Jasbir Singh nain
Jasbir Singh nain Nov 20, 2021

रविवार की व्रत कथा शुभ प्रभात जी 🌅 जय सूर्य देव जी 🙏🌅🙏🌹🙏🙏🙏🪔 रविवार का दिन सूर्य भगवान के लिए समर्पित है। इसलिए रविवार व्रत उनके लिए ही रखा जाता है। शास्त्रों में सूर्य को सृष्टि की आत्मा कहा गया है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य ग्रह को आत्मा का कारक माना गया है। सूर्य ग्रह सभी ग्रहों के राजा हैं। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य ग्रह कमज़ोर होता है तो वह व्यक्ति रविवार का व्रत कर अपने सूर्य ग्रह को मजबूत बना सकता है। यह धरती पर ऊर्जा का सबसे बड़ा प्राकृतिक स्रोत है। पेड़-पौधों, मनुष्यों और अन्य जीव-जंतुओं को सूर्य से ही ऊर्जा मिलती है। रविवार व्रत का महत्व हिन्दू धार्मिक ग्रंथो में देवी/देवताओं का आशीर्वाद पाने के लिए भक्तों को पूजा-अर्चना, व्रत का पालन तथा दान करने के लिए कहा गया है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि व्रत या उपवास करना ईश्वर की भक्ति करने का मार्ग है। धार्मिक दृष्टि से ऐसा कहा जाता है कि सूर्य की कृपा जिस व्यक्ति के ऊपर हो जाए तो उस व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान और नौकरी में उच्च पद की प्राप्ति होती है। सूर्य के प्रभाव से व्यक्ति के अंदर राजसी गुण पैदा होते हैं। व्यक्ति समाज का नेतृत्व करता है। इसलिए सूर्य की कृपा दृष्टि पाने के लिए भक्तजन रविवार को उनका व्रत रखते हैं। लेकिन इस व्रत को विधि अनुसार ही किया जाना चाहिए। रविवार व्रत की विधि रविवार के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठें । स्नान कर स्वच्छ कपड़े धारण करें । सूर्य देव का स्मरण करें । सूर्योदय के समय जल में रोली, लाल पुष्प, अक्षत तथा दुर्वा मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें । अर्घ्य देने से पूर्व सूर्य के बीज मंत्र का जाप करें । व्रत के दौरान रविवार व्रत कथा का पाठ करें । सूर्यास्त के समय पूजा अर्चना के बाद सात्विक भोजन करें । सूर्य का वैदिक मंत्र ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।। सूर्य का तांत्रिक मंत्र ॐ घृणि सूर्याय नमः सूर्य का बीज मंत्र ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः व्रत हेतु पूजा सामग्री धूप,अगरबत्ती,जल पात्र,रोली,लाल चंद,लाल पुष्प,अक्षत दुर्वा,कपूर,पंचामृत आदि । सूर्यदेव की व्रत कथा प्राचीन काल में एक बुढ़िया रहती थी। वह नियमित रूप से रविवार का व्रत करती। रविवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर बुढ़िया स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन को गोबर से लीपकर स्वच्छ करती, उसके बाद सूर्य भगवान की पूजा करते हुए रविवार व्रत कथा सुनकर सूर्य भगवान का भोग लगाकर दिन में एक समय भोजन करती। सूर्य भगवान की अनुकंपा से बुढ़िया को किसी प्रकार की चिंता एवं कष्ट नहीं था। धीरे-धीरे उसका घर धन-धान्य से भर रहा था। उस बुढ़िया को सुखी होते देख उसकी पड़ोसन उससे जलने लगी। बुढ़िया ने कोई गाय नहीं पाल रखी थी। अतः वह अपनी पड़ोसन के आंगन में बंधी गाय का गोबर लाती थी। पड़ोसन ने कुछ सोचकर अपनी गाय को घर के भीतर बांध दिया। रविवार को गोबर न मिलने से बुढ़िया अपना आंगन नहीं लीप सकी। आंगन न लीप पाने के कारण उस बुढ़िया ने सूर्य भगवान को भोग नहीं लगाया और उस दिन स्वयं भी भोजन नहीं किया। सूर्यास्त होने पर बुढ़िया भूखी-प्यासी सो गई। प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उस बुढ़िया की आंख खुली तो वह अपने घर के आंगन में सुंदर गाय और बछड़े को देखकर हैरान हो गई। गाय को आंगन में बांधकर उसने जल्दी से उसे चारा लाकर खिलाया। पड़ोसन ने उस बुढ़िया के आंगन में बंधी सुंदर गाय और बछड़े को देखा तो वह उससे और अधिक जलने लगी। तभी गाय ने सोने का गोबर किया। गोबर को देखते ही पड़ोसन की आंखें फट गईं। पड़ोसन ने उस बुढ़िया को आसपास न पाकर तुरंत उस गोबर को उठाया और अपने घर ले गई तथा अपनी गाय का गोबर वहां रख आई। सोने के गोबर से पड़ोसन कुछ ही दिनों में धनवान हो गई। गाय प्रति दिन सूर्योदय से पूर्व सोने का गोबर किया करती थी और बुढ़िया के उठने के पहले पड़ोसन उस गोबर को उठाकर ले जाती थी। बहुत दिनों तक बुढ़िया को सोने के गोबर के बारे में कुछ पता ही नहीं चला। बुढ़िया पहले की तरह हर रविवार को भगवान सूर्यदेव का व्रत करती रही और कथा सुनती रही। लेकिन सूर्य भगवान को जब पड़ोसन की चालाकी का पता चला तो उन्होंने तेज आंधी चलाई। आंधी का प्रकोप देखकर बुढ़िया ने गाय को घर के भीतर बांध दिया। सुबह उठकर बुढ़िया ने सोने का गोबर देखा उसे बहुत आश्चर्य हुआ। उस दिन के बाद बुढ़िया गाय को घर के भीतर बांधने लगी। सोने के गोबर से बुढ़िया कुछ ही दिन में बहुत धनी हो गई। उस बुढ़िया के धनी होने से पड़ोसन बुरी तरह जल-भुनकर राख हो गई और उसने अपने पति को समझा-बुझाकर उसे नगर के राजा के पास भेज दिया। सुंदर गाय को देखकर राजा बहुत खुश हुआ। सुबह जब राजा ने सोने का गोबर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उधर सूर्य भगवान को भूखी-प्यासी बुढ़िया को इस तरह प्रार्थना करते देख उस पर बहुत करुणा आई। उसी रात सूर्य भगवान ने राजा को स्वप्न में कहा, राजन, बुढ़िया की गाय व बछड़ा तुरंत लौटा दो, नहीं तो तुम पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ेगा. तुम्हारा महल नष्ट हो जाएगा। सूर्य भगवान के स्वप्न से बुरी तरह भयभीत राजा ने प्रातः उठते ही गाय और बछड़ा बुढ़िया को लौटा दिया। राजा ने बहुत-सा धन देकर बुढ़िया से अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी। राजा ने पड़ोसन और उसके पति को उनकी इस दुष्टता के लिए दंड दिया। फिर राजा ने पूरे राज्य में घोषणा कराई कि सभी स्त्री-पुरुष रविवार का व्रत किया करें। रविवार का व्रत करने से सभी लोगों के घर धन-धान्य से भर गए, राजतय में चारों ओर खुशहाली छा गई। स्त्री-पुरुष सुखी जीवन यापन करने लगे तथा सभी लोगों के शारीरिक कष्ट भी दूर हो गए। श्री सूर्य देव की आरती जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव। जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥ रजनीपति मदहारी, शतदल जीवनदाता। षटपद मन मुदकारी, हे दिनमणि दाता॥ जग के हे रविदेव, जय जय जय रविदेव। जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥ नभमंडल के वासी, ज्योति प्रकाशक देवा। निज जन हित सुखरासी, तेरी हम सबें सेवा॥ करते हैं रविदेव, जय जय जय रविदेव। जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥ कनक बदन मन मोहित, रुचिर प्रभा प्यारी। निज मंडल से मंडित, अजर अमर छविधारी॥ हे सुरवर रविदेव, जय जय जय रविदेव। जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥

रविवार की व्रत कथा
शुभ प्रभात जी 🌅 जय सूर्य देव जी 🙏🌅🙏🌹🙏🙏🙏🪔
रविवार का दिन सूर्य भगवान के लिए समर्पित है। इसलिए रविवार व्रत उनके लिए ही रखा जाता है। शास्त्रों में सूर्य को सृष्टि की आत्मा कहा गया है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य ग्रह को आत्मा का कारक माना गया है। सूर्य ग्रह सभी ग्रहों के राजा हैं। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य ग्रह कमज़ोर होता है तो वह व्यक्ति रविवार का व्रत कर अपने सूर्य ग्रह को मजबूत बना सकता है। यह धरती पर ऊर्जा का सबसे बड़ा प्राकृतिक स्रोत है। पेड़-पौधों, मनुष्यों और अन्य जीव-जंतुओं को सूर्य से ही ऊर्जा मिलती है।



रविवार व्रत का महत्व

हिन्दू धार्मिक ग्रंथो में देवी/देवताओं का आशीर्वाद पाने के लिए भक्तों को पूजा-अर्चना, व्रत का पालन तथा दान करने के लिए कहा गया है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि व्रत या उपवास करना ईश्वर की भक्ति करने का मार्ग है। धार्मिक दृष्टि से ऐसा कहा जाता है कि सूर्य की कृपा जिस व्यक्ति के ऊपर हो जाए तो उस व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान और नौकरी में उच्च पद की प्राप्ति होती है। सूर्य के प्रभाव से व्यक्ति के अंदर राजसी गुण पैदा होते हैं। व्यक्ति समाज का नेतृत्व करता है। इसलिए सूर्य की कृपा दृष्टि पाने के लिए भक्तजन रविवार को उनका व्रत रखते हैं। लेकिन इस व्रत को विधि अनुसार ही किया जाना चाहिए।



रविवार व्रत की विधि

रविवार के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठें ।

स्नान कर स्वच्छ कपड़े धारण करें ।

सूर्य देव का स्मरण करें ।

सूर्योदय के समय जल में रोली, लाल पुष्प, अक्षत तथा दुर्वा मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें ।

अर्घ्य देने से पूर्व सूर्य के बीज मंत्र का जाप करें ।

व्रत के दौरान रविवार व्रत कथा का पाठ करें ।

सूर्यास्त के समय पूजा अर्चना के बाद सात्विक भोजन करें ।



सूर्य का वैदिक मंत्र

ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।।

सूर्य का तांत्रिक मंत्र

ॐ घृणि सूर्याय नमः

सूर्य का बीज मंत्र

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः

व्रत हेतु पूजा सामग्री

धूप,अगरबत्ती,जल पात्र,रोली,लाल चंद,लाल पुष्प,अक्षत दुर्वा,कपूर,पंचामृत आदि ।



सूर्यदेव की व्रत कथा

प्राचीन काल में एक बुढ़िया रहती थी। वह नियमित रूप से रविवार का व्रत करती। रविवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर बुढ़िया स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन को गोबर से लीपकर स्वच्छ करती, उसके बाद सूर्य भगवान की पूजा करते हुए रविवार व्रत कथा सुनकर सूर्य भगवान का भोग लगाकर दिन में एक समय भोजन करती। सूर्य भगवान की अनुकंपा से बुढ़िया को किसी प्रकार की चिंता एवं कष्ट नहीं था। धीरे-धीरे उसका घर धन-धान्य से भर रहा था।

उस बुढ़िया को सुखी होते देख उसकी पड़ोसन उससे जलने लगी। बुढ़िया ने कोई गाय नहीं पाल रखी थी। अतः वह अपनी पड़ोसन के आंगन में बंधी गाय का गोबर लाती थी। पड़ोसन ने कुछ सोचकर अपनी गाय को घर के भीतर बांध दिया। रविवार को गोबर न मिलने से बुढ़िया अपना आंगन नहीं लीप सकी। आंगन न लीप पाने के कारण उस बुढ़िया ने सूर्य भगवान को भोग नहीं लगाया और उस दिन स्वयं भी भोजन नहीं किया। सूर्यास्त होने पर बुढ़िया भूखी-प्यासी सो गई।

प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उस बुढ़िया की आंख खुली तो वह अपने घर के आंगन में सुंदर गाय और बछड़े को देखकर हैरान हो गई। गाय को आंगन में बांधकर उसने जल्दी से उसे चारा लाकर खिलाया। पड़ोसन ने उस बुढ़िया के आंगन में बंधी सुंदर गाय और बछड़े को देखा तो वह उससे और अधिक जलने लगी। तभी गाय ने सोने का गोबर किया। गोबर को देखते ही पड़ोसन की आंखें फट गईं।

पड़ोसन ने उस बुढ़िया को आसपास न पाकर तुरंत उस गोबर को उठाया और अपने घर ले गई तथा अपनी गाय का गोबर वहां रख आई। सोने के गोबर से पड़ोसन कुछ ही दिनों में धनवान हो गई। गाय प्रति दिन सूर्योदय से पूर्व सोने का गोबर किया करती थी और बुढ़िया के उठने के पहले पड़ोसन उस गोबर को उठाकर ले जाती थी।

बहुत दिनों तक बुढ़िया को सोने के गोबर के बारे में कुछ पता ही नहीं चला। बुढ़िया पहले की तरह हर रविवार को भगवान सूर्यदेव का व्रत करती रही और कथा सुनती रही। लेकिन सूर्य भगवान को जब पड़ोसन की चालाकी का पता चला तो उन्होंने तेज आंधी चलाई। आंधी का प्रकोप देखकर बुढ़िया ने गाय को घर के भीतर बांध दिया। सुबह उठकर बुढ़िया ने सोने का गोबर देखा उसे बहुत आश्चर्य हुआ।

उस दिन के बाद बुढ़िया गाय को घर के भीतर बांधने लगी। सोने के गोबर से बुढ़िया कुछ ही दिन में बहुत धनी हो गई। उस बुढ़िया के धनी होने से पड़ोसन बुरी तरह जल-भुनकर राख हो गई और उसने अपने पति को समझा-बुझाकर उसे नगर के राजा के पास भेज दिया। सुंदर गाय को देखकर राजा बहुत खुश हुआ। सुबह जब राजा ने सोने का गोबर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

उधर सूर्य भगवान को भूखी-प्यासी बुढ़िया को इस तरह प्रार्थना करते देख उस पर बहुत करुणा आई। उसी रात सूर्य भगवान ने राजा को स्वप्न में कहा, राजन, बुढ़िया की गाय व बछड़ा तुरंत लौटा दो, नहीं तो तुम पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ेगा. तुम्हारा महल नष्ट हो जाएगा। सूर्य भगवान के स्वप्न से बुरी तरह भयभीत राजा ने प्रातः उठते ही गाय और बछड़ा बुढ़िया को लौटा दिया।

राजा ने बहुत-सा धन देकर बुढ़िया से अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी। राजा ने पड़ोसन और उसके पति को उनकी इस दुष्टता के लिए दंड दिया। फिर राजा ने पूरे राज्य में घोषणा कराई कि सभी स्त्री-पुरुष रविवार का व्रत किया करें। रविवार का व्रत करने से सभी लोगों के घर धन-धान्य से भर गए, राजतय में चारों ओर खुशहाली छा गई। स्त्री-पुरुष सुखी जीवन यापन करने लगे तथा सभी लोगों के शारीरिक कष्ट भी दूर हो गए।



श्री सूर्य देव की आरती

जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव।
जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥

रजनीपति मदहारी, शतदल जीवनदाता।
षटपद मन मुदकारी, हे दिनमणि दाता॥

जग के हे रविदेव, जय जय जय रविदेव।
जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥

नभमंडल के वासी, ज्योति प्रकाशक देवा।
निज जन हित सुखरासी, तेरी हम सबें सेवा॥

करते हैं रविदेव, जय जय जय रविदेव।
जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥

कनक बदन मन मोहित, रुचिर प्रभा प्यारी।
निज मंडल से मंडित, अजर अमर छविधारी॥

हे सुरवर रविदेव, जय जय जय रविदेव।
जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥

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कामेंट्स

योगेश जानी Nov 21, 2021
ॐ सूयॅदेवाय नमः शुभ रविवार आप का दिन शुभहो नमस्ते

Brajesh Sharma Nov 21, 2021
👌❤🙏🎋🇮🇳👌🎋❤🇮🇳🙏👌🎋 ॐआदित्याय नमः ॐसूर्याय नमः ॐभास्कराय नमः राम राम जी जय जय श्री राम

Rajbirsingh Nov 21, 2021
Good morning Nain Sahab Aradhya Ki Aradhna Asan Nahi Dhanyavad

Vijay Sharma_9737329188 Nov 21, 2021
@jasbirnain ॐ आदित्ये नम:👏☘️🍀🌺 सुप्रभात वंदनजी🍁✨🌟🙏 सूर्यदेव जी की कृपा सदैव आप पर बनी रहे✴️☀️💥👏

Shivsanker Shukla Nov 21, 2021
सप्रेम सुप्रभात भैया जी राधे-राधे

kamala Maheshwari Nov 21, 2021
जयश्री कृष्णा जी ऊं सुर्यदेवाय नमः जय श्री राधे रानी कीबाकैविहारी कीकानहाकी कृपादृष्टि सदैव आपके उपर बनी रहेंआज  केदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं जी,, जय श्री कृष्णा जी ♦️💠♦️💠♦️💠♦️💠♦️💠♦️💠♦️💠

R.K.SONI (Ganesh Mandir) Nov 21, 2021
Radhe Radhe Ji🙏 Aap Hmesha Khush Rhe Ji. V. Nice Post Ji. 👌👌👌🌹🌹🌹🌹🌲🌲🌲🌹🌹🙏

PRABHAT KUMAR Jan 26, 2022

📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊 📊📊📊📊📊 *#ऊँ__गं__गणपते__नमः* 📊📊📊📊📊 📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊 *#सभी_आदरणीय_साथियों_को_मंगलमय_शुभ_रात्री* 🙏 📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊 *लंबोदर के नाम से संबोधित किए जाने वाले गोल-मटोल गणेश जी को ऋद्धि-सिद्धि का दाता कहा जाता है। गणों के स्वामी होने के कारण उनका एक नाम गणपति भी है। देवी-देवताओं में प्यारे गणेश जी का मस्तक तो हाथी का है लेकिन वह सवारी नन्हे मूषक की करते हैं। खाने को उन्हें चाहिए गोल-गोल लड्डू. उनकी आकृति चित्रकारों की कूची को बेहद प्रिय रही है और उनकी बुद्धिमत्ता का लोहा ब्रह्मादि सहित सभी देवताओं ने माना है। उनके विचित्र रूप को लेकर उनके भक्तों में जिज्ञासा रहती है। आइए इन जिज्ञासाओं को दूर करते हैं।* 📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊 *कोई भी शुभ काम शुरू करने से पहले भगवान गणेश की पूजा जरूर की जाती है। इस तरह की स्थिति को हम ‘श्रीगणेश’ के नाम से भी जानते हैं। अब मन में सवाल उठता है कि आखिर क्यों भगवान श्री गणेश की पूजा अन्य देवताओं से पहले की जाती है।* 📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊 *गणेश जी की प्रथम पूजा के संबंध में कई पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं। जब भगवान शिव ने गणेश जी का सिर काटा तो उस समय पार्वती बहुत क्रोधित हुईं। गज का सिर लगाने के बाद भी जब वह शिव से रूठी रहीं तो शिव ने उन्हें वचन दिया कि उनका पुत्र गणेश कुरूप नहीं कहलाएगा बल्कि उसकी पूजा सभी देवताओं से पहले की जाएगी। इसलिए कोई भी कार्य शुरू करने से पहले हम ॐ गणेशाय नमः कहते हैं।* 📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊 *एक अन्य कथा के अनुसार एक बार सभी देवताओं में पहले पूजे जाने को लेकर विवाद छिड़ गया। आपसी झगड़ा सुलझाने के लिए वे भगवान विष्णु के पास गए। विष्णु जी सभी देवताओं को लेकर महेश्वर शिव के पास गए। शिव ने यह शर्त रखी कि जो पूरे विश्व की परिक्रमा करके सबसे पहले यहां पहुंचेगा वही श्रेष्ठ होगा और उसी की पूजा सर्वप्रथम होगी। शर्त सुनते ही सभी देवता शीघ्रता से अपने-अपने वाहनों में बैठ विश्व की परिक्रमा के लिए प्रस्थान कर गए लेकिन गणेश जी ने बुद्धि चातुर्य का प्रयोग किया और अपने माता-पिता से एक साथ बैठने का अनुरोध किया। गणेश जी माता (पृथ्वी) और पिता (आकाश) की परिक्रमा करने के बाद सर्वश्रेष्ठ पूजन के अधिकारी बन गए।* 📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊 *#ओ३म् (ॐ) में गणेश* 📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊 *शिवमानस पूजा में श्री गणेश को ओ३म् (ॐ) या ओंकार का नामांतर प्रणव कहा गया है। इस एकाक्षर ब्रह्म में ऊपर वाला भाग गणेश का मस्तक, नीचे का भाग उदर, चंद्रबिंदु लड्डू और मात्रा सूंड मानी गई है।* 📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊 *प्राचीन समय में सुमेरू अथवा महामेरू पर्वत पर सौभरि ऋषि का अत्यंत मनोरम आश्रम था। उनकी अत्यंत रूपवती और पतिव्रता पत्नी का नाम मनोमयी था। एक दिन ऋषि लकड़ी लेने के लिए वन में गए और मनोमयी गृह-कार्य में लग गई। उसी समय एक दुष्ट कौंच नामक गंधर्व वहां आया और उसने अनुपम लावण्यवती मनोमयी को देखा तो व्याकुल हो गया। अपनी व्याकुलता में कौंच ने ऋषि-पत्नी का हाथ पकड़ लिया। रोती और कांपती हुई ऋषि पत्नी उससे दया की भीख मांगने लगी। उसी समय सौभरि ऋषि आ गए। उन्होंने कौंच को श्राप देते हुए कहा ‘तूने चोर की तरह मेरी पत्नी का हाथ पकड़ा है, इस कारण तू मूषक होकर धरती के नीचे और चोरी करके अपना पेट भरेगा। कांपते हुए गंधर्व ने मुनि से प्रार्थना की -’दयालु मुनि, अविवेक के कारण मैंने आपकी पत्नी के हाथ का स्पर्श किया था, मुझे क्षमा कर दें’।* 📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊 *ऋषि ने कहा मेरा श्राप व्यर्थ नहीं होगा, तथापि द्वापर में महर्षि पराशर के यहां गणपति देव गजमुख पुत्र रूप में प्रकट होंगे तब तू उनका वाहन बन जाएगा, जिससे देवगण भी तुम्हारा सम्मान करने लगेंगे।* 📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊 *शास्त्रों के मतानुसार भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए सबसे सरल व उत्तम उपाय है मोदक का भोग. गणेश जी को सबसे प्रिय मोदक है। गणेश जी का मोदक प्रिय होना भी उनकी बुद्धिमानी का परिचय है। मोदक का अर्थ- मोद’ यानी आनंद व ‘क’ का अर्थ है छोटा-सा भाग. अतः मोदक यानी आनंद का छोटा-सा भाग। मोदक का आकार नारियल समान, यानी ‘ख’ नामक ब्रह्मरंध्र के खोल जैसा होता है। कुंडलिनी के ‘ख’ तक पहुंचने पर आनंद की अनुभूति होती है. हाथ में रखे मोदक का अर्थ है कि उस हाथ में आनंद प्रदान करने की शक्ति है।* 📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊 *गणेश जी की सूंड को लेकर ऐसी मान्यता है कि सूंड को देखकर दुष्ट शक्तियां डरकर मार्ग से अलग हो जाती हैं। इस सूंड के जरिए गणेश जी ब्रह्मा जी पर कभी जल फेंकते हैं तो कभी फूल बरसाते हैं। गणेश जी की सूंड के दायीं ओर या बायीं ओर होने का भी अपना महत्व है. कहा जाता है कि सुख, समृद्धि व ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए उनकी दायीं ओर मुड़ी सूंड की पूजा करनी चाहिए और यदि किसी शत्रु पर विजय प्राप्त करने जाना हो तो बायीं ओर मुड़ी सूंड की पूजा करनी चाहिए।* 📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊 *लड्डू प्रेमी भगवान गणेश जी का पेट बहुत बड़ा है इसलिए उन्हें लंबोदर भी कहा जाता है। लेकिन लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर उनका नाम लंबोदर कैसे पड़ा। ब्रह्मपुराण में वर्णन मिलता है कि गणेश जी माता पार्वती का दूध दिन भर पीते रहते थे। उन्हें डर था कि कहीं भैया कार्तिकेय आकर दूध न पी लें। उनकी इस प्रवृति को देखकर पिता शंकर ने एक दिन विनोद में कह दिया कि तुम दूध बहुत पीते हो कहीं तुम लंबोदर न बन जाओ। बस इसी दिन से गणेश जी का नाम लंबोदर पड़ गया। उनके लंबोदर होने के पीछे एक कारण यह भी माना जाता है कि वे हर अच्छी-बुरी बात को पचा जाते हैं।* 📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊 *हाथी जैसा सिर होने के कारण गणेश भगवान को गजानन भी कहते हैं। उनके बड़े कान ग्राह्यशक्ति की सूचक हैं अर्थात इसका मतलब है कि हमें कान का कच्चा नहीं सच्चा होना चाहिए। कान से सुनें सभी की, लेकिन उतारें मन में सत्य को।वहीं उनकी छोटी-पैनी आंखें सूक्ष्म-तीक्ष्ण दृष्टि की सूचक हैं अर्थात सूक्ष्म आंखें जीवन में सूक्ष्म दृष्टि रखने की प्रेरणा देती हैं। जबकि उनके नाक के होने का मतलब है किसी भी दुर्गन्ध (विपदा) को दूर से ही पहचान सकें। गणेशजी के दो दांत हैं एक अखण्ड और दूसरा खण्डित। अखण्ड दांत श्रद्धा का प्रतीक है यानि श्रद्धा हमेशा बनाए रखना चाहिए. खण्डित दांत है बुद्धि का प्रतीक, इसका तात्पर्य है कि एक बार बुद्धि भ्रमित हो, लेकिन श्रद्धा न डगमगाए।* 📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊 *#नोट : उक्त जानकारी सोशल मीडिया से प्राप्त किया गया है* 📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰 *(इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)* 📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊📊

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Ammbika Jan 26, 2022

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my mandir Jan 25, 2022

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radha Jan 26, 2022

*मां-बाप के निरादर के लिए बहु नहीं, बेटा होता है जिम्मेदार* *एक वृद्ध माँ रात को 11:30 बजे रसोई में बर्तन साफ कर रही है, घर में दो बहुएँ हैं, जो बर्तनों की आवाज से परेशान होकर अपने पतियों को सास को उल्हाना देने को कहती हैं |* *वो कहती हैं आप माँ को मना करो इतनी रात को बर्तन धोने के लिये हमारी नींद खराब होती है | साथ ही सुबह 4 बजे उठ कर फिर खट्टर पट्टर शुरू कर देती हैं सुबह 5 बजे पूजा |* *आरती करके हमें सोने नहीं देती ना रात को ना ही सुबह | जाओ सोच क्या रहे हो, जाकर माँ को मना करो |* *बड़ा बेटा खड़ा होता है और रसोई की तरफ जाता है | रास्ते में छोटे भाई के कमरे में से भी वो ही बातें सुनाई पड़ती हैं जो उसके कमरे में हो रही थी | वो छोटे भाई के कमरे को खटखटा देता है | छोटा भाई बाहर आता है |* *दोनों भाई रसोई में जाते हैं, और माँ को बर्तन साफ करने में मदद करने लगते हैं, माँ मना करती है पर वो नहीं मानते, बर्तन साफ हो जाने के बाद दोनों भाई माँ को बड़े प्यार से उसके कमरे में ले जाते हैं, तो देखते हैं पिताजी भी जागे हुए हैं |* *दोनो भाई माँ को बिस्तर पर बैठा कर कहते हैं, माँ सुबह जल्दी उठा देना, हमें भी पूजा करनी है, और सुबह पिताजी के साथ योगा भी करेंगे |* *माँ बोली ठीक है बच्चो, दोनों बेटे सुबह जल्दी उठने लगे, रात को 9:30 पर ही बर्तन मांजने लगे, तो पत्नियां बोलीं माता जी करती तो हैं आप क्यों कर रहे हो बर्तन साफ ? तो बेटे बोले हम लोगों की शादी करने के पीछे एक कारण यह भी था कि माँ की सहायता हो जायेगी। पर तुम लोग ये कार्य नहीं कर रही हो कोई बात नहीं हम अपनी माँ की सहायता कर देते हैं।* *हमारी तो माँ है इसमें क्या बुराई है, अगले तीन दिनों में घर में पूरा बदलाव आ गया | बहुएँ जल्दी बर्तन इसलिये साफ करने लगीं कि नहीं तो उनके पति बर्तन साफ करने लगेंगे | साथ ही सुबह वो भी पतियों के साथ ही उठने लगीं और पूजा आरती में शामिल होने लगीं |* *कुछ दिनों में पूरे घर के वातावरण में पूरा बदलाव आ गया | बहुएँ सास ससुर को पूरा सम्मान देने लगीं |* *माँ का सम्मान तब कम नहीं होता जब बहुऐं उनका सम्मान नहीं करतीं | माँ का सम्मान तब कम होता है जब बेटे माँ का सम्मान नहीं करते या माँ के कार्य में सहयोग ना करें ।* *जन्म का रिश्ता है। माता पिता पहले आपके हैं।*

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