Babita Sharma
Babita Sharma Oct 16, 2017

दिवाली की पौराणिक कहानी और उसके पीछे छिपा तात्पर्य।

दिवाली की पौराणिक कहानी और उसके पीछे छिपा तात्पर्य।

दीपावली पर प्रचलित है लक्ष्मी जी की यह पौराणिक कथा

हमारी लोक संस्कृति में दीपावली त्योहार और माता लक्ष्मी की बड़ी सौंधी सी कथा प्रचलित है। एक बार कार्तिक मास की अमावस को लक्ष्मीजी भ्रमण पर निकलीं। चारों ओर अंधकार व्याप्त था। वे रास्ता भूल गईं। उन्होंने निश्चय किया कि रात्रि वे मृत्युलोक में गुजार लेंगी और सूर्योदय के पश्चात बैकुंठधाम लौट जाएंगी, किंतु उन्होंने पाया कि सभी लोग अपने-अपने घरों में द्वार बंद कर सो रहे हैं। 

तभी अंधकार के उस साम्राज्य में उन्हें एक द्वार खुला दिखा जिसमें एक दीपक की लौ टिमटिमा रही थी। वे उस प्रकाश की ओर चल दीं। वहां उन्होंने एक वृद्ध महिला को चरखा चलाते देखा। रात्रि विश्राम की अनुमति मांग कर वे उस बुढ़िया की कुटिया में रुकीं। 

 

वृ्द्ध महिला लक्ष्मीदेवी को बिस्तर प्रदान कर पुन: अपने कार्य में व्यस्त हो गई। चरखा चलाते-चलाते वृ्‍द्धा की आंख लग गई। दूसरे दिन उठने पर उसने पाया कि अतिथि महिला जा चुकी है किंतु कुटिया के स्थान पर महल खड़ा था। चारों ओर धन-धान्य, रत्न-जेवरात बिखरे हुए थे।

 

कथा की फलश्रुति यह है कि मां लक्ष्मीदेवी जैसी उस वृद्धा पर प्रसन्न हुईं वैसी सब पर हों। और तभी से कार्तिक अमावस की रात को दीप जलाने की प्रथा चल पड़ी। लोग द्वार खोलकर लक्ष्मीदेवी के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे।

किंतु मानव समाज यह तथ्य नहीं समझ सका कि मात्र दीप जलाने और द्वार खोलने से महालक्ष्मी घर में प्रवेश नहीं करेंगी। बल्कि सारी रात परिश्रम करने वाली वृद्धा की तरह कर्म करने पर और अंधेरी राहों पर भटक जाने वाले पथिकों के लिए दीपकों का प्रकाश फैलाने पर घरों में लक्ष्मी विश्राम करेंगी। ध्यान दिया जाए कि वे विश्राम करेंगी, निवास नहीं। क्योंकि लक्ष्मी का दूसरा नाम ही चंचला है। अर्थात् अस्थिर रहना उनकी प्रकृति है।

 

इस दीपोत्सव पर कामना करें कि राष्ट्रीय एकता का स्वर्णदीप युगों-युगों तक अखंड बना रहे। हम ग्रहण कर सकें नन्हे-से दीप की कोमल-सी बाती का गहरा-सा संदेश कि बस अंधकार को पराजित करना है और नैतिकता के सौम्य उजास से भर उठना है। 

 

।। न क्रोधो न च मात्सर्य

न लोभो ना शुभामति:

भवन्ति कृत पुण्यानां

भक्तानां सूक्त जापिनाम्।।

 

अर्थात् लक्ष्मी सूक्त का पाठ करने वाले की क्रोध, मत्सर, लोभ व अन्य अशुभ कर्मों में वृत्ति नहीं रहती। वे सत्कर्मों की ओर प्रेरित होते हैं।

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कामेंट्स

Babita Sharma Oct 16, 2017
@shubham.maharaj this is reality bro mn to aapka profile check karti rahti hu ye achhi baat h aap busy rahte hi rahna bhi chahiye aur is sister ki wish hai festive season mn ki Maa laxmi ki kripa rahe aao pr lekin kabhi tym nikal kr post bhi kr dn. Good evening brother

Omprakash Sahu Oct 16, 2017
जय माता लक्ष्मी बहुत सुन्दर दीवाली का ज्ञान पोस्ट किय है मेम शु भ रात्री जी

GOODBYE. Shubham maharaj.. Oct 17, 2017
@babita.sharma.2 Thanx a lot sister.Maa Lakshmi aapko aur aapke parivaar ko bhi baht khush rakhein.Definitely I will post free hoker.I too love your posts Sister .Isliye post karne ki zarurt hi nahi padti.haha.Aapki posts itni achi aur complete hoti hain.But I will post when I will be free.Thanx a lot.God bless you Sister

Rajkumar Agarwal Jan 22, 2020

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Jay Shree Krishna Jan 22, 2020

🌸 विष्णुपुराण में माता लक्ष्मी का वर्णन विष्णुपुराण के अनुसार लक्ष्मीजी भृगु और अत्रि की पुत्री हैं। वे स्वर्ग मे रहते थे। दुर्वाषा ऋ षि के श्राप के कारण उन्होंने स्वर्ग छोड़ दिया और क्षीरसागर को अपना घर बनाया। समुद्र मंथन के समय लक्ष्मी पुन: प्रकट हुईं और उनका विवाह भगवान विष्णु के साथ हुआ। लक्ष्मी ही भगवान विष्णु की शक्ति एवं माया हैं। कुछ जगहों पर लक्ष्मीजी के दो रूपों की मूर्तियां भी स्थापित की जाती हैं- भूदेवी और श्रीदेवी। दोनों रूपों की मूर्तियां विष्णु भगवान के दोनो ओर होती है। भूदेवी जीवनदायी धरती माता का रूप हैं तो वहीं पर श्रीदेवी धन-धान्य एवं बुद्धि प्रदान करने वाली हैं। दोनों ही भगवान विष्णु के साथ रहती हैं। कुछ लोग इनको अलग-अलग समझते हैं, वास्तव में दोनों लक्ष्मी के ही रूप हैं। *𖣔 जहां माता लक्ष्मी का वास होता है 𖣔* धन, सम्पन्नता, सुख व खुशी की कामना रखने वाले सभी व्यक्ति माता लक्ष्मी की पूजा करते हंै। ऎसा विश्वास किया जाता है कि माता लक्ष्मी का प्रवेश सिर्फ उन्हीं घरों मे होता है जो स्वच्छ और साफ होते हंै, जहां गन्दगी नहीं होती है, जहां के परिवारजन मेहनती व सेवाभावी होते हंै। याद रखें लक्ष्मी वहां कभी नहीं जातीं जहां पर गंदगी होगी और लोग आलसी-कामचोर, घमंडी व क्रोधी होंगे। जहां पर महिलाओं-बच्चों का सम्मान नहीं होगा। मां लक्ष्मी उनसे भी नाराज होती हैं जो शंकालु, परिवर्तन से डरने वाले, डरपोक एवं स्वार्थी (सिर्फ अपने लिए ही धन इकट्ठा करने वाले) होते हैं। साधारणतया हम अपने घरों की बाहरी सफाई करते हैं, रंग-रोशनी करवाते हैं, घरों को सजाते भी हैं किन्तु अपनी अंतरात्मा को पवित्र और शुद्ध नहीं रखते हैं। हमारा ह्वदय क्रोध, ईष्र्या, लोभ, लालच, असीमित इच्छाओं, घृणा, राग-द्वेष, छल-कपट आदि से भरा रहता है। हम जब तक अपनी आत्मा को इन दुर्गुणों से मुक्त नहीं करेंगे मां लक्ष्मी हमारे घर में प्रवेश नहीं करेगी। मां लक्ष्मी उन्हें पसंद करती हैं जो रचनात्मक सोच रखते हैं, जिनके पास एक कार्य योजना है, सब के सहयोग से काम करते हैं, सभी की मदद करते हैं, खुद खुश रहते हैं और अन्य को भी खुशी देते हैं, गरीबों की मदद करते हैं, किसी की उपेक्षा और अपमान नहीं करते और जीवन मे हुए हर परिवर्तन को दिल से स्वीकार करते हैं। यह भी एक सत्य है कि जहां बुद्धीजीवियों का अपमान होता है वहां लक्ष्मी निवास नहीं करती है। माता लक्ष्मीजी का वाहन माता लक्ष्मी का वाहन उल्लू है, उल्लू दिन मे सोता है ओर रात मे जागता है। माता लक्ष्मी की छवि विष्णुप्रिया माता लक्ष्मी को अत्यंत प्रियशील, सुंदर कमल के फूल पर विराजमान, भव्य हीरे-जवाहरात धारण किये हुए एवं सुंदर परिधानयुक्तचार भुजा वाली देवी के रूप में माना जाता है। माता के मुख मंडल से प्रेम, शांति तथा कृपा की आभा झलकती रहती है। *𖣔 श्रीरूप लक्ष्मी रूप 𖣔* ये दो होकर भी एक हैं और एक होकर भी दो हैं। दोनों ही रूपों में ये भगवान विष्णु की पत्नी हैं। इनकी थोड़ी-सी कृपा प्राप्त करके व्यक्ति वैभववान हो जाता है। भगवती लक्ष्मी कमलवन में निवास करती हैं, कमल पर बैठती हैं और हाथ में कमल ही धारण करती हैं। समस्त सम्पत्तियों की अधिष्ठात्री श्रीदेवी शुद्ध सत्त्वमयी हैं। विकार और दोषों का वहाँ प्रवेश भी नहीं है। भगवान जब-जब अवतार लेते हैं, तब-तब भगवती महालक्ष्मी भी अवतीर्ण होकर उनकी प्रत्येक लीला में सहयोग देती हैं। इन्हें धन की देवी माना जाता है और नित्य लक्ष्मी जी का भजन पूजन और लक्ष्मी जी की आरती करते हैं। इनके आविर्भाव (प्रकट होने) की कथा इस प्रकार है- *𖣔 कथा 𖣔* महर्षि भृगु की पत्नी ख्याति के गर्भ से एक त्रिलोक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई। वह समस्त शुभ लक्षणों से सुशोभित थी। इसलिये उसका नाम लक्ष्मी रखा गया। धीरे-धीरे बड़ी होने पर लक्ष्मी ने भगवान नारायण के गुण-प्रभाव का वर्णन सुना। इससे उनका हृदय भगवान में अनुरक्त हो गया। वे भगवान नारायण को पतिरूप में प्राप्त करने के लिये समुद्र तट पर घोर तपस्या करने लगीं। उन्हें तपस्या करते-करते एक हज़ार वर्ष बीत गये। उनकी परीक्षा लेने के लिये देवराज इन्द्र भगवान विष्णु का रूप धारण करके लक्ष्मी देवी के पास आये और उनसे वर माँगने के लिये कहा- लक्ष्मी जी ने उनसे विश्वरूप का दर्शन कराने के लिये कहा। इन्द्र वहाँ से लज्जित होकर लौट गये। अन्त में भगवती लक्ष्मी को कृतार्थ करने के लिये स्वयं भगवान विष्णु पधारे। भगवान ने देवी से वर माँगने के लिये कहा। उनकी प्रार्थना पर भगवान ने उन्हें विश्वरूप का दर्शन कराया। तदनन्तर लक्ष्मी जी की इच्छानुसार भगवान विष्णु ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। *𖣔 लक्ष्मी देवी दूसरी कथा 𖣔* लक्ष्मी जी के प्रकट होने का दूसरी कथा इस प्रकार है- एक बार महर्षि दुर्वासा घूमते-घूमते एक मनोहर वन में गये। वहाँ एक विद्याधरी सुन्दरी ने उन्हें दिव्य पुष्पों की एक माला भेंट की। माला लेकर उन्मत्त वेशधारी मुनि ने उसे अपने मस्तक पर डाल लिया और पुन: पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे। इसी समय दुर्वासा जी को देवराज इन्द्र दिखायी दिये। वे ऐरावत पर चढ़कर आ रहे थे। उनके साथ अन्य देवता भी थे। महर्षि दुर्वासा ने वह माला इन्द्र को दे दी। देवराज इन्द्र ने उसे लेकर ऐरावत के मस्तक पर डाल दिया। ऐरावत ने माला की तीव्र गन्ध से आकर्षित होकर उसे सूँड़ से उतार लिया और अपने पैरों तले रौंद डाला। माला की दुर्दशा देखकर महर्षि दुर्वासा क्रोध से जल उठे और उन्होंने इन्द्र को श्री भ्रष्ट होने का शाप दे दिया। उस शाप के प्रभाव से इन्द्र श्री भ्रष्ट हो गये और सम्पूर्ण देवलोक पर असुरों का शासन हो गया। समस्त देवता असुरों से संत्रस्त होकर इधर-उधर भटकने लगे। ब्रह्मा जी की सलाह से सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गये। भगवान विष्णु ने उन लोगों को असुरों के साथ मिलकर क्षीरसागर को मथने की सलाह दी। भगवान की आज्ञा पाकर देवगणों ने दैत्यों से सन्धि करके अमृत-प्राप्ति के लिये समुद्र मंथन का कार्य आरम्भ किया। मन्दराचल की मथानी और वासुकि नाग की रस्सी बनी। भगवान विष्णु स्वयं कच्छपरूप धारण करके मन्दराचल के आधार बने। इस प्रकार मन्थन करने पर क्षीरसागर से क्रमश: कालकूट विष, कामधेनु, उच्चैश्रवा नामक अश्व, ऐरावत हाथी, कौस्तुभमणि, कल्पवृक्ष, अप्सराएँ, लक्ष्मी, वारुणी, चन्द्रमा, शंख, शांर्ग धनुष, धन्वंतरि और अमृत प्रकट हुए। क्षीरसमुद्र से जब भगवती लक्ष्मी देवी प्रकट हुईं, तब वे खिले हुए श्वेत कमल के आसन पर विराजमान थीं। उनके श्री अंगों से दिव्य कान्ति निकल रही थी। उनके हाथ में कमल था। लक्ष्मी जी का दर्शन करके देवता और महर्षि गण प्रसन्न हो गये। उन्होंने वैदिक श्रीसूक्त का पाठ करके लक्ष्मी देवी का स्तवन किया। सबके देखते-देखते वे भगवान विष्णु के पास चली गयीं। माँ का जयकारा लगाकर जय श्री लक्ष्मी नारायण जय विष्णुप्रिया माता लक्ष्मी जय श्री गणेश जय माँ सरस्वती 🙏 जय माँ महालक्ष्मी जी🙏

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Rajkumar Agarwal Jan 22, 2020

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PDJOSHI Jan 21, 2020

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