीं आ रहा है॥४॥ 

जडभरत ने कहा-पृथ्वीपते ! यह देह पृथ्वी का विकार है, पाषाणादि से इसका क्या भेद है ? जब यह किसी कारण से पृथ्वी पर चलने लगता है, तब इसके
भारवाही आदि नाम पड़ जाते हैं। इसके दो चरण हैं; उनके ऊपर क्रमशः टखने, पिंडली, घुटने, जाँघ, कमर, वक्षःस्थल,
गर्दन और कंधे आदि अङ्ग ॥ ५ ॥ 

कंधों के ऊपर लकड़ी की पालकी रखी हुई है; उसमें भी सौवीरराज नाम का एक पार्थिव विकार ही है, जिसमें आत्मबुद्धि रूप अभिमान करने से तुम 'मैं सिन्धु देश का राजा हूँ इस प्रबल मद से अंधे हो रहे हो । ६ ॥ 

किन्तु इसी से तुम्हारी कोई श्रेष्ठता सिद्ध नहीं होती, वास्तव में तो तुम बड़े क्रूर और धृष्ट ही हो। तुमने इन बेचारे दीन-दुखिया कहारों को बेगार में पकड़कर पालकी में जोत रखा है और फिर महापुरुषों की
सभा में बढ़-बढ़कर बातें बनाते हो कि मैं लोकों की रक्षा करने वाला हूँ। यह तुम्हें शोभा नहीं देता ॥ ७ ॥ 

हम देखते हैं कि सम्पूर्ण चराचर भूत सर्वदा पृथ्वी से ही उत्पन्न होते हैं और पृथ्वी में ही लीन होते हैं; अतः उनके क्रियाभेद के कारण जो अलग-अलग नाम पड़ गये हैं-बताओ तो, उनके सिवा व्यवहार का और क्या मूल है ? ॥ ८ ॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 
क्रमशः...
शेष अलगे लेख में...
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नर नारायण जन्मोत्सव विशेष 〰️〰️🌸〰️🌸〰️🌸〰️〰️ कथा नर और नारायण की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ प्रभु श्री कृष्ण जी को अर्जुन सबसे प्रिय इसलिए थे कि वो नर के अवतार थे और श्री कृष्ण स्वयं नारायण थे। आपने नर और नारायण का नाम तो सुना ही होगा। भारत का शिरोमुकुट हिमालय है, जो समस्त पर्वतों का पति होने से गिरिराज कहलाता है उसी के एक उत्तुंग शिखर के प्रांगण में बद्रिकाश्रम या बदरीवन है। वहाँ पर इन चर्म चक्षुओं से न दीखने वाला बदरी का एक विशाल वृक्ष है, इसी प्रकार का प्रयाग में अक्षयवट है। बदरी वृक्ष में लक्ष्मी का वास है, इसीलिये लक्ष्मीपति को यह दिव्य वृक्ष अत्यन्त प्रिय है। उसकी सुखद शीतल छाया में भगवान् ऋषि मुनियों के साथ सदा तपस्या में निरत रहते हैं। बदरी वृक्ष के कारण ही यह क्षेत्र बदरी क्षेत्र कहलाता है और नर-नारायण का निवास स्थान होने से इसे नर-नारायण या नारायणाश्रम भी कहते हैं। सृष्टि के आदि में भगवान् ब्रह्मा ने अपने मन से 10 पुत्र उत्पन्न किये। ये संकल्प से ही अयोनिज उत्पन्न हुए थे, इसलिये ब्रह्मा के मानस पुत्र कहाये। उनके नाम मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ, दक्ष और नारद है। इनके द्वारा ही आगे समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई। इसके अतिरिक्त ब्रह्माजी के दायें स्तन से धर्मदेव उत्पन्न हुए और पृष्ठ भाग से अधर्म। अधर्म का भी वंश बढ़ा उसकी स्त्री का नाम मृषा (झूठ) था, उसके दम्भ और माया नाम के पुत्र हुए। उन दोनों से लोभ और निकृति (शठता) ये उत्पन्न हुए, फिर उन दोनों से क्रोध और हिंसा दो लड़की लडके हुए। क्रोध और हिंसा के कलि और दुरक्ति हुए। उनके भय ओर मृत्यु हुए तथा भय मृत्यु से यातना (दुख) और निरय नरक ये हुए। ये सब अधर्म की सन्तति है। ’’दुर्जनं प्रथम बन्दे सज्जनं तदनन्तरम्’’ इस न्याय से अधर्म की वंशावली के बाद अब धर्म की सन्तति - ब्रह्माजी के पुत्र दक्ष प्रजापति का विवाह मनु पुत्री प्रसूती से हुआ। प्रसूति में दक्ष प्रजापति ने 16 कन्यायें उत्पन्न की। उनमें से 13 का विवाह धर्म के साथ किया। एक कन्या अग्नि को दी, एक पितृगण को, एक भगवान् शिव को। जिनका विवाह धर्म के साथ हुआ उनके नाम - श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि मेधा, तितिक्षा, ही और मूर्ति। धर्म की ये सब पत्नियाँ पुत्रवती हुई। सबने एक एक पुत्र रत्न उत्पन्न किया। जैसे श्रद्धा ने शुभ को उत्पन्न किया, मैनी ने प्रसाद को, दया ने अभय को, शान्ति ने सुख को, तुष्टि ने मोद को, पुष्टि ने अहंकार को, क्रिया ने योग को उन्नति ने दर्प को, पुद्धि ने अर्थ को, मेधा ने स्मृति को, तितिक्षा ने क्षेम को, और ही (लल्जा) ने प्रश्रय (विनय) को और सबसे छोटी मूर्ति देवी ने भगवान् नर-नारायण को उत्पन्न किया। क्योंकि मूर्ति में ही भगवान् की उत्पत्ति हो सकती है। वह मूर्ति भी धर्म की ही पत्नी है। नर-नारायण ने अपनी माता मूर्ति की बहुत अधिक बड़ी श्रद्धा से सेवा की। अपने पुत्रों की सेवा से सन्तुष्ट होकर माता ने पुत्रों से वर माँगने को कहा। पुत्रों ने कहा-’’माँ, यदि आप हम पर प्रसन्न हैं तो वरदान दीजिये कि हमारी रूचि सदा तप में रहे और घरबार छोड़कर हम सदा तप में ही निरत रहें।’’ माता को यह अच्छा कैसे लगता कि मेरे प्राणों से भी प्यारे पुत्र घर-बार छोड़कर सदा के लिये वनवासी बन जायँ, किन्तु वे वचन हार चुकी थी। अतः उन्होंने अपने आँखों के तारे आज्ञाकारी पुत्रों को तप करने की आज्ञा दे दी। दोनों भाई बदरिकाश्रम में जाकर तपस्या में निरत हो गये। बदरिकाश्रम में जाकर दोनों भाई घोर तपस्या करने लगें इनकी तपस्या के सम्बन्ध में पुराणों में भिन्न-भिन्न प्रकार की कथायें हैं। श्रीमद्भागवत में कई स्थानों पर भगवान् नर-नारायण का उल्लेख है। देवी भागवत के चतुर्थ स्कन्द में तो नर-नारायण की बड़ी लम्बी कथा है। नर और नारायण भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए केदारखंड में उस स्थान पर तपस्या करने लगे जहां पर आज ब्रदीनाथ धाम है। इनकी तपस्या से इंद्र परेशान होने लगे। इंद्र को लगने लगा कि नर और नारायण इंद्रलोक पर अधिकार न कर लें। इसलिए इंद्र ने अप्सराओं को नर और नारायण के पास तपस्या भंग करने के लिए भेजा। उन्होंने जाकर भगवान नर-नारायण को अपनी नाना प्रकार की कलाओं के द्वारा तपस्या भंग करने का प्रयास किया, किंतु उनके ऊपर कामदेव तथा उसके सहयोगियों का कोई प्रभाव न पड़ा। कामदेव, वसंत तथा अप्सराएं शाप के भय से थर-थर कांपने लगे। उनकी यह दशा देखकर भगवान नर और नारायण ने कहा, 'तुम लोग मत डरो। हम प्रेम और प्रसन्नता से तुम लोगों का स्वागत करते हैं।' भगवान नर और नारायण की अभय देने वाली वाणी को सुनकर काम अपने सहयोगियों के साथ अत्यन्त लज्जित हुआ। उसने उनकी स्तुति करते हुए कहा- प्रभो! आप निर्विकार परम तत्व हैं। बड़े बड़े आत्मज्ञानी पुरुष आपके चरण. कमलों की सेवा के प्रभाव से कामविजयी हो जाते हैं। हमारे ऊपर आप अपनी कृपादृष्टि सदैव बनाए रखें। हमारी आपसे यही प्रार्थना है। आप देवाधिदे विष्णु हैं। कामदेव की स्तुति सुनकर भगवान नर नारायण प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी योगमाया के द्वारा एक अद्भुत लीला दिखाई। सभी लोगों ने देखा कि 16000 सुंदर-सुंदर नारियां नर और नारायण की सेवा कर रही हैं। फिर नारायण ने इंद्र की अप्सराओं से भी सुंदर अप्सरा को अपनी जंघा से उत्पन्न कर दिया। उर्व से उत्पन्न होने के कारण इस अप्सरा का नाम उर्वशी रखा। नारायण ने इस अप्सरा को इंद्र को भेंट कर दिया। उन 16000 कन्याओं ने नारायण से विवाह की इच्छा जाहिर की,तब नारायण ने उन्हें कहा कि द्वापर में मेरा कृष्ण अवतार होगा।तब तक प्रतीक्षा करने को कहा उनकी आज्ञा मानकर कामदेव ने अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ अप्सरा उर्वशी को लेकर स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया। उसने देवसभा में जाकर भगवान नर और नारायण की अतुलित महिमा के बारे में सबसे कहा, जिसे सुनकर देवराज इंद्र को काफी पश्चाताप हुआ। केदार और बदरीवन में नर-नारायण नाम ने घोर तपस्या की थी। इसलिए यह स्थान मूलत: इन दो ऋषियों का स्थान है। दोनों ने केदारनाथ में शिवलिंग और बदरीकाश्रम में विष्णु के विग्रहरूप की स्थापना की थी। *केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति* भगवान शिव की प्रार्थना करते हुए दोनों कहते हैं कि हे शिव आप हमारी पूजा ग्रहण करें। नर और नारायण के पूजा आग्रह पर भगवान शिव स्वयं उस पार्थिव लिंग में आते हैं। इस तरह पार्थिव लिंग के पूजन में वक्त गुजरता जाता है। एक दिन भगवान शिव खुश होते हैं और नर व नारायण के सामने प्रकट होकर कहते हैं कि वो उनकी अराधना से बेहद खुश हैं इसलिए वर मांगो। नर और नारायण कहते हैं, हे प्रभु अगर आप प्रसन्न हैं तो लोक कल्याण के लिए कुछ कीजिए। भगवान शिव कहते हैं कि कहो क्या कहना चाहते हो। इस पर नर और नारायण कहते हैं कि जिस पार्थिव लिंग में हमने आपकी पूजा की है उस लिंग में आप स्वयं निवास कीजिए ताकि आपके दर्शन मात्र से लोगों का कष्ट दूर हो जाए। दोनों भाइयों के अनुरोध से भगवान शिव और प्रसन्न हो जाते हैं और केदारनाथ के इस तीर्थ में केदारेश्वर ज्योतिलिंग के रुप में निवास करने लगते हैं। इस तरह केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति होती है। महाभारत के अनुसार पाप से मुक्त होने के बाद केदारेश्वर में स्थित ज्योतिर्लिंग के आसपास मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने हाथ से किया था। बाद में इसका दोबारा निर्माण आदि शंकराचार्य ने करवाया था। इसके बाद राजा भोज ने यहां पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। यही नर और नारायण द्वापर में अर्जुन और कृष्ण के रूप में अवतरित हुए थे। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथविंशोऽध्यायः अन्य छः द्वीपो तथा लोकालोक पर्वत का वर्णन...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीशुक उवाच अतः परं लक्षादीनां प्रमाणलक्षणसंस्थानतो वर्षविभाग उपवर्ण्यते ॥ १ ॥ जम्बूद्वीपोऽयं यावत्प्रमाणविस्तारस्तावता क्षारोदधिना परि वेष्टितो यथा मेरुर्जम्बाख्येन लवणोदधिरपि ततो द्विगुणविशालेन प्रक्षाख्येन परिक्षिप्तो यथा परिखा बाह्योपवनेन। प्लक्षो जम्बूप्रमाणो द्वीपाख्याकरो हिरण्मय उत्थितो यत्राग्निरुपास्ते सप्तजिह्वस्तस्याधि पतिः प्रियव्रतात्मज इध्मजिह्वः स्वं द्वीपं सप्तवर्षाणि विभज्य सप्तवर्षनामभ्य आत्मजेभ्य आकलय्य स्वय मात्मयोगेनोपरराम ॥ २ ॥ शिवं यवसं सुभद्रं शान्तं क्षेमममृतमभयमिति वर्षाणि तेषु गिरयो नद्यश्च सप्तैवाभिज्ञाताः ॥ ३ ॥ मणिकूटो वज्रकूट' इन्द्रसेनो ज्योतिष्मान् सुपर्णो हिरण्यष्ठीवो मेघमाल इति सेतुशैला:। अरुणा नृणाऽऽङ्गिरस सावित्री सुप्रभाता ऋतम्भरा सत्यम्भरा इति महानद्यः यासां जलोपस्पर्शनविधूतरजस्तमसो हंस पतङ्गोर्ध्वायनसत्याङ्गसंज्ञाश्चत्वारो वर्णाः सहस्त्रायुषो विबुधोपमसन्दर्शनप्रजननाः स्वर्गद्वारं त्रय्या विद्यया भगवन्तं त्रयीमयं सूर्यमात्मानं यजन्ते ॥ ४ ॥ प्रत्नस्य विष्णो रूपं यत्सत्यस्यर्तस्य ब्रह्मणः। अमृतस्य च मृत्योश्च सूर्यमात्मानमीमहीति ॥ ५ प्लक्षादिषु पञ्चसु पुरुषाणामायुरिन्द्रियमोजः सहो बलं बुद्धिर्विक्रम इति च सर्वेषामौत्पत्तिकी सिद्धिरविशेषेण वर्तते ॥ ६ ॥ प्लक्ष: 'स्वसमानेनेक्षुरसोदेनावृतो यथा तथा द्वीपोऽपि शाल्मलो द्विगुणविशाल: समानेन सुरोदेनावृतः परिवृते ।। ७ ॥ यत्र ह वै शाल्मली प्लक्षायामा यस्यां वाव किल निलयमाहुर्भगवत श्छन्दःस्तुतः पतत्त्रिराजस्य सा द्वीपहूतये उप लक्ष्यते ॥ ८ ॥ तद्द्वीपाधिपतिः प्रियव्रतात्मजो यज्ञबाहुः स्वसुतेभ्यः सप्तभ्यस्तन्नामानि सप्तवर्षाणि व्यभजत्सुरोचनं सौमनस्यं रमणकं देववर्षं पारिभद्रमाप्यायनमविज्ञातमिति ॥ ९ ॥ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ श्रीशुकदेवजी कहते हैं- राजन् ! अब परिमाण, लक्षण और स्थितिके अनुसार लक्षादि अन्य द्वीपोंके वर्षविभागका वर्णन किया जाता है ॥ १ ॥ जिस प्रकार मेरु पर्वत जम्बूद्वीप से घिरा हुआ है, उसी प्रकार जम्बूद्वीप भी अपने ही समान परिमाण और विस्तारवाले खारे जल के समुद्र से परिवेष्टित है। फिर खाई जिस प्रकार बाहरके उपवनसे घिरी रहती है, उसी प्रकार क्षारसमुद्र भी अपनेसे दूने विस्तारवाले लक्षद्वीपसे घिरा हुआ है। जम्बूद्वीपमें जितना बड़ा जामुनका पेड़ है, उतने ही विस्तार वाला यहाँ सुवर्णमय प्लक्ष (पाकर) का वृक्ष है। उसीके कारण इसका नाम लक्षद्वीप हुआ है। यहाँ सात जिह्वाओंवाले अग्निदेव विराजते हैं। इस द्वीपके अधिपति प्रियव्रतपुत्र महाराज इध्मजिह्व थे। उन्होंने इसको सात वर्षों में विभक्त किया और उन्हें उन वर्षोंके समान ही नामवाले अपने पुत्रोंको सौंप दिया तथा स्वयं अध्यात्मयोगका आश्रय लेकर उपरत हो गये ॥ २ ॥ इन वर्षों के नाम शिव, यवस, सुभद्र, शान्त, क्षेम, अमृत और अभय हैं। इनमें भी सात पर्वत और सात नदियाँ ही प्रसिद्ध हैं ॥ ३ ॥ वहाँ मणिकूट, वज्रकूट, इन्द्रसेन, ज्योतिष्मान, सुपर्ण, हिरण्यष्ठीव और मेघमाल—ये सात मर्यादापर्वत हैं तथा अरुणा, नृष्णा, आङ्गिरसी, सावित्री, सुप्रभाता, ऋतम्भरा और सत्यम्भरा- ये सात महानदियाँ हैं। वहाँ हंस, पतङ्ग, ऊर्ध्वायन और सत्याङ्ग नाम के चार वर्ण हैं। उक्त नदियों के जल में स्नान करने से इनके रजोगुण-तमोगुण क्षीण होते रहते हैं। इनकी आयु एक हजार वर्ष की होती है। इनके शरीरों में देवताओं की भाँति थकावट, पसीना आदि नहीं होता और सन्तानोत्पत्ति भी उन्हीं के समान होती है। ये त्रयीविद्या के द्वारा तीनों वेदों में वर्णन किये हुए स्वर्ग के द्वारभूत आत्मस्वरूप भगवान् सूर्यकी उपासना करते हैं ॥ ४ ॥ वे कहते हैं कि 'जो सत्य (अनुष्ठान योग्य धर्म) और ऋत (प्रतीत) होने वाले धर्म), वेद और शुभाशुभ फल के अधिष्ठाता हैं – उन पुराणपुरुष विष्णुस्वरूप भगवान् सूर्यकी हम शरणमें जाते हैं ॥ ५॥ प्लक्ष आदि पाँच द्वीपों में सभी मनुष्यों को जन्म से ही आयु, इन्द्रिय, मनोबल, इन्द्रियबल, शारीरिक बल, बुद्धि और पराक्रम समानरूप से सिद्ध रहते हैं ॥ ६ ॥ लक्षद्वीप अपने ही समान विस्तार वाले इक्षुरस के समुद्र से घिरा हुआ है। उसके आगे उससे दुगुने परिमाण वाला शाल्मलीद्वीप है, जो उतने ही विस्तार वाले मदिराके सागर से घिरा है ॥ ७ ॥ प्लक्षद्वीप के पाकर के पेड़ के बराबर उसमें शाल्मली (सेमर) का वृक्ष है। कहते हैं, यही वृक्ष अपने वेदमय पंखों से भगवान्‌ की स्तुति करने वाले पक्षिराज भगवान् गरुड का निवासस्थान है तथा यही इस द्वीप के नामकरण का भी हेतु है || ८ || इस द्वीप के अधिपति प्रियव्रतपुत्र महाराज यज्ञबाहु थे। उन्होंने इसके सुरोचन, सौमनस्य, रमणक, देववर्ष, पारिभद्र, आप्यायन और अविज्ञात नाम से सात विभाग किये और इन्हें इन्हीं नामवाले अपने पुत्रों को सौंप दिया ॥ ९ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (बयासीवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय तारकद्वादशी के प्रसंग में राजा कुशध्वज की कथा तथा व्रत विधान...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ महाराज युधिष्ठिर ने कहा- भगवन्! मैं बहुत बड़ा पातकी हूँ। भीष्म, द्रोण आदि महात्माओं का मैंने वध किया। आप कृपाकर कोई ऐसा उपाय बतायें, जिससे मैं इस वधरूपी पापसमूह से छुटकारा पा सकूँ। भगवान् श्रीकृष्ण बोले- महाराज! प्राचीन काल में विदर्भ देश में एक बड़ा प्रतापी कुशध्वज नाम का राजा रहता था। किसी दिन वह मृगया के लिये वन में गया। वहाँ उसने मृग के धोखे में एक तपस्वी ब्राह्मण को बाण से मार दिया। मरने के बाद उस पाप से उसे भयंकर रौरव नरक की प्राप्ति हुई। फिर वह बहुत दिनों तक नरक की यातना को भोगकर भयंकर सर्प-योनि में गया। सर्प-योनि में भी उसने पाप किया। इस कारण उसे सिंह-योनि प्राप्त हुई। इस प्रकार उसने कई निन्द्य योनियों में जन्म लिया और उस उस योनि में पाप-कर्म करता रहा। इस कर्मविपाक से उसे कष्ट भोगना पड़ता था। चूँकि उसने पूर्वजन्म में तारकद्वादशी का व्रत किया था, अतः उस व्रत के प्रभाव से इन पाप-योनियों से वह जल्दी-जल्दी मुक्त होता गया। अन्त में पुनः वह विदर्भ देश का धर्मात्मा राजा हुआ। वह भक्तिपूर्वक तारकद्वादशी का व्रत किया करता था। उसके प्रभाव से बहुत समय तक निष्कण्टक राज्यकर, मरने पर उसने विष्णुलोक को प्राप्त किया। राजा युधिष्ठिर ने पूछा- श्रीकृष्णचन्द्र ! इस व्रत को किस प्रकार करना चाहिये ? भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा- राजन्! मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को तारकद्वादशी व्रत करना चाहिये। प्रातःकाल नदी आदि में स्नानकर तर्पण, पूजन आदि सम्पन्न कर सूर्यास्ततक हवन करता रहे। सूर्यास्त होने पर पवित्र भूमि के ऊपर गोमय से ताराओं सहित एक सूर्य मण्डल का निर्माण करे। उस आकाश में चन्दन से ध्रुव को भी अङ्कित करे। अनन्तर ताम्र के अर्घ्यपात्र में पुष्प, फल, अक्षत, गन्ध, सुवर्ण तथा जल रखकर मस्तकतक उस अर्घ्यपात्र को उठाकर दोनों जानुओं को भूमि पर टेककर पूर्वाभिमुख होकर 'सहस्त्रशीर्षा०' इस मन्त्र से उस मण्डल को अर्घ्य प्रदान करे। अनन्तर ब्राह्मण भोजन कराना चाहिये। मार्गशीर्ष आदि बारह महीनों में क्रमशः खण्ड-खाद्य, सोहालक, तिल तण्डुल, गुड़के अपूप, मोदक, खण्डवेष्टक, सत्तू, गुड़युक्त पूरी, मधुशीर्ष, पायस, घृतपर्ण (करंज) और कसार का भोजन ब्राह्मण को कराये। तदनन्तर क्षमा प्रार्थना कर मौन धारणपूर्वक स्वयं भी भोजन करे। उद्यापन में चाँदी का तारकमण्डल बनाकर उसकी पूजा करे। मोदक के साथ बारह घड़े तथा दक्षिणा के साथ वह मण्डल ब्राह्मण को निवेदित कर दे। इस विधि से जो पुरुष और स्त्री इस तारकद्वादशी व्रत को करते हैं, वे सूर्य के समान देदीप्यमान विमानों में बैठकर नक्षत्र-लोक को जाते हैं। वहाँ अयुत वर्षों तक निवास कर विष्णुलोक को प्राप्त करते हैं। इस व्रत को सती, पार्वती, सीता, राज्ञी, दमयन्ती, रुक्मिणी, सत्यभामा आदि श्रेष्ठ नारियों ने किया था। इस व्रत को करने से अनेक जन्मों में किये गये पातक नष्ट हो जाते हैं। जय श्री राम क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (चौथा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 10 (भाग 1) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ देवताओं के साथ दैत्यों का युद्ध और हारे हुए दैत्यों को शुक्राचार्य के द्वारा अभयदान, शंकर की तपस्या, देवताओं का दैत्यों पर आक्रमण... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ जनमेजय ने कहा- व्यासजी ! तप को ही अपना सर्वस्व मानने वाले नर और नारायण भगवान् विष्णु के अंशावतार थे। उनका चित्त सदा शान्त रहता था। सात्त्विक गुणों का पालन करते हुए वे तीर्थ में रहते थे। जंगल के फल-मूल ही उनके नित्य के आहार थे। उन धर्मनन्दन तपस्वियों ने कभी असत्य का व्यवहार नहीं किया। वे महात्मा पुरुष थे। तब फिर वे युद्धभूमि में उपस्थित हो परस्पर लड़ने के लिये क्यों उद्यत हो गये ? किस कारण उन्होंने तप-जैसी उत्तम क्रिया का त्याग कर दिया ? शान्ति के महान् सुख का परित्याग करके उन मुनियों ने क्यों प्रह्लाद के साथ युद्ध ठान लिया ? देवताओं के वर्ष से पूरे सौ वर्ष तक वे लड़ते रहे। महाभाग ! नर-नारायण और प्रह्लाद का परस्पर संघर्ष क्यों छिड़ गया? आप इस विग्रह का कारण बताने की कृपा करें। व्यासजी कहते हैं- राजन्! धर्म का निर्णय करते समय सर्वज्ञ मुनियों ने संसार के मूल कारण अहंकार को सत्त्वादि भेद से तीन प्रकार का बतलाया है। अतएव मुनिवर नारायण शरीरधारी होकर इसका परित्याग कर दें यह उनके लिये अवैध (लीला विरुद्ध) काम था। बिना कारण कार्य की सम्भावना नहीं होती – यह निर्धारित विषय है। जब हृदय में सात्त्विक भाव उत्पन्न होता है, तब यज्ञ, तप और दान होते हैं। महाभाग ! रज और तम के प्रभाव से मन में कलह की भावना उत्पन्न हो जाती है। राजेन्द्र ! अहंकार के बिना एक छोटी-सी क्रिया भी, चाहे वह उत्तम हो या मध्यम, कदापि कार्यरूप में परिणत नहीं हो सकती। जगत् में अहंकार से बढ़कर बन्धन में डालने वाला दूसरा कोई पदार्थ नहीं है। अहंकार से बना हुआ यह विश्व उसे त्यागकर स्थित रह जाय – यह भला कैसे हो सकता है। राजन् ! समस्त प्राणी अपने कर्म के अनुसार विवश होकर बार-बार संसार में जन्मते और मरते रहते हैं। देवता, मानव और पशु आदि अनेक योनियों में उन्हें भटकना पड़ता है। रथ के चक्के की भाँति इस संसार को सदा से परिवर्तनशील बताया गया है, प्रत्येक युग में जगत्प्रभु जनार्दन नियमानुसार अनेक अवतार धारण करते हैं। महाराज! सातवें— वैवस्वत मन्वन्तर में भगवान् श्रीहरि के जो अवतार हुए हैं, उन्हें ध्यानपूर्वक सुनो। एक बार भृगु मुनि ने भगवान्‌ को शाप देना चाहा। उनकी बात सत्य करने के लिये श्रीहरिने अवतार लेने का वर दे दिया। महाराज! फिर अखिल जगत् के अधिष्ठाता भगवान् श्रीहरि अनेक रूप से धरातल पर पधारने लगे। राजा जनमेजय ने पूछा- महाभाग ! भृगु ने भगवान् विष्णु को क्यों शाप दे दिया ? मुने! भगवान् तो चराचर जगत् के स्स्रष्टा हैं। उनके द्वारा भृगु मुनि का कौन-सा अप्रिय कार्य बन गया था, जिससे मुनि कुपित हो गये और भगवान् विष्णु को जिन्हें सभी देवता नमस्कार करते हैं, शाप देने में उन्होंने कुछ भी संकोच नहीं किया ? क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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Acharya Rajesh May 16, 2021

☀️ *लेख:-देवताओं के कोषाध्यक्ष-कुबेर देवता* कुबेर एक हिन्दू पौराणिक देवता हैं, जो धन के स्वामी व देवताओं के कोषाध्यक्ष यानि देवताओं के खजांची माने जाते हैं। कुबेर यक्षों के राजा भी हैं। कुबेर घोर तपस्या करके उत्तर दिशा के दिक्पाल नियुक्त हुए । यही संसार के रक्षक अर्थात लोकपाल भी हैं। भगवान ब्रह्मा ने इन्हें समस्त सम्पत्तियों का स्वामी बनाया था । *कुबेर जी का जन्म:-* ब्रह्माजी के पुत्र हुए महर्षि पुलस्त्य, तथा महर्षि पुलस्त्य के पुत्र महामुनि विश्वश्रवा ( विश्र्वा ) ही कुबेर जी के पिता थे । विश्वश्रवा जी की दो पत्नियां थीं। ऋषि भारद्वाज जी की पुत्री इलविला (मतांतर से इनका नाम पुण्योतकटा तथा देववर्णिनी भी कहा गया ) से विश्वश्रवा जी का विवाह हुआ, और इन्ही से कुबेर जी की उत्पत्ति हुई । इनकी सौतेली माता का नाम कैकसी था, जिनके गर्भ से रावण, कुंभकर्ण और विभीषण इत्यादि ने जन्म लिया । *कुबेर जी के भाई-बहन:-* माता-पिता की संतान-पुत्रों में कुबेर सबसे बड़े थे। शेष भाईयो मे इनके पिता की दूसरी पत्नी कैकसी से रावण, कुंभकर्ण और विभीषण अहिरावण, खर और दूषण पैदा हुए तथा उनकी बहन शूर्पणखा और कुम्भिनी हुई । ये सभी कुबेर जी के सौतेले भाई-बहन थे। *कुबेर जी का रूप-स्वरूप:-* कुबेर जी का श्वेत वर्ण है, ये तुंदियल शरीर लिए हुए यानि थोड़े थुलथुल हैं। परंतु उनकी तोंद सांकेतिक रूप से उनकी समृद्धि की प्रतीक है । उनकी ठुड्डी दोहरी है । ये आठ दांतो वाले तथा तीन चरणों वाले है । कुबेर जी गदा धारण किए रहते है । *कुबेर जी का निवास स्थान:-* कुबेर यक्षों के राजा हैं । भोलेनाथ के निवास स्थान कैलाश पर्वत के समीप इनकी नगरी अलकापुरी है । जो कि एक जगमगाती नगरी है ।  जहां पर गदाधारी कुबेर जी अपनी सत्तर योजन विस्तार वाली सभा मे विराजते है । जहां पर यक्ष इनके अनुचर यानि सेवक है, जोकि निरंतर इनकी सेवा करते हैं । कुबेर का निवास वटवृक्ष पर भी बताया गया है । ऐसे वृक्ष जो घर-आंगन में नहीं होते, गांव के बीच में भी नहीं होते हैं। ये ऐसे वृक्ष पर वास करते है, जोकि गांव-शहर के बाहर या बियाबान में होते हैं। यहां पर उन्हें धन का घड़ा लिए हुए कल्पित किया गया है ।  *सोने की लंका:-* वास्तव मे सोने की लंका विश्वकर्मा जी ने राक्षसों के लिए बनाई थी, परंतु भगवान विष्णु जी से डरकर राक्षसों ने लंका को त्याग दिया । तब विश्र्वा जी ने लंका को कुबेर को दे दिया । अब इस पर कुबेर जी का अधिपत्य हो गया । कालांतर मे कुबेर के सौतेले भाई राक्षसराज रावण ने अपनी मां से प्रेरणा पाकर कुबेर को युद्ध में परास्त कर, कुबेर से पुष्पक विमान तथा लंका पुरी के साथ अन्य समस्त संपत्तियो को भी छीन लिया । अब सबकुछ हारकर कुबेर अपने पितामह के पास गये। उनकी प्रेरणा से कुबेर ने शिवाराधना की। फलस्वरूप उन्हें 'धनपाल' की पदवी प्राप्त हुई और साथ ही इन्हे पत्नी और पुत्र का भी लाभ हुआ। जिस स्थान पर उन्होंने यह कठोर तपस्या की, वह स्थल गौतमी नदी का तट धनदतीर्थ नाम से विख्यात हुआ । *कुबेर जी का वाहन :-* जैसे विष्णु जी का वाहन गरुड़ और शिव के वाहन नंदी हैं, इसी प्रकार कुबेर का वाहन मनुष्य है- धन का गुलाम मनुष्य ।  *कुबेर जी का पालतू जानवर:-* कुबेर का पालतू नेवला, यह जब भी मुंह खोलता है, जवाहरात उगलता है।  *कुबेर जी की पत्नी तथा पुत्र:-* देवी भद्रा कुबेर जी की पत्नी थी । इनके पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव है । जिन्हें महर्षि नारद का श्राप था, भगवान श्री कृष्णजी की कृपा द्वारा श्राप से मुक्त होकर, यह दोनो सदैव अपने पिता कुबेर जी के समीप ही स्थित रहते हैं । *कुबेर मंत्र:-* 1. *ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥* *भावार्थ:-*इस मंत्र में देवता कुबेर के अलग-अलग नामों एवं उनकी विशेषताओं का जिक्र करते हुए उनसे धन-धान्य एवं समृद्धि देने की प्रार्थना की गई है। धन धान्य और समृद्धि के स्वामी श्री कुबेर जी का यह पैतिस आक्षरी मंत्र है। इस मंत्र के विश्रवा ऋषि हैं तथा छंद बृहती है भगवान शिव के मित्र कुबेर इस मंत्र के देवता हैं। इस मंत्र को उनका अमोघ मंत्र कहा जाता है। *फल:-* लगातार तीन महीने तक इस मंत्र का कम से कम एक माला का जाप करने से घर में किसी भी प्रकार धन धान्य की कमी नहीं होती। यह मंत्र सब प्रकार की सिद्धियां देने पाने के लिये कारगर है। ऐसा माना जाता है कि यदि बेल के वृक्ष के नीचे बैठ कर इस मन्त्र का एक लाख बार जप किया जाये तो जन्म-२ की दरिद्रता तथा कर्जो से मुक्ति पाकर साधक अपने समस्त कुल को धनवान तथा अगले जन्मों मे भी अटल धन-धान्य तथा समृद्धि को प्राप्त करता है। *2. कुबेर धन प्राप्ति मंत्र:-* *ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः॥* धन प्राप्ति की कामना करने वाले साधकों को कुबेर जी का यह मंत्र जपना चाहिये। इसके नियमित जप से साधक को अचानक धन की प्राप्ति होती है। *3. कुबेर अष्टलक्ष्मी मंत्र:-* *ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं श्रीं कुबेराय अष्ट-लक्ष्मी मम गृहे धनं पुरय पुरय नमः॥* कुबेर और मां लक्ष्मी का यह संयुक्त मंत्र जीवन की सभी श्रेष्ठता को देने वाला है, तथा ऐश्वर्य, श्री, दिव्यता, पद प्राप्ति, सुख-सौभाग्य, व्यवसाय वृद्धि, अष्ट सिद्धि, नव निधि, आर्थिक विकास, सन्तान सुख उत्तम स्वास्थ्य, आयु वृद्धि, और समस्त भौतिक और परासुख देने में समर्थ है। शुक्ल पक्ष के किसी भी शुक्रवार को रात्रि में इस मंत्र की साधना शुरू करनी चाहिये। इन तीनों में से किसी भी एक मंत्र का जप दस हजार होने पर दशांश हवन करें या एक हजार मंत्र अधिक जपें। कुबेर जी के नौ अन्य भिन्न-भिन्न रूपों मे की गई साधना इनके भक्तो के भिन्न-भिन्न मनोरथो को पूर्ण करती हैं, जोकि इस प्रकार से है । *कुबेर के नौ अन्य रूप:-* *1. उग्र कुबेर :-* यह कुबेर धन तो देते ही है साथ में आपके सभी प्रकार के शत्रुओ का भी हनन कर देते है । *2. पुष्प कुबेर :-* यह धन प्रेम विवाह , प्रेम में सफलता, मनोवांछित वर प्राप्ति, सम्मोहन विद्या प्राप्ति, तथा सभी प्रकार के दुख से निवृति के लिए की जाती है । *3. चंद्र कुबेर :-* कुबेर के इस रूप की साधना धन एवं पुत्र प्राप्ति के लिए की जाती है, योग्य संतान के लिए चंदर कुबेर की साधना करना अत्यंत फलदायी है । *4. पीत कुबेर :-* धन, वाहन तथा सुख-संपति आदि की प्राप्ति के लिए पीत कुबेर की साधना की जाती है । इस साधना से मनोवांछित वाहन और संपति की प्राप्ति होती है । *5. हंस कुबेर :-* अज्ञात तथा भविष्य मे आने वाले दुखो और मुकदमो में विजय की प्राप्ति के लिए हंस कुबेर की साधना की जाती है । *6. राग कुबेर :-* भौतिक और अध्यात्मिक हर प्रकार की विधा, संगीत, ललितकला और राग नृत्य आदि में निपुणता और सभी प्रकार की परीक्षा में सफलता के लिए राग कुबेर की साधना फलदायी सिद्ध होती है । *7. अमृत कुबेर :-* हर प्रकार के रोग से मुक्ति प्राप्त कर अयोग्यता प्राप्ति, धन प्राप्ति तथा जीवन में सभी प्रकार के भय और दुखो के छुटकारे के लिए अमृत कुबेर की साधना दिव्य और फलदायी है । *8. प्राण कुबेर :-* व्यर्थ मे धन का व्यय, बरकत न पडना तथा कर्जो के बोझ से मुक्ति के लिए प्राण कुबेर की साधना हर प्रकार के संकट से मुक्ति दिलाने में सक्षम है । इन की साधना साधक को सभी प्रकार के परेशानियों से मुक्ति देती है । *9. धन कुबेर :-* ऐसा माना जाता है कि धन कुबेर की साधना अन्य साधनाओ में सर्वश्रेष्ठ है । मनुष्य द्वारा जीवन में किये गये कर्म, उन कर्मो के फलो की प्राप्ति, धन आदि की प्राप्ति के हेतु, सभी मनोकामना की पूर्ति हेतु यदि भाग्य साथ न दे रहा हो तो इसके समाधान के रूप मे धन कुबेर की साधना को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है । *(समाप्त)* _________________________ *आगामी लेख:-* *1. शीघ्र ही "पंचक" विषय पर लेख ।* *2. शीघ्र ही "मोहिनी एकादशी" विषय पर लेख ।* *3. शीघ्र ही "वैशाख मास के अंतिम तीन दिन" विषय पर लेख ।* *4. शीघ्र ही "वैशाख पूर्णिमा" विषय पर लेख ।* _________________________ ☀️ *जय श्री राम* *आज का पंचांग 🌹🌹🌹* *सोमवार,17.5.2021* *श्री संवत 2078* *शक संवत् 1943* *सूर्य अयन- उत्तरायण, गोल-उत्तर गोल* *ऋतुः- ग्रीष्म ऋतुः ।* *मास- वैशाख मास।* *पक्ष- शुक्ल पक्ष ।* *तिथि- पंचमी तिथि 11:36 am तक* *चंद्रराशि- चंद्र मिथुन राशि मे 6:52 am तक तदोपरान्त कर्क राशि ।* *नक्षत्र- पुनर्वसु 1:22 pm तक* *योग- गंड योग अगले दिन 2:47 am तक (अशुभ है)* *करण- बालव करण 11:36 am तक* *सूर्योदय 5:29 am, सूर्यास्त 7:05 pm* *अभिजित् नक्षत्र- 11:50 am से 12:44 pm* *राहुकाल - 7:11 am से 8:53 am* (अशुभ कार्य वर्जित,दिल्ली )* *दिशाशूल- पूर्व दिशा ।* *मई माह -शुभ दिन:-* शुभ दिन :- 17, 18, 19 (दोपहर 1 तक), 20, 21, 22, 24 (सवेरे 11 उपरांत), 26, 28, 30, 31 *मई माह-अशुभ दिन:-* 23, 25, 27, 29. *सर्वार्थ सिद्ध योग :- 17 मई 1:22 pm to 18 मई 5:29 am तक*,  ( यह एक शुभयोग है, इसमे कोई व्यापारिक या कि राजकीय अनुबन्ध (कान्ट्रेक्ट) करना, परीक्षा, नौकरी अथवा चुनाव आदि के लिए आवेदन करना, क्रय-विक्रय करना, यात्रा या मुकद्दमा करना, भूमि , सवारी, वस्त्र आभूषणादि का क्रय करने के लिए शीघ्रतावश गुरु-शुक्रास्त, अधिमास एवं वेधादि का विचार सम्भव न हो, तो ये सर्वार्थसिद्धि योग ग्रहण किए जा सकते हैं। *रवि योग :- 17 मई 1:22 pm to 18 मई 2:55 pm तक* यह एक शुभ योग है, इसमे किए गये दान-पुण्य, नौकरी  या सरकारी नौकरी को join करने जैसे कायों मे शुभ परिणाम मिलते है । यह योग, इस समय चल रहे, अन्य बुरे योगो को भी प्रभावहीन करता है। ______________________ *विशेष:- जो व्यक्ति दिल्ली से बाहर अथवा देश से बाहर रहते हो, वह ज्योतिषीय परामर्श हेतु paytm या Bank transfer द्वारा परामर्श फीस अदा करके, फोन द्वारा ज्योतिषीय परामर्श प्राप्त कर सकतें है* ________________________ *आगामी व्रत तथा त्यौहार:-* 22 मई:- मोहिनी एकादशी। 24 मई:- सोम प्रदोष व्रत। 26 मई:- बुद्ध पूर्णिमा/वैशाख पूर्णिमा। 29 मई:- संकष्टी चतुर्थी आपका दिन मंगलमय हो . 💐💐💐 *आचार्य राजेश ( रोहिणी, दिल्ली )* *9810449333, 7982803848*

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sn vyas May 16, 2021

🏵️🏵️🏵️ *नारद मोह* 🏵️🏵️🏵️ 🌻🌻🌻 *भाग 3* 🌻🌻🌻 💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥 ------------ गतांक से आगे ----- सज्जनों -- याज्ञवल्क्य जी भरद्वाज जी से कहते है , एक बार पृथ्वी पर जालन्धर नामक राक्षस हुआ । वह इतना शक्तिशाली था कि इसने सभी देवताओ को पराजित कर दिया ।भगवान शिव भी युद्ध करने के लिये गये ,पूरे प्रयत्न के बावजूद यह मरता नही है ,यह हारता नही था क्यूँकि उसकी पत्नी वृन्दा महान पतिव्रता सती थी । *परम सती असुराधिप नारी । तेहि बल ताहि न जितहिं पुरारी ।।* उस पतिव्रता पत्नी के बल से जलन्धर अजेय बना था । युद्ध मे वृन्दा का पतिव्रत उसका कवच बना था । लाखो प्रयत्न के बाद भी जब शिवजी नही मार पाये तो सभी देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गये और प्रार्थना किया । भगवान ने जालन्धर का रुप लेकर वृन्दा का सतीत्व भंग किया । जालन्धर मारा गया ।. जब वृन्दा को जानकारी हुई तो उसने श्राप दिया कि जिस प्रकार तुमने मेरे साथ छल किया है उसी प्रकार मेरा पति भी तुम्हारी पत्नी के साथ छल करके हरण करेगा । *छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह।* *जब तेंहि जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह।।* मित्रों इस प्रसंग पर बहुत लोग शंका करते है , जालंधर को मारने के लिये प्रभु ने छल से वृन्दा का सतीत्व भंग किया यह न्याय संगत नही ? जब भगवान ही ऐसा करेंगे तो दूसरे तो करेगें ही । मानस के दो प्रसंग पहला वृन्दा का सतीत्व भंग करना ,दूसरा मेघनाद का यज्ञ विध्वंस करना । इन पर बहुत चर्चा होती है । सज्जनों -गोस्वामी बाबा ने मानस के इन दोनो प्रसंगोके माध्यम से सनातन धर्म के उन्नयन का बहुत ही सुन्दर सूत्र बताया है । मानस की यह विशेषता है कि जब भी कोई चिंतक ,विश्लेषक किसी विषय का विशेष मंथन करता है तो तभी उस का भाव समझ सकता है । और वह ऐसा भी नही कह सकता कि मेरा भाव ही सर्वोत्तम है । मित्रों आज की परिस्थित यह है कि हम अपने आपको भक्त तो कहते है ,धार्मिक तो कहते है परन्तु आँखो के सम्मुख हो रहे अत्याचार ,अधार्मिक कृत्य ,धर्म विरोधी आचरण देखकर आँखे बन्द कर लेते है । मेरा क्या ? और बडे दुख के साथ यह कहना पडता है कि ऐसे आवश्यक प्रसंग जो कि हमे प्रेरित कर सके उसे आजकल के महान कथाकार या तो कहेगे ही नही कहेंगे भी तो मनमाने ढंग से । जबकि ये दोनो प्रसंग स्पष्ट रुप से इसारा कर रहे है जब अधर्म ,अत्याचार अपनी पराकाष्ठा पर हो तो उस अधर्म ,अत्याचार को समाप्त करने के लिये हमे छल करना भी पडे तो कोई दोष नही है । उदाहरण से समझे जैसे कोई व्यक्ति लोहे का कवच पहनकर आपसे लडने आये तो आप क्या करोगे ? सबसे पहले हमे उसके उस कवच को तोडना पडेगा तभी हम उससे लड सकते है । जालंधर भयंकर अधर्म का स्वरुप है पर उसने धर्म रुपी कवच पहना है । अपनी पतिव्रता नारी का धार्मिक रुप कवच जालन्धर ने पहना है । उसके अन्दर वह अधर्म का आचरण करता है । भगवान ने संसार को बताया कि वृन्दा का सतीत्व यदि नही तोडा जाएगा तो संसार के किसी स्त्री का सतीत्व नही बचेगा । अगर एक व्यक्ति को त्यागने से पूरा समाज सुरक्षित हो रहा हो तो यह गलत कैसे ? जलंधर भयंकर पाप कर्म करता है ,भविष्य मे तमाम स्त्रिओ के सतीत्व को बचाने के लिये ही वृन्दा का सतीत्व भंग किया भगवान ने । मित्रों हमारे आपके शरीर मे कोई एक अंग खराब हो जाता है तो डाक्टर कहते है कि अमुक अंग को काटना पडेगा नही तो पूरे शरीर मे विष फैल जायेगा । हम लोग न चाहते हुये उस अंग को कटवा देते है । उसी प्रकार हमे देश , समाज , सनातन धर्म की रक्षा के लिये अगर कुछ अधर्म करना भी पडे तो कर देना चाहिये । यह बहुत महान कार्य होगा । परन्तु निजी स्वार्थ के लिये नही । उसी प्रकार इन्द्रजीत प्रसंग मे भी है । भगवान ने यज्ञ क्यूँ नष्ट करवाया । यदि उसका यज्ञ सफल हो जाता तो क्या वह संसार मे कोई और यज्ञ होने देता क्यूँकि वह तो पहले से ही -- *द्विज भोजन मख होम सराधा । सब कै जाइ करहु तुम बाधा ।।* अब बताइये यदि मेघनाद का यज्ञ न भंग होता तो क्या और कोई यज्ञ पूजा पाठ जप तप हो सकता था क्या ? मित्रों मेरे कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है कि हम नियमतः अपने धार्मिक कृत्य करे लेकिन यदि कभी देश समाज को बचाने के लिये पाप या अधर्म करना भी पडे तो पीछे मत हटना कोई पाप नही लगेगा । भगवान शिवजी ने माता पार्वती से कहते है देवी इस तरह श्री राम जी के शरीर धारण करने का दूसरा कारण है वृन्दा का श्राप । उस कल्प मे जलंधर रावण बना । देवी एक कल्प मे भगवान विष्णु को नारद जी ने श्राप दिया था ~ --------- क्रमशः ---------------- 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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Neha Sharma, Haryana May 15, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 200*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 09*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 17*🙏🌸 *इस अध्याय में क्षत्रवृद्ध, रजि आदि राजाओं के वंश का वर्णन... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! राजेन्द्र पुरूरवा का एक पुत्र था आयु। उसके पाँच लड़के हुए- नहुष, क्षत्रवृद्ध, रजि, शक्तिशाली रम्भ और अनेना। अब क्षत्रवृद्ध का वंश सुनो। *क्षत्रवृद्ध के पुत्र थे सुहोत्र। सुहोत्र के तीन पुत्र हुए- काश्य, कुश और गृत्समद। गृत्समद का पुत्र हुआ शुनक। इसी शुनक के पुत्र ऋग्वेदियों में श्रेष्ठ मुनिवर शौनक जी हुए। काश्य का पुत्र काशि, काशि का राष्ट्र, राष्ट्र का दीर्घतमा और दीर्घतमा के धन्वन्तरि। यही आयुर्वेदों के प्रवर्तक हैं। ये यज्ञभाग के भोक्ता और भगवान् वासुदेव के अंश हैं। इनके स्मरण मात्र से ही सब प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं। धन्वन्तरि का पुत्र हुआ केतुमान् और केतुमान् का भीमरथ। भीमरथ का दिवोदास और दिवोदास का द्युमान-जिसका एक नाम प्रतर्दन भी है। यही द्युमान् शत्रुजित्, वत्स, ऋतध्वज और कुवलयाश्व के नाम से भी प्रसिद्ध है। द्युमान् के ही पुत्र अलर्क आदि हुए। *परीक्षित! अलर्क के सिवा और किसी राजा ने छाछठ हजार (६६,०००) वर्ष तक युवा रहकर पृथ्वी का राज्य नहीं भोग। अलर्क का पुत्र हुआ सन्तति, सन्तति का सुनीथ, सुनीथ का सुकेतन, सुकेतन का धर्मकेतु और धर्मकेतु का सत्यकेतु। सत्यकेतु से धृष्टकेतु, धृष्टकेतु से राजा सुकुमार, सुकुमार से वीतिहोत्र, वीतिहोत्र से भर्ग और भर्ग से राजा भार्गभूमि का जन्म हुआ। ये सब-के-सब क्षत्रवृद्ध के वंश में काशिउत्पन्न नरपति हुए। रम्भ के पुत्र का नाम था रभस, उससे गम्भीर और गम्भीर से अक्रिय का जन्म हुआ। अक्रिय की पत्नी से ब्राह्मण वंश चला। अब अनेना का वंश सुनो। *अनेना का पुत्र था शुद्ध, शुद्ध का शुचि, शुचि का त्रिककुद और त्रिककुद का धर्मसारथि। धर्मसारथि के पुत्र थे शान्तरय। शान्तरय आत्मज्ञानी होने के कारण कृतकृत्य थे, उन्हें सन्तान की आवश्यकता न थी। परीक्षित! आयु के पुत्र रजि के अत्यन्त तेजस्वी पाँच सौ पुत्र थे। *देवताओं की प्रार्थना से रजि ने दैत्यों का वध करके इन्द्र को स्वर्ग का राज्य दिया। परन्तु वे अपने प्रह्लाद आदि शत्रुओं से भयभीत रहते थे, इसलिये उन्होंने वह स्वर्ग फिर रजि को लौटा दिया और उनके चरण पकड़कर उन्हीं को अपनी रक्षा का भार भी सौंप दिया। जब रजि की मृत्यु हो गयी, तब इन्द्र के माँगने पर भी रजि के पुत्रों ने स्वर्ग नहीं लौटाया। वे स्वयं ही यज्ञों का भाग भी ग्रहण करने लगे। तब गुरु बृहस्पति जी ने इन्द्र की प्रार्थना से अभिचार विधि से हवन किया। इससे वे धर्म के मार्ग से भ्रष्ट हो गये। इन्द्र ने अनायास ही उन सब रजि के पुत्रों को मार डाला। उनमें से कोई ही न बचा। *क्षत्रवृद्ध के पौत्र कुश से प्रति, प्रति से संजय और संजय से जय का जन्म हुआ। जय से कृत, कृत से राजा हर्यवन, हर्यवन से सहदेव, सहदेव से हीन और हीन से जयसेन नामक पुत्र हुआ। जयसेन का संकृति, संकृति का पुत्र हुआ महारथी वीरशिरोमणि जय। क्षत्रवृद्ध की वंश-परम्परा में इतने ही नरपति हुए। अब नहुष वंश का वर्णन सुनो। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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sn vyas May 15, 2021

🌹🌹🌹 *नारद मोह* 🌹🌹🌹 ☘☘☘ *भाग 2*☘☘☘ 🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻 ---------- गतांक से आगे ----- सज्जनों --- जय विजय ने सनतकुमारो को रोका । सनतकुमारो ने कहा हम तो माता लक्ष्मी एवं पिता नारायण से मिलने जा रहे हैं । आज तक तो मुझे किसी ने कभी भी नही रोका ,और न ही हमे कहीं आने जाने के लिये किसी से आज्ञा लेनी पडती है , इसलिये मेरा रास्ता न रोको ।द्वारपालो ने कहा महराज ! आप लोग यहीं रुके मै अन्दर जाकर आज्ञा लेकर आता हुँ उसके बाद आप चले जाना । चारो कुमार यह सुनते ही क्रोधित हो गये । मित्रों ध्यान दीजियेगा मनुष्य जब कोई कार्य करता है और उसमे पराजित हो जाता है तब मानव निराश हो जाता है ।वह काम करते करते रुक जाता है । पराजय मानव की गति मे रुकावट बनती है । परन्तु गोस्वामी बाबा की दृष्टि मे पराजय की गति की रुकावट है ऐसा नही है । जय विजय भी खतरा उत्पन्न करते है ।प्रभु के पास जाते समय जितना पराजय बाधक बनता है उतना ही जय विजय का अहम भी बाधक बनता है । सज्जनों बैकुण्ठ मे जाने के बाद भी सनतकुमारो एवं पहरेदारो का अहंकार बना हुआ है ।दोनो ओर से वाक युद्ध प्रारम्भ हो गया । सनत कुमारो को अहम है कि हम अपने तपोबल से भगवान के इतने निकट है फिर भी मुझे रोक रहे है । और द्वारपालो को अहम है कि हम अपनी अर्जित तप के द्वारा भगवान के द्वार पर है । मेरा कोई क्या कर सकता है ? मित्रों अहंकारी मानव कितना भी उँचा पद प्राप्त कर ले वही से नीचे गिरता है । अहं छूटने का एक ही उपाय है प्रभू की शरणागति । संतो ने दोनो को समझाया कि हम तो संत है ,प्रभु के दर्शन करने आये है पर जय विजय अपनी बात पर अडे है बिना आज्ञा के प्रवेश सम्भव नही है । संत क्रोधित हो गये । जय विजय को श्राप देते हुये कहा , जाओ तुम दोनो का पतन होगा और तुमने मुझे तीन बार रोका है इसलिये 3 जन्मो तक घोर राक्षस बनो । अन्दर बैठे प्रभु सुन रहे थे । प्रभू तत्क्षण वहाँ पर आ गये और आते ही सनतकुमारो को प्रणाम किया । जैसे ही भगवान के मुख का दर्शन किया संतो ने क्रोध तत्छण शान्त हो गया । संतो ने कहा महराज भूल हो गयी क्रोध के बस मे आकर मैने इन्हे श्राप दे दिया है । भगवान ने कहा ,आप ने कोई भूल नही किया ,आपने बहुत अच्छा किया ,मै तो कहता हुँ महात्मन आप मुझे भी दण्ड दे क्यूँकि सेवक की भूल की सजा उसके मालिक को भी मिलनी चाहिये । सनतकुमारो को अपनी भूल का अहसास हुआ । प्रभू से छमा माँगने लगे और कहा कि मै दिया श्राप तो वापस नही ले सकता लेकिन इतना जरुर कहता हुँ कि आप के हाथों सदगति प्राप्त करके तीन जन्मो के बाद पुनःआपके पार्षद बन जायेंगे । भगवान वहीं से मुनियों को बिदा कर दिया । एक बार भी अन्दर चलने के लिये नही कहा । क्रोध करने के कारण सनत्कुमारो को प्रभु के द्वार से ही लौटना पडा । किन्तु उनका क्रोध सात्विक था । वे द्वारपाल भगवान के दर्शन मे बाधक बन रहे थे इसलिये क्रोधित हुये । अतः भगवान ने अनुग्रह करके द्वार पर आये सनतकुमारो को दर्शन तो दिया किन्तु भगवान के महल मे प्रवेश नही पा सके । ज्ञानी के लिये ज्ञानमार्ग मे अभिमान विघ्नकर्ता है ।अभिमान के मूल मे यही क्रोध है । मित्रों यही जय विजय पहले जन्म मे *हिरणाक्ष्य एवं हिरण्यकश्यप* हुये जिन्हे भगवान ने *वाराह एवं नरसिंह* अवतार लेकर उद्धार किया । दूसरा जन्म *रावण एवं कुम्भकर्ण* रुप मे लिया जिन्हे *श्रीराम* जी ने मार कर उद्धार किया , लेकिन मुक्ति नही मिली क्यूँ ? *मुकुत न भए हते भगवाना । तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना ।।* तीसरा जन्म इन्हे पुनः *शिशुपाल एवं दंतवक्र* के रुप मे लिया वहाँ पर *भगवान कृष्ण* के हाथों मारे गये और तब इनका उद्धार हुआ । भगवान शिव माता पार्वती जी से बता रहे है कि यह वही समय था देवी जब कश्यप एवं अदित दशरथ कौशल्या बने थे । भगवान राम के अवतार लेने का दूसरा कारण था वृन्दा का श्राप ------ ---------- क्रमशः -------------- 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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भगवान परशुराम जन्मोत्सव विशेष 〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰 भगवान परशुराम जन्मोत्सव हिन्दू पंचांग के वैशाख माह की शुक्ल पक्ष अक्षय तृतीया को परशुराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन दिये गए पुण्य का प्रभाव कभी खत्म नहीं होता। अक्षय तृतीया से त्रेता युग का आरंभ माना जाता है. इस दिन का विशेष महत्व है। भारत में हिन्दू धर्म को मानने वाले अधिक लोग हैं. मध्य कालीन समय के बाद जब से हिन्दू धर्म का पुनुरोद्धार हुआ है, तब से परशुराम जयंती का महत्व और अधिक बढ़ गया है। परशुराम के जन्म एवं जन्मस्थान के पीछे कई मान्यताएँ एवं अनसुलझे सवाल है. सभी की अलग अलग राय एवं अलग अलग विश्वास हैं। भार्गव परशुराम को हाइहाया राज्य, जो कि अब मध्य प्रदेश के महेश्वर नर्मदा नदी के किनारे बसा है, वहाँ का तथा वहीं से परशुराम का जन्म भी माना जाता है। एक और मान्यता के अनुसार रेणुका तीर्थ पर परशुराम के जन्म के पूर्व जमदग्नि एवं उनकी पत्नी रेणुका ने शिवजी की तपस्या की. उनकी तपस्या से प्रसन्न हो कर शिवजी ने वरदान दिया और स्वयं विष्णु ने रेणुका के गर्भ से जमदग्नि के पांचवें पुत्र के रूप में इस धरती पर जन्म लिया. उन्होनें अपने इस पुत्र का नाम “रामभद्र” रखा। परशुराम के अगले जन्म के पीछे बहुत सी दिलचस्प मान्यता है. एसा माना जाता है, कि वे भगवान विष्णु के दसवें अवतार में कल्कि के रूप में फिर एक बार पृथ्वी पर अवतरित होंगे. हिंदुओं के अनुसार यह भगवान विष्णु का धरती पर अंतिम अवतार होगा. इसी के साथ कलियुग की समाप्ति होगी। परशुराम का परिवार एवं कुल 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ परशुराम सप्तऋषि जमदग्नि और रेणुका के सबसे छोटे पुत्र थे। ऋषि जमदग्नि के पिता का नाम ऋषि ऋचिका तथा ऋषि ऋचिका, प्रख्यात संत भृगु के पुत्र थे। ऋषि भृगु के पिता का नाम च्यावणा था. ऋचिका ऋषि धनुर्वेद तथा युद्धकला में अत्यंत निपुण थे. अपने पूर्वजों कि तरह ऋषि जमदग्नि भी युद्ध में कुशल योद्धा थे। जमदग्नि के पांचों पुत्रों वासू, विस्वा वासू, ब्रिहुध्यनु, बृत्वकन्व तथा परशुराम में परशुराम ही सबसे कुशल एवं निपुण योद्धा एवं सभी प्रकार से युद्धकला में दक्ष थे। परशुराम भारद्वाज एवं कश्यप गोत्र के कुलगुरु भी माने जाते हैं। भगवान परशुराम के अस्त्र 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ परशुराम का मुख्य अस्त्र “कुल्हाड़ी” माना जाता है. इसे फारसा, परशु भी कहा जाता है. परशुराम ब्राह्मण कुल में जन्मे तो थे, परंतु उनमे युद्ध आदि में अधिक रुचि थी. इसीलिए उनके पूर्वज च्यावणा, भृगु ने उन्हें भगवान शिव की तपस्या करने की आज्ञा दी. अपने पूर्वजों कि आज्ञा से परशुराम ने शिवजी की तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया. शिवजी ने उन्हें वरदान मांगने को कहा. तब परशुराम ने हाथ जोड़कर शिवजी की वंदना करते हुए शिवजी से दिव्य अस्त्र तथा युद्ध में निपुण होने कि कला का वर मांगा. शिवजी ने परशुराम को युद्धकला में निपुणता के लिए उन्हें तीर्थ यात्रा की आज्ञा दी. तब परशुराम ने उड़ीसा के महेन्द्रगिरी के महेंद्र पर्वत पर शिवजी की कठिन एवं घोर तपस्या की। उनकी इस तपस्या से एक बार फिर शिवजी प्रसन्न हुए. उन्होनें परशुराम को वरदान देते हुए कहा कि परशुराम का जन्म धरती के राक्षसों का नाश करने के लिए हुआ है. इसीलिए भगवान शिवजी ने परशुराम को, देवताओं के सभी शत्रु, दैत्य, राक्षस तथा दानवों को मारने में सक्षमता का वरदान दिया। परशुराम युद्धकला में निपुण थे. हिन्दू धर्म में विश्वास रखने वाले ज्ञानी, पंडित कहते हैं कि धरती पर रहने वालों में परशुराम और रावण के पुत्र इंद्रजीत को ही सबसे खतरनाक, अद्वितीय और शक्तिशाली अस्त्र – ब्रह्मांड अस्त्र, वैष्णव अस्त्र तथा पाशुपतास्त्र प्राप्त थे। परशुराम शिवजी के उपासक थे. उन्होनें सबसे कठिन युद्धकला “कलारिपायट्टू” की शिक्षा शिवजी से ही प्राप्त की. शिवजी की कृपा से उन्हें कई देवताओं के दिव्य अस्त्र-शस्त्र भी प्राप्त हुए थे। “विजया” उनका धनुष कमान था, जो उन्हें शिवजी ने प्रदान किया था। जन्म की कथा 〰️〰️〰️〰️〰️ महर्षि भृगु के पुत्र ऋचिक का विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती से हुआ था। विवाह के बाद सत्यवती ने अपने ससुर महर्षि भृगु से अपने व अपनी माता के लिए पुत्र की याचना की। तब महर्षि भृगु ने सत्यवती को दो फल दिए और कहा कि ऋतु स्नान के बाद तुम गूलर के वृक्ष का तथा तुम्हारी माता पीपल के वृक्ष का आलिंगन करने के बाद ये फल खा लेना। किंतु सत्यवती व उनकी मां ने भूलवश इस काम में गलती कर दी। यह बात महर्षि भृगु को पता चल गई। तब उन्होंने सत्यवती से कहा कि तूने गलत वृक्ष का आलिंगन किया है। इसलिए तेरा पुत्र ब्राह्मण होने पर भी क्षत्रिय गुणों वाला रहेगा और तेरी माता का पुत्र क्षत्रिय होने पर भी ब्राह्मणों की तरह आचरण करेगा। तब सत्यवती ने महर्षि भृगु से प्रार्थना की कि मेरा पुत्र क्षत्रिय गुणों वाला न हो भले ही मेरा पौत्र (पुत्र का पुत्र) ऐसा हो। महर्षि भृगु ने कहा कि ऐसा ही होगा। कुछ समय बाद जमदग्रि मुनि ने सत्यवती के गर्भ से जन्म लिया। इनका आचरण ऋषियों के समान ही था। इनका विवाह रेणुका से हुआ। मुनि जमदग्रि के चार पुत्र हुए। उनमें से परशुराम चौथे थे। इस प्रकार एक भूल के कारण भगवान परशुराम का स्वभाव क्षत्रियों के समान था। राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका और भृगुवंशीय जमदग्नि के पुत्र विष्णु के अवतार परशुराम शिव के परम भक्त थे। इन्हें शिव से विशेष परशु (कुल्हाड़ी) प्राप्त हुआ था। इनका नाम तो राम था किन्तु शंकर द्वारा प्रदत अमोघ परशु को सदैव धारण किए रहने के कारण ये परशुराम कहलाते थे। विष्णु के दस अवतारों में से छठा अवतार, जो वामन एवं रामचन्द्र के मध्य में हैं गिने जाते हैं। जमदग्नि के पुत्र होने के कारण ये जामदग्न्य भी कहे जाते हैं। इनका जन्म अक्षय तृतीय (वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीय तिथि) को हुआ था। अतः इस दिन व्रत करने व उत्सव मनाने की प्रथा है। परम्परा के अनुसार इन्होंने क्षत्रियों का अनेक बार विनाश किया। क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए इनका जन्म हुआ था। उनकी माता जल का कलश भरने के लिए नदी पर गई। वहां गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। उसे देखने में रेणुका इतनी तन्मय हो गई कि जल लाने में विलंब हो गया तथा यज्ञ का समय व्यतीत हो गया। उसकी मानसिक स्थिति समझकर जमदग्नि ने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चारों बेटों को मां की हत्या करने का आदेश दिया। किन्तु परशुराम के अतिरिक्त कोई भी ऐसा करने के लिए तैयार नहीं हुआ। पिता के कहने से परशुराम ने माता का शीश काट डाला। पिता के प्रसन्न होने पर उन्होने परशुराम को वर मांगने को कहा तो उन्होंने चार वरदान मांगे। 1. माता पुनर्जीवित हो जाएं, 2. उन्हें मरने की स्मृति न रहे, 3. भाई चेतना युक्त हो जाएं और 4. मां परमायु हो। जमदग्नि ने उन्हें चारों वरदान दे दिए। दुर्वासा की भांति ये भी अपने क्रोधी स्वभाव के लिए विख्यात हैं 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ एक बार कार्तवीर्य ने परशुराम की अनुपस्थिति में आश्रम उजाड़ डाला था जिससे परशुराम ने क्रोधित हो उसकी सहस्त्र भुजाओं को काट डाला। कार्तवीर्य के सम्बन्धियों ने प्रतिशोध की भावना से परशुराम के पिता जमदग्नि का वध कर दिया। इस पर परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय-विहीन कर दिया। अंत में पितरों की आकाशवाणी सुनकर उन्होंने क्षत्रियों से युद्ध करना छोड़कर तपस्या की ओर ध्यान लगाया। रामावतार में श्री रामचन्द्र द्वारा शिव का धनुष तोड़ने पर ये क्रुद्ध होकर आए थे। इन्हेांने परीक्षा के लिए उनका धनुष श्री रामचन्द्र जी को दिया था। जब श्री रामचन्द्र जी ने धनुष चढ़ा दिया तो परशुराम समझ गए कि रामचन्द्र विष्णु के अवतार हैं। इसलिए उनकी वन्दना करके वे तपस्या करने चले गए। परशुराम ने अपने जीवनकाल में अनेक यज्ञ किए। यज्ञ करने के लिए उन्होंने बत्तीस हाथ ऊँची सोने की वेदी बनवाई थी। महर्षि कश्यप ने दक्षिण में पृथ्वी सहित उस वेदी को ले लिया तथा फिर परशुराम से पृथ्वी छोड़कर चले जाने के लिए कहा। परशुराम ने समुद्र से पीछे हटकर गिरिश्रेष्ठ महेन्द्र पर निवास किया। रामजी का पराक्रम सुनकर वे अयोध्या गए और राजा दशरथ ने उनके स्वागतार्थ रामचन्द्र को भेजा। उन्हें देखते ही परशुराम ने उनके पराक्रम की परीक्षा लेनी चाही। अतः उन्हें क्षत्रिय संहारक दिव्य धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए कहा। राम के ऐसा कर लेने पर उन्हें धनुष पर एक दिव्य बाण चढ़ाकर दिखाने के लिए कहा। राम ने वह बाण चढ़ाकर परशुराम के तेज पर छोड़ दिया। बाण उनके तेज को छीनकर पुनः राम के पास लौट आया। रामजी ने परशुराम को दिव्य दृष्टि दी। जिससे उन्होंने राम के यथार्थ स्वरूप के दर्शन किए। परशुराम एक वर्ष तक लज्ज्ति, तेजहीन तथा अभिमानशून्य होकर तपस्या में लगे रहे। तद्न्तर पितरों से प्रेरणा पाकर उन्होंने वधूसर नामक नदी के तीर्थ पर स्नान करके अपना तेज पुनः प्राप्त किया। परशुराम कुंड नामक तीर्थस्नान में पांच कुंड बने हुए हैं। परशुराम ने समस्त क्षत्रियों का संहार करके उन कुंडों की स्थापना की थी तथा अपने पितरों से वर प्राप्त किया था कि क्षत्रिय संहार के पाप से मुक्त हो जाएंगे। जानापाव पहाड़ी का संक्षिप्त परिचय एवं धार्मिक एवं पौराणिक महत्व 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ इस स्थल को जानापाव कहने के बारे में जनश्रुति है। परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि ने परशुराम को अपनी माँ का सिर काटने का आदेश दिया था। उन्होंने यह कार्य करके पिता को कहा कि अब मुझे माँ जीवित चाहिए। तब ऋषि ने अपने कमण्डल से जल छींटा तो माँ में वापस जान आ गई थी। इसलिए इसका नाम जानापाव यानी जान वापस आना पड़ा। इन्दौर जिले की महू तहसील से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर विन्ध्याचल पर्वत की श्रृंखला में धार्मिक एवं पौराणिक महत्व का स्थान जानापाव स्थित है। जानापाव में भगवान परशुराम जी के पिता महर्षि जमदग्नि ने जनकेश्वर शिवलिंग की स्थापना कर अत्यन्त कठोर तपस्या की थी। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिवजी ने महर्षि जमदग्नि को वरदान स्वरूप समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाली कामधेनू गाय प्रदान की थी। वर्षों पूर्व जानापाव पहाड़ी ज्वालामुखी का उद्गम स्थल था। ज्वालामुखी के लावे से ही मालवा क्षेत्रा में काली मिट्टी का फैलाव हुआ था। वर्तमान में यह बिन्दुजल कुण्ड के रूप में विद्यमान है। नदियों का उद्गम स्थलः जानापाव पहाड़ी की मुख्य विशेषता यह है कि यहाँ से सात नदियों का उद्गम हुआ है। इनमें से तीन नदियाँ चोरल, गम्भीर एवं चम्बल मुख्य हैं। शेष चार सहायक नदियाँ नखेरी, अजनार, कारम और जामली हैं। प्रति वर्ष अक्षय तृतीया को जानापाव में भगवान परशुराम जी का जन्मोत्सव बडे़ पैमाने पर मनाया जाता है। साथ ही एक मेले का भी आयोजन किया जाता है। प्रति वर्ष नवरात्रि एवं भूतड़ी अमावस्या को भी मेले का आयोजन किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि भूतड़ी अमावस्या को जानापाव के कुण्ड में स्नान करने से भूतप्रेत बाधा एवं समस्त शारीरिक रोगों का नाश होता है। अतः इस मेले में देश, प्रदेश के समस्त श्रद्धालु बड़ी संख्या में भाग लेते हैं। परशुराम और सहस्रबाहु की कथा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ राम चरितमानस में आया है कि ‘सहसबाहु सम सो रिपु मोरा’ का कई बार उल्लेख आया है। महिष्मती नगर के राजा सहस्त्रार्जुन क्षत्रिय समाज के हैहय वंश के राजा कार्तवीर्य और रानी कौशिक के पुत्र थे। सहस्त्रार्जुन का वास्तविक नाम अर्जुन था। उन्होने दत्तत्राई को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की। दत्तत्राई उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए और उसे वरदान मांगने को कहा तो उसने दत्तत्राई से एक हजार हाथों का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद उसका नाम अर्जुन से सहस्त्रार्जुन पड़ा। इसे सहस्त्राबाहू और राजा कार्तवीर्य पुत्र होने के कारण कार्तेयवीर भी कहा जाता है। कहा जाता है महिष्मती सम्राट सहस्त्रार्जुन अपने घमंड में चूर होकर धर्म की सभी सीमाओं को लांघ चुका था। उसके अत्याचार व अनाचार से जनता त्रस्त हो चुकी थी। वेद-पुराण और धार्मिक ग्रंथों को मिथ्या बताकर ब्राह्मण का अपमान करना, ऋषियों के आश्रम को नष्ट करना, उनका अकारण वध करना, निरीह प्रजा पर निरंतर अत्याचार करना, यहाँ तक की उसने अपने मनोरंजन के लिए मद में चूर होकर अबला स्त्रियों के सतीत्व को भी नष्ट करना शुरू कर दिया था। एक बार सहस्त्रार्जुन अपनी पूरी सेना के साथ झाड-जंगलों से पार करता हुआ जमदग्नि ऋषि के आश्रम में विश्राम करने के लिए पहुंचा। महर्षि जमदग्रि ने सहस्त्रार्जुन को आश्रम का मेहमान समझकर स्वागत सत्कार में कोई कसर नहीं छोड़ी। कहते हैं ऋषि जमदग्रि के पास देवराज इन्द्र से प्राप्त दिव्य गुणों वाली कामधेनु नामक अदभुत गाय थी। महर्षि ने उस गाय के मदद से कुछ ही पलों में देखते ही देखते पूरी सेना के भोजन का प्रबंध कर दिया। कामधेनु के ऐसे विलक्षण गुणों को देखकर सहस्त्रार्जुन को ऋषि के आगे अपना राजसी सुख कम लगने लगा। उसके मन में ऐसी अद्भुत गाय को पाने की लालसा जागी। उसने ऋषि जमदग्नि से कामधेनु को मांगा। किंतु ऋषि जमदग्नि ने कामधेनु को आश्रम के प्रबंधन और जीवन के भरण-पोषण का एकमात्र जरिया बताकर कामधेनु को देने से इंकार कर दिया। इस पर सहस्त्रार्जुन ने क्रोधित होकर ऋषि जमदग्नि के आश्रम को उजाड़ दिया और कामधेनु को ले जाने लगा। तभी कामधेनु सहस्त्रार्जुन के हाथों से छूट कर स्वर्ग की ओर चली गई। जब परशुराम अपने आश्रम पहुंचे तब उनकी माता रेणुका ने उन्हें सारी बातें विस्तारपूर्वक बताई। परशुराम माता-पिता के अपमान और आश्रम को तहस नहस देखकर आवेशित हो गए। पराक्रमी परशुराम ने उसी वक्त दुराचारी सहस्त्रार्जुन और उसकी सेना का नाश करने का संकल्प लिया। परशुराम अपने परशु अस्त्र को साथ लेकर सहस्त्रार्जुन के नगर महिष्मतिपुरी पहुंचे। जहां सहस्त्रार्जुन और परशुराम का युद्ध हुआ। किंतु परशुराम के प्रचण्ड बल के आगे सहस्त्रार्जुन बौना साबित हुआ। भगवान परशुराम ने दुष्ट सहस्त्रार्जुन की हजारों भुजाएं और धड़ परशु से काटकर कर उसका वध कर दिया। सहस्त्रार्जुन के वध के बाद पिता के आदेश से इस वध का प्रायश्चित करने के लिए परशुराम तीर्थ यात्रा पर चले गए। तब मौका पाकर सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने अपने सहयोगी क्षत्रियों की मदद से तपस्यारत महर्षि जमदग्रि का उनके ही आश्रम में सिर काटकर उनका वध कर दिया। सहस्त्रार्जुन पुत्रों ने आश्रम के सभी ऋषियों का वध करते हुए, आश्रम को जला डाला। माता रेणुका ने सहायतावश पुत्र परशुराम को विलाप स्वर में पुकारा। जब परशुराम माता की पुकार सुनकर आश्रम पहुंचे तो माता को विलाप करते देखा और माता के समीप ही पिता का कटा सिर और उनके शरीर पर 21 घाव देखे। यह देखकर परशुराम बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने शपथ ली कि वह हैहय वंश का ही सर्वनाश नहीं कर देंगे बल्कि उसके सहयोगी समस्त क्षत्रिय वंशों का 21 बार संहार कर भूमि को क्षत्रिय विहिन कर देंगे। पुराणों में उल्लेख है कि भगवान परशुराम ने अपने इस संकल्प को पूरा भी किया। पुराणों में उल्लेख है कि भगवान परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करके उनके रक्त से समन्तपंचक क्षेत्र के पाँच सरोवर को भर कर अपने संकल्प को पूरा किया। कहा जाता है की महर्षि ऋचीक ने स्वयं प्रकट होकर भगवान परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोक दिया था तब जाकर किसी तरह क्षत्रियों का विनाश भूलोक पर रुका। तत्पश्चात भगवान परशुराम ने अपने पितरों के श्राद्ध क्रिया की एवं उनके आज्ञानुसार अश्वमेध और विश्वजीत यज्ञ किया। अपने शिष्य भीष्म को नहीं कर सके पराजित 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ महाभारत के अनुसार महाराज शांतनु के पुत्र भीष्म ने भगवान परशुराम से ही अस्त्र-शस्त्र की विद्या प्राप्त की थी। एक बार भीष्म काशी में हो रहे स्वयंवर से काशीराज की पुत्रियों अंबा, अंबिका और बालिका को अपने छोटे भाई विचित्रवीर्य के लिए उठा लाए थे। तब अंबा ने भीष्म को बताया कि वह मन ही मन किसी और का अपना पति मान चुकी है तब भीष्म ने उसे ससम्मान छोड़ दिया, लेकिन हरण कर लिए जाने पर उसने अंबा को अस्वीकार कर दिया.. तब अंबा भीष्म के गुरु परशुराम के पास पहुंची और उन्हें अपनी व्यथा सुनाई। अंबा की बात सुनकर भगवान परशुराम ने भीष्म को उससे विवाह करने के लिए कहा, लेकिन ब्रह्मचारी होने के कारण भीष्म ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। तब परशुराम और भीष्म में भीषण युद्ध हुआ और अंत में अपने पितरों की बात मानकर भगवान परशुराम ने अपने अस्त्र रख दिए। इस प्रकार इस युद्ध में न किसी की हार हुई न किसी की जीत। बाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीराम का परशुराम भगवान से कोई विवाद नही हुआ था 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस में वर्णन है कि भगवान श्रीराम ने सीता स्वयंवर में शिव धनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाते समय वह टूट गया। धनुष टूटने की आवाज सुनकर भगवान परशुराम भी वहां आ गए। अपने आराध्य शिव का धनुष टूटा हुआ देखकर वे बहुत क्रोधित हुए और वहां उनका श्रीराम व लक्ष्मण से विवाद भी हुआ। जबकि वाल्मीकि रामायण के अनुसार सीता से विवाह के बाद जब श्रीराम पुन: अयोध्या लौट रहे थे। तब परशुराम वहां आए और उन्होंने श्रीराम से अपने धनुष पर बाण चढ़ाने के लिए कहा। श्रीराम ने बाण धनुष पर चढ़ा कर छोड़ दिया। यह देखकर परशुराम को भगवान श्रीराम के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो गया और वे वहां से चले गए। 〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰🌼〰

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हिदु धर्म और पीपल ~~~~~~~~~~~~ पीपल को वृक्षों का राजा कहते है। इसकी वंदना में एक श्लोक देखिए:- मूलम् ब्रह्मा, त्वचा विष्णु, सखा शंकरमेवच । पत्रे-पत्रेका सर्वदेवानाम, वृक्षराज नमोस्तुते ।। हिदु धर्म में पीपल के पेड़ का बहुत महत्व माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इस वृक्ष में सभी देवी-देवताओं और हमारे पितरों का वास भी माना गया है। पीपल वस्तुत: भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णत:मूर्तिमान स्वरूप ही है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है की वृक्षों में मैं पीपल हूँ। पुराणो में उल्लेखित है कि ~~~~~~~~~~~~~~~~ मूलतः ब्रह्म रूपाय मध्यतो विष्णु रुपिणः। अग्रतः शिव रुपाय अश्वत्त्थाय नमो नमः।। अर्थात इसके मूल में भगवान ब्रह्म, मध्य में भगवान श्री विष्णु तथा अग्रभाग में भगवान शिव का वास होता है। शास्त्रों के अनुसार पीपल की विधि पूर्वक पूजा-अर्चना करने से समस्त देवता स्वयं ही पूजित हो जाते हैं। कहते है पीपल से बड़ा मित्र कोई भी नहीं है, जब आपके सभी रास्ते बंद हो जाएँ, आप चारो ओर से अपने को परेशानियों से घिरा हुआ समझे, आपकी परछांई भी आपका साथ ना दे, हर काम बिगड़ रहे हो तो आप पीपल के शरण में चले जाएँ, उनकी पूजा अर्चना करे , उनसे मदद की याचना करें निसंदेह कुछ ही समय में आपके घोर से घोर कष्ट दूर जो जायेंगे। धर्म शास्त्रों के अनुसार हर व्यक्ति को जीवन में पीपल का पेड़ अवश्य ही लगाना चाहिए । पीपल का पौधा लगाने वाले व्यक्ति को जीवन में किसी भी प्रकार संकट नहीं रहता है। पीपल का पौधा लगाने के बाद उसे रविवार को छोड़कर नियमित रूप से जल भी अवश्य ही अर्पित करना चाहिए। जैसे-जैसे यह वृक्ष बढ़ेगा आपके घर में सुख-समृद्धि भी बढ़ती जाएगी। पीपल का पेड़ लगाने के बाद बड़े होने तक इसका पूरा ध्यान भी अवश्य ही रखना चाहिए, लेकिन ध्यान रहे कि पीपल को आप अपने घर से दूर लगाएं, घर पर पीपल की छाया भी नहीं पड़नी चाहिए। मान्यता है कि यदि कोई व्यक्ति पीपल के वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित करता है तो उसके जीवन से बड़ी से बड़ी परेशानियां भी दूर हो जाती है। पीपल के नीचे शिवलिंग स्थापित करके उसकी नित्य पूजा भी अवश्य ही करनी चाहिए। इस उपाय से जातक को सभी भौतिक सुख सुविधाओं की प्राप्ति होती है। सावन मास की अमवस्या की समाप्ति और सावन के सभी शनिवार को पीपल की विधि पूर्वक पूजा करके इसके नीचे भगवान हनुमान जी की पूजा अर्चना / आराधना करने से घोर से घोर संकट भी दूर हो जाते है। यदि पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर रविवार को छोड़कर नित्य हनुमान चालीसा का पाठ किया जाए तो यह चमत्कारी फल प्रदान करने वाला उपाय है। पीपल के नीचे बैठकर पीपल के 11 पत्ते तोड़ें और उन पर चन्दन से भगवान श्रीराम का नाम लिखें। फिर इन पत्तों की माला बनाकर उसे प्रभु हनुमानजी को अर्पित करें, सारे संकटो से रक्षा होगी। पीपल के चमत्कारी उपाय ~~~~~~~~~~~~~~~~ शास्त्रानुसार प्रत्येक पूर्णिमा पर प्रातः 10 बजे पीपल वृक्ष पर मां लक्ष्मी का फेरा लगता है। इसलिए जो व्यक्ति आर्थिक रूप से मजबूत होना चाहते है वो इस समय पीपल के वृक्ष पर फल, फूल, मिष्ठान चढ़ाते हुए धूप अगरबती जलाकर मां लक्ष्मी की उपासना करें, और माता लक्ष्मी के किसी भी मंत्र की एक माला भी जपे । इससे जातक को अपने किये गए कार्यों के सर्वश्रेष्ठ फल मिलते है और वह धीरे धीरे आर्थिक रूप से सक्षम हो जाता है । पीपल को विष्णु भगवान से वरदान प्राप्त है कि जो व्यक्ति शनिवार को पीपल की पूजा करेगा, उस पर लक्ष्मी की अपार कृपा रहेगी और उसके घर का ऐश्वर्य कभी नष्ट नहीं होगा। व्यापार में वृद्धि हेतु प्रत्येक शनिवार को एक पीपल का पत्ता लेकर उस पर चन्दन से स्वस्तिक बना कर उसे अपने व्यापारिक स्थल की अपनी गद्दी / बैठने के स्थान के नीचे रखे । इसे हर शनिवार को बदल कर अलग रखते रहे । ऐसा 7 शनिवार तक लगातार करें फिर 8वें शनिवार को इन सभी पत्तों को किसी सुनसान जगह पर डाल दें और मन ही मन अपनी आर्थिक समृद्धि के लिए प्रार्थना करते रहे, शीघ्र पीपल की कृपा से आपके व्यापार में बरकत होनी शुरू हो जाएगी । जो मनुष्य पीपल के वृक्ष को देखकर प्रणाम करता है, उसकी आयु बढ़ती है जो इसके नीचे बैठकर धर्म-कर्म करता है, उसका कार्य पूर्ण हो जाता है। पीपल के वृक्ष को काटना ~~~~~~~~~~~~~ जो मूर्ख मनुष्य पीपल के वृक्ष को काटता है, उसे इससे होने वाले पाप से छूटने का कोई उपाय नहीं है। (पद्म पुराण, खंड 7 अ 12) हर रविवार पीपल के नीचे देवताओं का वास न होकर दरिद्रा का वास होता है। अत: इस दिन पीपल की पूजा वर्जित मानी जाती है यदि पीपल के वृक्ष को काटना बहुत जरूरी हो तो उसे रविवार को ही काटा जा सकता है। शनि दोष में पीपल ~~~~~~~~~~ शनि की साढ़ेसाती और ढय्या के बुरे प्रभावों को दूर कर,शुभ प्रभावों को प्राप्त करने के लिए हर जातक को प्रति शनिवार को पीपल की पूजा करना श्रेष्ठ उपाय है। यदि रोज (रविवार को छोड़कर) पीपल पर पश्चिममुखी होकर जल चढ़ाया जाए तो शनि दोष की शांति होती है l शनिवार की सुबह गुड़, मिश्रित जल चढ़ाकर, धूप अगरबत्ती जलाकर उसकी सात परिक्रमा करनी चाहिए, एवं संध्या के समय पीपल के वृक्ष के नीचे कड़वे तेल का दीपक भी अवश्य ही जलाना चाहिए। इस नियम का पालन करने से पीपल की अदृश्य शक्तियां उस जातक की सदैव मदद करती है। ब्रह्म पुराण' के 118 वें अध्याय में शनिदेव कहते हैं- 'मेरे दिन अर्थात् शनिवार को जो मनुष्य नियमित रूप से पीपल के वृक्ष का स्पर्श करेंगे, उनके सब कार्य सिद्ध होंगे तथा उन्हें ग्रहजन्य पीड़ा नहीं होगी।' शनिवार के दिन पीपल के वृक्ष का दोनों हाथों से स्पर्श करते हुए 'ॐ नमः शिवाय।' का 108 बार जप करने से दुःख, कठिनाई एवं ग्रहदोषों का प्रभाव शांत हो जाता है। हर शनिवार को पीपल की जड़ में जल चढ़ाने और दीपक जलाने से अनेक प्रकार के कष्टों का निवारण होता है । ग्रहों के दोषों में पीपल ~~~~~~~~~~~~~ ज्योतिष शास्त्र में पीपल से जुड़े हुए कई आसान किन्तु अचूक उपाय बताए गए हैं, जो हमारे समस्त ग्रहों के दोषों को दूर करते हैं। जो किसी भी राशि के लोग आसानी से कर सकते हैं। इन उपायों को करने के लिए हमको अपनी किसी ज्योतिष से कुंडली का अध्ययन करवाने की भी आवश्यकता नहीं है। पीपल का पेड़ रोपने और उसकी सेवा करने से पितृ दोष में कमी होती है । शास्त्रों के अनुसार पीपल के पेड़ की सेवा मात्र से ही न केवल पितृ दोष वरन जीवन के सभी परेशानियाँ स्वत: कम होती जाती है पीपल में प्रतिदिन (रविवार को छोड़कर) जल अर्पित करने से कुंडली के समस्त अशुभ ग्रह योगों का प्रभाव समाप्त हो जाता है। पीपल की परिक्रमा से कालसर्प जैसे ग्रह योग के बुरे प्रभावों से भी छुटकारा मिल जाता है। (पद्म पुराण) असाध्य रोगो में पीपल ~~~~~~~~~~~~ पीपल की सेवा से असाध्य से असाध्य रोगो में भी चमत्कारी लाभ होता देखा गया है । यदि कोई व्यक्ति किसी भी रोग से ग्रसित है वह नित्य पीपल की सेवा करके अपने बाएं हाथ से उसकी जड़ छूकर उनसे अपने रोगो को दूर करने की प्रार्थना करें तो जातक के रोग शीघ्र ही दूर होते है। उस पर दवाइयों का जल्दी / तेज असर होता है । यदि किसी बीमार व्यक्ति का रोग ठीक ना हो रहा हो तो उसके तकिये के नीचे पीपल की जड़ रखने से बीमारी जल्दी ठीक होती है । निसंतान दंपती संतान प्राप्ति हेतु पीपल के एक पत्ते को प्रतिदिन सुबह लगभग एक घंटे पानी में रखे, बाद में उस पत्ते को पानी से निकालकर किसी पेड़ के नीचे रख दें और पति पत्नी उस जल का सेवन करें तो शीघ्र संतान प्राप्त होती है । ऐसा लगभग 2-3 माह तक लगातार करना चाहिए ।

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