Santosh Hariharan
Santosh Hariharan Aug 16, 2017

संस्कारों का मानव जीवन मे महत्व।🎎

संस्कारों का मानव जीवन मे महत्व।🎎

जन्म लिए हुए हर इंसान के लिए संस्कार बड़े आवश्यक हैं। उनका किसी भी उपासना पद्धति से कोई संबंध नहीं है। संस्कार करने के पीछे प्रमुख कारण है, हर इंसान को प्रकृति के नियमों से परिचित कराना और जिस समाज में हम रहते हैं, उस समाज के सामाजिक नियमों से परिचित कराना। मानव और प्राणी इनमें बहुत बड़ा फर्क है। प्राणी के सृष्टि में जन्म लेते समय ही परमेश्वर उसे ज्ञान देता है। इसलिए प्राणियों को सिखाने की जरूरत नहीं होती। जन्म लेते समय ही प्राणी को ज्ञान की देन मिलती है। इसके संदर्भ में मधुमक्खी का उदाहरण लिया जा सकता है। जन्म लेते ही मधुमक्खी अपने काम में जुट जाती है। उसे यह सिखाना नहीं पड़ता कि मधुमक्खी का छत्ता कैसे बनाया जाता है। पीढ़ी दर पीढ़ी, सालों-साल मधुमक्खियां एक ही प्रकार का छत्ता बनाती रहती हैं। छत्ता बनाने का ज्ञान चाहे उसके पास जन्म से ही हो, किंतु उसे बनाते समय उसमें कुछ बदलाव भी जरूरी है, यह जानने की क्षमता मधुमक्खी में नहीं होती।

मानव में जन्म से जो ज्ञान होता है, वह सुप्त रूप में होता है। यह ज्ञान प्रत्यक्ष रूप में बाहर से दिखाई नहीं देता। अपने शरीर की सफाई का ज्ञान मानव में जन्म से नहीं होता। गाय का बछड़ा जन्म लेते ही कूदने लगता है। शरीर की सफाई कैसे की जाए, उस बछड़े को सिखाना नहीं पड़ता। उसके शरीर की रचना ही ऐसी होती है कि मलमूत्र उसके शरीर पर नहीं गिरता। मानव शरीर में यह बात नहीं होती। यही कारण है कि बच्चे का शरीर साफ करना, उसे खाना खिलाना, कोई दूसरा करता है। बच्चा जैसे जैसे बड़ा होता है, उसे इन बातों का ज्ञान होता जाता है। इस प्रकार का जो ज्ञान दिया जाता है, उसे संस्कार कहते हैं। इन्ही संस्कारों के कारण बच्चों को ज्ञान प्राप्त होता है। मानव को सबसे पहले उसके शरीर से संबंधित ज्ञान देना पड़ता है। इसी प्रकार उसकी बुद्धि का परिचय भी कोई दूसरा ही उसे देता है। हर इंसान को जन्म से ही बुद्धि होती है, किंतु उसे उसका परिचय नहीं होता या ज्ञान नहीं होता। यह ज्ञान उसे अनुकरण से और मार्गदर्शन से ही प्राप्त होता है।

इन दोनों तरीकों से जैसे जैसे ज्ञान प्राप्त होता है, वैसे वैसे मानव को प्राकृतिक तथा सामाजिक नियमों का परिचय होता जाता है। दोनों तरह के नियमों का परिचय सही तरीके से ना हो, तो इंसान पशुवत् ही रह जाएगा। यही कारण है कि इन बातों का ज्ञान होने के लिए संस्कारों की जरुरत होती है। यहां रामभक्त हनुमान का उदाहरण दिया जा सकता है। हनुमान प्रखर शक्तिशाली थे। किंतु अपनी इस शक्ति का ज्ञान उन्हें नहीं था। कोई दूसरा कहे, तभी उन्हें अपनी शक्ति का ज्ञान होता था। इसलिए सागर लांघकर लंका जाने का काम उन्हें दिया गया, तब वे शंकित हो गए कि वे यह काम कैसे कर सकेंगे। तभी जाम्बुवंत ने उन्हें उनकी शक्तियों का एहसास दिलाया और कहा, ‘आप ही समुद्र लांघ सकते हैं। किसी और के बस की यह बात नहीं है।’ यही बात हर एक इंसान में देखी जाती है। कोई दूसरा एहसास दिलाता है, तभी इंसान अपनी शारीरिक या बौद्धिक क्षमता को पहचान पाता है।


ऐसा नहीं है कि यह ज्ञान इंसान को नहीं होता, किंतु वह सुप्त रूप में होने के कारण बाहर से दिखाई नहीं देता। सुप्त रूप में होने वाले इस ज्ञान को प्रकट करने का काम संस्कार करते हैं। संस्कारों की आवश्यकता पर विचार करते समय हम जो अन्न सेवन करते हैं, उस अन्न का विचार किया जा सकता है। हम चावल, सब्जियां आदि चीजें पकाते हैं। इसे ही संस्कार करना कहते हैं। बिना पकाए, अन्न का सेवन करें तो उससे नुकसान होने की संभावना होती है। इसलिए उस पर पकाने का संस्कार करने की आवश्यकता होती है। उसे केवल पकाने से काम नहीं होता, वरन् उसमें जरुरत के अनुसार नमक, मिर्च, मसाले डालकर उसे स्वादिष्ट बनाने की भी आवश्यकता होती है। नमक-मिर्च सही मात्रा में मिलाया जाए, तो हम कहते हैं कि उसपर सही रूप में संस्कार हुए हैं। नमक-मिर्च की मात्रा कम या ज्यादा हो जाए तो हम कहते हैं कि खाना अच्छा नहीं बना। इसे ही उचित या अनुचित संस्कार कहा जा सकता है।

यही बात इंसान के लिए भी कही जा सकती है। चोरी करना अनुचित संस्कार है। जन्म लेते समय इंसान को चोरी करने की बुद्धि नहीं होती। चोरी करने की क्रिया कोई उसे सिखाता है। हो सकता है कि पूर्वजन्म के सुप्त संस्कारों का भी वह एक हिस्सा हो। बात चाहे कुछ भी हो, चोरी करना सामाजिक नियमों के खिलाफ है और इसलिए यह एक अनुचित संस्कार है। जिसपर संस्कार करने हो, वह इंसान या चीज, योग्य होना जरूरी है। साथ ही संस्कार करनेवाला भी योग्य होना जरूरी है। इंसान का स्वभाव अनुकरण करने का है।

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कामेंट्स

अमन मिश्रा Aug 16, 2017
@sachin.dayma.dadhich आपने पूरा लेख नही पढ़ा शायद यह ज्ञान की बारे में बात कर रहें हैं कि ज्ञान कैसे मिलता है मानव को। यह ये नही कह रहे कि स्कूल मत जाओ। वैसे भी गुरु बिन ज्ञान कहा, अब चाहे वो गुरु आपके माता पिता हो या फिर स्कूल के कोई शिक्षक।

Neha Sharma, Haryana Aug 14, 2020

#मो_मन_गिरिधर_छवि_पे_अटक्यो भारत अपने अधोपतन के कालखंड से गुजर रहा था। अकबर द्वारा मुगलिया सल्तनत के पाये भारत की जमीन में गाड़े जा चुके थे। दासता के साथ साथ हिंदुओं में मुस्लिम कुसंग से विलासिता व व्यभिचार भी पनप रहा था। इस विदेशी सत्ता का प्रतिरोध राजनैतिक रूप से मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के नेतृत्व में और सांस्कृतिक रूप से रामानंद, वल्लभाचार्य, कबीर, रैदास,तुलसी, मीरा, सूर आदि द्वारा किया जा रहा था परंतु फिर भी दासता का भाव गहराता जा रहा था और साथ ही बढ़ता जा रहा था हिंदू जाति का चारित्रिक पतन जो मुगल सत्ता के हरेक शहरी केंद्र में तवायफों व वेश्याओं के कोठों की बढ़ती संख्या में स्पष्ट दिख रहा था और मुगलिया सत्ता के मुख्य केंद्र आगरा में तो यह चरम पर था। और उसी आगरा में एक शाम हर रोज की तरह तंग और बदनाम गलियों में शाम से ही 'रंगीन रातों' का आगाज हो चुका था। कोठों से श्रृंगार रस की स्वर लहरियाँ उठ रहीं थीं । ऐसी ही गली से दैववश साधारण वस्त्रों में एक असाधारण पुरुष गुजर रहा था। साधारण नागरिकों के वस्त्रों में भी उसके चेहरे की आभा उसके तपस्वी व्यक्तित्व होने की घोषणा कर रही थी। वह कुछ गुनगुनाते हुये जा रहा था। "उफ ये आखिरी पंक्ति पूरी ही नहीं हो पा रही है इतने दिनों से" वह झुंझलाकर स्वगत बड़बड़ाया । और तभी रूप और संगीत के उस बाजार के एक कोठे से एक मधुर स्वर उठा। मधुर स्वरलहरियाँ उसके कानों में पड़ीं और वह उस आवाज को सुनकर जैसे चौंक उठा। लंबे लंबे डग भरते उसके पैर सहसा ठिठक गये । ऐसी अद्भुत आवाज ? रूप और वासना के इस बाजार में ?? उसके कदम स्वरों की दिशा में यंत्रचलित अवस्था में खिंचने लगे । स्वर जितने अधिक स्पष्ट होते गये वह उतना ही अपने भीतर डूबता चला गया। अंततः उसके पग उन स्वरों के उद्गमस्थल पर पहुँच कर रुक गए। एक गणिका का कोठा। और फिर उपस्थित हो गया एक अद्भुत दृश्य .. बदनाम कोठे के नीचे एक खड़ा एक पुरुष, कर्णगह्वरों से होकर आत्मा की गहराइयों तक उतरती स्वरलहरियों में डूबा, भाव विभोर और अर्धनिमीलित नेत्रों से अपने अश्रुओं को उस आवाज पर न्योछावर सा करता हुआ। गीत अंततः अवरोह की ओर आता हुआ पूर्ण हुआ और उसके साथ ही उस अद्भुत पुरुष की भावसमाधि भी टूट गयी। कुछ क्षणों तक वह सोच विचार करता खड़ा रहा और फिर कुछ निश्चय कर कोठे की सीढ़ियां चढ़ने लगा। कोठे के कारिंदों से व्यवहार के बाद कुछ क्षण उपरांत उसे गणिका के सम्मुख पहुंचा दिया गया। पुरुष ने गणिका पर दृष्टिपात किया। चंपक वर्ण, तीखी नासिका, उत्फुल्ल अधर, क्षीण कटि और जगमगाते वस्त्राभूषणों में लिपटा संतुलित सुगठित शरीर। गणिका का सौंदर्य उसके स्वरसंपदा के ही समान मनोहारी था परंतु सर्वाधिक विचित्र थी उसकी आंखें। बड़ी बड़ी आंखें जिनमें एक अबूझ गहराई थी जो उसकी गणिका सुलभ चंचलता से मेल नहीं खातीं थीं। आगुंतक पुरुष भी गणिका के चेहरे पर अपलक कुछ ढूंढता, खोया सा स्तंभ के सहारे खड़ा रहा जबकि गणिका कनखियों से अपने संभावित नये ग्राहक को 'तौलती' हुई अपने प्रारंभिक ग्राहकों को बीड़े देकर उन्हें विदा कर रही थी। जब अंतिम व्यक्ति भी चला गया तब वह आगुंतक पुरुष की ओर उन्मुख हुई और अपने पेशे के अनुरूप नजाकत भरी अदाओं के साथ आदाब पेश किया। "ये नाचीज आपकी क्या खिदमत कर सकती है हुजूर? " "तुम्हारा नाम क्या है?" बिना दृष्टि हटाये हुए पुरुष ने पूछा। "रामजनी बाई" "आवाज और सौंदर्य के साथ तुम्हारा नाम भी उतना ही सुंदर है देवि।" गणिका इस तरह की प्रशंसा के लिये अभ्यस्त थी परंतु उसे अपलक देखे जा रहे इस अजीब पुरुष के इन स्वरों में एक अंतर वह स्पष्ट अनुभव कर रही थी। इस पुरुष की आंखों में अन्य पुरुषों के विपरीत कामुक चमक और स्वरों में कामलोलुपता युक्त दैन्यता का पूर्ण अभाव था। गणिका आगुंतक के व्यक्तित्व से प्रभावित हो उठी। "शुक्रिया, आइये तशरीफ़ रखिये" उसने स्वयं को संभाला और अपने ग्राहक को एक मसनद पर विराजने हेतु आमंत्रित किया। आगुंतक अपने स्थान पर अविचल रहे। "नहीं, मैं तो यहां नहीं बैठ सकूँगा पर क्या तुम मेरे साथ चलकर मेरे ठाकुर के लिए गा सकोगी?" आगुंतक ने गंभीर स्वर में पूछा । गणिका को बहुत ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि उस समय जमींदार या राजे रजवाड़ों के पास ऐसे कारिंदों की फौज हुआ करती थी, जो अपने मालिक के 'शौक की पूर्ति ' के लिये नित नयी वारांगनाओं को ढूंढते रहते थे और ये भी शायद ऐसा ही कोई कारिंदा होगा हालांकि आगुंतक की अतिगंभीर छवि और चेहरे का सात्विक तेज ऐसे किसी विचार का निषेध करते थे । "जैसा हुजूर चाहें। पर ये नाचीज हवेलियों पर मुजरा करने के लिये 100 अशर्फियाँ लेती है।" तिरछी कुटिल चितवन के साथ गणिका ने अपना शुल्क बताया। पुरुष शुल्क सुनकर भी अप्रभावित रहा और बिना कुछ कहे अपने अंगरखे को टटोला और अशर्फियों से भरी थैली गणिका की ओर उछाल दी । कुछ देर बाद मथुरा की ओर दो घोडागाड़ियाँ जा रहीं थीं । एक गाड़ी में तबलची , सारँगीवान और सितारवादक अपने साजों के साथ ठुंसे हुये थे और दूसरी गाड़ी में गणिका अपने उस असाधारण ग्राहक के साथ बैठी थी । "आपके ठाकुर का ठिकाना क्या है ?" वेश्या ने पूछा । "ब्रज" संक्षिप्त उत्तर आया । क्षणिक चुप्पी के बाद पुनः गणिका ने कटाक्षपूर्वक पूछा, "और आपका नाम?" "कृष्णदास" "आपके ठाकुर क्या सुनना पसंद करेंगे ?" "कुछ भी जो ह्रदय से गाया जाये", पुरुष रहस्यपूर्ण ढंग से मुस्कुराया। "फिर भी?", उलझी हुई गणिका ने पुनः आग्रह किया । "अच्छा ठीक है, तुम मेरे ठाकुर को यह सुनाना" उन्होंने अपने मधुर गंभीर स्वर में गुनगुनाना शुरू कर दिया। "अरे यह तो भजन है।" गणिका बोल उठी। "हाँ, तुम्हें इसे गाने में कठिनाई तो नहीं होगी?" स्वरों को रोककर वह फिर मुस्कुराया । भजन ब्रज भाषा में था और बहुत सुंदर था । "किसने लिखा है ?" "मैंने" उन्होंने जवाब दिया। "ओह तो ये कविवर इस भजन को मेरे माध्यम से अपने मालिक को सुनाकर उनकी कृपा प्राप्त करना चाहते हैं ।" गणिका ने सोचा । ब्रज क्षेत्र में अकबर की मनसबदारी प्रथा के कारण उस समय कुकुरमुत्तों की तरह नित नये 'राजा साहबों' का उदय हो रहा था जिनमें अधिकांशतः विलासी और कामुक चरित्र के थे और इसीलिये संपूर्ण ब्रज क्षेत्र में महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा जनसामान्य में बहाई भक्तिरस की धारा के साथ साथ समांतर रूप से जागीरदारों के विलास की धारा भी बह रही थी और संगीत दोनों समांतर धाराओं को जोड़ने वाली कड़ी था। उस युग में धनाढ्य वर्ग में यद्यपि फारसी-उर्दू का प्रचलन व शायरों की गजलों का प्रभुत्व था और गजलों की प्रतिष्ठा राजदरबारों और गणिकाओं के कोठों पर प्रसिद्धि पर निर्भर करती थी हालांकि सूरदास और तुलसीदास की रचनाएं अपवाद थीं जो जनमानस के होंठों व ह्रदय में बसी हुईं थीं और कई गणिकायें कभी कभी व्यक्तिगत भाव सुख के लिये या कभी कभी अपने ग्राहकों की मांग पर इन भक्तिगीतों को भी गाती थीं। यह गणिका भी उसी वर्ग से थी। पुरुष पुनः अपना भजन गुनगुनाने लगा और गणिका तन्मयता से सुनकर शब्दों, ताल, राग, आरोह अवरोह आदि को स्मृतिबद्ध करती रही । अंततः 5 घंटे बाद लगभग अर्धरात्रि से कुछ पूर्व उन्होंने मथुरा में प्रवेश किया और कुछ पलों बाद पुरुष के निर्देशानुसार एक मंदिर के सामने गाड़ियां रोक दी गयीं। पुरुष नीचे उतरा और सभी को नीचे उतरने का निर्देश दिया। वह स्वयं मंदिर के सिंहद्वार की ओर बढ़ा और जेब से कुंजी निकालकर उसकी सहायता से कपाट खोल दिये । "अंदर आओ" उसने इशारा किया । "मंदिर में?" गणिका आश्चर्यचकित व संकुचित हो उठी । "अंदर आ जाओ, संकुचित होने की आवश्यकता नहीं है " पुरुष ने साधिकार आदेश दिया । उलझन में भरी गणिका और उसकी मंडली अंदर आ गयी। "मैं चादरें और मसनद बिछवाता हूँ, तुम अपने साज जमा लो" "यहां? यह एक मंदिर है । लोग क्या कहेंगे हुजूर ??" गणिका अब भयग्रस्त हो उठी । "कोई कुछ नहीं कह सकेगा। मेरे ठाकुर ने मुझे सारे अधिकार दे रखे हैं।" उन्होंने सबको आश्वस्त करते हुए कहा । "सच बताइये आप कौन हैं?" "इस मन्दिर का मुख्य प्रबंधनकर्ता और मुख्याधिकारी कृष्णदास" उन्होंने उत्तर दिया । गणिका आश्वस्त तो हुई परंतु उसकी उलझन मिटी नहीं। कैसा है ये व्यक्ति जो इस पवित्र स्थान का प्रयोग अपनी महत्वाकांक्षा पूरी करनी के लिए कर रहा है और कैसा है इनका 'ठाकुर' जो इस पवित्र स्थान में मुजरा सुनने का आकांक्षी है? इसी उधेड़बुन में डूबी वह अपना श्रंगार व्यवस्थित करने एक ओर चली गयी जबकि कृष्णदास व साजिंदे दीपों को प्रज्ज्वलित कर बिछावन बिछाने लगे। अंततः पूरा मंदिर पुनः दीपों से जगमग होने लगा और साजिंदों ने अपने साज जमा लिये। गणिका भी अपने पूर्ण श्रंगार और मोहक रूप में प्रस्तुत थी। "आपके ठाकुर नहीं पधारे अभी तक?" उसने अपनी मोहक मुस्कुराहट के साथ पूछा । "वे तो यहीं हैं " "कहाँ?" इस प्रश्न के उत्तर में कृष्णदास उठे, गर्भगृह की ओर बढ़े और पट खोल दिये। दीपकों के झिलमिल प्रकाश में वहां कान्हाजी अपने पूर्णश्रृंगार में विराजमान थे । "यही हैं मेरे ठाकुर" हतप्रभ स्त्री की निगाहें कृष्ण के श्रीविग्रह से टकराईं। जन्म जन्मांतरों के पुण्य प्रकट हो उठे। वह चित्रवत जड़ हो गई, कृष्ण छवि में खो गई, बिक गई। समय उन पलों में जैसे ठहर गया । "गाओ देवी, कान्हा तुम्हें सुनने का इंतजार कर रहे हैं " कृष्णदास की गंभीर वाणी गूंजी । गणिका के लिये समस्त संसार जैसे अदृश्य हो गया और वह बावली हो उठी। उसकी आँखों में अब केवल कृष्ण की छवि थी और कर्ण गह्वरों में सिर्फ एक ध्वनि .. "कान्हा तुम्हें सुनने का इंतजार कर रहे हैं " उसकी आंखें भर आईं और आत्मा की गहराइयों से मधुर तान फूट निकली। साजिंदों ने स्वर छेड़ दिये। कृष्णदास के सिखाये भजन के स्वर गूंज उठे। "मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो।" स्त्री उन शब्दों में जैसे डूब गई । वह बार बार उन्हीं पंक्तियों को दुहरा रही थी। "मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो।" संगीत की ध्वनि, भावविभोर स्वर .. लोगों की निद्रा टूट गयी और वे आश्चर्यचकित मंदिर में आने लगे। दृश्य अवांक्षित परन्तु अपूर्व था। जनवृन्द का सात्विक रोष गणिका के भावसमुद्र में उतराते शब्दों के साथ बह गया। गणिका ने भजन की अगली पंक्तियाँ उठाईं। "ललित त्रिभंग चाल पै चलि कै" "ललित त्रिभंग चाल पै चलि कै चिबुक चारु गडि ठठक्यो" मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो। मो मन गिरिधर छबि पै अटक्यो।। समस्त जन उन क्षणों में, उन भावभरे शब्दों में जैसे कृष्ण का साक्षात दर्शन कर रहे थे। गणिका आगे बढ़ी-- "सजल स्याम घन बरन लीन ह्वै, "सजल स्याम घन बरन लीन ह्वै फिर चित अनत न भटक्यो।" लोगों की आंसुओं की धारायें बह उठी। समस्त जनवृन्द गा उठा, एक बार, दो बार, बार बार ... "....फिर चित अनत न भटक्यो .... ..….फिर चित अनत न भटक्यो... .....फिर चित अनत न भटक्यो गणिका अपने ही भावसंसार में थी। भावों की चरमावस्था में उसकी आंखें कृष्ण की आंखों से जा मिलीं। गणिका ने और गाना चाहा पर उसके होंठ कुछ थरथराकर शांत हो गये और आंखें कृष्ण की आंखों में अटक गयीं। कृष्ण की आंखों में उसे आमंत्रण दिखाई दे रहा था, उसकी आत्मा विकल हो उठी और अपने स्थान पर बैठे ही बैठे उसने अपनी भुजा कातर मुद्रा में कृष्ण की ओर फैला दी। उसने कान्हाजी के चेहरे पर मुस्कुराहट देखी और वह पूर्ण हो उठी। डबडबाई आंखों से अंततः अश्रुओं की दो धाराएं बह निकलीं और अगले ही क्षण वह भूमि पर निश्चेष्ट होकर गिर गई । भीड़ शांत स्तब्ध हो गई । इस गहन स्तब्धता को कृष्णदास की पगध्वनि ने भंग किया। उन्होंने रामजनी की निश्चल देह को भुजाओं में उठाया और कान्हा के श्रीविग्रह की ओर बढ़ चले । मृत देह कृष्ण चरणों में अर्पित हुई । जीवनपुष्प कृष्णार्पित हुआ । जीवन, निर्माल्य बनकर कृतार्थ हुआ । .....और डबडबाई आंखों से कृष्णदास ने अपने अधूरे भजन की पंक्तियाँ पूर्ण कीं -- '#कृष्णदास_किए_प्रान_निछावर, #यह_तन_जग_सिर_पटक्यो।।

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Shakti Aug 14, 2020

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Sunita Pawar Aug 14, 2020

कोलाहल करते राहगीर, भागते वाहनों का शोर। सड़क किनारे तरु तले, पिता के सीने पर, सोती हुई एक बेटी। वो दृश्य देख कर, दिल ने एक बात कही है। कि दुनिया में एक यही है, जो जगह सबसे सही है। क्यूँ कि एक बेटी सबसे महफ़ूज़ यहीं है। ये किसी सरकार का, कोई घोषणा पत्र नही। ये पिता का सीना है, और ये भी नही मालूम, कि कितने इंच का है। मगर दुनिया में यही है, जो जगह सबसे सही है। क्यूँ कि एक बेटी सबसे महफ़ूज़ यहीं है। आसमां को उन्मुक्त उड़ान, इसी सीने से भरती हैं। विदा होती हैं घर से, इसी सीने से लगतीं हैं। ये कोई सड़क नही, जहाँ फब्तियों का डर हो। दिल की हर बात, इसी सीने से लग कही है। दुनिया में बस यही है, जो जगह सबसे सही है। क्यूँ कि एक बेटी सबसे महफ़ूज़ यहीं है। बेटियों को बेटा, कहने का जज़्बा इसी में है। उनकी कामयाबी पर, ख़ुशीयों का नाच इसी में है। ये वो जन्नत है जहाँ बेटियाँ, परियों की तरह रहती हैं। मंज़िल पर जाने से पहले, वो अपने माथे को, इसी सीने से लगा कहती हैं। उन्हें शगुन में दही चीनी की, अब कोई ज़रूरत नही है। दुनिया में बस यही है, जो जगह सबसे सही है, क्यूँ कि एक बेटी सबसे महफ़ूज़ यहीं है। ✍#शेखर (स्वरचित)

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राधे -राधे - आज का भगवद चिन्तन 14-08-2020 🚩 अन्याय, अत्याचार और अनीति से लड़ना भगवान श्री कृष्ण के जीवन से सीखें। आदमी सबका विरोध करता है मगर दो जगहों पर यह विरोध का सामर्थ्य खो बैठता है। पहला जब विरोध अपनों का करना पड़े और दूसरा जब विरोध किसी सामर्थ्यवान, शक्तिवान का करना पड़े। 🚩 श्री कृष्ण का जीवन तो देखिये। उन्होंने अनीति के खिलाफ सबसे अधिक अपनों का और सर्व सामर्थ्यवानों का ही विरोध किया। सात वर्ष की आयु में इन्द्र को ही चुनौती दे डाली और उसके व्यर्थाभिमान का नाश किया। 🚩 अपने ही कुल के लोग जब कुमार्ग पर चलने लगे तो बिना किसी संकोच व मोह के उनका परित्याग कर दिया। अत: अन्याय, अत्याचार और अनीति का विरोध ही श्री कृष्ण की सच्चा अनुसरण होगा। अन्याय का विरोध करना ही होगा, चाहे सामने कोई अपना हो अथवा कोई साधन संपन्न ही क्यों न हो।

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बाल संस्कार : अपने बच्चों को अवश्य सिखाएं ये दिव्य श्लोक हमारे पुराणों में वर्णित मंत्र-श्लोक अपने बच्चों को जरूर सिखाएं,जीवन की विपरीत परिस्थिति में इनके स्मरण से शक्ति मिलती है.... 1.प्रात: कर-दर्शनम् कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती। करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्॥ 2.पृथ्वी क्षमा प्रार्थना समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमंडिते। विष्णु पत्नि नमस्तुभ्यं पाद स्पर्शं क्षमस्व मे॥ 3.त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण ब्रह्मा मुरारी स्त्री पुरान्तकारी भानु: शशि भूमिसुतो बुधश्च। गुरुश्च शुक्र: शनि राहु केतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥ 4.स्नान मंत्र गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेस्मिन् सन्निधिं कुरु॥ 5.सूर्य नमस्कार ॐ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च।। आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने। दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि शोक विनाशनम् सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्॥ ॐ मित्राय नम: ॐ रवये नम: ॐ सूर्याय नम: ॐ भानवे नम: ॐ खगाय नम: ॐ पूष्णे नम: ॐ हिरण्यगर्भाय नम: ॐ मरीचये नम: ॐ आदित्याय नम: ॐ सवित्रे नम: ॐ अर्काय नम: ॐ भास्कराय नम: ॐ श्री सवितृ सूर्यनारायणाय नम: आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम भास्कर। दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥ 6.संध्या दीप दर्शन शुभं करोतु कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योति नमोऽस्तु ते॥ दीपो ज्योतिः परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते॥ 7.गणपति स्तोत्र गणपति: विघ्नराजो लम्बतुंडो गजानन:। द्वै मातुरश्च हेरम्ब एकदंतो गणाधिप:॥ विनायक: चारुकर्ण: पशुपालो भवात्मज:। द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय य: पठेत्॥ विश्वं तस्य भवेद् वश्यं न च विघ्नं भवेत् क्वचित्। विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय। लम्बोदराय विकटाय गजाननाय॥ नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय। गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥ शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजं। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥ 8.आदिशक्ति वंदना सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥ 9.शिव स्तुति कर्पूर गौरं करुणावतारं, संसार सारं भुजगेन्द्रहारं। सदा वसंतं हृदयारविन्दे, भवं भवानी सहितं नमामि॥ 10. विष्णु स्तुति शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम् वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥ 11. श्री कृष्ण स्तुति कस्तूरी तिलकं ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभं। नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले, वेणु करे कंकणम्॥ सर्वांगे हरिचन्दनं सुललितं, कंठे च मुक्तावलि। गोपस्त्री परिवेष्टितो विजयते, गोपाल चूडामणी॥ मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्। यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्॥ 12.श्रीराम वंदना लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्। कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥ 13. एक श्लोकी रामायण आदौ रामतपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनम्। वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीवसम्भाषणम्॥ बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम्। पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद् श्री रामायणम्॥ 14.सरस्वती वंदना या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता। या वींणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपदमासना॥ या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता। सा माम पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्याऽपहा॥ 15.हनुमंत वंदना अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्। दनुजवनकृषानुम् ज्ञानिनांग्रगणयम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्। रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ मनोजवं मारुततुल्यवेगम जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणम् प्रपद्ये॥ 16.स्वस्ति-वाचन ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्ट्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ 17.शांति पाठ ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष (गुँ) शान्ति:, पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:, सर्व (गुँ) शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ ॥ॐ शांति: शांति:शांति:॥

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