ताहि अहीर की छोहरिया छछिया भर छाछ पे नाच नचावै,, कृष्ण जन्मोत्सव की अनेकानेक शुभकामनाएं.... अद्भुत है श्रीकृष्ण-चरित्र...... जिनको मुनियों के मनन में नहिं आते देखा। गोकुल में उन्हें गाय चराते देखा। हद नहीं पाते हैं अनहद में भी योगी जिनकी। तीर यमुना के उन्हें वंशी बजाते देखा। जिनकी माया ने चराचर को नचा रखा है गोपियों में उन्हें खुद नाचते गाते देखा। जो रमा के हैं रमण, विश्व के पति ‘राधेश्याम’। ब्रज में आके उन्हैं माखन को चुराते देखा। श्रीकृष्ण चरित्र में अद्भुत विरोधाभास:- भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की प्रत्येक लीला में विलक्षणता दिखाई देती है। वह अजन्मा होकर पृथ्वी पर जन्म लेते हैं, सर्वशक्तिमान होने पर भी कंस के कारागार में जन्म लेते हैं। माता पिता हैं देवकी और वसुदेव; किन्तु नन्दबाबा और यशोदा द्वारा पालन किए जाने के कारण उनके पुत्र ‘नंदनन्दन’ और ‘यशोदानन्दन’ कहलाते हैं। राक्षसी पूतना ने अपने स्तनों में कालकूट विष लगाकर श्रीकृष्ण को मार डालने की इच्छा से स्तनपान कराया किन्तु दयामय कृष्ण ने मातावेष धारण करने वाली पूतना को माता के समान सद्गति दे दी, ऐसा अद्भुत और दयालु चरित्र किसी और देवता का नहीं है। योगमाया के स्वामी होने से श्रीकृष्ण समस्त सृष्टि को बंधन में रखने की क्षमता रखते हैं, फिर भी स्वयं माता के द्वारा ऊखल से बांधे जाते हैं और ‘दामोदर’ कहलाते हैं। तीन पग भूमि मांग कर जिसने राजा बलि को छला वे नन्दभवन की चौखट नहीं लांघ पाते:- तीन पैंड़ भूमि मांगि बलि लियौ छलि, चौखट न लांघी जाय रहयौ सो मचलि। नन्दरायजी नौ लाख गायों के स्वामी और व्रजराज हैं, फिर भी श्रीकृष्ण स्वयं गाय चराने जाते हैं। श्रीकृष्ण माता यशोदा से कहते हैं:- मैया री! मैं गाय चरावन जैहों। तूं कहि, महरि! नंदबाबा सौं, बड़ौ भयौ, न डरैहों॥ जो ‘सहस्त्राक्ष’ हैं, सारे संसार पर जिनकी नजर रहती है, उन श्रीकृष्ण को यशोदामाता डिठौना लगाकर नजर उतारती हैं। आसुरीमाया से श्रीकृष्ण की रक्षा के लिए रक्षामन्त्रों से जल अभिमन्त्रित कर उन्हें पिलाती हैं; इतना ही नहीं:- देखौ री जसुमति बौरानी, घर-घर हाथ दिखावति डोलति, गोद लियें गोपाल बिनानी।। जगत के पालनहार व पोषणकर्ता होने पर भी श्रीकृष्ण व्रजगोपिकाओं के यहां दधि-माखन की चोरी करते हैं। स्वयं के घर में दूध, दही माखन का भंडार होने पर भी गोपियों से एक छोटा पात्र छाछ की याचना करते हैं और उसके लिए गोपिकाओं के सामने नाचने को तैयार हो जाते हैं:- ब्रज में नाचत आज कन्हैया मैया तनक दही के कारण। तनक दही के कारण कान्हां नाचत नाच हजारन।। नन्दराय की गौशाला में बंधी हैं गैया लाखन। तुम्हें पराई मटुकी को ही लागत है प्रिय माखन।। गोपी टेरत कृष्ण ललाकूँ इतै आओ मेरे लालन। तनक नाच दे लाला मेरे, मैं तोय दऊँगी माखन।। (रसिया) प्रेम की झिड़कियाँ भी मीठी होती हैं–मार भी मीठी लगती है। सलोना श्यामसुन्दर व्रजमण्डल के प्रेमसाम्राज्य में छाछ की ओट से इसी रस के पीछे अहीर की छोकरियों के इशारों पर तरह-तरह के नाच नाचता-फिरता है–‘ताहि अहीरकी छोहरियाँ, छछियाभरि छाछपै नाच नचावैं’ (रसखान) और श्रीकृष्ण एक होकर ही असंख्य गोपियों के साथ असंख्य रूपों में रासक्रीडा करते हैं। परब्रह्म श्रीकृष्ण की लीला से दुर्वासा ऋषि भी हुए भ्रमित:- दुर्वासा ऋषि गोकुल में परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण के दर्शनों की अभिलाषा से आते हैं, किन्तु उन्होंने परब्रह्म को किस रूप में देखा–सारे अंग धूलधूसरित हो रहे हैं, केश बिखरे हुए, श्रीअंग पर कोई वस्त्र नहीं, दिगम्बर वेष है, और सखाओं के साथ दौड़े जा रहे हैं। मुनि ने सोचा–’क्या ये ईश्वर हैं? अगर भगवान हैं तो फिर बालकों की भांति पृथ्वी पर क्यों लोट रहे हैं? दुर्वासा ऋषि भगवान की योगमाया से भ्रमित होकर कहने लगे ’नहीं, ये ईश्वर नहीं ये तो नन्द का पुत्रमात्र है।’ प्रकृति की पाठशाला से पढ़ा जीवन का पाठ:- यह एक विलक्षण बात थी कि राज-परिवार के स्नेह-सत्कार को छोड़कर गोपों के बीच जन्म से ही संघर्ष का पाठ पढ़ने के लिए भगवान कृष्ण मथुरा से गोकुल आ गए। जिस व्यक्ति को आगे चलकर राजनीति की दृढ़ स्थापना और एक उच्च जीवनदर्शन स्थापित करना था; उन्होंने अपना आरम्भिक जीवन बिताने के लिए गो-पालकों का नैसर्गिक जीवन और प्रकृति का सुन्दर वातावरण चुना क्योंकि उन्हें पहले पृथ्वी से सहज रस लेना था। अत: वन उनकी पहली पाठशाला थी और उनके शिक्षक मुक्त और निर्भीक गो-पालक थे। सांदीपनि ऋषि की पाठशाला में दाखिल होने से पहले ही वे जीवन की पाठशाला से स्नातक हो चुके थे। वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।। मुरली का माधुर्य और पांचजन्य-शंख का घोर निनाद:- श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व में हृदय को विमुग्ध करने वाली बांसुरी और शौर्य के प्रतीक सुदर्शन चक्र का अद्भुत समन्वय हुआ है। कहां तो यमुनातट और निकुंज में मुरली के मधुरनाद से व्रजबालाओं को आकुल करना और कहां पांचजन्य-शंख के भीषण निनाद से युद्धक्षेत्र को प्रकम्पित करना। अपने मुरलीनाद से जहां उन्होंने धरती के सोये हुए भाव जगाये; वहीं पांचजन्य के शंखनाद से, कौमोदकी गदा के भीषण प्रहार से, शांर्गधनुष के बाणों के आघात से, धूमकेतु के समान कृपाण से और अनन्त शक्तिशाली सुदर्शन चक्र से भारतभूमि को अत्याचारी, अधर्मी व लोलुप राजाओं से विहीन कर दिया। अतुल नेतृत्व-शक्ति रखते हुए भी दूत और सारथि का काम किया और युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ में अग्रपूजा के योग्य माने जाने पर भी जूठी पत्तलें उठाने का कार्य किया। चरित्र की ऐसी विलक्षणता और कहीं देखने को नहीं मिलती। श्रीकृष्ण का अद्भुत अनासक्ति योग:- श्रीकृष्ण की जीवन को तटस्थ (सम) भाव से देखने की प्रवृति की शुरुआत तो जन्मकाल से ही हो गयी थी। जन्म से ही माता-पिता की ममता छोड़ नन्द-यशोदा के घर रहे। सहज स्नेह रखने वाली गोपियों से नाता जोड़ा और उन्हें तड़पता छोड़ मथुरा चले गए। फिर मथुरा को छोड़ द्वारका चले आए परन्तु यदुकुल में कभी आसक्त नहीं रहे। कोई भी स्नेह उन्हें बांध न सका। पाण्डवों का साथ हुआ पर पाण्डवों को महाभारत का युद्ध जिताकर उन्हें छोड़कर चले गए। पृथ्वी का उद्धार किया और पृथ्वी पर प्रेमयोग व गीता द्वारा ज्ञानयोग की स्थापना की; पर पृथ्वी को भी चुपचाप, निर्मोही होकर छोड़कर चले गये। ममता के जितने भी प्रतीक हैं, उन सबको उन्होंने तोड़ा। गोरस (दूध, दही, माखन) की मटकी को फोड़ने से शुरु हुआ यह खेल, कौरवों की अठारह अक्षौहिणी सेना के विनाश से लेकर यदुकुल के सर्वनाश पर जाकर खत्म हुआ। द्वारकालीला में सोलह हजार एक सौ आठ रानियां, उनके एक-एक के दस-दस बेटे, असंख्य पुत्र-पौत्र और यदुवंशियों का लीला में एक ही दिन में संहार करवा दिया, हंसते रहे और यह सोचकर संतोष की सांस ली कि पृथ्वी का बचा-खुचा भार भी उतर गया। क्या किसी ने ऐसा आज तक किया है? वही श्रीकृष्ण अपने प्रिय सखा उद्धवजी को व्रज में भेजते समय कहते हैं–’उद्धव! तुम व्रज में जाओ, मेरे विरह में गोपिकाएं मृतवत् पड़ी हुईं हैं, मेरी बात सुनाकर उन्हें सांन्त्वना दो।’ भगवान की सारी लीला में एक बात दिखती है कि उनकी कहीं पर भी आसक्ति नहीं है। इसीलिए महर्षि व्यास ने उन्हें प्रकृतिरूपी नटी को नचाने वाला सूत्रधार और ‘कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्’ कहा है। यही कारण है कि प्रत्येक भारतीय माता अपनी गोद श्रीकृष्ण के बालरूप (गोपालजी) से ही भरना चाहती है और प्रत्येक स्त्री अपने प्रेम में उसी निर्मोही के मोहनरूप की कामना करती है। रम रहे विश्व में, फिर भी रहते हो न्यारे-न्यारे। पर सुना प्रेम के पीछे फिरते हो मारे-मारे,, जय श्री कृष्ण राधे राधे ( प्रेषक अज्ञात )

ताहि अहीर की छोहरिया
छछिया भर छाछ पे नाच नचावै,,
कृष्ण जन्मोत्सव की अनेकानेक शुभकामनाएं....
अद्भुत है श्रीकृष्ण-चरित्र......

जिनको मुनियों के मनन में नहिं आते देखा।
गोकुल में उन्हें गाय चराते देखा।
हद नहीं पाते हैं अनहद में भी योगी जिनकी।
तीर यमुना के उन्हें वंशी बजाते देखा।
जिनकी माया ने चराचर को नचा रखा है
गोपियों में उन्हें खुद नाचते गाते देखा।
जो रमा के हैं रमण, विश्व के पति ‘राधेश्याम’।
ब्रज में आके उन्हैं माखन को चुराते देखा।
श्रीकृष्ण चरित्र में अद्भुत विरोधाभास:-
भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की प्रत्येक लीला में विलक्षणता दिखाई देती है। 
वह अजन्मा होकर पृथ्वी पर जन्म लेते हैं, सर्वशक्तिमान होने पर भी कंस के कारागार में जन्म लेते हैं।
माता पिता हैं देवकी और वसुदेव; किन्तु नन्दबाबा और यशोदा द्वारा पालन किए जाने के कारण उनके पुत्र ‘नंदनन्दन’ और ‘यशोदानन्दन’ कहलाते हैं।
राक्षसी पूतना ने अपने स्तनों में कालकूट विष लगाकर श्रीकृष्ण को मार डालने की इच्छा से स्तनपान कराया किन्तु दयामय कृष्ण ने मातावेष धारण करने वाली पूतना को माता के समान सद्गति दे दी, ऐसा अद्भुत और दयालु चरित्र किसी और देवता का नहीं है।
योगमाया के स्वामी होने से श्रीकृष्ण समस्त सृष्टि को बंधन में रखने की क्षमता रखते हैं, फिर भी स्वयं माता के द्वारा ऊखल से बांधे जाते हैं और ‘दामोदर’ कहलाते हैं।
तीन पग भूमि मांग कर जिसने राजा बलि को छला वे नन्दभवन की चौखट नहीं लांघ पाते:-
तीन पैंड़ भूमि मांगि बलि लियौ छलि,
चौखट न लांघी जाय रहयौ सो मचलि।
नन्दरायजी नौ लाख गायों के स्वामी और व्रजराज हैं, फिर भी श्रीकृष्ण स्वयं गाय चराने जाते हैं।
श्रीकृष्ण माता यशोदा से कहते हैं:-
मैया री! मैं गाय चरावन जैहों।
तूं कहि, महरि! नंदबाबा सौं, बड़ौ भयौ, न डरैहों॥
जो ‘सहस्त्राक्ष’ हैं, सारे संसार पर जिनकी नजर रहती है, उन श्रीकृष्ण को यशोदामाता डिठौना लगाकर नजर उतारती हैं।
आसुरीमाया से श्रीकृष्ण की रक्षा के लिए रक्षामन्त्रों से जल अभिमन्त्रित कर उन्हें पिलाती हैं; इतना ही नहीं:-
देखौ री जसुमति बौरानी,
घर-घर हाथ दिखावति डोलति,
गोद लियें गोपाल बिनानी।।
जगत के पालनहार व पोषणकर्ता होने पर भी श्रीकृष्ण व्रजगोपिकाओं के यहां दधि-माखन की चोरी करते हैं।
स्वयं के घर में दूध, दही माखन का भंडार होने पर भी गोपियों से एक छोटा पात्र छाछ की याचना करते हैं और उसके लिए गोपिकाओं के सामने नाचने को तैयार हो जाते हैं:-
ब्रज में नाचत आज कन्हैया मैया तनक दही के कारण।
तनक दही के कारण कान्हां नाचत नाच हजारन।।
नन्दराय की गौशाला में बंधी हैं गैया लाखन।
तुम्हें पराई मटुकी को ही लागत है प्रिय माखन।।
गोपी टेरत कृष्ण ललाकूँ इतै आओ मेरे लालन।
तनक नाच दे लाला मेरे, मैं तोय दऊँगी माखन।। (रसिया)
प्रेम की झिड़कियाँ भी मीठी होती हैं–मार भी मीठी लगती है।
सलोना श्यामसुन्दर व्रजमण्डल के प्रेमसाम्राज्य में छाछ की ओट से इसी रस के पीछे अहीर की छोकरियों के इशारों पर तरह-तरह के नाच नाचता-फिरता है–‘ताहि अहीरकी छोहरियाँ, छछियाभरि छाछपै नाच नचावैं’ (रसखान) और श्रीकृष्ण एक होकर ही असंख्य गोपियों के साथ असंख्य रूपों में रासक्रीडा करते हैं।
परब्रह्म श्रीकृष्ण की लीला से दुर्वासा ऋषि भी हुए भ्रमित:-
दुर्वासा ऋषि गोकुल में परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण के दर्शनों की अभिलाषा से आते हैं, किन्तु उन्होंने परब्रह्म को किस रूप में देखा–सारे अंग धूलधूसरित हो रहे हैं, केश बिखरे हुए, श्रीअंग पर कोई वस्त्र नहीं, दिगम्बर वेष है, और सखाओं के साथ दौड़े जा रहे हैं।
मुनि ने सोचा–’क्या ये ईश्वर हैं? अगर भगवान हैं तो फिर बालकों की भांति पृथ्वी पर क्यों लोट रहे हैं?
दुर्वासा ऋषि भगवान की योगमाया से भ्रमित होकर कहने लगे ’नहीं, ये ईश्वर नहीं ये तो नन्द का पुत्रमात्र है।’
प्रकृति की पाठशाला से पढ़ा जीवन का पाठ:-
यह एक विलक्षण बात थी कि राज-परिवार के स्नेह-सत्कार को छोड़कर गोपों के बीच जन्म से ही संघर्ष का पाठ पढ़ने के लिए भगवान कृष्ण मथुरा से गोकुल आ गए।
जिस व्यक्ति को आगे चलकर राजनीति की दृढ़ स्थापना और एक उच्च जीवनदर्शन स्थापित करना था; उन्होंने अपना आरम्भिक जीवन बिताने के लिए गो-पालकों का नैसर्गिक जीवन और प्रकृति का सुन्दर वातावरण चुना क्योंकि उन्हें पहले पृथ्वी से सहज रस लेना था। अत: वन उनकी पहली पाठशाला थी और उनके शिक्षक मुक्त और निर्भीक गो-पालक थे।
सांदीपनि ऋषि की पाठशाला में दाखिल होने से पहले ही वे जीवन की पाठशाला से स्नातक हो चुके थे।
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।।
मुरली का माधुर्य और पांचजन्य-शंख का घोर निनाद:-
श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व में हृदय को विमुग्ध करने वाली बांसुरी और शौर्य के प्रतीक सुदर्शन चक्र का अद्भुत समन्वय हुआ है।
कहां तो यमुनातट और निकुंज में मुरली के मधुरनाद से व्रजबालाओं को आकुल करना और कहां पांचजन्य-शंख के भीषण निनाद से युद्धक्षेत्र को प्रकम्पित करना।
अपने मुरलीनाद से जहां उन्होंने धरती के सोये हुए भाव जगाये; वहीं पांचजन्य के शंखनाद से, कौमोदकी गदा के भीषण प्रहार से, शांर्गधनुष के बाणों के आघात से, धूमकेतु के समान कृपाण से और अनन्त शक्तिशाली सुदर्शन चक्र से भारतभूमि को अत्याचारी, अधर्मी व लोलुप राजाओं से विहीन कर दिया।
अतुल नेतृत्व-शक्ति रखते हुए भी दूत और सारथि का काम किया और युधिष्ठिर के राजसूय-यज्ञ में अग्रपूजा के योग्य माने जाने पर भी जूठी पत्तलें उठाने का कार्य किया। चरित्र की ऐसी विलक्षणता और कहीं देखने को नहीं मिलती।
श्रीकृष्ण का अद्भुत अनासक्ति योग:-
श्रीकृष्ण की जीवन को तटस्थ (सम) भाव से देखने की प्रवृति की शुरुआत तो जन्मकाल से ही हो गयी थी। 
जन्म से ही माता-पिता की ममता छोड़ नन्द-यशोदा के घर रहे।
सहज स्नेह रखने वाली गोपियों से नाता जोड़ा और उन्हें तड़पता छोड़ मथुरा चले गए।
फिर मथुरा को छोड़ द्वारका चले आए परन्तु यदुकुल में कभी आसक्त नहीं रहे।
कोई भी स्नेह उन्हें बांध न सका। पाण्डवों का साथ हुआ पर पाण्डवों को महाभारत का युद्ध जिताकर उन्हें छोड़कर चले गए।
पृथ्वी का उद्धार किया और पृथ्वी पर प्रेमयोग व गीता द्वारा ज्ञानयोग की स्थापना की; पर पृथ्वी को भी चुपचाप, निर्मोही होकर छोड़कर चले गये।
ममता के जितने भी प्रतीक हैं, उन सबको उन्होंने तोड़ा।
गोरस (दूध, दही, माखन) की मटकी को फोड़ने से शुरु हुआ यह खेल, कौरवों की अठारह अक्षौहिणी सेना के विनाश से लेकर यदुकुल के सर्वनाश पर जाकर खत्म हुआ।
द्वारकालीला में सोलह हजार एक सौ आठ रानियां, उनके एक-एक के दस-दस बेटे, असंख्य पुत्र-पौत्र और यदुवंशियों का लीला में एक ही दिन में संहार करवा दिया, हंसते रहे और यह सोचकर संतोष की सांस ली कि पृथ्वी का बचा-खुचा भार भी उतर गया।
क्या किसी ने ऐसा आज तक किया है?
वही श्रीकृष्ण अपने प्रिय सखा उद्धवजी को व्रज में भेजते समय कहते हैं–’उद्धव! तुम व्रज में जाओ, मेरे विरह में गोपिकाएं मृतवत् पड़ी हुईं हैं, मेरी बात सुनाकर उन्हें सांन्त्वना दो।’
भगवान की सारी लीला में एक बात दिखती है कि उनकी कहीं पर भी आसक्ति नहीं है।
इसीलिए महर्षि व्यास ने उन्हें प्रकृतिरूपी नटी को नचाने वाला सूत्रधार और ‘कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्’ कहा है।
यही कारण है कि प्रत्येक भारतीय माता अपनी गोद श्रीकृष्ण के बालरूप (गोपालजी) से ही भरना चाहती है और प्रत्येक स्त्री अपने प्रेम में उसी निर्मोही के मोहनरूप की कामना करती है।
रम रहे विश्व में, फिर भी रहते हो न्यारे-न्यारे।
पर सुना प्रेम के पीछे फिरते हो मारे-मारे,,
जय श्री कृष्ण राधे राधे
( प्रेषक अज्ञात )

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कामेंट्स

deepak soni Aug 12, 2020
सभी भक्तजनों को जन्माष्टमी की शुभकामनाएं

🔱🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕🔱 Aug 12, 2020
🚩💐जय श्री गणेश वंदन जी💐🚩 🦚आपको सपरिवार भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और मंगलमय बुधवार की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏 🎭आप और आपके पूरे परिवार पर प्रभु श्री कृष्ण और श्री सिद्धि विनायक दुखहर्ता गणेश जी की आशिर्वाद हमेशा बनी रहे 🌹 🎭आपका बुधवार का दिन शुभ अतिसुन्दर शांतिमय और मंगलमय व्यतीत हो🐚

🌹🌹 तिवारी जी🌹🌹 Aug 12, 2020
@dipusoni आपको भी सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएं "यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल। अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें। अम्बर में कुन्तल-जाल देख, पद के नीचे पाताल देख, मुट्ठी में तीनों काल देख, मेरा स्वरूप विकराल देख। सब जन्म मुझी से पाते हैं, फिर लौट मुझी में आते हैं।" अनंतकोटि ब्रह्मांड नायक लीला पुरुषोत्तम आनन्द कन्द ब्रजचंद नंदनंदन यशोदा के लाला श्रीराधावर श्रीराधाकांत श्री राधा वल्लभ श्री राधामाधव बाल गोपाल श्री बालकृष्ण प्रभु के 5247वें प्राकट्योत्सव पर आपको व आपके समस्त परिवार को कोटि कोटि बधाई। जय श्री कृष्ण राधे राधे शुभ रात्रि इस🚩🚩🙏🙏

🌹🌹 तिवारी जी🌹🌹 Aug 12, 2020
@drratansingh डाक्टर साहब को सप्रेम नमस्कार ईश्वर आप की आस्था को मजबूती प्रदान करें शुभ रात्रि 🚩🚩🙏🙏

Shakti Sep 20, 2020

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Shakti Sep 19, 2020

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Amar jeet mishra Sep 22, 2020

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Neha Sharma Sep 21, 2020

*🌸बहुत ही प्रेरणाप्रद कथा🌸* *➖एक दरिद्र ब्राह्मण यात्रा करते-करते किसी नगर से गुजर रहा था, बड़े-बड़े महल एवं अट्टालिकाओं को देखकर ब्राह्मण भिक्षा माँगने गया, किन्तु उस नगर मे किसी ने भी उसे दो मुट्ठी अन्न नहीं दिया।* *➖आखिर दोपहर हो गयी ,तो ब्राह्मण दुःखी होकर अपने भाग्य को कोसता हुआ जा रहा था, सोच रहा था “कैसा मेरा दुर्भाग्य है इतने बड़े नगर में मुझे खाने के लिए दो मुट्ठी अन्न तक नहीं मिला ? रोटी बना कर खाने के लिए दो मुट्ठी आटा तक नहीं मिला ?* *➖इतने में एक सिद्ध संत की निगाह उस ब्राहम्ण पर पड़ी ,उन्होंने ब्राह्मण की बड़बड़ाहट सुन ली, वे बड़े पहुँचे हुए संत थे ,उन्होंने कहाः “हे दरिद्र ब्राह्मण तुम मनुष्य से भिक्षा माँगो, पशु क्या जानें भिक्षा देना ?”* *➖यह सुनकर ब्राह्मण दंग रह गया और कहने लगाः “हे महात्मन् आप क्या कह रहे हैं ? बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में रहने वाले मनुष्यों से ही मैंने भिक्षा माँगी है”* *➖महात्मा बोले, “नहीं ब्राह्मण मनुष्य शरीर में दिखने वाले वे लोग भीतर से मनुष्य नहीं हैं ,अभी भी वे पिछले जन्म के हिसाब से ही जी रहे हैं। कोई शेर की योनी से आया है तो कोई कुत्ते की योनी से आया है, कोई हिरण की योनी से आया है तो कोई गाय या भैंस की योनी से आया है ,उन की आकृति मानव-शरीर की जरूर है, किन्तु अभी तक उन में मनुष्यत्व निखरा नहीं है ,और जब तक मनुष्यत्व नहीं निखरता, तब तक दूसरे मनुष्य की पीड़ा का पता नहीं चलता। "दूसरे में भी मेरा प्रभु ही है" यह ज्ञान नहीं होता। तुम ने मनुष्यों से नहीं, पशुओं से भिक्षा माँगी है”*। *➖ब्राह्मण का चेहरा दुःख व निराशा से भरा था। सिद्धपुरुष तो दूरदृष्टि के धनी होते हैं उन्होंने कहाः “देख ब्राह्मण, मैं तुझे यह चश्मा देता हूँ इस चश्मे को पहन कर जा और कोई भी मनुष्य दिखे, उस से भिक्षा माँग फिर देख, क्या होता है”* *➖वह दरिद्र ब्राह्मण जहाँ पहले गया था, वहीं पुनः गया और योगसिद्ध कला वाला चश्मा पहनकर गौर से देखाः* *‘ओहोऽऽऽऽ….वाकई कोई कुत्ता है कोई बिल्ली है तो कोई बघेरा है। आकृति तो मनुष्य की है ,लेकिन संस्कार पशुओं के हैं, मनुष्य होने पर भी मनुष्यत्व के संस्कार नहीं हैं’। घूमते-घूमते वह ब्राह्मण थोड़ा सा आगे गया तो देखा कि एक मोची जूते सिल रहा है, ब्राह्मण ने उसे गौर से देखा तो उस में मनुष्यत्व का निखार पाया।* *➖ब्राह्मण ने उस के पास जाकर कहाः “भाई तेरा धंधा तो बहुत हल्का है ,औऱ मैं हूँ ब्राह्मण रीति रिवाज एवं कर्मकाण्ड को बड़ी चुस्ती से पालता हूँ ,मुझे बड़ी भूख लगी है ,इसीलिए मैं तुझसे माँगता हूँ ,क्योंकि मुझे तुझमें मनुष्यत्व दिखा है”* *➖उस मोची की आँखों से टप-टप आँसू बरसने लगे वह बोलाः “हे प्रभु, आप भूखे हैं ? हे मेरे भग्वन आप भूखे हैं ? इतनी देर आप कहाँ थे ?”* *➖यह कहकर मोची उठा एवं जूते सिलकर टका, आना-दो आना वगैरह जो इकट्ठे किये थे, उस चिल्लर (रेज़गारी) को लेकर हलवाई की दुकान पर पहुँचा और बोलाः “हलवाई भाई, मेरे इन भूखे भगवान की सेवा कर लो ये चिल्लर यहाँ रखता हूँ जो कुछ भी सब्जी-पराँठे-पूरी आदि दे सकते हो, वह इन्हें दे दो मैं अभी जाता हूँ”* *➖यह कहकर मोची भागा,और घर जाकर अपने हाथ से बनाई हुई एक जोड़ी जूती ले आया, एवं चौराहे पर उसे बेचने के लिए खड़ा हो गया।* *➖उस राज्य का राजा जूतियों का बड़ा शौकीन था, उस दिन भी उस ने कई तरह की जूतियाँ पहनीं, किंतु किसी की बनावट उसे पसंद नहीं आयी तो किसी का नाप नहीं आया, दो-पाँच बार प्रयत्न करने पर भी राजा को कोई पसंद नहीं आयी तो राजा मंत्री से क्रुद्ध होकर बोलाः* *➖“अगर इस बार ढंग की जूती लाया तो जूती वाले को इनाम दूँगा ,और ठीक नहीं लाया तो मंत्री के बच्चे तेरी खबर ले लूँगा।”* *➖दैव योग से मंत्री की नज़र इस मोची के रूप में खड़े असली मानव पर पड़ गयी जिस में मानवता खिली थी, जिस की आँखों में कुछ प्रेम के भाव थे, चित्त में दया-करूणा थी, ब्राह्मण के संग का थोड़ा रंग लगा था। मंत्री ने मोची से जूती ले ली एवं राजा के पास ले गया। राजा को वह जूती एकदम ‘फिट’ आ गयी, मानो वह जूती राजा के नाप की ही बनी थी। राजा ने कहाः “ऐसी जूती तो मैंने पहली बार ही पहन रहा हूँ ,किस मोची ने बनाई है यह जूती ?”* *➖मंत्री बोला “हुजूर यह मोची बाहर ही खड़ा है”* *➖मोची को बुलाया गया। उस को देखकर राजा की भी मानवता थोड़ी खिली। राजा ने कहाः* *➖“जूती के तो पाँच रूपये होते हैं किन्तु यह पाँच रूपयों वाली नहीं है,पाँच सौ रूपयों वाली जूती है। जूती बनाने वाले को पाँच सौ और जूती के पाँच सौ, कुल एक हजार रूपये इसको दे दो!”* *➖मोची बोलाः “राजा जी, तनिक ठहरिये, यह जूती मेरी नहीं है, जिसकी है उसे मैं अभी ले आता हूँ”मोची जाकर विनयपूर्वक उस ब्राह्मण को राजा के पास ले आया एवं राजा से बोलाः “राजा जी, यह जूती इन्हीं की है।* *”राजा को आश्चर्य हुआ वह बोलाः “यह तो ब्राह्मण है इस की जूती कैसे ?”राजा ने ब्राह्मण से पूछा तो ब्राह्मण ने कहा मैं तो ब्राह्मण हूँ, यात्रा करने निकला हूँ”* *➖राजाः “मोची जूती तो तुम बेच रहे थे इस ब्राह्मण ने जूती कब खरीदी और बेची ?”* *➖मोची ने कहाः “राजन् मैंने मन में ही संकल्प कर लिया था कि जूती की जो रकम आयेगी वह इन ब्राह्मण देव की होगी। जब रकम इन की है तो मैं इन रूपयों को कैसे ले सकता हूँ ? इसीलिए मैं इन्हें ले आया हूँ। न जाने किसी जन्म में मैंने दान करने का संकल्प किया होगा और मुकर गया होऊँगा तभी तो यह मोची का चोला मिला है अब भी यदि मुकर जाऊँ तो तो न जाने मेरी कैसी दुर्गति हो ?* *➖इसीलिए राजन् ये रूपये मेरे नहीं हुए। मेरे मन में आ गया था कि इस जूती की रकम इनके लिए होगी फिर पाँच रूपये मिलते तो भी इनके होते और एक हजार मिल रहे हैं तो भी इनके ही हैं। हो सकता है मेरा मन बेईमान हो जाता इसीलिए मैंने रूपयों को नहीं छुआ और असली अधिकारी को ले आया!”* *➖राजा ने आश्चर्य चकित होकर ब्राह्मण से पूछाः “ब्राह्मण मोची से तुम्हारा परिचय कैसे हुआ ?* *➖”ब्राह्मण ने सारी आप बीती सुनाते हुए सिद्ध पुरुष के चश्मे वाली बात बताई, और कहा कि राजन्, आप के राज्य में पशुओं के दर्शन तो बहुत हुए लेकिन मनुष्यत्व का अंश इन मोची भाई में ही नज़र आया।* *➖”राजा ने कौतूहलवश कहाः “लाओ, वह चश्मा जरा हम भी देखें।”राजा ने चश्मा लगाकर देखा तो दरबारियों में उसे भी कोई सियार दिखा तो कोई हिरण, कोई बंदर दिखा तो कोई रीछ। राजा दंग रह गया कि यह तो पशुओं का दरबार भरा पड़ा है उसे हुआ कि ये सब पशु हैं तो मैं कौन हूँ ? उस ने आईना मँगवाया एवं उसमें अपना चेहरा देखा तो शेर! उस के आश्चर्य की सीमा न रही, ‘ये सारे जंगल के प्राणी और मैं जंगल का राजा शेर यहाँ भी इनका राजा बना बैठा हूँ।’ राजा ने कहाः “ब्राह्मणदेव योगी महाराज का यह चश्मा तो बड़ा गज़ब का है, वे योगी महाराज कहाँ होंगे ?”* *➖ब्राह्मणः “वे तो कहीं चले गये ऐसे महापुरुष कभी-कभी ही और बड़ी कठिनाई से मिलते हैं।”श्रद्धावान ही ऐसे महापुरुषों से लाभ उठा पाते हैं, बाकी तो जो मनुष्य के चोले में पशु के समान हैं वे महापुरुष के निकट रहकर भी अपनी पशुता नहीं छोड़ पाते।* *➖ब्राह्मण ने आगे कहाः "राजन् अब तो बिना चश्मे के भी मनुष्यत्व को परखा जा सकता है। व्यक्ति के व्यवहार को देखकर ही पता चल सकता है कि वह किस योनि से आया है।* *➖एक मेहनत करे और दूसरा उस पर हक जताये तो समझ लो कि वह सर्प योनि से आया है क्योंकि बिल खोदने की मेहनत तो चूहा करता है ,लेकिन सर्प उस को मारकर बल पर अपना अधिकार जमा बैठता है।”अब इस चश्मे के बिना भी विवेक का चश्मा काम कर सकता है ,और दूसरे को देखें उसकी अपेक्षा स्वयं को ही देखें कि हम सर्पयोनि से आये हैं कि शेर की योनि से आये हैं या सचमुच में हममें मनुष्यता खिली है ? यदि पशुता बाकी है तो वह भी मनुष्यता में बदल सकती है कैसे ?* *गोस्वामी तुलसीदाज जी ने कहा हैः* *बिगड़ी जनम अनेक की, सुधरे अब और आजु।* *तुलसी होई राम को, रामभजि तजि कुसमाजु।।* *➖कुसंस्कारों को छोड़ दें… बस अपने कुसंस्कार आप निकालेंगे तो ही निकलेंगे। अपने भीतर छिपे हुए पशुत्व को आप निकालेंगे तो ही निकलेगा। यह भी तब संभव होगा जब आप अपने समय की कीमत समझेंगे मनुष्यत्व आये तो एक-एक पल को सार्थक किये बिना आप चुप नहीं बैठेंगे। पशु अपना समय ऐसे ही गँवाता है। पशुत्व के संस्कार पड़े रहेंगे तो आपका समय बिगड़ेगा अतः पशुत्व के संस्कारों को आप बाहर निकालिये एवं मनुष्यत्व के संस्कारों को उभारिये फिर सिद्धपुरुष का चश्मा नहीं, वरन् अपने विवेक का चश्मा ही कार्य करेगा और इस विवेक के चश्मे को पाने की युक्ति मिलती है हरि नाम संकीर्तन व सत्संग से!तो हे आत्म जनों, मानवता से जो पूर्ण हो, वही मनुष्य कहलाता है।बिन मानवता के मानव भी, पशुतुल्य रह जाता है।* *जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌷🌷 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸

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Mahaveer Singh Mahi Sep 21, 2020

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