Neha Sharma, Haryana
Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 179*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 20*🙏🌸 *इस अध्याय में भगवान वामन जी का विराट् रूप होकर दो ही पग से पृथ्वी और स्वर्ग को नाप लेना..... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन! जब कुलगुरु शुक्राचार्य ने इस प्रकार कहा, तब आदर्श गृहस्थ राजा बलि ने एक क्षण चुप रहकर बड़ी विनय और सावधानी से शुक्राचार्य जी के प्रति यों कहा। *राजा बलि ने कहा- भगवन! आपका कहना सत्य है। गृहस्थाश्रम में रहने वालों के लिये वही धर्म है जिससे अर्थ, काम, यश और आजीविका में कभी किसी प्रकार बाधा न पड़े। परन्तु गुरुदेव! मैं प्रह्लाद जी का पौत्र हूँ और एक बार देने की प्रतिज्ञा कर चुका हूँ। अतः अब मैं धन लोभ से ठग की भाँति इस ब्राह्मण से कैसे कहूँ कि ‘मैं तुम्हें नहीं दूँगा’। *इस पृथ्वी ने कहा है कि ‘असत्य से बढ़कर कोई अधर्म नहीं है। मैं सब कुछ सहने में समर्थ हूँ, परन्तु झूठे मनुष्य का भार मुझसे नहीं सहा जाता’। *मैं नरक से, दरिद्रता से, दुःख के समुद्र से, अपने राज्य के नाश से और मृत्यु से भी उतना नहीं डरता, जितना ब्राह्मण से प्रतिज्ञा करके उसे धोखा देने से डरता हूँ। *इस संसार में मर जाने के बाद धन आदि जो-जो वस्तुएँ साथ छोड़ देती हैं, यदि उनके द्वारा दान आदि से ब्राह्मणों को भी संतुष्ट न किया जा सका, तो उनके त्याग का लाभ ही क्या रहा? *दधीचि, शिबि आदि महापुरुषों ने अपने परम प्रिय दुस्त्यज प्राणों का दान करके भी प्राणियों की भलाई की है। फिर पृथ्वी आदि वस्तुओं को देने में सोच-विचार करने की क्या आवश्यकता है? *ब्रह्मन! पहले युग में बड़े-बड़े दैत्यराजों ने इस पृथ्वी का उपभोग किया है। पृथ्वी में उनका सामना करने वाला कोई नहीं था। उनके लोक और परलोक को तो काल खा गया, परन्तु उनका यश अभी पृथ्वी पर ज्यों-का-त्यों बना हुआ है। गुरुदेव! ऐसे लोग संसार में बहुत हैं, जो युद्ध में पीठ न दिखाकर अपने प्राणों की बलि चढ़ा देते हैं; परन्तु ऐसे लोग बहुत दुर्लभ हैं, जो सत्पात्र के प्राप्त होने पर श्रद्धा के साथ धन का दान करें। *गुरुदेव! यदि उदार और करुणाशील पुरुष अपात्र याचक की कामना पूर्ण करके दुर्गति भोगता है, तो वह दुर्गति भी उसके लिये शोभा की बात होती है। फिर आप-जैसे ब्रह्मवेत्ता पुरुषों को दान करने से दुःख प्राप्त हो तो उसके लिये क्या कहना है। इसलिये मैं इस ब्रह्मचारी की अभिलाषा अवश्य पूर्ण करूँगा। *महर्षे! वेदविधि के जानने वाले आप लोग बड़े आदर से यज्ञ-यागादि के द्वारा जिनकी आराधना करते हैं-वे वरदानी विष्णु ही इस रूप में हों अथवा कोई दूसरा हो, मैं इनकी इच्छा के अनुसार इन्हें पृथ्वी का दान करूँगा। यदि मेरे अपराध न करने पर भी ये अधर्म से मुझे बाँध लेंगे, तब भी मैं इनका अनिष्ट नहीं चाहूँगा। क्योंकि मेरे शत्रु होने पर भी इन्होंने भयभीत होकर ब्राह्मण का शरीर धारण किया है। यदि ये पवित्रकीर्ति भगवान् विष्णु ही हैं तो अपना यश नहीं खोना चाहेंगे (अपनी माँगी हुई वस्तु लेकर ही रहेंगे)’। *मुझे युद्ध में मारकर भी पृथ्वी छीन सकते हैं और यदि कदाचित ये कोई दूसरा ही हैं, तो मेरे बाणों की चोट से सदा के लिये रणभूमि में सो जायेंगे। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- जब शुक्राचार्य जी ने देखा कि मेरा यह शिष्य गुरु के प्रति अश्रद्धालु है तथा मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर रहा है, तब दैव की प्रेरणा से उन्होंने राजा बलि को शाप दे दिया-यद्यपि वे सत्यप्रतिज्ञ और उदार होने के कारण शाप के पात्र नहीं थे। *शुक्राचार्य जी ने कहा- ‘मूर्ख! तू है तो अज्ञानी, परन्तु अपने को बहुत बड़ा पण्डित मानता है। तू मेरी उपेक्षा करके गर्व कर रहा है। तूने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है। इसलिये शीघ्र ही तू अपनी लक्ष्मी खो बैठेगा’। *राजा बलि बड़े महात्मा थे। अपने गुरुदेव के शाप देने पर भी वे सत्य से नहीं डिगे। उन्होंने वामन भगवान् की विधिपूर्वक पूजा की और हाथ में जल लेकर तीन पग भूमि का संकल्प कर दिया। *उसी समय राजा बलि की पत्नी विन्ध्यावली, जो मोतियों के गहनों से सुसज्जित थी, वहाँ आयी। उसने अपने हाथों वामन भगवान के चरण पखारने के लिये जल से भरा सोने का कलश लाकर दिया। बलि ने स्वयं बड़े आनन्द से उनके सुन्दर-सुन्दर युगल चरणों को धोया और उनके चरणों का वह विश्व पावन जल अपने सिर पर चढ़ाया। उस समय आकाश में स्थित देवता, गन्धर्व, विद्याधर, सिद्ध, चारण-सभी लोग राजा बलि के इस अलौकिक कार्य तथा सरलता की प्रशंसा करते हुए बड़े आनन्द से उनके ऊपर दिव्य पुष्पों की वर्षा करने लगे। एक साथ ही हजारों दुन्दुभियाँ बार-बार बजने लगीं। *गन्धर्व, किम्पुरुष और किन्नर गान करने लगे- ‘अहो धन्य है! इन उदारशिरोमणि बलि ने ऐसा काम कर दिखाया, जो दूसरों के लिये अत्यन्त कठिन है। देखो तो सही, इन्होंने जान-बूझकर अपने शत्रु को तीनों लोकों का दान कर दिया’। *इसी समय एक बड़ी अद्भुत घटना घट गयी। अनन्त भगवान् का वह त्रिगुणात्मक वामन रूप बढ़ने लगा। वह यहाँ तक बढ़ा कि पृथ्वी, आकाश, दिशाएँ, स्वर्ग, पाताल, समुद्र, पशु-पक्षी, मनुष्य, देवता और ऋषि- सब-के-सब उसी में समा गये। ऋत्विज, आचार्य और सदस्यों के साथ बलि ने समस्त ऐश्वर्यों के एकमात्र स्वामी भगवान् के उस त्रिगुणात्मक शरीर में पंचभूत, इन्द्रिय, उनके विषय, अन्तःकरण और जीवों के साथ वह सम्पूर्ण त्रिगुणमय जगत् देखा। *राजा बलि ने विश्वरूप भगवान के चरणतल में रसातल, चरणों में पृथ्वी, पिंडलियों में पर्वत, घुटनों में पक्षी और जाँघों में मरुद्गण को देखा। *इसी प्रकार भगवान् के वस्त्रों में सन्ध्या, गुह्य-स्थानों में प्रजापतिगण, जघनस्थल में अपने सहित समस्त असुरगण, नाभि में आकाश, कोख में सातों समुद्र और वक्षःस्थल में नक्षत्र समूह देखे। उन लोगों को भगवान् के हृदय में धर्म, स्तनों में ऋत (मधुर) और सत्य वचन, मन में चन्द्रमा, वक्षःस्थल पर हाथों में कमल लिये लक्ष्मी जी, कण्ठ में सामवेद और सम्पूर्ण शब्दसमूह उन्हें दीखे। बाहुओं में इन्द्रादि समस्त देवगण, कानों में दिशाएँ, मस्तक में स्वर्ग, केशों में मेघमाला, नासिका में वायु, नेत्रों में सूर्य और मुख में अग्नि दिखायी पड़े। वाणी में वेद, रसना में वरुण, भौंहों में विधि और निषेध, पलकों में दिन और रात। विश्वरूप के ललाट में क्रोध और नीचे के ओठ में लोभ के दर्शन हुए। *परीक्षित! उनके स्पर्श में काम, वीर्य में जल, पीठ में अधर्म, पदविन्यास में यज्ञ, छाया में मृत्यु, हँसी में माया और शरीर के रोमों में सब प्रकार की ओषधियाँ थीं। उनकी नाड़ियों में नदियाँ, नखों में शिलाएँ और बुद्धि में ब्रह्मा, देवता एवं ऋषिगण दीख पड़े। इस प्रकार वीरवर बलि ने भगवान् की इन्द्रियों और शरीर में सभी चराचर प्राणियों का दर्शन किया। *परीक्षित! सर्वात्मा भगवान् में यह सम्पूर्ण जगत देखकर सब-के-सब दैत्य अत्यन्त भयभीत हो गये। इसी समय भगवान् के पास असह्य तेज वाला सुदर्शन चक्र, गरजते हुए मेघ के समान भयंकर टंकार करने वाला शारंग धनुष, बादल की तरह गम्भीर शब्द करने वाला पांचजन्य शंख, विष्णु भगवान् की अत्यन्त वेगवती कौमुदकी गदा, सौ चन्द्राकार चिह्नों वाली ढाल और विद्याधर नाम की तलवार, अक्षय बाणों से भरे दो तरकश तथा लोकपालों के सहित भगवान् के सुनन्द आदि पार्षदगण सेवा करने के लिये उपस्थित हो गये। उस समय भगवान की बड़ी शोभा हुई। मस्तक पर मुकुट, बाहुओं में बाजूबंद, कानों में मकराकृत कुण्डल, वक्षःस्थल पर श्रीवत्स चिह्न, गले में कौस्तुभ मणि, कमर में मेखला और कंधे पर पीताम्बर शोभायमान हो रहा था। *वे पाँच प्रकार के पुष्पों की बनी वनमाला धारण किये हुए थे, जिस पर मधुलोभी भौंरे गुंजार कर रहे थे। उन्होंने अपने एक पग से बलि की सारी पृथ्वी नाप ली, शरीर से आकाश और भुजाओं से दिशाएँ घेर लीं; दूसरे पग से उन्होंने स्वर्ग को भी नाप लिया। तीसरा पैर रखने के लिये बलि की तनिक-सी भी कोई वस्तु न बची। भगवान का वह दूसरा पग ही ऊपर की ओर जाता हुआ महर्लोक, जनलोक और तपलोक से भी ऊपर सत्यलोक में पहुँच गया। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸
            🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸
 🌸🙏*पोस्ट - 179*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸
                   🌸🙏*अध्याय - 20*🙏🌸
*इस अध्याय में  भगवान वामन जी का विराट् रूप होकर दो ही पग से पृथ्वी और स्वर्ग को नाप लेना.....

          *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन! जब कुलगुरु शुक्राचार्य ने इस प्रकार कहा, तब आदर्श गृहस्थ राजा बलि ने एक क्षण चुप रहकर बड़ी विनय और सावधानी से शुक्राचार्य जी के प्रति यों कहा। 
          *राजा बलि ने कहा- भगवन! आपका कहना सत्य है। गृहस्थाश्रम में रहने वालों के लिये वही धर्म है जिससे अर्थ, काम, यश और आजीविका में कभी किसी प्रकार बाधा न पड़े। परन्तु गुरुदेव! मैं प्रह्लाद जी का पौत्र हूँ और एक बार देने की प्रतिज्ञा कर चुका हूँ। अतः अब मैं धन लोभ से ठग की भाँति इस ब्राह्मण से कैसे कहूँ कि ‘मैं तुम्हें नहीं दूँगा’। 
          *इस पृथ्वी ने कहा है कि ‘असत्य से बढ़कर कोई अधर्म नहीं है। मैं सब कुछ सहने में समर्थ हूँ, परन्तु झूठे मनुष्य का भार मुझसे नहीं सहा जाता’। 
          *मैं नरक से, दरिद्रता से, दुःख के समुद्र से, अपने राज्य के नाश से और मृत्यु से भी उतना नहीं डरता, जितना ब्राह्मण से प्रतिज्ञा करके उसे धोखा देने से डरता हूँ। 
          *इस संसार में मर जाने के बाद धन आदि जो-जो वस्तुएँ साथ छोड़ देती हैं, यदि उनके द्वारा दान आदि से ब्राह्मणों को भी संतुष्ट न किया जा सका, तो उनके त्याग का लाभ ही क्या रहा? 
          *दधीचि, शिबि आदि महापुरुषों ने अपने परम प्रिय दुस्त्यज प्राणों का दान करके भी प्राणियों की भलाई की है। फिर पृथ्वी आदि वस्तुओं को देने में सोच-विचार करने की क्या आवश्यकता है? 
          *ब्रह्मन! पहले युग में बड़े-बड़े दैत्यराजों ने इस पृथ्वी का उपभोग किया है। पृथ्वी में उनका सामना करने वाला कोई नहीं था। उनके लोक और परलोक को तो काल खा गया, परन्तु उनका यश अभी पृथ्वी पर ज्यों-का-त्यों बना हुआ है। गुरुदेव! ऐसे लोग संसार में बहुत हैं, जो युद्ध में पीठ न दिखाकर अपने प्राणों की बलि चढ़ा देते हैं; परन्तु ऐसे लोग बहुत दुर्लभ हैं, जो सत्पात्र के प्राप्त होने पर श्रद्धा के साथ धन का दान करें। 
          *गुरुदेव! यदि उदार और करुणाशील पुरुष अपात्र याचक की कामना पूर्ण करके दुर्गति भोगता है, तो वह दुर्गति भी उसके लिये शोभा की बात होती है। फिर आप-जैसे ब्रह्मवेत्ता पुरुषों को दान करने से दुःख प्राप्त हो तो उसके लिये क्या कहना है। इसलिये मैं इस ब्रह्मचारी की अभिलाषा अवश्य पूर्ण करूँगा। 
          *महर्षे! वेदविधि के जानने वाले आप लोग बड़े आदर से यज्ञ-यागादि के द्वारा जिनकी आराधना करते हैं-वे वरदानी विष्णु ही इस रूप में हों अथवा कोई दूसरा हो, मैं इनकी इच्छा के अनुसार इन्हें पृथ्वी का दान करूँगा। यदि मेरे अपराध न करने पर भी ये अधर्म से मुझे बाँध लेंगे, तब भी मैं इनका अनिष्ट नहीं चाहूँगा। क्योंकि मेरे शत्रु होने पर भी इन्होंने भयभीत होकर ब्राह्मण का शरीर धारण किया है। यदि ये पवित्रकीर्ति भगवान् विष्णु ही हैं तो अपना यश नहीं खोना चाहेंगे (अपनी माँगी हुई वस्तु लेकर ही रहेंगे)’। 
          *मुझे युद्ध में मारकर भी पृथ्वी छीन सकते हैं और यदि कदाचित ये कोई दूसरा ही हैं, तो मेरे बाणों की चोट से सदा के लिये रणभूमि में सो जायेंगे।
          *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- जब शुक्राचार्य जी ने देखा कि मेरा यह शिष्य गुरु के प्रति अश्रद्धालु है तथा मेरी आज्ञा का उल्लंघन कर रहा है, तब दैव की प्रेरणा से उन्होंने राजा बलि को शाप दे दिया-यद्यपि वे सत्यप्रतिज्ञ और उदार होने के कारण शाप के पात्र नहीं थे। 
          *शुक्राचार्य जी ने कहा- ‘मूर्ख! तू है तो अज्ञानी, परन्तु अपने को बहुत बड़ा पण्डित मानता है। तू मेरी उपेक्षा करके गर्व कर रहा है। तूने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है। इसलिये शीघ्र ही तू अपनी लक्ष्मी खो बैठेगा’। 
          *राजा बलि बड़े महात्मा थे। अपने गुरुदेव के शाप देने पर भी वे सत्य से नहीं डिगे। उन्होंने वामन भगवान् की विधिपूर्वक पूजा की और हाथ में जल लेकर तीन पग भूमि का संकल्प कर दिया। 
          *उसी समय राजा बलि की पत्नी विन्ध्यावली, जो मोतियों के गहनों से सुसज्जित थी, वहाँ आयी। उसने अपने हाथों वामन भगवान के चरण पखारने के लिये जल से भरा सोने का कलश लाकर दिया। बलि ने स्वयं बड़े आनन्द से उनके सुन्दर-सुन्दर युगल चरणों को धोया और उनके चरणों का वह विश्व पावन जल अपने सिर पर चढ़ाया। उस समय आकाश में स्थित देवता, गन्धर्व, विद्याधर, सिद्ध, चारण-सभी लोग राजा बलि के इस अलौकिक कार्य तथा सरलता की प्रशंसा करते हुए बड़े आनन्द से उनके ऊपर दिव्य पुष्पों की वर्षा करने लगे। एक साथ ही हजारों दुन्दुभियाँ बार-बार बजने लगीं। 
          *गन्धर्व, किम्पुरुष और किन्नर गान करने लगे- ‘अहो धन्य है! इन उदारशिरोमणि बलि ने ऐसा काम कर दिखाया, जो दूसरों के लिये अत्यन्त कठिन है। देखो तो सही, इन्होंने जान-बूझकर अपने शत्रु को तीनों लोकों का दान कर दिया’। 
          *इसी समय एक बड़ी अद्भुत घटना घट गयी। अनन्त भगवान् का वह त्रिगुणात्मक वामन रूप बढ़ने लगा। वह यहाँ तक बढ़ा कि पृथ्वी, आकाश, दिशाएँ, स्वर्ग, पाताल, समुद्र, पशु-पक्षी, मनुष्य, देवता और ऋषि- सब-के-सब उसी में समा गये। ऋत्विज, आचार्य और सदस्यों के साथ बलि ने समस्त ऐश्वर्यों के एकमात्र स्वामी भगवान् के उस त्रिगुणात्मक शरीर में पंचभूत, इन्द्रिय, उनके विषय, अन्तःकरण और जीवों के साथ वह सम्पूर्ण त्रिगुणमय जगत् देखा। 
          *राजा बलि ने विश्वरूप भगवान के चरणतल में रसातल, चरणों में पृथ्वी, पिंडलियों में पर्वत, घुटनों में पक्षी और जाँघों में मरुद्गण को देखा। 
          *इसी प्रकार भगवान् के वस्त्रों में सन्ध्या, गुह्य-स्थानों में प्रजापतिगण, जघनस्थल में अपने सहित समस्त असुरगण, नाभि में आकाश, कोख में सातों समुद्र और वक्षःस्थल में नक्षत्र समूह देखे। उन लोगों को भगवान् के हृदय में धर्म, स्तनों में ऋत (मधुर) और सत्य वचन, मन में चन्द्रमा, वक्षःस्थल पर हाथों में कमल लिये लक्ष्मी जी, कण्ठ में सामवेद और सम्पूर्ण शब्दसमूह उन्हें दीखे। बाहुओं में इन्द्रादि समस्त देवगण, कानों में दिशाएँ, मस्तक में स्वर्ग, केशों में मेघमाला, नासिका में वायु, नेत्रों में सूर्य और मुख में अग्नि दिखायी पड़े। वाणी में वेद, रसना में वरुण, भौंहों में विधि और निषेध, पलकों में दिन और रात। विश्वरूप के ललाट में क्रोध और नीचे के ओठ में लोभ के दर्शन हुए। 
          *परीक्षित! उनके स्पर्श में काम, वीर्य में जल, पीठ में अधर्म, पदविन्यास में यज्ञ, छाया में मृत्यु, हँसी में माया और शरीर के रोमों में सब प्रकार की ओषधियाँ थीं।
          उनकी नाड़ियों में नदियाँ, नखों में शिलाएँ और बुद्धि में ब्रह्मा, देवता एवं ऋषिगण दीख पड़े। इस प्रकार वीरवर बलि ने भगवान् की इन्द्रियों और शरीर में सभी चराचर प्राणियों का दर्शन किया।
          *परीक्षित! सर्वात्मा भगवान् में यह सम्पूर्ण जगत देखकर सब-के-सब दैत्य अत्यन्त भयभीत हो गये। इसी समय भगवान् के पास असह्य तेज वाला सुदर्शन चक्र, गरजते हुए मेघ के समान भयंकर टंकार करने वाला शारंग धनुष, बादल की तरह गम्भीर शब्द करने वाला पांचजन्य शंख, विष्णु भगवान् की अत्यन्त वेगवती कौमुदकी गदा, सौ चन्द्राकार चिह्नों वाली ढाल और विद्याधर नाम की तलवार, अक्षय बाणों से भरे दो तरकश तथा लोकपालों के सहित भगवान् के सुनन्द आदि पार्षदगण सेवा करने के लिये उपस्थित हो गये। उस समय भगवान की बड़ी शोभा हुई। मस्तक पर मुकुट, बाहुओं में बाजूबंद, कानों में मकराकृत कुण्डल, वक्षःस्थल पर श्रीवत्स चिह्न, गले में कौस्तुभ मणि, कमर में मेखला और कंधे पर पीताम्बर शोभायमान हो रहा था।
          *वे पाँच प्रकार के पुष्पों की बनी वनमाला धारण किये हुए थे, जिस पर मधुलोभी भौंरे गुंजार कर रहे थे। उन्होंने अपने एक पग से बलि की सारी पृथ्वी नाप ली, शरीर से आकाश और भुजाओं से दिशाएँ घेर लीं; दूसरे पग से उन्होंने स्वर्ग को भी नाप लिया। तीसरा पैर रखने के लिये बलि की तनिक-सी भी कोई वस्तु न बची। भगवान का वह दूसरा पग ही ऊपर की ओर जाता हुआ महर्लोक, जनलोक और तपलोक से भी ऊपर सत्यलोक में पहुँच गया।
                             ~~~०~~~
                   *श्रीकृष्ण  गोविन्द  हरे मुरारे।
                   *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥
                           "जय जय श्री हरि"
                           🌸🌸🙏🌸🌸
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कामेंट्स

जितेन्द्र दुबे Apr 15, 2021
🚩🌹🥀जय श्री मंगलमूर्ति गणेशाय नमः 🌺🌹💐🚩🌹🌺 शुभ रात्रि वंदन🌺🌹 राम राम जी 🌺🚩🌹मंदिर के सभी भाई बहनों को राम राम जी परब्रह्म परमात्मा आप सभी की मनोकामना पूर्ण करें 🙏 🚩🔱🚩प्रभु भक्तो को सादर प्रणाम 🙏 🚩🔱 🕉️ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ओम नमो नारायण हरि ऊँ तत्सत परब्रह्म परमात्मा नमः ॐ या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता नमस्तस्ए नमस्तस्ए नमस्तस्ए नमो नमःऊँ माँ ब्रम्हचारिणी नमः🌺🚩 ऊँ उमामहेश्वराभ्यां नमः🌺 ऊँ राम रामाय नमः 🌻🌹ऊँ सीतारामचंद्राय नमः🌹 ॐ राम रामाय नमः🌹🌺🌹 ॐ हं हनुमते नमः 🌻ॐ हं हनुमते नमः🌹🥀🌻🌺🌹ॐ शं शनिश्चराय नमः 🚩🌹🚩ऊँ नमः शिवाय 🚩🌻 जय श्री राधे कृष्णा जी🌹 श्री जगत पिता परम परमात्मा श्री हरि विष्णु जी माता लक्ष्मी माता चंद्रघंटा की कृपा दृष्टि आप सभी पर हमेशा बनी रहे 🌹 आप का हर पल मंगलमय हो 🚩जय श्री राम 🚩🌺हर हर महादेव🚩राम राम जी 🥀शुभ रात्रि स्नेह वंदन💐शुभ गुरुवार🌺 हर हर महादेव 🔱🚩🔱🚩🔱🚩🔱🚩 जय माता दी जय श्री राम 🚩 🚩हर हर नर्मदे हर हर नर्मदे 🌺🙏🌻🙏🌻🥀🌹🚩🚩🚩

RAJ RATHOD Apr 15, 2021
🚩🚩जय माता दी 🚩🚩 शुभ रात्रि वंदन जी 🙏🙏

Ranveer soni Apr 15, 2021
🌹🌹जय श्री कृष्णा🌹🌹

madan pal 🌷🙏🏼 Apr 15, 2021
जय श्री राधे कृष्णा जी शूभ प्रभात वंदन जी आपका हर पल शूभ मंगल हों जी 🌹🌹🌷🌷🌷👍👍👍🙏🏼🙏🏼🙏🏼

Neha Sharma, Haryana May 15, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 200*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 09*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 17*🙏🌸 *इस अध्याय में क्षत्रवृद्ध, रजि आदि राजाओं के वंश का वर्णन... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! राजेन्द्र पुरूरवा का एक पुत्र था आयु। उसके पाँच लड़के हुए- नहुष, क्षत्रवृद्ध, रजि, शक्तिशाली रम्भ और अनेना। अब क्षत्रवृद्ध का वंश सुनो। *क्षत्रवृद्ध के पुत्र थे सुहोत्र। सुहोत्र के तीन पुत्र हुए- काश्य, कुश और गृत्समद। गृत्समद का पुत्र हुआ शुनक। इसी शुनक के पुत्र ऋग्वेदियों में श्रेष्ठ मुनिवर शौनक जी हुए। काश्य का पुत्र काशि, काशि का राष्ट्र, राष्ट्र का दीर्घतमा और दीर्घतमा के धन्वन्तरि। यही आयुर्वेदों के प्रवर्तक हैं। ये यज्ञभाग के भोक्ता और भगवान् वासुदेव के अंश हैं। इनके स्मरण मात्र से ही सब प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं। धन्वन्तरि का पुत्र हुआ केतुमान् और केतुमान् का भीमरथ। भीमरथ का दिवोदास और दिवोदास का द्युमान-जिसका एक नाम प्रतर्दन भी है। यही द्युमान् शत्रुजित्, वत्स, ऋतध्वज और कुवलयाश्व के नाम से भी प्रसिद्ध है। द्युमान् के ही पुत्र अलर्क आदि हुए। *परीक्षित! अलर्क के सिवा और किसी राजा ने छाछठ हजार (६६,०००) वर्ष तक युवा रहकर पृथ्वी का राज्य नहीं भोग। अलर्क का पुत्र हुआ सन्तति, सन्तति का सुनीथ, सुनीथ का सुकेतन, सुकेतन का धर्मकेतु और धर्मकेतु का सत्यकेतु। सत्यकेतु से धृष्टकेतु, धृष्टकेतु से राजा सुकुमार, सुकुमार से वीतिहोत्र, वीतिहोत्र से भर्ग और भर्ग से राजा भार्गभूमि का जन्म हुआ। ये सब-के-सब क्षत्रवृद्ध के वंश में काशिउत्पन्न नरपति हुए। रम्भ के पुत्र का नाम था रभस, उससे गम्भीर और गम्भीर से अक्रिय का जन्म हुआ। अक्रिय की पत्नी से ब्राह्मण वंश चला। अब अनेना का वंश सुनो। *अनेना का पुत्र था शुद्ध, शुद्ध का शुचि, शुचि का त्रिककुद और त्रिककुद का धर्मसारथि। धर्मसारथि के पुत्र थे शान्तरय। शान्तरय आत्मज्ञानी होने के कारण कृतकृत्य थे, उन्हें सन्तान की आवश्यकता न थी। परीक्षित! आयु के पुत्र रजि के अत्यन्त तेजस्वी पाँच सौ पुत्र थे। *देवताओं की प्रार्थना से रजि ने दैत्यों का वध करके इन्द्र को स्वर्ग का राज्य दिया। परन्तु वे अपने प्रह्लाद आदि शत्रुओं से भयभीत रहते थे, इसलिये उन्होंने वह स्वर्ग फिर रजि को लौटा दिया और उनके चरण पकड़कर उन्हीं को अपनी रक्षा का भार भी सौंप दिया। जब रजि की मृत्यु हो गयी, तब इन्द्र के माँगने पर भी रजि के पुत्रों ने स्वर्ग नहीं लौटाया। वे स्वयं ही यज्ञों का भाग भी ग्रहण करने लगे। तब गुरु बृहस्पति जी ने इन्द्र की प्रार्थना से अभिचार विधि से हवन किया। इससे वे धर्म के मार्ग से भ्रष्ट हो गये। इन्द्र ने अनायास ही उन सब रजि के पुत्रों को मार डाला। उनमें से कोई ही न बचा। *क्षत्रवृद्ध के पौत्र कुश से प्रति, प्रति से संजय और संजय से जय का जन्म हुआ। जय से कृत, कृत से राजा हर्यवन, हर्यवन से सहदेव, सहदेव से हीन और हीन से जयसेन नामक पुत्र हुआ। जयसेन का संकृति, संकृति का पुत्र हुआ महारथी वीरशिरोमणि जय। क्षत्रवृद्ध की वंश-परम्परा में इतने ही नरपति हुए। अब नहुष वंश का वर्णन सुनो। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

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"परशुराम जयंती विशेषांक" श्रीमद्भागवत से भगवान परशुरामजी का चरित्र °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°° उर्वशी के गर्भ से पुरुरवा के छः पुत्र हुए---- "आयु, श्रुतायु, सत्यायु, रय, विजय और जय।" श्रुतायु का पुत्र था वसुमान्, सत्यायु का श्रुतंजय, रय का एक और जय का अमित। विजय का भीम, भीम का कांचन, कांचन का होत्र और होत्र का पुत्र था जह्नु। ये जह्नु वही थे, जो गंगा जी को अपनी अंजलि में लेकर पी गये थे। जह्नु का पुत्र था पूरु, पूरु का बलाक और बलाक का अजक। अजक का कुश था। कुश के चार पुत्र थे- कुशाम्बु, तनय, वसु और कुशनाभ। इनमें से कुशाम्बु के पुत्र गाधि हुए। गाधि की कन्या का नाम था सत्यवती। ऋचीक ऋषि ने गाधि से उनकी कन्या माँगी। गाधि ने यह समझकर कि ये कन्या के योग्य वर नहीं है। ऋचीक से कहा------ ‘मुनिवर! हम लोग कुशिक वंश के हैं। हमारी कन्या मिलनी कठिन है। इसलिये आप एक हजार ऐसे घोड़े लाकर मुझे शुल्क रूप में दीजिये, जिनका सारा शरीर तो श्वेत हो, परन्तु एक-एक कान श्याम वर्ण का हो’। जब गाधि ने यह बात कही, तब ऋचीक मुनि उनका आशय समझ गये और वरुण के पास जाकर वैसे ही घोड़े ले आये तथा उन्हें देकर सुन्दरी सत्यवती से विवाह कर लिया। एक बार महर्षि ऋचीक से उनकी पत्नी और सास दोनों ने ही पुत्र प्राप्ति के लिये प्रार्थना की। महर्षि ऋचीक ने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके दोनों के लिये अलग-अलग मन्त्रों से चरु पकाया और स्नान करने के लिये चले गये। सत्यवती की माँ ने यह समझकर कि ऋषि ने अपनी पत्नी के लिये श्रेष्ठ चरु पकाया होगा, उससे वह चरु माँग लिया। इस पर सत्यवती ने अपना चरु तो माँ को दे दिया--- जिससे महाराज गाधि के पुत्र हुए प्रज्वलित अग्नि के समान परमतेजस्वी विश्वामित्र। उन्होंने अपने तपोबल से क्षत्रियत्व का भी त्याग करके ब्रह्मतेज प्राप्त कर लिया। माँ का चरु सत्यवती स्वयं खा गयी। जब ऋचीक मुनि को इस बात का पता चला, तब उन्होंने अपनी पत्नी सत्यवती से कहा कि ‘तुमने बड़ा अनर्थ कर डाला। अब तुम्हारा पुत्र तो लोगों को दण्ड देने वाला घोर प्रकृति का होगा और तुम्हारा भाई एक श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता’। सत्यवती ने ऋचीक मुनि को प्रसन्न किया और प्रार्थना की----- ‘स्वामी! ऐसा नहीं होना चाहिये।' तब उन्होंने कहा------ ‘अच्छी बात है। पुत्र के बदले तुम्हारा पौत्र वैसा (घोर प्रकृति का) होगा।’ समय पर सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि का जन्म हुआ। सत्यवती समस्त लोकों को पवित्र करने वाली परम पुण्यमयी ‘कौशिकी’ नदी बन गयी। रेणु ऋषि की कन्या थी रेणुका। जमदग्नि ने उसका पाणिग्रहण किया। रेणुका के गर्भ से जमदग्नि ऋषि के वसुमान् आदि कई पुत्र हुए। उनमें से सबसे छोटे परशुराम जी थे। उनका यश सारे संसार में प्रसिद्ध है। हैहय वंश का अन्त करने के लिये स्वयं भगवान ने ही परशुराम के रूप में अंशावतार ग्रहण किया था। उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियहीन कर दिया। यद्यपि क्षत्रियों ने उनका थोडा-सा ही अपराध किया था-फिर भी वे लोग बड़े दुष्ट, ब्राह्मणों के अभक्त, रजोगुणी और विशेष करके तमोगुणी हो रहे थे। यही कारण था कि वे पृथ्वी के भार हो गये थे और इसी के फलस्वरूप भगवान परशुराम ने उनका नाश करके पृथ्वी का भार उतार दिया। हैहय वंश का अधिपति था अर्जुन। वह एक श्रेष्ठ क्षत्रिय था। उसने अनेकों प्रकार की सेवा-शुश्रूषा करके भगवान नारायण के अंशावतार दत्तात्रेय जी को प्रसन्न कर लिया और उनसे एक हजार भुजाएँ तथा कोई शत्रु यद्ध में पराजित न कर सके-यह वरदान प्राप्त कर लिया। साथ ही इन्द्रियों का अबाध बल, अतुल सम्पत्ति, तेजस्विता, वीरता, कीर्ति और शारीरिक बल भी उसने उनकी कृपा से प्राप्त कर लिये थे। वह योगेश्वर हो गया था। उसमें ऐसा ऐश्वर्य था कि सूक्ष्म-से-सूक्ष्म, स्थूल-से-स्थूल रूप धारण कर लेता। सभी सिद्धियाँ उसे प्राप्त थीं। वह संसार में वायु की तरह सब जगह बेरोक-टोक विचरा करता। एक दिन सहस्रबाहु अर्जुन शिकार खेलने के लिये बड़े घोर जंगल में निकल गया था। दैववश वह जमदग्नि मुनि के आश्रम पर जा पहुँचा। परम तपस्वी जमदग्नि मुनि के आश्रम में कामधेनु रहती थी। उसके प्रताप से उन्होंने सेना, मन्त्री और वाहनों के साथ हैहयाधिपति का खूब स्वागत-सत्कार किया। वीर हैहयाधिपति ने देखा कि जमदग्नि मुनि का ऐश्वर्य तो मुझसे भी बढ़ा-चढ़ा है। इसलिये उसने उनके स्वागत-सत्कार को कुछ भी आदर न देकर कामधेनु को ही ले लेना चाहा। उसने अभिमानवश जमदग्नि मुनि से माँगा भी नहीं, अपने सेवकों को आज्ञा दी कि कामधेनु को छीन ले चलो। उसकी आज्ञा से उसके सेवक बछड़े के साथ ‘बाँ-बाँ’ डकराती हुई कामधेनु को बलपूर्वक माहिष्मतीपुरी ले गये। जब वे सब चले गये, तब परशुराम जी आश्रम पर आये और उसकी दुष्टता का वृतान्त सुनकर चोट खाये हुए साँप की तरह क्रोध से तिलमिला उठे। वे अपना भयंकर फरसा, तरकस, ढाल एवं धनुष लेकर बड़े वेग से उसके पीछे दौड़े-जैसे कोई किसी से न दबने वाला सिंह हाथी पर टूट पड़े। सहस्राबाहु अर्जुन अभी अपने नगर में प्रवेश कर ही रहा था कि उसने देखा परशुराम जी महाराज बड़े वेग से उसी की ओर झपटे आ रहे हैं। उनकी बड़ी विलक्षण झाँकी थी। वे हाथ में धनुष-बाण और फरसा लिये हुए थे, शरीर पर काला मृगचर्म धारण किये हुए थे और उनकी जटाएँ सूर्य की किरणों के समान चमक रही थीं। उन्हें देखते ही उसने गदा, खड्ग, बाण, ऋष्टि, शतघ्नी और शक्ति आदि आयुधों से सुसज्जित एवं हाथी, घोड़े, रथ तथा पदातियों से युक्त अत्यन्त भयंकर सहस्र अक्षौहिणी सेना भेजी। भगवान् परशुराम ने बात-की-बात में अकेले ही उस सारी सेना को नष्ट कर दिया। भगवान् परशुराम जी की गति मन और वायु के समान थी। वे शत्रु की सेना काटते ही जा रहे थे। जहाँ-जहाँ वे अपने फरसे का प्रहार करते, वहाँ-वहाँ सारथि और वाहनों के साथ बड़े-बड़े वीरों की बाँहें, जाँघें और कंधे कट-कटकर पृथ्वी पर गिरते जाते थे। हैहयाधिपति अर्जुन ने देखा कि मेरी सेना के सैनिक, उनके धनुष, ध्वजाएँ और ढाल भगवान् परशुराम के फरसे और बाणों से कट-कटकर खून से लथपथ रणभूमि में गिर गये हैं, तब उसे बड़ा क्रोध आया और वह स्वयं भिड़ने के लिये आ धमका। उसने एक साथ ही अपनी हजार भुजाओं से पाँच सौ धनुषों पर बाण चढ़ायें और परशुराम जी पर छोड़े। परन्तु परशुराम जी तो समस्त शस्त्रधारियों के शिरोमणि ठहरे। उन्होंने अपने एक धनुष पर छोड़े हुए बाणों से ही एक साथ सबको काट डाला। अब हैहयाधिपति अपने हाथों से पहाड़ और पेड़ उखाड़कर बड़े वेग से युद्धभूमि में परशुराम जी की ओर झपटा। परन्तु परशुराम जी ने अपनी तीखी धार वाले फरसे से बड़ी फुर्ती के साथ उसकी साँपों के समान भुजाओं को काट डाला। जब उसकी बाँहें कट गयीं, तब उन्होंने पहाड़ की चोटी की तरह उसका ऊँचा सिर धड़ से अलग कर दिया। पिता के मर जाने पर उसके दस हजार लड़के डरकर भाग गये। विपक्षी वीरों के नाशक परशुराम जी ने बछड़े के साथ कामधेनु लौटा ली। एक दिन की बात है, परशुराम जी की माता रेणुका गंगा तट पर गयी हुई थीं। वहाँ उन्होंने देखा कि गन्धर्वराज चित्ररथ कमलों की माला पहने अप्सराओं के साथ विहार कर रहा है। वे जल लाने के लिये नदी तट पर गयी थीं, परन्तु वहाँ जलक्रीड़ा करते हुए गन्धर्व को देखने लगीं और पतिदेव के हवन का समय हो गया है-इस बात को भूल गयीं। उनका मन कुछ-कुछ चित्ररथ की ओर खिंच भी गया था। हवन का समय बीत गया, यह जानकर वे महर्षि जमदग्नि के शाप से भयभीत हो गयीं और तुरंत वहाँ से आश्रम पर चली आयीं। वहाँ जल का कलश महर्षि के सामने रखकर हाथ जोड़ खड़ी हो गयीं। जमदग्नि मुनि ने अपनी पत्नी का मानसिक व्यभिचार जान लिया और क्रोध करके कहा------ ‘मेरे पुत्रों! इस पापिनी को मार डालो।’ परन्तु उनके किसी भी पुत्र ने उनकी वह आज्ञा स्वीकार नहीं की। इसके बाद पिता की आज्ञा से परशुराम जी ने माता के साथ सब भाइयों को मार डाला। क्योंकि वे अपने पिताजी के योग और तपस्या का प्रभाव भली भाँति जानते थे। परशुराम जी के इस काम से सत्यवतीनन्दन महर्षि जमदग्नि बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा----- ‘बेटा! तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँग लो।’ परशुराम जी ने कहा------ ‘पिताजी! मेरी माता और सब भाई जीवित हो जायें तथा उन्हें इस बात की याद न रहे कि मैंने उन्हें मारा था’। परशुराम जी के इस प्रकार कहते ही जैसे कोई सोकर उठे, सब-के-सब अनायास ही सकुशल उठ बैठे। परशुराम जी ने अपने पिताजी का तपोबल जानकर ही तो अपने सुहृदों का वध किया था। एक दिन की बात है, परशुराम जी अपने भाइयों के साथ आश्रम से बाहर वन की ओर गये हुए थे। यह अवसर पाकर वैर साधने के लिये सहस्रबाहु के लड़के वहाँ आ पहुँचे। उस समय महर्षि जमदग्नि अग्निशाला में बीते हुए थे और अपनी समस्त वृत्तियों से पवित्रकीर्ति भगवान् के ही चिन्तन में मग्न हो रहे थे। उन्हें बाहर की कोई सुध न थी। उसी समय उन पापियों ने जमदग्नि ऋषि को मार डाला। उन्होंने पहले से ही ऐसा पापपूर्ण निश्चय कर रखा था। परशुराम की माता रेणुका बड़ी दीनता से उनसे प्रार्थना कर रही थीं, परन्तु उन सबों ने उनकी एक न सुनी। वे बलपूर्वक महर्षि जमदग्नि का सिर काटकर ले गये। वास्तव में वे नीच क्षत्रिय अत्यन्त क्रूर थे। सती रेणुका दुःख और शोक से आतुर हो गयीं। वे अपने हाथों अपनी छाती और सिर पीट-पीटकर जोर-जोर से रोने लगीं---- ‘परशुराम! बेटा परशुराम! शीघ्र आओ’। परशुराम जी ने बहुत दूर से माता का ‘हा राम!’ यह करुण-क्रन्दन सुन लिया। वे बड़ी शीघ्रता से आश्रम पर आये और वहाँ आकर देखा कि पिताजी मार डाले गये हैं। उस समय परशुराम जी को बड़ा दुःख हुआ। साथ ही क्रोध, असहिष्णुता, मानसिक पीड़ा और शोक के वेग से वे अत्यन्त मोहित हो गये। ‘हाय पिता जी! आप तो बड़े महात्मा थे। पिता जी! आप तो धर्म के सच्चे पुजारी थे। आप हम लोगों को छोड़कर स्वर्ग चले गये’। इस प्रकार विलाप कर उन्होंने पिता का शरीर तो भाइयों को सौंप दिया और स्वयं हाथ से फरसा उठाकर क्षत्रियों को संहार कर डालने का निश्चय किया। परशुराम जी ने माहिष्मती नगरी में जाकर सहस्रबाहु अर्जुन के पुत्रों के सिरों से नगर के बीचों-बीच एक बड़ा भारी पर्वत खड़ा कर दिया। उस नगर की शोभा तो उन ब्रह्मघाती नीच क्षत्रियों के कारण ही नष्ट हो चुकी थी। उनके रक्त से एक बड़ी भयंकर नदी बह निकली, जिसे देखकर ब्राह्मणद्रोहियों का हृदय भय से काँप उठता था। भगवान् ने देखा कि वर्तमान क्षत्रिय अत्याचारी हो गये हैं। उन्होंने अपने पिता के वध को निमित्त बनाकर इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय हीन कर दिया और कुरुक्षेत्र के समन्त पंचक में ऐसे-ऐसे पाँच तालाब बना दिये, जो रक्त के जल से भरे हुए थे। परशुराम जी ने अपने पिता जी का सिर लाकर उनके धड़ से जोड़ दिया और यज्ञों द्वारा सर्वदेवमय आत्म स्वरूप भगवान का यजन किया। यज्ञों में उन्होंने---- पूर्व दिशा होता को। दक्षिण दिशा ब्रह्मा को। पश्चिम दिशा अध्वर्यु को। उत्तर दिशा उद्गाता को दे दी। इसी प्रकार अग्निकोण आदि विदिशाएँ ऋत्विजों को दीं, कश्यप जी को मध्यभूमि दी, उपद्रष्टा को आर्यावर्त दिया तथा दूसरे सदस्यों को अन्यान्य दिशाएँ प्रदान कर दीं। इसके बाद यज्ञान्त-स्नान करके वे समस्त पापों से मुक्त हो गये और ब्रह्मनदी सरस्वती के तट पर मेघ रहित सूर्य के समान शोभायमान हुए। महर्षि जमदग्नि को स्मृतिरूप संकल्प मय शरीर की प्राप्ति हो गयी। परशुराम जी से सम्मानित होकर वे सप्तर्षियों के मण्डल में सातवें ऋषि हो गये। कमललोचन जमदग्नि नन्दन भगवान् परशुराम आगामी मन्वन्तर में सप्तर्षियों के मण्डल में रहकर वेदों का विस्तार करेंगे। वे आज भी किसी को किसी प्रकार का दण्ड न देते हुए शान्त चित्त से महेन्द्र पर्वत पर निवास करते हैं। वहाँ सिद्ध, गन्धर्व और चारण उनके चरित्र का मधुर स्वर से गान करते रहते हैं। सर्वशक्तिमान् विश्वात्मा भगवान् श्रीहरि ने इस प्रकार भृगुवंशियों में अवतार ग्रहण करके पृथ्वी के भारभूत राजाओं का बहुत बार वध किया।

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sn vyas May 15, 2021

🌹🌹🌹 *नारद मोह* 🌹🌹🌹 ☘☘☘ *भाग 2*☘☘☘ 🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻 ---------- गतांक से आगे ----- सज्जनों --- जय विजय ने सनतकुमारो को रोका । सनतकुमारो ने कहा हम तो माता लक्ष्मी एवं पिता नारायण से मिलने जा रहे हैं । आज तक तो मुझे किसी ने कभी भी नही रोका ,और न ही हमे कहीं आने जाने के लिये किसी से आज्ञा लेनी पडती है , इसलिये मेरा रास्ता न रोको ।द्वारपालो ने कहा महराज ! आप लोग यहीं रुके मै अन्दर जाकर आज्ञा लेकर आता हुँ उसके बाद आप चले जाना । चारो कुमार यह सुनते ही क्रोधित हो गये । मित्रों ध्यान दीजियेगा मनुष्य जब कोई कार्य करता है और उसमे पराजित हो जाता है तब मानव निराश हो जाता है ।वह काम करते करते रुक जाता है । पराजय मानव की गति मे रुकावट बनती है । परन्तु गोस्वामी बाबा की दृष्टि मे पराजय की गति की रुकावट है ऐसा नही है । जय विजय भी खतरा उत्पन्न करते है ।प्रभु के पास जाते समय जितना पराजय बाधक बनता है उतना ही जय विजय का अहम भी बाधक बनता है । सज्जनों बैकुण्ठ मे जाने के बाद भी सनतकुमारो एवं पहरेदारो का अहंकार बना हुआ है ।दोनो ओर से वाक युद्ध प्रारम्भ हो गया । सनत कुमारो को अहम है कि हम अपने तपोबल से भगवान के इतने निकट है फिर भी मुझे रोक रहे है । और द्वारपालो को अहम है कि हम अपनी अर्जित तप के द्वारा भगवान के द्वार पर है । मेरा कोई क्या कर सकता है ? मित्रों अहंकारी मानव कितना भी उँचा पद प्राप्त कर ले वही से नीचे गिरता है । अहं छूटने का एक ही उपाय है प्रभू की शरणागति । संतो ने दोनो को समझाया कि हम तो संत है ,प्रभु के दर्शन करने आये है पर जय विजय अपनी बात पर अडे है बिना आज्ञा के प्रवेश सम्भव नही है । संत क्रोधित हो गये । जय विजय को श्राप देते हुये कहा , जाओ तुम दोनो का पतन होगा और तुमने मुझे तीन बार रोका है इसलिये 3 जन्मो तक घोर राक्षस बनो । अन्दर बैठे प्रभु सुन रहे थे । प्रभू तत्क्षण वहाँ पर आ गये और आते ही सनतकुमारो को प्रणाम किया । जैसे ही भगवान के मुख का दर्शन किया संतो ने क्रोध तत्छण शान्त हो गया । संतो ने कहा महराज भूल हो गयी क्रोध के बस मे आकर मैने इन्हे श्राप दे दिया है । भगवान ने कहा ,आप ने कोई भूल नही किया ,आपने बहुत अच्छा किया ,मै तो कहता हुँ महात्मन आप मुझे भी दण्ड दे क्यूँकि सेवक की भूल की सजा उसके मालिक को भी मिलनी चाहिये । सनतकुमारो को अपनी भूल का अहसास हुआ । प्रभू से छमा माँगने लगे और कहा कि मै दिया श्राप तो वापस नही ले सकता लेकिन इतना जरुर कहता हुँ कि आप के हाथों सदगति प्राप्त करके तीन जन्मो के बाद पुनःआपके पार्षद बन जायेंगे । भगवान वहीं से मुनियों को बिदा कर दिया । एक बार भी अन्दर चलने के लिये नही कहा । क्रोध करने के कारण सनत्कुमारो को प्रभु के द्वार से ही लौटना पडा । किन्तु उनका क्रोध सात्विक था । वे द्वारपाल भगवान के दर्शन मे बाधक बन रहे थे इसलिये क्रोधित हुये । अतः भगवान ने अनुग्रह करके द्वार पर आये सनतकुमारो को दर्शन तो दिया किन्तु भगवान के महल मे प्रवेश नही पा सके । ज्ञानी के लिये ज्ञानमार्ग मे अभिमान विघ्नकर्ता है ।अभिमान के मूल मे यही क्रोध है । मित्रों यही जय विजय पहले जन्म मे *हिरणाक्ष्य एवं हिरण्यकश्यप* हुये जिन्हे भगवान ने *वाराह एवं नरसिंह* अवतार लेकर उद्धार किया । दूसरा जन्म *रावण एवं कुम्भकर्ण* रुप मे लिया जिन्हे *श्रीराम* जी ने मार कर उद्धार किया , लेकिन मुक्ति नही मिली क्यूँ ? *मुकुत न भए हते भगवाना । तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना ।।* तीसरा जन्म इन्हे पुनः *शिशुपाल एवं दंतवक्र* के रुप मे लिया वहाँ पर *भगवान कृष्ण* के हाथों मारे गये और तब इनका उद्धार हुआ । भगवान शिव माता पार्वती जी से बता रहे है कि यह वही समय था देवी जब कश्यप एवं अदित दशरथ कौशल्या बने थे । भगवान राम के अवतार लेने का दूसरा कारण था वृन्दा का श्राप ------ ---------- क्रमशः -------------- 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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Renu Singh May 13, 2021

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Yogi Kashyap May 13, 2021

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