गीता अध्याय 5 का संक्षिप्त वर्णन।

इसके पहले हमने गीता के 4 अध्याय इसी कृष्णा चैनल में अपलोड कर चुके हैं।
आइये आज जाने गीता के पांचवे अध्याय का ज्ञान।
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Lakshmi Singh Aug 3, 2020

श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ तृतीय स्कन्ध: नवमोध्याय (पहला दिन) (ब्रह्मा जी द्वारा भगवान की स्तुति) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ ब्रह्मोवाच ज्ञातोऽसि मेऽद्य सुचिरात्ननुदेहभाजां न ज्ञायते भगवतो गतिरित्यवद्यम्। नान्यत्त्वदस्ति भगवन्नपि तन्न' शुद्धं मायागुणव्यतिकराद्यदुरुर्विभासि ॥ १ रूपं यदेतदवबोधरसोदयेन হश्वन्निवृत्ततमसः सदनुग्रहाय । आदौ गृहीतमवतारशतैकबीजं यन्नाभिपद्मभवनादहमाविरासम् ॥ २ नातः परं परम यद्भवतः स्वरूप- मानन्दमात्रमविकल्पमविद्धवर्चः पश्यामि विश्वसृजमेकमविश्वमात्मन् भूतेन्द्रियात्मकमदस्त उपाश्रितोऽस्मि ।॥ ३ तद्वा इदं भुवनमङ्गल मङ्गलाय ध्याने स्म नो दर्शितं त उपासकानाम्। तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम तुभ्यं योऽनादृतो नरकभाग्भिरसत्प्सङ्गैः ॥ ४ ये तु त्वदीयचरणाम्बुजकोशगन्धं जिघ्रन्ति कर्णविवरैः श्रुतिवातनीतम् । भक्त्या गृहीतचरणः परया च तेषां नापैषि नाथ हृदयाम्बुरुहात्स्वपुंसाम् ॥ ५ तावद्भयं द्रविणगेहसुहन्निमित्तं शोकः स्पृहा परिभवो विपुलश्च लोभः । तावन्मेत्यसदवग्रह आर्तिमूलं यावन्न तेऽङ्घ्रिमभयं प्रवृणीत लोकः ॥ ६ दैवेन ते हतधियो भवतः प्रसङ्गात् सर्वाशुभोपशमनाद्विमुखेन्द्रिया ये। कुर्वन्ति कामसुखलेशलवाय दीना लोभाभिभूतमनसोऽकुशलानि হাश्वत् ॥ ७ क्षुत्तदत्रिधातुभिरिमा मुहुर्द्यमानाः शीतोष्णवातवर्षैरितरेतराच्च कामाग्निनाच्युत रुषा च सुदुर्भरेण सम्पश्यतो मन उरुक्रम सीदते मे ॥ ८ यावत्पृथक्त्वमिदमात्मन इन्द्रियार्थ- मायाबलं भगवतो जन ईश पश्येत् । तावन्न संसृतिरसौ प्रतिसंक्रमेत व्यर्थापि दुःखनिवहं वहती क्रियार्था ॥ ९ अह्नयापृतार्तकरणा निशि नि:शयाना नानामनोरथधिया क्षणभग्ननिद्राः । दैवाहतार्थरचना ऋषयोऽपि देव युष्पत्प्रसङ्गविमुखा इह संसरन्ति ॥ १० त्वं भावयोगपरिभावितहत्सरोज आस्से श्रुतेक्षितपथो ननु नाथ पुंसाम्। यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ ११ नातिप्रसीदति तथोपचितोपचारै- राराधितः सुरगणैर्हदि बद्धकामैः । यत्सर्वभूतदययासदलभ्ययैको नानाजनेष्रुवहितः सुहृदन्तरात्मा ॥ १२ पुंसामतो विविधकर्मभिरध्वराद्यै- दनेिन चोग्रतपसा व्रतचर्यया च। आराधनं भगवतस्तव सत्क्रिया्थो धर्मोऽर्पितः कर्हिचिद्ध्रियते न यत्र ॥ १३ হাश्वत्स्वरूपमहसैव निपीतभेद मोहाय बोधधिषणाय नमः परस्मै । विश्वोद्धवस्थितिलयेषु निमित्तलीला- रासाय ते नम इदं चकृमेश्वराय ॥ १४ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ ब्रह्माजी ने कहा-प्रभो ! आज बहुत समय के बाद मैं आपको जान सका हूँ। अहो ! कैसे दुर्भाग्य की बात है कि देहधारी जीव आपके स्वरूप को नहीं जान पाते। भगवन् ! आपके सिवा और कोई वस्तु नहीं है। जो वस्तु प्रतीत होती है, वह भी स्वरूपतः सत्य नहीं है, क्योंकि माया के गुणों के क्षुभित होने के कारण केवल आप ही अनेकों रूपों में प्रतीत हो रहे हैं ।। १ ॥ देव ! आपकी चित् शक्ति के प्रकाशित होने के कारण अज्ञान आपसे सदा ही दूर रहता है। आपका यह रूप, जिसके नाभि-कमल से मैं प्रकट हुआ हूँ, सैकड़ों अवतारों का मूल कारण है। इसे आपने सत्पुरुषों पर कृपा करने के लिये ही पहले-पहल प्रकट किया है ॥ २ ॥ परमात्मन् ! आपका जो आनन्दमात्र, भेदरहित, अखण्ड तेजोमय स्वरूप है, उसे मैं इससे भिन्न नहीं समझता। इसलिये मैंने विश्व की रचना करने वाले होने पर भी विश्वातीत आपके इस अद्वितीय रूप की ही शरण ली है। यही सम्पूर्ण भूत और इन्द्रियोंका भी अधिष्ठान है। ३ । हे विश्वकल्याणमय ! मैं आपका उपासक हूँ, आपने मेरे हित के लिये ही मुझे ध्यान में अपना यह रूप दिखलाया है। जो पापात्मा विषयासक्त जीव हैं, वे ही इसका अनादर करते हैं। मैं तो आपको इसी रूप में बार बार नमस्कार करता हूँ ।। ४ ।। मेरे स्वामी ! जो लोग वेदरूप वायु से लायी हुई आपके चरणरूप कमल कोश की गंधक अपने कर्णपुटों से ग्रहण करते हैं, उन अपने भक्तजनों के हृदय-कमल से आप कभी दूर नहीं होते; क्योंकि वे पराभक्तिरूप डोरी से आपके पादपद्मों को बाँध लेते हैं। ५ ॥ जब तक पुरुष आपके अभयप्रद चरणारविन्दों का आश्रय नहीं लेता, तभी तक उसे धन, घर और बन्धुजनों के कारण प्राप्त होने वाले भय, शोक, लालसा, दीनता और अत्यन्त लोभ आदि सताते हैं और तभी तक उसे मैं-मेरेपन का दुराग्रह रहता है, जो दुःख का एकमात्र कारण है।। ६॥ जो लोग सब प्रकार के अमङ्गलों को नष्ट करने वाले आपके श्रवण-कीर्तनादि प्रसङ्गों से इन्द्रियों को हटाकर लेशमात्र विषय-सुख के लिये दीन और मन-ही-मन लालायित होकर निरन्तर दुष्कर्म में लगे रहते हैं, उन बेचारों की बुद्धि दैव ने हर ली है॥७॥ अच्युत ! उरुक्रम ! इस प्रजा को भूख-प्यास, वात, पित्त, कफ, सर्दी, गर्मी, हवा और वर्षा से, परस्पर एक-दूसरे से तथा कामाग्नि और दुःसह क्रोध से बार-बार कष्ट उठाते देखकर मेरा मन बड़ा खुन होता है।। ८॥ स्वामिन् ! जब तक मनुष्य इन्द्रिय और विषय रूपी माया के प्रभाव से आपसे अपने को भिन्न देखता है, तब तक उसके लिये इस संसार चक्र की निवृत्ति नहीं होती । यद्यपि यह मिथ्या है, तथापि कर्मफल भोग का क्षेत्र होने के कारण उसे नाना प्रकार के दुःख में डालता रहता है ॥९॥ देव । औरों की तो बात ही क्या-जो साक्षात् मुनि हैं, वे भी यदि आपके कथाप्रसङ्ग से विमुख रहते हैं तो उन्हें संसार में फँसना पड़ता है। वे दिनमें अनेक प्रकार के व्यापारों के कारण विक्षिप्तचित्त रहते हैं, रात्रि में निद्रा में अचेत पड़े रहते हैं, उस समय भी तरह-तरह के मनोरथों के कारण क्षण-क्षण में उनकी नींद टूटती रहती है तथा दैववश उनकी अर्थसिद्धि के सब उद्योग भी विफल होते रहते हैं ।। १० ॥ नाथ ! आपका मार्ग केवल गुण-श्रवण से ही जाना जाता है। आप निश्चय ही मनुष्य के भक्ति योग के द्वारा परिशुद्ध हुए हृदयकमल में निवास करते हैं। पुण्यश्लोक प्रभु! आपके भक्तजन जिस-जिस भावना से आपका चिन्तन करते हैं, उन साधु पुरुषों पर अनुग्रह करने के लिये आप वही-वही रूप धारण कर लेते हैं। ११ ।॥ भगवन् ! आप एक हैं तथा सम्पूर्ण प्राणियों के अन्तःकरण में स्थित उनके परम हितकारी अन्तरात्मा हैं। इसलिये यदि देवता लोग भी हृदय में तरह-तरह की कामनाएँ रखकर भाँति-भाँति की विपुल सामग्रियों से आपका पूजन करते हैं, तो उससे आप उतने प्रसन्न नहीं होते जितने सब प्राणियों पर दया करने से होते हैं। किन्तु वह सर्वभूतदया असत् पुरुषों को अत्यन्त दुर्लभ है ॥ १२ ॥ जो कर्म आपको अर्पण कर दिया जाता है, उसका कभी नाश नहीं होता- वो अक्षय हो जाता है। अतः नाना प्रकार के कर्म-यज्ञ, दान, कठिन तपस्या और व्रत के द्वारा आपकी प्रसन्नता प्राप्त करना ही मनुष्य का सबसे बड़ा कर्मफल है, क्योंकि आपकी प्रसन्नता होने पर ऐसा कौन फल है जो सुलभ नहीं हो जाता ।। १३ ॥ आप सर्वदा अपने स्वरूप के प्रकाश से ही प्राणियों के भेद-भ्रमरूप अन्धकार का नाश करते रहते हैं तथा ज्ञान के अधिष्ठान साक्षात् परमपुरुष हैं; मैं आपको नमस्कार करता हूँ। संसार की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के निमित्त से जो माया की लीला होती है, वह आपका ही खेल है; अतः आप परमेश्वर को मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ। १४ ।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमश.... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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Mehul Shetty Aug 3, 2020

श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ तृतीय स्कन्ध: नवमोध्याय (दूसरा दिन) (ब्रह्मा जी द्वारा भगवान की स्तुति) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ यस्यावतारगुणकर्मविडम्बनानि नामानि येऽसुविगमे विवशा गृणन्ति । ते नैकजन्मशमलं सहसैव हित्वा संयान्त्यपावृतमृतं तमजं प्रपद्ये ॥ १५ यो वा अहं च गिरिशश्च विभुः स्वयं च स्थित्युद्धवप्रलयहेतव आत्ममूलम् । भित्त्वा त्रिपाद्वृध एक उरुप्ररोह- स्तस्मै नमो भगवते भुवनद्रुमाय ॥ १६ लोको विकर्मनिरतः कुशले प्रमत्तः कर्मण्ययं त्वदुदिते भवदर्चने स्वे । यस्तावदस्य बलवानिह जीविताशां सद्यश्छिनत्त्यनिमिषाय नमोऽस्तु तस्मै ।। १७ यस्माद्विभेम्यहमपि द्विपरार्धधिष्ण्य- मध्यासितः सकललोकनमस्कृतं यत् । तेपे तपो बहुसवोऽवरुरुत्समान- स्तस्मै नमो भगवतेऽधिमखाय तुभ्यम् ॥ १८ तिर्यङ्गनुष्यविबुधादिषु जीवयोनि- ष्वात्मेच्छयाऽत्मकृतसेतुपरीप्सया यः । रेमे निरस्तरतिरप्यवरूद्धदेह स्तस्मै नमो भगवते पुरुषोत्तमाय ॥ १९ योऽविद्ययानुपहतोऽपि दशार्धवृत्त्या निद्रामुवाह जठरीकृतलोकयात्रः । अन्तर्जलेऽहिकशिपुस्पश्शानुकूलां भीमोर्मिमालिनि जनस्य सुखं विवृण्वन् ॥ २० यन्नाभिपद्मभवनादहमासमीड्य लोकत्रयोपकरणो यदनुग्रहेण । तस्मै नमस्त उदरस्थभवाय योग- निद्रावसानविकसन्नलिनेक्षणाय ॥ २१ सोऽयं समस्तजगतां सुहृदेक आत्मा सत्त्वेन यन्मृडयते भगवान् भगेन । तेनैव मे दृशमनुस्पृशताद्यथाहं स्रक्ष्यामि पूर्ववदिदं प्रणतप्रियोऽसौ' ॥ २२ एष प्रपन्नवरदो रमयाऽऽत्मशक्त्या यद्यत्करिष्यति गृहीतगुणावतारः । तस्मिन् स्वविक्रममिदं सृजतोऽपि चेतो युञ्जीत कर्मशमलं च यथा विजह्याम् ॥ २३ नाभिह्ृदादिह सतोऽम्भसि यस्य पुंसो विज्ञानशक्तिरहमासमनन्तशक्तेः रूपं विचित्रमिदमस्य विवृण्वतो मे मा रीरिषीष्ट निगमस्य गिरां विसर्गः ॥ २४ सोऽसावदभ्रकरुणो भगवान् विवृद्ध'- प्रेमस्मितेन नयनाम्बुरुहं विजृम्भन् । उत्थाय विश्वविजयाय च नो विषादं माध्व्या गिरापनयतात्पुरुषः पुराणः ॥ २५ मैत्रेय उवाच स्वसम्भवं निशाम्यैवं तपोविद्यासमाधिभिः । यावन्मनोवचः स्तुत्वा विरराम स खिन्नवत् ॥ २६ अथाभिप्रेतमन्वीक्ष्य ब्रह्मणो मधुसूदनः । विषण्णचेतसं तेन कल्पव्यतिकराम्भसा ॥ २७ लोकसंस्थानविज्ञान आत्मनः परिखिद्यतः । तमाहागाधया वाचा कश्मलं शमयन्निव ॥ २८ श्रीभगवानुवाच मा वेदगर्भ गास्तन्द्रीं सर्ग उद्यममावह । तन्मयाऽऽपादितं ह्यग्रे यन्मां प्रार्थयते भवान् ॥ २९ भूयस्त्वं तप आतिष्ठ विद्यां चैव मदाश्रयाम् । ताभ्यामन्तर्हदि ब्रह्मन् लोकान्द्रक्ष्यस्यपावृतान् ॥ ३० श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ जो लोग प्राणत्याग करते समय आपके अवतार, गुण और कर्मो को सूचित करने वाले देवकीनन्दन, जर्नादन, कंस निकंदन आदि नामों का विवश होकर भी उच्चारण करते हैं वे अनेकों जन्मों के पापों से तत्काल छुटकारा मायादि आवरणों से रहित ब्रह्मपद प्राप्त करते हैं। आप नित्य अजन्मा हैं, मैं आपकी शरण लेता हूँ॥ १५ ॥ भगवन् ! इस विश्ववृक्ष के रूप में आप ही विराजमान हैं। आप ही अपनी मूलप्रकृति को स्वीकार करके जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के लिये मेरे, अपने और महादेवजी के रूप में तीन प्रधान शाखाओं में विभक्त हुए हैं और फिर प्रजापति एवं मनु आदि शाखा-प्रशाखाओं के रूपमें फैलकर बहुत विस्तृत हो गये है। मैं आपको नमस्कार करता हूँ। १६ ॥ भगवन् ! आपने अपनी आराधना को ही लोकों के लिये कल्याणकारी स्वधर्म बताया है, किन्तु वे इस ओर से उदासीन रहकर सर्वदा विपरीत (निषिद्ध) कर्म में लगे रहते हैं। ऐसी प्रमाद की अवस्था में पड़े हुए इन जीवों की जीवन-आशा को जो सदा सावधान रहकर बड़ी शीघ्रता से काटता रहता है, वह बलवान् काल भी आपका ही रूप है; मैं उसे नमस्कार करता हूँ॥ १७॥ यद्यपि मैं सत्यलोक का अधिष्ठाता हूँ, जो दो परार्द्धपर्यन्त रहने वाला और समस्त लोको का वन्दनीय है, तो भी आपके उस कालरूप से डरता रहता हैं। उससे बचने और आपको प्राप्त करने के लिये ही मैंने बहुत समय तक तपस्या की है। आप ही अधियज्ञ रूप से मेरी इस तपस्या के साक्षी हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। १८ ॥ आप पूर्णकाम हैं, आपको किसी विषयसुख की इच्छा नहीं है, तो भी आपने अपनी बनायी हुई धर्ममर्यादा की रक्षा के लिये पशु-पक्षी, मनुष्य और देवता आदि जीवयोनियों में अपनी ही इच्छा से शरीर धारण कर अनेकों लीलाएँ की हैं। ऐसे आप पुरुषोत्तम भगवान को मेरा नमस्कार है॥ १९ ॥ प्रभो ! आप अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश— पाँचों में से किसी के भी अधीन नहीं हैं; तथापि इस समय जो सारे संसार को अपने उदर में लीनकर भयङ्कर तरङ्गमालाओं से विक्षुब्ध प्रलयकालीन जल में अनन्तविग्रह की कोमल शय्या पर शयन कर रहे हैं, वह पूर्वकल्प की कर्मपरम्परा से श्रमित हुए जीवों को विश्राम देने के लिये ही है ॥ २० ॥ आपके नाभिकमलरूप भवन से मेरा जन्म हुआ है। यह सम्पूर्ण विश्व के उदर में समाया हुआ है। आपकी कृपा से ही मैं त्रिलोकी की रचनारूप उपकार में प्रवृत्त हुआ हु। इस समय योगनिद्रा का अन्त हो जाने के कारण आपके नेत्र-कमल विकसित हो रहे हैं, आपको मेरा नमस्कार है। २१ ॥ आप सम्पूर्ण जगत के एकमात्र सुहृद और आत्मा हैं तथा शरणागत पर कृपा करने वाले हैं। अतः अपने जिस ज्ञान और ऐश्वर्य से आप विश्व को आनन्दित करते हैं, उसी से मेरी बुद्धि को भी युक्त करें जिससे मैं पूर्वकल्प के समान इस समय भी जगत् की रचना कर सकूँ । २२ ।। आप भक्तवाञ्छाकल्पतरु हैं। अपनी शक्ति लक्ष्मी के सहित अनेकों गुणावतार लेकर आप जो-जो अद्भुत कर्म करेंगे, मेरा यह जगत् की रचना करने का उद्यम भी उन्हीं से एक है। अतः इसे रचते समय आप मेरे चित्त को प्रेरित करें-शक्ति प्रदान करें, जिससे मैं सृष्टिरचना विषयक अभिमानरूप मल से दूर रह सकूँ ।। २३ ॥ प्रभो ! इस प्रलय कालीन जल में शयन करते हुए आप अनन्तशक्ति परमपुरुष के नाभि-कमल से मेरा प्रादुर्भाव हुआ है और मैं हूँ भी आपकी ही विज्ञान शक्ति; अतः इस जगत् के विचित्र रूप का विस्तार करते समय आपकी कृपा से मेरी वेदरूप वाणी का उच्चारण लुप्त न हो। २४ ॥ आप अपार करुणामय पुराणपुरुष हैं। आप परम प्रेममयी मुसकान के सहित अपने नेत्रकमल खोलिये और शेष-शय्या से उठकर विश्व के उद्भव के लिये अपनी सुमधुर वाणी से मेरा विषाद दूर कीजिये ॥२५॥ श्री मैत्रेय जी कहते हैं-विदुर जी ! इस प्रकार तप, विद्या और समाधि के द्वारा अपने उत्पत्तिस्थान श्रीभगवान् को देखकर तथा अपने मन और वाणी की शक्ति के अनुसार उनकी स्तुति कर ब्रह्माजी थके-से होकर मौन हो गये। २६ ॥ श्री मधुसूदन भगवान ने देखा कि ब्रह्माजी इस प्रलय जल राशि से बहुत घबराये हुए हैं तथा लोकरचना के विषय में कोई निश्चित विचार न होने के कारण उनका चित्त बहुत मित्र है। तब उनके अभिप्राय को जानकर वे अपनी गम्भीर वाणी से उनका खेद शान्त करते हुए कहने लगे। २७-२८ ॥ श्रीभगवान ने कहा-वेदगर्भ ! तुम विषाद के वशीभूत हो आलस्य न करो, सृष्टिरचना के उद्यम में तत्पर हो जाओ। तुम मुझसे जो कुछ चाहते हो, उसे तो मैं पहले ही कर चुका हूँ ।। २९ ॥ तुम एक बार फिर तप करो और भागवत-ज्ञान का अनुष्ठान कर। उनके द्वारा तुम सब लोकों को स्पष्टतया अपने अंतःकरण में देखोगे ॥ ३० ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

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Nikhil Nair Aug 3, 2020

दान से धन एवं मन की शुद्धि 〰️〰️🌸〰️🌸〰️🌸〰️〰️ कलियुग में दान प्रधान है । श्रुति में निर्देश है जो सिर्फ अपने लिये पकाकर खाता है, वह अन्न नहीं खाता, पाप पकाकर खाता है-'केवलाघो भवति केवलादी।' अत: अन्नदान को सर्वोपरि दान कहा गया है। कलियुग का धर्म केवल एक पैर अर्थात् दान के ऊपर टिका हुआ है। ईमानदारी, परिश्रम तथा धर्म अनुसार अर्जित धन-संपत्ति का दान ही पुण्य दायक होता है । लक्ष्मी माता हैं। उनका सत्कर्म के लिये उपयोग तो किया जा सकता है, परंतु सांसारिक सुख-सुविधाओं के लिये-व्यक्तिगत लाभ के लिये उनका उपभोग नहीं किया जाना चाहिये। -अर्थ अमृत है, पर असावधानी से वह जहर भी बन जाता है। जो नीति से आये और जिसका उपयोग रीति से हो, वह अर्थ अमृत है; पर अनीति से अर्जित धन जहर बन जाता है। -यदि धर्म की मर्यादा न रहे तो धन अनर्थ करता है। धन साधन है, धर्म साध्य है। धन कमाना कठिन नहीं है, उसका धर्म-कार्यों सेवा, सहायता, दान आदि में सदुपयोग करना कठिन है। धन का धार्मिक कर्तव्यों-दान, सेवा, गोसेवा-जैसे सत्कर्म में सदुपयोग हो तो वह सुख देता है और विलासिता आदि दुष्कर्मों में उपभोग करने पर तरह-तरह के दुख देता है। ज्ञान दान श्रेष्ठ दान है। अन्नदान और वस्त्रदान कुछ समय के लिये शान्ति प्राप्त होती है, किंतु ज्ञान दान अर्थात जहाँ अध्यात्म ज्ञान का दान होता है, वहाँ सारे तीर्थ आ जाते हैं। दान के नियम और फल 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 👉 दान देने का अधिकार गृहस्थ को दिया गया है। दान में विवेक रखो। इतना दान दो कि गृहस्थ की आवश्यकता की पूर्ति में बाधा न पड़े। 👉 दान से धन की शुद्धि, स्नान से तन की शुद्धि तथा ध्यान से मन की शुद्धि होती है। 👉 जिसका धन शुद्ध नहीं, उसका दान तथा उसकी सहायता स्वीकार नहीं करनी चाहिये। 👉 यदि सत्कर्मों में, धर्म में सम्पत्ति का सदुपयोग करोगे तो लक्ष्मीमाता तुम्हें नारायण की गोद में बिठायेंगी। 👉 धन का दान करते रहने से धन के प्रति ममता कम होती है तथा तन से सेवा करने से देहाभिमान में कमी आती है। 👉 दान देते समय जब तुम लेने वाले को परमात्मा का रूप समझकर दान दो तभी दान सफल-सार्थक होगा। 👉 आँगन में आये याचक को यदि कुछ नहीं मिलता है तो वह घर का पुण्य ले जाता है। 👉 याचका माँगने नहीं आता, वह तो हमको ज्ञान देने आता है कि पूर्वजन्म में मैंने किसी को कुछ दिया नहीं, इसीलिये मैं भिखारी हुआ हूँ। यदि आप भी किसी को कुछ न देंगे तो अगले जन्म में मेरे-जैसे याचक बनेंगे। 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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Ravi Mishra Aug 1, 2020

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