prieti gupta
prieti gupta Sep 13, 2017

our ancient heritage

our ancient heritage

The first ever world map was sketched thousands of years ago by Indian saint Ramanujacharya, who simply translated the following verse from Mahabharat and gave the world its real face.

In Mahabharat, it is described how Maharishi Ved Vyasa gave away his divine vision to Sanjay, Dhritarashtra's charioteer so that he could describe him the events of the upcoming war. But, even before questions of war could begin, Dhritarashtra asked him to describe how the world looks like from space.

This is how he described the face of the world:

यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः- ।

एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्ड्ले॥

द्विरंशे पिप्पलस्तत्: द्विरंशे च शशो महान्।।-


(भी:म पर्व, महाभारत)

Meaning:-

अर्थ- जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप (पृथ्वी) चन्द्रमण्ड्ल में दिखाई देता है। इसके दो अंशों में पिप्पल (पीपल के पत्ते) और दो अंशों में महान शश (खरगोश) दिखाई देता है।


Just like a man sees his face in the mirror, so does the Earth appears in the Universe. In the first phase, you see Peepal leaves and the next phase you see a rabbit.

Based on this shloka, Saint Ramanujacharya sketched out the map, but the world laughed it off on seeing some leaves and a rabbit. Much later, when the picture was switched upside down, the reality struck in.

Don’t believe us, try turning the above picture upside down and you’ll know what I am talking about.

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आशुतोष Sep 24, 2020

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🚩🙏 यह विचार उचित है , और ये सत्य घटनाक्रम है *( यह लेख किसी को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं है आप अपना विचार एवं मार्गदर्शन दे सकते हैं )* एक काल में देवराज इन्द्र ने देवगुरु बृहस्पति से असहमति जताई और देवकार्य सम्पन्न कराने के लिए उन्होंने विश्वरूप जी को पुरोहित पद पर नियुक्ति किया। लेकिन विश्वरूप जी जब भी देवताओं को बल देने वाले हवि का भाग आहुतियां प्रदान करते तो उसका कुछ भाग देवताओं को न मिल कर दैत्यों को मिलने लगा क्योंकि विश्वरूप जी दैत्यों के हितैषी थे , जब ये बात देवराज इन्द्र को पता चली तो उन्होंने उसी क्षण विश्वरूप जी का सिर काट डाला जिसके कारण उन्हें ब्रह्म हत्या का पाप लगा । जिसे बाद में बृक्षों , जल , स्त्रियों और पृथ्वी में बांट दिया गया । वृक्ष पर जो गोंद निकलता है वह उसी का भाग है , पानी में जो झाग बनता और काई है ये उनका ही भाग है , स्त्रियों को जो ऋतु धर्म होता है ये उसी ब्रह्म हत्या का भाग है , और भूमि पर जो बरसात में कुकुरमुत्ते होते हैं और बंजर भूमि है ये उसी का भाग है । इसके पीछे का भाव यह है कि पुरोहित को अपने यजमान के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहिए । जैसा कि पुरोहित होने पर विश्वरूप जी ने किया है । आप सबको को जानकर आश्चर्य होगा कि दिव्य नारायण कवच को धारण करने की विद्या देवराज इन्द्र को विश्वरूप जी से ही प्राप्त हुई । इसलिए ऐसे कृत्य करने वाले पुरोहितों की वेद , पुराण, स्मृति निन्दा करते हैं ।। शेष आदरणीय विद्वतजनों से मार्गदर्शन की अपेक्षा है। सभी प्रभु प्रेमियों को जय माता दी ।। 🚩👏🌺🌷💐🙏🌺🌷💐

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Anilkumar Tailor Sep 24, 2020

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Shakti Sep 24, 2020

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