basant prasad
basant prasad Sep 12, 2017

कलश का महत्व पूजन अनुष्ठान में,

कलश का महत्व पूजन अनुष्ठान में,
कलश का महत्व पूजन अनुष्ठान में,

सभी धार्मिक कार्यों में कलश का बड़ा महत्व है। जैसे मांगलिक कार्यों का शुभारंभ, नया व्यापार, नववर्ष आरंभ, गृहप्रवेश, दिवाली पूजन, यज्ञ-अनुष्ठान, दुर्गा पूजा आदि के अवसर पर सबसे पहले कलश स्थापना की जाती है।

धर्मशास्त्रों के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है। देवी पुराण के अनुसार मां भगवती की पूजा-अर्चना करते समय सर्वप्रथम कलश की स्थापना की जाती है। नवरा‍त्रि के दिनों में मंदिरों तथा घरों में कलश स्थापित किए जाते हैं तथा मां दुर्गा की विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है।

यह कलश विश्व ब्रह्मांड, विराट ब्रह्मा एवं भू-पिंड यानी ग्लोब का प्रतीक माना गया है। इसमें सम्पूर्ण देवता समाए हुए हैं। पूजन के दौरान कलश को देवी-देवता की शक्ति, तीर्थस्थान आदि का प्रतीक मानकर स्थापित किया जाता है।

कलश के मुख में विष्णुजी का निवास, कंठ में रुद्र तथा मूल में ब्रह्मा स्थित हैं और कलश के मध्य में दैवीय मातृशक्तियां निवास करती हैं।

जय भोले भंडारी की जय

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Swami Lokeshanand May 27, 2019

बड़ी गंभीर बात है, आज असली और नकली का खेल समझना है। विभक्त माने जो टूट गया, भक्त माने जो जुड़ गया। हर कोई कहीं ना कहीं जुड़ा ही है, तो भक्त तो सब हैं, पर सबको एक जैसा फल नहीं मिलता, क्योंकि असली बात है कि कौन कहाँ जुड़ा है? भगवान से जुड़ा हुआ असली भक्त है, संसार पर दृष्टि वाला नकली भक्त है, उसे तो भक्त कहा भी नहीं जाता, आसक्त कहा जाता है। रामकथा में असली और नकली भक्ति के अंतर को सीताजी के माध्यम से दिखाया गया है। सीताजी जब असली थीं, तब रामजी और अयोध्या में से चुनना था, तो रामजी को चुना, सुख साधन का त्याग किया, दुर्गम वन का मार्ग पकड़ा। आज नकली बैठी हैं, तो रामजी से दृष्टि हट गई, स्वर्णमृग पर पड़ गई। गहनता से विचार करें, असली भक्ति में दुख नहीं है, दुख तो नकली भक्ति का फल है। देखें, सीताजी जब तक जनकजी के यहाँ रहीं, उन्हें कोई दुख नहीं था। रामजी से विवाह कर अवध आईं तब तो दुख होता ही क्यों? वनवास की सुबह, अयोध्या छोड़ कर, तपस्वी वेषधारी रामजी के पीछे चलते हुए भी, उनके मुख मंडल पर वही स्वाभाविक मुस्कान तैर रही थी, जो पिछली रात सोने जाते समय थी। यहाँ तक की लम्बे वनवासकाल में, सर्दी गर्मी वर्षा में, नंगे पैर पथरीली कंकरीली पगडंडियों पर चलते हुए भी उन्हें दुखानुभूति नहीं हुई। पर जिस दिन दृष्टि राम जी से हटी और संसार रूपी मारीच पर पड़ी, उनकी दुख की यात्रा प्रारंभ हो गई। वास्तव में भगवान से दृष्टि लग जाना ही सुख है, और संसार से दृष्टि लग जाना ही दुख है। इन्द्रियों का बहिर्मुखी, अधोमुखी, संसारोन्मुखी प्रवाह ही दुख नाम से, और अन्तर्मुखी, ऊर्ध्वमुखी, परमात्मोन्मुखी प्रवाह ही सुख नाम से जाना जाता है। तो येन् केन् प्रकारेन् भगवान में वृति लगाए रखने वाले को दुख छू नहीं पाता। यह विडियो भी देखें- तुम पावक महुँ करहु निवासा https://youtu.be/agl8M3skRo8 और https://youtu.be/BYTcbh0B0nU

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Anju Mishra May 26, 2019

🙏🌹🚩🙏जय श्री कृष्णा 🙏🌹🚩🙏 कृष्ण के जीवन से सीख कृष्ण को पूरा बृज प्यार और सम्मान करता था क्योकि वो दूसरों की मदद करते थे और दूसरो के दुखो को भी दूर करते थे. प्रत्येक व्यक्ति अपनी यथा शक्ति दूसरों की मदद जरूर करनी चाहिए. कृष्ण पृथ्वी से दुष्टों का, बुराईयों का नाश किया और मानव को सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी. उन्होंने मानव समाज को सीख दे अच्छे कर्म का फल हमेशा अच्छा ही होता हैं और बुरे कर्म का फल हमेशा बुरा ही होता हैं. कृष्ण ने दुष्टों को भी अपनी गलती सुधारने का मौका दिया क्योकि वो किसी मनुष्य को नही उसके अंदर के बुराई को मारना चाहते थे. कृष्ण ने द्रोपदी के सम्मान की रक्षा के लिए एक बार बुलाने पर स्वयं आ गये क्योकि जब वीरों से भरा समाज किसी स्त्री की रक्षा करने में असमर्थ होता हैं तो भगवान् को स्वयं ही आना पड़ता हैं. भगवान् कृष्ण ने जैसे ही जाना अपने मित्र सुदामा की गरीबी को तो वो तीनों लोक अपने मित्र के नाम कर दिया. मित्र को लेने नंगे पाँव घर के बाहर आये और अपनी गद्दी पर बिठाकर उनका सम्मान किया. मानव समाज के लिए उनकी मित्रता एक मिसाल हैं.

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