रामानुजाचार्य जी प्रतिदिन नदी पर स्नान करने जाया करते थे। जब वे स्नान करने जाते तो एक ब्राह्मण के कंधे का सहारा लेकर जाते और लौटते समय एक शूद्र के कंधे का सहारा लेते। वृद्धावस्था के कारण उन्हें किसी के सहारे की आवश्यकता है,यह बात तो सभी समझते थे किंतु आते समय ब्राह्मण का और लौटते समय शूद्र का सहारा सबकी समझ से परे था। उनसे इस विषय में प्रश्न करने का साहस भी किसी में न था। सभी आपस में चर्चा करते कि वृद्धावस्था में रामानुजाचार्य जी की बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। नदी स्नान कर शुद्ध हो जाने के बाद अपवित्र शूद्र को छूने से स्नान का महत्व ही भला क्या रह जाता है? शूद्र का सहारा लेकर आएं और स्नान के बाद ब्राह्मण का सहारा लेकर जाएं तो भी बात समझ में आती है। एक दिन एक पंडित से रहा नहीं गया, उसने रामानुजाचार्य जी से पूछ ही लिया- प्रभु आप स्नान करने आते हैं तो ब्राह्मण का सहारा लेते हैं किंतु स्नान कर लौटते समय शूद्र आपको सहारा देता है। क्या यह नीति के विपरीत नहीं है? यह सुनकर आचार्य बोले- भई! मैं तो शरीर और मन दोनों का स्नान करता हूं। ब्राह्मण का सहारा लेकर आता हूं और शरीर का स्नान करता हूं किंतु तब मन का स्नान नहीं होता क्योंकि उच्चता का भा पानी से नहीं मिटता, वह तो स्नान कर शूद्र का सहारा लेने पर ही मिटता है। ऐसा करने से मेरा अहंकार धुल जाता है और सच्चे धर्म के पालन की अनुभूति होती है।

रामानुजाचार्य जी प्रतिदिन नदी पर स्नान करने जाया करते थे। 

जब वे स्नान करने जाते तो एक ब्राह्मण के कंधे का सहारा लेकर जाते और लौटते समय एक शूद्र के कंधे का सहारा लेते। 

वृद्धावस्था के कारण उन्हें किसी के सहारे की आवश्यकता है,यह बात तो सभी समझते थे किंतु आते समय ब्राह्मण का और लौटते समय शूद्र का सहारा सबकी समझ से परे था। 

उनसे इस विषय में प्रश्न करने का साहस भी किसी में न था। 
सभी आपस में चर्चा करते कि वृद्धावस्था में रामानुजाचार्य जी की बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। 

नदी स्नान कर शुद्ध हो जाने के बाद अपवित्र शूद्र को छूने से स्नान का महत्व ही भला क्या रह जाता है? 
शूद्र का सहारा लेकर आएं और स्नान के बाद ब्राह्मण का सहारा लेकर जाएं तो भी बात समझ में आती है। 

एक दिन एक पंडित से रहा नहीं गया, उसने रामानुजाचार्य जी से पूछ ही लिया- प्रभु आप स्नान करने आते हैं तो ब्राह्मण का सहारा लेते हैं किंतु स्नान कर लौटते समय शूद्र आपको सहारा देता है।
क्या यह नीति के विपरीत नहीं है? 

यह सुनकर आचार्य बोले- भई! मैं तो शरीर और मन दोनों का स्नान करता हूं। 

ब्राह्मण का सहारा लेकर आता हूं और शरीर का स्नान करता हूं किंतु तब मन का स्नान नहीं होता क्योंकि उच्चता का भा पानी से नहीं मिटता, वह तो स्नान कर शूद्र का सहारा लेने पर ही मिटता है।
ऐसा करने से मेरा अहंकार धुल जाता है और सच्चे धर्म के पालन की अनुभूति होती है।

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कामेंट्स

🙏 Dilip 🙏 Dec 28, 2018
Jai Shri Krishna Radhe Radhe Shri Krishna Ji ki kirpa aap pe hamesha Bani rahe pranam ji

Ram Kumar yadav Dec 29, 2018
राधे राधे कृष्ण सुप्रभात जय श्री राम जय श्री हनुमान

💞☘️🌿🍃सेवाकुंज💞🍃🌿☘️ श्री कृष्ण का सबसे बड़ा ‘रहस्य’ .. बहुत रहस्यमयी है ये महल, यहां रोज आते हैं कृष्ण छोड़ जाते हैं निशानियां यह स्थान वृंदावन के राधाबल्लभ मंदिर से महज कुछ मीटर की दूरी पर यमुना तट पर बसा सेवाकुंज है। माना जाता है कि यह वही वन है जहां भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ रासलीला का आयोजन किया था। इस वन में मौजूद वृक्षों को देखकर ऐसा लगता है जैसे मनुष्य नृत्य की मुद्रा में हो। मान्यता है कि यह वृक्ष गोपियां हैं जो रात के समय मनुष्य रूप लेकर श्री कृष्ण के साथ रास का आनंद लेती हैं। इस वन की विशेषता है कि शाम ढ़लते ही सभी पशु-पक्षी वन से निकलकर भाग जाते हैं। इस वन के बीचों-बीच एक मंदिर बना हुआ है। मंदिर में हर दिन भगवान की सेज सजाई जाती है और श्रृंगार साम्रगी रख दी जाती है। मान्यता है कि श्री राधा रानी श्रृंगार सामग्री से अपना श्रृंगार करती हैं और भगवान श्री कृष्ण श्री राधा के साथ सेज पर विश्राम करते हैं। अगले दिन भक्तगण इस श्रृंगार सामग्री और सिंदूर को प्रसाद स्वरूप पाकर अपने आपको धन्य मानते हैं। वृंदावन और मथुरा का नाम आते ही दिल और दिमाग में सबसे पहले कृष्ण जी श्री राधा की सुंदर छवि आती है। मथुरा को कृष्ण की जन्म स्थली और नंदगांव को उनका लीला स्थल, बरसाने को राधा जी की नगरी कहा जाता है। वहीं वृंदावन को श्रीकृष्ण और राधा की रास स्थली कहा जाता है। वृंदावन में वैसे तो अनेक मंदिर हैं, लेकिन सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र यहां ‘सेवाकुंज’ को माना जाता है। रास रचाने आते हैं रात में राधा कृष्ण ? धार्मिक नगरी वृंदावन में ‘सेवाकुंज’ एक बहुत ही रहस्यमयी स्थान है। मान्यता है कि ‘सेवाकुंज’ में भगवान श्रीकृष्ण और श्रीराधा आज भी अद्र्धरात्रि के बाद रास रचाते हैं। रास के बाद ‘सेवाकुंज’ परिसर में स्थापित निज मंदिर में शयन करते हैं। धार्मिक नगरी वृन्दावन में ‘सेवाकुंज’ एक अत्यन्त पवित्र, रहस्यमयी धार्मिक स्थान है। निज मंदिर में आज भी प्रसाद (माखन मिश्री) प्रतिदिन रखा जाता है। शयन के लिए सेज सजाया जाता है… सुबह सेज के देखने से प्रतीत होता है कि यहां निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया तथा प्रसाद भी ग्रहण किया है। लगभग दो ढ़ाई एकड़ क्षेत्रफल में फैले सेवाकुंज के वृक्षों की खासियत यह है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिलेंगे तथा इन वृक्षों की डालियां नीचे की ओर झुकी तथा आपस में गुंथी हुई प्रतीत हाते हैं। सेवाकुंज परिसर में ही महाप्रभु श्री हित हरिवंश जी की जीवित समाधि, निज मंदिर, राधाबल्लभ जी का प्राकट्य स्थल, राधारानी बंशी अवतार आदि दर्शनीय स्थान है। ‘सेवाकुंज’ दर्शन के दौरान वृन्दावन के पंडे-पुजारी, गाईड द्वारा ‘सेवाकुंज’ के बारे में जो जानकारी दी जाती है, उसके अनुसार ‘सेवाकुंज’ में प्रतिदिन रात्रि में होने वाली श्रीकृष्ण की रासलीला को देखने वाला अंधा, गूंगा, बहरा, पागल और उन्मादी हो जाता है ताकि वह इस रासलीला के बारे में किसी को बता ना सके। सुबह मिलती है गीली दातून इसी कारण रात्रि 8 बजे के बाद पशु-पक्षी, परिसर में दिनभर दिखाई देने वाले बन्दर, भक्त, गोस्वामी, पुजारी इत्यादि सभी यहां से चले जाते हैं और परिसर के मुख्यद्वार पर ताला लगा दिया जाता है। उनके अनुसार यहां जो भी रात को रुक जाते है वह सांसारिक बन्धन से मुक्त हो जाते हैं और जो मुक्त हो गए हैं, उनकी समाधियां परिसर में ही बनी हुई है। इसी के साथ गाईड यह भी बताते हैं कि ‘सेवाकुंज’ में जो 16108 आपस में गुंथे हुए वृक्ष आप देख रहे हैं, वही रात में श्रीकृष्ण की 16108 रानियां बनकर उनके साथ रास रचाती हैं। रास के बाद श्रीराधा और श्रीकृष्ण परिसर के ही निज महल में विश्राम करते हैं। सुबह 5:30 बजे निज महल का पट खुलने पर उनके लिए रखी दातून गीली मिलती है और सामान बिखरा हुआ मिलता है जैसे कि रात को कोई सेज पर विश्राम करके गया हो। मान्यता है कि सेवाकुंज का हर एक वृक्ष गोपी है। रात को जब यहां श्रीकृष्ण-राधा सहित रास के लिए आते हैं तो ये सारे पेड़ जीवन्त होकर गोपियां बन जाते हैं और सुबह फिर से पेड़ बन जाते हैं। इसलिए इस वन का एक भी पेड़ सीधा नहीं है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि इस क्षेत्र में 16108 पेड़ हैं, जो कि कृष्ण की 16108 हजार रानियां हैं ☘️🌿🍃💞 *बोलो सेवाकुंज वाली की जय*💞🍃🌿☘️

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💝*#ब्रज_की_छाछ_की_महिमा*💝 एक बार जब भगवान श्री कृष्ण लीला कर रहे तो ब्रह्मा शिव इंद्र इत्यादि सब देवता ठाकुर जी के निकट आये क्या देखा कि ठाकुर जी अपने पीछे कुछ छुपा रहे है ! तब देवता बोले - प्रभु आप क्या छुपा रहे हो ? भगवान चुपचाप खड़े रहे हाथ में एक पात्र रखा है और उसको पीछे छुपा रखा है !देवताओ ने फिर पूछा -प्रभु आप क्या छुपा रहे हो तो भगवान धीरे से बोले -देखो आप किसी को बताना नहीं ये जो पात्र है ना इसमें बड़ी मुश्किल से आज मैं कहीं से छाछ लेकर आया हूँ ! देवता बोले -फिर प्रभु छुपा क्यों रहे हो क्या ये बहुत कीमती है ? भगवान बोले -अब इसकी कीमत मैं क्या बताऊँ ? तो देवता बोले -प्रभु आप जो अनंत कोटि ब्रम्हाण्ड नायक है आप इस छाछ को छुपा रहे है तो ये तो अनमोल होगी तो प्यारे एक घूंट हमे भी मिल जाये आप कृपा कर दो ताकि एक घूंट हम भी पी सके ! भगवान बोले -नहीं-२ देवताओ ये छाछ तुम्हारे सौभागय में नहीं है तुम स्वर्ग का अमृत पी सकते हो पर ब्रजवासियो की छाछ तो मैं ही पियूँगा तुम जाओ यहाँ से स्वर्ग का अमृत पीओ पर ये छाछ मैं आपको नहीं दे सकता हूँ ! देवता बोले -प्रभु ऐसी कौन सी अनमोल बात है इस छाछ में जो हम नहीं पी सकते है आप कह रहे हो कि हम अमृत पिये तो क्या ये छाछ अमृत से भी बढ़कर है ? अरे छाछ तो छाछ है इसमें क्या बड़ी बात है ! इतना सुना तो ठाकुर जी आँखों में आँसू भरकर बोले -देवताओ तुम्हे नहीं पता इस छाछ को पाने के लिये मुझे गोपिन के सामने नृत्य करना पड़ा है जब मैं नाचा हूँ तब मुझे ये छाछ मिला है : !! ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भर छाछ पर नाच नचावे !! तो कुछ तो बात होगी ही ना गोपियों के प्रेमवश बनाये इस छाछ में में जो इसे पाने के लिये ठाकुर जी को नाचना पड़ा वस्तुतः भक्त के निःस्वार्थ ह्रदय की गहराईयों से निसृत भजन ही भगवान का भोजन है परमात्मा इसे ही प्रेमवश भोग लगाया करते है !! हरि के सब आधीन पै, हरी प्रेम आधीन !! याही ते हरि आपु ही, याहि बड़प्पन दीन !! जय जय श्री राधे कृष्णा जी

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*श्रीहरिनाम चिन्तामणि* भाग 24 *अध्याय15* *भजन प्रणाली* श्रीगदाधर पंडित जी, श्रीगौरांग महाप्रभु जी व श्रीमती जान्हवा देवी के प्राणस्वरूप श्रीनित्यानन्द प्रभु जी की जय हो, श्रीसीतापति श्रीअद्वैताचार्य जी तथा श्रीवास आदि सभी गौर भक्तों की जय हो! जय हो ! जय हो!अन्य सभी पथों का परित्याग करके जो हरिनाम का जप या संकीर्तन करता है ऐसे भक्त की जय हो ! जय हो! श्रीमन महाप्रभु जी बोले हे हरिदास! आपने इस पृथ्वी पर भक्ति के बल से दिव्य ज्ञान को प्राप्त किया है । चारों वेद आपकी जिव्हा पर नित्य नृत्य करते हैं तथा मैं आपकी कथा में सारे सुसिद्धान्तों को अनुभव करता हूँ। *नाम रस की जिज्ञासा* महाप्रभु जी बोले हे हरिदास! अब मुझे यह बताइए कि हरिनाम रस कितनी प्रकार के हैं और अधिकार के अनुसार साधकों को किस प्रकार प्राप्त होंगे । हरिनाम के प्रेम में विभोर होकर नामाचार्य श्रीहरिदास ठाकुर जी निवेदन करते हुए श्रीमहाप्रभु जी से कहते हैं कि हे गौरहरि ! आपकी प्रेरणा के बल से ही मैं इसका वर्णन करूंगा। शुद्ध तत्व तथा पर तत्व के रूप में जो वस्तु सिद्ध है , वो रस के नाम से वेदों में प्रसिद्ध है। वह रस अखंड है , परब्रह्म तत्व है । यह चरम वस्तु असीम आनन्द का समुद्र है। शक्ति तथा शक्तिमान रूप से यह परमतत्व विद्यमान है। शक्ति तथा शक्तिमान रूप से इसमें कोई भेद नहीं है। केवल दर्शन में भेद दिखाई देता है। शक्तिमान अदृश्य से है जबकि शक्ति इसे प्रकाशित करती है। तीनों प्रकार की शक्ति (चित्त, जीव तथा माया शक्ति) ही विश्व को प्रकाशित करती है। *चित्त शक्ति के द्वारा वस्तु का प्रकाश* चित्त शक्ति के रूप में वस्तु का रूप, वस्तु का नाम, वस्तु का धाम, वस्तु की क्रिया तथा वस्तु का स्वरूप आदि प्रकाशित होते हैं। श्रीकृष्ण ही वह परम वस्तु हैं तथा उनका वर्ण श्याम है।गोलोक, मथुरा, वृन्दावन आदि श्रीकृष्ण के धाम हैं जहां वह अपनी लीला प्रकट करते हैं। श्रीकृष्ण के नाम , रूप, लीला, धाम इत्यादि जो भी हैं सबके सब अखण्ड तथा अद्वय ज्ञान के अंतर्गत हैं।श्रीकृष्ण में जितनी भी विचित्रता है ये सब परा शक्ति के द्वारा ही की गई है। श्रीकृष्ण धर्मी हैं जबकि श्रीकृष्ण की परा शक्ति ही उनका नित्य धर्म है। धर्म तथा धर्मी में कोई भेद नहीं है। दोनो ही अखण्ड तथा अद्वय हैं। ये दोनों अभेद होते हुए भी विचित्र विशेषता के द्वारा इनमें भेद दिखाई पड़ता है। इस प्रकार की विशेषता केवल चिद जगत में दिखाई पड़ती है। *माया शक्ति का स्वरूप* जो छाया शक्ति श्रीकृष्ण की इच्छा से सारे विश्व का सृजन करती है , उस शक्ति को माया शक्ति के नाम स जाना जाता है। *जीव शक्ति* भेदाभेदमयी जीव शक्ति अर्थात भगवान श्रीकृष्ण की तटस्था शक्ति श्रीकृष्ण की सेवा के उद्देश्य से जीवों को प्रकाशित करती है। *दो प्रकार की दशा वाले जीव* जीव दो प्रकार के हैं - नित्य बद्ध तथा नित्य मुक्त। नित्य मुक्त जीवों का नित्य ही श्रीकृष्ण सेवा में अधिकार होता है जबकि नित्य बद्ध जीव माया के द्वारा संसार में फंस जाते हैं।जिनमें भी बहिर्मुखी तथा अंतर्मुखी दो प्रकार के विभाग हैं। जो अंतर्मुखी जीव हैं , वह साधु सँग के द्वारा श्रीकृष्ण नाम को प्राप्त करते हैं और श्रीकृष्ण नाम के प्रभाव से श्रीकृष्ण के धाम को जाते हैं। *रस और रस का स्वरूप* भगवान श्रीहरि ही अखण्ड रस के भंडार हैं और उस रस रूपी फूल की कली हरिनाम थोड़ी सी प्रस्फुटित हुई कली का रूप अति मनोहर होता है । गोलोक वृन्दावन में भी यही रूप श्यामसुंदर के रूप में विद्यमान है। प्रभु के 64 गुण उस कली की सुंगन्ध हैं , वे गुण ही भगवान के नाम के तत्व को पूरे जगत में प्रकाशित करते हैं। श्रीकृष्ण की लीला पूरी तरह से खिले हुए फूल के समान है । यह भगवत लीला प्रकृति से परे है , नित्य है तथा आठों पहर चलती है। *भक्ति का स्वरूप* जीवों पर हरिनाम की कृपा होने से यह कृपा संचित शक्ति और आह्लादिनी शक्ति के समावेश से भक्ति के रूप में जीव के हृदय में प्रवेश करती है। *भक्ति क्रिया* वही सर्वेश्वरी शक्ति अर्थात भक्ति जीवों के हृदय में आविर्भूत होकर श्रीकृष्ण नाम के रसों की सारी सामग्री को प्रकाशित करती है। जीव भक्ति के प्रभाव से अपने चिन्मय स्वरूप को प्राप्त करता है और फिर उसी शक्ति के द्वारा ही उसमें रस प्रकाशित होता है। *रस के विभाव आलम्बन* रस के विभिन्न आलम्बन के विषय तो परमधन स्वरूप श्रीकृष्ण हैं एवम आश्रय उनके भक्त हैं । जब भक्त सदा ही हरिनाम लेता है तब हरिनाम की कृपा से वह भगवान के रूप, लीला , गुण आदि का आस्वादन करता है।क्रमशः जय निताई जय गौर

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Mamta Chauhan Apr 17, 2019

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Raj Apr 17, 2019

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Geeta Sharma Apr 18, 2019

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Raj Apr 17, 2019

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Raj Apr 17, 2019

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