Mahesh Limje
Mahesh Limje Aug 11, 2017

संकष्ट चतुर्थी च्या शुभेच्छा 💐💐💐💐💐

संकष्ट चतुर्थी च्या शुभेच्छा 💐💐💐💐💐

#गणेशजी

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Shankaranand Hakare Anekal Aug 11, 2017
Gajananam Bhoot Ganadishevitham Kapidvjumbhu Falasar Bhakshitham Umasutham Shokavinashakaranam Namami Vignesvara Pad Pankajam 💙

Dheerendra Gupta Feb 27, 2021

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Geeta Feb 26, 2021

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. सत्पुरूषों का उपहास उचित नहीं एक समयकी बात है। नवयौवन सम्पन्ना तुलसीदेवी नारायणपरायण हो तपस्या के निमित्त से तीर्थो में भ्रमण करती हुई गंगा-तट पर जा पहुँचीं। वहाँ उन्होंने गणेश को देखा, जो किशोरवय और नवयौवन से सम्पन्न थे; वे अत्यन्त सुन्दर, शुद्ध और पीताम्बर धारण किये हुए थे; उनके सारे शरीर में चन्दन का आलेप लगा था; वे रत्नो के आभूषणों से विभूषित थे। सुन्दरता जिनके मन का अपहरण नहीं कर सकती; जो कामना रहित, जितेन्द्रियों में सर्वश्रेष्ठ और योगीन्द्रों के गुरु-के-गुरु हैं तथा मन्द-मन्द मुसकराते हुए जन्म, मृत्यु और बुढ़ापा का नाश करने वाले श्रीकृष्ण के चरणकमलों का जो ध्यान कर रहे थे; ऐसे उन पार्वती नन्दन को देखते ही तुलसी का मन गणेश की ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी उनसे लम्बोदर तथा गजमुख होने का कारण पूछकर उनका उपहास करने लगी। ध्यान-भग होने पर गणेशजी ने पूछा-''वत्से! तुम कौन हो ? किसकी कन्या हो ? यहाँ तुम्हारे आने का क्या कारण है? माता! यह मुझे बतलाओ; क्योंकि शुभे! तपस्वियों का ध्यान भंग करना सदा पाप जनक तथा अमंगलकारी होता है। शुभे! श्रीकृष्ण कल्याण करें, कृपानिधि विघ्न का विनाश करें और मेरे ध्यान- भंग से उत्पन्न हुआ दोष तुम्हारे लिये अमंगलकारक न हो। इस पर तुलसी ने कहा- 'प्रभो! मैं धर्मात्मज की नवयुवती कन्या हूँ और तपस्या में संलग्न हूँ। मेरी यह तपस्या पति-प्राप्ति के लिये है; अतः आप मेरे स्वामी हो जाइये। तुलसी की बात सुनकर अगाध बुद्धिसम्पन्न गणेश श्रीहरि का स्मरण करते हुए विदुषी तुलसी से मधुरवाणी में बोले। गणेश ने कहा- 'हे माता! विवाह करना बड़ा भयंकर होता है; अतः इस विषय में मेरी बिलकुल इच्छा नहीं है; क्योंकि विवाह दुःख का कारण होता है, उससे सुख कभी नहीं मिलता। यह हरि-भक्ति का व्यवधान, तपस्या के नाश का कारण, मोक्ष द्वार का किवाड़, भव-बन्धन की रस्सी, गर्भवास कारक, सदा तत्त्वज्ञान का छेदक और संशयों का उद्गम स्थान है। इसलिये महाभागे ! मेरी ओर से मन लौटा लो और किसी अन्य पति की तलाश करो।' गणेश के ऐसे वचन सुनकर तुलसी को क्रोध आ गया। तब वह साध्वी गणे शको शाप देते हुए बोली-'तुम्हारा विवाह होगा।' यह सुनकर शिव-तनय सुरश्रेष्ठ गणेश ने भी तुलसी को शाप दिया- 'देवि! तुम निस्सन्देह असुर द्वारा ग्रस्त होओगी। तत्पश्चात् महापुरुषों के शाप से तुम वृक्ष हो जाओगी।' गणेश के शाप से वह चिरकाल तक शंखचूड की प्रिय पत्नी बनी रही। तदनन्तर असुरराज शंखचूड शंकरजी के त्रिशूल से मृत्यु को प्राप्त हो गया, तब नारायण प्रिया तुलसी कलांश से वृक्ष भाव को प्राप्त हो गयी। इसलिये सत्पुरुषों के प्रति उपहास पूर्ण व्यवहार नहीं करना चाहिये। [ब्रह्मवैवर्तपुराण] कल्याण (९५/०२) ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" *********************************************

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Geeta Feb 25, 2021

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