गीता अध्याय 5 का संक्षिप्त वर्णन।

इसके पहले हमने गीता के 4 अध्याय इसी कृष्णा चैनल में अपलोड कर चुके हैं।
आइये आज जाने गीता के पांचवे अध्याय का ज्ञान।
#गीताज्ञान : पिछ्ले गीता अध्याय के लिए यहाँ क्लिक करें।

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Harikishan Patidar Mar 24, 2019

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ramkumar verma Mar 23, 2019

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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ ग्यारहवाँ अध्याय : विश्वरूपदर्शनयोग (विराट स्वरूप) सप्तम दिवस 〰️〰️🔸〰️〰️🔸🔸〰️〰️🔸〰️〰️ संजय उवाच एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृतांजलिर्वेपमानः किरीटी। नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णंसगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ।।35) संजय ने धृतराष्ट्र से कहा- हे राजा! भगवान् के मुख से इन वचनों को सुनकर काँपते हुये अर्जुन ने हाथ जोड़कर उन्हें बारम्बार नमस्कार किया, फिर उसने भयभीत होकर अवरुद्ध स्वर में कृष्ण से इस प्रकार कहा। सज्जनों, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, भगवान् के विश्वरूप के कारण अर्जुन आश्चर्यचकित था, अतः वह श्रीकृष्ण को बारम्बार नमस्कार करने लगा और अवरुद्ध कंठ से आश्चर्य से वह श्रीकृष्ण की प्रार्थना मित्र के रूप में नहीं, अपितु भक्त के रूप में करने लगा। अर्जुन उवाच स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च। रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्‍घा: ।।36।। अर्जुन ने कहा- हे ह्रषिकेश! आपके नाम के श्रवण से संसार हर्षित होता है और सभी लोग आपके प्रति अनुरक्त होते हैं, यद्यपि सिद्धपुरूष आपको नमस्कार करते हैं, किन्तु असुरगण भयभीत है और इधर-उधर भाग रहे हैं, यह ठीक ही हुआ है। सज्जनों! श्रीकृष्ण से कुरुक्षेत्र युद्ध के परिणाम को सुनकर अर्जुन प्रबुद्ध हो गया और भगवान् के परम भक्त तथा मित्र के रूप में बोला कि श्रीकृष्ण जो कुछ करते हैं, वह सब उचित है, अर्जुन ने पुष्टि की कि श्रीकृष्ण ही पालक हैं और भक्तों के आराध्य तथा अवांछित तत्त्वों के संहारकर्ता है, उनके सारे कार्य सबों के लिये समान रूप से शुभ होते हैं, यहाँ पर अर्जुन यह समझ पाता कि जब युद्ध निश्चित रूप से होना था तो अन्तरिक्ष से अनेक देवता, सिद्ध तथा उच्चतर लोकों के बुद्धिमान प्राणी युद्ध को देख रहे थे। क्योंकि युद्ध में श्रीकृष्ण उपस्थित थे, जब अर्जुन ने भगवान् का विराट स्वरूप देखा तो देवताओं को आनन्द हुआ, किन्तु अन्य असुरों और नास्तिकों को वह भयभीत होने वाला लगा और डर कर इधर-उधर भागने लगे, भक्तों तथा नास्तिकों के प्रति भगवान् के व्यवहार की अर्जुन द्वारा यहाँ पर प्रशंसा की गई है, भक्त प्रत्येक अवस्था में भगवान् का गुणगान करता है, क्योंकि वह जानता है कि वे जो कुछ भी करते हैं, वह सबों के हित में है। कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्‌ गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे। अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्‌ ।।37।। हे महात्मा! आप ब्रह्मा से भी बढ़कर है, आप आदि स्त्रष्टा है, तो फिर वे आपको सादर नमस्कार क्यों न करें? हे अनन्त, हे देवेश, हे जगन्निवास! आप परम स्त्रोत, परम अक्षर, कारणों के कारण तथा इस भौतिक जगत् से परे है। सज्जनों! अर्जुन इस प्रकार नमस्कार करके यह सूचित करता है कि श्रीकृष्ण सबों के पूजनीय है, वे सर्वव्यापी है और प्रत्येक जीव की आत्मा है, अर्जुन श्रीकृष्ण को महात्मा कहकर सम्बोधित करता है, जिसका अर्थ है कि वे उदार तथा अनन्त है, अनन्त शब्द सूचित करता है कि ऐसा कुछ भी नहीं जो भगवान् की शक्ति और प्रभाव से आच्छादित न हो और देवेश शब्द का अर्थ है कि वे समस्त देवताओं के नियन्ता है और उन सबके ऊपर है, वे समग्र विश्व के आश्रय है। अर्जुन ने भी सोचा कि यह सर्वथा उपयुक्त है कि सारे सिद्ध तथा शक्तिशाली देवता भगवान् को नमस्कार करते हैं, क्योंकि उनसे बढ़कर कोई नहीं है, अर्जुन विशेष रूप से उल्लेख करता है कि श्रीकृष्ण ब्रह्माजी से भी बढ़कर है, क्योंकि ब्रह्माजी उन्हीं के द्वारा उत्पन्न हुये है, ब्रह्माजी का जन्म श्रीकृष्ण के पूर्व विस्तार गर्भोदकशायी श्रीविष्णु की नाभि से निकले कमलनाल से हुआ, अतः ब्रह्माजी तथा ब्रह्माजी से उत्पन्न विभिन्न देवताओं को चाहिये कि श्रीकृष्ण को नमस्कार करें। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि शिवजी, ब्रह्माजी तथा सभी बड़े देवता भगवान् श्रीकृष्ण का आदर करते हैं, अक्षरम् शब्द भी बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह जगत् विनाशशील है, किन्तु भगवान् इस जगत् से परे है, वे समस्त कारणों के कारण है, अतएव भगवान् इस भौतिक प्रकृति के तथा इस दृश्यजगत् के समस्त बद्धजीवों से श्रेष्ठ है, इसलिये वे परमेश्वर है। त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌। वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ।।38।। आप आदि देव, सनातन पुरूष तथा इस दृश्यजगत के परम आश्रय है, आप सब कुछ जानने वाले हैं और आप ही सब कुछ है जो जानने योग्य है, आप भौतिक गुणों से परे परम आश्रय है, हे अनन्त रूप! यह सम्पूर्ण दृश्यजगत् आपसे व्याप्त है। प्रत्येक वस्तु भगवान् पर आश्रित है, अतः वे ही परम आश्रय है, निधानम्‌ से तात्पर्य है ब्रह्म तेज समेत सारी वस्तुयें भगवान् श्रीकृष्ण पर आश्रित होना, वे इस संसार में घटित होने वाली प्रत्येक घटना को जानने वाले हैं और यदि ज्ञान का कोई अन्त है, तो श्रीकृष्ण ही समस्त ज्ञान के अन्त है, अतः वे ज्ञाता है और ज्ञेय (वेधं) भी है, वे जानने योग्य है, क्योंकि वे सर्वव्यापी है, वैकुण्ठलोक में कारण स्वरूप होने से वे दिव्य है, श्रीकृष्ण दिव्यलोक में भी प्रधान पुरूष है। शेष जारी • • • जय श्री कृष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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Arti Verma Mar 23, 2019

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