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Manju Jaiswal
Manju Jaiswal Dec 19, 2017

Jaipur k Govind dev ji...

Jaipur k Govind dev ji...

मंगला झांकी दर्शन राधे राधे जय श्री कृष्णा शुभ प्रभात

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कामेंट्स

munna Dec 19, 2017
jai jai Govind DAV ji very nice post Ji good morning have a nice day post k leye thanks

kaka sen Dec 19, 2017
जय हो राधा रानी की ।।

Batuksonpal Dec 20, 2017
🌹🌹 जय श्री राधे राधे जी 🌹🌹 ❤ जय श्री कृष्णा जी ❤ 🌹 शुभ रात्रि जी 🌹 🙏⚛🔯☸✡🚩✡☸🔯⚛🙏 •═•═•⊰❉⊱•═•⊰❉⊱•═•⊰❉⊱•═•═• *ओ कान्हा~~~~ सजती- होगी -दुनियाँ -मे -महफिलें- एक- से -बढ़कर -एक...। पर- हमारी -जिन्दगी- मे -रोशनी- एक- तेरी -रहमतों -के -चिरागो- से -है...।। 🌺🌺जय जय श्री राधे*🌺🌺

Ajnabi Jan 11, 2018
good morning jay shree Radhe krishna

aditi sharma Jun 26, 2019

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Durga Pawan Sharma Jun 25, 2019

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Manish BhArDwAj Jun 26, 2019

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sonal shukla Jun 26, 2019

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Amit Kumar Jun 26, 2019

हरि ॐ गायत्रीरहस्य भाग-6 गायत्री के पाद:- पाद का अर्थ चरण होता है।चरण के अर्थ में चर अर्थात् गतौ,चरति, आचरति,गमनम्।चर धातु को देखें तो चर का अर्थ-संशये होता है जिसका भाव है-विचारयति विचारणा हि सति संशये भवति। गायत्री मन्त्र में चरण अथवा विचार,विचारणा हेतु प्रथम तीन पाद किये गए।जो आठ आठ अक्षर के भेद से गायत्री के अर्थों पर विचार या विचारणा के लिए किये गए।जब गायत्री सूक्ष्म विचार से योगियों में प्रवेश करती है तब गायत्री का चौथा पाद स्वतः ही प्रकट होता है जिसे श्रुतियों ने "परोरजासावदोम्" से आठ अक्षर वाला पाद कहा है। आज इन्ही पादों पर विचार करते हैं। गायत्री रहस्योपनिषद् के तीसरे मन्त्र में है- "ऋग्वेदोsस्या: प्रथमः पादो भवति। गायत्री का प्रथम पाद ऋग्वेद है। "यजुर्वेदो द्वितीयः पादः। यजुर्वेद द्वितीय पाद है। "सामवेदस्तृतीयः पादः। सामवेद तृतीय पाद है। "अथर्ववेदश्चतुर्थः पादः। अथर्वेद चौथा पाद है। गायत्र्युप निषद में पाद हेतु जो विचार है- प्रेरक तत्त्व सविता और प्रेरित तत्त्व में भू भुवः और स्वः है।इसमें जो वरणीय तत्त्व है वह प्रथम पाद है।श्रुति कहती है~ स सविता सावित्र्या ब्राह्मणं सृष्ट्वा तत् सावित्रीं पर्य्यदधात् तत् सवितुर्वरेण्यमिति सावित्र्य: प्रथम पादः।4/2 (भू से लेकर तपलोक तक तत् का जो प्रसार है वह वित्तवान बनाने से वितु हैं।उस वितु के जो प्रेरक तत्त्व हैं वे हिरण्यगर्भ हैं, वे ही सविता हैं।हिरण्यगर्भ के प्रेरित तत्त्व जो हैं वे सावित्री रूप सविता के युग्म,जोड़ा हैं।उसी हेतु यह मन्त्र है) उन देव सविता ने सावित्री के साथ ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्मज्ञान सम्पन्न को उत्पन्न कर उसे सावित्री मन्त्र को धारण कराया।इस लिए प्रेरक होने से प्रथम पाद--- "तत्सवितुर्वरेण्यम्" यह सावित्री का प्रथम पाद है। भू भुवः स्वः को सवितुर्वरेण्यम् में स्थित कर आठ अक्षरों का "तत्सवितुर्वरेण्यम्" को प्रथमपाद या चरण कहा है।इस हेतु तीसरा मन्त्र है~ "पृथिव्यर्च्च्यं समदधादृचाsग्निमग्निना श्रियं श्रिया स्त्रियं स्त्रिया मिथुनं मिथुनेन प्रजां प्रजया कर्म कर्मणा तपस्तपसा सत्यं सत्येन ब्रह्म ब्रह्मणा ब्राह्मणं ब्रह्मणेन व्रतं व्रतेन वै ब्राह्मणः संशितोभवत्यशुन्यो भवत्यविच्छिन्न:" उन सविता देव ने पृथिवी के साथ ऋक् को संयुक्त किया।ऋक् से अग्नि को ,अग्नि से श्री को, श्री से स्त्री को स्त्री से जोड़े को, जोड़े के साथ प्रजा को, प्रजा से कर्म को कर्म से तपको,तप से सत्य को,सत्य से ब्रह्मज्ञान को, ब्रह्मज्ञान को वेदज्ञान से,वेदज्ञान से ब्राह्मण को,ब्राह्मण से व्रत को संयुक्त किया।व्रत से ही ब्राह्मण तेजस्वी होता है,परिपूर्ण होता है और अविच्छिन्न होता है और अविच्छिन्न होता है। अपरिहार्य कारण से आज की पोस्ट यहीं तक। हरि ॐ सभी को सादर प्रातः प्रणाम।

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Durga Pawan Sharma Jun 25, 2019

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Shobha Sharma Jun 25, 2019

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