Shyam Sharma
Shyam Sharma Aug 18, 2017

विष्णुपद मंदिर, गयाजी,बिहार - पिंडदान और श्राद्ध.

विष्णुपद मंदिर, गयाजी,बिहार - पिंडदान और श्राद्ध.
विष्णुपद मंदिर, गयाजी,बिहार - पिंडदान और श्राद्ध.

विष्णुपद #मंदिर भारत के गया में स्थित एक प्राचीन हिन्दू मंदिर है। ये हिन्दू मंदिर भगवन विष्णु को समर्पित है।
ये मंदिर फाल्गु नदी के किनारे स्थित है, जहां विष्णु भगवन के पैरो के निशान मौजूद है जिन्हे धर्मशीला के नाम से जाना जाता है और ये निशान बेसाल्ट के एक खंड पर बने हुए है। गया के विष्णुपद मंदिर के पारंपरिक पुजारी सकलद्वीपिया ब्राह्मण है जो गयावार पांडा के रूप में मौजूद है और हज़ारीबाग़ बाग़ जैसे आस पास जिलों में भी कार्य करते है। रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, शंकरदेव और चैतन्य महाप्रभु जैसे कई दिग्गज़ संत इस मंदिर में आ चुके है।
इस मंदिर का निर्माण कब हुआ था इस बात की जानकारी किसी को भी नहीं मिल पाई है। लेकिन ऐसा माना जाता है की राम ने सीता जी के साथ इस स्थान पार अवश्य आये थे। मंदिर की वर्तमान संरचना का निर्माण इंदौर की शासक देवी अहिल्या बाई होल्कर ने सं 1787 में फाल्गु नदी के तट पर करवाया था। विष्णुपद मंदिर के दक्षिण पश्चिम से 1km की दुरी पर ब्रह्मजुनि पहाड़ी है जिसके शीर्ष तक जाने के लिए पत्थर की 1000 सीढ़िया है। यहाँ आने वाले पर्यटक ब्रह्मजुनि पहाड़ी के शीर्ष पर अवश्य जाते है ताकि वे मंदिर के अनुपम दृश्य को ऊपर से देख सके। इस मंदिर के निकट कई छोटे छोटे मंदिर मौजूद है।
धार्मिक दृष्टि से गया न सिर्फ हिन्दूओं के लिए बल्कि बौद्ध धर्म मानने वालों के लिए भी आदरणीय है। बौद्ध धर्म के अनुयायी इसे महात्मा बुद्ध का ज्ञान क्षेत्र मानते हैं जबकि हिन्दू गया को मुक्तिक्षेत्र और मोक्ष प्राप्ति का स्थान मानते हैं।
इसलिए हर दिन देश के अलग-अलग भागों से नहीं बल्कि विदेशों में भी बसने वाले हिन्दू आकर गया में आकर अपने परिवार के मृत व्यकित की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना से श्राद्ध, तर्पण और पिण्डदान करते दिख जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते है की गया को मोक्ष स्थली का दर्ज़ा एक राक्षस गयासुर के कारण मिला है? आज हम आपको गयासुर से संबंधित वही पौराणिक वृतांत बता रह है।
पौराणिक वृतांत
पुराणों के अनुसार गया में एक राक्षस हुआ जिसका नाम था गयासुर। गयासुर को उसकी तपस्या के कारण वरदान मिला था कि जो भी उसे देखेगा या उसका स्पर्श करगे उसे यमलोक नहीं जाना पड़ेगा। ऐसा व्यक्ति सीधे विष्णुलोक जाएगा। इस वरदान के कारण यमलोक सूना होने लगा।अनैतिक व्यक्ति जिन्होंने मोक्ष प्राप्त कर लिया था को रोकने के लिए भगवान विष्णु ने के गयासुर से कहा की तुम पृथ्वी के नीचे चले जाओ और उन्होंने अपना दाहिना पैर असुर के सिर पर रख दिया। गयासुर को पृथ्वी की सतह के नीचे धकेलने के पश्चात, भगवन विष्णु के चरणों के निशान सतह पर रह गए जो आज भी इस मंदिर में मौजूद है। चरणों के इस निशान में 9 विभिन्न सूचक है जैसे शंकम, चक्रम और गधम। इन सभी को भगवान के हथियार माना जाता है। गयासुर को पृथ्वी के नीचे धकेला जा चूका था जो भोजन के लिए निवेदन करता रहता था। भगवान विष्णु ने उसे आशीर्वाद दिया की प्रतिदिन कोई न कोई तुम्हे भोजन अवश्य देगा। जो भी ऐसा करता है उसकी आत्मा सीधे स्वर्ग को जाती है। कहा जाता है जिस दिन गयासुर को भोजन नहीं मिलेगा उस दिन वो धरती के भीतर से बाहर आ जायेगा। प्रतिदिन, भारत के विभिन्न भागो से आने वाले लोग गयासुर के कल्याण के लिए प्रार्थना करते है और उसे भोजन अर्पित करते है।

गयासुर के इस समर्पण से विष्णु भगवान ने वरदान दिया कि अब से यह स्थान गया के नाम से जाना जाएगा। यहां पर पिंडदान और श्राद्ध करने वाले को पुण्य और पिंडदान प्राप्त करने वाले को मुक्ति मिल जाएगी। यहां आकर आत्मा को भटकना नहीं पड़ेगा।
इस मंदिर का निर्माण भगवान विष्णु जी के पदचिह्नों के चारो ओर बनाया गया है ओर ये पदचिह्न मंदिर के केंद्र में स्थित है। हिन्दू धर्म के मुताबिक, ये पद्चिंन्ह उस समय के है जब भगवान विष्णु ने गयासुर की छाती पर पैर रखकर उसे धरती के भीतर धकेल दिया था। विष्णुपद मंदिर के भीतर, भगवान विष्णु का 40 cm लम्बा पदचिह्न है जो एक मजबूत चट्टान पर बना हुआ है और इसके चारो ओर चांदी से जड़ा बेसिन है। इस मंदिर की ऊँचाई 30 meter है और इसमें खूबसूरत नक्काशी वाले स्तंभों की 8 पंक्तिया है जिन्होंने मंडप को सहारा प्रदान किया हुआ है। विष्णुपद मंदिर का निर्माण बड़े बड़े ग्रे ग्रेनाइट ब्लॉक्स द्वारा किया गया हैइस अष्टकोणीय मंदिर का मुख्य पूर्व की ओर है।
ऐसा माना जाता है की इस स्थान पर भगवान बुद्ध ने छः वर्ष तक योग साधना की थी। विष्णुपद मंदिर के भीतर, भगवान विष्णु का 40 cm लम्बा पदचिह्न है जो एक ठोस चट्टान पार बना हुआ है और इसके चारो ओर चांदी से जड़ा बेसिन है।
वहां एक सोने से बन झंडा और सोने से बना कलश है जो मंदिर के शीर्ष पर मौजूद है और हमेशा चमकता रहता है। कहा जाता है की बहुत समय पहले दो चोरो ने मंदिर के शीर्ष पर से सोने के झंडे और कलश को चोरी करने का प्रयास किया था, परन्तु उनमे से एक चोर तो मंदिर के शीर्ष पर पत्थर बन गया और दूसरा पत्थर बनने के कारण ज़मीन पर गिर गया। चोरो के पत्थर आज भी मंदिर में मौजूद है (ये एक मनुष्य के आकार के नहीं अपितु एक सपाट आकृति के है)।

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कामेंट्स

S.B. Yadav Aug 18, 2017
JAI JAISHRI VISHNU BHAGWAN JI KI JAI JAI HO

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