Shanti pathak
Shanti pathak Apr 16, 2021

*जय माता दी* *शुभरात्रि वंदन*. एक गरीब विधवा के पुत्र ने एक बार अपने राजा को देखा। राजा को देख कर उसने अपनी माँ से पूछा- माँ! क्या कभी मैं राजा से बात कर पाऊँगा? माँ हंसी और चुप रह गई। पर वह लड़का तो निश्चय कर चुका था। उन्हीं दिनों गाँव में एक संत आए हुए थे। तो युवक ने उनके चरणों में अपनी इच्छा रखी। संत ने कहा- अमुक स्थान पर राजा का महल बन रहा है, तुम वहाँ चले जाओ और मजदूरी करो। पर ध्यान रखना, वेतन न लेना। अर्थात् बदले में कुछ माँगना मत। निष्काम रहना। वह लड़का गया। वह मेहनत दोगुनी करता पर वेतन न लेता। एक दिन राजा निरीक्षण करने आया। उसने लड़के की लगन देखी। प्रबंधक से पूछा- यह लड़का कौन है, जो इतनी तन्मयता से काम में लगा है? इसे आज अधिक मजदूरी देना। प्रबंधक ने विनय की- महराज! इसका अजीब हाल है, दो महीने से इसी उत्साह से काम कर रहा है। पर हैरानी यह है कि यह मजदूरी नहीं लेता। कहता है मेरे घर का काम है। घर के काम की क्या मजदूरी लेनी? राजा ने उसे बुला कर कहा- बेटा! तूं मजदूरी क्यों नहीं लेता? बता तूं क्या चाहता है? लड़का राजा के पैरों में गिर पड़ा और बोला- महाराज! आपके दर्शन हो गए, आपकी कृपा दृष्टि मिल गई, मुझे मेरी मजदूरी मिल गई। अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए। राजा उसे मंत्री बना कर अपने साथ ले गया। और कुछ समय बाद अपनी इकलौती पुत्री का विवाह भी उसके साथ कर दिया। राजा का कोई पुत्र था नहीं, तो कालांतर में उसे ही राज्य भी सौंप दिया। लोकेशानन्द कहता है कि भगवान ही राजा हैं। हम सभी भगवान के मजदूर हैं। भगवान का भजन करना ही मजदूरी करना है। संत ही मंत्री है। भक्ति ही राजपुत्री है। मोक्ष ही वह राज्य है। हम भगवान के भजन के बदले में कुछ भी न माँगें तो वे भगवान स्वयं दर्शन देकर, पहले संत बना देते हैं और अपनी भक्ति प्रदान कर, कालांतर में मोक्ष ही दे देते हैं। वह लड़का सकाम कर्म करता, तो मजदूरी ही पाता, निष्काम कर्म किया तो राजा बन बैठा। यही सकाम और निष्काम कर्म के फल में भेद है। "तुलसी विलम्ब न कीजिए, निश्चित भजिए राम। जगत मजूरी देत है, क्यों राखे भगवान॥" भक्त कैसा होता है.....? रसिकाचार्य कृपा-पूर्वक बता रहे थे कि यदि कोई संत प्रसन्न होकर कहे कि बोलो - "क्या चाहते हो? श्रीहरि का दर्शन अथवा श्रीहरि का विरह? सोचोगे, क्या पूछ बैठे? बड़ी सरल सी बात है कि श्रीहरि का दर्शन ! जब अभी दुर्लभ-दर्शन सुलभ है तो अब चिंतन को बचा क्या? किन्तु जो सच्चा भक्त होगा, जो वास्तव में ही बाबरा होगा, वही कह सकेगा कि विरह ! क्यों? अभी क्षुधा/भूख लगी ही नहीं तो देव-दुर्लभ भोग-पदार्थों में रस कैसे मिलेगा? तृप्ति कैसे होगी? पहले भूख तो लगे तब पदार्थ में रस आवेगा, तृप्ति होवेगी सो कृपया आप मुझे श्रीहरि का विरह दे दीजिये जो प्रतिक्षण बढ़ता ही रहे। एक दिन ऐसा आ जाये कि मैं उनकी प्रतिक्षण स्मृति के बिना जीवित ही न रह सकूँ। विरह और मिलन ! नदी हजारों किलोमीटर का रास्ता दौड़ते-भागते, बाधाओं से टकराते हुए करती है; यही विरह है ! एक ही धुन ! एक ही लक्ष्य ! हम बड़े चतुर हैं; श्रीहरि से मिलन तो चाहते हैं किन्तु बड़ी ही सावधानी बरतते हैं कि कही ऐसा न हो जावे कि हम खो जावें। दो नावों पर सवार को श्रीहरि-कृपा का दर्शन तो हो सकता है किन्तु प्राप्ति न हो सकेगी। हमें भौतिक संपदा और कुटुंबीजनों में आसक्ति अधिक है, श्रीहरि में कम। सब कुछ बना रहे और श्रीहरि भी मिल जावें तो सोने में सुहागा। सब चला जावे और वे मिल जावें तो क्या लाभ? यही कारण है कि प्रवचन करना, सुनना सरल है किन्तु उसे आचरण में लाना कठिन और जब तक आचरण में ही न उतरी तो कथा-सत्संग का कैसा लाभ? यही कहते हैं कि उन्होंने प्रवचन में बड़ी सुंदर बात कही। अरे बात सुंदर होती तो कहना न पड़ता; वह तो आचरण में उतरनी चाहिये। भक्ति सरल है, सरल के लिये किन्तु सरल होना बड़ा कठिन है ! प्राण-प्रियतम के अतिरिक्त अब किसी की सुधि नहीं; जगत में जो भी है, वह उन्हीं का। जब वे ही कर रहे हैं, वे ही कह रहे हैं तो मान-अपमान कैसा और किसका? खेल तो खेल है ! इसीलिये कहते हैं कि भक्ति करे कोई सूरमा, जाति-बरन-कुल खोय। अपने पास श्रीहरी की कृपा से जो कुछ है वह और स्वयं को जो श्रीहरि के श्रीचरणारविन्द में सहर्ष न्यौछावर करने को प्रस्तुत है, यह मार्ग उनके लिये है। इस मार्ग पर कोई भौतिक-संपदा प्राप्त होगी, इस भ्रम में मत रहना। यह तो जान-बूझकर लुटने वालों की गली है; यहाँ वे ही आवें जिन्हें सर्वस्व लुटाने/लुटने में परमानन्द आता हो ! सांकरी-खोर से कोई बिना लुटे चला जावे; असंभव! मैं तो छाया हूँ घनश्याम की न मैं राधा,न मैं मीरा,न गोपी ब्रजधाम की। न मैं भक्तिनि,न मैं दासी,न शोभा हूँ बाम की। रहूँ संग मैं,सँग-सँग राँचू ,संगिनि प्रात: शाम की। श्याम करे जो वही करूँ मैं,प्रति हूँ उसके काम की। मैं हूँ उसके आगे-पीछे चाह नहीं विश्राम की। रहूँ सदा उसके चरणों में, स्थिति यही प्रणाम की। जीव यही है मुक्ति जगत से,लीला यह हरि नाम की। जय जय श्यमाश्याम!

*जय माता दी*
*शुभरात्रि वंदन*.

एक गरीब विधवा के पुत्र ने एक बार अपने राजा को देखा। राजा को देख कर उसने अपनी माँ से पूछा- माँ! क्या कभी मैं राजा से बात कर पाऊँगा?
माँ हंसी और चुप रह गई।
पर वह लड़का तो निश्चय कर चुका था। उन्हीं दिनों गाँव में एक संत आए हुए थे। तो युवक ने उनके चरणों में अपनी इच्छा रखी।
संत ने कहा- अमुक स्थान पर राजा का महल बन रहा है, तुम वहाँ चले जाओ और मजदूरी करो। पर ध्यान रखना, वेतन न लेना। अर्थात् बदले में कुछ माँगना मत। निष्काम रहना।
वह लड़का गया। वह मेहनत दोगुनी करता पर वेतन न लेता।
एक दिन राजा निरीक्षण करने आया। उसने लड़के की लगन देखी। प्रबंधक से पूछा- यह लड़का कौन है, जो इतनी तन्मयता से काम में लगा है? इसे आज अधिक मजदूरी देना।
प्रबंधक ने विनय की- महराज! इसका अजीब हाल है, दो महीने से इसी उत्साह से काम कर रहा है। पर हैरानी यह है कि यह मजदूरी नहीं लेता। कहता है मेरे घर का काम है। घर के काम की क्या मजदूरी लेनी?
राजा ने उसे बुला कर कहा- बेटा! तूं मजदूरी क्यों नहीं लेता? बता तूं क्या चाहता है?
लड़का राजा के पैरों में गिर पड़ा और बोला- महाराज! आपके दर्शन हो गए, आपकी कृपा दृष्टि मिल गई, मुझे मेरी मजदूरी मिल गई। अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए।
राजा उसे मंत्री बना कर अपने साथ ले गया। और कुछ समय बाद अपनी इकलौती पुत्री का विवाह भी उसके साथ कर दिया। राजा का कोई पुत्र था नहीं, तो कालांतर में उसे ही राज्य भी सौंप दिया।
लोकेशानन्द कहता है कि भगवान ही राजा हैं। हम सभी भगवान के मजदूर हैं। भगवान का भजन करना ही मजदूरी करना है। संत ही मंत्री है। भक्ति ही राजपुत्री है। मोक्ष ही वह राज्य है।
हम भगवान के भजन के बदले में कुछ भी न माँगें तो वे भगवान स्वयं दर्शन देकर, पहले संत बना देते हैं और अपनी भक्ति प्रदान कर, कालांतर में मोक्ष ही दे देते हैं।
वह लड़का सकाम कर्म करता, तो मजदूरी ही पाता, निष्काम कर्म किया तो राजा बन बैठा। यही सकाम और निष्काम कर्म के फल में भेद है।
"तुलसी विलम्ब न कीजिए, निश्चित भजिए राम।
जगत मजूरी देत है, क्यों राखे भगवान॥"

भक्त कैसा होता है.....?

रसिकाचार्य कृपा-पूर्वक बता रहे थे कि यदि कोई संत प्रसन्न होकर कहे कि बोलो - "क्या चाहते हो? श्रीहरि का दर्शन अथवा श्रीहरि का विरह?
सोचोगे, क्या पूछ बैठे? बड़ी सरल सी बात है कि श्रीहरि का दर्शन ! जब अभी दुर्लभ-दर्शन सुलभ है तो अब चिंतन को बचा क्या?

किन्तु जो सच्चा भक्त होगा, जो वास्तव में ही बाबरा होगा, वही कह सकेगा कि विरह !
क्यों?

अभी क्षुधा/भूख लगी ही नहीं तो देव-दुर्लभ भोग-पदार्थों में रस कैसे मिलेगा? तृप्ति कैसे होगी? पहले भूख तो लगे तब पदार्थ में रस आवेगा, तृप्ति होवेगी सो कृपया आप मुझे श्रीहरि का विरह दे दीजिये जो प्रतिक्षण बढ़ता ही रहे। एक दिन ऐसा आ जाये कि मैं उनकी प्रतिक्षण स्मृति के बिना जीवित ही न रह सकूँ।

विरह और मिलन !
नदी हजारों किलोमीटर का रास्ता दौड़ते-भागते, बाधाओं से टकराते हुए करती है; यही विरह है !
एक ही धुन ! एक ही लक्ष्य !

हम बड़े चतुर हैं; श्रीहरि से मिलन तो चाहते हैं किन्तु बड़ी ही सावधानी बरतते हैं कि कही ऐसा न हो जावे कि हम खो जावें। दो नावों पर सवार को श्रीहरि-कृपा का दर्शन तो हो सकता है किन्तु प्राप्ति न हो सकेगी। हमें भौतिक संपदा और कुटुंबीजनों में आसक्ति अधिक है, श्रीहरि में कम। सब कुछ बना रहे और श्रीहरि भी मिल जावें तो सोने में सुहागा। सब चला जावे और वे मिल जावें तो क्या लाभ?

यही कारण है कि प्रवचन करना, सुनना सरल है किन्तु उसे आचरण में लाना कठिन और जब तक आचरण में ही न उतरी तो कथा-सत्संग का कैसा लाभ? यही कहते हैं कि उन्होंने प्रवचन में बड़ी सुंदर बात कही। अरे बात सुंदर होती तो कहना न पड़ता; वह तो आचरण में उतरनी चाहिये।

भक्ति सरल है, सरल के लिये किन्तु सरल होना बड़ा कठिन है !
प्राण-प्रियतम के अतिरिक्त अब किसी की सुधि नहीं; जगत में जो भी है, वह उन्हीं का। जब वे ही कर रहे हैं, वे ही कह रहे हैं तो मान-अपमान कैसा और किसका? खेल तो खेल है !

इसीलिये कहते हैं कि भक्ति करे कोई सूरमा, जाति-बरन-कुल खोय। अपने पास श्रीहरी की कृपा से जो कुछ है वह और स्वयं को जो श्रीहरि के श्रीचरणारविन्द में सहर्ष न्यौछावर करने को प्रस्तुत है, यह मार्ग उनके लिये है।

इस मार्ग पर कोई भौतिक-संपदा प्राप्त होगी, इस भ्रम में मत रहना। यह तो जान-बूझकर लुटने वालों की गली है; यहाँ वे ही आवें जिन्हें सर्वस्व लुटाने/लुटने में परमानन्द आता हो !
सांकरी-खोर से कोई बिना लुटे चला जावे; असंभव!

मैं तो छाया हूँ घनश्याम की
न मैं राधा,न मैं मीरा,न गोपी ब्रजधाम की।
न मैं भक्तिनि,न मैं दासी,न शोभा हूँ बाम की।
रहूँ संग मैं,सँग-सँग राँचू ,संगिनि प्रात: शाम की।
श्याम करे जो वही करूँ मैं,प्रति हूँ उसके काम की।
मैं हूँ उसके आगे-पीछे चाह नहीं विश्राम की।
रहूँ सदा उसके चरणों में, स्थिति यही प्रणाम की।
जीव यही है मुक्ति जगत से,लीला यह हरि नाम की।

जय जय श्यमाश्याम!

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कामेंट्स

Rajendra.L.Gupta Apr 16, 2021
Ati.sundar🌹🥀🌷🌷🕉️🚩🚩🍎🍏🕉️🙏🙏🙏

Shivsanker Shukla Apr 16, 2021
शुभ रात्रि आदरणीय बहन जय माता दी

laltesh kumar sharma Apr 16, 2021
🍒🌟⭐🍒 jai mata di 🍒🌟⭐🍒 Subh ratri vandan ji 🍒⭐🌟🍒🙏🙏

babulal Apr 16, 2021
jay mata rani ki good night ji

Kamala Sevakoti Apr 16, 2021
jai mate di 🍀🍀🍀🍀🍀 jai mate di jai mate di 💘💘💘💘 jai mate di jai mate di 🌷🌷🌷🌷🏵🏵 jai mate di 🌹🌹🌹🌹🌹🌺 jai mate di 🙏🙏🙏🙏🙏

Rajesh Lakhani Apr 16, 2021
JAI MATADI SHUBH RATRI BEHENA MATA RANI KI KRUPA AAP PER OR AAP KE PARIVAR PER SADA BANI RAHE AAP KA AANE WALA HAR PAL SHUBH OR MANGALMAYE HO AAP OR AAP KA PARIVAR SADA SWASTH RAHE SUKHI RAHE BEHENA PRANAM

K L Tiwari Apr 16, 2021
🌺🚩🌺ॐ श्री दुर्गा देव्यै नमः🌺🚩🌺 🌷🌼🌷राम राम बहन,जय श्री माता की बहन,सादर चरण स्पर्श करता हूँ मेरी बहना,जगतजननी जगदम्बा आपको सदा स्वस्थ और दीर्घायु करें 🌹💗🌹 🌼🌾🌼जय श्री माता कुष्मांडा की🌼🌾🌼""नौ दिन की इस मङ्गल बेला""नवरात्रि पर्व"" चतुर्थ दिवस पर आपको बहुत बहुत मंगलशुभकामनाएँ, श्रीमाता आप और आपके परिवार के अंतःकरण में नई सुरमई ऊर्जा शक्ति, आध्यात्मिक शक्ति और उमंग उत्साह,स्नेह और ज्ञान का भण्डार भर दें🏵️🌻🌺🌸शुभ🚩रात्रि बहन🌾🌼💮

Renu Singh Apr 16, 2021
Jai Mata Di 🌹🙏 Shubh Ratri Pyari Bahena Ji 🙏🌹 Mata Rani Aapki Sabhi Manokamnayein Puri Karein Aapka Har Pal Shubh V Mangalmay ho Bahena Ji 🙏🌹

prem chand shami Apr 16, 2021
प्रेम से बोलिए श्री वृंदावन बिहारी की जय 🙏🏻🙏🏻 शुभ मंगलमय रात्रि की शुभकामनायें प्रणाम बहन जी 💐🙏🏻 बहुत ही सुन्दर पोस्ट हैं बहुत अच्छा लिखा है आपने 🙏🏻

🌼🇮🇳हरि प्रिय पाठक🇮🇳🌼 Apr 16, 2021
⛳🐯‼️*जय माता जी*‼️🐯⛳ 🌀᯽शुभ रात्रि स्नेह वंदन᯽🌀 🥀😊शुभ स्वप्नों की शुभकामनाएं के साथ आप को स्प्रेम नमस्कार,🙏🌹 🌼🌺🌼🌺🌼🌺🌼🌺🌼🌺

Daya Shankar Apr 16, 2021
Jay Mata Rani ki 🌹 shubh ratri 🌹 Mata Rani aap ke har sapne phone Karen Jay Shri Radhe 🌹

madan pal 🌷🙏🏼 Apr 16, 2021
जय माता दी शूभ रात्रि वंदन जी माता रानी जी की कृपा आप व आपके परिवार पर बनीं रहे जी 🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🌷🌷🌷🌷

Ravi Kumar Taneja Apr 16, 2021
*🦋प्रेम से बोलो जय मां कुष्मांडा देवी की🦋 🕉️🌹👣ॐ कूष्माण्डायै नम:!!!👣🌹 🔯 या देवी सर्वभूतेषु माँ कुष्मांडा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः 🔯 🐾 माँ लक्ष्मीजी का हाथ हो🐾 🐾 माँ सरस्वती जी का साथ हो🐾 तथा श्री गणेशजी का निवास हो🙏 माँ नवदुर्गा के आशीर्वाद से सभी के घर परिवार में प्रकाश ही प्रकाश हो🙏🌹🙏

Renu Singh May 7, 2021

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Mamta Chauhan May 9, 2021

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Renu Singh May 9, 2021

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मदर्स डे🌹🌹🌹 🌞मां के लिए लिखने के लिए कोई शब्द ही नहीं मिलते ।जहां पर पूरी हो जाए शब्दों की सीमा, बस वही तो है मां। मां से बड़ा त्यागी और तपस्वी इस धरती पर मिलना दुर्लभ ही है ।जब बच्चा पेट में होता है तो उसी समय से एक मां को अपने खानपान पर अंकुश रखना होता है। बच्चा पेट में आने और दुग्धपान करने की अवधि तक एक मां कभी भी अपनी रूचि के अनुसार भोजन नहीं कर सकती। अब उसे क्या खाना और क्या नहीं खाना, यह अपने बच्चे के हित और अहित को ध्यान में रखकर ही करना होता है। 🌞और इतना ही नहीं, जीवन पर्यंत एक मां अपने बच्चे के हिसाब से रसोई में कुछ पकाती है । बच्चे के जन्म के बाद एक मां जीवन भर के लिए यह भुला देती है उसकी भी कोई पसंद नापसंद है। अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं की बलि देकर भी एक नारी मां बन पाती है ।अपने बच्चे से एक मां के लगाव को इन बातों से समझा जा सकता है, जब बच्चे का मां का हंसना- मां का हंसना, बच्चों का रोना- मां का रोना, बच्चों का सोना -मां का सोना, बच्चों का जगाना- मां का जगाना और तो और बच्चों का खाना ही मां का खाना भी बन जाता है। 🌞मां की अपनी कोई खुशी नहीं होती अपितु अपने बच्चों की खुशी में ही एक मां की खुशी होती है ।मां की आंखों का आंसू हमारे सभी पुण्य कर्मों को भी अपने साथ बहाकर ले जाता है ।आओ! इस मातृ दिवस पर हम सब मिलकर संकल्प लेते हैं कि हमारे कारण कभी मां-बाप की आंखें गीली ना हो। 🙏मातृत्व दिवस पर सभी माताओं के चरणों में प्रणाम करते हुए आप सभी को मातृत्व दिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएं एवं बधाइयां।

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Archana Singh May 9, 2021

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